Poem on Womens | महिलाओं के लिए कविता

Poem on Womens
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साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए “Poem on Womens | महिलाओं के लिए कविता” लेकर आएं हैं जिन्हें पढ़कर आपको महिलाओं और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक प्रोत्साहन मिलेगा| आप इन कविताओं को किसी भी सभा या उत्सव में पढ़कर सुना सकते हैं|


Poem on Womens | हाँ डरती हूँ में

हाँ डरती हूँ में..जब घर से बाहर निकलती हूँ में..
स्कूल के स्कर्ट से लेकर ,साड़ी पहन कर जब भी सफ़र करती हूँ में ..
पता नहीं डर उन घुरती निगाहो का हैं या उन तानो का…
जो अपने आस -पास रोजाना सुनती हूँ में…
हाँ आज कल नहीं बहुत पहले से डरती हूँ में..
समझ नहीं पाई क्यों कुछ कहने से पहले, टोक दिया जाता हैं..
ओर अगर कुछ कहुँ तो ज्यादा समझदार हूँ कह कर बातो का रुख मोड़ दिया जाता हैं!
किचन से लेकर ड्राइविंग के उदाहरणो के जुबानी तारो में बांध दिया जाता हैं
हाँ में उन जुबानी तारो को तोड़ने से डरती हूँ ..
क्यों की में खुद से जुड़े लोगों ओर रिश्तो का लिहाज करती हूँ,
हाँ शायद इसलिए खुद से डरती हूँ में..
काश मेरे घरवालो ने मुझे ना डरना सिखाया होता..
इस सोच को बस अपनी सोच में ही रखती हूँ में..
जैसे मुझे रोका जाता था..
आने वाली पीढी को में बस थोड़े बदले हुए अन्दाज से टोकती हूँ में..
क्यों की आज से नहीं जन्म से समाज में मेरे चारो ओर खड़े रहे जो,
उन अनदेखे चार लोगों से आज भी डरती हूँ में..
हाँ आज से नहीं सदियों से डरती हूँ में..
अनीता दयाल 
Poem on Womens

Women’s Day Quotes Poems | महिलाओं के लिए कविता

मेरी उम्र पूछने वाले,
मेरी तकदीर का लिखा कैसे जान जाते हो…
अठारह कहूँ तो  संभलकर रहना बहक जाऊँगी,
यह कैसे कह जाते हो!!
और इककतीस कहूँ तो शादी नहीं होगी,
इसका इतना दुख तुम कयो मनाते हो…
मेरी उम्र पूछने वाले,
मेरी तकदीर का लिखा कैसे जान जाते हो!!
अरे मेरी उम्र पर नजर रखने वाले पहले अपनी तो जी ले,
महज कुछ पलों के राही थोड़ी सी तो सीख ले ले…
तुझे एहसास भी है इस उम्र के खेल में मैंने कितना कुछ हारा है,
मेरी उम्र पूछने वाले मेरी तकदीर लिखा कैसे जान जाते हो ॥

खुद के लिए जीना चाहती हूँ  | Poem on Women’s Empowerment

शौर-शराबे और इस हलचल से दूर,
शांत जीवन जीना चाहती हूँ…
जीती रही अब तक सबके लिए,
कुछ पल अब खुद के लिए जीना चाहती हूँ!!

उन्मुक्त सरिता की तरह मेरा मन,
सिमटता रहा जीवन-कूप के भीतर,
फैला था चरों और मरुस्थल,
धरा टेल फिर भी बहता रहा निर्झर!!

संघर्ष करते करते,
शायद अब मायने ही खो गए…
समंदर में उतारते,
लहरों के भंवर में खो गए!!

वसुंधरा सी सहनशीलता,
है मुझमें सागर सी गहराई,
संसार चक्र की धुरी बनी,
ममता ने जो ली अंगडाई!!

हूँ आदि, मध्य और अंत भी में ही,
जीवन का मूल और सृष्टिकर्ता भी में ही!!

Poem on Womens


स्त्री शक्ति | Poem on Womens

कभी किसी स्त्री को कम मत समझना,
ब्रह्मा विष्णु शिव जिसके सामने शीश झुकाए,
वह जगदंबा कहलाए!!

