Places to Visit in Amritsar | मेरी अमृतसर की यात्रा

Places to Visit in Amritsar

Places to Visit in Amritsar | मेरी अमृतसर की यात्रा


अमृतसर भ्रमण मेरे मन में काफी समय से था| जैसे ही तारीख तय हुई मैं अपनी एकल यात्रा का खाका तैयार करने में लग गया| मैंने दो दिवसीय “मेरी अमृतसर की यात्रा | Places to Visit in Amritsar” निर्धारित की थी|

जाने से पूर्व ही मैंने अपने दोनों दिनों को ध्यानपूर्वक योजनाबद्ध किया| कहाँ निवास करना है, किन जगहों पर किस दिन किस क्रम में जाना है और किन स्थानों पर अमृतसर के प्रसिद्ध व्यंजनों का लुत्फ़ उठाना है इन पहलुओं पर विचार कर निर्धारण किया|

किस जगह पर कितना समय व्यतीत होना चाहिए इसका भी पूर्वानुमान लगा लिया था| जिन वस्तुओं की जरुरत पड़ सकती थी इसकी भी एक सूची तैयार की थी और सभी सामन अपने साथ रख लियेथे|

अवधि कम थी इसलिए दिल्ली से अमृतसर आवागमन के लिए हवाई यात्रा के माध्यम का चुनाव किया था| पूर्व निर्धारण करना आवश्यक था ताकि यात्रा के दौरान मैं अपने समय का पूर्ण उपयोग कर सकूँ और सभी महत्वपूर्ण जगहों को भी देख सकूँ|

परिणामस्वरूप अमृतसर में मुझे कुछ भी सोचने की जरुरत नहीं पड़ी क्योंकि एक कागज़ पर मेरे पास सभी निर्देश विद्यमान थे| मुझे इस बात का संतोष है कि यात्रा को जिस प्रकार सोचा था उसी प्रकार क्रियान्वित किया|

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Places to Visit in Amritsar | दिल्ली से अमृतसर

इंदिरा गांधी अंतराष्ट्रीय हवाईअड्डे से मेरे विमान के प्रस्थान का समय सुबह 05:30 बजे था| हवाईअड्डे के पूरे परिसर में अंतराष्ट्रीय मानको के अनुरूप सुविधाएँ, भव्यता और सुरक्षा देखकर मै पूर्णत: भाव-विभोर हो गया| भारत के इस प्रवेश द्वार की आभा देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई|

वहाँ खड़े नाना प्रकार के भीमकाय हवाई जहाजों को देखना रोचक था| हवाईअड्डे का अंदरूनी भाग किसी शहर जैसा लग रहा था| मेरा सेवा प्रदाता ‘एयर इंडिया’ था| मुझे यह बात विदित थी की छोटे सामान को मैं अपने साथ लेकर बैठ सकता था और किसी कतार में भी नहीं लगना पड़ता|

इसी कारण मैंने अपने साथ एक लघु बस्ता ही रखा था जिसके परिणामस्वरूप मुझे सुरक्षा जाँच में ज्यादा समय नहीं लगा| विमान में चढ़ने में कुछ समय था इसलिए मैं पतीक्षालय में बैठ गया| हवाई जहाज़ मुझे सदा ही प्रभावित करते हैं | इनका आकार, उड़ान इत्यादी| इसी कौतूहल में मैं झरोखों से हवाई पट्टी और विमानों को निहारता रहा|

सूचना मिलने पर मैं विमान की ओर चल पड़ा| अपने विमान में प्रवेश करते ही विमान परिचारिका ने ‘नमष्कार’ कहकर मेरा अभिवादन किया| मैंने भी हाथ जोड़कर प्रत्युत्तर दिया| इस अत्याधुनिक सेवा में भी भारतीय संस्कृति से साक्षात्कार मन मोहने वाला था|

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आकाश और सूर्योदय के अद्भुत नज़ारे देखने के लिए खिड़की के सम्मुख वाली जगह मैंने आग्रह करके आवंटित करवाई थी| विमान में आकाशवाणी के माध्यम से हमें सूचित किया गया कि Delhi to Amritsar पहुँचने में हमें आधे घंटे का समय लगेगा| मैं उड़ान को लेकर बहुत उत्सुक था|

