Best Hindi Dharmik Kahani
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Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत

आदरणीय पाठक, आज के इस अंक में हम आपके लिए लेकर आएं हैं एक ऐसी कहानी “Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत” जिसे पढ़कर आप हिन्दू संस्कृति और हिंदुत्व को और भी बारीकी से जान पाएँगे| आपको यह कहानी कैसी लगती है हमें “Comment Section” में ज़रूर बताएं|

Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत

पता है वो पड़ोस वाली सरिता क्या बता रही थी ?
मुझे कहाँ से पता होगा | तुमसे बोला तो तुम जानो रमेश ने कहा|
अनीता – तुम अपने व्यंग बाण हर समय चला दिया करो, ये भी नहीं कि जरा देख लो की सामने वाले की बातो मे कितनी गंभीरता है|
रमेश – अच्छा भागवान गलती हो गयी, बताओ क्या कहना है?
अनीता – सरिता बता रही थी, कि उसकी नन्द के कई साल से संतान नहीं थी फिर वह फलां शहर से कोई 20-25 किलोमीटर आगे किसी गाँव मे टेकरी पर “हर सिद्धि “ माता का मंदिर है वहाँ गयी थी| कहते है वहां मन्नत पुरी होती है| हम भी जाकर आयें क्या?
रमेश – अच्छा तुम्हें बस मन्नत पुरी हो जाये इसलिए जाना है?
साधारणत: ऐसा कोई मनुष्य नहीं होगा जिसके पास कोई इच्छा न हो जिसे वह पुरा करना चाहता हो| जब उसे पता चले कि फलां जगह जाने से वह इच्छा पुरी भी हो जाएगी तो बेचारा भला मानुस वहां जाने से क्यों चुकने लगा| इससे अच्छा मार्केटिंग का तरीका कोई हो भी नहीं सकता| मन्नत पुर्ती के नाम पर कुछ भी आसानी से  बिक सकता है|
बड़े धार्मिक लोग है अपने देश के भगवान के नाम पर किसी तर्क के लिए अपने दिमाग मे स्थान नहीं रखते बस मन्नत पुरी हो जाये तो काहे का तर्क और काहे का वितर्क| रमेश का तो यही मानना था |
अनीता – इनसे तो बस बहस करवा लो, सारी दुनिया कह रही है पर वो सब तो बेवकुफ है| भगवान ने सारी समझदारी का ठेका तो बस इन्हे ही दे दिया है|
स्त्रीहट और बालहट के आगे भला किसकी चलती है रमेश को तो अनुमति देनी ही थी| अगले रविवार को जाना तय हुआ|
रमेश और अनीता की बच्ची बबली बड़ी खुश थी कि अगले रविवार को हम घुमने जाने वाले है| बच्चो को क्या मतलब कि कहाँ जाना है| उनके लिए तो बाहर जाना मतलब मनोरंजन है क्योंकि बबली के लिए अभी तक बाहर जाने का अनुभव केवल नानी के घर जाने का था लेकिन इस बार तो नानी के घर की तरह किसी बड़े शहर थोड़े जाना है| जहां जाते ही सादर सत्कार और मेहमान नवाजी शुरू हो जाती है|
रमेश का सोचना तो यही था कि बबली को ले जाकर क्या करेंगे! परेशानी ये थी कि बबली के दादा – दादी भी गाँव गए हुए थे तो इसे कहाँ छोड़कर जायें इसलिए मजबूरी मे साथ ले जाना पड़ा|
आप पढ़ रहें हैं Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत
रविवार को सुबह दस बजे की ट्रेन थी, टिकट भी लेना था सो थोड़ा जल्दी ही पौने दस तक स्टेशन पहुंच गये|  चार नंबर प्लेटफॉर्म पर ठीक दस बजे ट्रेन आ गयी| भारतीय रेल जब समय पर आये तो बड़ा सुकुन सा महसूस होता है| इसकी वजह है कि हम हमेशा उसकी समयबद्धता को लेकर आशंकित रहते है और उसके देरी से आने के बुरे अनुभव तो हमारे जहन मे हैं ही|
