Gratitude Moral Stories in Hindi कृतज्ञता |

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए एक ऐसी “Gratitude Moral Stories in Hindi” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आपके विचारों में एक नया जोश और उमंग उत्पन्न होगा| आपको हमारी यह कहानी कैसी लगती है हमें Comment Section में ज़रूर बताएं|


कृतज्ञता | Moral Stories in Hindi

एक गाँव में एक गरीब आदमी रहता था| पड़ा लिखा था, इमानदार था, लेकिन नौकरी के लिए दर-दर भटकता फिर रहा था| ऐसे ही भटकते-भटकते एक दिन वो पास के गाँव में जा पहुंचा और एक दुकान पर जा कर नौकरी के लिए याचना करने लगा|

सेठ काफी अनुभवी था| उसे समझते देर नहीं लगी की वह आदमी पड़ा लिखा है| सेठ ने उसे अपनी दुकान में  एक छोटी सी नौकरी दे दी| आदमी बहुत खुश हुआ और मन लगा कर सेठ के यहाँ काम करने लग गया|

गुण तो उसमें थे ही, इसीलिए सेठ उसके काम से बहुत प्रभावित हुआ और समय के साथ उसकी तरक्की भी हो गई|  देखते ही देखते दर-दर भटकने वाला वह आदमी सेठ का मुनीम बन गया|

सब कुछ ठीक चल रहा था, तभी सेठ ने देखा की रोज़ दोपहर को मुनीम अपने कमरे के दरवाज़े बंद कर लेता था| सेठ को मुनीम पर संदेह होने लगा| अब सेठ रोज़ मुनीम पर निगाह रखने लगा| हर रोज़ दोपहर के वक्त मुनीम अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लेता|

अब तो सेठ को संदेह हो गया की हो ना हो मुनीम  रूपए चुराता होगा और दोपहर के वक्त अपने कमरे में कहीं छुपा कर रख देता होगा| एक दिन जैसे ही दौपहर में मुनीम ने अपने कमरे का दरवाज़ा बवण्ड किया| सेठ वहां पहुंच गया और बोला, खोलो दरवाज़ा|

मुनीम ने दरवाज़ा खोला और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया| कमरे में दाखिल होते ही सेठ जी की नज़र एक पुराने बक्से पर पड़ी जिस पर ताला लगा था, सेठ जी को संदेह हुआ “हो ना हो, मुनीम ने रूपए यहीं छुपा कर रखें होंगे” सेठ जी ने मुनीम को डाटते हुए कहा  “क्या है इस बक्से में, खोलो इसे”|

मुनीम ने सेठ जी को हाथ  जोड़ कर निवेदन किया, “इस बक्से में कुछ नहीं है सेठ जी….इसे मत खुलवाइए| अब तो सेठ जी का शक और पक्का हो गया| उन्होंने ज़बरदस्ती मुनीम से बक्सा खुलवाया|

सेठ जी बक्से में पड़े सामान को देख कर दांग रह गए| बक्से में एक कुचेला कुरता और एक जोड़ी चप्पल पड़ी थी| मुनीम ने हाथ जोड़ कर कहा “सेठ जी ये वही कपडे हैं, जिन्हें पहनकर में पहली बार आपके यहाँ नौकरी मांगने के लिए आया था|

रोज़ दोपहर के वक्त इन कपड़ों को देख कर अपने पुराने दिनों को याद करता हूँ| आज तो आपकी कृपा से अच्छा पहनता हूँ, लेकिन रोज़ इन पुराने कपड़ों को देखता  हूँ ताकि पुराने दिनों को भूल न जाऊं और आपकी कृपा यद् आती रहे|

सेठ मुनीम की बाद सुनकर मन ही मन शर्मिंदा हो गया|

कहानी का तर्क यही है, कि “हमें हमेशा याद रखना चाहिए की किस-किस ने हमारी सहायता की, हमारी ज़रूरतें पूरी की हमारा साथ दिया| हमें उस लोगों के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए|


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