अंतत:विमान ने विस्थापन शुरू किया और मुख्य हवाई पट्टी पर पहुँचा| उड़ान भरने के लिए उसने जैसे ही गति बढाई वैसे ही एक अदृश्य बल मुझे अपनी कुर्सी में दबाने लगा| मुझे यह अनुमान लगाने में देर न लगी कि यह ‘जी-फ़ोर्स’ था| इसके बारे में दूरदर्शन पर देखा था परन्तु इसका प्रभाव पहली बार महसूस किया था|

कुछ ही समय में हम भूमि से हज़ारों फीट ऊपर आ गए और खुले आकाश में अद्भुत नज़ारे देखने को मिले| भिन्न प्रकार के बादल और उनके बीच से उगता सूर्य मानो किसी कल्पना के मानचित्र से निकलकर मेरे सामने प्रत्यक्ष आ गए थे |आधे घंटे कुदरत के बेहतरीन नजारे देखने के उपरान्त हम श्री गुरु राम दास जी अंतराष्ट्रीय हवाईअड्डेपर उतर गए|


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हरमंदिर साहिब | Harmandir Sahib

अमृतसर पहुँचनेके पश्चात मेरा पहला पड़ाव स्वर्ण मंदिर या हरमंदिर साहिब ( Harmandir Sahib ) या दरबार साहिब था| हरमंदिर साहिब सेवा के पर्याय के रूप में जाना जाता है और वहाँ पहुँचने के पश्चात मैंने इसे प्रत्यक्ष अनुभव किया | मैंने परिसर में हर जगह लोगों को स्वयं सफाई करते देखा।जगह-जगह लोग प्याऊ लगाए थे |

लोगों के रहने के लिए कमरे की व्यवस्था मुफ्त में उपलब्ध थी | रेलवे स्टेशन से दरबार परिसर तक आवागमन के लिए नि:शुल्क बस भी सेवा में थी | मुख्य दरवाजे से प्रवेश करने के पश्चात सफेद संगमरमर से बना एक विशाल चौकोर आंगनथा|

आंगन के बीचों-बीच एक पवित्र तालाबऔर उसके मध्य में स्थितथास्वर्णमंदिर | मुख्य गुरुद्वारा पूर्णत: कंचन रंजित था | आंगन को स्वर्णमंदिर से जोड़ने के लिए एक पुल विद्यमानथा |तालाब के पानी को पवित्र माना जाता है |इस जलाशय का निर्माण गुरु राम दासजी ने करवाया था | उसमे तैरती मछलियाँभी स्वर्ण वर्ण की थी और अतिमोहक लगती थी|

पूरे परिसर को अच्छे से देखने के पश्चात मैंने गर्भग्रह के दर्शनाभिलाषी लोगों को देखा | भीड़ बहुत थी और मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा बन गया| लगभग २घंटे शन: शन: चलकर मुख्य कक्ष में प्रवेश कर गया| वहाँ गुरुग्रंथ साहिब के सम्मुख अरदास पढ़ी जा रही थी|

वही पर स्थापित वीडियो कैमरे से यह सब सजीव प्रसारित किया जा रहा था | बचपन में कभी पंजाबी चैनल आँखों के सामने से गुज़र जाता तो इसी प्रकार की तस्वीरें देखता था | लेकिन उस समय समझ नहीं आता था कि वह क्या था और वहाँ का चित्रण था। सिख धर्म के सबसे पवित्र तीर्थ को देखना सुखद अनुभव था, लेकिन अभी उनका एक रिवाज देखना बाकी था- लंगर |

सेवाकी इस परम्परा के बारे में मैंने बहुत सुना था लेकिन उस दिन पहली बार महसूस करने जा रहा था | लंगर स्थल में प्रवेश करते ही हमें थाली व कटोरी दिए गए | मुख्य कक्ष में कई लोग भोजन कर रहे थे इसलिए बाकि लोग बाहर ही अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे|

कुछ इंतजार करने के उपरांत हम सभी अंदर प्रवेश कर गए | मुझे एक खाली जगह मिली और वही पर आसन जमा लिया |भोजन कक्ष विशाल था और कई लोगों के बैठने की व्यवस्था थी | खाने में दाल रोटी परोसे गए | रोटी देने का भी एक अलग तरीका था |

