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Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी

साथियों नमस्कार, कभी कभी इन्सान कुछ ऐसे रिश्तों में फंस जाता है जहाँ उसे अपने सपने पीछे छुटते नज़र आते हैं| ऐसी ही एक कहानी “Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी” हमारी लेखिका लिपि चौहान ने हमें भेजी है, आशा है आपको हमारा यह संकलन पसंद आएगा|


Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी

आज घर में अकेली थी ,राधा काम करके जा चुकी थी ,रवि ऑफिस जा चुके थे और में सारा काम निपटा के रेडियो पर गाने सुन रही थी। सुनते-सुनते नज़र शर्मा जी की बालकनी में टंगे पिंजरे पर पड़ी जहा एक प्यारा सा मिट्ठु  था।

एक खुबसुरा बोलने वाला मिट्ठू ,  जो अब बंद पिंजरे में चुप सा हो गया था। उसकी आँखे बस आकाश को देखती हुई आज़ादी का इंतज़ार करती थी उड़ने का इंतज़ार करती थी|

मुझे उससे हमदर्दी सी होने लगी वो तो एक असहाय पंछी है पर में तो इंसांन हूँ वो पिंजरा नहीं खोल सकता पर में सारे दरवाजे खोल सकती हूँ , पर क्यों हूँ  मै आज इस मुकाम पर?

माँ-पापा की चहेती,  भाई की जान और हर एक फंक्शन की जान थी मै| मुझे आज भी याद है, कॉलेज के उस फंक्शन में मेरे डांस परफॉरमेंस के बाद वन्स मोर-वन्स मोर की आवाजे आ रही थी| सारे टीचर्स और प्रिन्सिपल सर मेरी माँ को घेर कर खड़े थे|

प्रिंसिपल  तारीफ़ करते नहीं थक रहे थे| यही नहीं में कॉलेज टापर भी थी| मेरे यही सारे गुण देख कर रवि मर मिटे थे मुझ पर और मेरा हाथ मांग लिया| घर नौकरी सब अच्छी देख कर पापा ने भी मेरी शादी कर दी|

पहला एक साल तो प्यार मोहब्बत में कुछ ऐसा गुज़रा की पता ही नहीं चला| रवि की दीवानगी थी ही कुछ ऐसी थी| लेकिन वो दीवानगी सिर्फ दीवानगी नहीं थी एक ऐसा पिंजरा जो में मेरे लिए तैयार कर रही थी| जिसमे अब मेरा दम घुटता था|

मेरी खूबसूरती कोई और देखे तो रवि बर्दाश्त नहीं कर सकते थे| कोई मेरी कोई तारीफ़ करे ये भी उन्हें अच्छा नहीं लगता था| मै ज्यादा सजु-सवरू तो ताने मिलते थे|

एक कॉम्पिटिशन में भाग लेने के लिए जब मैने रवि से पूछा तो उन्कहोंने कह दिया की मेरी बीवी बीच बाजार में नाचे मुझे पसंद नहीं| क्या मेरी कला जो पूरी दुनिया पसंद करती है वो अब बाज़ारू भी हो गई थी ?

दिन ब दिन उम्मीदे मेरा दामन छोड़ रही थी और में उन चार दीवारों में सिमटती जा रही थी|

मेरा किसी पडोसी से बात करना भी रवि को पसंद नहीं था| क्या यही प्यार था उसका जो मुझे कैद करता जा रहा था| शाम हो चुकी थी, में अपने लिए चाय बनाकर लाई और बालकनी में पी ही रही थी की घंटी बजे देखा तो रवि थे और कुछ जल्दी में थे…

पूछा तो कहने लगे की मीटिंग है और उसके बाद  पार्टी लेट हो जाऊंगा आने में|

मैंने  कहा कुछ जरुरी बात है तो कहने लगे फ़िज़ूल में परेशान न करो  जल्दी से सूट निकालो मुझे जाना है| पता नहीं मेरे अंदर कौन सी लहर दौड़ गई की मेने कहा फ़िज़ूल नहीं बहुत ज़रूरी है और आज सुनना होगा|

रवि गुस्से में मेरी तरफ देखने लगे मेने भी उनसे आँख से आँख मिला कर कहा, आज मेरी गुरु माँ का कॉल आया था| उन्होंने कहा की आगरा कत्थक फेस्टिवल में, मैं  गुरुकुल को रिप्रेजेंट करू|

यह सुनते ही रवि का कटाक्ष मेरे कानो में पड़ा| वो कुछ बोलते इससे पहले ही मैंने  कहा, पूछ नहीं रही हूँ बता रही हूँ| कल आगरा के लिए निकल जाउंगी और हां अभी मुझे टिकट्स करना है। जा रही  हूँ।

