पौराणिक कथा Poranik Katha

पौराणिक कथा Poranik Katha

पौराणिक कथा Poranik Katha


हमारी भारतीय संस्कृति को विशाल और व्यापक रुप देने में पौराणिक कथा Poranik Katha का काफी योगदान है| बचपन से ही हम दादी-नानी से कई शिक्षाप्रद पौराणिक कथा Poranik Katha सुनते आएं है| जिनसे हमें जीवन की कई परेशानियों को हल करने में मदद मिली है| आज हम आपके लिए कुछ ऐसी ही चुनिन्दा पौराणिक कथा Poranik Katha लेकर आएं हैं जिन्हें आप खुद भी पढ़ कर कुछ सिख सकते हैं और अपने घर अरिवार के बच्चों को भी काफी बाते सिखा सकते हैं| पेश है हमारी पहली कहानी….

 में ले डूबा

एक बार एक शिष्य को अपने गुरु के दर्शन की इच्छा जाग्रत हुई! गुरु की कुटीया जंगल में एक नदी के किनारे थी, जहाँ संकरे रास्ते से होते हुए नदी पार करते हुए जाना पड़ता था| एक दिन गुरु से मिलने की तीव्र इच्छा से शिष्य अपने गुरु से मिलने घर से चल पड़ा| पथरीले, संकरे रास्तों से होता हुआ वह जैसे तैसे नदी तक पहुंचा| अब समस्या यह थी की बिना नाव के नदी को कैसे पार किया जाए| नदी उसके मार्ग में बाधक बनना चाहती थी लेकिन उसे अपने गुरु पर अपार श्रद्धा थी|  बस फिर क्या था, उसने आने गुरु का नाम लिया और पानी पर कदम रखते हुए उस पार पहुंच गया|

नदी के दुसरे किनारे पर ही गुरु की कुटीया थी| गुरु ने जैसे ही बहुत दिनों बाद अपने शिष्य को देखा उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा| गुरु के दर्शन पाकर शिष्य गुरु के चरण स्पर्श के लिए निचे झुका ही था की गुरु ने शिष्य को बिच में ही उठाकर गले से लगा लिया| क्षण भर में ही गुरु का ध्यान भंग हुआ और उन्होंने आश्चर्य से शिष्य से पुछा – “वत्स, तुमने बिना नाव के इतनी गहरी नदी को पार कैसे किया ?

शिष्य ने गुरुवर को कुटिया तक पहुँचने की पूरी कहानी बता दी| अपने नाम में इतनी शक्ति होने का गुरुवर को अहसास न था| जब उन्होंने शिष्य की उरी बात सुनी तो वे फुले न समाए| उन्होंने सोचा , “यदि मेरे नाम में इतनी शक्ति है तो में बहुत ही महान और शक्तिशाली हूँ| अब मुझे नदी पार करने के लिए नाव का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं”

अगले दिन गुरुवर ने जैसे ही नदी पार करने के लिए, मैं..मैं…मैं कहकर कदम बढाया, नदी में पाँव  रखते ही वह डूबने लगे और देखते ही देखते उनका प्राणांत हो गया|

इसीलिए कहा गया है, अहंकार हमेशा हानिकारक होता है!

पौराणिक कथा Poranik Katha


 छोटी भूल, बड़ा दुष्परिणाम

एक बार एक राज्य के राजा नगर भ्रमण को निकला| नगर में एक दुकान पर उसे मधुपर्क (शहद) खाने की इच्छा हुई| तत्काल साथ चल रहे कर्मचारियों को शहद लाने की आज्ञा दी गई| राजा के कर्मचारी एक प्याले में शहद लेकर राजा के समक्ष उपस्थित हुए| राजा शहद का आनंद ले ही रहा था की तभी उसके प्याले से कुछ शहद टपक कर जमीन पर गिर गया|

तभी उस शहद को चाटने मक्खियाँ आ गई| मक्खियों को देखकर छिपकली ललचाई और मक्खियों को खाने के लिए आ पहुंची| छिपकली को मारने बिल्ली आ पहुंची और बिल्ली पर दो-तिन कुत्ते झपट पड़े| कुत्तों के डर से  बिल्ली तो भाग गई पर कुत्ते आपस में लड़ पड़े और बुरी तरह घायल हो गए|

कुत्तों के मालिक अपने-अपने कुत्तों के पक्ष का समर्थन करने लगे और एक दुसरे का दोष बताने लगे| इसी बात पर दोनों पक्षों में लड़ाई हो गई| देखते ही देखते दोनों और काफी भीड़ जमा हो गई और दोनों पक्षों में बलवा हो गया| राजा के सैनिक दोनों पक्षों तक पहुँचते उस से पहले ही बात बढ़ गई और पुरे शहर में दंगा शुरू हो गया| दंगाइयों को मोका मिला तो सरकारी खजाना लुट लिया गया और राजमहल में आग लगा दी गई|

राजा ने इतने बड़े उपद्रव का कारन जानने के लिए एक टीम गठित की| मानती ने उपद्रव का कारन जांचकर बता कि, “महाराज…आपके द्वारा असावधानी से गिराया गया शहद ही इतने बड़े दंगे का कारण बन गया है|”

तब राजा को समझ आया की इतनी छोटी सी असावधानी भी कितनी बड़ी समस्या का कारण बन सकती है|

इसीलिए हमेशा सोच समझकर कोई भी कदम उठाना चाहिए और सावधानी से कार्य करना चाहिए|

पौराणिक कथा Poranik Katha


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