हमें अपने करो को याचना की मुद्रा में रखना था और भोजन परोसने वाले  रोटी को हाथों पर रख देते थे | भोजनस्वादिष्ट था | खाने के उपरांत मैंने अपनी थाली को कमरे के बाहर बने हौद में रखा | वहाँ कई लोग संगठित रूप से थालियों को साफ करने का काम कर रहे थे | वह सभी सेवा भाव में रमे बड़ी कुशलता से अपना काम कर रहे थे | यह अनुभव मेरे लिए नया था |

प्रस्थानके पूर्व मै कुछ देर प्रांगण में ही बैठकर परिसर को निहारता रहा | सुखद अनुभव से मैंने स्वर्ण मंदिरसे निकास किया और अपने अगले पड़ाव की ओर चल पड़ा – जलियाँवाला बाग |


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जलियाँवाला बाग | Short Note on Jallianwala Bagh Tragedy

सेवा के प्रतीक स्वर्ण मंदिर के दर्शन करने के बाद अब बारी बलिदान के प्रतीक जलियाँवाला बाग (Jallianwala Bagh) की थी | हरमंदिरसाहिब से कुछ कदम की दूरी पर जलियाँवाला बाग स्थित है |प्रवेश द्वार के बाहर एक पत्थर का स्तम्भ है |

लगभग १५फुट ऊँचेइस पत्थर पर कई मानव चेहरों की आकृति उकेरी गई है | यह स्मारक उन भारतवासियों की स्मृति में बनाया गया है जो १९ अप्रैल १९१९को अंग्रेजों की बर्बर गोलियों द्वारा शहीद हो गए थे |

वहीं बाग़के प्रांगण में रुधिर वर्ग की दीवार पर सफेद रंग मेउभरे शब्दों में ‘जलियांवाला बाग’ हिंदी,अंग्रेजी और पंजाबी भाषा में लिखा हुआ था| मेरा मन इतिहास के पन्नों को पलटना शुरू कर चुका था|

परन्तु जैसे ही मैंनेबाग का मुख्य द्वार देखा मैं अचानक रुक गया | मेरी स्मृतियों में १९१९के घटनाक्रम सजीव होकर गुजरने लगे | वह सकरा रास्ता जिससे होकर बाग में दाखिल होते हैं अभी भी उन्हीं ईटों से अपनी कहानियाँ बयाँकर रहा था |

बात १० मार्च १९१९की है जब अंग्रेजों ने भारतीयों पर ज़ुल्म का एक और अध्याय लिखा | उस समय का लेजिस्लेटिव कॉउंसिल यानी आज के संसद भवन में एक कानून पारित हुआ| इसेरौलेट कानूनकहा गया |

इसके अंतर्गत किसी भी भारतीय को किसी भी समय, बिना कानूनी इजाजत,बिना किसी सुनवाई, अनिश्चितकालीन तक कैद किया जा सकता था | कैदी को उसका अपराध, सबूत, शिकायतकर्ता के बारे में भीजानने की इजाजत नहीं थी | यहाँतक कि अखबार पर भी शिकंजा कर दिया गया था |

१९ अप्रैल १९१९को बैसाखी के अवसर पर कई लोग जलियांवाला बाग में एकत्रित हुए थे | वह लोग इस कानून का शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे थे | अमृतसर में तैनात अंग्रेजी फौजी ‘जनरल डायर’ अपनी टुकड़ी के साथ बाग में दाखिल हुआ | उसने निकास द्वार पर अवरोध लगा दिए ताकि कोई भी बाहर न जा सके और अंधाधुंध गोलियाँ चलाना शुरु कर दिया|

देखते ही देखते अंग्रेजों की क्रूर गोलियाँ भारतीयों के शरीर को भेदने लगी| हर तरफ़ मानवता शव के रूप में पृथ्वी पर गिरने लगी |अपनी जान बचाने के लिए कई लोग बाग में स्थित एक कुँए के अंदर कूदने लगे | १०मिनट तक बर्बरता का यह दृश्य जारी रहा और फिर गोलियों की आवाज शान्त हुई|

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मगर नहींशान्त हुई उन व्यक्तियों की चीख-पुकार जिसे मैं तब भी महसूस कर पा रहा था| उस रास्ते से गुजरते समय उन पत्थरों को अपनी उंगलियों से स्पर्श कर रहा था | यह उन शहीदों के लिए मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि थी|

बाग में पहुँचने पर मैंने अमर ज्योति के दर्शन किए जो उन मृतकोंकी याद में अखंड प्रज्वलितरहती है| बाग का स्वरूप अब काफी बदल चुका है | उसे सुंदर बना दिया गया है परंतु उस समय वह खाली जगह ही थी |

