Women's Day Speech
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Women’s Day Speech | महिला दिवस भाषण

साथियों नमस्कार, आज के इस अंक “Women’s Day Speech | महिला दिवस भाषण” में हम आपके लिए महिला दिवस पर अपने स्कूल, कॉलेज या कार्य स्थान पर होने वाली भाषण प्रतियोगिता के लिए कुछ जानकारी देने जा रहें हैं| आशा है आपको हमारा यह संकलन ज़रूर पसंद आएगा|


Women’s Day Speech | महिला दिवस पर लेख

(साथियों कई बार ऐसा होता है की आपसे पहले दिया गया किसी का भाषण श्रोताओं को अच्छा नहीं लगता| इस स्तथी में श्रोता आपके भाषण भी सही ढंग से नहीं सुनते| इसलिए हमेशा अपने भाषण की शुरुआत किसी कहानी, कविता या शेर के साथ करें ताकि श्रोताओं का ध्यान आपके और आकर्षित हो जाए)

महिला दिवस पर कविता

खुश रहने का अधिकार नहीं मुझे,
क्यों की एक औरत हूँ में!
अपनी मर्जी से जीने का हक़ नहीं मुझे,
क्यों की एक औरत हूँ में!
खुश होने के लिए एक पल के लिए आसमान में उडती हूँ,
वहीँ दुसरे पल में पंख काट दिए जाते हैं…
क्यों की एक औरत हूँ में!!
लेकिन ज्यादा दुःख तब होता है..
जब पता चलता है यह सब एक औरत ही करती है,
औरत के साथ…
तब बड़ा समझ के झुक जाती हूँ,
क्यों की एक औरत हूँ में!!

दोस्तों! आज महिला दिवस के उपलक्ष्य में, में आपके समक्ष अपनी कुछ बात रखना चाहता/चाहती हूँ| मुझे पूर्ण विश्वाश है की आज आप मेरी बात को सुनेंगे और समझेंगे| मुझे आशा है की आज के बाद आपका महिलाओं के प्रति नज़रिया बदल जाएगा…

(दोस्तों यहाँ हम आपको कोई Women’s Day Speech | महिला दिवस भाषण लिख कर नहीं दे रहें हैं| यहाँ हम आपको महिला दिवस के बारे में कुछ ऐसी जानकारियाँ और लेख दे रहें हैं जिनकी मदद से आप अपनी एंकरिंग स्क्रिप्ट बना कर अपने श्रोताओं के दिलों पर राज कर सकते हैं)

“अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस क्यों मनाया जाता है ?”

इस दिन को मनाने की शुरुआत हुई “8 मार्च 1908” को “न्यूयार्क” शहर से जब करीब 15 हज़ार महिलाओं ने नौकरी के घंटे कम करने और वेतन वृद्धि के लिए एक साथ आन्दोलन कि शुरुआत की| इतनी तादाद में महिलाओं द्यवारा किया गया यह पहला आन्दोलन था| देखते ही देखते इस आन्दोलन को पुरे विश्व में पहचान मिल गई|

इस आन्दोलन के बाद ही महिलाओं ने अपने हक़ के लिए लड़ना शुरू किया| इस आन्दोलन के एक साल बाद “सोशलिस्ट पार्टी आफ अमेरिका” ने इस दिन को “राष्ट्रिय महिला दिवस” के रूप में मानाने की घोषणा की|

लगभग एक साल बाद 1910 में “कोपेनहेगन” में महिलाओं का एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन हुआ जिसमें इस दिन को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने का फैसला लिया गया|

इसके बाद इस दिन को मानाने को लेकर महिलाओं में लोकप्रियता और भी ज्यादा बढ़ गई| हालाँकि इस दिन को मान्यता साल 1975 में मिली जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस दिन को एक थीम के साथ मानाने की घोषणा के साथ इसे अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित किया|


