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Hindi Kahaniya | परिवार

Hindi Kahaniya | परिवार

साथियों नमस्कार, Hindi Kahaniya के इस अंक में हम आपके लिए लेकर आएं हैं एक पिता-पुत्र की मार्मिक कहानी “परिवार” जिसे पढ़कर आपको अपने बच्चों की परवरिश से लेकर उनके आपके प्रति चल रहे विचारों को बखूभी से समझने का मौका मिलेगा! आशा है आपको हमारी यह कहानी पसंद आएगी….


परिवार

हर रात की तरह आज भी में देर रात घर पहुंचा! हमेशा से कोई भी गलत आदत न होने के कारण कॉलोनी में कोई भी मुझे देर रात आने पर गलत नज़रों से नहीं देखता था! में हमेशा इस बात को लेकर गर्व करता की लोग अपने बच्चों को मेरी उपलब्धियों का उदारहण देकर अच्छा पढने-लिखने की सलाह देते हैं|

खैर, यही सब सोचते हुए मैंने अपनी चाबी से घर का दरवाज़ा खोला|हांलाकि मुझे पता था की जब तक में घर नहीं पहुँचता तब तक दीप्ती को नींद नहीं आती थी, पर में अपने पांच साल के बेटे चिंटू को नींद से नहीं जगाना चाहता था|

दरवाज़े की हलकी सी आहट पाकर दीप्ती हमेशा की तरह कमरे से बहार आई, तब तक में मुह-हाथ धोने बाथरूम की तरफ जा चूका था और हमेशा की तरह दीप्ती खाना गरम करने किचन में चली गई| हर रोज़ ऐसा ही होता था, सुबह घर से निकलने के बाद हमारी मुलाकात रात को खाने पर ही होती थी|

दीप्ती को इस तरह की जीवन शैली से कोई Problem नहीं थी| एक हाई-क्लास सोसाइटी में अपनी साख बनाने के लिए हर किसी को इस हद तक की  मेंहनत करना ही पड़ती थी|

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चिंटू सो गया ? (खाना खाते हुए मैंने दीप्ती से पूछा)
हाँ काफ़ी देर से आपका इंतजार कर रहा था, लेकिन फिर इंतजार करते-करते ही सो गया (दीप्ती ने शिकायत भरे लहज़े से कहा)

लेकिन, हर बार की तरह मेने मुस्कुराकर बात को टाल दिया!

अगली सुबह

रात को देर से सोने के कारण हर रोज़ में सुबह देर से ही उठता था| लेकिन जब तक में उठता तब तक चिंटू स्कूल चला जाता था| चिंटू की हमेशा शिकायत रहती की में उसे कभी बाहर घुमाने नहीं ले जाता, और शायद  इसी बात को लेकर वो मुझसे नाराज़ भी था!

हमेशा की तरह मैंने उठ कर दीप्ती को आवाज़ लगाई, और बाथरूम में घुस गया| थोड़ी देर में ही दीप्ती नहाने के लिए गरम पानी ले आई|

तुम नहीं होती तो मेरा क्या होता (हमेशा की तरह मैंने पानी की बाल्टी लेते हुए अपना घिसा-पिटा डायलॉग मारा, और हमेशा की तरह ही दीप्ती मुस्कुराते हुए खाने की तैयारी करने किचन में चली गई)

खैर, Office के लिए तैयार होकर जब में Dining Table पर आया तो चिंटू मुह फुलाए बेठा था|

क्या बात है, जनाब आज स्कूल नहीं गए (मेने प्यार से चिंटू के बालों पर हाथ घुमाते हुए बोला)
आज Sunday है! (चिंटू ने घुस्से भरी आवाज़ से कहा)

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<काम की भाग-दौड़ में, मै यह भी भूल गया था…की आज Sunday है, और आज दिन में मैंने चिंटू के साथ मूवी जाने का Promise किया था| लेकिन आज तो मुझे Clint Meeting के लिए office जाना था>

मुझे office जाता देख चिंटू को अपना movie प्लान खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा था और शायद इसी लिए वो मुझसे गुस्से से बात कर रहा था|

पापा आप एक घंटे के कितने पैसे कमा लेते हो (अचानक चिंटू ने पूछा)

<चिंटू ने पहले कभी इस रवैये से मुझसे बात नहीं की थी, शायद गुस्से में उसने ऐसा कह दिया>

परिवार-Short Story in Hindi

लगभग 1000 रूपए (मेने कहा)
क्या आप मुझे 500 रूपए उधार दे सकते हो (चिंटू ने कहा)
लेकिन तुम्हे पैसे क्यों चाहिए (मेने थोडा गंभीर होते हुए पूछा)

मुझे चाहिए (चिंटू ने बनावटी मुह बनाते हुआ कहा)