जिस जगह से गोलियाँ चलाई गई थी उसे चिन्हित करने के लिए एक ठोस त्रिभुज बनाया गया है | उसपर यह वाक्य अंकित है -“यहीं से लोगों पर गोलियाँ चलाई गई थी”|  उसके सामने कई झाड़ियाँ थी जिन्हें बंदूक चलाते फौजियों के आकार में तराशा गया था|

यह सभी किसी सजीव चित्रण का आभास करा रहे थे| कुछ और आगे चलने पर बाग के अंत में लाल ईंटों से बनी वही दीवार थी जिसने उन व्यक्तियों के साथ खुद भी गोलियां झेली थी | उस दीवार पर आज भी गोलियों के निशान दर्ज है और उन्हें पर्यटकों की सहूलियत के लिए अंकित कर दिया गया है | कुल ३६ निशान थे |

उस दिन लोग उसशान्त दीवार को अपने साथ चित्र खींचने के योग्य समझ रहे थेपरन्तु उस दीवार के कराहने की आवाज सुनना कोई दुर्लभ कार्य नहीं था |उनमें से कोई ऐसा निशान भी हो सकता था जो उस गोली से बना हो जो किसी जिस्म को भेदने के पश्चात शर्म से इस दीवार में मुँहछिपाने आई हो|

अमृतसर की पावन धरती को रक्त रंजित करती उस घटना के जीवित गवाह को नमन करने के बादमै आगे बढ़ गया | बाग के बीचो बीच एक विशाल स्मारक खडा है | वह इस घटना के प्रतीक के रूप में समस्त दुनिया को सदैव स्मरण करावाता रहता है कि जो भारत भूमि मानव सभ्यता की जननी है उसी पर मानव का संघार किस प्रकार हुआ |

मेरे लिए उस कुँए को देखना भी अविस्मरणीय था जिसने उन लोगों को जान बचाने का माध्यम दिया | तब तो कूप चारों तरफ से बंद था और हम खिड़की से ही अंदर देख सकते थे| वह काफी विशाल व गहरा था | नीचे घोर अंधेरे के सिवा कुछ नजर न आ रहा था|

सोच कर ही मैं सहम गया कि कैसा भयानक मंजर रहा होगा जब लोगों ने इसमें छलांग लगाई होगी | कूप के बगल में दर्ज था “यहाँ से १२४शव निकाले गए” ।

मैं कुछ और आगे बढ़ा तो वहाँ बनाए गए एक संग्रहालय में प्रवेश किया | उसमें कई मृतकों व घायलों की तस्वीर व व्याख्यान प्रदर्शित था | उन मासूम लोगों को देखकर दु:ख हुआ परन्तु उसी के समीप एक और प्रदर्शनी को देखकर कुछ मरहम भी लगा|

कुछ वर्ष पहले वहाँ अंग्रेजों का एक समूह आया था जिन्होंने नम आंखों के साथ इस नृशंसता के लिए क्षमा याचना की थी | इसके चित्र भीवहाँ लगे थे | हालांकि इस ग्लानी की अनुभूति से भारत की छति कम नहीं हो सकती थी परंतुउनके पश्चाताप का साधन जरूर बन सकती थी|

संग्रहालय में प्रदर्शनी के अंत के साथ मेरे जलियांवाला बाग से प्रस्थान का मार्ग प्रशस्त हो गया | बाहर आकर मैंने उस बाग को दोबारा मुड़ कर देखा और उन शहीदों को नमन करके १९१९की यादों से निकल कर पुनः वास्तविक दिन में लौट आया |

जलियांवाला बाग नरसंहार से भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति रोष और भड़क गया और अंततः १५अगस्त १९४७ को भारत आजाद हुआ | परन्तु हमें इस आजादी की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी – विभाजन | इसे वास्तविक रूप में महसूस करने के लिए मेरा अगला पड़ाव हिंदुस्तान-पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित वाघा-अटारी बॉर्डर था।


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वाघा अटारी बॉर्डर | Wagah Border

