Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत

आदरणीय पाठक, आज के इस अंक में हम आपके लिए लेकर आएं हैं एक ऐसी कहानी “Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत” जिसे पढ़कर आप हिन्दू संस्कृति और हिंदुत्व को और भी बारीकी से जान पाएँगे| आपको यह कहानी कैसी लगती है हमें “Comment Section” में ज़रूर बताएं|

Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत

पता है वो पड़ोस वाली सरिता क्या बता रही थी ?
मुझे कहाँ से पता होगा | तुमसे बोला तो तुम जानो रमेश ने कहा|
अनीता – तुम अपने व्यंग बाण हर समय चला दिया करो, ये भी नहीं कि जरा देख लो की सामने वाले की बातो मे कितनी गंभीरता है|
रमेश – अच्छा भागवान गलती हो गयी, बताओ क्या कहना है?
अनीता – सरिता बता रही थी, कि उसकी नन्द के कई साल से संतान नहीं थी फिर वह फलां शहर से कोई 20-25 किलोमीटर आगे किसी गाँव मे टेकरी पर “हर सिद्धि “ माता का मंदिर है वहाँ गयी थी| कहते है वहां मन्नत पुरी होती है| हम भी जाकर आयें क्या?
रमेश – अच्छा तुम्हें बस मन्नत पुरी हो जाये इसलिए जाना है?
साधारणत: ऐसा कोई मनुष्य नहीं होगा जिसके पास कोई इच्छा न हो जिसे वह पुरा करना चाहता हो| जब उसे पता चले कि फलां जगह जाने से वह इच्छा पुरी भी हो जाएगी तो बेचारा भला मानुस वहां जाने से क्यों चुकने लगा| इससे अच्छा मार्केटिंग का तरीका कोई हो भी नहीं सकता| मन्नत पुर्ती के नाम पर कुछ भी आसानी से  बिक सकता है|
बड़े धार्मिक लोग है अपने देश के भगवान के नाम पर किसी तर्क के लिए अपने दिमाग मे स्थान नहीं रखते बस मन्नत पुरी हो जाये तो काहे का तर्क और काहे का वितर्क| रमेश का तो यही मानना था |
अनीता – इनसे तो बस बहस करवा लो, सारी दुनिया कह रही है पर वो सब तो बेवकुफ है| भगवान ने सारी समझदारी का ठेका तो बस इन्हे ही दे दिया है|
स्त्रीहट और बालहट के आगे भला किसकी चलती है रमेश को तो अनुमति देनी ही थी| अगले रविवार को जाना तय हुआ|
रमेश और अनीता की बच्ची बबली बड़ी खुश थी कि अगले रविवार को हम घुमने जाने वाले है| बच्चो को क्या मतलब कि कहाँ जाना है| उनके लिए तो बाहर जाना मतलब मनोरंजन है क्योंकि बबली के लिए अभी तक बाहर जाने का अनुभव केवल नानी के घर जाने का था लेकिन इस बार तो नानी के घर की तरह किसी बड़े शहर थोड़े जाना है| जहां जाते ही सादर सत्कार और मेहमान नवाजी शुरू हो जाती है|
रमेश का सोचना तो यही था कि बबली को ले जाकर क्या करेंगे! परेशानी ये थी कि बबली के दादा – दादी भी गाँव गए हुए थे तो इसे कहाँ छोड़कर जायें इसलिए मजबूरी मे साथ ले जाना पड़ा|
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रविवार को सुबह दस बजे की ट्रेन थी, टिकट भी लेना था सो थोड़ा जल्दी ही पौने दस तक स्टेशन पहुंच गये|  चार नंबर प्लेटफॉर्म पर ठीक दस बजे ट्रेन आ गयी| भारतीय रेल जब समय पर आये तो बड़ा सुकुन सा महसूस होता है| इसकी वजह है कि हम हमेशा उसकी समयबद्धता को लेकर आशंकित रहते है और उसके देरी से आने के बुरे अनुभव तो हमारे जहन मे हैं ही|
जनरल डब्बे मे चढ़े और गनीमत रही की सीट भी जल्द ही मिल गयी, ट्रेन मे ज्यादा भीड़ नहीं थी| संयोग से हमारे पास वाली सीट पर बैठे सज्जन जो की शिक्षक थे और उनकी पत्नी भी उसी मन्नत सिद्धि वाली जगह जा रहे थे|
आपस मे बातचीत शुरू हुई तो मंदिर की मान्यता को लेकर और कई कथा किस्से सुनने को मिले| शिक्षक महोदय आप को भी मान्यता पर यकीन है या हमारी तरह पत्नी की इच्छा के चलते आपको भी आना पड़ा, रमेश ने शिक्षक महोदय से पुंछा|
शिक्षक – हम तो स्वेच्छा से आये है| मुझे तो प्राचीन स्थलो, देवस्थानों पर जाना वहाँ का जनजीवन देखना, रहस्यो को जानने मे ख़ासी दिलचस्पी है| पर लगता है आप बेमन से आये है|
रमेश – मई की चिलचिलाती धूप मे लोग जाते है, कंही ठंडी जगह पर और हम है कि परेशान होते हुए जा रहे है इस आस मे कि मन्नत पुरी होती है|
शिक्षक – क्या पता होती भी हो? जब जा ही रहें तो विश्वास रखिए|
शाम के पाँच बजे ट्रेन उस जंक्शन पर पहुंची जहां से अभी 20-25 किलोमीटर का सफर करना बाकी था| दिन भर की थकान सभी के चेहरे पर साफ दिख रही थी लेकिन आस्था मे शक्ति अपार होती है|
थोड़ी देर उसी जंक्शन पर रुक कर जलपान किया और अब आगे प्रस्थान के लिए बस पकडनी थी| जंक्शन से रिक्शा कर पहले बस अड्डे गये ,जहां से गाँव के लिए छ: बजे की बस मिली जिसने रात आठ बजे उस गाँव मे उतार दिया|
रमेश को अब बबली को गोद मे लेना पड़ा| बेचारी बच्ची खुद पछता रही होगी कि वह यहाँ क्यों आ गयी| यात्रा का इतना कठिन अनुभव उसने पहली बार किया है वरन हर छुट्टियों मे नानी के घर जाती जो मात्र दो घंटे का रास्ता है उसमे भी स्टेशन पर ही मामा तैयार खड़े मिलते थे|
ये गाँव वैसा नहीं था जैसी आप आम हिंदुस्तान के गाँव कि कल्पना करते है| यहां बिजली भी थी, रहने कि व्यवस्था भी अच्छी थी, बड़े–बड़े होटल भले न हों पर धर्मशालाएँ अच्छी थी|
रोड़े भी टूटी फूटी नहीं थी और परिवहन व्यवस्था भी ठीक थी| बस से उतरते ही एक व्यक्ति रिक्शा लेकर आया और कहा मंदिर जाने आयें है| रमेश ने हाँ मे उत्तर दिया|
रिक्शे वाले ने अपना ग्राहक भाँप कर बोला कि अब तो मंदिर सुबह ही जाना होगा, चलिए आपको मंदिर के पास ही एक धर्मशाला तक छोड़ दूँ| सुबह वंही से मंदिर चले जाइएगा|
रमेश – कितने रुपये लोगे ?
साहब वैसे तो सौ रुपये लेते है पर आप अस्सी दे दीजिएगा! ये कहते हुए रिक्शे वाले ने अपने व्यापारिक कौशल का परिचय दिया| अरे भई अब क्या सोचना, चलो बस अब तो शरीर आराम मांग रहा है कहकर शिक्षक महोदय ने सहमति जाता दी|
शहरो का वातावरण गांवो से कई ज्यादा प्रदुषित होता है| बड़ी–बड़ी इमारतों ने ऐसा कब्जा जमा रखा है कि पेड़ पौधे तो दिखाई नहीं देते| हाँ बस दिखावट के लिए छोटे– छोटे गमले रख लिए जाते है जिन्हे देख गालिब की बात याद आती है “दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है”
जहां शहर मे कूलर, एसी मे भी आदमी को चैन नहीं मिल रहा वंही गाँव मे छत पर ही क्या हवा चल रही है, आनंद आ रहा है न शिक्षक साहब! क़हते हुए रमेश ने शिक्षक महोदय की ओर नजरे घुमाई|
शिक्षक महोदय – गांवो मे आज भी परिवेश प्रकृति से जुड़ा हुआ है| जो आनंद यंहा है वो और कंही नहीं है|
सबने छत पर ही अपनी–अपनी खाट बिछा ली और थकान तो इतनी कि तुरंत नींद भी आ गयी| सुबह ज्यों ही रमेश की आंखे खुली सामने चाय लिए अनीता खड़ी थी| आज वास्तव मे बहुत अच्छी नींद आई रमेश ने कहा, अनीता ने चाय का प्याला आगे बढ़ाते हुए आदेशात्मक स्वर मे बोला तो अब जल्दी से नहाँ भी लो फिर दर्शन के लिए भी जाना है|
नौ बजे तक सभी तैयार हो गये, बस अब निकलना था| मंदिर पैदल दुरी पर ही था, रमेश द्वारा नाश्ते के लिए पुंछने पर अनीता ने बताया कि पहले दर्शन कर आते है फिर खाना पीना कर लेंगे पर बबली को रास्ते मे कुछ खिला देंगे बाजार से| “चलो जैसा तुम ठीक समझो ” के साथ रमेश ने अपनी सहमति व्यक्त की
रास्ते मे बबली ने कचौरी खाई बाकि किसी ने कुछ नहीं लिया| कोई पाँच मिनट की पैदल यात्रा के बाद वह स्थान आया जहां से अब पहाड़ी का रास्ता तय करना था हालांकि सीढ़िया थी जो मंदिर तक जाती थी , करीब तीन सौ सीढ़ियाँ होंगी|
नारियल, लड्डू, धूप, दीप, सिंदुर, फूल से सजी थालियाँ जिसकी पचास रुपये कीमत थी, ऐसी दो थालियाँ ली और मंदिर तक पहुँचने के अंतिम पड़ाव की यात्रा शुरू की गयी| कुछ पचास सीढ़ियो के बाद रमेश को बबली को गोद मे उठाना पड़ा| मंदिर के पट नौ बजे खुलते थे और खुलते से ही अथाह भीड़ दर्शन को बेताब रहती|
बाजार मे खाने–पीने की दुकाने हों या कपड़ो की, खेल–खिलौने हों या जूते चपल्लो की, पूजन सामग्री की हों या मिठाई की हर जगह लोग ही लोग दिखाई देते| ये अत्यंत व्यस्त बाजार था| जैसे – जैसे सीढ़ियों पर चढ़ते जा रहे थे ऊंचाई बढने के कारण नीचे स्थित पूरा बाजार सपष्ट दिखने लगा था|
मंदिर के अंदर भक्तों का तांता लगा हुआ था पर मंदिर के अंदर व्यवस्थाएं सुचारु होने के कारण दर्शन के लिए  कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा| दर्शन के बाद बाहर आते से ही रमेश ने शिक्षक महोदय के समक्ष एक सवाल रख दिया कि क्या लगता है आपको यहां मन्नते पुरी होतीं है?
शिक्षक महोदय बड़ी विनम्रता से बोले की पूरे गाँव की अर्थव्यवस्था इसी मंदिर के भरोसे है, किसी की दुकान है तो किसी का भोजनालय और सभी की कमाई तो इस मंदिर के भक्तो से ही है| इस हिसाब से उनके परिवारों की तो रोज की आशा आकांशाओ की पूर्ति इसी मंदिर के भरोसे होती है|
अब बताइए इतने लोगो की मन्नत तो रोज ये मंदिर पुरी कर रहा है, रमेश स्तब्ध सा रह गया उसके पास कहने को कुछ नहीं था इसलिए केवल सर हिला कर सहमति प्रकट कर दी|
लौटते वक्त रास्ते मे बबली ने पिता का हाथ पकड़ा हुआ था उसने अचानक सवाल किया कि पापा सब कह रहे थे यहाँ मन्नत पुरी होती है| रमेश ने बबली को गोद मे लिया और कहा “हां होती है अगर आप दिल से मांगो तो” इस जवाब को सुनकर अनीता हैरान थी उसने पुनः मुड़कर मंदिर की ओर नमस्कार किया|
अनीता को अब यकीन हो चला था कि ये मंदिर वास्तव मे चमत्कारी है जिसके दर्शन मात्र से ही रमेश के विचारो मे परिवर्तन आ गया|

Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत

कल्पित हरित


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Romentic Story in Hindi | शादी का पहला सावन

देख रहे हो रोहित ये बारिश इसकी बूँदें उसे बहुत पसन्द थी। इन बूँदों के गिरने के साथ वो पैरों में घुघुरूँ बाँध कर नाचा करती थी। इतनी खूबसूरत लगती थी वो कि उसके सामने मोर भी फीके पड़ जाते थे।

उसे बारिश बहुत पसन्द थी, और आज भी पसन्द होगी। आज इस बारिश के साथ उठने वाली मिट्टी की खुशबू फिर से उन दिनों में ले जाकर मुझे छोड़ आयी है। जब हम बरसात के मौसम पर सड़क पर यूँ ही घूमते हुए घर आते थे।

“ये बारिश भी बड़ी अजीब है
लोगों के लिए पानी है
और मेरे लिए बरसते इश्क़ की कहानी है”

पहाडी़ के पीछे जो वो ढाँबा है, जहाँ मैं चाय पीने जाता हूँ वहाँ की चाय उसे बहुत पसन्द थी। हम हर बरसात में कॉलेज से लौटते वक्त वहाँ की चाय जरूर पीते थे। चाय वैसे भी भी उसे बहुत पसन्द थी। मई, जून की दोपहरी में भी वो चाय पीना पसन्द करती थी, और जब मैं मना करता था तो बडी़ नजाकत से कहती थी…

जनाब आपके लिए सिर्फ चाय होगी
मेरे लिए तो इश्क़ है….

फिर मैं कहता था कि जब चाय से इश्क़ है तो मैं क्या हूँ? तो वो कहती थी..
“तुम और मैं तो एक हैं, तो मेरी पसन्द तुम्हारी भी पसन्द है” और ये बोलकर हँसने लगती थी, जानते हो क्योंकि चाय मुझे कभी पसन्द नहीं थी और ये बात वो जानती थी। हाँ कभी कहा नहीं मैंनें उससे लेकिन उसे पता चल गया था।

तुम्हें पता है जिस दिन हमारी शादी तय हुई ,उस दिन भी ये बादल ऐसे ही जोर से बरस रहे थे। हमारे साथ इन्होंनें भी उस खुशी को महसूस किया था। ये भी हमारी खुशी में मेरी नैना की तरह झूम कर नाचे थे।

उस दिन नैना ने मुझसे कहा था कि हम अब हम हमेशा इन बूँदों के साथ नाचेगे, गायेगे। मैं हमेशा उसकी इन बेतुकी बातों पर हँसता रहता था।

हमारी शादी की ये फोटो देख रहे हो नैना के चेहरे की मुस्कराहट ये खुशी हमारी शादी में दस्तक देने वाली  बेमौसम बारिश के लिए थी। लोग बेमौसम बारिश से परेशान थे और मेरी नैना दुनियां की पहली दुल्हन होगी जो बारिश में भीगते हुए फोटो शूट करवा रही थी।

नैना को कभी अपने मेंकअप, सजने सँवरने की कोई चिन्ता नहीं रही, वो हमेशा से ही ऐसी बेपरवाह सी थी।

रोहित :” सर वो फोटो तो नहीं है इस एलबम में”??

अंशुल : ” नैना बारिश वाली फोटो का एक अगल एलबम रखना चाहती थी। उसके लिए अलग एलबम भी बनवाई थी। शादी के बाद 15 दिन बाद ही मुझे अपनी डूयूटी पर वापस जम्मू जाना पडा़।

जब यह बात नैना को पता चली तो वो मुझसे बोली ….”कि तुम फौजिओं का काम छुट्टी के ममाले में बड़ा खराब है। लेकिन ठीक है जाओ जल्दी आना। सबको बता दो कि तुम्हारे साथ रहने की बरसात में मैंनें बुकिंग कर ली है। तो अपनी बारिश तुम यही बिताना मेरे साथ। शादी के पहले सावन में मुझे तुम्हारी छुट्टियाँ गिफ्ट में चाहिये।”

मैंनें मुस्कराते हुए कहा था “आपका हुक्म सर आँखों पर तो वो हँसने लगी थी। जब मैं वापस जा रहा था तो उसने अपनी आँखों में बिखरी नमी को छुपा लिया था। उसकी आँखों से एक आँसू ना गिरा।

फिर मानसून आया और जम्मू में बाढ़ आ गई और मेरी छुट्टियाँ कैन्सल हो गई। जब नैना को यह बात पता चली तो बहुत निराश हुई थी वो। उसे मेरे बिना सब कुछ अधूरा ही लगता था। लेकिन मैं क्या कर सकता था, नहीं आ पाया। मैं बाढ़ में फँसे लोगों की जान बचा रहा था। अपनी नैना को उसका मनचाहा सावन ना दे पाया। उसका गिफ्ट उसे नहीं दे पाया।

फिर एक हफ्ते बाद पता चला कि नैना बाहर गई  थी। लैन्ड स्लाइड हुआ और नैना अपनी कार के साथ नदी में जा गिरी। दो दिन बाद उसकी लाश मिली । उस दिन ऐसा लगा जैसे मैं मर गया।  तब आया था मैं इस जगह जब मेरी नैना मुझे छोड़कर जा चुकी थी। तब मैं यहाँ से उसकी यादें समेटकर अपने साथ ले गया था। तब से हिम्मत नहीं हुई यहाँ आने की।

अब 5 सालों बाद मेरी पोस्टिंग यहाँ हुई तो बहुत हिम्मत जुटा कर आया हूँ। लेकिन ऐसा लग रहा है कि मेरी नैना मेरे यहाँ आने से बहुत खुश है। मैं उसका साथ महसूस कर पा रहा हूँ। जो तब नहीं कर पाया वो अब कर दिया मैंनें “अपनी नैना के शादी के पहले सावन का गिफ्ट दे दिया मैंनें” अब हम साथ उस पहाडी़ तक घूमने जायेगें। उस ढाबे की चाय भी पीने हम साथ जायेगें। अब हम दोनों अपना हर सावन एक साथ यही मनायेगे।”