खैर, मैंने चिंटू को 500 रूपए दे दिए
चिंटू उठा और अन्दर से अपनी गुल्लक ले आया

चिंटू ने अपनी गुल्लक से 500 रूपए निकाल कर 1000 रूपए मेरे हाथ में रखते हुए कहा, “क्या आप कल मुझे आपका एक घंटा दे सकते हैं, मुझे आपके साथ बैठ कर खाना खाना है”

बहुत बिगाड़ रखा है, तुम्हारी मम्मी ने तुम्हे….(चिंटू की इस हरकत पर मैंने गुस्से से चिंटू को एक थप्पड़ लगाते हुए कहा)

आज Office जाते हुए मेरे मन में बस यही सोच रहा था, कि “इस भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में क्या सब कुछ ख़रीदा जा सकता है” हांलाकि में भी तो चिंटू को यही सिखा रहा था|

कहानी का तर्क यही है की परिवार के लिए पैसा कमाने की चाह में हम परिवार को समय देना ही भूल जाते हैं| ज़िन्दगी में सबके बिच में ताल-मेल बिठा कर चलना ही समझदारी है!

परिवार | Hindi Kahaniya

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Hindi Kahaniya | सरपरस्त 

मजहर की एक छोटी सी दुकान थी, सूट-सलवार और चुन्नी बेचने की! दिन भर में थोड़ी बहुत कमाई हो जाती थी| इतनी की वो संतुष्ट
था| गरीब तबके के लोगो को उसकी दूकान पर कुछ ना कुछ मिल ही जाता था, अपनी बीवी या बेटियों को खुश करने के लिए|

दूकान के पीछे ही एक कमरे का छोटा सा घर था उसका! कमरे और दूकान के बीच की एक जगह में छप्पर पड़ा था, जो इस घर का आंगन,
रसोई सब कुछ था| मजहर के परिवार में उसकी बीवी “जैमुमा” और बस एक 14 वषीय बेटी “अंदलीब” थी|

यूूँ तो उसकी बीवी को कई बार गर्भवती हुई लेकिन कुल बच्चो में से बस ये एक बेटी ही जिंदा बची थी| जो की अपने माँ-बाप की बहुत लाडली थी| मजहर की बीवी सिलाई-कढाई का काम करती थी और “अंदलीब” मजहर की बेटी  भी इसी काम में पारंगत हो गयी थी|

“मजहर” के सामने ही “रहबर” की कस्बे की सबसे बड़ी जनाना कपड़ो की दूकान थी| रहबर की दूकान भी उसके घर में ही थी| रहबर की
गिनती कस्बे के रईस लोगो में होती थी| मुस्लिम समाज में तो उसे ख़ासा मुकाम हंसील था| क्यों की रहबर “इमदाद” भी बहुत करता
था| उसकी दूकान का कढाई-बुनाई का काम मजहर की बीवी ही करती थी|

दोनों दुकाने कहने को जनाना कपड़ो की ही थी लेकिन दोनों में कोई मुकाबला नहीं था| रहबर की दूकान पर हर तरह का जनाना कपडा मिलता था तो वहीूँ मजहर की दूकान पर गिनती का और सस्ता सामान था| मजहर बोलता था की रहबर मिया की छाूँव में उसका भी पेट पल रहा है|

वो कहते हैं ना, की सबसे बड़ी बात है आत्मसंतोष… तो मजहर और उसका परिवार अपनी सिमित सी कमाई और ज़िन्दगी में बेहद खुश
था|

लेकिन, शायद उनकी इस छोटी सी ख़ुशी को भी नज़र सी लग गयी थी| मजहर दिखने में तो पतला दुबला सा ही था लेकिन उसे देखकर कभी नहीं लगा की  वो अपने भीतर कोई गंभीर बीमारी पाले बैठा है|

मजहर के दिल में छेद था और एक दिन वो भी आया जब उसके दिल ने उसका साथ छोड़ दिया| इद्दत का समय तो गुजर गया लेकिन अब जैमुमा के सामने अपना और अपनी बेटी अंदलीब का पेट पालने का सवाल था|

क्या करे! एक औरत यूूँ दूकान पर भी नहीं बैठ सकती थी, बिरादरी में उल्टी सीधी बातें होने लगेंगी| जो सिलाई-कढाई का काम वो करती थी
उससे भी कोई इतनी कमाई नहीं होती थी|

अब घर में बस वो दोनों अकेली बैठी रहती थी| कहने को तो महीने से भी ज्यादा बीत गया था, लेकिन उन दोनों की आूँखें अभी भी नहीं सूख
पायीं थी| तभी जैमुमा को बाहर दूकान में कोई आहट सुनाई दी| वो उठकर बाहर आई तो देखा रहबर खड़ा है|

