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Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी

साथियों नमस्कार, कभी कभी इन्सान कुछ ऐसे रिश्तों में फंस जाता है जहाँ उसे अपने सपने पीछे छुटते नज़र आते हैं| ऐसी ही एक कहानी “Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी” हमारी लेखिका लिपि चौहान ने हमें भेजी है, आशा है आपको हमारा यह संकलन पसंद आएगा|


Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी

आज घर में अकेली थी ,राधा काम करके जा चुकी थी ,रवि ऑफिस जा चुके थे और में सारा काम निपटा के रेडियो पर गाने सुन रही थी। सुनते-सुनते नज़र शर्मा जी की बालकनी में टंगे पिंजरे पर पड़ी जहा एक प्यारा सा मिट्ठु  था।

एक खुबसुरा बोलने वाला मिट्ठू ,  जो अब बंद पिंजरे में चुप सा हो गया था। उसकी आँखे बस आकाश को देखती हुई आज़ादी का इंतज़ार करती थी उड़ने का इंतज़ार करती थी|

मुझे उससे हमदर्दी सी होने लगी वो तो एक असहाय पंछी है पर में तो इंसांन हूँ वो पिंजरा नहीं खोल सकता पर में सारे दरवाजे खोल सकती हूँ , पर क्यों हूँ  मै आज इस मुकाम पर?

माँ-पापा की चहेती,  भाई की जान और हर एक फंक्शन की जान थी मै| मुझे आज भी याद है, कॉलेज के उस फंक्शन में मेरे डांस परफॉरमेंस के बाद वन्स मोर-वन्स मोर की आवाजे आ रही थी| सारे टीचर्स और प्रिन्सिपल सर मेरी माँ को घेर कर खड़े थे|

प्रिंसिपल  तारीफ़ करते नहीं थक रहे थे| यही नहीं में कॉलेज टापर भी थी| मेरे यही सारे गुण देख कर रवि मर मिटे थे मुझ पर और मेरा हाथ मांग लिया| घर नौकरी सब अच्छी देख कर पापा ने भी मेरी शादी कर दी|

पहला एक साल तो प्यार मोहब्बत में कुछ ऐसा गुज़रा की पता ही नहीं चला| रवि की दीवानगी थी ही कुछ ऐसी थी| लेकिन वो दीवानगी सिर्फ दीवानगी नहीं थी एक ऐसा पिंजरा जो में मेरे लिए तैयार कर रही थी| जिसमे अब मेरा दम घुटता था|

मेरी खूबसूरती कोई और देखे तो रवि बर्दाश्त नहीं कर सकते थे| कोई मेरी कोई तारीफ़ करे ये भी उन्हें अच्छा नहीं लगता था| मै ज्यादा सजु-सवरू तो ताने मिलते थे|

एक कॉम्पिटिशन में भाग लेने के लिए जब मैने रवि से पूछा तो उन्कहोंने कह दिया की मेरी बीवी बीच बाजार में नाचे मुझे पसंद नहीं| क्या मेरी कला जो पूरी दुनिया पसंद करती है वो अब बाज़ारू भी हो गई थी ?

दिन ब दिन उम्मीदे मेरा दामन छोड़ रही थी और में उन चार दीवारों में सिमटती जा रही थी|

मेरा किसी पडोसी से बात करना भी रवि को पसंद नहीं था| क्या यही प्यार था उसका जो मुझे कैद करता जा रहा था| शाम हो चुकी थी, में अपने लिए चाय बनाकर लाई और बालकनी में पी ही रही थी की घंटी बजे देखा तो रवि थे और कुछ जल्दी में थे…

पूछा तो कहने लगे की मीटिंग है और उसके बाद  पार्टी लेट हो जाऊंगा आने में|

मैंने  कहा कुछ जरुरी बात है तो कहने लगे फ़िज़ूल में परेशान न करो  जल्दी से सूट निकालो मुझे जाना है| पता नहीं मेरे अंदर कौन सी लहर दौड़ गई की मेने कहा फ़िज़ूल नहीं बहुत ज़रूरी है और आज सुनना होगा|

रवि गुस्से में मेरी तरफ देखने लगे मेने भी उनसे आँख से आँख मिला कर कहा, आज मेरी गुरु माँ का कॉल आया था| उन्होंने कहा की आगरा कत्थक फेस्टिवल में, मैं  गुरुकुल को रिप्रेजेंट करू|

यह सुनते ही रवि का कटाक्ष मेरे कानो में पड़ा| वो कुछ बोलते इससे पहले ही मैंने  कहा, पूछ नहीं रही हूँ बता रही हूँ| कल आगरा के लिए निकल जाउंगी और हां अभी मुझे टिकट्स करना है। जा रही  हूँ।

रवि ने कहा, जा रही हो तो दुबारा इस घर में मत आना| मैंने कहा घर और अलमारी की चाबियां टेबल पर रखी है आपके जरुरी पेपर उस ड्रावर में है और आपको बोलने की जरुरत नहीं मैंने घर छोड़ने का फैसला उस वक़्त ही कर लिया था जब आपने मेरी कला को बाज़ारू कहा  था| बस हिम्मत आज जुटा पाई हूँ।

घर से बहार आते ही महसूस हुआ जो ख़ुशी एक अरसे से गुम थी आज मिल गई|

Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी

लिपि चौहान


Success Story in Hindi | आत्मविश्वाश 

दिन गर्मियों के थे, हम सब सयुंक्त परिवार में रहते थे। एक दिन मेरी कॉलोनी में कुछ खूबसूरत सी लड़कियों का आना हुआ, बात करने पर पता चला कि वो मुम्बई से आई थी।

हाव-भाव, चाल-ढाल से एकदम शहरी। मैं जो कि अभी तेरह की हुई थी, उनको देखकर बहुत प्रभावित थी। आखिर बात हुई, दोस्ती हुई….फिर घूमना, बाते करना।

अक्सर मैं उनको देखकर उन जैसा बनने की कोशिश करती| समय बीतने लगा और कोशिश बढ़ गयी, पर कोई तारीफ नही बस कोशिश……पढ़ाई में होशियार थी अब जो समय पढ़ाई का था वो सुंदर दिखने और तारीफ पाने में लगने लगा।

उम्र का वो दौर, हार्मोन की उथल पुथल, सब कुछ जैसे अजीब था। एक सीधी साधी लड़की को अब उड़ना था, लेकिन किस दिशा में ,ये उसको नही पता था।समय निकलता गया, सयुंक्त परिवार और काम के कारण माँ उतना समय नही दे पाती थी, पिता सरकारी नौकरी में थे जोकि दूसरे शहर में पदस्थ थे।

लेकिन मेरे व्यवहार में अचानक आये परिवर्तन से वो भी अनभिज्ञ न थे।आखिर पापा ने पूछ ही लिया “क्या बात है तनीषा, आज कल कहा मन रहता है तुम्हारा”। मैं बोली “परीक्षा में अभी टाइम है,मैं कोर्स कवर कर लूंगी। पर मुसीबत बढ़ने वाली थी, उन लड़कियो ने ये बात भांप ली और फिर शुरू हुआ वो दौर जिसकी मैं कल्पना भी नही कर सकती थी|