अलग-अलग देशों में महिला दिवस को मानाने के तरीके

आपको जानकर हैरानी होगी की दुनियां के कई देश महिला दिवस को अपने अनूठे अंदाज़ में मानते आएँ हैं| कई देशों में महिला दिवस के दिन महिलाओं को छुट्टी के साथ-साथ बोनस दिया जाता है और कई देशों में महिला दिवस के दिन महिलाओं को फूल देने की भी परंपरा है|

वहीँ भारत में इस दिन अपने क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली महिलाओं को पुरुस्कृत कर सम्मानित किया जाता है| इसी के साथ-साथ कई समाज सेवी संस्थाओं के द्वारा गरीब महिलाओं की आर्थिक मदद कर उनके जीवन को सँवारने का बीड़ा भी उठाया जाता है|

कई स्कूल/कॉलेज में अंतर्राष्टीय महिला दिवस पर कई संस्कृतिक और रंगारंग कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं|

आपको जानकर हैरानी होगी की आज भी कई देशों में महिलाओं को वोट देने का भी अधिकार नहीं है| हालाँकि हमारे देश में महिलाऐं पुरुषों से कदम से कदम मिला कर चल रही है| आज कई भारतीय परिवारों में लड़कियों को लड़कों के सामान शिक्षा और खान-पान में बराबर का दर्जा दिया जा रहा है|

लेकिन सही मायनें में अंतर्राष्टीय महिला दिवस मनाने का मूल उद्देश्य तब पूरा होगा जब हमारे भारत वर्ष में महिलाओं को पुरूषों के बराबर पूर्ण रूप से दर्जा मिलेगा| जब महिलाओं को पूर्ण सम्मान और स्वाभिमान के साथ जीवन जीने का मौका मिलेगा|


“एक सवाल जो मेरे ज़हन में उठता हैं”

साथियों संस्कृत में एक श्लोक है, “‘यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता:।” यानि की जहाँ नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं|

भारत जैसे देश जहाँ पुराणों में नारी को पूज्य माना गया है आखिर वहां हमें महिलाओं के सम्मान और अधिकारों के लिए लड़ने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी है| हमें इस मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता है|

महिला दिवस, एक ऐसा दिन जो महिलाओं को समर्पित है लेकिन क्या हम वाकई में इस दिन से महिलाओं के समर्पण को समझना शुरू कर देते हैं ?

क्या हम इस दिन से वाकई में महिलाओं का सम्मान करना शुरू कर देते हैं ?

क्या हम वाकई में इस दिन से महिलाओं को पुरुषों के बराबर दर्जा देने का प्रण लेते हैं ?

मुझे आपसे इन सवालों के जवाब नहीं चाहिए! में चाहता हूँ की यह सवाल आप एक बार खुद से पूछे की क्या एक दिन महिलाओं का सम्मान करने या फिर एक दिन को उन्हें समर्पित कर हम वाकई में महिलाओं के लिए कुछ कर रहें हैं ?

आप खुद से यह सवाल पूछिए ?

क्या आप नव वर्ष को मनाते हुए किसी भी एक आदत या किसी भी एक ऐसी बात को  छोड़ने का प्रण करते हैं ?

अगर हाँ तो क्यों न हम महिला दिवस के दिन भी महिलाओं के सम्मान और बराबरी के लिए एक प्रण लें…