जैमुमा ने चुन्नी से चेहरा छुपाते हुए दूकान में पड़े तख़्त पर उसे बैठने के लिए कहा और खुद लकड़ी की बेंच पर बैठ गयी| रहबर कुछ कहता इतने वो बोल पड़ी “सिलाई-कढाई” का काम अब शुरू कर दूंगी, आप भिजवा देना”

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रहबर ने गला साफ़ करते हुए कहा “उसकी फिक्र मत करो, कोई और जरुरत हो तो बताओ?
जैमुमा बोली “जी कुछ नहीं बस खैर है, रह रहें हैं आपके साए में”

तभी अंदलीब पानी लेकर आ गयी| रहबर ने पानी पिया और फीर बोला “देख जैमुमा मजहर मेरे छोटे भाई जैसा था…मुझे पता है की
खाली सिलाई-कढाई के काम से तो तेरा खर्च नहीं चलेगा| तू ऐसा कर मेरे घर पर घर के काम में हाथ बटा दिया कर और अंदलीब भी
मेरी बेटी अनम के साथ खेल लेगी|

तू तो जानती है अम्मी तो बिस्तर पर ही है, और रुखसाना उम्मीद से है| डॉक्टर ने पूरे आराम को बोला है”

जैमुमा को लगा की रहबर को वाकई खुदा ने फ़रिश्ता बना कर भेज दिया उसके पास| वो कुछ बोलती इससे पहले ही रहबर फिर
बोलने लगा “देख ये मत समझना की तुझे या तेरी बेटी को घर की नौकरानी बनने को कह रहा हूँ…ना बिलकुल भी नहीं| तू मेरे भाई की
बेवा है|

तेरी इज्जत मेरे दिल में रुखसाना से लेश मात्र भी कम नहीं| अंदलीब भी मेरे लिए मेरी बेटी जैसी ही है| देख वहीँ कुछ घर के
काम में मदद कर देना…अपना घर समझ कर और जो सिलाई-कढाई का काम हो वो भी वहीँ पर कर देना| सिलाई-कढाई से अलग
कुछ कमाई हो जाएगी|”

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जैमुमा को भला इसमें क्या दिक्कत होती, वैसे भी रहबर की बेटी अनम भी अंदलीब की अच्छी सहेली थी| अनम 12 साल की थी और इससे छोटे दो बच्चे और थे रहबर के, और इससे बड़े दो बेटे जो बाहर रहकर पढ़ रहे थे|

जैमुमा और अंदलीब सुबह से ही रहबर के घर पर चले जाते थे| पुरे दिन दोनों माँ बेटी रहबर के घर में ही रहते थे| रुखसाना और
अनम का व्यवहार भी बहुत ही अच्छा था| दोनों समय का खाना रुखसाना उन्हें अपने घर पर ही खिलाती थी| और सिलाई-कढाई से
अलग कुछ और पैसे भी उन्हें रहबरसे मिल जाया करते थे|

सब सही चल रहा था| लेकिन कुछ दिनों बाद ही जैमुमा ने महसूस किया की रहबर उससे बात करने के बहाने तलाशता रहता है| शुरू जैमुमा को ये अपना वहम लगा लेकिन बाद में उसने महसूस किया की रहबर कहीं ना कहीं उसके नजदीक आने की फ़िराक में रहता था|

एक दिन जब वो रसोई का काम कर रही थी| अंदलीब अलग कमरे में कुछ कढाई का काम कर रही थी|उसने रहबर की आवाज सुनी| अब
उसे रहबर की आवाज से कोफ़्त सी होने लगी थी| आजकल उसके कान भी कुछ ज्यादा ही सजग रहते थे| रहबर अंदलीब को शायद कुछ काम बताने आया था|

तभी रहबर की अम्मी ने जैमुमा को आवाज लगायी| वो एकदम भीतरी कमरे में रहती थी| जैमुमा उसके पास गयी| अपनी कुर्खली आवाज में वृद्धा बोली “पेशाब की हाजत लगी है, ज़रा उठाकर गुसलखाने तक ले चल”

जैमुमा ने बेहद ही मधुर आवाज में कहा “जी अम्मी”

जैमुमा बूढी अम्मा को अपने कंधे का सहारा देकर गुसलखाने को लेकर चल दी| चलते चलते अम्मा उसे दुवाएं देती चल रही थी| ये उसकी
पुरानी आदत थी “अल्लहा तुझे हर नैमत बख्शे, अंदलीब को शाजादे जैसा शोहर मिले” और भी पता नहीं क्या क्या|

चलते-चलते वो समय को भी कोस लेती थी, की क्यों इस बेचारी को बेवा बना दिया|

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जैमुमा ने अम्मा को वापस बिस्तर पर लेटाते हुए उससे पूछा “और कुछ दरकार तो नहीं अम्मी”

अम्मा ने अनुग्रमहत होते हुए कहा “ना मेरी बच्ची तू देख ले अपना काम”

जैमुमा बाहर आई तो देखा अनम रसोई में ही बैठी है| जैमुमा ने पूछा “अंदलीब कहाूँ है?”