उन लड़कियो ने मेरे कद ,रंग वजन और हर उस चीज़ का मज़ाक बनाया जिसको लेकर मैं संवेदनशील थी। एक अलग ही तरह का दबाव महसूस कर रही थी। मेरा खाना खाने का दिल नही करता था, खाती भी थी तो उल्टी कर देती थी।

मै उदास रहने लगी, कितनी भी कोशिश कर लूं, मैं उन लड़कियों जितनी आकर्षक नही लग पा रही थी। असर ये हुआ कि उस वर्ष मेरा परीक्षा परिणाम बहुत बुरा रहा। समय निकल रहा था। मैं अंदर से कमजोर हो गयी थी, फिर एक दिन मैंने ऐसे जीवन को खत्म करने का सोचा।

बस किशोर मन यही सोच रहा था कि जब मुझमे कोई आकर्षण ही नही तो जीवन का अर्थ क्या, दिन और समय तय किया ,और इंतज़ार करने लगी। पर इसी बीच पापा ने फ़ोन कर बुला लिया। जगह बदली, मन बदला मरने का विचार आगे बढ़ा दिया।

सोच वही ले जाती थी मैं सुंदर नही, मोटी हु। कद कम है रंग दबा हुआ। इस दबाव को झेलते हुए एक दिन अचानक ,एक अंदरूनी ऊर्जा महसूस हुई।जैसे कोई हाथ पकड़ कर मुझे इस स्थिति से निकल रहा था। मैंने खुद तय किया कि कुछ तय समय तक मैं सिर्फ सकारात्मक बाते पढूंगी और देखूंगी। मुझे अच्छा महसूस होने लगा था।

भूख बढ़ गयी , चहरा ठीक हो रहा था। थकान भी कम हो गयी। मैंने फिर एक दिन हिम्मत करके वहां के बच्चो से दोस्ती की और शाम को रोज़ बेडमिंटन खेलने जाने लगी।सब कुछ जैसे सही हो गया था। नए दोस्त , नया माहौल सब अच्छा था । फिर वापस जाने का समय आया।घबराहट , डर के कारण हालात खराब थी, पर जाना तो था।

अगले दिन वापस आ गए। उन लड़कियों का ग्रुप सामने से जा रहा था हंसता हुआ, पर मैं स्थिर खड़ी देख रही थी न कोई डर ,न दबाव। अपने अस्तित्व का पहला अनुभव उसी दिन हुआ था मूझे और उस किशोरी के लिए ये जीवन की अमूल्य सीख थी। आज ,इतने साल बीत गए ,लड़खड़ाई , बोहोत उत्तर चढ़ाव देखे पर उस दिन हिम्मत के जो पंख मिले, उनने मुझे कभी गिरने नही दिया। ——–

यामिनी

Motivational Story in Hindi for Success


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साथियों नमस्कार, भारत-पाकिस्तान विभाजन की कई कहानियां आपने पढ़ी होंगी! लेकिन यकीं मानिये “सतीश भारद्वाज” की लिखी यह कहानी “घरु | Hindi Stories” आपके दिल को छु जाने वाली है! आपकी प्रतिक्रियाओं का हमें इंतज़ार रहेगा…


घरु | Hindi Stories

परितोष तेजवानी घर में आते ही सबसे पहले अपने पिता जगमोहन तेजवानी के पास आया| जगमोहन  तेजवानी 83 वर्ष के विधुर वृद्ध थे| सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त, परितोष भी प्रोढ़ अवस्था में आ चूका था और एक नामचीन पत्रकार है|

{जगमोहन  अपने कमरे में अपनी कुर्सी पर बैठे नित्य की भांति अपने ही विचारों में लीन है| धीमी आवाज़ में मल्लिका पुखराज के गाने चल रहे हैं}

परितोष ने अपने पिता के हाथो को अपने हाथों से नरमी के साथ पकड़ा और बोला “पापा जी”| जगमोहन का ध्यान भंग हुआ और पुत्र को देखकर एक हलकी सी मुस्कराहट अपने चहरे पर बिखेर दी| चेहरे की झुर्रियों में भी जगमोहन आँखे उनकी मुस्कान की गवाही दे रही थी|

परीतोश की आँखों में चमक थी उसने उत्साह से कहा “पापा तयारू कर लो, हम घरु जायेंगे”(पापा तैयारी कर लो हम घर जायेंगे)

जगमोहन एकदम से चंचल हो उठा और बोला “क्या जामपुर?”

परितोष ने जोर देकर कहा “हाँ, टहु दिहुं बाद” (हाँ तिन दिन बाद)

जगमोहन ने संक्षिप्त उत्तर दिया “ठिकू” (अच्छा है) और अपनी कुर्सी से सर टिका कर आँख बंद कर ली|

परितोष कुछ देर और अन्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में बैठा रहा फिर उठकर बाहर चला गया|

जगमोहन  पुरानी यादों में चला गया था शायद|

आज से कोई 70 साल पहले की बात होगी जब भारत की स्वतंत्रता के साथ ही विभाजन भी हो गया था| विभाजन रेखा के दोनों तरफ ही बड़ा कत्लेआम और विस्थापन हुआ था| जगमोहन तेजवानी का परिवार सिन्धी परिवार था|

जगमोहन के पिता का पंजाब के राजनपुर जिले के जामपुर क़स्बे में तम्बाकू का व्यापार था| “जामपुर” “सुलतान पहाड़ीयों” और “सिन्धु नदी” से बनी मनोरम वादियों में बसा पंजाब, पकिस्तान की सीमा पर सिंध से सटा क़स्बा था|

तीन भाई-बहनों में बहन सबसे बड़ी थी, एक और छोटा भाई था| माता पिता के साथ ही जगमोहन के दादा दादी भी रहते थे| दूकान के साथ ही घर था| कुछ जमीन जायदाद भी बना रखी थी|

विभाजन के समय जब कत्लेआम शुरू हुआ तो जगमोहन का परिवार भी उस आग की चपेट में आ गया| अपने पुरे परिवार में से बस जगमोहन ही वापस आ पाया था भारत| भारत में जगमोहन को उसकी बुआ ने पाला था| जगमोहन के फूफा सरकारी नौकरी में थे|

विभाजन के समय सरकारी नौकरी वालो की तो अदला बदली दोनों तरफ की सरकारों ने कर ली थीं लेकिन जो किसान या व्यापारी थे वो आग के दरियाओं को पार करके विस्थापित हुए थे|

जगमोहन के परिवार के साथ पकिस्तान में क्या हुआ?  ये कभी भी जगमोहन ने किसी से नहीं बताया| उस समय का जिक्र आते ही जगमोहन एक मौन धारण कर लेता था और उसकी आँखे पनीली हो जाती थीं|

परितोष ने भी बाकी लोगो की तरह कई बार जानना चाहा था कि उस समय क्या हुआ था? लेकिन जगमोहन ने कभी कुछ नहीं बताया| आज भी जगमोहन को आबिदा परवीन के गीत बहुत सुहाते थे|

