Category Archives: Travel Stories

साथियों नमस्कार

Hindi Short Stories के इस अंक में हम आपके लिए लेकर आएँ हैं, Travel Stories.

दोस्तों, हमारी दिली ख्वाइश रहती है, कि हम पूरी दुनियां घूम आएँ | लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों और कामकाज भरी ज़िन्दगी के बिच हम कुछ खास जगह ही घूम पते हैं | हम सभी को किसी भी जगह जाने से पहले उस जगह पर घुमने वाली जगहें , वहां पहुँचने के साधन और साथ ले जाने वाले जरुरी सामानों की जानकारी होना आवश्यक होता है| इसीलिए Hindi Short Stories हमारे पाठकों के लिए इस अंक Travel Stories में देश-दुनियां की उन खास जगहों के बारे में बताने जा रहा हैं जहाँ आप अपने परिवार या दोस्तों के साथ वक़्त बिताने जा सकते हैं !

तो लीजिये पेश है, देश-दुनियां में की कुछ खास जगहों की जानकारी…..

धन्यवाद् !!

Prem Mandir Vrindavan | मथुरा का प्रेम मंदिर

Prem Mandir Vrindavan | मथुरा का प्रेम मंदिर


साथियों नमस्कार, आज के इस अंक में हम आपके लिए लेकर आएं हैं “Prem Mandir Vrindavan | मथुरा का प्रेम मंदिर” के बारे में कुछ खास बातें! जिसे पढ़कर आपको लगेगा की आप मथुरा वृन्दावन की यात्रा पर ही हैं| तो आइये चलते हैं मथुरा वृन्दावन यात्रा पर|


Vrindavan | मथुरा का प्रेम मंदिर

एक प्यार लैला मजनू जैसा जो इतिहास में प्यार के मायने बदल दे,
एक प्यार शाहजहां जैसा जो दुनिया के कुछ चंद अजूबे में खुदको शामिल कर ले,
एक प्यार राम सीता जैसा जो दुनिया को त्याग का मतलब सिखा दे
और एक प्यार राधा कृष्णा जैसा जो एक शहर वृन्दावन को प्रेम नगरी बना दे।।।

राधा कृष्णा की बात करें तो उनका रिश्ता ,उनकी जोड़ी हमारे दिमाग में हमेशा एक सवाल पैदा करता है कि उनकी शादी रुक्मणी से हुई थी फिर भी क्यों राधे-कृष्णा को साथ पूजा जाता है।।।

कृष्ण के साथ, राधा को सर्वोच्च देवी स्वीकार किया जाता है और यह कहा जाता है कि वह अपने प्रेम से कृष्ण को नियंत्रित करती हैं। यह भी माना जाता है कि कृष्ण संसार को मोहित करते हैं, लेकिन राधा “उन्हें भी मोहित कर लेती हैं। इसलिए वे सभी की सर्वोच्च देवी हैं।

कृष्णा जी की बात करें तो सबसे पहले उनका माखन चुराना और उनकी गोपियों के साथ रास लीला याद आती है।।।

भगवान श्रीकृष्ण  की लीला से जुडा हुआ है एक क्षेत्र “वृन्दावन” जो मथुरा से १५ किमी कि दूरी पर है। पुराणों के अनुसार सतयुग में महाराज केदार की पुत्री वृंदा ने श्री कृष्णा को पति रूप में पाने के लिए तप किया था उसके तप से भगवान प्रसन्न हुए इसलिए वृंदा के तपस्थल को वृन्दावन कहते है।। यह स्थान श्री कृष्ण भगवान् के बाल लीलाओं का स्थान माना जाता है।

कृष्ण भगवान से संबंधित मंदिर एवं घाट सभी वृन्दावन में स्थित है। युवास्था से सम्बन्धित मंदिर एवं कुंज, व्रन्दावन में स्थित है। ऐसा माना जाता है की  यह एक ऐसी भूमि है जहाँ आने से सभी पापों का नाश हो जाता है

वृन्दावन का प्राकृतिक सौंदर्य देखने योग्य है। यमुना जी ने इसको तीन ओर से घेरे रखा है। यहाँ के सघन कुंजो में तरह तरह के पुष्पों से शोभित लता तथा ऊँचे-ऊँचे घने वृक्ष मन में रोमांच भरते हैं। बसंत ॠतु के आगमन पर यहाँ की छटा और सावन-भादों की हरियाली आँखों को शीतलता प्रदान करती है।

वृन्दावन का कण-कण रसमय है। यहाँ प्रेम-भक्ति का ही वातावरण है। इसे गोलोक धाम से अधिक बढ़कर माना गया है। यही कारण है कि हज़ारों धर्म-परायणजन यहाँ अपने-अपने कामों से अवकाश प्राप्त कर अपने शेष जीवन को बिताने के लिए यहाँ अपने निवास स्थान बनाकर रहते हैं।

वे नित्य प्रति रासलीलाओं, साधु-संगतों, हरिनाम संकीर्तन, भागवत आदि ग्रन्थों के होने वाले पाठों में सम्मिलित होकर धर्म-लाभ प्राप्त करते हैं। वृन्दावन मथुरा भगवान कृष्ण की लीला से जुड़ा हुआ है। ब्रज के केन्द्र में स्थित वृन्दावन में सैंकड़ो मन्दिर है। जिनमें से अनेक ऐतिहासिक धरोहर भी है।

यहाँ सैंकड़ों आश्रम और कई गौ-शालाऐं है। गौड़ीय वैष्णव, वैष्णव और हिन्दुओं के धार्मिक क्रिया-कलापों के लिए वृन्दावन विश्वभर में प्रसिद्ध है। देश से पर्यटक और तीर्थ यात्री यहाँ आते हैं। सूरदास, स्वामी हरिदास, चैतन्य महाप्रभु के नाम वृन्दावन से हमेशा के लिए जुड़े हुए हैं।

तो चलिए वृन्दावन की यात्रा शुरू की जाए,
वहा के प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन कर अपना जीवन सफल बनाया जाये….

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Prem Mandir Vrindavan | मथुरा का प्रेम मंदिर

यह मंदिर रसिक संत जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की तरफ से कान्हा की नगरी वृन्दावन को तोहफ़ा था। प्रेम मंदिर 125 फुट ऊंचा, 122 फुट लम्बा और 115 फुट चौड़ा है।

भगवान कृष्णा के श्रद्धालुओ की इस मंदिर पर काफी श्रद्धा है। वे इस मंदिर को भगवान कृष्णा के सबसे पवित्र और प्रसिद्द मंदिरों में से एक मानते है।

प्रेम मंदिर दिव्य प्रेम को साकार करता है। दिव्य प्रेम का संदेश देने वाले इस मंदिर के द्वार सभी दिशाओं में खुलते हैं। मुख्य प्रवेश द्वारों पर अष्ट मयूरों के नक़्क़ाशीदार तोरण बनाए गए हैं। पूरे मंदिर की बाहरी दीवारों पर श्रीराधा-कृष्ण की लीलाओं को शिल्पकारों ने मूर्त रूप दिया है।

पूरे मंदिर में 94 कलामंडित स्तम्भ हैं, जिसमें किंकिरी व मंजरी सखियों के विग्रह दर्शाए गए हैं। यहां संगमरमर की चिकनी स्लेटों पर ‘राधा गोविंद गीत’ के सरल दोहे प्रस्तुत किए गए हैं!


Banke Bihari Mandir | बाके बिहारी मंदिर

वृंदावन में स्थित बांके बिहारी मंदिर एक अति प्रसिद्द हिन्दू मंदिर है, जिसे प्रचीन गायक तानसेन के गुरू स्वमी हरिदास जी ने बनवाया था। भगवान कृष्ण को समर्पित इस मंदिर में राजस्थानी शैली की बेहतरीन नक्काशी की गई है।

बांके का शब्दिक अर्थ होता है- तीन जगह से मुड़ा हुआ और बिहारी का अर्थ होता है- श्रेष्ठ। इस आधार पर मंदिर में रखी कृष्ण की मुख्य प्रतिमा प्रसिद्ध त्रिभंगा मुद्रा में है।

माना जाता है बाके बिहारी अपने भक्तों की भक्ति से इतना खुश हो जाते है कि वो स्थान से उठकर उनके साथ चले जाते है इसलिए उन्हें पर्दे में रखकर उनकी क्षणिक झलक ही दिखाई जाती है। यह मंदिर हिंदू धर्म में काफी पवित्र माना जाता है और यहां हर दिन हजारों श्रद्धालू आते हैं।

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Iskcon Temple Mathura | इस्कॉन मंदिर वृंदावन

1975 में बने इस्कॉन मंदिर को श्री कृष्ण बलराम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर ठीक उसी जगह पर बना है, जहां आज से 5000 साल पहले भगवान कृष्ण दूसरे बच्चों के साथ खेला करते थे।

मंदिर में कई सुंदर चित्रकारी की गई है, जिसमें भगवान कृष्ण की शिक्षा का वर्णन किया गया है।
मंदिर में तीन मुख्य वेदी (जिसपर भगवान को चढ़ाने के लिए सामग्रियां रखी जाती है) है। वहीं दीवारों पर खूबसूरत नक्काशी और पेंटिंग की गई है। भारतीयों से ज्यादा यहां विदेशी पर्यटक अध्यात्म और ज्ञान की प्राप्ति के लिए आते हैं।

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Govind Dev ji Temple | गोविंद देव मंदिर

वृंदावन के सबसे प्राचीन मंदिरों में है शुमार है यह मंदिर ,गोविंद देव का यह मंदिर वृंदावन  के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है।

ऐसा मन जाता है की इस मंदिर की रखवाली भूत करते हैं। इसी के बाद से इसका नाम भूतों का मंदिर रख दिया गया। लोगों का मानना है कि मुगल शासक औरंगजेब की बुरी नजर इस मंदिर पर पड़ गई थी। उसने इसके 4 माले गिरवा दिए। इसके बाद लंबे अर्से तक यहां किसी मूर्ति की स्थापना नहीं हो सकी। लोगों का मानना है कि उसके बाद से मंदिर को भूतों ने अपना अड्डा बना लिया।

मंदिर में एक अद्वितीय वास्तुकला है, जिसमें हिंदू, मुस्लिम और पश्चिमी वास्तुकला शामिल हैं। मुख्य हॉल में छत पर एक सुंदर मूर्तिनुमा कमल है जो देखने लायक है। इस मंदिर को देखने के बाद निश्चित है कि जो कोई भी दर्शन करने का फैसला करता है, वह मोहित हो जाए|


Madan Mohan Temple | मदन मोहन मंदिर

मदन मोहन मंदिर वृंदावन में काली घाट के पास स्थित है। यह इस क्षेत्र के पुराने मंदिरों में से एक है। आज जिस जगह पर मंदिर बना है, वहां पुराने समय में सिर्फ विशाल जंगल हुआ करते थे

दूसरे प्रचीन निर्माणों की तुलना में यह मंदिर थोड़ा छोटा है, लेकिन इसमें की गई नक्काशी बेहद खूबसूरत है। इसे 19वीं शताब्दी में श्री नंदलाल वासु ने बनवाया था। इसका रंग लाल है और यह ऊंचा, लेकिन संकरा है।

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Rang ji Temple Vrindavan | रंग जी का मन्दिर

यह मन्दिर अपनी भव्यता तथा मन्दिर प्रांगण में खड़े 6 फुट सोने के खम्भे के लिए प्रसिद्ध है। मन्दिर का प्रांगण भी बहुत विशाल है। रंग जी मन्दिर का रथ उत्सव, बैकुंठ उत्सव तथा जन्माष्टमी उत्सव देखने योग्य होता है।


शाह जी का मन्दिर

यमुना तट पर बना शाह जी का मन्दिर अपने संगमरमर के खम्भों के लिए प्रसिद्ध है। इसे टेढ़े मेढ़े खम्भों के लिए प्रसिद्ध है। वास्तव में इसका नाम ललित कुंज है। बसंत पंचमी को यहा मेला लगता है।