Romentic Story in Hindi | शादी का पहला सावन

प्रीती मिश्रा


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Karwa Chauth ki Kahani | करवा चौथ के किस्से

Karwa Chauth ki Kahani | करवा चौथ के किस्से

साथियों नमस्कार, करवा चौथ स्पेशल के इस अंक में हम आपके लिए लेकर आएं हिं एक ऐसी कहानी ” Karwa Chauth ki Kahani | करवा चौथ के किस्से ” जिसे पढ़कर आपका इस त्यौहार से और भी गहरा नाता हो जाएगा| आपको हमारी यह कहानी कैसी लगती है हमें Comment Section में ज़रूर बताएं|


Karwa Chauth ki Kahani | करवा चौथ के किस्से

इस बार आप करवां चौथ पर आ रहें हैं ना ?  चार महीने हो गए आपसे मिले, आपको देखे हुए भी एक महीने से ज्यादा हो चला है। बड़ी ही धीमी आवाज़ में दिशा ने गौरव से कहा,गौरव आर्मी में एक सैनिक है। गौरव ने कहा नही आ सकता यहां सीमा पर तनाव बहुत है।

दिशा ने पूछा तो क्या मैं अपना पहला करवां चौथ तुम्हे देखे बिना पूरा करूँगी। गौरव ने कहा नहीं मैं तुम्हे रात को वीडियो कॉल करूँगा मुझे देख कर अपना उपवास पूरा कर लेना ओर बदले में एक प्यारी सी मुस्कुराहट दे देना। दिशा ने पूछा पक्का?जवाब आया हाँ वादा विश्वास रखो।

आज करवां चौथ का दिन है। सुबह से ही दिशा बहुत खुश है उसे अपने हाथ की मेहंदी उसे अपनी शादी की याद दिला रही है।शादी के बाद ही गौरव वापस कश्मीर चला गया था। कुछ ही पल के साथ को याद कर वह शादी के दिन की तरह तैयार हो रही थी।

शाम होने को है आसमान में कुछ बदल भी हैं, कही ये चांद बादलों में छुप कर लुकाछीपी ना खेले ओर उन्हें देखने का समय और न बढ़ाये।दिशा बस रात होने का इंतज़ार कर रही थी ।

वही गौरव परेशान है उसकी डयूटी आज बहुत दूर घाटी में लगी है। अपना वादा कैसे पूरा करेगा , यहां तो कोई फोन तक काम नही करता।
शाम के  5 बज गए तभी टीवी पर दिखाया आज कश्मीर में बम धमाके में 3 जवान शहीद हुए और बहुत से घायल। खबर सुनते ही दिशा का गला रूँधा गया।

सभी लोग गौरव को ले कर चिंतित है। दिशा का फ़ोन भी बज रहा है, वह बड़ी उम्मीद के साथ उठती है कि शायद गौरव का फ़ोन होगा लेकिन सब रिश्तेदार होते है और यही पूछते है कि गौरव भी वहां है कुछ खबर है क्या?  रात के 9 बज गए अब चांद भी निकल आया।

सास ने कहा बेटी अब गौरव की फ़ोटो देख कर ही उपवास खोल लो कब तक उसके फ़ोन का इंतज़ार करोगी।नहीं माँ जी उन्होंने वादा किया है वो जरूर फ़ोन करेंगे।मन एक चिंता से भरा है,कुछ अनायास घटना होने की आशंका उसे अंदर ही अंदर डरा रही है।

तभी एक अनजान नंबर से उसे वीडियो कॉल आता है अधूरे मन से उठाया तो सामने गौरव था।उसके चेहरे पर हल्की खरोच थी, दिशा के मुह से शब्द नही निकल रहे थे।  गौरव ने बताया धमाके से वो बेसुध हो गया था होश आया तो अपने आप को अस्पताल में पाया और किसी से फ़ोन ले कर उसे फ़ोन किया।

एक अटूट भावनाओ के साथ दोनो बस एक दूसरे को देख रहे थे।इस बार एक दूसरे को देखना हमेशा दोनो के लिए खास रहेगा।

Karwa Chauth ki Kahani | करवा चौथ के किस्से
नटेश्वर कमलेश

चांदामेटा छिन्दवाड़ा


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2 October Gandhi Jayanti | गाँधी जयंती विशेष

साथियों नमस्कार, हिंदी भाषा की सबसे बड़ी वेबसाइट Hindi Short Stories पर आपका स्वागत है| आज के इस खास अंक “2 October Gandhi Jayanti | गाँधी जयंती विशेष” में हम आपके लिए हमारी मण्डली के लेखक “धीरज व्यास” द्वारा लिखी गई एक शानदार कविता लेकर आएं हैं|

आशा है आपको हमारा यह संकलन पसंद आएगा| आपको हमारा यह संकलन कैसा लगता है कृपया कमेंट सेक्शन में हमें ज़रूर बताएं|


2 October Gandhi Jayanti | गाँधी जयंती विशेष

“कर दिया कमाल”

तर्ज:- दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल

फसा दिया फैला के तूने मंदी का ये जाल,
मीडिया के महानायक तूने कर दिया कमाल…
संकट में भी चलती रही तेरी राजनेतिक ये चाल,
वाह रे प्रधान सेवक तूने कर दिया कमाल!!

कोरोना से लड़ी तूने अजब सी ये लड़ाई,
ज्योति जलाई तो कभी तूने ताली थाली बजाई…
ऐसे में झूलते पडोसीयों नें भी आँख दिखाई,
वाह रे फ़क़ीर तूने खूब करामत करवाई||

विदेशी मोबाइलों में से चीनी एप्प को दिया निकाल,
इसको भी मीडिया नें मान लिया एक धमाल…
आ सकता है कोरोना में पहला नंबर अगले साल,
वाह रे चोकीदार तूने कर दिया कमाल||

नौकरी की राह देख रहा थे ये ज़माना,
बद से बदतर हुआ अब नौकरी पाना…
ऐसे में पकोड़ों का भी अब जल भुन जाना,
तू भी फैकुं बड़ा है अब उस्ताद पुराना||

काट डाली तूने ढूँढ़ कर अर्थ वाली डाल,
इस पर चला दी तूने आत्मनिर्भर वाली चाल…
बढ़ा दी हम बेरोजगारों की ये खूब तूने जमात,
वाह रे विकास पुरुष तूने क्या कर दिया कमाल||

2 October Gandhi Jayanti | गाँधी जयंती विशेष
लेखक:- धीरज व्यास पाली


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Vedavati | वेदवती की कथा

हिंदी दिवस 2020 पर कविता | राष्ट्रभाषा पर बहस चले

Vedavati | वेदवती की कथा

साथियों नमस्कार! आज हम आपके लिए हमारे वैद-पुराणों की एक ऐसी कथा “वेदवती की कथा | Vedavati in Hindi” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आप अपने आपको भारतीय होने पर गोरवान्वित महसूस करेंगे| यह कथा हमें भेजी है पीयूष गोएल ने| आपको हमारा यह संकलन कैसा लगता है हमें Comment Section में ज़रूर बताएं|


Vedavati | वेदवती की कथा

एक बार कुशध्वज नाम के एक राजा थे । वह अत्यंत ज्ञानी थे इसलिए उन्हें देवगुरु ब्रहस्पति के पुत्र की भी उपाधि प्राप्त थी । उनकी एक पुत्री थी , जब उसका जन्म हुआ तब वह रोने के स्थान पर वेदों की महिमा गाने लगी , जिससे प्रसन्न होकर उसके माता पिता ने उस कन्या का नाम वेदवती रखा । वेदवती भगवान विष्णु को बहुत मानती थी ।

एक बार वेदवती तप करने बैठी थी । उसे तप करते करते तीन दिवस पूर्ण हुए । वह भूखी प्यासी थी । उनके पिता कुशध्वज ने जब यह देखा तो वह चिंतित हो उठे उन्होंने वेदवती की तपस्या भंग करने का निश्चय किया । तभी वातावरण में नारायण – नारायण नाम की ध्वनि उतपन्न हुई । वह ध्वनि देवऋषि नारद की थी ।

देवरिषि प्रकट हुए ओर उन्होंने राजा को वेदवती की तपस्या भंग करने से मना किया । ओर कहा की  आप ऐसा न करिए क्योकिज़22 वेदवती इस समय भगवान विष्णु के तप में लीन है , इस वक्त वेदवती को उठाना बिल्कुल एक शिशु से उसकी माता छीनने जैसा है । इसलिए हमारा निवेदन है कि कृपा कर आप वेदवती को उनकी साधना से न उठाए । यह बात सुनकर कुशध्वज रुक गए ओर वह चले गए ।

अप पढ़ रहें हैं Vedavati | वेदवती की कथा

कुशध्वज अपनी पुत्री के विषय मे चिंतित थे क्योंकि वेदवती का स्वभाव बिल्कुल भक्तिमय था और वह अपने तप में अधिक लीन रहती थी । कुशध्वज को यह चिंता थी कि वेदवती का विवाह कैसे होगा ? कोंन करेगा वेदवती से विवाह ? वेदवती की संतान होगी या नही ?