हालाँकि वो विभाजन से बाद में पैदा हुई थीं| सिंध और पंजाब, पकिस्तान से सम्बद्ध समाचारो पर जगमोहन का ख़ास ध्यान रहता था| वह परितोष से कई बार कहता था “कडहिं घरु वञणु छा?” (कभी घर जायेंगे क्या?)|

आप पढ़ रहें हैं सतीश भरद्वाज की लिखी  ” घरु | Hindi Stories “

जगमोहन ने कभी भी इस विभाजन को स्वीकार ही नहीं किया था| जगमोहन  उस विभीषिका से बचकर आ तो गया था लेकिन शायद अपना बचपन, यौवन, हास्य, विनोद, करुणा सब वहीँ छोड़ आया था| एक भावना विहीन शरीर मात्र रह गया था जगमोहन |

लेकिन सिन्धु के जल प्रवाह की वो मोनारम ध्वनि से उत्त्पन्न संगीत, सुलतान पहाड़ियों की हवाओं कि वो सुंगंध आज भी उसके मन में बसी थी जो दिल्ली में भी भी उसको कभी जैसे सहला जाती थी| और यूँ ही मौन बैठे बैठे उसके चहरे पर एक मोहक मुस्कान आ जाती थी|

वो मुस्कान उसे एकदम एक बच्चे की तरह बना देती थी वो हसने लगता था, ठेठ सिन्धी भाषा में या कभी पंजाबी में कुछ भी बोल उठता था, जैसे वो लड़ रहा हो कभी अपने भाई बहनों से तो कभी अपने दोस्तों से|

हालाँकि जगमोहन को अच्छी हिंदी आती थी| वो खो जाता था कंचो या गिल्ली डंडे के खेल में| फिर शांत हो जाता था| किसी राजनैतिक मजलिस या जुलुस में अगर जगमोहन “अल्लहा हु अकबर” का नारा सुनता था तो बेचैन हो उठता था| वो अपने दोनों कानो को अपने हाथो से कसकर भींच लेता था|

सबको लगता था की जगमोहन पागल है| परन्तु अपना कार्य जगमोहन अन्य लोगो से ज्यादा गंभीरता से और कुशलता से करता था| बस वो किसी के साथ ज्यादा घुलता मिलता नहीं था| जगमोहन एक अच्छा पिता और पति रहा लेकिन उसके आचरण में ये असामन्यता हमेशा बनी रही| जगमोहन की बुआ ने और बाद में बेटे परितोष ने उसका इलाज भी करवाया लेकिन कुछ नहीं हुआ था|

दोनों देशो की सरकारें पुन: सम्बन्ध सामान्य करने की प्रक्रिया के दौर में थे| भारत से एक सांस्कृतिक प्रतिनिधि मंडल पकिस्तान जा रहा था| जिसमें परितोष भी था| परितोष ने भारतीय विदेश सचिव से अपने पिता के बारें में चर्चा की और उन्हें साथ ले जाने की बात रखी तो उसे अनुमति मिल गयी थी| भारत में पकिस्तान के राजदूत ने खास व्यवस्था करवाई थी जगमोहन को जामपुर भेजने की|

…….

लाहोर में कुछ औपचारिक मित्रवत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद आज जगमोहन जामपुर जा रहा था| भारत की मीडिया पकिस्तान की दरियादिली की चर्चाओं में तल्लीन थीं कि कैसे एक बिछड़े को उसकी जड़ों से मिलवाने को पकिस्तान सरकार ने मानवता का परिचय दिया है|

पाकिस्तानी जनता के जगमोहन के लिए बेहद मार्मिक और अपनत्व लिए सन्देश प्रचारित किये जा रहे थे| सत्यता का तो पता नहीं लेकिन भारतीय मिडिया चैनलों ने दोनों देशो के रिश्तों की बर्फ को पूरी तरह पिंघाल दिया था| जगमोहन की हालत को देखते हुए उसे मिडिया से बहुत दूर रखा जा रहा था|

सरकारी गाडी से सेना के चार जवान, एक पाकिस्तानी पत्रकार, दो पाकिस्तानी सरकारी अधिकारी, जगमोहन और परितोष को जामपुर ले जा रहे थे| परितोष यहाँ के दृश्य को देखकर मुग्ध था| “हिन्दुकुश पर्वतमाला का ही हिस्सा सुलतान पहाड़ी दिख रहीं थी| सिन्धु नदी ने यहाँ की धरती को उपजाऊ बना रखा था| जिससे यहाँ की हरयाली यहाँ की खूबसूरती को और बढ़ा रहीं थी| जगमोहन अपने में ही मगन था|

जामपुर क़स्बा शुरू भी नहीं हुआ था की जगमोहन ने एकदम से गाडी रुकवा दी| जगमोहन गाडी से बाहर आकर चारो तरफ देखने लगा| जगमोहन  की दृष्टी कुछ तलाश रही थी| तभी साथ आये पाकिस्तानी पत्रकार जिसे हिंदी अच्छी आती थी उसने कहा “यहाँ कभी एक पुराना मंदिर हुआ करता था| नयी सड़क बनाने के लिए उसे यहाँ से शिफ्ट कर दिया गया|”

परितोष ने उसकी बात सुनकर कहा “लगभग सभी मंदिर रास्तो में आ रहे थे इसलिए पकिस्तान सरकारों ने शिफ्ट कर दिए” ये शिफ्ट शब्द कुछ ज्यादा ही जोर डालकर बोला था परितोष ने| परितोष के इस कटाक्ष पर पाकिस्तानी पत्रकार ने दृष्टी चुराने का असफल प्रयास किया|

जगमोहन को उनके इस वार्तालाप से कोई मतलब नहीं था| वो अपनी ही धुन में कस्बे की तरफ चल दिया|

पाकिस्तानी पत्रकार ने कहा “सर कार से ही चलिए, अभी एक किलोमीटर चलना पड़ेगा, बिच शहर में कहीं होगा आपका ठिकाना”

जगमोहन ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और पैदल ही चलता रहा| जगमोहन  के बूढ़े शरीर में उर्जा का स्तर एकदम से बढ़ गया था| अब उसके कदम भी नहीं बहक रहे थे| जगमोहन कस्बे के भीतर आ गया था|

बहुत ज्यादा बदल चूका था ये क़स्बा, पहले से बड़ा भी हो गया था| लेकिन शायद यहाँ की जमीन का हर टुकड़ा पहचानता था जगमोहन को| वो कभी किसी गली में चला जाता| कुछ देर देखता रहता, साथ आया पाकिस्तानी बताता कि यहाँ कभी कोई पुरानी ईमारत हुआ करती थी|

कभी जगमोहन किसी पुरानी ईमारत के सामने रुक कर खड़ा हो जाता| उस ईमारत के भीतर जाता और घूमकर बहर आ जाता| वो चले जा रहा था अपनी पुरानी यादों में खोया| ना जगमोहन किसी से कुछ पुछ रहा था ना ही किसी को कुछ बता रहा था| वो चल रहा था जैसे कहाँ कहाँ जाना है ये उसने पहले से ही निश्चित किया हुआ है|