Seva Kunj Vrindavan | सेवा कुंज

सेवा कुंज को निकुंजवन भी कहते है यहा ताल और कदम्ब का पेड़ है, कोने में एक छोटा सा मन्दिर है। कहा जाता है कि रात्रि में यहा राधा जी के साथ भगवान श्रीकृष्ण विहार करते है। यहा रात्रि में रहना वर्जित है। शाम ढलते ही मन्दिर से सभी जीव जन्तु स्वयं ही अपने आप चले जाते है यह अपने आप में अचरज की बात है।


वंशी चोर राधा रानी का भी है मंदिर | Radha Rani Temple Barsana

निधि वन में ही वंशी चोर राधा रानी का भी मंदिर है। यहां के महंत बताते हैं कि जब राधा जी को लगने लगा कि कन्हैया हर समय वंशी ही बजाते रहते हैं, उनकी तरफ ध्यान नहीं देते, तो उन्होंने उनकी वंशी चुरा ली। इस मंदिर में कृष्ण जी की सबसे प्रिय गोपी ललिता जी की भी मूर्ति राधा जी के साथ है।

प्रसिद्ध मंदिरों के साथ इस पावन भूमि में अनेक घाट भी है जो दर्शनीय है जैसे श्रीवराहघाट,कालीयदमनघाट,सूर्यघाट,युगलघाट,
श्रीबिहारघाट,श्रीआंधेरघाट,चीर घाट और भी अन्य घाट है जहाँ आकर आपका मन मुक्त हो जाएगा

मंदिरो के दर्शन ,और घाट में सैर के बाद
अब बारी है कृष्णा के शहर के कुछ पकवान चखने की

मथुरा और वृंदावन उत्तर प्रदेश के दो पवित्र शहर हैं जिनसे हर भगवान कृष्ण भक्त संबंधित हो सकते हैं। जबकि हम सभी जानते हैं कि दो शहरों को बालगोपाल और राधा रानी को समर्पित मंदिरों के लिए जाना जाता है, हम में से बहुत से लोग इस बात से अवगत नहीं हैं कि पवित्र शहर कई खाद्य कियोस्क और स्टालों का घर हैं जो एक श्रद्धांजलि के रूप में सात्विक भोजन और दूध उत्पादों की सेवा करते हैं।

नंदगोपाल, जिन्हें दूध और दूध से बने उत्पादों के प्रति उनके प्रेम के कारण ‘माखन चोर’ कहा जाता है। यहां उन व्यंजनों की झलक मिलती है, जिन्हें आपको याद नहीं करना चाहिए

लस्सी
मिट्टी के बर्तन में सेवा की जाती है, यहाँ की लस्सी आपको अन्य जगहों पर मिलने वाले स्वाद से कुछ अलग है। शीर्ष पर मलाई की समृद्ध और मोटी परत और तल पर सूखे फलों की एक भारी खुराक इस लस्सी को हमेशा यादगार बनाती है।

माखन मिश्री
वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर में एक ढक्कन के साथ छोटे मिट्टी के बर्तन में प्रसाद के रूप में सेवा की जाती है, इसे बालगोपाल (भगवान कृष्ण) का पसंदीदा माना जाता है। इसमें ताजा मखाने (व्हाइट बटर) और शीर्ष पर मिश्री क्यूब्स शामिल रहते हैं।

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कही घूमने जाओ तो रह जाती है बस यादें
क्यों ना यादों को किन्ही चीजों में समेटा जाए

खरीदारी के बिना यात्रा कभी पूरा नहीं होती है। खरीदारी हमारी यात्रा योजना का एक अभिन्न हिस्सा है। वृंदावन एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है, यहाँ पूजा के कई सामान भी बेचे जाते हैं। वृंदावन में कई संकीर्ण लेन बाजारों में इत्मीनान के साथ टहलें, जहाँ चांदी के गहने, वस्त्र और हस्तशिल्प उत्पादों की बिक्री करने वाली दुकानों की एक पंक्ति दिखाई जाती है।

ये संकरी गलियां और बाज़ारों में एक पुराना विश्व आकर्षण है जो मथुरा, वृंदावन, आगरा और हरिद्वार जैसी जगहों की विशेषता है। । लोई बाज़ार एक और जगह है जहाँ आपको वृंदावन में खरीदारी करते समय जाना चाहिए।

यह इस क्षेत्र से प्राचीन वस्तुओं और लकड़ी के कामों में डूबने के इच्छुक लोगों के लिए एक खजाना है। भक्ति की वस्तुएं जैसे मूर्ति या अगरबत्ती का सामान भी यहां बेचा जाता है। मथुरा और वृंदावन दोनों में पीतल की वस्तुएं काफी सस्ती हैं।

आसपास घूमने वाली जगह

वृन्दावन के साथ साथ उत्तर प्रदेश में ऐसी बहुत जगह है जहाँ आप घूमकर अपनी यात्रा को यादगार बना सकते है जैसे मथुरा,आगरा, वाराणसी,लखनऊ,अलाहाबाद,सारनाथ,विद्यांचल,चित्रकूट,अयोधया आदि है!!!

लेखक:
आयुषी जैन इंदौर  

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Places to Visit in Amritsar | मेरी अमृतसर की यात्रा

Places to Visit in Amritsar | मेरी अमृतसर की यात्रा


अमृतसर भ्रमण मेरे मन में काफी समय से था| जैसे ही तारीख तय हुई मैं अपनी एकल यात्रा का खाका तैयार करने में लग गया| मैंने दो दिवसीय “मेरी अमृतसर की यात्रा | Places to Visit in Amritsar” निर्धारित की थी|

जाने से पूर्व ही मैंने अपने दोनों दिनों को ध्यानपूर्वक योजनाबद्ध किया| कहाँ निवास करना है, किन जगहों पर किस दिन किस क्रम में जाना है और किन स्थानों पर अमृतसर के प्रसिद्ध व्यंजनों का लुत्फ़ उठाना है इन पहलुओं पर विचार कर निर्धारण किया|

किस जगह पर कितना समय व्यतीत होना चाहिए इसका भी पूर्वानुमान लगा लिया था| जिन वस्तुओं की जरुरत पड़ सकती थी इसकी भी एक सूची तैयार की थी और सभी सामन अपने साथ रख लियेथे|

अवधि कम थी इसलिए दिल्ली से अमृतसर आवागमन के लिए हवाई यात्रा के माध्यम का चुनाव किया था| पूर्व निर्धारण करना आवश्यक था ताकि यात्रा के दौरान मैं अपने समय का पूर्ण उपयोग कर सकूँ और सभी महत्वपूर्ण जगहों को भी देख सकूँ|

परिणामस्वरूप अमृतसर में मुझे कुछ भी सोचने की जरुरत नहीं पड़ी क्योंकि एक कागज़ पर मेरे पास सभी निर्देश विद्यमान थे| मुझे इस बात का संतोष है कि यात्रा को जिस प्रकार सोचा था उसी प्रकार क्रियान्वित किया|

पढ़िए “मेरी अमृतसर यात्रा | Places to Visit in Amritsar”


Places to Visit in Amritsar | दिल्ली से अमृतसर

इंदिरा गांधी अंतराष्ट्रीय हवाईअड्डे से मेरे विमान के प्रस्थान का समय सुबह 05:30 बजे था| हवाईअड्डे के पूरे परिसर में अंतराष्ट्रीय मानको के अनुरूप सुविधाएँ, भव्यता और सुरक्षा देखकर मै पूर्णत: भाव-विभोर हो गया| भारत के इस प्रवेश द्वार की आभा देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई|

वहाँ खड़े नाना प्रकार के भीमकाय हवाई जहाजों को देखना रोचक था| हवाईअड्डे का अंदरूनी भाग किसी शहर जैसा लग रहा था| मेरा सेवा प्रदाता ‘एयर इंडिया’ था| मुझे यह बात विदित थी की छोटे सामान को मैं अपने साथ लेकर बैठ सकता था और किसी कतार में भी नहीं लगना पड़ता|

इसी कारण मैंने अपने साथ एक लघु बस्ता ही रखा था जिसके परिणामस्वरूप मुझे सुरक्षा जाँच में ज्यादा समय नहीं लगा| विमान में चढ़ने में कुछ समय था इसलिए मैं पतीक्षालय में बैठ गया| हवाई जहाज़ मुझे सदा ही प्रभावित करते हैं | इनका आकार, उड़ान इत्यादी| इसी कौतूहल में मैं झरोखों से हवाई पट्टी और विमानों को निहारता रहा|

सूचना मिलने पर मैं विमान की ओर चल पड़ा| अपने विमान में प्रवेश करते ही विमान परिचारिका ने ‘नमष्कार’ कहकर मेरा अभिवादन किया| मैंने भी हाथ जोड़कर प्रत्युत्तर दिया| इस अत्याधुनिक सेवा में भी भारतीय संस्कृति से साक्षात्कार मन मोहने वाला था|

आप पढ़ रहें हैं “मेरी अमृतसर की यात्रा | Places to Visit in Amritsar “

आकाश और सूर्योदय के अद्भुत नज़ारे देखने के लिए खिड़की के सम्मुख वाली जगह मैंने आग्रह करके आवंटित करवाई थी| विमान में आकाशवाणी के माध्यम से हमें सूचित किया गया कि Delhi to Amritsar पहुँचने में हमें आधे घंटे का समय लगेगा| मैं उड़ान को लेकर बहुत उत्सुक था|

अंतत:विमान ने विस्थापन शुरू किया और मुख्य हवाई पट्टी पर पहुँचा| उड़ान भरने के लिए उसने जैसे ही गति बढाई वैसे ही एक अदृश्य बल मुझे अपनी कुर्सी में दबाने लगा| मुझे यह अनुमान लगाने में देर न लगी कि यह ‘जी-फ़ोर्स’ था| इसके बारे में दूरदर्शन पर देखा था परन्तु इसका प्रभाव पहली बार महसूस किया था|

कुछ ही समय में हम भूमि से हज़ारों फीट ऊपर आ गए और खुले आकाश में अद्भुत नज़ारे देखने को मिले| भिन्न प्रकार के बादल और उनके बीच से उगता सूर्य मानो किसी कल्पना के मानचित्र से निकलकर मेरे सामने प्रत्यक्ष आ गए थे |आधे घंटे कुदरत के बेहतरीन नजारे देखने के उपरान्त हम श्री गुरु राम दास जी अंतराष्ट्रीय हवाईअड्डेपर उतर गए|


“Places to Visit in Amritsar”

हरमंदिर साहिब | Harmandir Sahib

अमृतसर पहुँचनेके पश्चात मेरा पहला पड़ाव स्वर्ण मंदिर या हरमंदिर साहिब ( Harmandir Sahib ) या दरबार साहिब था| हरमंदिर साहिब सेवा के पर्याय के रूप में जाना जाता है और वहाँ पहुँचने के पश्चात मैंने इसे प्रत्यक्ष अनुभव किया | मैंने परिसर में हर जगह लोगों को स्वयं सफाई करते देखा।जगह-जगह लोग प्याऊ लगाए थे |

लोगों के रहने के लिए कमरे की व्यवस्था मुफ्त में उपलब्ध थी | रेलवे स्टेशन से दरबार परिसर तक आवागमन के लिए नि:शुल्क बस भी सेवा में थी | मुख्य दरवाजे से प्रवेश करने के पश्चात सफेद संगमरमर से बना एक विशाल चौकोर आंगनथा|

आंगन के बीचों-बीच एक पवित्र तालाबऔर उसके मध्य में स्थितथास्वर्णमंदिर | मुख्य गुरुद्वारा पूर्णत: कंचन रंजित था | आंगन को स्वर्णमंदिर से जोड़ने के लिए एक पुल विद्यमानथा |तालाब के पानी को पवित्र माना जाता है |इस जलाशय का निर्माण गुरु राम दासजी ने करवाया था | उसमे तैरती मछलियाँभी स्वर्ण वर्ण की थी और अतिमोहक लगती थी|

पूरे परिसर को अच्छे से देखने के पश्चात मैंने गर्भग्रह के दर्शनाभिलाषी लोगों को देखा | भीड़ बहुत थी और मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा बन गया| लगभग २घंटे शन: शन: चलकर मुख्य कक्ष में प्रवेश कर गया| वहाँ गुरुग्रंथ साहिब के सम्मुख अरदास पढ़ी जा रही थी|