अनम ने बेपरवाही से कहा “वो तो सिलाई कर रही है| अब्बू कु छ काम बता रहें हैं उसे”

इतना सुनते ही जैमुमा का माथा ठनक गया| वो तेज कदमो से बाहर के उस कमरे की तरफ भाग ली!

कमरे का दरवाजा बंद था| ये देखते ही जैमुमा बदहवास हो गयी और अंदलीब को तेज आवाज लगाते हुए तेज-तेज दरवाजा पीटने
लगी| ये कमरे उपरी मंजिल पर थे तो निचे तक तो आवाज नहीं जा रही थी|

लेकिन आवाज सुनकर रुखसाना आ गयी|

रुखशाना को जैमुमा की बदहवाशी कुछ नगवांर गुजरी|

उसने झल्लाते हुए कहा “क्या कयामत टूट पड़ी क्यों इतना चिल्ला रही हो?”

तभी कमरे का दरवाजा खोलकर रहबर बाहर आया| उसके चहेरे पर पसीना था और वो घबराया हुआ था| अंदलीब भागकर अपनी
माूँ से लिपट गयी|

जैमुमा पागल सी हो गयी और चिल्लाते हुए बोली “क्या हुआ, क्या किया इस शैतान ने तेरे साथ?”

अंदलीब रोते हुआ बोली “अम्मी तुम ना आती तो बर्बाद हो गयी थी मैं”

अंदलीब 14 साल की थी तो अब बहुत कुछ समझती थी|

रहबर सकपकाते हुए बोला “अरे कुछ नहीं बस सिलाई का काम बता रहा था इसे, खान साहब अपनी बेटी के लहंगे पर कुछ ख़ास
कढाई और जरीदारी का काम करवाना चाहते थे”

रहबर आगे भी कु छ कहना चाहता था लेकिन जैमुमा ने उसको एक जोरदार तमाचा मारते हुए उससे कहा “कमरे के दरवाजे बंद करके
काम समझा रहा था जलील आदमी, शर्म नहीं आई तुझे, तेरी बेटी की उम्र की है ये”

रुखसाना जैमुमा को शांत करते हुए बोली “चुप हो जा जैमुमा”

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इतने में ही रहबर बोल पड़ा “एक तो तुझे सहारा दिया और उल्टा मेरे पर ही इल्जाम लगा रही है, मेरी बेटी और मेरी बीवी के सामने
ही मुझ पर झूठे इल्जाम लगा रही है हरामी औरत…तू खुद बच्चलन है, और तेरी ये बदचलन बेटी” वो इससे आगे कुछ बोलता तभी
रुखसाना अपनी जलती हुई आवाज में चिल्लाई “आप नीचे जाओ रहबर मिया”

रहबर ने देखा की रुखसाना की ऑंखें जल रहीं हैं| वो चुपचाप नीचे दूकान में चला गया|

अंदलीब अब भी रो रही थी|  जैमुमा ने अंदलीब से कहा चल बेटी अब यहाूँ नहीं आयेंगे| फिर वो रुखसाना की तरफ देखते हुए बोली “क्या रुखसाना तुझे भी नहीं दिखाई देता ये सब, तू तो एक औरत है| कुछ भी नहीं बोली”

रुखसाना की आँखे अब भी बह रहीं थी| वो रोते हुए बोली “क्या बोल सकती हूँ मैं जैमुमा? और कहाँ जायेगी तू भी अगर यहाँ नहीं आएगी तो?

जैमुमा, मैं भी तेरी तरह औरत हूँ और औरत हमेशा मर्द की जमीन ही तो रही है| मर्द जब चाहे उसका सीना चीर दे और
जब चाहे उस पर अपनी गंदगी उलट दे…..औरत को तो खामोश ही रहना है|”

जैमुमा ने ताना मारते हुए कहा “वाह रुखसाना अपने शोहर को सही साबित करने को क्या खूब कही….मतलब यहाँ रोज़ अपनी और
अपनी बेटी की अस्मत लुटवाऊं”

रुखसाना ने फिर कहा “जैमुमा मैं कौन होती हूँ किसी को सही साबित करने वाली? और ना ही तुझे यहाँ आने या ना आने को कुछ बोल
रही हूँ| जैमुमा मैं बस ये बता रही हूँ की मैं एक औरत हूँ इसलिए मैं कु छ नहीं| हम औरतो को तो कुरान की आयतों में भी कोई सहारा
नहीं, वो भी इन मर्दों की ही ढाल हैं|”