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चलते हुए जगमोहन एक खँडहर के सामने जाकर रुक गया| अब तक कुछ स्थानीय लोग भी कौतुहलवश साथ हो लिए थे| उस खंडहर को देखते ही जो स्थानीय लोग अभी तक इस तमाशे को आनंद से देख रहे थे, अब उनके सुर्ख चहरे सफ़ेद हो गए थे| एक स्थानीय के मुहँ से निकला “शैतानी रूहों का डेरा”

परितोष ने उन बातों पर ध्यान नहीं दिया| वो जगमोहन के पास आकर खड़ा हो गया| जगमोहन की आँखों में पूरा शहर घूमते समय एक बालसुलभ चमक थी लेकिन इस खंडहर के सामने आते ही उसकी आँखे झर झर बह चली थीं|

खंडहर कभी घर ही था| बाहर एक किनारे पर बड़ा सा कमरा और बरामदा था आगे फिर बड़ा सा आंगन था| उस आंगन में एक लोहे का खंम्बा था जिस पर लटका जीर्ण शीर्ण जंग खाया तराजू आज भी दिख रहा था| कभी मुख्य दरवाजे पर लकड़ी का दरवाजा रहा होगा क्योंकि जली हुई लकड़ी की देहल आज भी दिख रही थी|

पुरे आंगन में इंटें बिछी थीं, लेकिन फिर भी काफी ऊँची झाड़ियाँ हो गयी थीं| आंगन में ही दो बड़े पेड़ थे जिन पर जंगली बेल चढ़ गयीं थी| स्थानीय लोग इस खंडहर के पास भी नहीं आते थे| देखने में भी ये जगह बहुत डरावनी थी|

जगमोहन उस खंडहर के भीतर दाखिल होने लगा| तभी एक स्थानीय ने घबराते हुए कहा साहब इस जर्रे में तो आदमजात तो आदम जात कोई परिंदा भी कभी बैठे नहीं देखा|

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भयानक रूहें घुमती हैं यहाँ| रोकिये उन्हें भीतर जाने से| परितोष ने उस आदमी की बातों पर ध्यान नहीं दिया और जगमोहन के साथ खंडहर में भीतर दाखिल हो गया| लेकिन बाहर खड़े स्थानीय लोगो के चहरे भय से पीले जर्द हो गए थे|

जो स्थानीय लोग एक भीड़ के रूप में इनके साथ चल रहे थे अब वो सब वहाँ से दूर हो गए| बस उनके साथ आये लोग और एक दो स्थानीय ही वहाँ खड़े रह गए थे|

……….

जगमोहन  ने बाहर के उस कमरे में प्रवेश किया| कभी इसे जलाया गया था इसका अनुमान कमरे को देखकर हो रहा था| ये इस घर में आत्माओं के होने की जो बात लोगो के दिलों में बैठ गयी थी उसकी वजह से ये आज 70 साल बाद भी ज्यों का त्यों ही था, जैसा कभी दंगाइयों ने इसे कर दिया था और जगमोहन छोड़कर गया था|

जगमोहन ने बराबर में खड़े परितोष के हाथ को अपनी हथेली से दबाया और बोला “ये हमारी तम्बाकू की दुकान थी| पीले रंग की पुताई थी पुरे मकान पर”

फिर जगमोहन उस कमरे से बाहर आकर आंगन में आया और बताने लगा “यहाँ बहुत भीड़ रहती थी पुरे दिन, तम्बाकू और पैसो का लेनदेन होता था|”

परीतोष को अजीब लग रहा था| आज पहली बार जगमोहन बोल रहा था उस समय के बारे में|

फिर जगमोहन बाहरी आंगन से मकान के भतरी हिस्से में प्रविष्ट हो गया| एक बड़ा बरामदा फिर एक अपेक्षाकृत छोटा आंगन और उसके बाद फिर एक कमरों की पंक्ति| बरामदे में ही ऊपर जाने को जीना था| प्रथम दृष्टी में ही परितोष को इतना दिख गया था|

जगमोहन  ने अन्दर के बरामदे की तरफ इशारा करके कहा “यहाँ मेरी दादी बैठी रहती थी और तेरी बुआ और तेरी दादी भी उनके साथ यहीं बैठती थी| मैं और तेरा चाचा जब पाठशाला से आ जाते थे तो हम कभी यहाँ बैठ जाते थे|

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जब माँ घुड़क देती थी तो बाहर चले जाते थे| बाहर से भी पिताजी धमका कर भगा देते थे, तो फिर हम दादा जी के पास चले जाते थे” जगमोहन ने एक भीतरी कक्ष की तरफ इशारा करके कहा| बड़ी बड़ी झाड़ियों में जगमोहन  यूँ ही सरलता से घुसा चला जा रहा था|

परितोष भी जैसे उस समय में ही पहुँच गया था| उसे भी इस बात का अनुमान ही नहीं था की यहाँ कितनी बड़ी झाड़ियाँ हैं| वो अपने और जगमोहन के लिए झाड़ियाँ में से रास्ता बनाने का प्रयास जरुर कर रहा था|

फिर जगमोहन अन्दर आ गया आंगन में उसके बाद वो एक कमरे में गया| उस कमरे में एक लकड़ी का तख़्त पड़ा हुआ था| जो आज भी यूँ ही था|

अन्दर पक्का निर्माण होने के कारण झाडिया तो नहीं उगी थीं लेकिन मकड़ी के जालों से और धुल और कुछ जंगली बेलों से भरा था वो कमरा| उस घर में कदम रखने से भी सब डरते थे इसलिए उस घर का सामान भी किसी ने नहीं छेड़ा था| वहाँ बस प्रकृति का वास था पूरी तरह से|

उस कमरे के भीतर एक और कमरा था| जगमोहन ने उस कमरे में प्रवेश किया| परितोष ने देखा कि दो सेना के जवान डरते डरते भीतरी आंगन में आकर खड़े हो गए थे|

इस भीतरी कक्ष में अँधेरा था इसलिए परितोष ने मोबाइल टॉर्च जला ली थी रौशनी के लिए| कमरे के बिलकुल मध्य में एक पक्का ऊँचा आधार बना कर एक भण्डारण कक्ष बनाया हुआ था| पुराने मकानों में इसे बनाया जाता था जो कच्चा मिटटी का भी होता था, जिसे सामान्य रूप से अनाज भण्डारण के हेतु उपयोग करते थे|

जगमोहन  उसके आधार के पीछे की तरफ गया और आधार में ही बनी एक खोह को देखने लगा| अँधेरा था तो परितोष ने मोबाइल से टौर्च जला ली थी| जगमोहन ने उस खोह में घुसने का प्रयास किया लेकिन घुस नहीं पाया| जगमोहन  बाहरी कक्ष में आ गया| शायद वो अब थक गया था इसलिए गर्द और मकड़ी के जालो से भरी दिवार से ही टेक लगाकर खड़ा हो गया|

जगमोहन कुछ देर अपने में ही गुम रहा और फिर बोलना शुरू किया| “बहुत खुश थे हम यहाँ पर, अच्छा व्यवसाय था तेरे दादा का| लोगो में रसूख भी अच्छा था| यहाँ के मदरसों और मस्जिदों में सबसे ज्यादा दान तेरे दादा ही करते थे| मैं पुरे दिन मोनिस, अल्लामा के साथ खेलता था|

मोनिस का बाप असलाम और अल्लामा का बड़ा भाई मुश्ताक तेरे दादा के यहाँ ही नौकरी करते थे| असलाम को हम भाई बहन ताया बुलाते थे| जब विभाजन के बाद दंगे शुरू हुए तो तेरे दादा ने यहाँ से जाने का निर्णय कर लिया था| बुआ से भी बात हो गयी थी|

लेकिन शायद देर कर दी थी पिताजी ने| हमें पाठशाला भेजना बंद कर दिया था| माहोल बदल चूका था एकदम से| उस दोपहर के समय ही पिताजी भी खाना खाकर भीतर ही आराम करने आ गए थे|”

जगमोहन को एक सिहरन सी महसूस हुई और उसका बदन हल्का सा कंप-कपां गया| जगमोहन के शारीर की इस हलचल को परितोष ने भी अनुभव किया| वो जगमोहन से बोला “पापा आप ठीक तो हो ना, चले क्या?”