रवि ने कहा, जा रही हो तो दुबारा इस घर में मत आना| मैंने कहा घर और अलमारी की चाबियां टेबल पर रखी है आपके जरुरी पेपर उस ड्रावर में है और आपको बोलने की जरुरत नहीं मैंने घर छोड़ने का फैसला उस वक़्त ही कर लिया था जब आपने मेरी कला को बाज़ारू कहा  था| बस हिम्मत आज जुटा पाई हूँ।

घर से बहार आते ही महसूस हुआ जो ख़ुशी एक अरसे से गुम थी आज मिल गई|

Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी

लिपि चौहान


Success Story in Hindi | आत्मविश्वाश 

दिन गर्मियों के थे, हम सब सयुंक्त परिवार में रहते थे। एक दिन मेरी कॉलोनी में कुछ खूबसूरत सी लड़कियों का आना हुआ, बात करने पर पता चला कि वो मुम्बई से आई थी।

हाव-भाव, चाल-ढाल से एकदम शहरी। मैं जो कि अभी तेरह की हुई थी, उनको देखकर बहुत प्रभावित थी। आखिर बात हुई, दोस्ती हुई….फिर घूमना, बाते करना।

अक्सर मैं उनको देखकर उन जैसा बनने की कोशिश करती| समय बीतने लगा और कोशिश बढ़ गयी, पर कोई तारीफ नही बस कोशिश……पढ़ाई में होशियार थी अब जो समय पढ़ाई का था वो सुंदर दिखने और तारीफ पाने में लगने लगा।

उम्र का वो दौर, हार्मोन की उथल पुथल, सब कुछ जैसे अजीब था। एक सीधी साधी लड़की को अब उड़ना था, लेकिन किस दिशा में ,ये उसको नही पता था।समय निकलता गया, सयुंक्त परिवार और काम के कारण माँ उतना समय नही दे पाती थी, पिता सरकारी नौकरी में थे जोकि दूसरे शहर में पदस्थ थे।

लेकिन मेरे व्यवहार में अचानक आये परिवर्तन से वो भी अनभिज्ञ न थे।आखिर पापा ने पूछ ही लिया “क्या बात है तनीषा, आज कल कहा मन रहता है तुम्हारा”। मैं बोली “परीक्षा में अभी टाइम है,मैं कोर्स कवर कर लूंगी। पर मुसीबत बढ़ने वाली थी, उन लड़कियो ने ये बात भांप ली और फिर शुरू हुआ वो दौर जिसकी मैं कल्पना भी नही कर सकती थी|

उन लड़कियो ने मेरे कद ,रंग वजन और हर उस चीज़ का मज़ाक बनाया जिसको लेकर मैं संवेदनशील थी। एक अलग ही तरह का दबाव महसूस कर रही थी। मेरा खाना खाने का दिल नही करता था, खाती भी थी तो उल्टी कर देती थी।

मै उदास रहने लगी, कितनी भी कोशिश कर लूं, मैं उन लड़कियों जितनी आकर्षक नही लग पा रही थी। असर ये हुआ कि उस वर्ष मेरा परीक्षा परिणाम बहुत बुरा रहा। समय निकल रहा था। मैं अंदर से कमजोर हो गयी थी, फिर एक दिन मैंने ऐसे जीवन को खत्म करने का सोचा।

बस किशोर मन यही सोच रहा था कि जब मुझमे कोई आकर्षण ही नही तो जीवन का अर्थ क्या, दिन और समय तय किया ,और इंतज़ार करने लगी। पर इसी बीच पापा ने फ़ोन कर बुला लिया। जगह बदली, मन बदला मरने का विचार आगे बढ़ा दिया।

सोच वही ले जाती थी मैं सुंदर नही, मोटी हु। कद कम है रंग दबा हुआ। इस दबाव को झेलते हुए एक दिन अचानक ,एक अंदरूनी ऊर्जा महसूस हुई।जैसे कोई हाथ पकड़ कर मुझे इस स्थिति से निकल रहा था। मैंने खुद तय किया कि कुछ तय समय तक मैं सिर्फ सकारात्मक बाते पढूंगी और देखूंगी। मुझे अच्छा महसूस होने लगा था।

भूख बढ़ गयी , चहरा ठीक हो रहा था। थकान भी कम हो गयी। मैंने फिर एक दिन हिम्मत करके वहां के बच्चो से दोस्ती की और शाम को रोज़ बेडमिंटन खेलने जाने लगी।सब कुछ जैसे सही हो गया था। नए दोस्त , नया माहौल सब अच्छा था । फिर वापस जाने का समय आया।घबराहट , डर के कारण हालात खराब थी, पर जाना तो था।

अगले दिन वापस आ गए। उन लड़कियों का ग्रुप सामने से जा रहा था हंसता हुआ, पर मैं स्थिर खड़ी देख रही थी न कोई डर ,न दबाव। अपने अस्तित्व का पहला अनुभव उसी दिन हुआ था मूझे और उस किशोरी के लिए ये जीवन की अमूल्य सीख थी। आज ,इतने साल बीत गए ,लड़खड़ाई , बोहोत उत्तर चढ़ाव देखे पर उस दिन हिम्मत के जो पंख मिले, उनने मुझे कभी गिरने नही दिया। ——–