जैमुमा ने अब चीखते हुए कहा “जब तेरी बेटी के सीने पर कोई शैतान चढ़ेगा तब देखूंगी क्या बोलेगी| अभी तो तू भुस पर लीप रही
है|”

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रुखसाना को ये बात बुरी लगी,  वो बोली “अल्ल्ल्हा ना करे कभी ऐसा हो और अंदलीब के साथ भी कभी अल्लाह ऐसा ना होने
दे….तेरी मर्ज़ी जैमुमा| तुझसे बड़ी हूँ और तुझसे ज्यादा दुनिया देखि है|

याद रख इस दुनिया में हर औरत तेरी तरह मजबूर है और हर मर्द में तुझे एक रहबर ही मिलेगा| मर्द अपनी बीवी के नजदीक भी उस ही मकसद से आता है और दूसरी किसी और औरत के करीब भी उसी मकसद से जाता है|”

रुखसाना की बातें सुनकर जैमुमा को बुरा तो लगा लेकिन जैमुमा को बिना कुछ कहे वह अंदलीब को लेकर अपने घर चली गयी|

जैमुमा आ तो गयी थी लेकिन अब उसके लिए ज़िन्दगी का सफ़र एक अंधी गली बन कर रह गया था| उसे समझ ही नहीं आ रहा था की वह क्या करे?  सिलाई-कढाई का जो काम रहबर दे देता था अब तो उसे वो भी नहीं मिलेगा|

जैमुमा आज दूकान को देख रही थी तीन महीने से सब सामान ज्यों का त्यों ही पड़ा था| तभी अन्दर रुखसाना आई| उसे देखते ही
जैमुमा का चेहरा बिगड़ गया|

उसने बुझी सी आवाज में जैमुमा से कहा “कैसी है जैमुमा, सब खैरियत?”

जैमुमा ने उखड़े से अंदाज में जवाब दिया “खैरियत सब, आज यहाँ आने की तकलीफ क्यों की”

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रुखसाना ने मुट्ठी में रखे हुए हुए कुछ नोट जैमुमा के सामने रख दीए|

जैमुमा ने उन रुपयों को बेरुखी से देखते हुए कहा “क्या रुखसाना आपा, ये पैसे दे रही हो मुझे चुप रहने को…. लेकिन मैं तो चुप ही हूँ”

रुखसाना ने बुझी सी आवाज में कहा “एक औरत की इज्जत को कोई मर्द ही पैसे में तौल सकता है एक औरत ऐसा कभी नहीं करेगी
जैमुमा| तूने जो काम किया है ये उसके पैसे हैं, तू लेकर तो आई नहीं थी”

जैमुमा ने बेहद ही सख्त लहजे में कहा “रखिये ये अपने पैसे आप अपने पास, मुझे नहीं चाहिए”

रुखसाना की आूँखों में अब आंसू थे, वो रूवांसी होते हुए बोली “जैमुमा इतने बड़े बोझ तले मुझे मत दबा| ये तेरी ईमान की कमाई है|
हाथ जोडती हूँ इसे रख ले|”

जैमुमा ने कुछ नहीं कहा और रुखसाना वहां से चली गयी|
जैमुमा भीतर कमरे में चली गयी और फिर से इस उहा-पोह में उलझ गयी की करे तो क्या करे?

अगले रोज सुबह जैमुमा जब उठी तो देखा अंदलीब दूकान को सवांर रही है| जैमुमा दूकान में आई और बोली “ये क्या कर रही है?”
अंदलीब ने बेपरवाही से जवाब दिया “दूकान खोलनी तो है ही तो सफाई ही कर लूूँ|”

जैमुमा को ये बेहद ही अजीब लगा| वो झल्लाकर बोली “कौन खोलेगा दूकान?”
अंदलीब : हमारी दूकान है तो हम ही खोलेंगे अम्मी!

जैमुमा (आूँखे बड़ी करते हुए) : तेरा दिमाग ख़राब हो गया है क्या?  बिरादरी क्या कहेगी? किसी जनानी को दूकान पर बैठेते देखा है क्या?

अंदलीब : तो फिर अम्मी ऐसा करें घर में पड़ा है चूहों का चालान, दोनों उसे ही खा लेते हैं| अम्मी ये दुनियां  रहबर जैसे मदों से भरी
हुई है, हर जगह वो ही मिलेंगे|

जैमुमा (भावुक होते हुए) : ख़ुदकुशी गुनाह है मेरी बच्ची| ऐसी बात मत कर….अल्लाह कोई ना कोई रास्ता जरुर दिखाएगा|

अंदलीब : अल्लहा ने तो रास्ता दिखाया हुआ था अम्मी…. ये दूकान| बस हम ही आूँखें मूंदे बैठे थे|

जैमुमा को अंदलीब की बातें समझ नहीं आ रही थी| उसने तो कभी किसी मुस्लिम औरत को दूकान पर बैठे नहीं देखा था|

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जैमुमा ने समझाने के अंदाज में कहा “बेटी ये तो कादिरों के अंदाज हैं| उनकी औरते बैठती हैं यूँ बाजारों में| मुसलमानों में तो औरते
परदे में ही रहती है मेरी बच्ची| ये तू क्या करने को कह रही है?