आप पढ़ रहें हैं सतीश भरद्वाज की लिखी  ” Hindi Kahani | घरु “

जगमोहन ने ध्यान नहीं दिया और फिर बोलना शुरू किया “मैं दादा जी के साथ इस कमरे में था| तभी शोर शराबा हुआ, कुछ जाने पहचाने नारे भी लग रहे थे “अल्लह हु अकबर” के| मुझे इन नारों से डर नहीं लगता था| जामपुर और आसपास के कई गाँव और कस्बो की मस्जिदें तेरे दादा और परदादा के पैसो से ही बनी थीं|

मौलवी कहा करते थे “आस पास जहाँ भी रोज मुक़द्दस अजान होती है या बच्चे तालीम लेतें हैं तो आपको जरुर दुआ देते हैं| आपको खुदा यूँ ही सलामत रखे| आप नजीर हो इंसानियत की शाह जी|”

जगमोहन फिर मौन में खो गया| अब तक वो दोनों सिपाही भी पास आ गए थे और बहर खड़े बाकी दोनों सिपाही और कर्मचारी भी भीतर आ गए थे| वो सब भी अत्यंत उत्सुकता से जगमोहन को सुन रहे थे| जगमोहन परितोष से हिंदी में ही बात किया करता था|

जगमोहन ने मौन को तोड़ते हुए बोलना शुरू किया “शाह जी ही कहते थे तेरे दादा को यहाँ लोग| बहार जोर जोर से नारों की आवाज़ सुनकर बाकी सब घरवाले कुछ परेशान हो गए थे| पिताजी कमरे से निकले और बहार आंगन में जाने को ही थे कि तुरंत तेज धमाका हुआ|

किसी ने पिताजी को गोली मार दी| घर में चीख पुकार मच गयी थी| मेरे दादा जी बाहर की तरफ भागे| वो भीड़ “अल्लहा हु अकबर” के नारे लगाते हुए तुरंत अन्दर घुस गयी थी| मैंने अपनी आँखों से देखा कि उस भड़ी में सबसे आगे असलाम और मुश्ताक थे|

जिन्हें मेरे दादा-दादी इदी दिया करते थे| चेटीचंड का हलवा खिलाया करते थे| मुश्ताक ने तलवार से मेरे दादा की गर्दन काट डाली, भीड़ ने दादी को भी मार दिया| तेरे चाचा के जो आठ बरस का था उसके नाज़ुक से शरीर को तलवार बल्लमों से चिर कर उसके ऊपर को ही भीद गुजर गयी|

मुश्ताक ने तेरी बुआ जो 14 वर्ष की नहीं थी थी उसे यहीं आंगन में पकड़ कर भीड़ से कहा ये है हमारा इनाम इन काफिरों की औरतें| इन्हें नहीं मारेंगे| भीड़ में से ही एक ने मेरी माँ को पकड रखा था| ये वो था जिसे कुछ दिन पहले पिताजी ने उसके बेटे के इलाज के लिए पैसे दिए थे| मैं कमरे में छुपा सब देख रहा था|”

जगमोहन को एक हिचकी आ गयी थी| परितोष जिसकी आँखों से अब आंसू बिना रुके बह रहे थे उसने कहा “चलो चलते हैं पापा”

जगमोहन ने हाथ के इशारे से मना किया और फिर बोलना शुरू किया “मेरी आँखों के सामने उस भीड़ ने इस आंगन में मेरी बहन और मेरी माँ का…”

आप पढ़ रहें हैं सतीश भरद्वाज की लिखी  “घरु | Hindi Stories”

इतना कहकर ही जगमोहन ने लम्बी सांस ली और फिर बोला “जो मेरी माँ को काकी ताई बुलाते थे आज वो वहसीयों की तरह उसे नोच रहें थे| मेरी छोटी सी मासूम बहन जिनको चाचा ताऊ कहती थी वो उसे नोच रहे थे|

मुश्ताक ने कहा कि इसे मैंने ही अपनी गोद में जवान किया है तो सबसे पहला हक मेरा| मेरी बहन और माँ उस भीड़ के लिए इनाम थी अल्लहा का और हम सजा भुगत रहे थे हिन्दू होने की|

तेरी दादी और बुआ को तलवार या बन्दुक से क़त्ल नहीं किया गया था बल्कि उन्हें तो इतनी भीड़ ने नोचा के वो मर गयी| तेरी 13 साल की बुआ और दादी में हिस्सा बांटने को पूरा क़स्बा खड़ा था| भीड़ उन दोनों के मर जाने के बाद भी उनकी लाशों को नोचती रही|

मेरी बहन चीख रही थी| सबसे उसका कोई न कोई रिश्ता था, कभी कहती भाई छोड़ो कभी कहती ताया जी दर्द हो रहा है| उस बेचारी को तो बस दर्द का ही एहसास हो रहा था| उसे क्या पता था कि उसके साथ ये सब अल्लहा की हुकूमत कायम करने को किया जा रहा है|

फिर उसकी चीखे बंद हो गयीं थी| मेरी माँ गिडगिडा रही थी भीड़ के सामने “वो बोल रही थी कि जो करना है मेरे साथ कर लो ये बच्ची है इसे छोड़ दो| वो सबको पुराने रिश्ते याद दिला रही थी| लेकिन उस भीड़ पर तो एक मजहबी जूनून सवार था| ये सब हो रहा था और भीड़ “अल्लहा हु अकबर” के नारे लगा रही थी|

मैं ये देखकर पत्थर हो गया था| शैतानो और भूतों की कहानिया कभी कभी दादा जी सुनाया करते थे| लेकिन उन किस्सों के शैतान भी इतने डरवाने नहीं थे जितनी वो भड़ी थी….वो इंसानों की भीड़|  मुझसे जब नहीं देखा गया तो मैं अन्दर जाकर कोठी के नीचे उस खोह में छुप गया|

भीड़ को उनका इनाम मिल गया था| किसी का ध्यान ही नहीं गया मेरी तरफ| वो जितना लूट सकते थे लुटा और फिर बाहर आग लगा दी थी| मुझे नहीं पता मैं कितने दिन अन्दर छुपा रहा,…..मुझे रौशनी और आदमजात से भी से डर लगने लगा था|