यामिनी

Motivational Story in Hindi for Success


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Comedy Story in Hindi | बुन्दू ताऊ

Comedy Story in Hindi | बुन्दू ताऊ

साथियों नमस्कार, आज के इस अंक में हम आपके लिए “Comedy Story in Hindi | बुन्दू ताऊ” लेकर आएं हैं| यह कहानी हास्यास्पद होने के साथ-साथ एक खास शिक्षा भी देती है की जीवन में किसी भी परिस्थिथि में हमें अपने संयम और दिमाग से काम लेना चाहिए| आशा है आपको हमारी यह कहानी ज़रूर पसंद आएगी…


Comedy Story in Hindi | बुन्दू ताऊ

बुन्दू ताऊ जीवन के 65 वर्ष बिता चुके थे| अब सब उन्हें “बुन्दू ताऊ” ही कहते थे| कोई नहीं था जो ये बताये कि पुरोहित ने उनका क्या नाम सुझाया था और कैसे अपभ्रंश बुन्दू की उत्पत्ति हुई|

बुन्दू ताऊ के पास बहुत से किस्से थे अपनी उपलब्धियों के, लेकिन ताई हमेशा कहती थी “उत्ते नै कुछ ना करा चिलम फूंकने अर सराप पिने सै सिवा, यो तो मै ही….. होर कोई होत्ती तो चली जात्ती छोड़ कै”|

बुन्दू ताऊ कभी स्कुल तो गए नहीं थे| पिता ने दो तीन वर्ष अथक प्रयास किये गाँव की पाठशाला में पढ़ाने के| लेकिन आखिर बुन्दू के बाल-अवतार ने सिद्ध कर दिया कि शिक्षा जैसी भोतिक अकांक्षाओ से परे हैं वों| यौवन के 15 वें वर्ष की देहलीज पर आते ही बुन्दू कुछ महान संतों के सानिध्य में आकर चिलम फूंकने में माहिर हो गए थे|

बाकी अफीम, गान्झा पर भी पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लिया था| जवानी का 20 वाँ साल आते आते तो बुन्दू चिलम फूंकने की विधा में इतने पारंगत हो चुके थे कि पहले ही दम में अपनी प्रतिभा का यशोगान करती हुयी ऊँची अग्नि की लुक चिलम से उठा देते थे| काफी नाम कमा लिया था बुन्दू ने|

बुन्दू की प्रतिभा यहीं तक नहीं रुकी वो एक सम्मानित शराबी भी थे| इकलोता उदाहरण थे बुन्दू जिनका शराबियों की महफ़िल और भंगेडियों की टोली में बराबर सम्मान था| बुन्दू की प्रतिभा इतनी ही नहीं थी, वो घर में ही कनस्तर के भपारे से शराब निकालने में माहिर थे और बुन्दू के हाथ का उतरा सुल्फा भी ख़ास स्थान रखता था|

लेकिन ये सब बुन्दू करते अपने लिए ही थे|बुन्दू को अपनी प्रतिभा पर बिलकुल अभिमान नहीं था| चिलम में लम्बा कश तब तक खींच कर जब तक की चिलम की अग्नि की ज्वाला ऊँचे उठकर बुन्दू की शक्ति को नमन ना करे फिर अपनी चढ़ी आँखों को झपझपा कर बुन्दू बोलते थे “मैं क्या हूँ सब बाबा भोले नाथ का प्रताप है”|

सामान्यतया भांग फूंकने वाले शराब नहीं पीते और शराबी भांग नहीं पीते| लेकिन बुन्दू ताऊ इस मामले में अपवाद थे, दोनों ही दैवीय पदार्थो का शेवन बराबर करते थे| और इसके पीछे बुन्दू ताऊ का एक गूढ़ दर्शन भी था|

वो कहते थे “भाईईईईईई शराब यादमी के भित्तर जोश बढ़ा…. अर भांग मन कु शांति दे| तो दोन्नो कु बराबर लो, कोई सिमस्या ई ना हो| इब ये सराप्पी पियों जा…. अर फेर भिड़ते फिरो जां| जोश कु होश की जुरुत हो, तो सराब तै जोश आ अर सुल्फा दिमाग कु होश मै रक्खै”

वैसे बुन्दू ताऊ का आचरण उनके इस गूढ़ दर्शन को प्रमाणित भी करता था| बुन्दू अपने ही भपारे की निकली कच्ची पीने के बाद साक्षात् काल का अवतार बन जाते थे| उस समय वो चीन से अत्यंत क्रुद्ध होते थे| आखिर हो भी क्यों ना, चीन ने उनके अराध्य शिव के वास स्थान पर जो अतिक्रमण कर रखा था|