अंदलीब : अम्मी हकीक़त में तो हम पदों में रहने वाली हैं बाजारू| जब चाहे कोई भी मर्द आकर लुट ले| कादिर तो बोल दिया अम्मी
लेकिन क्या देखा नहीं की कितनी इजात हैं उनमे औरतो की? उनकी औरते काम करती हैं तो इसका मतलब यह नहीं है की वो किसी की भी जागीर है|

जैमुमा उसे एकटक निहार रही थी| अपने हाथो से जैमुमा ने अंदलीब की नज़र उतारते हुए कहा “क्या बच्ची ज़िम्मेदारी ने तो बहुत
ज्यादा समझदार बना दिया तुझे” जैमुमा ने अपनी आूँखों के आंसू अपने दुपट्टे से पूंछे और अंदलीब को बाहों में भर लिया|

अगले दिन कस्बे में बहुत सी चर्चाएँ थी| क्यों की अंदलीब और जैमुमा दूकान पर बैठी ग्राहकों को सामान दिखा रही थी| बाज़ार में सभी को ये
बहुत ही अजीब लग रहा था|

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लेकिन अंदलीब और जैमुमा ने दूकान पर बचे हुए सामान और रुखसाना के दीए पैसो से शुरुवात कर दी थी| औरतो के दूकान पर होने
से औरतो की आमद कु छ ज्यादा हो गयी थी|

जो एजेंट रहबर की दूकान पर थोक में माल बेचने आते थे उनकी निगाह इस छोटी  दूकान पर भी पड़ी| रहबर सबसे तो सामान लेता नहीं था तो जिनका सामान रहबर अपनी दूकान पर नहीं बेच रहा था उन्होंने जैमुमा को दूकान पर अपना सामान बेचने को दे दिया| जैमुमा को ये सामान उधार में मिल गया था|

उन दोनों माँ-बेटी का व्यवहार भी इतना अच्छा और मधुर था की ग्राहकों को वो मोह ही लेती थी| इस तरह चार महीने में ही जैमुमा की दूकान से पीछे का हिस्सा भी लगभग दूकान में ही तब्दील हो गया था| ग्राहकों की भीड़ उसकी दूकान से टूटती ही नहीं थी| अब उसकी दूकान पर वो महंगा सामान भी मिलता था जो रहबर की दूकान पर था|

रहबर के ग्राहक भी अब टूटकर जैमुमा की दूकान पर जा रहे थे| रहबर अपनी झल्लाहट ये कहकर निकाल लेता था, की “मुझे ईमान का खाना है जनाब, लोग उनका सामान नहीं उनकी जवानी देखने जाते हैं| इखलाक नाम की चीज ही नहीं रही| हमने नहीं देखा की हम मुसलमानों की औरते यूूँ बाजारू हो जाएँ”

लेदकन कु छ समय बाद रहबर को जैमुमा की दूकान पर बढती भीड़ से दिक्कत होने लगी थी| क्योंकि अब उसकी दूकान के ग्राहक टूटकर
जैमुमा की दूकान पर जा रहे थे|

एक तो रहबर उससे पहले से ही चिढ रहा था क्योंकी रहबर को लगता था की जैमुमा और उसकी बेटी ने उसके सम्मान को ठेस पहुंचाई थी| उसने जो भी अंदलीब के साथ करने की कोशिश की थी वो तो उसे अपना हक लगता था|

अब रहबर की छटपटाहट बढती ही जा रही थी| वो अक्सर समाज के लोगो के मध्य अब जैमुमा के यूँ दूकान पर बैठने का विरोध करता रहता था|

जैमुमा की दूकान पर अलसुबह अभी ग्राहक आने भी शुरू नहीं हुए थे की शहर काजी और कुछ अन्य लोग आकर खड़े हो गये| जैमुमा
भीतर ही थी और अंदलीब दूकान लगा रही थी|

शहर काजी और अन्य लोगो को देखकर अंदलीब ने सर को ढककर उनका अभिवादन किया और उन्हें बैठने को कहते हुए अन्दर चली
गयी| थोड़ी देर बाद जैमुमा बाहर आई|