कोंन  पुरुष वेदवती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करेगा ? क्या वेदवती आजीवन अविवाहित रहेगी ? राजा ने यह सारी बात अपनी रानी को बताई ।

रानी भी अपनी पुत्री के स्वभाव से चिंतित रहती थी । फिर  उनके अंधकार भरे जीवन में एक ज्योत जली जब वेदवती ने एक दिन अपने पिता से कहा की वेदवती ने अपने आप के लिए एक वर पसन्द किया है ।

यह सुनकर कुशध्वज अति प्रसन्न हुए ओर वह अति प्रशंसा के भाव मे कहने लगे की पुत्री ! मुझे तुमसे यही आशा थी कि तुम अपने योग्य एक वर का चयन अवश्य करोगी । मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुमने जिस वर का चयन करा होगा , वह वर निसन्देह अति मनमोहक व अति ज्ञानी होगा परन्तु उस वर का नाम व पता तो बताओ ताकि हम उस वेद के पास तुम्हारा विवाह प्रस्ताव रख सके ।

यह सुनकर वेदवती ने अपने पिता से कहा कि वह वर अत्यंत मनमोहक ओर ज्ञानी है , उसका नाम श्री विष्णु है और वह वैकुंठ में रहते है । यह सुनकर कुशध्वज चिंतित हो उठे , उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उनके पैरों के तले से  जमीन खिंच गयी हो । वह कभी शांत होते तो कभी अपनी पुत्री को निहारते ।

काफी देर तक कोई वार्तालाप नही हुआ , फिर कुशध्वज ने अपनी चुप्पी फोड़ते हुए कहा कि पुत्री ! तुम खुद नही जानती की तुम क्या कह रही हो , तुम जिन विष्णु की बात कर रही हो , उनकी कृपा से सृष्टि की रक्षा होती है । फिर रानी ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी और बोली कि भगवान कभी विवाह नही करते , ओर फिर नारायण तो विवाहित है तभी उन्हें लक्ष्मीपति  कहा जाता है ।

इसलिए तू यह विचार अपने मन – मस्तिष्क से सदैव के लिए निकाल दे । रानी व राजा ने अपनी बात सम्पूर्ण करी । पर वेदवती तो अपने तन -मन – धन से नारायण को अपना पति मां चुकी थी और किसी भक्त को भगवान से छीनना धरती से सूर्य छीनने जैसा है ।

वेदवती अपनी बात पर अड़ी रही तब कुशध्वज को देवऋषि की सिख याद आई ओर् उन्होंने रानी से कहा कि प्रिये ! अब वेदवती को न रोको बस इतना समझ लो कि अब हमारी पुत्री अपने ससुराल के लिए विदा हो चुकी है ।

वेदवती भगवान विष्णु को प्राप्त करने के लिए एक वटवृक्ष के नीचे बैठकर तप करने लगी । उसने कई वर्षों तक तप किया । उसके तपोबल ने वटवृक्ष के नीचे ही वैकुंठ धाम बना दिया । उसकी यह तपस्या इतनी कठिन थी जितनी देवता भी तपस्या नही कर सकते । भगवान विष्णु सब देख रहे थे ।

ईस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु  प्रकट हुए ऒर उन्होंने वेदवती से वर मांगने को कहा तब वेदवती ने भगवान नारायण को अपने पति रूप में मांगा तब भगवान बोले कि मैं तो विवाहित हु प्रणति मैं अपने किसी अवतार में तुम्हे अपनी पत्नी अवश्य बनाऊंगा ,  फिर भगवान चले गए ।

वेदवती दुबारा तप करने लगी । तभी रावण वहां आया , वह वेदवती की सुंदरता देख मोहित हो गया ओर उसके सम्भोग करने की इच्छा करने लगा । तब वेदवती ने रावण को श्राप दिया की वेदवती ही रावण के वध का कारण बनेगी । फिर वेदवती रथ में सवार होकर स्वर्ग की ओर चली गई ।

समय बीता और एक दिन रावण सीता का अपहरण करने आ गया तब वेदवती ने सीता का रूप धारण करा ओर रावण ने वेदवती का ही अपहरण करा ।

श्री राम ने रावण का वध किया और सद्वती को मुक्ति दिलाई । सीता की अग्नि परीक्षा इसलिए हुई ताकि श्री राम सीता को वापस प्राप्त कर सके । जब अग्नि परीक्षा समाप्त हुई तब सीता ने श्री राम से कहा कि वेदवती ने बहुत दुख सहे है इसलिए आप वेदवती को अपनी पत्नी बनाए । तब श्री राम ने ऐसा ही किया|

Vedavati | वेदवती की कथा

पियूष गोएल


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Moral Stories in Hindi | असली शिक्षक

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए गुरु शिष्य पर आधारित एक ऐसी कहानी “Moral Stories in Hindi | असली शिक्षक” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आपको एक शिक्षक और विधार्थी के बिच के प्रेम व् सामंज्यास को समझने का मौका मिलेगा| आपको हमारी यह कहानी कैसे लगती है हमें Comment Section में जरुर बताएं|


Moral Stories in Hindi | असली शिक्षक

सोमवार की सुबह दिवार पर लटकी संगीतमाय घडी 11 बजने का आभास पहले संगीत से फिर 11 घंटे बजाकर कराती है। रवि के घर में उसके स्कूल जाने की तैयारियां अब जोर पकड़ने लगती है।

वैसे तो रोज इस समय तक सारी तैयारियां हो जाती है पर आज रवि दो दिन से स्कूल जा रहा है| इस कारण तैयारियों का कार्यक्रम तनिक देरी से चल रहा है।

रवि सुबह जल्दी 6 बजे उठ गया था और टूशन जाकर भी आ गया लेकिन वहां से वापस आ कर अखबार पढ़ते पढ़ते उसे नीदं आ गई जो उसकी आँख अभी तोड़ी देर पहले खुली।

स्कूल ड्रेस को वह खुद इस्त्री कर रहा है पर अभी जूते पोलिश करना, बस्ता जमाना भी तो बाकी है। ड्रेस को इस्त्री करते करते रवि अपनी माँ से बोला ”खाना बना कर मेरा टिफिन भी पैक कर देना” माँ ने आश्चर्य से पूछा ”आज लंच टाइम में खाना खाने घर नहीं आएगा क्या?”

उसने बताया “शुक्रवार को स्कूल में बोल रहे थे कि गेट पर ताला लगा दिया जाएगा, जो स्कूल समय में कोई भी बाहर ना जा सके। इसलिए, मेरे तो टिफिन डाल दो क्या पता लंच में आज घर आ पाऊ या या नहीं।” इतना बोल वो वापस तैयारियों में जुट गया।

रवि पास के सरकारी स्कूल में पिछले कुछ सालों से पढ़ रहा है। बचपन से प्राईवेट स्कूल में पढ़ा होने के कारण उसकी अच्छे से तैयार होकर स्कूल जाने की आदत पड़ी हुई थी वरना उसकी कक्षा के कुछ छात्र तो बगैर जूते, कुछ सलवटों से भरी ड्रेस पहने, कुछ के शर्ट बाहर निकले हुए, और कुछ तो बगैर बस्ते हाथ में दो चार किताब लिए हुए आ जाते थे।

समय रहते सारी तैयारी हो गई और रवि तय समय पर स्कूल के लिए निकल पड़ा। स्कूल पहुँच कर रवि सीधा अपनी कक्षा में पहुँचा। बस्ते को कक्षा में रख कर प्रार्थना में जाने के लिए अपने दोस्त विनोद के साथ मैदान की तरफ जाने लगा।

रास्ते में उसने “शनिवार का दिन स्कूल में कैसा रहा” इसके बारे में विनोद से पूछा तो वह बोला ”यार तु तो “शनिवार को आया नहीं पर उस दिन गजब हो गया।

लंच के बाद उपप्रधानाचार्य सर कक्षा में आये और अपनी कक्षा में सिर्फ 5 छात्रों को देखकर काफी नाराज हुए, फिर माॅनीटर से हाजरी भी नोट करवाई।”

”बाकी के सारे कहां गये थे ?” रवि ने पूछा। ”लंच में कुछ खाना-खाने स्कूल से बाहर गये थे जो वापस आए ही नहीं। आज पता नहीं क्या होगा ? मुझे तो अजीब सा ड़र लग रहा हैं।”

विनोद बस इतना बोल के चुप हो गया। ”डर मत यार। मैं तो छुट्टी पर था और तु कक्षा में मौजूद था। तो हम दोनो को डरने की जरूरत नहीं। डरेंगे तो वे बाकी के 60 छात्र जो कक्षा से भाग गए थे।” रवि विनोद को ये सब बोल हिम्मत बढ़ा ही रहा था कि प्रार्थना सभा स्थल आ गया और वे दोनो लाईन में खड़े हो गए।