अँधेरे में बाहर आता और फिर छुप जाता, जो खाने पिने को मिलता घर में खा लेता| उस दिन के बाद मैंने मेरे परिवार के मुर्दों को भी नहीं देखा| क्योंकि मैं रौशनी में बाहर निकलता ही नहीं था| बस एक तीखी बदबू मुर्दा शरीर की नांक में घुस जाती थी|”

कुछ देर चुप रहने के बाद जगमोहन ने फिर बोलना शुरू किया “एक रात मैं यहाँ से बाहर निकला और चलता चला गया| दिन में छुप जाता रात में चल पड़ता| फिर मुझे एक जगह भीड़ दिखाई दी, वो शरणार्थियों का शिविर था| वहाँ से मुझे भारत भेज दिया| मुझे फूफा बुआ का पता मालूम था तो उनके पास पहुँच दिया गया|”

फिर जगमोहन बाहर आंगन की तरफ चल दिया| अब परितोष ही नहीं उन पाकिस्तानियों की आँख से पानी बह रहा था| जगमोहन ने एक कोने की तरफ ऊँगली करके कहा “देख यहाँ चूल्हा था हमारा, हम भाई बहन यहीं पास बैठकर गर्म गर्म खाते थे|”

एक कमरे की तरफ ऊँगली करके जगमोहन बोला “यहाँ हमारी चक्की थी जिसे माँ या दादी चलाती थी”

जगमोहन पुरे आंगन में घूम रहा था और अब अपनी ही धुन में बोल रहा था “ माँ सुम्मो बहन डूबीरो जाई, इनानु हलवा खुवा?” (माँ सुम्मो बहन दुबली हो रही है इसे हलवा खिला) फिर जगमोहन ठेठ सिन्धी में कुछ बोलने लगा जो परितोष के भी समझ नहीं आया| बस वो सुन रहा था कभी दादा कभी दादी, कभी पिता जी तो कभी चाचा लालराम का नाम| जगमोहन की शारीरिक भावभंगिमा एकदम से एक 13 वर्ष के बच्चे जैसी हो गयीं थी|

आप पढ़ रहें हैं सतीश भरद्वाज की लिखी  ” घरु | Hindi Stories “

फिर जगमोहन उस कमरे में चला गया, परितोष उसके पीछे चल रहा था| जगमोहन का पैर किसी चीज़ से टकराया उसने उसे उठाया तो वो टुटा हुआ हुक्का था| जगमोहन ने उसे अपनी छाती से यूँ लगा लिया जैसे कोई माँ अपने नवजात बच्चे को बाहों में भर लेती है|

जगमोहन उस लकड़ी के तख़्त के पास पहुंचा और एक छोटे बच्चे की तरह बोला “दादा नींड आइ, तमारी गोदी मा आवी जाऊं”(दादा नींद आ रही है, तुम्हारी गोद में आ जाऊं)

इतना कहने के बाद जगमोहन एक बच्चे की तरह उस वर्षो की गर्द और गंदगी जमे तख़्त पर लेट गया| वो कुछ ऐसे लेटा था जैसे कोई छोटा बच्चा अपने दादा की गोद में खिलंदरी करके लेट जाता है|

परितोष रोकना तो चाहता था अपने पिता जगमोहन को उस धुल और गंदगी भरे तख़्त पर लेटने से लेकिन रोक नहीं पाया| वो देख रहा था आज अपने पिता के रूप में उस 14 साल के जगमोहन को खलेते हुए| जगमोहन  तख़्त पर लेटकर एकदम शांत हो गया था| परितोष ने कुछ देर तक चुप खड़ा रहा फिर उसने जगमोहन को आवाज दी “पप्पा …. पप्पा”

जगमोहन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी| परितोष ने जगमोहन का कन्धा पकड़ कर उसे हिलाया तो वो एक तरफ को निढाल होकर लेट गया और उसका हाथ तख़्त से नीचे लटक गया| परितोष घबरा गया और जोर से जगमोहन को हिलाकर बोला “पप्पा”

एक पाकिस्तानी फौजी ने पास आकर जगमोहन को देखा और परितोष से बोला “सर अब ये नहीं उठेंगे, ये अब अपने परिवार के साथ हैं……. पाक परवर दिगार की उस दुनियां में जहाँ कोई भी मजहबी शैतान इनकी खुशियों को आग नहीं लगा पायेगा”

परितोष ने टोर्च की रौशनी जगमोहन के चेहेरे पर डाली तो उस बूढ़े जगमोहन के झुर्रियों से भरे चेहेरे में जामनगर के उस बच्चे जगमोहन की झलक दिख रही थी|

 ” घरु | Hindi Stories “

लेखक-सतीश भारद्वाज (Satish Bhardwaj)

पढ़ें सतिश भारद्वाज की लिखी कहानी “भतेरी” 

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Moral Story in Hindi | नज़रिया-कहानी दो दोस्तों की

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए दो दोस्तों की एक ऐसी कहानी “Moral Story in Hindi | नज़रिया-कहानी दो दोस्तों की” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आपको इन्सान की सोचा और उसके लक्ष्य के प्रति नज़रिए को समझने का मौका मिलेगा|


Moral Story in Hindi | नज़रिया-कहानी दो दोस्तों की

यह कहानी है उन दो दोस्तों की जिन्होंने एक साथ अपने करियर (Career) की शुरुआत की लेकिन 10 साल बाद दोनों अलग-अलग मुकाम पर पहुंचे|

एक गाँव में दो दोस्त रामलाल और श्यामलाल रहते थे| दोनों पढ़े लिखे ना होने के कारण अभी तक बेरोजगार थे| उनका गाँव गंगा नदी से पञ्च किलोमीटर दूर था|

गाँव के नदी से दूर रहने के कारण गाँव में पानी की कमी थी, लिहाज़ा दोनों ने नदी से पानी ला कर गाँव में बेचने की योजना बनाई| अगली सुबह दोनों बड़े-बड़े बर्तन ले कर नदी की और निकल गए और गाँव में आकर पानी बेचने लगे|

गाँव में कुछ साहूकार थे जिन्होंने रोज़ पानी के बदले दोनों को अच्छा पैसा देना शुरू कर दिया| अब रामलाल और श्यामलाल दोनों रोज़ सुबह-सुबह नदी से पानी लाते और गाँव के चौराहे पर खड़े होकर बेच देते|

रामलाल और श्यामलाल दोनों की ज़िन्दगी अब अच्छी काटने लगी| रामलाल और उसका परिवार बहुत खुश था लेकिन श्यामलाल खुद का कोई व्यवसाय करना चाहता था| लिहाज़ा श्यामलाल ने कुछ अलग करने के मन से पैसे जोड़ना शुरू कर दिए|

2 साल बाद श्यामलाल ने अपने जोड़े हुए पैसो से गंगा नदी से उसके गाँव तक एक पाइपलाइन का निर्माण करवा दिया और पाइपलाइन से एक नल जोड़कर चौराहे पर लगा दिया| अब श्यामलाल को रोज़ सुबह नदी तक बर्तन लेकर नहीं जाना पड़ता|