जनरल डब्बे मे चढ़े और गनीमत रही की सीट भी जल्द ही मिल गयी, ट्रेन मे ज्यादा भीड़ नहीं थी| संयोग से हमारे पास वाली सीट पर बैठे सज्जन जो की शिक्षक थे और उनकी पत्नी भी उसी मन्नत सिद्धि वाली जगह जा रहे थे|
आपस मे बातचीत शुरू हुई तो मंदिर की मान्यता को लेकर और कई कथा किस्से सुनने को मिले| शिक्षक महोदय आप को भी मान्यता पर यकीन है या हमारी तरह पत्नी की इच्छा के चलते आपको भी आना पड़ा, रमेश ने शिक्षक महोदय से पुंछा|
शिक्षक – हम तो स्वेच्छा से आये है| मुझे तो प्राचीन स्थलो, देवस्थानों पर जाना वहाँ का जनजीवन देखना, रहस्यो को जानने मे ख़ासी दिलचस्पी है| पर लगता है आप बेमन से आये है|
रमेश – मई की चिलचिलाती धूप मे लोग जाते है, कंही ठंडी जगह पर और हम है कि परेशान होते हुए जा रहे है इस आस मे कि मन्नत पुरी होती है|
शिक्षक – क्या पता होती भी हो? जब जा ही रहें तो विश्वास रखिए|
शाम के पाँच बजे ट्रेन उस जंक्शन पर पहुंची जहां से अभी 20-25 किलोमीटर का सफर करना बाकी था| दिन भर की थकान सभी के चेहरे पर साफ दिख रही थी लेकिन आस्था मे शक्ति अपार होती है|
थोड़ी देर उसी जंक्शन पर रुक कर जलपान किया और अब आगे प्रस्थान के लिए बस पकडनी थी| जंक्शन से रिक्शा कर पहले बस अड्डे गये ,जहां से गाँव के लिए छ: बजे की बस मिली जिसने रात आठ बजे उस गाँव मे उतार दिया|
रमेश को अब बबली को गोद मे लेना पड़ा| बेचारी बच्ची खुद पछता रही होगी कि वह यहाँ क्यों आ गयी| यात्रा का इतना कठिन अनुभव उसने पहली बार किया है वरन हर छुट्टियों मे नानी के घर जाती जो मात्र दो घंटे का रास्ता है उसमे भी स्टेशन पर ही मामा तैयार खड़े मिलते थे|
ये गाँव वैसा नहीं था जैसी आप आम हिंदुस्तान के गाँव कि कल्पना करते है| यहां बिजली भी थी, रहने कि व्यवस्था भी अच्छी थी, बड़े–बड़े होटल भले न हों पर धर्मशालाएँ अच्छी थी|
रोड़े भी टूटी फूटी नहीं थी और परिवहन व्यवस्था भी ठीक थी| बस से उतरते ही एक व्यक्ति रिक्शा लेकर आया और कहा मंदिर जाने आयें है| रमेश ने हाँ मे उत्तर दिया|
रिक्शे वाले ने अपना ग्राहक भाँप कर बोला कि अब तो मंदिर सुबह ही जाना होगा, चलिए आपको मंदिर के पास ही एक धर्मशाला तक छोड़ दूँ| सुबह वंही से मंदिर चले जाइएगा|
रमेश – कितने रुपये लोगे ?
साहब वैसे तो सौ रुपये लेते है पर आप अस्सी दे दीजिएगा! ये कहते हुए रिक्शे वाले ने अपने व्यापारिक कौशल का परिचय दिया| अरे भई अब क्या सोचना, चलो बस अब तो शरीर आराम मांग रहा है कहकर शिक्षक महोदय ने सहमति जाता दी|
शहरो का वातावरण गांवो से कई ज्यादा प्रदुषित होता है| बड़ी–बड़ी इमारतों ने ऐसा कब्जा जमा रखा है कि पेड़ पौधे तो दिखाई नहीं देते| हाँ बस दिखावट के लिए छोटे– छोटे गमले रख लिए जाते है जिन्हे देख गालिब की बात याद आती है “दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है”
जहां शहर मे कूलर, एसी मे भी आदमी को चैन नहीं मिल रहा वंही गाँव मे छत पर ही क्या हवा चल रही है, आनंद आ रहा है न शिक्षक साहब! क़हते हुए रमेश ने शिक्षक महोदय की ओर नजरे घुमाई|
शिक्षक महोदय – गांवो मे आज भी परिवेश प्रकृति से जुड़ा हुआ है| जो आनंद यंहा है वो और कंही नहीं है|