वो बस तुरंत चीन पर आक्रमण के लिए उद्यत हो उठते थे| वो तो भला हो उन समझदार शराबियों का जो उनके साथ होते थे और उन्हें संभाल लेते थे अन्यथा चीन कभी का मानचित्र से गायब हो गया होता| विश्व में किसी को नहीं पता था कि इन महान शराबियों के कारण विश्व तृतीय विश्वयुद्ध की विभीषिका से बचा हुआ था|

लेकिन जब वो भांग फूंक लेते थे तो बेहद शालीन होते थे| यदि उनसे कैलाश पर्वत पर आततायी चीन के अतिक्रमण की बात की भी जाती थी तो वो बोलते थे “पापकरम हैं भाई म्हारे, आग्गै तो आवेंगे| चीन की के औकात….. यो तो बाब्बा कु ई ना रहना हा म्हारे गैल| रै नूं बी कहं कि यु तो नशा करै इस्तै दूर रओ, रै बावलो यो तो आशीर्वाद है बाब्बा का”

बुन्दू ताऊ के पास किस्सों की कोई कमी नहीं थी| वो अपने किस्सों में महानायक होते थे| जब उनकी महफ़िल जमती तो वो बताते “सुभास चन्न बोस मझै छोट्टा भाई मान्नै हे” फिर वो बताते थे कि सुभाष चन्द्र बोस हादसे में नहीं मरे थे और उनके बराबर संपर्क में रहे थे| जब नेता जी हिमालय पर गए तो बुन्दू ताऊ उनके साथ गए थे|

आप पढ़ रहें हैं Comedy Story in Hindi | बुन्दू ताऊ

यूँ ही कभी वो बताते “कह्त्तर मै पकिस्तान के गैल जिब जंग छिड़ी ही तो मैई हा जिन्नै तगड़ी जसुस्सी करी ही” ऐसा कोई भी किस्सा बताते समय बुन्दू ताऊ फुफुसाकर बोलते थे| ऐसे संवेदनशील मुद्दों की गोपनीयता का ध्यान वो हमेशा रखते थे| उनके चेले विस्मृत हो जाते थे, अब ये कहा नहीं जा सकता कि ये प्रभाव किस्सागोई का था या उस बूटी का जो वो चिलम में खींच रहे होते थे|

अपने चेलो के विस्मृत चेहेरो को देखकर बुन्दू ताऊ एक बुलंदियों भरा कश चिलम में खींचते और उद्दघोष करते “जय हो पहाड़ वाले बब्बा की”| येउद्दघोष उनकी विजय के आत्मबोध को दर्शाता था|

घर की खेती बाड़ी अच्छी थी तो कभी कोई आर्थिक समस्या नहीं हुई| अब बच्चे भी सब अपने कामों में ठीक लगे हुए थे| घर में घी दूध की कोई कमी नहीं थी तो सेहत आज भी बढ़िया थी| जब उनके भांग और शराब पीने और उसकी दर का पता किसी डॉक्टर को भी लगता था तो वो आश्चर्यचकित हो जाता था| क्योंकि किसी सामान्य आदमी का स्वास्थ्य भी इतना बढ़िया नहीं था जितना इस उम्र में बुन्दू ताऊ का|

चलिए अब आतें हैं बुन्दू ताऊ के जीवन की एक रोचक घटना पर| किसान आन्दोलन चरम पर थाऔर लखनऊ में किसानो की बड़ी रैली थी| बुन्दू ताऊ भी अकेले ही रैली के लिए निकल लिए| धरना समाप्त करके बुन्दू ताऊ कुछ दिन और लखनऊ में ही रुके| वापसी में बुन्दू ने गाज़ियाबाद की रेल पकड़ ली| वहाँ से शामली अपने निवास स्थान  निकलना था|

ताऊ खिड़की के साथ ही सुखासन लगाए बैठे थे| तभी एक लड़का जो उम्र में 25 वर्ष का होगा पूरे डिब्बे का अवलोकन करते हुए ताऊ के बराबर में ही आकर फंस गया| बुन्दू ताऊ अपने मस्त-मलंग स्वभाव के कारण दुनिया घुमा था और हर तरह के लोगो के सानिध्य में रहा था तो ताऊ को समझते देर नही लगी कि ये लड़का कोई ठग है|

ताऊ अपनी टारजन की बीड़ी में मस्त थे| तभी उस लड़के ने भी एक बीड़ी मांग ली| बीड़ी, हुक्का और भांग भले ही व्यसनों के दायरे में आतें हों लेकिन ये वो माध्यम हैं जो रंग, धन, जाति, संप्रदाय और क्षेत्र के भेद को अलोप कर देते हैं| बिना किसी की जात, स्तर और परिचय जाने लोग आपस में एक ही बीड़ी साझा कर लेते हैं|

बुन्दू ताऊ ने भी उस लड़के को बीड़ी दे दी और दोनों दम खींचने लगे| ये सामान्य श्रेणी का डिब्बा था और अब भीड़ भी बढ़चुकी थी| सामान्य श्रेणी में कोई धुम्रपान पर टोका टाकी नही करता| जिसको भी तलब हो रही थी वो अपनी तलब मिटा रहा था|

