Dharmik Kahaniya

God Story in Hindi

Dharmik Kahaniya


साथियों नमस्कार, आध्यात्मिक कहानियां ( Dharmik Kahaniya ) का हमारी ज़िन्दगी में खास महत्त्व होता है | हिन्दू धर्म में  36 करोड़ देवी देवताओं को पूजा जाता जाता है | हर देवी-देवता को अपनी खास शक्ति के लिए जाना जाता है| जैसे, धन की देवी लक्ष्मी, बुद्धि की देवी सरस्वती, बल के देवता हनुमान आदि! हर देवी-देवता की इन शक्तियों के पीछे कई सारीआध्यात्मिक कहानियां होती है, जिनसे हम बहुत कुछ सीखकर हमारी ज़िन्दगी को और बेहतर बना सकते हैं |

हमारी वेबसाइट Hindi Short Stories भी यही चाहती है, कि हमारे पाठकों भी इन आध्यात्मिक कहानियों से कुछ सीखें और अपनी ज़िन्दगी को और खास बनाए |

धन्यवाद !!


शबरी की साधना | Dharmik Kahaniya

शबरी भगवन राम की परम भक्त थी| वह ”शबर” जाती की एक भोली भाली लड़की थी| शबर जाती के लोग देखने में बहुत कुरूप होते हैं| लेकिन शबरी इतनी कुरूप थी की शबर जाती के लोग भी उसका तिरस्कार करते थे|

शबरी के माँ-बाप को शबरी के विअवः की बहुत चिंता होती थी| वे दिन रात बस इसी चिंता में डूबे रहते थे की आखिर शबरी के वैवाहिक जिवन का क्या होगा|

आख़िरकार शबरी के माता पिता को शबर जाती का एक विअवः योग्य लड़का मिल गया| माता-पिता के रात्री में शबरी का विवाह कर उसे रात्रि में ही विदा कर दिया| उन्हें डर था की कहीं लड़का शबरी को देखकर विवाह के लिए इंकार न कर दे|

शबरी अपने पति के साथ रात्रि में ही निकल गई| आगे-आगे शबरी का पति चल रहा था और पीछे-पीछे शबरी| चलते-चलते वे दण्डकवन में आ पहुंचे| वहां उन्हें सुबह हो गई| लड़के ने सोचा देखूं तो सही मेरी स्त्री कैसी दिखती है|

लड़के ने पीछे मुड़कर देखा तो शबरी की कुरूपता देखकर वह डर गया| उसे लगा यह तो कोई राक्षश कुल ही है जो मुझे यहीं खा जाएगी| यह सोचकर लड़का शबरी को वहीँ छोड़कर भाग गया|

अब शबरी दण्डकवन में अकेली रह गई| वह पीहर से तो आ गई थी लेकिन उसे अपने ससुराल का कोई पता न था| अब शबरी जाए तो कहाँ जाए|

दण्डकवन में रहने वाले ऋषि शबरी को अछूत मानकर उसका तिरस्कार करने लगे| उसी वन में “मतंग” नाम के एक ऋषि महात्मा रहते थे| मातंग ऋषि को शबरी को देख कर उस पर दया आ गई| उन्होंने शबरी पर कृपा कर उसे अपने आश्रम में रहने के लिए शरण दे दी|

दुसरे ऋषि-मुनियों ने जब यह सब देखा तो उन्होंने इस बात का बहुत विरोध किया की उन्होंने एक कुरूप और अछूत जाती की लड़की को अपने आश्रम में शरण दे दी| लेकिन मतंग  ऋषि ने किसी की भी एक बात न सुनी|

उन्होंने प्रेम से शबरी के सर पर हाथ रखा और कहा – “बेटा! तुम घबराओ नहीं, जैसे कोई पुत्री अपने माँ बाप के पास रहती है वैसे ही तुम मेरे पास रह जाओ| शबरी अब ख़ुशी-ख़ुशी मतंग ऋषि के आश्रम में रहने लगी|

शबरी को ऋषि-मुनियों की सेवा करने में बड़ा आनंद आता था| सब ऋषि-मुनि शबरी का तिरस्कार करते थे इसलिए शबरी छिप-छिप कर उनकी सेवा किया करती थी|

रात में जब सब सो जाया करते थे तो शबरी रात में ऋषियों के स्नान के लिए पम्पा सरोवर जाने वाले रास्ते को जा कर बुहार देती थी| जहाँ कंकड़-पत्थर पड़े होते थे उन्हें हटा कर वहां बालू बिछा देती थी| ऋषियों के लिए इंधन ला कर रख देती थी|