जैमुमा : सलाम वालिकुम काजी जी

शहर काजी ने देखा की जैमुमा ने बस सर पर एक चुन्नी ढकी हुई है| शहर काजी के माथे में बल पड़ गए| लेकिन फिर अपना जायका ठीक करते हुए शहर काजी ने अभिवादन का उत्तर दिया “वालेकुम अस्सलाम वा रहमतौल्ल्हा”

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शहर काजी ने दूकान को देखते हुए कहा “बीबी मजहर मिया जब तक जिंदा रहे उन्होंने हर मजहबी शिनाख्त को इस घर में
बरक़रार रखा| लेकिन अब देख रहा हूँ की कादिरों के चलन पर आते जा रहें हो”

जैमुमा समझ गयी थी दक शहर काजी आज क्यों आया है? वैसे भी वो समझ रही थी दक अब उसकी दूकान मुसलमानों को खटक रही
है| कितने ही लोग थे जो मजहर की मौत के बाद रहबर की ही तरह इन दोनो माँ-बेटी पर अपनी सरपरस्ती का एहसान करना चाहते थे| ये दूकान और जैमुमा की आत्मनिर्भरता अब उनके आड़े आ रही थी|

जैमुमा ने संभल कर जवाब दिया: शहर काजी जी हर मजहबी तालीम का सम्मान अब भी इस घर में होता है| बाकी खाली मजहबी
तकरीरो को पढ़ लेने से पेट तो नहीं भर जाता ना| पेट भरने के लिए भी कुछ तो करना ही पड़ेगा|

शहर काजी को जैमुमा से ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी| बड़े बड़े रईस मुसलमान जिसके आगे गीड़गीड़ाते हों उसे एक औरत वो
भी बेवा यूँ सीधे जवाब कैसे दे देगी भला?

शहर काजी ने मौके की नजाकत को समझते हुए जैमुमा से कहा “आज शाम को मदरसे में आ जाना जैमुमा कुछ बात करनी है और
बिरादरी के कुछ लोग रहेंगे तो थोडा ख़याल रखना”

शहर काजी का इशारा उसके द्वारा बुरका ना पहनने को लेकर था| शहर काजी चले गए| अंदलीब बाहर आई और बोली “क्यों आये थे शहर काजी जी? अब इन्हें भी ददक्कत है हमारी दूकान से..”

जैमुमा ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन वो जानती थी कि कितनी बड़ी मुसीबत उन पर टूट पड़ी है|

मदरसे में कस्बे के 10-15 लोग इकठ्ठा थे| रहबर भी बैठा था| जैमुमा अभी तक नहीं आई थी| उनमें आपस में बातें चल रही थी| रहबर बोल रहा था “जनाब हम तो कुछ कह नहीं सकते| चालचलन तो इन दोनों माँ-बेटियों का पहले से ही गलत था बस ये है की मजहर था तो निगाह थी इन पर, अब तो ये आजाद हो गयीं हैं|

मैंने घर पर काम के लिए बोल दिया था और अपनी तरफ से जो हो रही थी वो मदद कर रहा था| लेकिन इन्हें तो खुला चुगना था|” तभी एक व्यक्ति बोला “काजी जी माँ-बेटी बिना चुन्नी के यूँ ही झुक-झुक कर मदों से बातें करती हैं| लोंडे खूब आते हैं खरीदारी करने को, उन्हें भला क्या चाहिए और”

रहबर ने उसकी बात बीच में रोकते हुए कहा “साहब मैं तो सामने ही रहता हूँ, सारे आला करम देखता हूँ इन माँ-बेटियों के| लोंडो से हंस-हंस कर बातें करती हैं, और दो तीन हिन्दुओं के लोंडे तो अब लगे बंधे आ रहें हैं| वो तो देर सबेर भी आने लगे हैं…..और दूकान
नहीं सीधे भीतर घूसते हैं| लोगो में तरह तरह की बातें हो रही हैं”

ये हिन्दुओं के लोंडो वाली बात रहबर ने झूठ कही थी लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव इसने ही किया था वहां के लोगो पर| इतने में ही जैमुमा आ गयी तो उन लोगो में एकदम चुप्पी छा गयी|

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जैमुमा ने बुरका पहना हुआ था| शहर काजी ने आते ही जैमुमा की सुने बिना ही अपनी कहानी शुरू कर दी “सुन जैमुमा जिस तरह तू और तेरी बेटी यूँ बाज़ार में बैठ रहीं हैं ये इस्लामी चलन नहीं और जायज़ भी नहीं| तू दूकान बंद कर अपनी और रही बात तेरे खर्चे की तो रहबर मिया तुझे काम देने को तैयार हैं|

इनके घर पर काम कर तुझे रोटी भी मिलेगी और पैसा भी| जल्द ही हम तेरी बेटी के लिए कोई अच्छा सा लड़का देखकर उसका निकाह कर देंगे, उसकी फिक्र तू मत कर|”