प्रार्थना अपने निर्धारित समय पर चालु हो गई और जैसे ही खत्म हुई मंच पर से उपप्रधानाचार्य की आवाज माईक से गूंजी ”कक्षा बाहरवीं के छात्रों में से जिनका मैं नाम ले रहा हुँ उनको छोड़ कर बाकी के सारे छात्र उधर अलग लाईन बनाएँ|

विनोद का नाम मंच से बोला गया सो वो तो बच गया लेकिन रवि का नाम नहीं बोले जाने से उसे ताज्जुब हुआ। न चाहते हुए भी रवि को उस अलग वाली लाईन में खड़ा होना पड़ा।

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माईक पर अब बोला गया ”पूरी स्कूल अच्छे से देख लो इस लाईन को। ये सभी भागने वाले महान छात्र है। इनका आज सभी लोग देखलो मैं क्या ईलाज करता हूँ।  “उस लाईन की तरफ हाथ करते हुए, फिर से बोले ”मुर्गा बनो सभी”। ये सुनकर रवि की धड़कने तेज हो गई।

लाईन के सारे लड़के एक दूसरे को देखते रहे पर मुर्गा कोई नहीं बना। ये देख मंच से मुर्गा बनने का निर्देश फिर से गुस्से के साथ दिया गया। डर के मारे धीमें धीमें सारे लड़के मुर्गा बनने लगे लेकिन रवि खड़ा रहा।

वो खड़ा-खड़ा मन ही मन में सोचता रहा मेरी क्या गलती? मैं तो आया ही नहीं था। मैं क्यों मुर्गा बनु। रवि को खड़ा देख कर उपप्रधानाचार्य और ज्यादा गुस्से में आ कर मंच से चिल्लाए, ”लड़के! मुर्गा बन जल्दी”।

रवि ने सर हिलाकर मना कर दिया तो उनका धेर्य जबाव दे गया और मंच पर से तेजी से उतर कर सीधे रवि के पास पहुँचे |आव देखा न ताव उसका कान पकड़ कर मरोड़ दिया।

रवि हिम्मत करके जोर से बोला ”सर मैं छुट्टी पर था। “मैं भागा नहीं” पर वो कहां सुनने वाले थे। उन्होने एक जोरदार थप्पड़ रवि के गाल पर जड़ दिया और उसे झुका कर कमर में मुक्का भी मार दिया।

प्रार्थना में खड़े सभी लोगों का ध्यान इन दोनो पर आ गया। रवि जोर से चिल्लाया ”मेरी कोई गलती नहीं सर। मैंने तो माॅनीटर को छुट्टी की अर्जी भी दे रखी थी। आप उससे पुछते क्यों नही।”

वक्त की नजाकत को समझ माॅनीटर भी दौड कर झट से आ गया और कहा ”हाँ सर। रवि का प्रार्थना पत्र मेरे पास आया हुआ था और वो सच में छुट्टी पर ही था।” माॅनीटर की बात उनके कानो में जाती तब तक वे एक और थप्पड़ रवि को लगा चुके थे।

उपप्रधानाचार्य के रूकने पर रवि के सब्र का बांध टूट गया। ”मुझे ऐसी स्कूल में पढ़ना ही नहीं मैं तो घर जा रहा हुँ।” ऐसा बोलकर वो प्रार्थना स्थल से निकल पड़ा। पिछे से उसके सर चिल्लाए, ”जा चला जा। अब अपने पापा को स्कूल लाएगा तभी स्कूल में आ पाएगा”

रवि गुस्से से लबरेज पर मन से रूआंसा कक्षा में गया और अपना बस्ता उठा कर तेजी से वहां से चला गया। घर पहुँच कर जैसे ही रवि ने माँ और दादी को देखा तो उसकी आँखो से धड़ा धड़ आँसु पड़ने लगे। उसे रोता देख दोनो ने एक साथ पूछा ”क्या हुआ स्कूल में?”

रोते-रोते उसने सारी बात बतायी तो दोनो को बहुत गुस्सा आया पर खुद को और रवि को कैसे भी करके उसके पापा के आने तक का इंतजार करने का समझाया। पापा लंच में घर आए, तब तक रवि चुपचाप बैठा बैठा कुछ सोचता व रोता रहा।

माँ और दादी ने उसे खाना खीलाने की बहुत कोशिश की पर उसने कुछ नहीं खाया। पापा के घर आते ही रवि की दादी ने सारी बात बताते हुए, बोला ”अभी के अभी जा कर आ इसकी स्कूल और पता कर बात क्या है ? फालतु में मार दिया मेरे बच्चे को।”

पापा रवि को लेकर स्कूल पहुँचे। प्रधानाचार्य शहर से बाहर गए हुए थे और उपप्रधानाचार्य अन्य शिक्षकों साथ स्टाफ रूम में बैठे हुए थे। दोनो स्टाफ रूम पहुँचे और रवि के पापा ने उनको कहा ” सरजी गलती होने पर भले आप इसे पचास थप्पड़ मारों पर आपने तो बगैर गलती इसे मार दिया। एक बार इसकी बात तो सुनते।”

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इतना सुनते ही स्टाफ रूम में दूसरे अध्यापक भी आ गए| रवि के पापा सरकारी अधिकारी है इसलिए स्कूल में कई लोग उन्हे जानते है वे भी वहां आ गए| सर जी का गुस्सा अभी उतरा नहीं था सो उन्होने बेरूखी से जवाब दिया ”क्या हो गया मारा तो। इतना तो शिक्षक को हक होता है मारने का और गेहुं के साथ एक दो जौं पीस ही जाते है इसमें इतना बवाल काहे का।

इतने में रवि के दादा घर से होकर स्कूल पहुंचें| उनका शहर में बहुत रूतबा था जो वो सीधे स्टाफ रूम में आकर जोर से बोलने लगे, “कौन है वो मास्टर जिसने मेरे पोते को मारा है। उसकी इतनी हिम्मत मेरे बच्चे को हाथ लगाया। मैं उसका तबादला करा दूंगा।

उपप्रधानाचार्य उनके सामने आकर उनसे जोर से कुछ बोलने लगे तो उनकी बात काट कर रवि के दादा बोले ”जेल भिजवा दूंगा और नौकरी भी चली जाएगी मैंने पुलिस केस कर दिया तो।”

ये सुनते ही कक्षा के अन्य अध्यापक जो अध्यापक दल का नेता था रवि के दादा से भीड़ गया। स्टाफ रूम का माहौल अब तो ऐसा हो गया जैसे कोई सब्जी मंड़ी हो। दोनो पक्ष ज़ोर-ज़ोर  से चिल्लाने लगे। बड़ी मुश्किल से रवि और उसके पापा ने दादा को शांत करा कर रवाना किया।

उनके जाते ही सारे अध्यापक उपप्रधानाचार्य और संघ के नेता अध्यापक के साथ हो गए और रवि व उसके पापा को तरह तरह के ताने मारने लगे| एक बोला ”जमाना बहुत खराब है। गुरू की कोई इज्जत ही नहीं बची है।” दूसरा बोला ”मार दिया तो क्या हो गया? अब क्या माफी  मांगे पूरी कक्षा से|

एक अन्य बोला ”पुराने जमाने में लोेग स्कूल में कहने को आते थे कि मेरे बच्चे को मार मार के सुधारो और अब आज के जमाने के लोग लड़ने के लिए आ जाते है कि मेरे बच्चे को क्यों मारी।

एक के बाद एक कईयों ने अपनी भड़ास निकाली। सब के ताने सुन रवि ने अपने पापा का हाथ पकड़ा और उनसे बोला ”पापा चलो यहां से। मुझे नहीं पढ़ना इस स्कूल में। मुझे टी-सी- दिलवा दो। मै प्राईवेट ही बोर्ड की परीक्षा दे दूंगा| ये सुन कर आध्यापक बोला ”ये बात ,कदम सही है। हमें भी हमारे यहां नहीं चाहिए ऐसे विद्यार्थी|

ऐसा नहीं कहते बेटे। मैं बात कर रहा हुँ न।” रवि के पापा ने उसे समझाते हुए कहा। एक तरफ तो रवि के पापा रवि और उपप्रधानाचार्य में सुलह कराने की कोशिश कर रहे थे तो दूसरी तरफ अन्य अध्यापक उन्हें ताने मारने में व्यस्थ थे।

इन सब शोरगुल के बीच स्कूल के सबसे वरिष्ठ अध्यापक बाबुलाल अखबार पढ़ने का नाटक करते हुए सब चुप चाप देख रहे थे। आखिरकार जब उनसे रहा नहीं गया तो उठ कर बोले “ये कोई वक्त और मौका नहीं है आपसी एकता दिखाने का। इस बच्चे के साथ गलत हुआ है। हमें हमारी गलती माननी चाहिए।

हमारा काम सिर्फ पढ़ाना ही नहीं हैं। पढ़ाई के प्रति छात्रों का रूझान बनाये रखना भी हमारी जिम्मेदारी हैं। हमें हमारे सम्मान की चिंता छोडकर बच्चे के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए।”