वही पर स्थापित वीडियो कैमरे से यह सब सजीव प्रसारित किया जा रहा था | बचपन में कभी पंजाबी चैनल आँखों के सामने से गुज़र जाता तो इसी प्रकार की तस्वीरें देखता था | लेकिन उस समय समझ नहीं आता था कि वह क्या था और वहाँ का चित्रण था। सिख धर्म के सबसे पवित्र तीर्थ को देखना सुखद अनुभव था, लेकिन अभी उनका एक रिवाज देखना बाकी था- लंगर |

सेवाकी इस परम्परा के बारे में मैंने बहुत सुना था लेकिन उस दिन पहली बार महसूस करने जा रहा था | लंगर स्थल में प्रवेश करते ही हमें थाली व कटोरी दिए गए | मुख्य कक्ष में कई लोग भोजन कर रहे थे इसलिए बाकि लोग बाहर ही अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे|

कुछ इंतजार करने के उपरांत हम सभी अंदर प्रवेश कर गए | मुझे एक खाली जगह मिली और वही पर आसन जमा लिया |भोजन कक्ष विशाल था और कई लोगों के बैठने की व्यवस्था थी | खाने में दाल रोटी परोसे गए | रोटी देने का भी एक अलग तरीका था |

हमें अपने करो को याचना की मुद्रा में रखना था और भोजन परोसने वाले  रोटी को हाथों पर रख देते थे | भोजनस्वादिष्ट था | खाने के उपरांत मैंने अपनी थाली को कमरे के बाहर बने हौद में रखा | वहाँ कई लोग संगठित रूप से थालियों को साफ करने का काम कर रहे थे | वह सभी सेवा भाव में रमे बड़ी कुशलता से अपना काम कर रहे थे | यह अनुभव मेरे लिए नया था |

प्रस्थानके पूर्व मै कुछ देर प्रांगण में ही बैठकर परिसर को निहारता रहा | सुखद अनुभव से मैंने स्वर्ण मंदिरसे निकास किया और अपने अगले पड़ाव की ओर चल पड़ा – जलियाँवाला बाग |


भुबनेश्वर का लिंगराज मंदिर | Lingaraj Temple Bhubaneswar history in Hindi


“Places to Visit in Amritsar”

जलियाँवाला बाग | Short Note on Jallianwala Bagh Tragedy

सेवा के प्रतीक स्वर्ण मंदिर के दर्शन करने के बाद अब बारी बलिदान के प्रतीक जलियाँवाला बाग (Jallianwala Bagh) की थी | हरमंदिरसाहिब से कुछ कदम की दूरी पर जलियाँवाला बाग स्थित है |प्रवेश द्वार के बाहर एक पत्थर का स्तम्भ है |

लगभग १५फुट ऊँचेइस पत्थर पर कई मानव चेहरों की आकृति उकेरी गई है | यह स्मारक उन भारतवासियों की स्मृति में बनाया गया है जो १९ अप्रैल १९१९को अंग्रेजों की बर्बर गोलियों द्वारा शहीद हो गए थे |

वहीं बाग़के प्रांगण में रुधिर वर्ग की दीवार पर सफेद रंग मेउभरे शब्दों में ‘जलियांवाला बाग’ हिंदी,अंग्रेजी और पंजाबी भाषा में लिखा हुआ था| मेरा मन इतिहास के पन्नों को पलटना शुरू कर चुका था|

परन्तु जैसे ही मैंनेबाग का मुख्य द्वार देखा मैं अचानक रुक गया | मेरी स्मृतियों में १९१९के घटनाक्रम सजीव होकर गुजरने लगे | वह सकरा रास्ता जिससे होकर बाग में दाखिल होते हैं अभी भी उन्हीं ईटों से अपनी कहानियाँ बयाँकर रहा था |

बात १० मार्च १९१९की है जब अंग्रेजों ने भारतीयों पर ज़ुल्म का एक और अध्याय लिखा | उस समय का लेजिस्लेटिव कॉउंसिल यानी आज के संसद भवन में एक कानून पारित हुआ| इसेरौलेट कानूनकहा गया |

इसके अंतर्गत किसी भी भारतीय को किसी भी समय, बिना कानूनी इजाजत,बिना किसी सुनवाई, अनिश्चितकालीन तक कैद किया जा सकता था | कैदी को उसका अपराध, सबूत, शिकायतकर्ता के बारे में भीजानने की इजाजत नहीं थी | यहाँतक कि अखबार पर भी शिकंजा कर दिया गया था |

१९ अप्रैल १९१९को बैसाखी के अवसर पर कई लोग जलियांवाला बाग में एकत्रित हुए थे | वह लोग इस कानून का शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे थे | अमृतसर में तैनात अंग्रेजी फौजी ‘जनरल डायर’ अपनी टुकड़ी के साथ बाग में दाखिल हुआ | उसने निकास द्वार पर अवरोध लगा दिए ताकि कोई भी बाहर न जा सके और अंधाधुंध गोलियाँ चलाना शुरु कर दिया|

देखते ही देखते अंग्रेजों की क्रूर गोलियाँ भारतीयों के शरीर को भेदने लगी| हर तरफ़ मानवता शव के रूप में पृथ्वी पर गिरने लगी |अपनी जान बचाने के लिए कई लोग बाग में स्थित एक कुँए के अंदर कूदने लगे | १०मिनट तक बर्बरता का यह दृश्य जारी रहा और फिर गोलियों की आवाज शान्त हुई|

आप पढ़ रहें हैं “मेरी अमृतसर यात्रा | Places to Visit in Amritsar”

मगर नहींशान्त हुई उन व्यक्तियों की चीख-पुकार जिसे मैं तब भी महसूस कर पा रहा था| उस रास्ते से गुजरते समय उन पत्थरों को अपनी उंगलियों से स्पर्श कर रहा था | यह उन शहीदों के लिए मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि थी|

बाग में पहुँचने पर मैंने अमर ज्योति के दर्शन किए जो उन मृतकोंकी याद में अखंड प्रज्वलितरहती है| बाग का स्वरूप अब काफी बदल चुका है | उसे सुंदर बना दिया गया है परंतु उस समय वह खाली जगह ही थी |

जिस जगह से गोलियाँ चलाई गई थी उसे चिन्हित करने के लिए एक ठोस त्रिभुज बनाया गया है | उसपर यह वाक्य अंकित है -“यहीं से लोगों पर गोलियाँ चलाई गई थी”|  उसके सामने कई झाड़ियाँ थी जिन्हें बंदूक चलाते फौजियों के आकार में तराशा गया था|

यह सभी किसी सजीव चित्रण का आभास करा रहे थे| कुछ और आगे चलने पर बाग के अंत में लाल ईंटों से बनी वही दीवार थी जिसने उन व्यक्तियों के साथ खुद भी गोलियां झेली थी | उस दीवार पर आज भी गोलियों के निशान दर्ज है और उन्हें पर्यटकों की सहूलियत के लिए अंकित कर दिया गया है | कुल ३६ निशान थे |

उस दिन लोग उसशान्त दीवार को अपने साथ चित्र खींचने के योग्य समझ रहे थेपरन्तु उस दीवार के कराहने की आवाज सुनना कोई दुर्लभ कार्य नहीं था |उनमें से कोई ऐसा निशान भी हो सकता था जो उस गोली से बना हो जो किसी जिस्म को भेदने के पश्चात शर्म से इस दीवार में मुँहछिपाने आई हो|

अमृतसर की पावन धरती को रक्त रंजित करती उस घटना के जीवित गवाह को नमन करने के बादमै आगे बढ़ गया | बाग के बीचो बीच एक विशाल स्मारक खडा है | वह इस घटना के प्रतीक के रूप में समस्त दुनिया को सदैव स्मरण करावाता रहता है कि जो भारत भूमि मानव सभ्यता की जननी है उसी पर मानव का संघार किस प्रकार हुआ |

मेरे लिए उस कुँए को देखना भी अविस्मरणीय था जिसने उन लोगों को जान बचाने का माध्यम दिया | तब तो कूप चारों तरफ से बंद था और हम खिड़की से ही अंदर देख सकते थे| वह काफी विशाल व गहरा था | नीचे घोर अंधेरे के सिवा कुछ नजर न आ रहा था|

सोच कर ही मैं सहम गया कि कैसा भयानक मंजर रहा होगा जब लोगों ने इसमें छलांग लगाई होगी | कूप के बगल में दर्ज था “यहाँ से १२४शव निकाले गए” ।

मैं कुछ और आगे बढ़ा तो वहाँ बनाए गए एक संग्रहालय में प्रवेश किया | उसमें कई मृतकों व घायलों की तस्वीर व व्याख्यान प्रदर्शित था | उन मासूम लोगों को देखकर दु:ख हुआ परन्तु उसी के समीप एक और प्रदर्शनी को देखकर कुछ मरहम भी लगा|

कुछ वर्ष पहले वहाँ अंग्रेजों का एक समूह आया था जिन्होंने नम आंखों के साथ इस नृशंसता के लिए क्षमा याचना की थी | इसके चित्र भीवहाँ लगे थे | हालांकि इस ग्लानी की अनुभूति से भारत की छति कम नहीं हो सकती थी परंतुउनके पश्चाताप का साधन जरूर बन सकती थी|

संग्रहालय में प्रदर्शनी के अंत के साथ मेरे जलियांवाला बाग से प्रस्थान का मार्ग प्रशस्त हो गया | बाहर आकर मैंने उस बाग को दोबारा मुड़ कर देखा और उन शहीदों को नमन करके १९१९की यादों से निकल कर पुनः वास्तविक दिन में लौट आया |

जलियांवाला बाग नरसंहार से भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति रोष और भड़क गया और अंततः १५अगस्त १९४७ को भारत आजाद हुआ | परन्तु हमें इस आजादी की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी – विभाजन | इसे वास्तविक रूप में महसूस करने के लिए मेरा अगला पड़ाव हिंदुस्तान-पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित वाघा-अटारी बॉर्डर था।


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वाघा अटारी बॉर्डर | Wagah Border

स्वर्ण मंदिर के परिसर में ही लोग अटारी बॉर्डर Wagah Border के लिए आगंतुक तलाशने मिल जाएँगे | उस दिन अपराह्न २बजे मैंने एक व्यक्ति से बात करी | उसने मुझे बताया किवह मुझे अटारी सीमा तक ले कर जाएगा और सायं काल वापस लेकर भी आएगा | मैं बहुत ही उत्सुक था और झट उस गाड़ी में बैठ गया|

गाड़ी में केवल एक ही जगह बची थी | मुझे लकड़ी के पटरे पर बैठने को मिला | मैं जान रहा था कि सफर लंबा था और समय भी अत्यधिक लगने वाला थातदापि अपने गंतव्य तक पहुँचनेकी उत्सुकता में यह असुविधा कहीं खो गई |

१ घंटे का सफर करके हम उस स्थान पर रुके जहाँ से अंतरराष्ट्रीय सीमा तक की १ किलोमीटर की दूरी हमें पैदल ही पूरी करनी थी | भीड़ के साथ और सीमा सुरक्षा बल की पैनी निघरानी में मैं एक कतारमें लग गया|

इन जवानों की कार्य पद्धति व अनुशासन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दोपहर की धूप और गर्मी के बाद भी हमारी हिम्मत नहीं थी कि कतारों को तोड़कर आगे जा सके| यदि किसी मनचले ने ऐसी कोशिश की तो उसे कतार में कहीं पीछे पहुँचा दिया जाता था| यह सब देखना अत्यंत ही मनोरंजक था| एक टोपी और पानी की बोतल लिए मैं भी इस कौतूहल भरी भीड़ का हिस्सा था|

प्रचण्ड सूर्य भी हमारे धैर्य की परीक्षा लेने पर अमादा था परंतु जब किसी लक्ष्य को पाने की सच्ची कामना होती है तब रास्तों की अड़चनें तुच्छ जान पड़ती हैं| शन: शन: अपनी तलाशी औरजाँच के उपरान्त हम समारोह स्थल के प्रवेश द्वार पर पहुँचे | बाकी सभी लोग तो उत्सुकता में आगे बढ़ते जा रहे थे परंतु मैं वहीं ठहर गया या यूँ कहें कि मेरे पैर खुद रुक गए|