तभी लड़के ने झल्लाते हुए कहा “ताऊ या मै रस ना आरो”

बुन्दू ताऊ को ये अपने टारजन ब्रांड का अपमान लगा और बुन्दू ताऊ ने तुनक कर बोला “भाई तै ई मांगी ही… मै तो नोत्ता दिया ना हा बीड़ी पिन कू”

वो लड़का खींसे निपोर कर बोला “ताऊ जी बीड़ी तो बढ़िया है पर हम तो लम्बे खिलाडी हैं| बीड़ी सु कहाँ चैन मिलेगी कालजे कु”

फिर उस लड़के ने अपनी पतलून की जेब में से एक पोटली नीकाली और भांग की सिगरेट तैयार करके उसमें कश खींचने शुरू कर दिए| दो कश खींचने के बाद लड़के ने बुन्दू ताऊ को भी आमंत्रण दिया|

बुन्दू ताऊ ने एकदम नए खिलाड़ी की तरह उत्सुकता दिखाते हुए दो हलके दम मार लिए| लड़के को ख़ुशी हुई और लगा कि शिकार फंस गया अब तो| अब पता नहीं कौन किसका शिकार करने वाला था| एक तरफ लम्बे अनुभव के साथ देहात का देशज बुजुर्ग तो एक तरफ अय्यारी में पारंगत ठग|

आप पढ़ रहें हैं Comedy Story in Hindi | बुन्दू ताऊ

भांग की सिगरेट का वो क्रम आगे बढ़ चला| अब तक दोनों आधा दर्जन सिगरेट पी चुके थे| बुन्दू ताऊ एकदम सिखदड की तरह दम लगाये जा रहा था| हर सिगरेट के साथ बुन्दू ताऊ की चढ़ी आँखे देखकर ठग को लगता था कि अबकी सिगरेट में तो बुड्ढा चित्त हो ही जाएगा|

लेकिन बुन्दू ताऊ दम खींचे ही जा रहा था| उस लड़के के पेशेवर जीवन में पहली बार कोई मिला था जो इतनी भंग की सिगरेट खींच गया था और अभी भी सुध में ही था| अब तो उस लड़के को भी नशा होने लगा था|

ठग ने देखा की ताऊ की आँखे चढ़ गयी थी तो उसने अंतिम आशा में बची हुई दो-तीन सिगरेट भी दाँव पर लगा दी| ताऊ की चढ़ी आँखे देखकर ठग को उम्म्मीद थी कि ताऊ एक नहीं तो दो सिगरेट में चित्त हो जायेगा| दो के बाद ठग ने आखरी बची सिगरेट भी दाँव पर लगा ही दी| लेकिन बुन्दू ताऊ की आँख चढ़ी हुई थी पर सुध में अभी भी था|

अब ठग का समस्त शस्त्र भण्डार समाप्त हो चूका था तो वो ठग चुप होकर बैठ गया| ताऊ ने इशारे से और सिगरेट की मांग की लड़के ने हाथ हिला कर सिगरेट ख़तम होने का इशारा किया|

बुन्दू ताऊ ने एक मोहक मुस्कान के साथ कहा “रै तो फिकर किस बात की भाई, यो बुन्दू ताऊ अखिर किस मरज की दवा…”|

फिर बुन्दू ताऊ ने अपना जखीरा निकाल लिया और एक टार्जन की बीड़ी निकाल कर अपने हाथ का उतरा विशेष सुल्फा बड़े ही करीने से माचिस की तिल्ली से तपा कर तम्बाकू में मिश्रित करके बीड़ी भर कर तैयार कर ली| बाबा भोले नाथ को धन्यवाद करते हुए सुलगा कर एक हल्का कश खींचने के बाद ठग की तरफ बढ़ा दी|

अब बेचारा वो लड़का जो ठगी करने आया था खुद ही ठगा सा बुन्दू को देख रहा था| लेकिन बेचारा करता भी क्या?सो बुन्दू से बीड़ी लेकर कश खींचने शुरू किये| एक तो पहले ही उसके सर पर नशा चढ़ चूका था फिर इस बीड़ी ने तो जैसे उसके दिमाग में सीधी टक्कर मार दी| लड़का एक अलग ही दुनिया में पहुँच गया था|

आखिर हो भी क्यूँ ना? बुन्दू ताऊ के हाथ के उतरे माल और बुन्दू ताऊ के हाथ से बनी बीड़ी की प्रसिद्धि तो दूर दूर तक थी| ठग ने दो तीन दम और खींचे और दैवीय दुनिया से धरातल पर वापस आते हुए जैसे ही बुन्दू ताऊ की तरफ देखा तो बुन्दू ताऊ दूसरी बीड़ी बनाकर उसे सुलगा चूका था|