इतना सुन कर स्टाफ रूम में ख़ामोशी हो गयी क्योंकि सभी लोग बाबुलाल की बहुत इज्जत करते थे। बाबुलालजी रवि के पास गये और उसके सिर पर हाथ फेर कर उससे बोले ”बेटा गुस्से में आदमी को सही गलत का कोई ध्यान नहीं रहता।

इस कारण उससे गलती हो जाती है। इस बात को एक बुरा सपना समझ कर भूल कर पढाई और अपने आने वाले भविष्य के बारे में सोचो।”

”पर ये सारे लोग नहीं भूलेंगे। मेरे कम सत्रांक भेजेंगे| मुझे कक्षा में नीचा दिखाएँगे मुझे जानबुझ कर तंग करेंगे ऐसे माहौल में पढ़ा नहीं जा सकता।” रवि ने उखड़े मन से जवाब दिया।”

कोई कुछ नहीं कहेगा तुझको। कोई कुछ भी कहे तो वो कक्षा छोड़ कर मेरी कक्षा में आ जाना। खाली समय में में मेरे पास आ जाना मै अतिरिक्त पढ़ा भी दूंगा तुझे। कोई टी-सी- नहीं लेना। तु तो मेरे बेटा जैसा है।

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ऐसा बोल उन्होने उसे गले लगा लिया। बाबुलाल के गले लग कर रवि का गुस्सा शांत हुआ और स्कूल में पढ़ने को तैयार हो गया। रवि को बिना गलती मिलें उस दंड और अपमान को भुलाने में कुछ वक्त लगा।

कुछ दिन बाद उसने वापस स्कूल जाना शुरू भी कर दिया। पर अब वह जब भी पढ़ने बैठता उसे वो घटना फिर याद आ जाती और पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता।

ये बात उसने बाबुलालजी को जा कर बोली। तो उन्होने समझाया की अगर तुम अपमान का बदला लेना चाहते हो तो ईज्जत पा कर लो। पढ़ाई कर के ऐसा परिणाम लाओ की तुम्हारी पूरे स्कूल में ईज्जत हो।

जिन लोगों ने तुम्हारा अपमान किया है वो ही तुम्हारी प्रशंशा करें यही असली बदला होगा। तुम्हारा आज से यही लक्ष्य होना चाहिए। आज नही तो कल गलती करने वालों को ग्लानी जरूर होगी।”

ये बात रवि के दिमाग में ठीक से बैठ गयी और वो पढाई में लग गया। पूरे साल बाबुलालजी प्यार से उसका हौसला बढ़ाते रहे। कुछ महीनों बाद हुई बोर्ड की परीक्षा में रवि ने अच्छे से सारे पेपर हल किए।

परीक्षा परिणाम में जब रवि प्रथम श्रेणी से पास हुआ तो वह बहुत ख़ुशी से बाबुलाल सर से मिलने स्कूल पहुँचा तो उसे पता चला कि अपनी कक्षा में सिर्फ वो अकेला ही प्रथम श्रेणी से पास हुआ है।

स्कूल वालों को परिणाम से आश्चर्य हुआ फिर भी सबने उसे बधाई दी। अगले दिन अखबार में अपनी फोटो देखते ही रवि की आँख भर आई। उसने अपनी माँ को बोला ”मेरी पूरी स्कूल में बहुत सारे शिक्षक थे। पर वो शिक्षक जिनकी वजह से मुझे यह ख़ुशी मिली वो अकेले बाबुलालजी है। वो ही है पूरी स्कूल के असली शिक्षक है।

Moral Stories in Hindi | असली शिक्षक
लेखक-धीरज व्यास, पाली


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हिंदी दिवस 2020 पर कविता | राष्ट्रभाषा पर बहस चले

साथियों नमस्कार, आज हम हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में आपके लिए एक खास कविता “हिंदी दिवस 2020 पर कविता | राष्ट्रभाषा पर बहस चले“लेकर आएं हैं| यह कविता हमारी मण्डली के लेखक बरुण कुमार सिंह ने लिखा है| आपको यह कविता कैसी लगी हमें Comment Section में ज़रूर बताएं|


हिंदी दिवस 2020 पर कविता | राष्ट्रभाषा पर बहस चले

 

नमस्कार! प्रणाम! हम भूल चले,
हैलो! हाय! बाय! हम बोल चले।
चरण स्पर्श! भूल चले,
आलिंगन को हाथ बढ़े।
संस्कृति को भूल चूकें,
विकृति को बढ़ चले।
पौराणिकता को भूल चले,
आधुनिकता को हाथ बढ़े।
अपव्यय पर हाथ रूके,
मितव्यय पर हाथ बढ़े।
कृत्रिमता को भूल चले,
अकृत्रिमता को बढ़ चले।
सुप्रीमकोर्ट में बहस बेमानी है,
न्याय की चौखट पर,
राष्ट्रभाषा हारी है,
मंजिल अभी बाकी है।
सितम्बर में हिन्दी दिवस मने,
हिन्दी पखवाड़ा विसर्जन बने।
राष्ट्रभाषा पर बहस चले,
हिन्दी पर राजनीति जारी है।
बरुण कुमार सिंह
ए-56/ए, प्रथम तल, लाजपत नगर-2
नई दिल्ली-110024
मो. 9968126797

हिंदी थी वह

हिंदी थी वह, जो लोगो के ह्रदयो में उमंग भरा करती थी,
हिंदी थी वह भाषा, जो लोगो के दिलो में बसा करती थी !!

हिंदी को ना जाने क्या हुआ, रहने लगी हैरान परेशान,
पूंछा तो कहती है अब कहाँ है, मेरा पहले सा सम्मान…!!

मैं तो थी लोगो की भाषा, मैं तो थी क्रांति की परिभाषा,
मैं थी विचार-संचार का साधन, मैं थी लोगो की अभिलाषा…!!

मुझको देख अपनी दुर्दशा, आज होती है बड़ी निराशा,
सुन यह दुर्दशा व्यथा हिंदी की, ह्रदय में हुआ बड़ा अघात ,
बात तो सच है वास्तव में, हिंदी के साथ हुआ बड़ा पक्षपात…!!

हिंदी जो थी जन जन की भाषा, और क्रांति की परिभाषा,
वह हिंदी कहती है लौटा दो उसका सम्मान, यही है उसकी अभिलाषा..!!

अपने ही देश में हिंदी दिवस को तुम, बस एक दिन ना बनाओ,
मैं तो कहती हूँ, हिंदी दिवस का यह त्यौहार तुम रोज मनाओ…!!

आओ मिलकर प्रण ले, हम सब करेंगे हिंदी का सम्मान,
पूरी करेंगे हिंदी की अभिलाषा, देंगे उसे दिलो में विशेष स्थान…!!


हिंदी जीवन है सदियों से,

हिंदी है मेरा अभिमान!
हिंदी को गर पूजूं न में,
मिट जाए मेरी पहचान!!
जिस धरती पर हुए अनेकों,
महापुरुष जो थे निष्काम!
उस भूमि और उस हिंदी को.
हमारा शत-शत प्रणाम!!

ह से हिंदी 

“ह” से “ह्रदय” ह्रदय से “हिंदी”, हिंदी दिल में रखता हूँ,

“नुक्ता”लेता हूँ “उर्दू” से, हिन्दी उर्दू कहता हूँ..

शब्द हो अंग्रेज़ी या अरबी, या कि फारसी तुर्की हो,

वाक्य बना कर हिन्दी में, हिन्दी धारा में बहता हूँ..

हिंदी-ह्रदय विशाल बहुत है, हर भाषा के शब्द समेटे,

शुरू कहीं से करूं मगर, हिंदी में ख़तम मैं करता हूँ..

केशव का हो कठिन काव्य, या मधुर छंद रसखान के हों,

मैं कबीर का समझ के दर्शन, सूर के रस में रमता हूँ..

तुलसी सदृश दास हिन्दी का, बन कर स्वयं समर्पित हो

मातृ रूपिणी हिन्दी तुमको, नमन कोटिशः करता हूँ…

—प्राणेन्द्र नाथ मिश्र


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सावन लोक गीत इन हिंदी लिरिक्स

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए सावन के कुछ ऐसे गीतों “सावन लोक गीत इन हिंदी लिरिक्स” का समावेश करने जा रहें हैं जिन्हें आप अपने घर-परिवार में रोजमर्रा के काम-काज के साथ गुनगुना सकते हैं|

सावन लोक गीत इन हिंदी लिरिक्स

ज्यों ज्यों बूँद परत चूनर पर,

    त्यों त्यों हरी उर लावतआवत ॥ कुन्जन  में ….

अधिक झंकोर होत मेघन की,

    द्रुम तरु छिन छिन गावत आवत ॥ कुन्जन  में ….

वे हँसि ओट करत पीताम्बर,

    वे चुनरी उन उढ़ावतआवत ॥ कुन्जन  में ….

भीजे राग रागिनी दोऊ,

    भीजे तन छवि पावनआवत ॥ कुन्जन  में ….

लै मुरली कर मन्द घोर स्वर,

    राग मल्हार बजावतआवत ॥ कुन्जन  में ….