अपनेदाएँ हाथ पर मैंने ‘सीमा बाड़े’ देखी | दरसल सीमा से कुछ मीटर की दूरी पर अपने इलाके में भारत ने कटीले तारों व जालियों से बाडे या अवरोध बनाए हैं जो पाकिस्तान से भारत में अवैध घुसपैठ रोकने में सहायता करते हैं|

इन बाड़ो के बारे में मैंने कई बार पढ़ा था और दूरदर्शन पर भी देखा था परंतु प्रत्यक्ष रूप में पहली बार देख रहा था | पहली बार ही मुझे सरहद का अनुभव हुआ|

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अपने सामने मैंने प्रवेशद्वार देखा जो काफी ऊँचा था और उस पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था ‘INDIA’ | इस दृश्य से मेरे मुख पर गर्वित मुस्कान आ गई और इस भाव को अपने अंदर समेटे हुए मैं भी समारोह स्थल में प्रवेश कर गया।

वहाँ की फिजा देखते ही बनती थी | वह एक गोलाकार क्षेत्र था | तीन तरफ नीचे से ऊपर तक लोगों के बैठने की जगह थी जो पूरी भर चुकी थी और लोग खड़े हुए थे|

ग्रैंड ट्रंक रोड (जी.टी. रोड) जिसपर मैं खड़ा था सीमा पार करती हुई पाकिस्तान में प्रवेश करती है | इसी सड़क पर सीमा पर दोनों तरफ दरवाजे लगे थे और उनके बगल में भारत-पाकिस्तान के राष्ट्रध्वज फहर रहे थे | हमारे दरवाजे के एक पल्ले पर लिखा था ‘INDIA’ व दूसरे पर ‘भारत’|

दोनों दरवाजों के मध्य जो जगह थी वहाँ बंदूकधारी कमाण्डो खडे थे अपने पाकिस्तानी समकक्ष से आँख मेंआँख मिलाकर| दोनों कमाण्डो के मध्य एक सफेद लकीर बनी हुई थी जो वास्तविक अंतरराष्ट्रीय सीमा थी | सीमा के उस पार मैंने पाकिस्तान देखा| वहाँ कुछ मुट्ठी भर लोग ही दिखाई पड़े| उस दिन अपने भारतीय होने का मुझे अलग ही एहसास हुआ|

इतने अल्पकाल में राष्ट्रीयता से जुड़े बहुसंख्यक अनुभवों को अपने मानस की पोटली में बाँधनाएक दुष्कर कार्य था| भावनाओं मे ओतप्रोत मैं अपनी दृष्टि पलट को इन्हें शीघ्र ग्रहण करने के लिए समझा ही रहा था कि बीएसएफ वालों ने मुझे सीढ़ियों से ऊपर जाने को कहा|

कहीं जगह न मिलने के कारण मैं सबसेऊपरीसीढी तक पहुँच गया और एक ऐसी जगह खड़ा हो गया जहाँ भीड़ कम थी | स्थिर होने के उपरान्त मैंअगल-बगल के दृश्यों को देखने लगा कि तभी मेरी दृष्टि पीछे खेतों की तरफ पड़ी और वहाँ जो कुछ देखा उससे मैं अत्यंत भावुक हो गया|

खेतों के मध्य में मैंने दोबारा उन्हीं बाड़ों को देखा| जहाँ तक दृष्टि गई वह अवरोध दिखाई पड़े| वास्तविक सीमा तो सीमा स्तंभ से जानी जाती है परंतु वह जालियाँ किसी सीमा से कम नहीं लग रही थी| अपने अखंड भारत को खंडित करती यह लकीरें देख कर मैं सचमुच बहुत उदास हो गया| मेरे मन में सदैव इस बात का मलाल रहता है कि भारत का विभाजन हुआ|

उन क्षणों में अपने आप को सम्भाल कर मैं वापिस सजग हुआ| मैंने देखा कि बाड़ों के साथ-साथ सीमा सुरक्षा बल के दो जवान अपनी दुपहिया वाहन पर गश्त लगा रहे थे|

मैं यह सब देख ही रहा था कि मुझे ९० डिग्री कोण वाली सरहद का ख्याल आया| जैसे कि मैंने बताया था कि सीमा सरहद स्तम्भ से प्रदर्शित की जाती है| कार्यक्रम स्थल के समीप एक स्तंभ है जिसकी खास बात यह है कि यहाँ से सीमा ९० डिग्री का कोण बनाती है इसीलिए इसे ९० डिग्री सीमा स्तम्भ कहते हैं|

बीएसएफ के दो जवान इसकी सुरक्षा में तैनात थे| सौर ऊर्जा से संचालित विद्युत बल्ब भी रोशनी के लिए इसके समीप लगे थे| मेरे लिए यह सब प्रत्यक्ष देखना बड़ा ही रोचक था|

मुख्य सड़क पर सीमा सुरक्षा बल के जवान और प्रशिक्षक सादी वर्दी में भी थे| वह दर्शकों में जोश भरने का काम कर रहे थे| देश का गुणगान करते नारे लगवा रहे थे| वह कहते “भारत माता की” औरसभी लोग बड़ी ही शान से उत्तर देते “जय”| उसी प्रकार “हिंदुस्तान जिंदाबाद” का उद्घोष भी फिजा में देशभक्ति के रंग को और गहरा कर रहा था|

भारत माता की वंदना के स्वर तो मेरी जिह्वा से अनायास ही निकलते रहते हैं परंतु वहाँ मैं अपने शरीर के हर कण में इसकी धमक महसूस कर रहा था| तभी वहाँ कुछ महिलाओं को तिरंगे झंडे दिए गए और उन्हें दौड़ते हुए सीमा के पास जाकर पुनः वापस आने को कहा गया| यह सिलसिला दो महिलाओं से शुरू हुआ और काफिला बढ़ता गया|

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उनके हाथों में लहरता तिरंगा और साथ ही देशभक्ति के गीत समा में असीम ऊर्जा का संचार कर रहे थे| इसके बाद कार्यक्रम शुरू हुआ| सुनियोजित तरीके से भारतीय व पाकिस्तानी जवान बल का सांकेतिक प्रदर्शन करने लगे|

कभी पैर पटकते तो कभी हाथों द्वारा आक्रामक मुद्राएँ दिखाते| पीछे जोश भरती धुनों से वह किसी वास्तविक चलचित्र जैसा लग रहा था| १ घंटे तक हमारे अंदर उस माहौल में राष्ट्र प्रेम की भावना हिलोरे खाती रही|

सायं काल दोनों राष्ट्रीय ध्वजों को नाटकीय ढंग से उतारा गया और सीमा पर लगे फाटक को बंद कर दिया गया| इसी के साथ इस अद्भुत कार्यक्रम का भव्य समापन हुआ| प्रस्थान करने के पहले मैंने दोबारा उन सीमा अवरोध को देखा| देश भक्ति के समंदर में गोते लगाते हुए एक बार पुन: गम की लहरों ने मुझे कुछ दूर फेक दिया|

भीड़ के साथ चलते चलते मैं मुख्य समारोह स्थल के बाहर आ गया| मैंने मुड़कर उस विशाल प्रवेश द्वार को देखा|अपनी सीमित स्मृति और चक्षुओं में राष्ट्र के सम्मान और उससे जुड़े इतिहास को जितना समेट सकता था समेटा|

विभाजन के इतिहास और अमृतसर की इस अनमोल धरोहर को सजीव रूप में देखने के बाद अब बारी थी इतिहास से एक अन्य प्रकार से रूबरू होने की| मेरा अगला पड़ाव ऐतिहासिक संग्रहालय थे।


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ऐतिहासिक संग्रहालय

अगले दिन मैंने कई जगहों का रुख किया |

  • महाराजा रंजीत सिंह किला | Maharaja Ranjit Singh Museum : अमृतसर के संस्थापक का किला और इसमें निहित संग्रहालयमें इनके जीवन पर कई कथाएँ प्रदर्शित थी|
  • राष्ट्रीय युद्ध स्मारक  | National War Memorial: यहाँ भारतीय थल, नभ और जल सेना द्वारा लड़ी गई हर लड़ाई की कहानी विधिवत ढंग से दर्शाई गई है| भारत की अक्षुण्णता को बनाए रखने के लिएसैनिकोंने किस प्रकार अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया यह बहुआयामीविधि (रौशनी, आवाज़ और झांकी) द्वारा समझाया गया है | इसके मुख्य प्रांगण में एक बहुत ऊँची तलवार बनाई गई है जिसकी नोक आसमान की ओर है | यहाँ पर सात आयामी चलचित्र (सेवेन-डी) भी दिखाई जाती है जो भारतीय सेना को समर्पित है | कई खण्डों में बंटी इस इमारत में सेना को सम्पूर्ण श्रद्दांजलि दी गई है |
  • विभाजन संग्रहालय | Partition Museum: मेरे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम में विभाजन संग्रहालय अति महत्वपूर्ण था | किसी हादसे की कहानी वही सबसे अच्छे से बता सकता है जो उससे सर्वाधिक प्रभावित हुआ हो | उसी प्रकार अमृतसर, जिसने विभाजन के घाव प्रत्यक्ष अनुभव किए थे उस दृष्टा को अच्छे से सुना सकता था | हरमंदिर साहिब के पीछे विभाजन संग्रहालय स्थित है | बाहर से देखने में वह एक आम सी जगह प्रतीत होती है परंतु भीतर जाने पर वह सजीव इतिहास से व्याप्त है | इस संग्रहालय में चार मंजिल है और हर मंजिल पर विभाजन के किसी पहलू को विस्तार में प्रदर्शित किया गया है | विभाजन के बारे में जब भी सोचता था तो मेरी सोच जमीनी बँटवारे तक ही सीमित रह जाती थी | यह कभी ख्याल ही नहीं आया कि भूमि के अतिरिक्त मुद्रा, संस्कृति, खेल, रेल, सरकारी तंत्र इत्यादि का भी विभाजन हुआ था | अखंड भारत का विभाजन मेरे लिए हमेशा ही दुखदाई पहलू रहा है और इसके बारे में बात करने अथवा इसे स्मरण करके अत्यंत शुब्ध हो जाता हूँ| प्रवेश करते ही मेरे सम्मुख तस्वीरें आने लगी जिसे अमृतसर की धरती ने १९४७में देखी होगी | नरसंघार के परिणामस्वरूप पूरी सड़क पर शव पड़े थे और अगल -बगल गिद्धबैठे थे जो इन लाशों कोखा रहे थे | जले हुए मकान, बिलखते लोग जो रेलगाड़ी की छत पर टंगे अपना सब कुछ छोड़ किसीशून्य की ओर जा रहे थे |

 

कई लोगों ने अपने प्रियजन (जिन्होंने १९४७ की त्रासदी को अनुभव किया था) उनकी किसी वस्तु को संग्रहालय को दान दे दिया था | वह वस्तु और उनके अनुभव भी विद्यमान थे|

वह सभी मार्मिक दृश्य कल्पना और वर्णन से परे थे | आज के चमकते दमकते भारत ने ऐसा दिन भी देखा था इसे सोचना बड़ा ही कठिन है | आज़ादी क्या होती है और किस कीमत पर मिलती है इससेआज के लोगअनजान हैं क्योकि यह सबहमकोजन्म से ही सहज रूप में मिला है |

पाकिस्तान बनने के पश्चात उसकी मुद्रा की छपाई के लिए कोई साधन नहीं था इसलिए जब तक पाकिस्तानी रिजर्व बैंक कार्यरत नहीं हुआ तब तक भारतीय रिजर्व बैंक में ही उसकी मुद्रा भी छपती थी | फौज की टुकड़ियाँ जो उनके इलाके में ही थी पकिस्तानको दी गई | इसी प्रकार रेल का परिचालन भारतीय सीमा तक ही सीमित कर दिया गया|