अब ठग को एकदम से आभास हुआ कि हो ना हो इस बुड्ढे ने अपने लिए हलकी बीड़ी बनायीं है और मुझे जरा तगड़ा माल भरकर दिया है| उस ठग ने नशे में ही कहा“ ताऊ जी मोये तो तुम अपने वाली बीड़ी दो, या तो ससुरी कछु मजा ना देरी”

बुन्दू ताऊ ने इस प्रस्ताव पर पूर्णत: असहमति जाता दी और कड़क आवाज में बोले “अरै उसै ई पिलै”

अब ठग का संदेह और गहरा गया और वो बुन्दू ताऊ की बीड़ी लेने की जिद पर अड़ गया अंत में उस ठग को पहली विजय प्राप्त हुई और बुन्दू ताऊ ने अपनी बीड़ी उसे दे दी और उसकी लेकर स्वयं कश खींचने लगे|

उस लड़के ने जैसे ही इस वाली बीड़ी में दम मारे तो इस बीड़ी का प्रभाव तो और भी ज्यादा अलोकिक और प्रलयंकारी था| वास्तव में चिलम खींचने वाले बुन्दू ताऊ का सिगरेट पीने से स्वाद ख़राब हो गया था तो ताऊ ने उस ठग के लिए बीड़ी बनाकर अपनी जरा और कड़क बीड़ी तैयार की थी|

आप पढ़ रहें हैं Comedy Story in Hindi | बुन्दू ताऊ

उस बीड़ी के निपटने से पहले ही वो ठग निपट चूका था| अब वो ठग चार आयामी दुनिया में पहुँच गया था|ठग का स्थूल शरीर अपनी जगह पर ही बिना रीढ़ के प्राणी की तरह बलखाया सा पड़ा था| बुन्दू ताऊ के हाथ के उतरे सुल्फे और उनके ही हाथ से बनी प्रलयंकारी बीड़ी को झेल पायें ऐसे तो अभी उनके चेले भी गिनती के ही थे| अब इस ठग को 24 घंटे से पहले तो होश आना नहीं था|

बुन्दू ताऊ की बीड़ी भी निपट चुकी थी| बुन्दू ताऊ ने एकबार उस लड़के को देखा और हँसते हुए अपनी पोटली में से चिलम निकाल कर उसे भरा फिर उसे सुलगा कर अपनी विख्यात शैली में एक जोरदार दम मारा, चिलम में से अग्नि की ज्वाला ने ऊँचे उठकर बुन्दू ताऊ की क्षमता से आसपास वालो को परिचित करवाया| जोरदार दम खींचकर बुन्दू ताऊ ने चिलम मुहँ से हटाई और एक ओजस्वी उद्घोष किया “जय हो पहाड़ वाले बाब्बा की”|

लेखक : सतीश भारद्वाज
E.Mail :  sat.nitu@gmail.com

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दुनियां में हर इन्सान की अहमियत है और हर एक इन्सान की अपनी एक अलग सोच| इस दुनियां में हर इन्सान दुनिया की सोच बदलने की ताक़त रखता है| आज की हमारी युवा पीढ़ी और परिवार के बिच गई मुद्दों पर अलग-अलग सोच है| हमारी आज की कहानी इसी सोच के एक पहलु को बयां करती है, आइये पढ़ते हैं ननंद | Emotional Story in Hindi


                           ननंद | Emotional Story in Hindi

शिखा !  परिवार की लाडली बिटिया या फिर यूँ कहें की परिवार की आन, बान और जान| जब घर में होती तो ऐसा लगता मानों घर में आसमान टूट पड़ा हो| घर में इधर उधर धमा-चोकड़ी करना और खूब सारी बातें करना उसके पसंदीदा कामों में से एक था| शिखा के दादाजी शिखा को बहुत प्यार करते थे, लेकिन आजकल उन्हें शिखा की एक चिंता और खाए जा रही थी और वो थी शिखा की शादी की चिंता| बस दादाजी अब हर परिवार में शिखा का ससुराल ढूंढते| लेकिन शिखा को शादी नाम से ही इतनी चिढ थी कि शादी का नाम सुनते ही वह गुस्सा होकर, मुह फुला कर दुसरे कमरे में बैठ जाती|

खैर, थोड़ी देर में उसका गुस्सा खुद-ब-खुद उतर जाता और वो वापस अपनी धमा-चोकड़ी में व्यस्त हो जाती| काफी खोज-बिन के बाद भी शिखा के दादाजी को कोई ऐसा परिवार नज़र नहीं आया जहाँ वे अपनी लाडली बिटिया की शादी कर सके| इसलिए उन्होंने अपने बचपन के दोस्त से इस बारे में राय लेने का निश्चय किया| बस फिर क्या था वे अपने दोस्त रायबहादुर से मिलने बरेली की और निकल पड़े |