अगर कोई शबरी को देख लेता तो वह वहां से डर के मारे भाग जाती थी| उसे डर था की कहीं मेरी छाया ऋषि-मुनियों पर पद गई तो वह अशुद्ध हो जाएँगे| बस इसी प्रकार ऋषि-मुनियों की सेवा में उसका समय बीतता गया|

आखिर एक दिन वह समय भी आ पहुंचा जो सबके लिए अनिवार्य है| मतंग ऋषि का समय छुटने का समय आ गया था| जैसे माँ-बाप के मरते समय बालक रोता है वैसे ही शबरी भी फुट-फुट कर रोने लगी थी|  रोने के सिवा वह कर भी क्या सकती थी|

मतंग ऋषि ने शबरी को अपने पास बुलाया और कहा, बेटा! तुम चिंता न करो, एक दिन तुम्हारे पास भगवान् राम आएँगे| बस इतना कहकर मतंग ऋषि शरीर छोड़कर चले गए|

अब शबरी दिन रात भगवन राम की प्रतीक्षा करने लगी| रात में किसी जानवर के चलने से पत्तों की खडखडाहट भी होती तो शबरी बहार आ कर देखने लगी की कहीं भगवान् राम तो नहीं आ गए|

वह प्रतिदिन कुटिया के बाहर पुष्प बिछाती और तरह-तरह के फल लाकर रख देती थी| फलों में भी बढ़िया-बढ़िया फल राम जी के लिए चखकर रख देती थी| फिर राम जी नहीं आते तो अगले दिन फिर नए फल ले आती| राम जी को भोजन करने का उसके मन में बहुत उत्साह था|

प्रतीक्षा करते-करते एक दिन शबरी की साधना सफल हुई| मतंग ऋषि के वचन सत्य हुए| भगवान् राम शबरी की कुटिया में पधारे|

कई बड़े-बड़े ऋषि मुनियों ने भगवान् राम से उनके आश्रम में चलने के लिए प्रार्थना की लेकिन भगवान् राम केवल शबरी की कुटिया में आए| जैसे शबरी को भगवान् राम से मिलने की तीव्र इच्छा थी ठीक वैसे ही भगवान् राम भी को भी शबरी से मिलने की उत्कंठा थी|

भगवान् राम शबरी की कुटिया में पहुंचे! शबरी के आनंद की सीमा नहीं रही| वह भगवान् के चरणों में लिपट गई| जल लाकर उनसे भगवान् के चरण धोए| फिर आसन बिछाकर भगवन को बैठाया| फल लाकर शबरी ने भगवान् के सामने रखे और प्रेम पूर्वक उनको खिलाने लगी|


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10 Best Dharmik Kahaniya

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आज्ञा पालन की महिमा | धार्मिक कहानियां 

भगवान् श्री कृष्ण ने सांदीपनी ऋषि से विद्याअध्ययन किया था| सांदीपनी ऋषि उनके विद्या गुरु थे|

सांदीपनी जब बाल्यावस्था में अपने गुरु के पास पढ़ते थे तब उन्होंने अपने गुरु की बहुत सेवा की| सभी विद्यार्थियों में सांदीपनी की गुरुभक्ति विशेष थी| 

एक बार गुरु के मन में सांदीपनी की परीक्षा लेने का विचार आया| उस समय उनका बालक बाहर खेल रहा था| तभी सांदीपनी अपने कुछ मित्रों के साथ वहां से गुज़रा| 

गुरूजी ने सांदीपनी को अपने बालक की और इशारा कर के कहा, “इसको कुए में डाल दे”! सांदीपनी ने गुरु की आगया का पालन किया और बालक को उठा कर कुए में डाल दिया|

बालक कुए में डूबने लगा| कुए का जल नजदीक ही था| तभी विधार्थी कुए में कूड़े और बालक को बचा लिया| अब विधार्थी सांदीपनीस को मरने लगे|

सांदीपनी ने उनकी मार सहन कर ली लेकिन किसी को नहीं बताया की उस से गुरूजी ने कहा था| गुरूजी ने विधार्थियों को  रोका की इसे मत मारो यह तुम्हारा गुरु भाई है|

सांदीपनी कोई विशेष बुद्धिमान बालक नहीं थे और न ही वे जड़ बुद्धि थे| वे एक मध्यम बुद्धि के बालक थे| परन्तु उनमें यह विशेषता थी की उन्हें गुरूजी जो भी आगया देते थे वे उसका झट से पालन कर देते थे|

उन्हें यह ज्ञात था की श्रेष्ठ पुरुषों की सबसे बड़ी सेवा उनकी आज्ञा का पालन करना है| आज्ञा का पालन करने से उनकी शक्ति हमरे अन्दर आ जाती है| इसीलिए सांदीपनी अपने गुरु की हर एक आज्ञा का पालन करते थे|

