Hindi Short Moral Stories | मोरल स्टोरी इन हिंदी

Hindi Short Moral Stories | मोरल स्टोरी इन हिंदी

हेल्लो दोस्तों, आज फिर हम आपके लिए दादी-नानी की तिन ऐसी  खास कहानियों “Hindi Short Moral Stories | मोरल स्टोरी इन हिंदी” का संग्रह लेकर आएं हैं जिन्हें आप खुद पढ़कर भी कई बाते सिख सकते हैं और अपने घर परिवार के बच्चों को सुनाकर उन्हें भी ज़िन्दगी के कई पहलुओं का ज्ञान करा सकते हैं|

तो खास आपके लिए पेश है दादी नानी की कहानी|


                            सपने का सच | Hindi Short Moral Stories

एक व्यक्ति ने एक रात सपने में देखा की वह एक बहुत ही बड़े राज्य का राजा बन गया है| सुबह जब वह उठा तो अपने रात के सपने को सच मान बैठा और खुद को राजा समझ कर प्रसन्न होता रहा|

दिन चढ़ते ही पिता ने काम पर साथ चलने को कहा लेकिन उसने पिता की बात को अनसुना कर दिया| थोड़ी देर बाद ही माँ ने जंगल से लकड़ियाँ काट लेन की आज्ञा दी लेकिन उसने लकड़ियाँ लाने से भी मना कर दिया और खुद को राजा समझ बिस्तर पर ही बैठा रहा|

कुछ देर बाद ही धर्मपत्नी ने बाजार से खाने का सामान लेन को कहा लेकिन युवक ने कोई भी काम ना कर सिर्फ एक ही उत्तर दिया कि, “में राजा हूँ…में कोई काम कैसे कर सकता हूँ!

घर वाले बड़े हैरान-परेशान थे की आखिर किया क्या जाए ?  तब कमान सम्हाली उसकी छोटी बहन ने, एक-एक कर उसने सबको चोके में बैठाकर भोजन करा दिया और अकेले खयाली महाराज ही भूखे  बैठे-के-बैठे रह गए|

शाम हो गई| महाराज का भूख से बुरा हाल हो गया| शरीर में आंते कुलबुलाने लगी| आख़िरकार जब युवक से रहा नही गया तो वह पलंग से उतर कर सीधा अपनी बहन के पास गया और बोला, ” क्यों री ! मुझे खाना नहीं देगी क्या ?”

बहन ने मुह बनाते हुए कहा, ” राजाधिराज ! रात आने दीजिये, इन्द्रलोक से परियां आकर आकाश से सीधा आपके महल में उतरेंगी, वही आपको उपयुक्त भोजन परोसेंगी| हमारे रूखे-सूखे भोजन से आपको संतोष कहाँ मिलेगा|

स्वप्न देखकर खुद को राजा समझने वाले युवक का स्वप्न टुटा और उसने मान लिया की बिना महनत के कभी भी तक्थों ताज नहीं मिलते|

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                   शुभचिंतक की पहचान | मोरल स्टोरी इन हिंदी

एक राज्य का राजा बड़ा सरल स्वाभाव का था| उसके प्रशंशक और भक्त बनकर अनेक लोग उसके राजदरबार में पहुँचते और कुछ न कुछ ठगकर ले जाते|

एक से दुसरे को इस बात की खबर लगी और धीरे-धीरे खबर पुरे राज्य में फैल गई| धीरे-धीरे कई लोग कुछ ना कुछ पाने के लालच में राजा के शुभचिंतक और प्रशंशक बनकर राजदरबार में पहुँचने लगे| अपने शुभचिंतकों की इतनी भीड़ देखकर राजा स्वयं हैरान रहने लगा|

एक दिन राजा के दिमाग में एक बात आई कि, “इतने लोग तो सच्चे शुभचिंतक नहीं हो सकते| हों ना हो यह लोग किसी ना किसी लालच में राजदरबार में पहुँच रहें हैं| इनमें से असली और नकली शुभचिंतक की पहचान जरुर करना चाहिए| राजा ने राजदरबारियों की एक बैठक बुलाई और अपने मन में चल रही शंका को राजदरबारियों के समक्ष रखा|

राजा ने पुरोहित से परामर्श कर के दुसरे दिन बीमार बने रहने का बहाना किया और राज्य में खबर फैला दी की राजा के स्वस्थ होने के लिए पांच व्यक्तियों के रक्त की आवश्यकता है अतः जो भी शुभचिंतक महाराज के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर सकता है वह राजदरबार में पहुंचे|

घोषणा सुनकर पुरे राज्य में हलचल मच गई| एक से बढ़कर एक खुद को राजा का शुभचिंतक बताने वालों में से एक भी शुभचिंतक राजा के दरबार में नहीं पहुंचा|राजा और उनके दरबारियों का राजा के शुभचिंतकों के असली चहरे का पता चल चूका था|

इसलिए कहा गया है, “ज्यादा प्रशंशा करने वाले व्यक्तियों से हमेशा दुरी बनाकर ही रखना चाहिए|

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                         मुर्ख वैज्ञानिक | हिंदी प्रेरणादायक कहानी

एक बार चार मित्र यात्रा पर निकले| उनमें से तिन वैज्ञानिक थे पर अक्ल से मुर्ख थे जबकि एक अनपढ़ था पर अक्ल से बुद्धिमान था| चलते चलते चारों एक जंगल से होकर गुजरे| मार्ग में उन्हें एक मारा हुआ शेर पड़ा मिला| मुर्ख वैज्ञानिकों ने सोचा क्यों ना हम इस मरे हुए शेर पर अपनी विद्या की परीक्षा कर लें|