अगले दिन जब वह बरेली पहुंचे तो रायबहादुर ने स्टेशन पर ही उनके लिए गाड़ी भेज दी थी| 10 साल बाद अपने बचपन के दोस्त से मिलने के लिए वे भी बड़े उतावले थे| गाडी धीरे-धीरे रायबहादुर के घर की और बढ़ी ! बड़ा सा बंगलो, बंगलों के आगे बगीचा, गाड़ियाँ और  नोकर-चाकर देख दादाजी का मन ख़ुशी से भर गया|

इन 10 सालों में रायबहादुर ने कितनी तरक्क्की कर ली है, नहीं तो 10 साल पहले रायबहादुर के पास था ही क्या| बस यही सब सोचते-सोचते शिखा के दादाजी अपने दोस्त के बंगलो पहुँच ही गए|

गाड़ी की हॉर्न की आवाज के साथ ही रायबहादुर घर के बाहर अपने दोस्त के स्वागत के लिए आ गए थे| अपने दोस्त को गले लगाकर वे दादाजी को अन्दर ले गए| घर अन्दर से भी काफी शानदार था, अपने दोस्त की सम्पन्नता को देख शिखा के दादाजी भी फुले नहीं समाए|

ननंद | Emotional Story in Hindi

चाय-नाश्ता के बाद रायबहादुर ने उनके खास दोस्त से आने का कोई खास कारण पुछा|  दादाजी ने पोती की शादी के लिए एक अच्छा सा परिवार ढूंढने की का काम सोंपते हुए बिटिया का फोटो रायबहादुर के हाथ में सोंप दिया|

रायबहादुर भी अपने बेटे विक्रम के लिए एक सुयोग्य कन्या की तलाश में थे| तीखे नैन नक्श, चहरे पर तेज और एक बार में ही किसी को पसंद आने वाली शिखा बिटिया को फोटो में देखकर ही उन्होंने शिखा को अपने घर की बहु बनाने का फैसला कर लिया|

रायबहादुर इतना सोच ही रहे थे की इतने में उनका बेटा विक्रम आ गया| विक्रम ने दादाजी के पैर छुए और हाल-चाल पूछने के बाद ऑफिस की और निकल गया| विक्रम के जाने के बाद रायबहादुर ने अपने दोस्त से विक्रम और शिखा के सम्बन्ध के लिए पेशकश की| शिखा के दादाजी को लगा जैसे रायबहादुर ने उनके मुह की बात छिन ली हो|

खेर, प्रसंन्नता से विदा लेकर अपने घर आने का कहकर दादाजी अपने घर की और निकल गए|

विक्रम को शिखा बहुत पसंद थी| लेकिन विक्रम की माँ, विक्रम की शादी अपने से भी बड़े घर में करना चाहती थी लेकिन विक्रम के मनाने पर वह मान गई और तय समय पर विराम और शिखा की शादी हो गई|

ससुराल में शिखा के साँस-ससुर, विक्रम के बड़े भैया-भाभी और शिखा की ही उम्र की एक ननंद थी रागिनी| अपनी साद्की और सबका अच्छे से ख्याल रखने के कारण शिखा ने घर में सबके दिलों में जगह बना ली| लेकिन अपनी तमन कोशिशों के बावजूद अपनी सासू- माँ  का प्यार पाने में असफल रही|वह शिखा के हर काम में कुछ ना कुछ गलती निकाल ही देती थी|

अपनी शादी की रात को ही विक्रम ने शिखा से साफ-साफ कह दिया था,की”घर के किसी भी मामले में में बिलकुल नहीं बोलूँगा| ना तो में किसी बात पर माँ से बहस करूँगा और ना ही तुम्हारा साथ दूंगा| तुम्हें अपनी समझदारी से ही काम लेना होगा|”

लेकिन शिखा की लाख कोशिशों के बावजूद भी सासू-माँ के व्यव्हार में कोई परिवर्तन नहीं आ रहा था| शिखा की ननद जरुर उसकी माँ से शिखा भाभी के प्रति इस तरह के व्यहवार पर उलझ जाती लेकिन इस से भी केवल बात बढ़ने के अलावा कुछ नहीं होता| इसी तरह करीब एक साल निकल गया| शिखा और विक्रम को जुड़वाँ बेटियाँ हुई| यह समय शिखा के लिए अग्नि परीक्षा का समय था| शिखा का दर्द शिखा के लिए आंसू बन गया था ससुराल में शिखा को सम्हालने वाला कोई नहीं था और विक्रम और उनके पापा ने शिखा को अपने मायके भेजने के लिए पहले ही मना कर दिया था|

ननंद | Emotional Story in Hindi

एक दिन रागिनी कॉलेज से आई तो उसने सभी को कॉलेज के सालाना कार्यक्रम में आने के लिए कहा और यह भी कहा की कॉलेज में उसकी भी दो थी प्रस्तुतियां है इसलिए आप सभी का चलना बहुत ज़रूरी है| खैर, ना चाहते हुए भी शिखा को अपनी दोनों जुड़वाँ बेटियों के साथ रागिनी के कॉलेज जाना पड़ा|