पाकिस्तान में बिछी पटरियाँ इस प्रकार उनके हिस्से में आ गईं | अविभाजित भारत का प्रतिनिधित्व करते अंतरराष्ट्रीय खिलाडियों का भी विभाजन हुआ | पहले जो खिलाड़ी एक साथ खेले थे वहीभारत पाकिस्तान की तरफ से आमने सामने भी खेले |

शरणार्थियों की प्रदर्शनी मार्मिक थी | भारी संख्या में विस्थापित लोगों के लिए अस्थाई प्रबंध किए गए थे | यूँ प्रतीत हो रहा था मानो किसी अस्थाई शहर को ही बसा दिया गया हो |उस विषम परिस्थिथि में इसका संचालन किस प्रकार हुआ होगा यह एक शोध का विषय हो सकता है|

लोगों ने अपने घर को छोड़ने के पहले घर की चाभी अपने पड़ोसियों को दी और कहा कि जब सब सामान्य हो जाएगा तो लौट आएँगे | इस वाक्य से लोगों की मानसिक प्रताड़ना और मजबूरी की परिकाष्ठा का अनुमान लगाया जा सकता है |अपना घर, व्यस्याय और प्रियजन को एक दिलासा लेकर छोड़ा कि कभीवापस लौटकर आएँगे | वास्तव में ऐसा कभी नहीं होने वाला था |

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यहाँ तक कि कारोबार पर भी विभाजन का असर पड़ा | भारतीय कारोबारियों के कराची और लाहौर स्थित ग्राहको को विभाजन के पश्चात आपूर्ति के लिए सरकार से निर्यात अनुमति लेनी पड़ती थी | उनको अपने उत्पाद पर ‘मेड इन इंडिया’ लिखना अनिवार्य हो गया था |

वहाँ पर ३ घंटो तक रहने के बाद भीलग रहा था कि कुछ छूट न गया हो | संग्रहालय में विभाजन से संबंधित बारीक से बारीकजानकारी काउल्लेख था| आखिरी एक कक्ष में अतिथियों की प्रतिक्रियाएँ दर्ज करने के लिए कई प्रावधान थे|

लोग इतने प्रभावित थे कि अपने विचार दर्ज करने के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे |एक कृत्रिम वृक्ष भी बनाया गया था जिसपर लोग अपने हस्तलिखित सन्देश को एक पन्ने पर लिखकर टांग रहे थे और चित्र खिचवा रहे थे|

मैंने भी अपने विचार आगन्तुक पुस्तिका में दर्ज किए और इतिहास के इस भव्य भवन को एक दिलासा लेकर छोड़ा कि कभी वापस लौटकर आएँगे|

अमृतसर की भूमि शौर्य, बलिदान, सेवा वइतिहास से सराबोर है | इस पावन धरती ने एक तरफ जहाँ सेवा परमो धर्मा: की कथनी को सार्थक किया है वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीयता के भाव को सहेज कर रखा है |

अटारी सीमा पर मैंने अपने देश के वीर जवानों का शौर्य देखा तो विभाजन संग्रहालय में भारत के इतिहास को टटोला | इसी के साथ मेरी अमृतसर यात्रा की समाप्ति हुई और मिली-जुली स्मृतियों के साथ मैंने इस भूमि से विदा ली |

गौरांग 

२२-जून-२०१९


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भुबनेश्वर का लिंगराज मंदिर | Lingaraj Temple Bhubaneswar history in Hindi

भुबनेश्वर का लिंगराज मंदिर | Lingaraj Temple Bhubaneswar history in Hindi


यूँ तो भारत सदियों से देश-विदेश सोने की चिड़िया के नाम से विश्व विख्यात है, लेकिन अपनी प्राकृतिक धरोहर के अलावा भारत अपनी पुरातात्विक धरोहर के लिए भी जाना जाता है| हिन्दू देश होने के कारन भारत में असंख्य मंदिर है, जो पुरातात्विक कला का बेजोड़ उधारहण है| आज हम उन्हीं मंदिरों में से एक जाने माने मंदिर के बारे में आपको जानकारी देने जा रहे हैं| जी हाँ दोस्तों, हम बात कर रहे हैं भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर की Lingaraj Temple Bhubaneswar history in Hindi….

भारत के एक पूर्वी राज्य उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर, जो की उड़ीसा का सबसे बड़ा शहर है और जहाँ स्थित है विश्व विख्यात लिंगराज मंदिर| लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर का सबसे प्राचीन मंदिर है, जिसके बारे में छठी शब्ताब्दी के लेखों में भी बताया गया है| लगभग 1400 वर्ष प्राचीन इस मंदिर में भगवान त्रिभुवनेश्वर की अति चमत्कारिक मूर्ति के दर्शन किये जा सकते हैं| लिंगराज मंदिर में गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है| हालाकि मंदिर को देखने के लिए मंदिर के बाहर एक चबूतरा बनाया गया है, जहाँ से गैर हिन्दू मंदिर के अलोकिक सोंदर्य का आनंद ले सकते हैं|

कैसे पहुंचे:-

लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर शहर के बिल्कुल बिच में स्थित है, इसे शर का लैंडमार्क भी कहा जाता है| भुवनेश्वर पहुँचने के लिए आप बस, रेल या हवाई मार्ग का उपयोग कर सकते हैं| भुवनेश्वर शहर के लिए समय समय पर बस सेवा उपलब्ध है| National Highway 16 (NH 16) से आप सीधे Bhubaneswar पहुँच सकते हैं|

अगर आप रेलवे से भुवनेश्वर पहुंचना चाहते हैं तो आप सीधे भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन पहुच सकते हैं| जहाँ से आप रिक्शा से सीधे लिंगराज मंदिर पहुँच सकते हैं| Bhubaneswar Railway Station से लिंगराज मंदिर की दुरी लगभग 4.5 Km है|

अगर आप हवाई मार्ग से भुवनेश्वर पहुँचना चाहते हैं तो आप सीधे Biju Patnaik International Airport  Bhubaneswar पहुच सकते हैं| Bhubaneswar Airport से लिंगराज मंदिर की दुरी महज 3.1 Km है|

इतिहास

लिंगराज मंदिर का निर्माण ११ वि शब्ताब्दी में सोमवंशी राजा जजाती केशरी ने करवाया था| लिंगराज मंदिर लगभग 150 मीटर वर्ग में फैला हुआ है| मंदिर के निकट ही एक तालाब स्थित है कहा जाता है, कि इस तालाब में भारत के लगभग हर झरने और तालाब का जल मिलाया गया है| इस तालाब के बारे में यह भी मान्यता है, कि यहाँ स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं| मंदिर में प्रयोग किये गए पत्थरों पर सुन्दर नक्काशी की गई है| मंदिर में काफी जगह शिलालेखों और मूर्तियों का समावेश है| मंदिर का शिखर लगभग 180 फूट ऊँचा है| मुख्या मंदिर में ही तिन छोटे छोटे मंदिर बनाए गए हैं जहाँ क्रमशः गणेश, कार्तिकेय और गौरी की मूर्तियों को स्थापित किया गया है|

लिंगराज मंदिर में शिवरात्रि का उत्सव बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है| प्रतिवर्ष यहाँ शिवरात्रि पर मैले का आयोजन किया जाता है और भगवान् शिव की विशेष पूजा की जाती है| इस उत्सव में महिलाऐं पारंपरिक नृत्य का प्रदर्शन कर भगवान् शिव को प्रसन्न करती है| लिंगराज मंदिर अपनी प्राचीन परम्पराओं के लिए जाना जाता है| मंदिर की परंपरा के अनुसार गैर हिन्दुओं का प्रवेश  मंदिर के अन्दर वर्जित है, लेकिन गैर हिन्दू मंदिर के बाहर बने चबूतरे से मंदिर के दर्शन कर सकते हैं|

Lingaraj Temple Bhubaneswar history in Hindi


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महांकाल मंदिर उज्जैन | Ujjain Mahakal

महांकाल मंदिर उज्जैन | Ujjain Mahakal


साथियों नमस्कार, Hindi Short Stories के इस खंड “Travel Stories” में आपका फिर से स्वागत है! दोस्तों, पिछले दिनों हमारे एक पाठक का बाबा महांकाल की नगरी उज्जैन(Ujjain Mahakal) में जाना हुआ| आत्मीय शांति और धर्म की नगरी उज्जैन में जाकर पाठक को यह अनुभव हुआ की देश की इस धर्म नगरी के बारे में सभी जो जानना अति आवश्यक है| महांकाल मंदिर उज्जैन के बारें में उन्होंने हमसे कुछ जानकारियां साझा की है जिसे हम एक Article के रूप में यहाँ प्रकाशित कर रहें हैं| आशा है आपको हमारा यह लेख काफी पसंद आएगा…


अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चांडाल का,
काल भी उसका क्या बिगाड़े जो भक्त हो महांकाल का!

जी हाँ, देवों के देव महादेव और महादेव का वह रूप जिसकी पूजा समस्त मानव जाती काल पर विजय पाने के लिए करती है! आज की हमारी यात्रा है महांकाल मंदिर उज्जैन की| वह मंदिर जिसके बारे में पुराणों में साक्ष्य मिलते है, जिसके बारे में कहा जाता है की आज भी उज्जैन के राजा महांकाल ही है और इसीलिए आज भी उज्जैन में कोई भी राजनेता और बड़ा अधिकारी रात्रि नहीं रुकता|

उज्जैन, मध्यप्रदेश के इंदौर से लगभग 55 किलोमीटर दूर बसा एक खुबसूरत आध्यात्मिक शहर जिसे मंदिरों की नगरी के रूप में भी जाना जाता है| अपनी पुरातात्विक, आध्यात्मिक और संस्कृतिक धरोहर को समेटे आज भी अपनी बेहद शानदार खूबसूरती के साथ लोगो के दिलों में राज कर रहा है| भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक, उज्जैन का महांकाल मंदिर आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है| तो चलिए आज आपको सैर करवाते है, इस खुबसूरत शहर उज्जैन की….

उज्जैन शहर ( Ujjain Mahakal ) मध्यप्रदेश का एक खुबसूरत शहर है| उज्जैन पहुँचने के लिए आप सड़क, रेलवे और हवाई मार्ग का उपयोग कर सकते है| सड़क मार्ग से उज्जैन पहुँचने के लिए आप नेशनल हाईवे का उपयोग कर सकते हैं| अगर आप रेल मार्ग से उज्जैन पहुंचना चाहते हैं तो आप रेलवे से उज्जैन जक्शन पर पहुँच सकते हैं| हवाई मार्ग से उज्जैन पहुँचने के लिए आपको सबसे करीबी विमानतल “अंतर्राष्ट्रीय विमानतल इंदौर” पहुंचना होगा, जहाँ से आप बस पकड़कर उज्जैन पहुँच सकते हैं|

रात बिताने के लिए उज्जैन में कई होटल (Hotel in ujjain),धर्मशालाएं उपलब्ध हैं जहाँ पर आप अपने बजट के अनुसार अपने लिए कमरा किराए पर ले सकते हैं| वैसे तो आप उज्जैन एक दिन में भी घूम सकते हैं, लेकिन अगर आप सही मायनों में उज्जैन दर्शन करना चाहते हैं तो उज्जैन घुमने के लिए कम से कम दो दिन का प्लान जरुर बनाइएगा|

उज्जैन में घुमने वाली जगहें ( Place to visit in ujjain mahakal )

वैसे तो उज्जैन ने आपको थोड़ी थोड़ी दुरी पर मंदिर मिल जाएँगे| कहा जाता है की अगर आप एक थैले में चावल लेकर उज्जैन दर्शन पर निकलेंगे तो चावल ख़तम हो जाएँगे लेकिन उज्जैन के मंदिर ख़तम नहीं होंगे| इसलिए यहाँ हम आपको उज्जैन के कुछ चुंनिंदा मंदिरों और जगहों के बारे में जानकारी देने वाले हैं|

                                महांकाल मंदिर उज्जैन ( Ujjain mahakal )