बस फिर क्या था, सोचने भर की देर थी और एक वैज्ञानिक ने शेर की मांसपेशियों को ठीक किया दुसरे ने शेर में  रक्त का संचार किया और तीसरा वैज्ञानिक शेर में प्राण डालने ही वाला था की चोथे बुद्धिमान अवेज्ञानिक ने कहा, “अरे-अरे ! तुम यह क्या कर रहे हो ? तुम शेर को जीवित करने जा रहे हो| शेर जीवित होते ही सबसे पहले हम सबको खा जाएगा| पहले अपनी रक्षा का उपाय तो कर लो|

लेकिन उसे अनपढ़ समझ कर उसकी बात एक ने ना सुनी| लाचार होकर वह अकेला पेड पर चढ़कर बेठ गया| उधर तीसरे वैज्ञानिक ने जैसे  ही शेर में प्राण डाले, शेर जीवित हो उठा और उठकर सबसे पहले तीनों को खा गया|

इसीलिए कहा गया है, “मुर्ख मित्र से विद्वान क्षत्रु भला”

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नक़ल में भी अक्कल की ज़रूरत होती है | Hindi Short Moral Stories

एक बार एक व्यापारी अपने घोड़े और घड़े को लेकर व्यापार के लिए निकला| हात बाज़ार से व्यापारी ने गधे के ऊपर रुई और घोड़े के ऊपर नमक बांध दिया|

खरीददारी करने के बाद व्यापारी घोड़े और घड़े को अपन्मे साथ लेकर नगर की और निकल पड़ा| आगे-आगे व्यापारी चल रहा था और पीछे-पीछे घोडा और गधा नामा और रुई को बोरियां अपने पीठ पर लादे चल रहे थे|

तभी रास्ते में एक्नादी पड़ी और घोड़े को एक उपाय सुझा| घोड़े ने झट से व्यापारी से नज़र बचा के नदी में डुबकी लगा दी| पानीमें डुबकी लगाते ही घोड़े की पीठ पर लदा नमक नदी में घुल गया और घोड़े की पीठ पर वज़न कम हो गया| यह देख गधा बोला|भाई, आप यह क्या कर रहे हो|

गधे का आग्रह सुनकर घोडा बोला में नदी में डुबकी लगा कर अपना वज़न कम कर रहा हूँ| यह देख गधे ने भी बिना कुछ सोचे समझे नदी में डुबकी लगा दी|

लेकिन गधे की पीठ पर तो रुई के बोर लदे थे| नदी में डुबकी लगते हीरुई सारा पानी पि गई और गधे की पीठ पर लादे बोर भरी हो गए| अब गधे को रुई ढ़ोने में पसीने छुट गए|

इसीलिए कहा गयाहै नक़ल में भी अक्कल की ज़रिउरत होती है इसलिए कभी भी किसी की भी नक़ल सोच समझ कर करना चाहिए|


कर्त्तव्य की कसौटी | Hindi Kahani

महाराणा प्रताप स्वतंत्रता संग्राम में झुझते हुए वन-वन भटकते फिर रहे थे| उन्होंने वन और पर्वतों में अपने परिवार सहीत डेरा जमा रखा था| लेकिन एक दिन महान प्रताप के जीवन में वह दिन आया की महाराणा प्रताप के पास खाने के लिए भी कुछ न रहा|

आखरी बचे अन्न से महराना प्रताप की धर्मपत्नी ने जो रोटी बनाई थी उसे भी वन बिलाव उठा कर ले गया| अब भूख भी बर्दाश्त के बाहर थी| महाराणा प्रताप की छोटी सी बच्ची भी अब भूख से व्याकुल हो उठी|

यह परिस्तिथि देखकर महाराणा प्रताप का साहस टूटने लगा| वे इस तरह बच्चों को भूख से बिलखता नहीं देख सके| यह परिस्तिथि देख उनके मन में एक बार तो क्षत्रु से संधि कर आराम की ज़िन्दगी बिताने का विचार आया| यही सोच कर वे गंभीर विचारधारा में दुबे हुए थे|

यह देख रानी को साड़ी परिस्थिथि समझने में देर न लगी| रानी, महाराणा प्रताप के पास गई और बोली, “प्राणनाथ! कर्त्तव्य पालन मानव जीवन की सर्वोपरि सम्पदा है इसे जीवन के मूल्यों पर तौलकर गवायाँ नहीं जा सकता| चाहे सारा परिवार यूँ ही भूख से तड़पकर म्रत्यु शैया पर क्यों न चला जाए|

सच्चे मनुष्य ना तो कष्टों से डरते हैं और न ही आघातों से उन्हें तो हर पल कर्तव्य का ही ध्यान रहता है| अप इस तरह क्या सोचने लगे|

महारानी की बात सुनकर महाराणा प्रताप का उतरा हुआ चहरा फिर से चमकने लगा| उन्होंने महारानी की बात सुनकर कहा, प्रिये तुम ठीक कहती हो|

सुख-सुविधा का जीवन तो तुच्छ जिव भी बिता सकते हैं लेकिन कर्त्तव्य की कसौटी पर तो मनुष्य ही कसा जाता है| परीक्षा की इस घडी में हमें खरा नहीं खोटा ही सिद्ध होना चाहिए|

यही प्रण लेकर महाराणा प्रताप वन से दूसरा आहार ढूँढ़कर लाए और दुगने उत्साह से स्वतंत्रता संग्राम जारी रखने की गतिविधियाँ आरम्भ कर दी|


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