जब विद्या अध्यन समाप्त हुआ तो सभी शिष्य अपने-अपने घर चले गए| उनमें से कई विद्यार्थी अच्छे-अच्छे पंडित बन गए| सांदीपनी भी विध्याअध्यन कर चले गए|

एक दिन गुरूजी बहुत बीमार पड़ गए| उनकी बीमारी का समाचार सुन सभी शिष्य उनको मिलने के लिए आश्रम आए| 

गुरुजी के शरीर छोड़ने का समय आया तो उन्होंने अपने शिष्यों कोकुछ न कुछ वस्तुएं दी| किसी को पंचपात्र दे दिया, किसी को आमचनी दे दी| किसी को आसन दिया, किसी को माला दी|

शिष्यों ने उन वस्तुओं को गुरुमहाराज की प्रसादी मानकर बड़े आदर के साथ ले लिया| सांदीपनी भी गुरु से मिलने उनके आश्रम में पहुंचे|

जब सांदीपनीस गुरु के समीप आए तो गुरूजी चुप हो गए, फिर बोले! बेटा, तुम्हें में क्या दू! तुम्हें देने के लिए मेरे पास कोई वास्तु नहीं है| तेरी जो गुरु भक्ति है उसके सामान मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है|

परन्तु में तुझे आशीर्वाद देता हूँ की त्रिलोकीनाथ भगवान् तेरे शिष्य बनेंगे| बाद में इन्ही सांदीपनी  के पास आकर भगवान् श्री कृष्ण शिष्य बने|


चार आशीर्वाद | Dharmik Kahaniya 

एक बार एक घने जंगल में एक शिकारी शिकार करने पहुंचा| वहां उसे रस्ते में घोड़े पर स्वर एक राजकुमार मिला|शिकारी राजकुमार के साथ चलने लगा|

चलते-चलते उन्हें एक साधू मिला| अब वे दोनों साधू के साथ चल दीए| वे चरों जंगल में साथ-साथ जा रहे थे, तभी उन्हें एक कुटिया दिखाई दी|

वे चारों चलते-चलते थक गए थे सो विश्राम करने के लिए वे कुटिया में रुके| कुटिया में एक बाबाजी बेठे थे| कुछ देर कुटिया में विश्राम करने के बाद वे बाबाजी को प्रणाम कर के जाने लगे| बाबाजी ने उन चारों को चार आशीर्वाद दीए|

बाबाजी ने राजकुमार को कहा, “राजपुत्र! तुम चिरंजीवी रहो” तपस्वी से कहा, “ऋषिपुत्र! तुम मत जिओ” साधू से कहा, “तुम चाहे जिओ चाहे मरो! तुम्हारी मर्जी” और शिकारी से कहा, “तुम न जिओ न मरो”

बाबाजी चारों को आशीर्वाद देकर चुप हो गए| चारों आदमियों को बाबाजी का आशीर्वाद समझ नहीं आया| उन्होंने बाबाजी से प्रार्थना की, की कृपया अपने आशीर्वाद का तात्पर्य समझाए|

बाबाजी बोले, “राजा को नरकों में जाना पड़ता है| मनुष्य पहले तप करता है फिर तप के प्रभाव से राजा बनता है और फिर मरकर नरक में जाता है” इसलिए मेने राजकुमार को जीते रहने के आशीर्वाद दिया| जीता रहेगा तो सुख पाएगा|

तपस्या करते रहने वाला जिएगा तो  तपस्या कर के अपने शारीर को कष्ट देता रहेगा| वह मरेगा तो तपस्या के प्रभाव से स्वर्ग में जाएगा अथवा राजा बनेगा| इसलिए उसको मर जाने का आशीर्वाद दिया, जिससे की वह सुख पाए| 

साधू जीता रहेगा तो भजन-स्मरण करेगा|दूसरों का उपकार करेगा और मर जाएगा तो भगवान् के धाम में जाएगा| वह जीता रहे तो भी आनद है और मर जाए तो भी आनद है| इसलिए मेने उसे आशीर्वाद दिया की तूम जिओ चाहे मरो तुहारी मर्जी|

शिकारी दिन भर जीवों को मारता है| वह जिएगा तो जीवों को मारेगा और मरेगा तो नरकों में जाएगा| इसलिए मेने कहा तुम जिओ न मरो|

इसीलिए मनुष्य को अपना जीवन ऐसा बनाना चाहिए की वह जहाँ रहें वहां सुख पाए|


  

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