(उज्जैन रेलवे स्टेशन से दुरी 1.2 किलोमीटर)
उज्जैन का महांकाल मंदिर, भारत के बारह प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं|यह मंदिर माँ शिप्रा नदी के तट पर स्थित है| हर 12 साल में यहाँ पर कुम्भ (सिहंस्थ) का मैला लगता है जिसमें देश विदेश से श्रद्धालुओं को उज्जैन आकर भारत की हिन्दू संस्कृति को और करीब से जानने का मौका मिलाता है| हर सुबह भगवान् महांकाल की भस्मारती की जाती है, जिसमें ज्योतिर्लिंग पर भस्म लगाकर भगवन महांकाल का श्रंगार किया जाता है| कहा जाता है की कुछ सालों पहले आरती के लिए शमशान की भस्म का उपयोग किया जाता था, लेकिन आजकल कपिला गाय के कंडे, पीपल, अमलतास, शमी, बड, और बैर की लकड़ियों को जलाकर भस्म तैयार की जाती है|

सुरक्षा की दृष्ठि से महांकाल मंदिर में सीसीटीवी कैमरें लगे गए हैं, मंदिर में मोबाइल ले जाना और फोटोग्राफी करना पूरी तरह वर्जित है| देश विदेश के शश्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर से भगवान् महांकाल के लाइव दर्शन इन्टरनेट पर किये जा सकते हैं| मंदिर में कई देवीदेवताओं के छोटे बड़े मंदिर हैं| दूर दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए निशुल्क शुद्ध और सात्विक भोजन की व्यवस्था भी मंदिर समिति द्वारा की जाती है|

मुख्य महांकाल मंदिर तिन भागों में बनाया गया है| जिसमें सबसे निचे “महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग” उसके उपर “श्री ओम्कारेश्वर” और उसके उपर “श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर है”| महांकाल मंदिर में मंदिर से लगा हुआ एक कुंड है, जिसे “कोटितीर्थ” के नाम से जाना जाता है| मंदिर खलने का समय प्रातः 4 बजे से रात्रि 11 बजे तक है|

श्री चिंतामन गणेश मंदिर (Chintaman ganesh mandir ujjain)

chintaman ganesh mandir ujjain

(महांकाल मंदिर से दुरी 14 किलोमीटर)
महांकाल मंदिर से लगभग 6 किलोमीटर दूर स्थित चिंतामन गणेश मंदिर अपने आप में एक अद्भुत मंदिर है| यहाँ पर भगवन गणेश की तिन मूर्तियाँ विराजमान है एक चितामन गणेश, दूसरी इच्छामन गणेश और तीसरी श्री सिद्धिविनायक गणेश! ऐसा माना जाता है, कि श्री चिंतामन गणेश यहाँ आने वाले भक्तों की समस्त चिंताओं को दूर कर देते हैं, श्री इच्छामन गणेश भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करते है और श्री सिद्धिविनायक भक्तों को सिद्धि प्रदान करते हैं|कहा जाता है की वनवास से लौटते वक़्त भगवन राम सीता और लखमन के साथ यहीं रुके थे| मंदिर के पास एक बावड़ी भी है, जिसे लक्ष्मण बावड़ी के नाम से जाना जाता है|

कालभैरव मंदिर उज्जैन (Kalbhairav mandir ujjain)

Kalbhairav mandir ujjain

(महांकाल मंदिर से दुरी 8 किलोमीटर)
कालभैरव मंदिर अति चमत्कारिक मंदिर है, कालभैरव मंदिर में भगवान् कालभैरव साक्षात् मदिरा पान करते हैं| जी हाँ, यहाँ कालभैरव को प्रसाद के रूप में मदिरा चढाई जाती है और जब मदिरा का प्याला कालभैरव की मूर्ति के मुह से लगाया जाता है तो प्याला अपने आप चमत्कारिक रूप से खाली हो जाता है|कहा जाता है की कालभैरव का यह मंदिर लगभग 6 हजार साल पुराना है और तभी से हर रोज़ भगवान् काल भैरव की यह मूर्ति यूँ ही चमत्कारिक रूप से मदिरा पान कर रही है|

श्री हरिसिद्धी मंदिर उज्जैन (Harisiddhi mandir ujjain)

Harisiddhi mandir ujjain

(महांकाल मंदिर से दुरी 500 मीटर)
श्री हरिसिद्धी मंदिर भगवन महांकाल मंदिर के पास बने रुद्रसागर के पास स्थित है| इस मंदिर के बारे में कहा जाता है, कि शिवपुराण के अनुसार माता पारवती के सटी होने पर माँ पारवती की कोहनी इसी स्थान पर गिरी थी इसीलिए इस स्थान को हरीसिद्धि मंदिर के रूप में जाना जाता है| इस मंदिर के बारे में एक कहावत यह भी है, कि यह देवी सम्राट विक्रमादित्य की कुलदेवी हैं, राजा विक्रमादित्य ने यहाँ घोर तपस्या की थी और लगातार 11 बार अपने सर को काटकर माँ हरिसिद्धी को समर्पित किया था और हर बार सर पुनः उनके धड से जुड़ जाता था| मंदिर के चारों और द्वार हैं, मंदिर में दो दीप स्तम्भ भी है जहाँ पूरी नवरात्री में दीप जलाए जाते हैं|

गोपाल मंदिर उज्जैन (Gopal mandir ujjain)

Gopal mandir ujjain

(महांकाल मंदिर से दुरी 800 मीटर)
उज्जैन का गोपाल मंदिर उज्जैन शहर के बीचों-बिच स्थित है| यह मंदिर लगभग 250 साल पुराना है, इस मंदिर का निर्माण सिंधिया स्टेट द्वारा करवाया गया था| जन्माष्ठमी पर यहाँ विशेष आयोजन किये जाते हैं| इस मंदिर को उज्जैन का द्वारिकाधीश भी कहा जाता है| मंदिर में द्वारिकाधीश, शंकर पारवती और गृध की मूर्तियाँ विराजमान है|

मंगलनाथ मंदिर उज्जैन (Mangalnath mandir ujjain)

Mangalnath mandir ujjain

(महांकाल मंदिर से दुरी 5.5 किलोमीटर)
अंकपात के निकट शिप्रा तट पर ही मंगल नाथ का मंदिर स्थित है| मंगलनाथ मंदिर के लिए लोगों में मान्यता है, कि जिन लोगों की जन्मकुंडली में मंगल दोष होता है उनके यहाँ आकर पूजा-अर्चना करने पर मंगल दोष का निवारण हो जाता है|पुराणों के अनुसार उज्जैन को मंगल की जननी भी कहा गया है, यही कारन है कि मंगलनाथ मंदिर के प्रति यहाँ के लोगों और यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं में अटूट श्रद्धा है|

संदीपनी आश्रम (Sandipani aashram ujjain)

Sandipani aashram ujjain

(महांकाल मंदिर से दुरी 3.5 किलोमीटर)
पुराणों में संदीपनी आश्रम का अपना एक खास महत्त्व है| इसी के साथ यह स्थान श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र इसलिए भी बना हुआ है क्यों की यहाँ भगवान् श्री कृष्णा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की थी| श्री कृष्ण के भाई बलराम और सखा सुदामा ने भी अपनी शिक्षा श्री कृष्णा के साथ यहीं ग्रहण की थी| इस आश्रम में एक बड़ा सा पत्थर है, जहाँ 1 से 100 तक की गिनती लिखी गई है| ऐसा मन जाता है की यह गिनती स्वयं गुरु संदीपनी ने ही यहाँ लिखी थी|

वैसे तो उज्जैन और यहाँ के मंदिरों के बारे में जितना लिखा जाए उतना कम है| इसलिए हम चाहते हैं की आप जब भी उज्जैन की यात्रा करें, यहाँ कम से कम दो दिन रूककर जरुर आएं| उज्जैन में सभी मंदिरों और स्थानों पर घुमने के लिए आपको बस और टेक्सी सुविधा सीधे महांकाल मंदिर से मिल जाएगी|

इसके अलावा भी उज्जैन में कई मंदिर और स्थान है जिन्हें आप घूम सकते है, कुछ प्रमुख स्थानों के नाम आपकी सुविधा के लिए निचे दिए जा रहें हैं|

स्कान मंदिर– महांकाल मंदिर से दुरी 6 किलोमीटर
बड़े गणपति मंदिर– महांकाल मंदिर से दुरी 240 मीटर
त्रिवेणी संगम– महांकाल मंदिर से दुरी 8 किलोमीटर
गढ़कालिका मंदिर– महांकाल मंदिर से दुरी 5 किलोमीटर

महांकाल मंदिर उज्जैन | Ujjain Mahakal


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शूरवीरों का धरती चित्तोडगढ | Chittorgarh

शूरवीरों का धरती चित्तोडगढ | Chittorgarh Fort


राजपूत राज्य राजस्थान का एक छोटा सा मगर बेहद खुबसूरत शहर चित्तौडगढ (Chittorgarh fort) और अपने आप को शूरवीरों की तरह सीना ताने खड़ा रखे चित्तोडगढ का किला! देखने पर ऐसा लगता है, मानो आज भी लाखों राजपूत सेनिकों के बलिदानों की कहानी बयां कर रहा हो….

यूँ तो राजस्थान की धरती पर जन्म लेना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है! लेकिन अगर आपने अभी तक राजस्थान की इस पावन धरती के दर्शन नहीं किये हैं तो हम आपको आज बताएँगे की आपको सबसे पहले जाना कहाँ है| वैसे तो पूरा राजस्थान घुमने के लिहाज से भारत में सबसे शानदार जगह है| लेकिन अगर आपको हेरिटेज (Heritage) जगहों और किलों को देखने का शोक है तो आप सबसे पहले रुख कर सकते हैं चित्तौडगढ (Chittorgarh fort) का!

चित्तौडगढ पहुँचने के लिए आप सड़क, रेलवे और हवाई मार्ग का सहारा ले सकते हैं| अगर आप सड़क मार्ग से चित्तौडगढ पहुंचना चाहते हैं तो आप National Highway 8 (NH 8) से सीधा चित्तौडगढ पहुँच सकते हैं| रेलवे मार्ग से भी चित्तौडगढ़ तक पहुंचना काफी आसान है, रेलवे के चित्तौडगढ जक्शन होने के कारण यहाँ पर पहुँचने के लिए आपको आसानी से ट्रेन मिल सकती है| इसके अलावा हवाई मार्ग से चित्तौडगढ पहुँचने के लिए आपको उदयपुर हवाई अड्डे पर उतरना होगा|

रात बिताने के लिए चित्तौडगढ में कई होटल, लॉज और धर्मशालाएं उपलब्ध है| आप अपने बजट के अनुसार रात बिताने के लिए रूम बुक कर सकते हैं|

अगर आप अब तक चित्तौडगढ (Chittorgarh fort) आने का प्लान बना चुके हैं, तो हमारी बात मानिये और चित्तौडगढ का रुख सुबह की पहली किरण के साथ करे| चित्तौडगढ किले से सूर्योदय और सूर्यास्त (Sunset at Chittorgarh fort) के नज़ारे को आप हमेशा के लिए अपनी यादों के झरोखों में समेट कर ले जा सकते हैं|

चलिए अब जानते है चित्तौडगढ के इस भव्य किले की भव्यता के बारे में….चित्तौडगढ का किला कुल 709 एकड़ में बसा हुआ है| जिस पहाड़ी पर यह किला बसा हुआ है, उस पहाड़ी का घेरा लगभग 8 मील का है| इस पहाड़ी की उचाई लगभग 180 मीटर है| सुरक्षा के लिहाज से चित्तौडगढ सबसे मजबूत किला माना जाता है| किले में पहुँचने के लिए सात दरवाजो से होकर गुजरना पड़ता है|