रोज़ सुबह वह चौराहे पर खड़ा होकर नल चलाता और ढेर सारा पैसा कमाता| लेकिन श्यामलाल अभी भी रोज़ नदी से ही पानी भरकर लाता और गाँव में बेचता|

नज़रिया-कहानी दो दोस्तों की

अगले पांच सालों तक रामलाल ने आसपास के सभी गाँवो में एक-एक पाइपलाइन लगा दी और हर नल पर एक व्यक्ति को नियुक्त कर दिया| अब रामलाल अपने घर पर परिवार के साथ समय बिताता था लेकिन श्यामलाल अभी भी नदी से सुबह-सुबह पानी भर कर लाता|

समय के साथ दोनों के शरीर ने जवाब देना शुरू कर दिया| अब रामलाल के पास पैसों की तंगी आने लगी लेकिन वहीँ श्यामलाल ने एक ऐसा सिस्टम बना दिया था की अब उसे घर बेठे आमदनी हो रही थी|

कहानी का तर्क यह है की रामलाल और श्यामलाल दोनों एक एक साथ एक ही काम को शुरू किया था लेकिन श्यामलाल के काम को करने और देखने का नज़रिया अलग था| इसीलिए आज श्यामलाल ज़िन्दगी के आखरी पड़ाव में भी खुश था|

नज़रिया-कहानी दो दोस्तों की | Moral Story in hindi

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सफलता का राज़-Secret to Success-Moral Story in Hindi

सफलता का राज़-Moral Story in Hindi

सफलता का राज़-Moral Story in Hindi


बहुत से लोगों का मानना है की सफलता (Success) रातों-रात मिल जाती है, लेकिन सफलता का राज़ (Secret to Success ) कुछ और ही है! पेश है, इसी को परिभाषित करती एक छोटी से शिक्षाप्रद कहानी (Moral Story)….


एक बार एक लड़का गर्मी की छुट्टियाँ बिताने अपने दादाजी के पास गाँव आया| एक दिन जब वह अपने दादाजी के साथ बता था तो उसने अपने दादाजी से एक सवाल पूछा, कि  “सफलता का राज़ (Secret to Success) क्या है…

इस पर दादाजी ने उसे पास ही की एक नर्सरी (Nursery) में जाकर वहां से दो पौधे खरीद लाने को कहा| उन्होंने एक पौधा घर के अन्दर और एक पौधा घर के बाहर लगाने को कहा| उस लड़के ने ऐसा ही किया| बाद में दादाजी ने अपने पोते से पूछा “तुम्हे क्या लगता है, इन पौधों में से सबसे अधिक सफल (Success) कौन होगा| लड़के ने जवाब दिया,  कि घर के अन्दर जो पौधा लगाया है वो ज्यादा सफल  होगा क्यों की वो प्राकृतिक खतरों से बचा रहेगा जबकि बाहर जो पौधा लगाया गया है उसको काफी चीजों से खतरा है| दादाजी अपने पौते की बात सुनकर मुस्कुरा दिए| कुछ दिनों बाद लड़का वापस शहर चला गया|

कुछ साल बाद जब वह लड़का वापस दादाजी से मिलने अपने गाँव आया तो उसने अपने दादाजी से पौधों के बारे में पूछा| दादाजी ने उसे घर के अन्दर लगाया गया पौधा दिखाया, वह पौधा अब एक बहुत बड़ा पौधा बन चूका था| लड़के ने अपने दादाजी की और देखते हुए कहा “मैंने  कहा था ना, कि यही पौधा ज्यादा सफल होगा| वैसे बहार वाले पौधे का क्या हुआ ?

दादाजी उसे बहार लेकर आए तो लड़का हैरान रह गया| बहार वाला पौधा अब एक विशाल पेड़ (Tree) का रूप ले चूका

Secret to Success

था| उसने दादाजी से पूछा कि यह कैसे संभव (Possible) है की बाहर वाला पौधा एक बड़ा पेड़ बना गया और अन्दर वाला पौधा उतना विकसित नहीं हो पाया जबकी अन्दर वाला पौधा प्राकृतिक खतरों से सुरक्षित था| दादाजी ने उसे बताया की “जीवन में खतरों से झूझकर ही सफलता हासिल होती है, सफलता का राज़ (Secret to Success ) यही है”

कहानी का तर्क यही है….कि मुश्किलों का सामना करने वालों को ही सफलता मिलती है! इसीलिए कहा गया है!
लहरों से डरकर नदियाँ पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती||

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और पढ़े:-आम का पेड़-Moral Story in Hindi

 

Moral Story | बचपन की कहानी आम का पेड़

हम जब बचपन (Bachpan) में स्कूल (School) में पढ़ा करते थे..तो अक्सर हमारी निगाहें एक कहानी (Story) पर आकर रुक जाती थी। “आम के पेड़ वाली कहानी”…जी हाँ, हम उसी कहानी (Moral Story) की बात कर रहें हें जिसमे एक आम का पेड़ एक बच्चे को जीवन भर कुछ ना कुछ देता रहता है, लेकिन बड़े होने के बाद भी उस पेड़ के त्याग को कोई समझ नहीं पता…

जनाब, अगर अब भी वो कहानी आपको याद  नहीं आई तो लीजिये पढ़ लीजिये और अपने बचपन की यादों (Childhood Memory) को तरोताजा रखिये…..


Moral Story | बचपन की कहानी आम का पेड़

एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था। जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता। पेड के उपर चढ़ता, आम खाता, खेलता और थक जाने पर उसी पेड़ की छांव  मे सो जाता।

धीरे-धीरे उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया. “दोस्ती का रिश्ता “। बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया, वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया और कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया।

आम का पेड अपने उस छोटे से दोस्त (Friend) को याद करके अकेला रोता।

एक दिन अचानक पेड ने अपने उस दोस्त को अपनी तरफ आते देखा। पेड़ को लगा अब फिर वही पुराने दिन लौट आएँगे, पेड़ ने उस लड़के के पास आने पर कहा, “तू कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।”

बच्चे ने आम के पेड से कहा,
“अब मेरी खेलने की उम्र नही है। मुझे पढना है, लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।”

पेड ने कहा,
“तू मेरे आम (Mengo) लेकर बाजार मे बेच दे और इससे जो पैसे मिले उससे अपनी फीस भर देना।”

उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया।

उसके बाद वह फिर कभी दिखाई नही दिया। आम का पेड उसकी राह देखता रहता।

एक दिन वो फिर आया और कहने लगा,
“अब मुझे नौकरी मिल गई है, मेरी शादी हो चुकी है, मुझे मेरा अपना घर बनाना है, लेकिन उसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।”

आम के पेड ने कहा,
“तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा और उससे अपना घर बना ले।” उस जवान ने पेड की सभी डालियाँ काट ली और ले के चला गया।

आम के पेड के पास अब कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था। कोई उसे देखता भी नहीं था। पेड ने भी अब यह उम्मीद छोड दी थी, कि उसका वो दोस्त जो उसके साथ बचपन में खेला करता था उसके पास फिर आयेगा।

फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बुढा आदमी आया। उसने आम के पेड से कहा,
“शायद आपने मुझे नही पहचाना, मैं वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।”

आम का पेड़-Moral Story

आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा,

“पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुम्हे दे सकु।”

वृद्ध ने आंखो मे आंसु लिए कहा,
“आज मै आपसे कुछ लेने नही आया हूं बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है, आपकी गोद मे सर रखकर सो जाना है।”

इतना कहकर वो आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सुखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी….