स्वर्ण मंदिर के परिसर में ही लोग अटारी बॉर्डर Wagah Border के लिए आगंतुक तलाशने मिल जाएँगे | उस दिन अपराह्न २बजे मैंने एक व्यक्ति से बात करी | उसने मुझे बताया किवह मुझे अटारी सीमा तक ले कर जाएगा और सायं काल वापस लेकर भी आएगा | मैं बहुत ही उत्सुक था और झट उस गाड़ी में बैठ गया|

गाड़ी में केवल एक ही जगह बची थी | मुझे लकड़ी के पटरे पर बैठने को मिला | मैं जान रहा था कि सफर लंबा था और समय भी अत्यधिक लगने वाला थातदापि अपने गंतव्य तक पहुँचनेकी उत्सुकता में यह असुविधा कहीं खो गई |

१ घंटे का सफर करके हम उस स्थान पर रुके जहाँ से अंतरराष्ट्रीय सीमा तक की १ किलोमीटर की दूरी हमें पैदल ही पूरी करनी थी | भीड़ के साथ और सीमा सुरक्षा बल की पैनी निघरानी में मैं एक कतारमें लग गया|

इन जवानों की कार्य पद्धति व अनुशासन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दोपहर की धूप और गर्मी के बाद भी हमारी हिम्मत नहीं थी कि कतारों को तोड़कर आगे जा सके| यदि किसी मनचले ने ऐसी कोशिश की तो उसे कतार में कहीं पीछे पहुँचा दिया जाता था| यह सब देखना अत्यंत ही मनोरंजक था| एक टोपी और पानी की बोतल लिए मैं भी इस कौतूहल भरी भीड़ का हिस्सा था|

प्रचण्ड सूर्य भी हमारे धैर्य की परीक्षा लेने पर अमादा था परंतु जब किसी लक्ष्य को पाने की सच्ची कामना होती है तब रास्तों की अड़चनें तुच्छ जान पड़ती हैं| शन: शन: अपनी तलाशी औरजाँच के उपरान्त हम समारोह स्थल के प्रवेश द्वार पर पहुँचे | बाकी सभी लोग तो उत्सुकता में आगे बढ़ते जा रहे थे परंतु मैं वहीं ठहर गया या यूँ कहें कि मेरे पैर खुद रुक गए|

अपनेदाएँ हाथ पर मैंने ‘सीमा बाड़े’ देखी | दरसल सीमा से कुछ मीटर की दूरी पर अपने इलाके में भारत ने कटीले तारों व जालियों से बाडे या अवरोध बनाए हैं जो पाकिस्तान से भारत में अवैध घुसपैठ रोकने में सहायता करते हैं|

इन बाड़ो के बारे में मैंने कई बार पढ़ा था और दूरदर्शन पर भी देखा था परंतु प्रत्यक्ष रूप में पहली बार देख रहा था | पहली बार ही मुझे सरहद का अनुभव हुआ|

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अपने सामने मैंने प्रवेशद्वार देखा जो काफी ऊँचा था और उस पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था ‘INDIA’ | इस दृश्य से मेरे मुख पर गर्वित मुस्कान आ गई और इस भाव को अपने अंदर समेटे हुए मैं भी समारोह स्थल में प्रवेश कर गया।

वहाँ की फिजा देखते ही बनती थी | वह एक गोलाकार क्षेत्र था | तीन तरफ नीचे से ऊपर तक लोगों के बैठने की जगह थी जो पूरी भर चुकी थी और लोग खड़े हुए थे|

ग्रैंड ट्रंक रोड (जी.टी. रोड) जिसपर मैं खड़ा था सीमा पार करती हुई पाकिस्तान में प्रवेश करती है | इसी सड़क पर सीमा पर दोनों तरफ दरवाजे लगे थे और उनके बगल में भारत-पाकिस्तान के राष्ट्रध्वज फहर रहे थे | हमारे दरवाजे के एक पल्ले पर लिखा था ‘INDIA’ व दूसरे पर ‘भारत’|

दोनों दरवाजों के मध्य जो जगह थी वहाँ बंदूकधारी कमाण्डो खडे थे अपने पाकिस्तानी समकक्ष से आँख मेंआँख मिलाकर| दोनों कमाण्डो के मध्य एक सफेद लकीर बनी हुई थी जो वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सीमा थी | सीमा के उस पार मैंने पाकिस्तान देखा| वहाँ कुछ मुट्ठी भर लोग ही दिखाई पड़े| उस दिन अपने भारतीय होने का मुझे अलग ही एहसास हुआ|