महिला दिवस के उपलक्ष्य में “महादेवी वर्मा” द्वारा लिखित एक कविता

*” मैं हैरान हूँ “*
— महादेवी वर्मा,

” मैं हैरान हूं यह सोचकर ,
किसी औरत ने क्यों नहीं उठाई उंगली ?
तुलसी दास पर ,जिसने कहा ,
“ढोल ,गंवार ,शूद्र, पशु, नारी,
ये सब ताड़न के अधिकारी।”
मैं हैरान हूं ,
किसी औरत ने
क्यों नहीं जलाई “मनुस्मृति”
जिसने पहनाई उन्हें
गुलामी की बेड़ियां ?
मैं हैरान हूं ,
किसी औरत ने क्यों नहीं धिक्कारा ?
उस “राम” को
जिसने गर्भवती पत्नी सीता को ,
परीक्षा के बाद भी
निकाल दिया घर से बाहर
धक्के मार कर।
किसी औरत ने लानत नहीं भेजी
उन सब को, जिन्होंने
” औरत को समझ कर वस्तु”
लगा दिया था दाव पर
होता रहा “नपुंसक” योद्धाओं के बीच
समूची औरत जाति का चीरहरण ?
महाभारत में ?
मै हैरान हूं यह सोचकर ,
किसी औरत ने क्यों नहीं किया ?
संयोगिता अंबा -अंबालिका के
दिन दहाड़े, अपहरण का विरोध
आज तक !
और मैं हैरान हूं ,
इतना कुछ होने के बाद भी
क्यों अपना “श्रद्धेय” मानकर
पूजती हैं मेरी मां – बहने
उन्हें देवता – भगवान मानकर?
मैं हैरान हूं,
उनकी चुप्पी देखकर
इसे उनकी सहनशीलता कहूं या
अंध श्रद्धा , या फिर
मानसिक गुलामी की पराकाष्ठा ?”

Women’s Day Speech


एक बेटी द्वारा अपनी माँ को समर्पित एक कविता

कर सकूँ बयाँ शब्दों तुम्हें,
है संभव नहीं यह माँ।

हूँ तुम्हारा अंश मैं माँ,
तुम्हारे बिन नहीं कोई
मेरा अस्तित्व जग में माँ।

भरी है जो किलकारियाँ,
तुम्हारी गोद के ब्रह्मांड में।

हैं अंकित मेरी अट्ठखेलियाँ,
तुम्हारे उर के अंत:स्थल में।

कटु थी तुम,
मृदु भी रही तुम।

कर कमलों के मर्म स्पर्श ने,
दिया अथक मनोबल
मेरे स्वाभिमान को।

कभी सरिता,
तो कभी सागर-सा
नेह बरसाया मुझ पर।

बन सखी उतर
जाया करती हो,
मेरे विचारों के धरातल पर।
तो कभी बन ढाल,
फेर दिया पानी
बेगानों के भ्रष्ट इरादों पर।

न जाने पढ़ लिया करती हो,
कैसे चेहरे के हाव-भावों को।

बन चाणक्य सिखा दिए,
दर्द,साहस,संघर्ष,विवेक
कला-कौशल आदि के पाठ।

माँ! हो तुम पहेली आज भी,
कर सकूँ बयाँ शब्दों तुम्हें,
है संभव नहीं यह माँ॥

डॉ.पूजा हेमकुमार अलापुरिया ‘हेमाक्ष’ मुंबई(महाराष्ट्र)


“अंतर्राष्टीय महिला दिवस मानाने का उद्देश्य | Women’s Day Speech”

अंतर्राष्टीय महिला दिवस मनाने के पीछे सबसे अहम् उद्देश्य यही है की महिलाओं को उनका उचित सम्मान और हक़ मिले| लेकिन असल में यह नहीं हो रहा है| हम वर्ष में एक बार महिला दिवस मना कर, महिलाओं का सम्मान कर अपने कर्त्तव्य से पल्ला झाड लेते हैं|

लेकिन क्या सिर्फ वर्ष में एक बार महिलाओं के प्रति अपना रव्वैया बदलने से महिलाओं को उनका उचित  सम्मान मिल पाएगा| हमें ज़रूरत है हर दिन महिलाओं के सम्मान और उनके अधिकारों के लिए खड़े रहने की|

हमें ज़रूरत है अपनी आने वाली पीढ़ी को महिलाओं के प्रति सम्मान और समर्पण सिखाने की| क्यों की पुराणों में भी कहा गया है जहाँ नारी का सम्मान होता है, जहाँ नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं|


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