वो आम का पेड़ और कोई नही हमारे माता-पिता हैं दोस्तों। हम जब छोटे थे तो हमें उनके साथ खेलना अच्छा लगता था। लेकिन जैसे-जैसे हम बडे होते चले गये उनसे दुर होते गये। पास भी तब आये जब कोई जरूरत पडी, कोई समस्या खडी हुई।

आज कई माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है। जाकर उनसे लिपटे, उनके गले लग जाये।फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा….


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संघर्ष-Moral Story in Hindi

Short Moral Story | कोशिश

अगर आपको भी लगता है की आपकी ज़िन्दगी में सब कुछ बुरा हो रहा है, गलत हो रहा है…तो यह कहानी Short Moral Story | कोशिश आपके लिए है! यह कहानी है एक राजा की जो अपनी जनता को यह सिखाना चाहता था, कि कैसे कोशिश करने वालों की ज़िन्दगी में धीरे धीरे ही सही पर आखिरकार सब कुछ अच्छा हो ही जाता है!


Short Moral Story | कोशिश

एक बार राजा राज्य में घुमने के लिए निकला, उसने यह देखने के लिए एक बड़े से पत्थर को रास्ते के बिच में रखवा दिया की कौन इस पत्थर को उठा कर रस्ते से अलग करता है| राजा ने पत्थर को रास्ते के बिच रखवा दिया, और दूर से देखने लगा की कौन इस पत्थर को रास्ते से अलग करता है|

राजा ने देखा की काफी  लौग उस रास्ते से गुज़रे,  कुछ लोगों को पत्थर से ठोकर भी लगी लेकिन वो उस पत्थर को उठा कर रास्ते से अलग करने की बजाए, पत्थर को रास्ते के बिच रखने वालों को बुरा-भला कह कर कर आगे बड गए| किसी ने भी उस पत्थर को रास्ते से अलग नहीं किया|

तभी वहां से एक किसान गुज़रा, किसान ने देखा की एक बड़ा सा पत्थर रास्ते के बिच पड़ा है और आने जाने वाले राहगीरों को उस पत्थर से काफी परेशानी का सामना करना पड रहा है|

किसान ने बड़ी मशक्कत से उस पत्थर को उठा कर रास्ते से अलग किया, लेकिन जब वो वापस आया तो उसने देखा की जिस जगह पत्थर पड़ा था, वहां एक थैली पड़ी है|

उसने थैली को खोल कर देखा, उसमे सोने की अशर्फियाँ और एक पत्र पड़ा था| किसान ने पत्र पढ़ा, उसमे राजा ने लिखा था, कि वो देखना चाहता था की कौन इस पत्थर को उठाने की कोशिश करता है और अपने भाग्य को बदल सकता है!

दोस्तों, हमारी ज़िन्दगी में भी एक वक्त ऐसा आता है, जब एक पत्थर हमारी कामियाबी के बिच पड़ा होता है, लेकिन हम उस पत्थर को उठाने की हिम्मत नहीं कर पाते!

विधाता हर इन्सान को अपना भाग्य बदलने का एक मौका अवश्य देता है, ज़रूरत है तो बस उसे पहचान कर सही कदम उठाने की!


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संघर्ष-Moral Story in Hindi

Moral Story in Hindi | संघर्ष

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए एक ऐसी “Moral Story in Hindi | संघर्ष” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आप अपने जीवन में आने वाली परेशानियों को भूलकर अपने लक्ष्य के प्रति सजग हो जाएँगे|


Moral Story in Hindi | संघर्ष

एक बार एक मूर्तिकार (मूर्ति बनाने वाला) जंगल की और जा रहा था, मूर्तिकार ने देखा की रास्ते में एक पत्थर पड़ा हुआ है ! मूर्तिकार ने सोचा की यह पत्थर मूर्ति बनाने के लिए सबसे अच्छा है|

मूर्तिकार ने जैसे ही उस पत्थर पर मूर्ति बनाने के लिए अपना पहला प्रहार किया, पत्थर से आवाज़ आई “नहीं-नहीं मुझे मत काटो मुझे छोड़ दो, मुझ पर इन औजारों से प्रहार मत करो”| मूर्तिकार ने सोचा, चलो इस पत्थर को छोड़ देते हैं  और वो आगे बढ़ गया|

आगे मूर्तिकार को एक बड़ा सा पत्थर मिला, मूर्तिकार ने सोचा यह पत्थर मूर्ति बनाने के लिए अच्छा है, मूर्तिकार ने लगभग एक महीने की लगन और  मेंहनत से एक बड़ी ही खुबसूरत मूर्ति बनाई|

लेकिन जब वह उस मूर्ति को ले जाने लगा तो वह बहुत भारी थी, मूर्तिकार ने सोचा क्यों ना पास के गाँव से 4-5 लोगों को बुला कर लाया जाए | मूर्तिकार जब पास के गाँव में गया, तो लोगों ने

Moral Story in Hindi

संघर्ष-Moral Story

उससे एक मूर्ति बनाने का आग्रह किया | मूर्तिकार ने कहा की मूर्ति तो तैयार है, जंगल में पड़ी है| गाँव के लौग मूर्तिकार के साथ गए और मूर्ति को ससम्मान ले आए और बड़े ही धूम-धाम के साथ गाँव के मंदिर में उस मूर्ति की स्थापना की|

जब मूर्तिकार जाने लगा तो गाँव वालों ने मुतिकर से एक आग्रह और किया, की हमें मंदिर के बहार नारियल फोड़ने के लिए एक पत्थर की और ज़रूरत है|

मूर्तिकार को उस पत्थर की याद आई जिसे वो जंगल में ही छोड़ आया था, मूर्तिकार ने गाँव वालो को उस पत्थर के बारे में बताया और गाँव वालों ने उस पत्थर को नारियल फोड़ने के लिए मन्दिर के सामने रख दिया|

एक दिन उस पत्थर ने मूर्ति से पूछा की हम दोनों एक ही जंगल में थे पर फिर भी क्यों लोग तुम्हारी पूजा करते हैं और मैरा उपयोग नारियल फोड़ने के लिए करते हैं! मूर्ति ने कहा की उस दिन अगर तुम मूर्तिकार का पहला प्रहार सह लेते तो आज तुम्हारी भी यहीं पूजा हो रही होती|

Moral Story in Hindi

कहानी का तर्क यही है, की उस पत्थर की तरह ही हम भी ज़िन्दगी में कुछ बनना तो चाहते हैं लेकिन उसके लिए संघर्ष (Struggle) नहीं करते! ज़िन्दगी में सफल होने के लिए संघर्ष करना बहुत ज़रूरी है!

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