केवल एक रात में किया गया था चित्तौडगढ़ (Chittorgarh fort) किले का निर्माण

इस किले के बारे में कई कहानियां है| लेकिन कहा जाता है की इस विशाल किले का निर्माण केवल एक रात में किया गया था| जी हाँ, द्वापर युग में पांच पांडवों में से सबसे बलशाली भीम जब संपत्ति की खोज में थे तब उन्हें इस पहाड़ी पर पारस पत्थर होने की सुचना मिली| भीम जब पारस पत्थर की खोज में इस पहाड़ी पर पहुंचे तब उन्हें रास्ते में एक योगी निर्भयानाथ और एक यति कुकडेश्वर मिले| भीम को जब यह पता चला की योगी निर्भयानाथ के पास पारस पत्थर है तो उन्होंने योगी से पारस पत्थर की मांग की| भीम के बलशाली शरीर को देख योगी ने उन्हें पारस पत्थर देने के लिए एक शर्त के साथ हाँ कर दी लेकिन शर्त यह थी की अगर भीम एक रात में इस पहाड़ी पर एक योगी के रहने के लिए इस पहाड़ी पर एक सुन्दर महल का निर्माण कर दे तो उन्हें पारस पत्थर मिल सकता है|

भीम को योगी की शर्त को पूरा करना लगभग असंभव लगा लेकिन पारस पत्थर को पाने की लालसा में उन्होंने योगी की शर्त को मान लिया सुर महल बनाने के काम में जुट गए| कहा जाता है की भीम में सौ हाथियों के बराबर शक्ति थी| इस असंभव काम को भीम ने एक रात में ही लगभग पूरा कर लिया था| लेकिन योगी निर्भायानाथ ने जब भीम को महल का काम पूरा करते देखा तो उनके मन में भीम को पारस पत्थर ना देने का विचार आया| इसलिए योगी ने भीम के काम को रोकने की एक योजना बनाइ|

महल को बनाने का काम लगभग पूरा हो चूका था सिर्फ पश्चिम क्षेत्र में थोडा सा निर्माण बाकि था| तभी  योगी निर्भयानाथ ने यति कुकड़ेश्वर से मुर्गे की बाग़ में आवाज लगाने को कहा| उस ज़माने में मुर्गे की बैग को ही सवेरा होने का प्रमाण मन जाता था| भीम ने जब मुर्गे की बाग़ सुनी तो अपने कार्य को विफल होते देख क्रोध में आकर अपने पैर को जोर से पटका| कहा जाता है की भीम के जोर से पैर पटकने के कारण वहां एक गड्ढा बन गया जिसे आज भी भीम कुंड के रूप में जाना जाता है|

चित्तौडगढ किले में घुमने वाली जगहें  (Place to VIsit in Chittorgarh Fort)

रानी पद्मिनी का महल :- 

Padmini Palace Chittorgarh Fort Rajasthan

चित्तौडगढ के किले में ही एक तालाब के बिच में एक महल बना हुआ है जिसे पद्मिनी महल के नाम से ही जाना जाता है| पद्मिनी महल को जनाना महल भी कहा जाता है और तालाब के किनारे बने महल को मर्दाना महल के नाम से जाना जाता है| मर्दाना महल में ही ऊपर एक कमरे में सामने की ओर एक दर्पण लगा हुआ है| दर्पण के सामने कि ओर खड़े होकर देखने पर मरदाना महल में खड़े व्यक्ति को देखा जा सकता है, लेकिन अगर पलट कर देखना चाहें तो देखना मुश्किल है| कहा जा सकता है की अलाउद्दीन खिलजी ने यहीं खड़े होकर रानी पद्मिनी का प्रतिबिम्ब देखा था|

कालिका माता मंदिर :- 

kalika-mata mandir chittorgarh fort

माँ पद्मिनीं महल के निकट ही एक विकाश मंदिर है, जिसे कालिका माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है| कहा जाता है की इस मंदिर का निर्माण 9 वि शब्ताब्दी में मवाद के राजाओं ने करवाया था| इस मंदिर के बारे में यह भी किदवंती है, कि पहले यह मंदिर सूर्य मंदिर था| मंदिर के गर्भ गृह में बनी सूर्य की मूर्तियाँ इसका प्रमाण है| कहा जाता है कि मुगलों के आक्रमण के दौरान मुग़ल राजाओं ने इन मूर्तियों को नष्ट कर दिया जहाँ बाद में माँ कालिका की मूर्ति की स्थापना की गई| तभी से यह मंदिर कालिका माता मंदिर के रूप में जाना जाता है|

कीर्ति स्तम्भ, विजय स्तंभ :-

Vijaya Stambha Chittorgarh Fort

कीर्ति स्तम्भ, जिसे विजय स्तम्भ भी कहा जाता है… का निर्माण सन 1440 इस्वी में महाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद शाह खिलजी को परास्त करने की यादगार के रूप में किया था| वास्तुकला की द्रष्ठी से विजय स्तम्भ एक बेजोड़ उदारहण है|

जोहर स्थल  :- किले के बिच में चारों और से घिरा हुआ एक मैदानी हिस्सा है, जिसके जोहर स्थल होने का दावा किया जाता है| यहाँ पहुँचने के लिए दो मुख्य द्वार बने है, जिन्हें सती द्वार के नाम से भी जाना जाता है|

गोमुख कुंड :- कालिका मंदिर से आगे चलने पर जोहर स्थल के पास ही एक कुंड है जिसे गोमुख कुंद के नाम से जाना जाता है| यहाँ पर एक पत्थर की गोमुख के सामान मूर्ति है जिससे प्राकृतिक झरने की एक धारा लगातार पास ही बने शिवलिंग पर गिरती रहती है|

मीराबाई का मंदिर :- कृष्ण भक्त मीराबाई का मंदिर चित्तौरगढ़ किले की शान कहा जाता है| यहाँ पर कृष्ण भक्त मीराबाई की एक मूर्ति स्थापित की गई है| मंदिर के सामने ही एक छत्री बनी हुई है, जहाँ मीराबाई की गुरु स्वामी रैदास जी के चरण चिन्ह है|

इन जगहों के अलावा भी चित्तौरगढ़ दुर्ग में घुमने के लिए छोटी-छोटी कई जगहें मौजूद है| चित्तौडगढ किला पूरा घुमने के लिए आपको पुरे एक दिन का समय लग सकता है|

चित्तौरगढ़ के आसपास घुमने वाली जगहें (Place to Visit Near Chittorgarh Fort)

वैसे तो चित्तौडगढ अपने आप में घुमने फिरने के लिए खास जगह है लकिन अगर आप चित्तौडगढ के आसपास घुमने का मन बना रहें है तो चित्तौडगढ के पास सवालिया जी, आवरीमाता, सुखानंद जी, भादवामाता घूमेने के लिए शानदार जगहें हैं|


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गुलाबी शहर-जयपुर|Best Place to Visit in Jaipur Rajasthan in Hindi

गुलाबी शहर-जयपुर|Best Place to Visit in Jaipur Rajasthan in Hindi


कुछ दिनों पहले ही जयपुर घुमने का मोका मिला, लगा जैसे दुनियाभर की खूबसूरती इस शहर में बस गई हो और कह रही हो,, “केसरिया बालम आओ नी..पधारो म्हारे देश…”

जी हाँ,  आज हम बात करने वालें है राजस्थान के एक ऐसे शहर की जहाँ अगर कोई एक बार चले जाए तो बार-बार वहां खीचा चला जाता है| (Jaipur-Rajasthan) जयपुर , लगभग 30 लाख जनसँख्या (Population) वाला राजस्थान का एक छोटा सा शहर है…जो अपनी राजस्थानी शैली और गुलाबी रंग के लिए देश दुनियां में मशहूर है| आज हम आपको बताएँगे की जयपुर में घुमने लायक कोन-कोन सी जगहें हैं Places to Visit in Jaipur Rajasthan


जयपुर घुमने का सबसे शानदार समय|Best Time  to Visit Jaipur

Best Time to Visit Jaipur

वैसे तो हर मौसम में जयपुर कुछ नया ही दिखता है, लेकिन Traveling Website-Make My Trip  के अनुसार “अक्टूबर से मार्च” के बिच का समय जयपुर घुमने के लिए सबसे शानदार है| हल्की सर्दियों में बादलों के बिच शहर के किलों और महलों को देखना आपके लिए एक रोमांचक अनुभव बन सकता है| जयपुर पहुँचने के लिए आप रेलवे, सड़क और हवाई मार्ग का उपयोग कर सकते हैं|


जयपुर में घुमने वाली जगहें|Place to Visit in Jaipur Rajasthan


आमेर का किला|Amer Fort Jaipur

आमेर जयपुर से लगभग 11 किलोमीटर दूर बसा एक छोटा सा शहर है जो ऊँचे पर्वतों पर बने अपने शानदार किले के के कारण जाना जाता है| एक रिपोर्ट के मुताबिक यहाँ हर रोज़ लगभग 5000 पर्यटक इस किले की खूबसूरती को देखने आते हैं| किले की दीवारें लाल पत्थरों और मार्बल से बनी हुई है|

Amer Fort Jaipur Rajasthan

आमेर के किले में चालीस खम्बो वाला एक शीश महल भी है जिसके बारे में कहा जाता है की अगर एक बार कोई यहाँ एक माचिस की तीली जला दे तो पूरा महल दीपावली जैसी रौशनी की तरह जगमगाने लगता है| इस किले की सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि  यहाँ आने पर आम आदमी को भी राजाओं जैसी अनुभूति होती है| किले के निचे से हाथी आपको राजाओं की तरह किले तक ले जाते हैं! इस किले में “आमेर किले से जयगढ़ किले” के बिच एक सुरंग भी बनी हुई है जीसे युद्ध के समय सुरक्षित निकलने के लिए इस्तमाल किया जाता था|


हवा महल|Hawa Mahal Jaipur

जयपुर का हवा महल अपने आप में बेजोड़ कला और राजपूती नक्काशी का एक बेजोड़ नमूना है| हवा महल का निर्माण महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था| कहते है, कि राजपूती महिलाऐं उस वक्त घुंघट और परदे में ही रहती थी, इस महल का निर्माण शहर में निकलने वाले जलसों और अन्य कार्यक्रमों को देखने के लिए करवाया था|

Hawa Mahal Jaipur

इस महल में कुल 152 खिड़कियाँ और जालीदार छज्जे हैं| बहार से देखने पर यह महल किसी  मधुमक्खी के छत्ते के सामान दिखाई देता है| यह पांच मंजिला महल पुराने शहर की मुख्या सड़क पर स्थित है| अगर आप सुबह के वक्त जयपुर पहुँचते हैं तो सबसे पहले हवा महल घुमें क्यों की सुबह की पहली किरण के साथ हवा महल को देखना एक रोमांचक अनुभव होता है|


जयगढ़ का किला|Jaigadh Fort Jaipur

जयगढ़ किले का निर्माण महाराजा जयसिंह ने 18 वि शब्ताब्दी में आमेर के किले की सुरक्षा के लिए करवाया था| इस किले में एशिया की सबसे बड़ी तोप आज भी रखी हुई है| यह किला, आमेर के किले से 2 किलोमीटर दूर चिल के टीले (Eagle Hill) पर लगभग 400 फुट की ऊंचाई पर स्थित है|

Jaigadh fort jaipur

पहाड़ी पर स्थित होने के कारन इस किले से पुरे जयपुर शहर को देखा जा सकता है| विजयी किले के नाम से प्रसिद्द यह किला 3 किलोमीटर लम्बा और लगभग 1 किलोमीटर चौड़ा है| जयपुर शहर से जयगढ़ किला 10 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है|


सिटी पैलेस जयपुर|City Palace Jaipur

सिटी पैलेस जयपुर शहर के बीचों-बिच स्थित एक महल है जिसका निर्माण महाराजा सवाई जय सिंह माधो ने सन 1729 में करवाया था| महल में जाने के तिन मुख्य दरवाजे हैं, जिन्हें भव्य रूप से सजाया गया है|

City Palace Jaipur

सिटी पैलेस परिसर में चन्द्र महल और मुबारक महल भी स्थित है| महल के एक हिस्से में आज भी शाही परिवार निवास करता है| सिटी पैलेस परिसर राजपूत, मुग़ल और यूरोपियन शैली के मिश्रण से बनाया गया है| सिटी पैलेस जयपुर रेलवे स्टेशन से महज 5 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है|