इतने अल्पकाल में राष्ट्रीयता से जुड़े बहुसंख्यक अनुभवों को अपने मानस की पोटली में बाँधनाएक दुष्कर कार्य था| भावनाओं मे ओतप्रोत मैं अपनी दृष्टि पलट को इन्हें शीघ्र ग्रहण करने के लिए समझा ही रहा था कि बीएसएफ वालों ने मुझे सीढ़ियों से ऊपर जाने को कहा|

कहीं जगह न मिलने के कारण मैं सबसेऊपरीसीढी तक पहुँच गया और एक ऐसी जगह खड़ा हो गया जहाँ भीड़ कम थी | स्थिर होने के उपरान्त मैंअगल-बगल के दृश्यों को देखने लगा कि तभी मेरी दृष्टि पीछे खेतों की तरफ पड़ी और वहाँ जो कुछ देखा उससे मैं अत्यंत भावुक हो गया|

खेतों के मध्य में मैंने दोबारा उन्हीं बाड़ों को देखा| जहाँ तक दृष्टि गई वह अवरोध दिखाई पड़े| वास्तविक सीमा तो सीमा स्तंभ से जानी जाती है परंतु वह जालियाँ किसी सीमा से कम नहीं लग रही थी| अपने अखंड भारत को खंडित करती यह लकीरें देख कर मैं सचमुच बहुत उदास हो गया| मेरे मन में सदैव इस बात का मलाल रहता है कि भारत का विभाजन हुआ|

उन क्षणों में अपने आप को सम्भाल कर मैं वापिस सजग हुआ| मैंने देखा कि बाड़ों के साथ-साथ सीमा सुरक्षा बल के दो जवान अपनी दुपहिया वाहन पर गश्त लगा रहे थे|

मैं यह सब देख ही रहा था कि मुझे ९० डिग्री कोण वाली सरहद का ख्याल आया| जैसे कि मैंने बताया था कि सीमा सरहद स्तम्भ से प्रदर्शित की जाती है| कार्यक्रम स्थल के समीप एक स्तंभ है जिसकी खास बात यह है कि यहाँ से सीमा ९० डिग्री का कोण बनाती है इसीलिए इसे ९० डिग्री सीमा स्तम्भ कहते हैं|

बीएसएफ के दो जवान इसकी सुरक्षा में तैनात थे| सौर ऊर्जा से संचालित विद्युत बल्ब भी रोशनी के लिए इसके समीप लगे थे| मेरे लिए यह सब प्रत्यक्ष देखना बड़ा ही रोचक था|

मुख्य सड़क पर सीमा सुरक्षा बल के जवान और प्रशिक्षक सादी वर्दी में भी थे| वह दर्शकों में जोश भरने का काम कर रहे थे| देश का गुणगान करते नारे लगवा रहे थे| वह कहते “भारत माता की” औरसभी लोग बड़ी ही शान से उत्तर देते “जय”| उसी प्रकार “हिंदुस्तान जिंदाबाद” का उद्घोष भी फिजा में देशभक्ति के रंग को और गहरा कर रहा था|

भारत माता की वंदना के स्वर तो मेरी जिह्वा से अनायास ही निकलते रहते हैं परंतु वहाँ मैं अपने शरीर के हर कण में इसकी धमक महसूस कर रहा था| तभी वहाँ कुछ महिलाओं को तिरंगे झंडे दिए गए और उन्हें दौड़ते हुए सीमा के पास जाकर पुनः वापस आने को कहा गया| यह सिलसिला दो महिलाओं से शुरू हुआ और काफिला बढ़ता गया|

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उनके हाथों में लहरता तिरंगा और साथ ही देशभक्ति के गीत समा में असीम ऊर्जा का संचार कर रहे थे| इसके बाद कार्यक्रम शुरू हुआ| सुनियोजित तरीके से भारतीय व पाकिस्तानी जवान बल का सांकेतिक प्रदर्शन करने लगे|

कभी पैर पटकते तो कभी हाथों द्वारा आक्रामक मुद्राएँ दिखाते| पीछे जोश भरती धुनों से वह किसी वास्तविक चलचित्र जैसा लग रहा था| १ घंटे तक हमारे अंदर उस माहौल में राष्ट्र प्रेम की भावना हिलोरे खाती रही|

