EMOTIONAL STORY

Emotional Story

EMOTIONAL STORY

Hindi Short Stories के इस अंक में आप सभी का स्वागत है  | वेबसाइट के इस अंक में आपको कई सारी Emotional Story पढने को मिलेगी  | दोस्तों, कहानियों का हमारी ज़िन्दगी में काफी महत्त्व होता है  | बचपन में हम दादी-नानी की कहानियां सुनकर काफी कुछ सिखते थे, उन कहानियों में हम खुद को जोड़ कभी राजा या कभी रानी बन जाते थे  | आज फिर हम आपको हमारी कहानियों के माध्यम से  मोहोब्बत की उन गलियों में ले जाने का प्रयत्न कर रहें हैं, जहाँ  आप फिर  से Emotional हो जाएँगे  |

धन्यवाद!


नरगिसी फुल

आज आशी जब सुबह-सुबह उठी तो खिड़की से बाहर देखते ही उसका चहरा मुरझा गया| अरे! कहाँ चले गए…कल तो यहीं थे| इतने महीनों से रोज सुबह दोनों को देखना उसकी आदत सा बन चूका था और आज जब दोनों अपनी जगह पर नहीं थे तो आशी को कुछ खाली-खाली सा लग रहा था|

सुबह-सुबह बस वो दोनों सामने दिख जाते तो आशी का रोम-रोम पुलकित हो उठता था| सुवासित हो उठती थी उसकी सांसे| मन एक अद्भुत ख़ुशी महसूस करने लगता और सबसे खास बात इन सबका सकारात्मक प्रभाव पड़ता उसके मन-मस्तिक्ष पर और कलम खुद-ब-खुद कोई गीत लिखने लगती|

पता नहीं क्या जादू था उन नरगिसी फूलों में| बस देखते ही मन मचल उठता| शायद असीम का असीम प्यार भरा था उनमे| आखिर उसी ने तो आशी के जन्मदिन पर यह गमला उसे उपहार में दिया था और फिर दोनों ने मिलकर उसमें नरगिसी फूलों का यह पौधा लगाया था|

“देखो न आशी! तुम्हारे लिए एक काम सौप कर जा रहा हूँ| कल ही मुझे कम्पनी के एक प्रोजेक्ट के लिए दुबई निकलना पड रहा है| बस छः महीने की ही तो बात है फिर आते ही झट मंगनी और पट ब्याह| बस तब तक मेरी यादों को इस पौधे में संजोती रहना” असीम को आशी को बातों में उलझाना बड़े अच्छे से आता था|

असीम बेशक चला गया था, लेकिन आशी हर रोज बड़े अरमानों से उस पौधे को सींचती रही| आशी की ख़ुशी का उस वक़्त ठिकाना नहीं था जब वह एक रोज सुबह उठी और उसने पौधे पर दो उल खिले हुए देखे, पीले रंग के…|

दोनों फुल बिलकुल एक दुसरे से जुड़े हुए थे, आशी और असीम की तरह| आशी रोज उन फूलों को निहारती रहती और असीम को याद करती|

आशी की रोज असीम से फोन पर बात होती थी, भला दो साल से चल रहा प्रेम दूरियों से कैसे कम हो सकता था| इसी प्रेम की शक्ति ने तो उसे क्या से क्या बना दिया था| कभी किसी को चिट्ठी-पत्री में दो अक्षर न लिखने वाली आशी की कलां आज अनवरत चलने लगी थी| अपने जज्बातों की स्याही में भिगोकर क्या-क्या न लिख डाला था उसने|

“तेरे अहसास में खुद को ऐसे फ़ना कर दिया हमने! ज़िन्दगी बाकी न बची, न तेरे साथ और न तेरे बाद|”

पता नहीं कैसे अहसास थे जो दिल से निकलकर पन्नों पर बिखरते रहते थे| जब भी मन होता, आशी उन नरगिस  के फूलों को निहारते हुए खिड़की के पास कागज़ कलम लेकर बैठ जाती| माँ जब डांटना शुरू कर देती तब सुध पड़ती की कुछ खाना भी है और घर का काम काज भी देखना है|

पता नहीं पिछले कुछ दिनों से क्या हो गया था उसे| पतझड़ का मौसम आ गया था, फुल मुरझाने लगे थे| माली से पुच कर खाद पानी भी डाला| असीम को फोन पर बताया तो वह भी पहले खूब हंसा फिर बोला “पतझड़ बीत जाने दो सब कुछ ठीक हो जाएगा|”

आशी फिर भी आश्वस्त नहीं हो पा रही थी| अब तो बसंत की बहार भी छाने लगी थी| चारों तरफ एक मीठी बयार बहने लगी थी लेकिन फिर भी आशी को कुछ सही नहीं लग रहा था| आज भी उन फूलों को देखे बिना बैचेनी बढ़ रही थी|

आशी, कागज कलम फेंक कर बाहर आ गई थी और गमले के आसपास ही चहलकदमी करने लगी| कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है| इसी सोच में उसे यह भी ध्यान नहीं रहा की काफी देर से बाहर की घंटी बज रही है|

“आशी! कहाँ खोई हुई हो ? दरवाजे पर कब से घंटी बज रही है…ध्यान कहाँ है ?” माँ ने दरवाजे की और जाते हुए पूछा…

इससे पहले की आशी सम्हाल पाती, दरवाजे पर असीम खड़ा था| मुस्कुराते हुए, हाथों में नरगिसी फुल लिए….

सीमा भाटिया


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