तैसे ही मोर कोकिला बोलत,

    अधिक पवन घन भावतआवत ॥ कुन्जन  में ….

सूरदास प्रभु मिलन परस्पर,

    प्रीत अधिक उपजावतआवत ॥ कुन्जन  में ….

शब्दार्थ : आवत = आते हैं, परत = पड़ती हैं, लावत = लाते हैं, झंकोर = गड़गड़ाहट की ध्वनि, उन = उन्हें, बजावत = बजाते हुए, उपजावत = उत्पन्न करते हुए


कृष्ण हिंडोले | सावन लोक गीत इन हिंदी लिरिक्स

कृष्ण हिंडोले बहना मेरी पड़ गये जी,
       ऐजी कोई छाय रही अजब बहार

सावन महीना अधिक सुहावनौ जी,
       ऐजी जामें तीजन कौ त्यौहार
मथुरा जी की शोभा ना कोई कहि सके जी,
ऐजी जहाँ कृष्ण लियौ अवतार

गोकुल में तो झूले बहना पालनो जी,
       ऐजी जहाँ लीला करीं अपार।  
वृन्दावन तो बहना सबते है बड़ौ री,
       एजी जहाँ कृष्ण रचायो रास।
मन्दिर मन्दिर झूला बहना मेरी परि गये जी
एजी जामें झूलें नन्दकुमार
राग रंग तो घर घर है रहे जी,
ऐजी बैकुण्ठ बन्यौ ब्रजधाम।
बाग बगीचे चारों लंग लग रहे जी,
ऐजी जिनमें पंछी रहे गुंजार
मोर पपैया कलरब करत हैं जी,
ऐजी कोई कोयल बोलत डार
पावन यमुना बहना मेरी बहि रही जी,
ऐजी कोई भमर लपेटा खाय
ब्रजभूमी की बहना छवि को कहै जी,
ऐजी जहाँ कृष्ण चराईं गाय
महिमा बड़ी है बहना बैकुण्ठ तै जी,
एजी यहाँ है रहे जै जैकार।  

शब्दार्थ : जामें = जिसमें, लंग = ओर / तरफ


झुकी है बदरिया कारीकब आओगे गिरधारी

झुकी है बदरिया कारीकब आओगे गिरधारी।

उमड घुमड कर घिरी हैं घटाएँ,

       घोर शब्द होए भारी,  कब आओगे गिरधारी।

धड धड कर यह जियरा धडके,

       आए याद तुम्हारीकब आओगे गिरधारी।

पी पी शोर मचाए पपीहा,

       कोयल अम्बुआ डालीकब आओगे गिरधारी।

गरज गरज कर इन्द्र डरावे,

       देख अकेली नारीकब आओगे गिरधारी।

रिमझिम रिमझिम मेहा बरसे,

       भीजे चुनर हमारीकब आओगे गिरधारी।

ओ किशोर चितचोर साँवरे,

       चाकर मैं शरणाईकब आओगे गिरधारी।


आई बागों में बहारझूला झूले राधा प्यारी

आई बागों में बहारझूला झूले राधा प्यारी

       झूले राधा प्यारी,  झुलावें बनवारी || आई बागों में …………..

सावन की ऋतु है आईघनघोर घटा नभ छाई

       ठंडी-ठंडी पड़े फुहारझूला झूले राधा प्यारी || आई बागों में …………..

हो मस्त मोर यूँ नाचेमोहन की मुरलिया बाजे

       कू-कू कोयल करे पुकारझूला झूले राधा प्यारी || आई बागों में ……….

सब सज रहीं नार नबेलीनटखट करते अठखेली

       कर कर के सोलह सिंगारझूला झूले राधा प्यारी || आई बागों में …………..

राधा संग में बनवारीझूलें हैं सखियाँ सारी

       हिलमिल गावेँ गीत मल्हारझूला झूले राधा प्यारी || आई बागों में …………..

भए ऐसे मगन कन्हाईचलती ठंडी पुरवाई

       छम-छम बरसे मूसलधारझूला झूले राधा प्यारी || आई बागों में ………..


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Hindi Poem on Daughter | में बेटी हूँ

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Hindi Poem on Daughter | में बेटी हूँ

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए एक ऐसी कविता “Hindi Poem on Daughter | में बेटी हूँ” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आपको बेटियों पर गर्व महसूस होगा|


Hindi Poem on Daughter | बेटीयों और बहनों की अस्मिता का सवाल है

दरीन्दगी से भरे मानुष रूप किसे किसका ख्याल है,
लूट रही है इज्जत और झूठों का मायाजाल है|
21वीं सदी में मनुष्य का मनुष्य ही काल है,
बेटीयों और बहनों की अस्मिता का सवाल है||
घूम रहे हैं भेड़िये निर्भीक हर चौराहे पर,
उनकी जान बचाने के लिए…
कुछ भेड़िये खाल ओढ़े बैठे हैं संसद भवन पर.
कुछ तो अर्थों से बलात्कार का परिभाषा…
प्रयत्न करते बदलने का|
ये राम नहीं दूशासन का काल है.
बेटियों और बहनो की अस्मिता का सवाल है||
बेटियों और बहनों के साथ होता रहा दुर्व्यवहार,
खुद को सामाजिक समझने वाला इंसान
देखता रहा हर बार…
न्याय व्यवस्था फीकी है उम्मीद करें तो किस पर,
पुलिस प्रशासन सोयी है भीभीषण की गहरी नींद में
किसी की बहन होना किसी की बेटी होना
अब हो गया जी का जंजाल है….
बेटियों और बहनो की अस्मिता का सवाल है||
अब तो जागो मानवों अगर है तुममे मानवता,
दिखा दो गीदड़ों को तुम अपनी विशेषता|
सजा दो ऐसी दुस्टों को कांप जाए उनकी रूह भी,
बहन, बेटी, भाई सभी से है अब गुहार…
खोलो आँखे अपनी और अत्याचार पर करो प्रहार||
अब हम सब को मिल कर यह करना कमाल है,
बेटियों और बहनों की अस्मिता का सवाल है||
विजय नारायण

में बेटी हूँ

जी हाँ! में बेटी हूँ,
जिसके जन्म लेती ही…
माता पिता करने लगते हैं उसके दहेज़ की व्यवस्था|

जी हाँ! में वही बेटी हूँ,
में जनि जाती हूँ लक्ष्मी के रूप में भले…
पर मुझ पर किए जाते हैं अन्याय अनेक|

जी हाँ! में बेटी हूँ,
जिसके लिए नारे लगाए जाते हैं कई…
परन्तु कोख में ही ख़त्म कर दिया जाता है मुझे!
और तो और पढने से भी वंचित रखा जाता है मुझे|

जी हाँ! में वही बेटी हूँ,
पढ़ लिख कर आगे बढ़ना चाहती हूँ में,
समाज की इस व्यवस्था को बदलना चाहती हूँ में|

रचयिता – सपना कुमारी साह


बेटी

चहकतेविहान का आफ़ताब है बेटी,
महकते शाम का महताब है बेटी|

ज़िन्दगी के छंदों का अलंकार है बेटी,
कविता के पन्नों का संस्कार है बेटी|

वत्सल के श्रृंगार का रस है बेटी,
कल के संसार का यश है बेटी||


तुम मेरी सखी बनोंगी ना

सुख में दुःख में संग मेरे रहना,
तुम मेरी सखी बनोंगी ना!

जब में रुठुं, तुम मुझे मानाने आना…
हंस दो न बस एक बार,
बोल-बोल कर मुझको गले लगाना…
बोलो ऐसा करोगी ना,
तुम मेरी सखी बनोंगी ना!!

माँ, आज यह पहनों…आज यह ओढो,
कहकर मुझसे लाड जाताना…
आज यह खाना…आज वह खाना,
अपनी फरमाइशें बताना…
खूब प्यार में करती तुमसे,
तुम भी इतना प्यार करोगी ना ?
तुम मेरी सखी बनोंगी ना||

रचयीता – निभा अम्बुज जैन


अन्याय देखकर आंख उठाती,

नही तो लज्जा का अवतार है।

कितने कष्ट भी उसने झेले,

पर सहनशीलता भरमार है।

टूटने लगता जो कभी हौसला,

तो बनती सच्ची ढार है।

छेड़ो कभी जो राक्षस बनकर,

तो “दुर्गा” सी अंगार है।

रचयिता – प्रिया त्रिपाठी


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Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी

साथियों नमस्कार, कभी कभी इन्सान कुछ ऐसे रिश्तों में फंस जाता है जहाँ उसे अपने सपने पीछे छुटते नज़र आते हैं| ऐसी ही एक कहानी “Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी” हमारी लेखिका लिपि चौहान ने हमें भेजी है, आशा है आपको हमारा यह संकलन पसंद आएगा|


Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी

आज घर में अकेली थी ,राधा काम करके जा चुकी थी ,रवि ऑफिस जा चुके थे और में सारा काम निपटा के रेडियो पर गाने सुन रही थी। सुनते-सुनते नज़र शर्मा जी की बालकनी में टंगे पिंजरे पर पड़ी जहा एक प्यारा सा मिट्ठु  था।

एक खुबसुरा बोलने वाला मिट्ठू ,  जो अब बंद पिंजरे में चुप सा हो गया था। उसकी आँखे बस आकाश को देखती हुई आज़ादी का इंतज़ार करती थी उड़ने का इंतज़ार करती थी|

मुझे उससे हमदर्दी सी होने लगी वो तो एक असहाय पंछी है पर में तो इंसांन हूँ वो पिंजरा नहीं खोल सकता पर में सारे दरवाजे खोल सकती हूँ , पर क्यों हूँ  मै आज इस मुकाम पर?