जैमुमा को सुनकर बड़ा अजीब लगा| किसी ने उसकी सुनी ही नहीं बस तुरंत अपना फैसला सुना दिया| जैमुमा ने कहा “काजी जी रहबर मिया की नियत मेरी बेटी को लेकर ठीक नहीं है और मैं जानती हूँ की आपको भी इन्होने ही भड़काया है”

इस इल्जाम के लगते ही रहबर बिगड़ पड़ा “काजी जी मैं इसलिए ही इस मसले में नहीं पड़ना चाह रहा था| ये बदजात औरत मुझ पर ही
इल्जाम लगा गयी| जब तक मैंने हमेशा इसकी मदद की”

शहर काजी और वहां बैठे बाकी लोगो ने रहबर का ही समर्थन किया| शहर काजी अब कड़े लहजे में बोले “बदजुबानी मत कर बेवकूफ औरत| जनानी है उस तरह ही रह| बेवा हो गयी तो इसका मतलब ये नही की अब तूम दोनों माँ-बेटी की अपनी मर्ज़ी से चलेगी| दूकान-वुकान बंद कर और जैसा कहा है वैसा कर”

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जैमुमा को अब गुस्सा आ गया “काजी जी कोई चोरी या जीना खोरी नहीं कर रहीं हूँ| और मेरी बेटी पर मुझे फक्र है| वो कोई गाडी चोर नहीं है तुम्हारे बेटे की तरह| जिसे तुम थानों में जाकर छुड़ा कर लाते हो”

शहर काजी के तीन लड़के थे और तीनो ही पक्के वाले गाडी चोर और अपराधी किस्म के थे| लेकिन शहर काजी के बेटे थे तो शहर
काजी कुछ ना कुछ करके उन्हें बचा ही लेता था| लेकिन यूँ सब लोगो के बीच में एक औरत उस पर ऐसे ऊँगली उठा दे, ये उसे अच्छा
नहीं लगा| वो एकदम चीख पड़ा और एक भद्दी गाली उसने जैमुमा को दी|

जैमुमा ने रहबर को उस दिन जो तमाचा मारा था वो रहबर भूल नहीं पाया था| रहबर के पौरुष पर गहरी चोट लगी थी उस दिन| आज रहबर को मौका मिल गया था| रहबर उठा और एक जोरदार लात जैमुमा के पेट पर मारी जैमुमा की चीख निकल गयी और वो जमीन पर गिर गयी|

जैमुमा की आँखों में अँधेरा छा गया था| शहर काजी बोला “बकवास करती है बदजात औरत| एक तो तेरी मदद करना चाहते हैं ऊपर से हम पर ही गलत इल्जाम डाल रही है|

जितना कहा है उतना सुन, समझी नहीं तो मजहब की तौहीन तो तुझे करने नहीं देंगे बिलकुल भी|”

जैमुमा अब मजबूर हो उनकी बाते सुन रही थी| रहबर ने कहा “काजी जी इसकी बेटी गलत नहीं है लेकिन ये उसे भी गलत बना देगी|”
शहर काजी ने रहबर से कहा “कोई नहीं आप अपने घर का काम काज करवाओ उससे, बाकी मदरसे में भी दिन में एक बार आ जाया
करेगी और कुछ साफ-सफाई कर दिया करेगी| कुछ पैसे मदरसे से भी दिलवा दूंगा”

शहर काजी ने भी अपनी संभावनाएं तलाश ली अंदलीब को लेकर| वहां खड़े बाकी लोग बोल पड़े “सुभान अल्लहा काजी जी, आप हैं तो किसी गरीब को कोई ददक्कत नहीं होगी”

शहर काजी ने चहेरे पर मुस्कान लाते हुए कहा “बस अल्लहा की मेहरबानी हैं, आप जैसो की इमदाद से हो जाता है सबकुछ”
फिर सब लोग वहां से चल दिए|

जैमुमा और उसकी बेटी की ज़िन्दगी का फैसला हो गया था| रहबर कुछ याद करते हुए पीछे मुड़ा और शहर काजी से कहा “वो काजी जी जो आप बता रहे थे मदरसे में वाटर कूलर और कुछ सामान के लिए… मैं आपको पैसे भिजवा दूंगा, मंगवा लीजिए आप| देखिये दूकान से फुर्सत नहीं हो पाती है और फिर आपकी तो जानकारी भी बहुत है मुझसे सही सौदा करेगा कोई आपके लिए”

शहर काजी ने सहमती में  गर्दन हिलाई और आँखे मिचमिचाकर कर मुस्कुराते हुए अनुग्रह प्रकट किया|

Hindi Kahaniya | सरपरस्त 
लेखक- सतीश भारद्वाज


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