सायं काल दोनों राष्ट्रीय ध्वजों को नाटकीय ढंग से उतारा गया और सीमा पर लगे फाटक को बंद कर दिया गया| इसी के साथ इस अद्भुत कार्यक्रम का भव्य समापन हुआ| प्रस्थान करने के पहले मैंने दोबारा उन सीमा अवरोध को देखा| देश भक्ति के समंदर में गोते लगाते हुए एक बार पुन: गम की लहरों ने मुझे कुछ दूर फेक दिया|

भीड़ के साथ चलते चलते मैं मुख्य समारोह स्थल के बाहर आ गया| मैंने मुड़कर उस विशाल प्रवेश द्वार को देखा|अपनी सीमित स्मृति और चक्षुओं में राष्ट्र के सम्मान और उससे जुड़े इतिहास को जितना समेट सकता था समेटा|

विभाजन के इतिहास और अमृतसर की इस अनमोल धरोहर को सजीव रूप में देखने के बाद अब बारी थी इतिहास से एक अन्य प्रकार से रूबरू होने की| मेरा अगला पड़ाव ऐतिहासिक संग्रहालय थे।


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ऐतिहासिक संग्रहालय

अगले दिन मैंने कई जगहों का रुख किया |

  • महाराजा रंजीत सिंह किला | Maharaja Ranjit Singh Museum : अमृतसर के संस्थापक का किला और इसमें निहित संग्रहालयमें इनके जीवन पर कई कथाएँ प्रदर्शित थी|
  • राष्ट्रीय युद्ध स्मारक  | National War Memorial: यहाँ भारतीय थल, नभ और जल सेना द्वारा लड़ी गई हर लड़ाई की कहानी विधिवत ढंग से दर्शाई गई है| भारत की अक्षुण्णता को बनाए रखने के लिएसैनिकोंने किस प्रकार अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया यह बहुआयामीविधि (रौशनी, आवाज़ और झांकी) द्वारा समझाया गया है | इसके मुख्य प्रांगण में एक बहुत ऊँची तलवार बनाई गई है जिसकी नोक आसमान की ओर है | यहाँ पर सात आयामी चलचित्र (सेवेन-डी) भी दिखाई जाती है जो भारतीय सेना को समर्पित है | कई खण्डों में बंटी इस इमारत में सेना को सम्पूर्ण श्रद्दांजलि दी गई है |
  • विभाजन संग्रहालय | Partition Museum: मेरे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम में विभाजन संग्रहालय अति महत्वपूर्ण था | किसी हादसे की कहानी वही सबसे अच्छे से बता सकता है जो उससे सर्वाधिक प्रभावित हुआ हो | उसी प्रकार अमृतसर, जिसने विभाजन के घाव प्रत्यक्ष अनुभव किए थे उस दृष्टा को अच्छे से सुना सकता था | हरमंदिर साहिब के पीछे विभाजन संग्रहालय स्थित है | बाहर से देखने में वह एक आम सी जगह प्रतीत होती है परंतु भीतर जाने पर वह सजीव इतिहास से व्याप्त है | इस संग्रहालय में चार मंजिल है और हर मंजिल पर विभाजन के किसी पहलू को विस्तार में प्रदर्शित किया गया है | विभाजन के बारे में जब भी सोचता था तो मेरी सोच जमीनी बँटवारे तक ही सीमित रह जाती थी | यह कभी ख्याल ही नहीं आया कि भूमि के अतिरिक्त मुद्रा, संस्कृति, खेल, रेल, सरकारी तंत्र इत्यादि का भी विभाजन हुआ था | अखंड भारत का विभाजन मेरे लिए हमेशा ही दुखदाई पहलू रहा है और इसके बारे में बात करने अथवा इसे स्मरण करके अत्यंत शुब्ध हो जाता हूँ| प्रवेश करते ही मेरे सम्मुख तस्वीरें आने लगी जिसे अमृतसर की धरती ने १९४७में देखी होगी | नरसंघार के परिणामस्वरूप पूरी सड़क पर शव पड़े थे और अगल -बगल गिद्धबैठे थे जो इन लाशों कोखा रहे थे | जले हुए मकान, बिलखते लोग जो रेलगाड़ी की छत पर टंगे अपना सब कुछ छोड़ किसीशून्य की ओर जा रहे थे |

 

कई लोगों ने अपने प्रियजन (जिन्होंने १९४७ की त्रासदी को अनुभव किया था) उनकी किसी वस्तु को संग्रहालय को दान दे दिया था | वह वस्तु और उनके अनुभव भी विद्यमान थे|