माँ-पापा की चहेती,  भाई की जान और हर एक फंक्शन की जान थी मै| मुझे आज भी याद है, कॉलेज के उस फंक्शन में मेरे डांस परफॉरमेंस के बाद वन्स मोर-वन्स मोर की आवाजे आ रही थी| सारे टीचर्स और प्रिन्सिपल सर मेरी माँ को घेर कर खड़े थे|

प्रिंसिपल  तारीफ़ करते नहीं थक रहे थे| यही नहीं में कॉलेज टापर भी थी| मेरे यही सारे गुण देख कर रवि मर मिटे थे मुझ पर और मेरा हाथ मांग लिया| घर नौकरी सब अच्छी देख कर पापा ने भी मेरी शादी कर दी|

पहला एक साल तो प्यार मोहब्बत में कुछ ऐसा गुज़रा की पता ही नहीं चला| रवि की दीवानगी थी ही कुछ ऐसी थी| लेकिन वो दीवानगी सिर्फ दीवानगी नहीं थी एक ऐसा पिंजरा जो में मेरे लिए तैयार कर रही थी| जिसमे अब मेरा दम घुटता था|

मेरी खूबसूरती कोई और देखे तो रवि बर्दाश्त नहीं कर सकते थे| कोई मेरी कोई तारीफ़ करे ये भी उन्हें अच्छा नहीं लगता था| मै ज्यादा सजु-सवरू तो ताने मिलते थे|

एक कॉम्पिटिशन में भाग लेने के लिए जब मैने रवि से पूछा तो उन्कहोंने कह दिया की मेरी बीवी बीच बाजार में नाचे मुझे पसंद नहीं| क्या मेरी कला जो पूरी दुनिया पसंद करती है वो अब बाज़ारू भी हो गई थी ?

दिन ब दिन उम्मीदे मेरा दामन छोड़ रही थी और में उन चार दीवारों में सिमटती जा रही थी|

मेरा किसी पडोसी से बात करना भी रवि को पसंद नहीं था| क्या यही प्यार था उसका जो मुझे कैद करता जा रहा था| शाम हो चुकी थी, में अपने लिए चाय बनाकर लाई और बालकनी में पी ही रही थी की घंटी बजे देखा तो रवि थे और कुछ जल्दी में थे…

पूछा तो कहने लगे की मीटिंग है और उसके बाद  पार्टी लेट हो जाऊंगा आने में|

मैंने  कहा कुछ जरुरी बात है तो कहने लगे फ़िज़ूल में परेशान न करो  जल्दी से सूट निकालो मुझे जाना है| पता नहीं मेरे अंदर कौन सी लहर दौड़ गई की मेने कहा फ़िज़ूल नहीं बहुत ज़रूरी है और आज सुनना होगा|

रवि गुस्से में मेरी तरफ देखने लगे मेने भी उनसे आँख से आँख मिला कर कहा, आज मेरी गुरु माँ का कॉल आया था| उन्होंने कहा की आगरा कत्थक फेस्टिवल में, मैं  गुरुकुल को रिप्रेजेंट करू|

यह सुनते ही रवि का कटाक्ष मेरे कानो में पड़ा| वो कुछ बोलते इससे पहले ही मैंने  कहा, पूछ नहीं रही हूँ बता रही हूँ| कल आगरा के लिए निकल जाउंगी और हां अभी मुझे टिकट्स करना है। जा रही  हूँ।

रवि ने कहा, जा रही हो तो दुबारा इस घर में मत आना| मैंने कहा घर और अलमारी की चाबियां टेबल पर रखी है आपके जरुरी पेपर उस ड्रावर में है और आपको बोलने की जरुरत नहीं मैंने घर छोड़ने का फैसला उस वक़्त ही कर लिया था जब आपने मेरी कला को बाज़ारू कहा  था| बस हिम्मत आज जुटा पाई हूँ।

घर से बहार आते ही महसूस हुआ जो ख़ुशी एक अरसे से गुम थी आज मिल गई|

Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी

लिपि चौहान


Success Story in Hindi | आत्मविश्वाश 

दिन गर्मियों के थे, हम सब सयुंक्त परिवार में रहते थे। एक दिन मेरी कॉलोनी में कुछ खूबसूरत सी लड़कियों का आना हुआ, बात करने पर पता चला कि वो मुम्बई से आई थी।

हाव-भाव, चाल-ढाल से एकदम शहरी। मैं जो कि अभी तेरह की हुई थी, उनको देखकर बहुत प्रभावित थी। आखिर बात हुई, दोस्ती हुई….फिर घूमना, बाते करना।

अक्सर मैं उनको देखकर उन जैसा बनने की कोशिश करती| समय बीतने लगा और कोशिश बढ़ गयी, पर कोई तारीफ नही बस कोशिश……पढ़ाई में होशियार थी अब जो समय पढ़ाई का था वो सुंदर दिखने और तारीफ पाने में लगने लगा।

उम्र का वो दौर, हार्मोन की उथल पुथल, सब कुछ जैसे अजीब था। एक सीधी साधी लड़की को अब उड़ना था, लेकिन किस दिशा में ,ये उसको नही पता था।समय निकलता गया, सयुंक्त परिवार और काम के कारण माँ उतना समय नही दे पाती थी, पिता सरकारी नौकरी में थे जोकि दूसरे शहर में पदस्थ थे।

लेकिन मेरे व्यवहार में अचानक आये परिवर्तन से वो भी अनभिज्ञ न थे।आखिर पापा ने पूछ ही लिया “क्या बात है तनीषा, आज कल कहा मन रहता है तुम्हारा”। मैं बोली “परीक्षा में अभी टाइम है,मैं कोर्स कवर कर लूंगी। पर मुसीबत बढ़ने वाली थी, उन लड़कियो ने ये बात भांप ली और फिर शुरू हुआ वो दौर जिसकी मैं कल्पना भी नही कर सकती थी|

उन लड़कियो ने मेरे कद ,रंग वजन और हर उस चीज़ का मज़ाक बनाया जिसको लेकर मैं संवेदनशील थी। एक अलग ही तरह का दबाव महसूस कर रही थी। मेरा खाना खाने का दिल नही करता था, खाती भी थी तो उल्टी कर देती थी।

मै उदास रहने लगी, कितनी भी कोशिश कर लूं, मैं उन लड़कियों जितनी आकर्षक नही लग पा रही थी। असर ये हुआ कि उस वर्ष मेरा परीक्षा परिणाम बहुत बुरा रहा। समय निकल रहा था। मैं अंदर से कमजोर हो गयी थी, फिर एक दिन मैंने ऐसे जीवन को खत्म करने का सोचा।

बस किशोर मन यही सोच रहा था कि जब मुझमे कोई आकर्षण ही नही तो जीवन का अर्थ क्या, दिन और समय तय किया ,और इंतज़ार करने लगी। पर इसी बीच पापा ने फ़ोन कर बुला लिया। जगह बदली, मन बदला मरने का विचार आगे बढ़ा दिया।

सोच वही ले जाती थी मैं सुंदर नही, मोटी हु। कद कम है रंग दबा हुआ। इस दबाव को झेलते हुए एक दिन अचानक ,एक अंदरूनी ऊर्जा महसूस हुई।जैसे कोई हाथ पकड़ कर मुझे इस स्थिति से निकल रहा था। मैंने खुद तय किया कि कुछ तय समय तक मैं सिर्फ सकारात्मक बाते पढूंगी और देखूंगी। मुझे अच्छा महसूस होने लगा था।

भूख बढ़ गयी , चहरा ठीक हो रहा था। थकान भी कम हो गयी। मैंने फिर एक दिन हिम्मत करके वहां के बच्चो से दोस्ती की और शाम को रोज़ बेडमिंटन खेलने जाने लगी।सब कुछ जैसे सही हो गया था। नए दोस्त , नया माहौल सब अच्छा था । फिर वापस जाने का समय आया।घबराहट , डर के कारण हालात खराब थी, पर जाना तो था।

अगले दिन वापस आ गए। उन लड़कियों का ग्रुप सामने से जा रहा था हंसता हुआ, पर मैं स्थिर खड़ी देख रही थी न कोई डर ,न दबाव। अपने अस्तित्व का पहला अनुभव उसी दिन हुआ था मूझे और उस किशोरी के लिए ये जीवन की अमूल्य सीख थी। आज ,इतने साल बीत गए ,लड़खड़ाई , बोहोत उत्तर चढ़ाव देखे पर उस दिन हिम्मत के जो पंख मिले, उनने मुझे कभी गिरने नही दिया। ——–

यामिनी

Motivational Story in Hindi for Success


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