हर स्त्री में जगदंबा का वास है,
हर स्त्री में कुछ ना कुछ खास है…
तीनो लोक जिस के गुण गाए,
वह जगदंबा कहलाए!!

जिसके होने से यह जीवन चक्र चलता जाए,
वह एक माँ कहलाए…
जो हर वक्त पुरुष को उसकी रक्षा का एहसास दिलाए,
वह बहन कहलाए !!


वो फिर उठ खड़ी होगी | Hindi Poems on Nari Shakti

वो फिर उठ खड़ी होगी,  तुम्हें राख कर देगी…
वो जवाला है तबाह बेहीसाब कर देगी!!
करके जो उसका अस्तित्व समाप्त, तुम खुश हुए बैठे हो…
अपने को ज्यादा और उसे कम समझे बैठे हो!!
वो फिर उठ खड़ी होगी, शमशीर बना लेगी…
तोड़ कर सारी जंजीरे, अब वो अपनी तकदीर बना लेगी!!
घर हो चाहे कचहरी, हो चाहे कोई भी व्यवसाय…
सूझबूझ से देगी वो अपनी राय!!
रोंद के यह जंगल वो फिर वा़पस आएगी,
पोछ के वो आँसू फिर तुमहे ललकारे गी!!
वो फिर उठ खड़ी होगी, तुम्हें राख कर देगी,

वो जवाला है तबाह बेहीसाब कर देगी!!

Poem on Womens


रुकती नहीं हूँ | महिला शशक्तिकरण के लिए कविता

गिरती हूँ उठती हूँ
चहकती हूँ बहकती हूँ
सहमती हूँ मुस्कराती हूँ
गूँजती हूँ गाती हूँ
बस……….
रुकती नहीं हूँ
मेरी नींव कुछ य़ूं मजबूत हो चली हैं
कि मैंने ठहरना नहीं दौड़ना सीख लिया है
बिना पंखों के उड़ान भरना सीख लिया है
मैंने सहेली के साथ साथ पहेली बनना सीख लिया है
मैंने अपना रास्ता खुद तय करना सीख लिया है
मेरी नींव इतनी मजबूत हो चुकी हैं
की मैंने अहसान लेना छोड़ दिया है
Poem on Women’s
Ritika Pathak


सच्ची खुशी
बस में चढ़ते ही सीट रोकली जो लग रही थी अच्छी,
पुरानी बस थी जो सीट हिलाकर देखली है तो पक्की!!
सीट पर बैठ कर चारो ओर नजरें दौड़ाई,
सामने की सीट पर एक महिला बैठी दी दिखाई!!
देखने में भले घर की एक महिला सी वो थी लगती,
चेहरे के उडे रंग ने बताया गम से हालत थी उसकी पतली!!
शायद पति से नहीं थी उसकी बनती,
या सास बात बात में होगी उससे झगड़ती!!
बैठते ही फोन पर लगी अपनो से बतियाने,
रुआंसे मन से सब को दुखड़ा लगी सुनाने!!
उसकी गोदी में सो रहा था बच्चा एक छोटा सा,
सब बातों से अनजान सपने में था खोया सा!!
तभी बातें करते ओस सी कुछ बूंदे आंखो से निकल गई,
और सीधी गोद में सोते उस बच्चे के मुंह पर गिर गई!!
बच्चा इन बूंदों से एकदम उठ खड़ा हुआ,
कुछ बोले बिना बस मां से चिपक गया!!
थोड़ी ही देर में उस बच्चे पर मस्ती छाई,
खेलने को मां की साड़ी ही उसे पसंद आई!!
बच्चे के साथ खेलने में वो अपने दुख को ऐसा भुली,
मानो वो दुखी महिला पता नहीं कहां एकदम गुम हो ली!!
यह सब देख मन में एक ही बात आई,
औरत अपने जीवन में क्यों इतनी दुखी है भाई!!
गहने, कपड़े, रूपये पाकर भी औरत हो सकती है दुखी,
प्यार, स्नेह और सम्मान ही उसे दे सकती है सच्ची खुशी!!
लेखक – धीरज व्यास, पाली
Poem on Womens

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