नाहरगढ़ किला|Nahargadh Fort Jaipur

जयपुर रेलवे स्टेशन से नाहरगढ़ किले की दुरी लगभग 19 किलोमीटर है| यहाँ बस और टेक्सी की सहायता से पहुंचा जा सकता है| नाहरगढ़ के किले की खास बात यह है कि इस किले को जयपुर शहर के हर कोने से देखा जा सकता है| रात में जब इस किले में लाइटिंग की जाती है तब इस किले को देखना अपने आप में एक रोमांचक अनुभव है|


जंतर मंतर जयपुर|Jantar Mantar Jaipur

जयपुर रेलवे स्टेशन से जंतर मंतर की दुरी लगभग 5 किलोमीटर है| संगमरमर और लाल पत्थरों से बनाई गई इस वेद्यशाला का निर्माण महाराजा सवाई माधोसिंह जी ने करवाया था| हाल ही में इस वेद्यशाला को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जा चूका है| अगर आप सौर मंडल और खगोलीय उपकरणों में अच्छी खासी रूचि रखते है तो जयपुर का जंतर मंतर घूमना ना भूलें|

Jantar Mantar Jaipur

जल महल जयपुर|Jal Mahal Jaipur

जयपुर रेलवे स्टेशन से जल महल की दुरी लगभग 12 किलोमीटर है| जल महल जयपुर शहर की सागर झील के बिच में स्थित वास्तुकला का बेजोड़ उदाहरण है| जल महल तक पहुँचने के लिए आप नाव का सहारा ले सकते हैं| रात के समय जल महल और भी खुबसूरत दिखाई देता है| कहा जाता है की इस महल में राजपूत राजा अपनी रानियों के साथ समय बिताना पसंद करते थे| महल का सिर्फ उपरी हिस्सा दिखाई देता है, बाकि का हिस्सा पानी में डूबा रहता है|

Jal Mahal Jaipur

यह थी जयपुर में घुमने वाली कुछ खास जगहें Place to visit in Jaipur Rajasthan, हमें उम्मीद है आपको हमारी यह पोस्ट जरुर पसंद आई होगी| अगर आपको हमारी वेबसाइट पसंद आई है तो हमारा फेसबुक पेज जरुर like करें| धन्यवाद


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यह भी पढ़ें-झीलों की नगरी-उदयपुर (Udaipur-City of lake)

 

 

 

Place to Visit in Udaipur | झीलों की नगरी-उदयपुर

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए लेकर आएं हैं एक ऐसा आर्टिकल “Place to Visit in Udaipur | झीलों की नगरी-उदयपुर” जिसे पढ़कर आपको लगेगा की आप उदयपुर में ही घूम रहें हैं| तो आइये आपको जन्नत की सैर करवाते हैं…


Place to Visit in Udaipur | झीलों की नगरी-उदयपुर

उदयपुर (Udaipur), आय हाय…नाम सुनते ही ज़हन में बड़ी-बड़ी झीलें और पहाड़ आ जाते हैं! वाकई में  इसीलिए तो उदयपुर को राजस्थान की जन्नत कहा गया है| वेसे तो अक्सर लोग उदयपुर एक या दो दिन में घूम कर आ जाते हैं|

लेकिन अगर सही मायनों में देखा जाए तो उदयपुर और उसके आसपास की जगहों को ढंग से घुमने के लिए आपको कम से कम पांच दिनों (5 Days) का वक्त लग सकता है| इसलिए अगर उदयपुर आने का मन बना रहें हैं तो ज़रा छुट्टियाँ बढ़ा कर आइयेगा|

तो चलिए अब जानते हैं उदयपुर और इसकी खूबसूरती के बारे में….

उदयपुर (Udaipur) राजस्थान का एक छोटा सा जिला है, जो अपने आप में अपनी बेहद शानदार खूबसूरती के लिए जाना जाता है! उदयपुर पहुँचने के लिए आप हवाई मार्ग, रेलवे और सड़क मार्ग का उपयोग कर सकते हैं|

उदयपुर हवाईअड्डा (Udaipur Airport) उदयपुर से लगभग 20 km दूर डबोक में स्थित है| जहा  से जयपुर, जोधपुर, दिल्ली, मुंबई और औरंगाबाद जैसे बड़े शहरों से हवाई यात्रा की जा सकती है| सड़क मार्ग से उदयपुर राष्ट्रिय राजमार्ग 8  (NH  8) से पहुंचा जा सकता है|

दयपुर में घुमने वाली जगहें (Udaipur is Famous for)

वैसे तो उदयपुर  को झीलों की नगरी (Udaipur-CIty of lakes) कहा जाता है, लेकिन झीलों के अलावा उदयपुर अपनी राजस्थानी शैली को भी बड़े बखूबी ढंग से प्रदर्शित करता है| तो चलिए आपको सैर कराते हैं उदयपुर की…..Place to Visit in Udaipur

उदयपुर की झीलें (Lakes of Udaipur)

उदयपुर की झीलें

वैसे तो उदयपुर में कई झीलें है, इसीलिए इस शहर को झीलों का शहर कहा जाता है| लेकिन उदयपुर में सबसे खास कुल सात झीलें हैं|

  1. पिछोला
  2. दुध तलाई
  3. स्वरुप सागर
  4. गोवर्धन सागर
  5. फतह सागर
  6. रंग सागर
  7. कुमारी तालाब

इन झीलों को उदयपुर की बहने भी कहा जाता है क्यों की यह उदयपुर की जीवन रेखा है|यह झीलें उस ज़माने की इन्जिनीरिंग का एक बेजोड़ उदाहरण है, एक झील में पानी ज्यादा होने पर उसका पानी अपने आप दूसरी झील में चला जाता है|

सिटी पैलेस उदयपुर(City Palace Udaipur)

सिटी पैलेस उदयपुर

उदयपुर (Udaipur) के बीचो-बिच अपनी राजपूती शानो-शोकत को बरकरार रखता उदयपुर का सिटी पैलेस मानो यहाँ आने वाले हर मुसाफिर को यही कह रहा हो “पधारो म्हारे उदयपुर” !

साल 1959 में महाराणा उदय सिंह ने पिछोला झील के किनारे राजपूत शैली के इस भव्य महल का निर्माण करवाया| सिटी पैलेस से पुरे उदयपुर शहर को देखा जा सकता है| सिटी पैलेस में कई द्वार है, लेकिन बड़ा पोल या ग्रेट गेट महल का मुख्या द्वार है|

कहा जाता है की इसी गेट के सामने कभी हाथियों की लड़ाई होती थी| सिटी पैलेस की भव्यता और खूबियों से सैलानियों को अवगत करवाने के लिए गाइड की सुविधा भी उपलब्ध है|

जगदीश मंदिर उदयपुर (Jagdish Mandir Udaipur)

जगदीश मंदिर उदयपुर

सिटी पैलेस से बहार निकलते ही आपको एक भव्य मंदिर का गुम्बद दिखाई देगा, जिसे जगदीश मंदिर के नाम से भी जाना जाता है| जगदीश मंदिर उदयपुर का सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है|

यह सिटी पैलेस से महज कुछ कदम की दुरी पर ही स्थित है इसलिए इसे सिटी पैलेस परिसर में ही माना जाता है| यह मंदिर उदयपुर के महाराणा जगत सिंह द्वारा बनाया गया था| मंदिर में भगवन विष्णु की चार हाथो वाली प्रतिमा के दर्शन किये जा सकते हैं|

बागौर की हवेली (Baagaur ki Haweli)

बगौर की हवेली उदयपुर

बागौर की हवेली वास्तुकला और भित्तिचित्रों का एक नायब संगम है| हवेली में कुल 138 कमरे हैं| इस हवेली का निर्माण 18 वी शब्ताब्दी में हुआ था|

बागौर की हवेली में हर शाम 7 बजे मेवाड़ी नृत्य और राजस्थानी नृत्य का आयोजन किया जाता है जिसे देखने देश विदेश से पर्यटक आते है और उदयपुर की यादों को अपने साथ ले जाते हैं|

यह हवेली पिछोला झील की किनारे गणगौर घाट पर स्थित है| यहाँ आप “म्हारी घुमर छे नखराली” जैसे गीतों पर नृत्य का आनंद उठा सकते हैं|

फतह सागर झील उदयपुर(Fatah Sagar Udaipur)

फतह सागर झील उदयपुर

फतह सागर झील का निर्माण महाराणा फतह सिंह द्वारा करवाया गया था| नाशपाती (Pear) आकर की यह झील पिछोला झील से डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित है| झील के बिच में एक टापू है, जिस पर एक बगीचा बनाया गया है  जिसे नहरू उद्यान के रूप में भी जाना जाता है|

झील के समीप ही एक सौर वेद्यशाला को भी स्थापित किया गया है| शाम के वक्त इस झील के किनारे घुमने का अपना अलग मज़ा है| अगर आप शाम के वक़्त झील किनारे समय बिताना चाहते हैं तो फतह सागर झील एक अच्छा विकल्प है|

Place to Visit in Udaipur

सज्जन गढ़ या मानसून भवन (Sajjangadh or Mansun Bhavan Udaipur)

Sajjangadh or Mansun Bhavan Udaipur

सज्जनगढ़ एक पहाड़ी पर स्थित है जहाँ कार या जीप (जीप किराए से मिल सकती है) से जाया जा सकता है| सज्जनगढ़ का निर्माण महाराजा सज्जन सिंह जी मानसून पर निगरानी के लिए  करवाया था इसीलिए इसे मानसून पैलेस के नाम से भी जाना जाता है|

सज्जनगढ़ के निचे एक अभ्यारण है जहाँ जंगल सफारी का आनंद लिया जा सकता है| मानसून भवन से झीलों का नज़ारा अलग ही दिखाई पड़ता है|

शाम के वक्त सज्जनगढ़ दुधिया रौशनी में एक किले के सामान दिखाई पड़ता है| अगर आप पहाड़ और उसकी ऊंचाई से उदैपुर को देखना चाहते है तो एक बार सज्जनगढ़ ज़रूर जाए|

सहेलियों की बाड़ी (Saheliyon ki Badi Udaipur)

सहेलियों की बाड़ी उदयपुर

सहेलियों की बाड़ी उदयपुर शहर के बिच में स्थित एक बाग़ है, जहाँ आप  विभिन्न प्रकार के फूलों के साथ-साथ फव्वारों को देखने का आनंद भी ले सकते हैं| कहा जाता है की सहेलियों की बड़ी में लगे इन फव्वारों को इग्लैंड से मंगवाया गया था|

यहाँ श्रावण महीने की अमावस्या को शहरवासियों का एक मेला भी पड़ता है| अगर आप सावन  महीने (July-Agust) में उदयपुर घुमने का प्लान बना रहें हें तो इस मेले का लुफ्त ज़रूर उठायें| सहेलियों की बाड़ी उद्यान रोज़ सुबह नौ से शाम छः बजे तक पर्यटकों के लिए खुला रहता है|

करणी माता मंदिर उदयपुर(Karni Mata Mandir Udaipur)

Place to visit in udaipur

करणी माता मंदिर दूध तलाई के निकट एक पहाड़ी पर स्थित है| मंदिर तक जाने के लिए सीढियों व् रोपवे दोनों मार्ग उपलब्ध है| लेकिन अगर आपका बजट थोडा ज्यादा है और आप रोप वे (Ropeway in Udaipur) का मज़ा लेना चाहते हैं तो करणी माता मंदिर घुमने का मज़ा दुगना हो सकता है|

करनी माता मंदिर में सैलून से चूहों को प्रशाद खिलने की अनूठी परंपरा है, अगर आपको चूहों से डर लगता है तो थोडा ध्यान से जाइएगा|

Place to Visit in Udaipur

उदयपुर के आस-पास घुमने वाली जगहें (Place to Visit Near in Udaipur)

उदयपुर घुमने की दृष्ठि से अपने आप में एक बहुत बड़ी जगह है, लेकिन अगर आप उदयपुर के आसपास घुमने का सोच रहें हैं तो उदैपुर के आसपास भी घुमने वाली कई जगह हैं…..

  • हल्दी घाटी
  • नाथद्वारा
  • माउन्ट आबू
  • एकलिंग जी
  • कुम्भलगढ़
  • चित्तौडगढ़
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