सबने छत पर ही अपनी–अपनी खाट बिछा ली और थकान तो इतनी कि तुरंत नींद भी आ गयी| सुबह ज्यों ही रमेश की आंखे खुली सामने चाय लिए अनीता खड़ी थी| आज वास्तव मे बहुत अच्छी नींद आई रमेश ने कहा, अनीता ने चाय का प्याला आगे बढ़ाते हुए आदेशात्मक स्वर मे बोला तो अब जल्दी से नहाँ भी लो फिर दर्शन के लिए भी जाना है|
नौ बजे तक सभी तैयार हो गये, बस अब निकलना था| मंदिर पैदल दुरी पर ही था, रमेश द्वारा नाश्ते के लिए पुंछने पर अनीता ने बताया कि पहले दर्शन कर आते है फिर खाना पीना कर लेंगे पर बबली को रास्ते मे कुछ खिला देंगे बाजार से| “चलो जैसा तुम ठीक समझो ” के साथ रमेश ने अपनी सहमति व्यक्त की
रास्ते मे बबली ने कचौरी खाई बाकि किसी ने कुछ नहीं लिया| कोई पाँच मिनट की पैदल यात्रा के बाद वह स्थान आया जहां से अब पहाड़ी का रास्ता तय करना था हालांकि सीढ़िया थी जो मंदिर तक जाती थी , करीब तीन सौ सीढ़ियाँ होंगी|
नारियल, लड्डू, धूप, दीप, सिंदुर, फूल से सजी थालियाँ जिसकी पचास रुपये कीमत थी, ऐसी दो थालियाँ ली और मंदिर तक पहुँचने के अंतिम पड़ाव की यात्रा शुरू की गयी| कुछ पचास सीढ़ियो के बाद रमेश को बबली को गोद मे उठाना पड़ा| मंदिर के पट नौ बजे खुलते थे और खुलते से ही अथाह भीड़ दर्शन को बेताब रहती|
बाजार मे खाने–पीने की दुकाने हों या कपड़ो की, खेल–खिलौने हों या जूते चपल्लो की, पूजन सामग्री की हों या मिठाई की हर जगह लोग ही लोग दिखाई देते| ये अत्यंत व्यस्त बाजार था| जैसे – जैसे सीढ़ियों पर चढ़ते जा रहे थे ऊंचाई बढने के कारण नीचे स्थित पूरा बाजार सपष्ट दिखने लगा था|
मंदिर के अंदर भक्तों का तांता लगा हुआ था पर मंदिर के अंदर व्यवस्थाएं सुचारु होने के कारण दर्शन के लिए  कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा| दर्शन के बाद बाहर आते से ही रमेश ने शिक्षक महोदय के समक्ष एक सवाल रख दिया कि क्या लगता है आपको यहां मन्नते पुरी होतीं है?
शिक्षक महोदय बड़ी विनम्रता से बोले की पूरे गाँव की अर्थव्यवस्था इसी मंदिर के भरोसे है, किसी की दुकान है तो किसी का भोजनालय और सभी की कमाई तो इस मंदिर के भक्तो से ही है| इस हिसाब से उनके परिवारों की तो रोज की आशा आकांशाओ की पूर्ति इसी मंदिर के भरोसे होती है|
अब बताइए इतने लोगो की मन्नत तो रोज ये मंदिर पुरी कर रहा है, रमेश स्तब्ध सा रह गया उसके पास कहने को कुछ नहीं था इसलिए केवल सर हिला कर सहमति प्रकट कर दी|
लौटते वक्त रास्ते मे बबली ने पिता का हाथ पकड़ा हुआ था उसने अचानक सवाल किया कि पापा सब कह रहे थे यहाँ मन्नत पुरी होती है| रमेश ने बबली को गोद मे लिया और कहा “हां होती है अगर आप दिल से मांगो तो” इस जवाब को सुनकर अनीता हैरान थी उसने पुनः मुड़कर मंदिर की ओर नमस्कार किया|
अनीता को अब यकीन हो चला था कि ये मंदिर वास्तव मे चमत्कारी है जिसके दर्शन मात्र से ही रमेश के विचारो मे परिवर्तन आ गया|

Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत

कल्पित हरित


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2 comments

  1. Thank you sir bahut badhiya story aise hi story Hamari Liye Lat aur Sar Ham bhi apni website per Aisa Hi Kuchh Gyan Dete Hain aap bhi Kuchh Humko suggest Karen dhanyvad

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