वह सभी मार्मिक दृश्य कल्पना और वर्णन से परे थे | आज के चमकते दमकते भारत ने ऐसा दिन भी देखा था इसे सोचना बड़ा ही कठिन है | आज़ादी क्या होती है और किस कीमत पर मिलती है इससेआज के लोगअनजान हैं क्योकि यह सबहमकोजन्म से ही सहज रूप में मिला है |

पाकिस्तान बनने के पश्चात उसकी मुद्रा की छपाई के लिए कोई साधन नहीं था इसलिए जब तक पाकिस्तानी रिजर्व बैंक कार्यरत नहीं हुआ तब तक भारतीय रिजर्व बैंक में ही उसकी मुद्रा भी छपती थी | फौज की टुकड़ियाँ जो उनके इलाके में ही थी पकिस्तानको दी गई | इसी प्रकार रेल का परिचालन भारतीय सीमा तक ही सीमित कर दिया गया|

पाकिस्तान में बिछी पटरियाँ इस प्रकार उनके हिस्से में आ गईं | अविभाजित भारत का प्रतिनिधित्व करते अंतरराष्ट्रीय खिलाडियों का भी विभाजन हुआ | पहले जो खिलाड़ी एक साथ खेले थे वहीभारत पाकिस्तान की तरफ से आमने सामने भी खेले |

शरणार्थियों की प्रदर्शनी मार्मिक थी | भारी संख्या में विस्थापित लोगों के लिए अस्थाई प्रबंध किए गए थे | यूँ प्रतीत हो रहा था मानो किसी अस्थाई शहर को ही बसा दिया गया हो |उस विषम परिस्थिथि में इसका संचालन किस प्रकार हुआ होगा यह एक शोध का विषय हो सकता है|

लोगों ने अपने घर को छोड़ने के पहले घर की चाभी अपने पड़ोसियों को दी और कहा कि जब सब सामान्य हो जाएगा तो लौट आएँगे | इस वाक्य से लोगों की मानसिक प्रताड़ना और मजबूरी की परिकाष्ठा का अनुमान लगाया जा सकता है |अपना घर, व्यस्याय और प्रियजन को एक दिलासा लेकर छोड़ा कि कभीवापस लौटकर आएँगे | वास्तव में ऐसा कभी नहीं होने वाला था |

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यहाँ तक कि कारोबार पर भी विभाजन का असर पड़ा | भारतीय कारोबारियों के कराची और लाहौर स्थित ग्राहको को विभाजन के पश्चात आपूर्ति के लिए सरकार से निर्यात अनुमति लेनी पड़ती थी | उनको अपने उत्पाद पर ‘मेड इन इंडिया’ लिखना अनिवार्य हो गया था |

वहाँ पर ३ घंटो तक रहने के बाद भीलग रहा था कि कुछ छूट न गया हो | संग्रहालय में विभाजन से संबंधित बारीक से बारीकजानकारी काउल्लेख था| आखिरी एक कक्ष में अतिथियों की प्रतिक्रियाएँ दर्ज करने के लिए कई प्रावधान थे|

लोग इतने प्रभावित थे कि अपने विचार दर्ज करने के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे |एक कृत्रिम वृक्ष भी बनाया गया था जिसपर लोग अपने हस्तलिखित सन्देश को एक पन्ने पर लिखकर टांग रहे थे और चित्र खिचवा रहे थे|

मैंने भी अपने विचार आगन्तुक पुस्तिका में दर्ज किए और इतिहास के इस भव्य भवन को एक दिलासा लेकर छोड़ा कि कभी वापस लौटकर आएँगे|

अमृतसर की भूमि शौर्य, बलिदान, सेवा वइतिहास से सराबोर है | इस पावन धरती ने एक तरफ जहाँ सेवा परमो धर्मा: की कथनी को सार्थक किया है वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीयता के भाव को सहेज कर रखा है |

अटारी सीमा पर मैंने अपने देश के वीर जवानों का शौर्य देखा तो विभाजन संग्रहालय में भारत के इतिहास को टटोला | इसी के साथ मेरी अमृतसर यात्रा की समाप्ति हुई और मिली-जुली स्मृतियों के साथ मैंने इस भूमि से विदा ली |

गौरांग 

२२-जून-२०१९

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