कार्यक्रम की शुरुआत में गीत संगीत की कई प्रस्तुतियां हुई| उसके बाद माडलिंग राउंड शुरू हुआ| दर्शकों ने तालियों के साथ सभी का उत्साहवर्धन किया| माडलिंग में रागिनी ने भी हिस्सा लिया था| आखरी राउंड में रागिनी के साथ चार और लड़कियों को सेलेक्ट किया गया जहाँ सभी से जज द्वारा एक-एक सवाल पूछकर विजेता घोषित करना था| सवाल-जवाब का दौर शुरू हुआ| इसी कड़ी में जज साहिबा ने रागिनी से सवाल पुछा, “अगर घर में तुम्हारी माँ और भाभी में से किसी एक का साथ देना हो तो तुम किसका साथ दोगी”

पुरे सदन में ख़ामोशी छाई थी| सभी रागिनी के ज़वाब की प्रतीक्षा कर रहे थे| तभी रागिनी ने थोडा आगे बढ़कर कहा, “अगर भाभी सही हो तो अपनी भाभी का”

जज साहिबा ने आगे पुछा, ” क्यों ?”

रागिनी ने ज़वाब दिया, “क्यों की मुझे भी कल किसी की भाभी बनना है”

जवाब सुनते ही पुरे सदन में तालियाँ गूंज उठी| सभी रागिनी की सोच और उसके सटीक जवाब की प्रशंशा कर रहे थे|

रागिनी को विजेता घोषित किया गया| पुरुस्कार लेने से पहले रागिनी ने सभी से कुछ कहने के लिए माइक थामते हुए कहा, “हर बेटी अपनी माँ से बहुत प्यार करती है और माँ भी अपनी बेटी के दिल के सबसे करीब होती है| इसी तरह हमारे घर की बहुएं भी तो किसी की बेटियां है| आज हम किसी की बेटियां है कल से किसी की भाभियाँ और बहुएं बनेंगी| अगर कल से हमें कुछ दुःख हुआ तो हमारी माँ को भी दुःख होगा और इसी तरह हमारे घर की बहु को दुःख हुआ तो उनकी माँ को भी दुःख पहुंचेगा| और इस दुनियां में किसी भी इन्सान को किसी की भी माँ को दुःख  पहुँचाने का कोई हक़ नहीं है इसीलिए हर साँस अपनी बहु को अपनी बेटी समझे तो आगे चलकर उनकी बेटी भी खुश रहेगी|”

रागिनि के इतना कहते ही पूरा सदन एक बार फिर तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा|

ननंद | Emotional Story in Hindi

                         तालियों की गडगडाहट के बिच ही शिखा की साँस ने शिखा को गले से लगा लिया|

पढ़ें कैसे एक छोटे से बाचे ने अपनी नादानी से एक बड़े झगडे को सुलझा दिया :- हिंदी कहानी -पिज़्ज़ा 

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संघटन की शक्ति | Sanghatan ki Shakti Moral Stories in Hindi

संघटन की शक्ति


Sanghatan ki Shakti Moral Stories in Hindi

एक जंगल में एक बहुत बड़ा और विशालकाय अजगर रहता था| अजगर को अपने विशालकाय शरीर पर बहुत घमंड था| एक पेड़ को कोटर में उसने अपना बिल बना रखा था| जब भी वह अपने बिल से बहार निकलता उसके शरीर को देखकर जंगल के सभी जानवर उससे डरकर दूर भागने लगते| अजगर का मुह ही इतना बड़ा था की खरगोश तक को पूरा का पूरा निगल जाता था|

एक बार अजगर शिकार की तलाश में अपने बिल से निकला| अजगर को देखकर जंगल के सारे जानवर उससे डर कर भागने लगे| जब शिकार के लिए अजगर को कुछ भी नहीं मिला तो वह फुफकारने लगा और इधर-उधर खाख छानने लगा|पास ही की झाड़ियों में एक हिरनी अपने नवजात बच्चे को पत्तियों के ढेर के निचे छुपाकर भोजन की तलाश में दूर निकल गई थी| अजगर की फुफकार से बाचे के उपर पड़ी पत्तियाँ उड़ गई और हिरनी का बच्चा पत्तियों से बहार दिखाई देने लगा| हिरनी के बाचे की नज़र जैसे ही इतने बड़े विशालकाय जिव पर पड़ी वह बहुत डर गया और उसके मुह से एक चींख भी नहीं निकल पाई|

अजगर ने देखते ही देखते एक बार में ही हिरनी के नवजात बच्चे को एक बार में ही पूरा का पूरा निगल लिया| तब तक हिरनी भी लौट आई थी| पर वह कर भी क्या सकती थी, दूर से ही अपनी आँखों के सामने अपने बच्चे को अजगर के मुह में जाते देख बस आंसू बहाती रही| इस द्रश्य को देख हिरनी इतना क्रोधित हो गई की उसने मन ही मन अजगर से अपने बच्चे की मौत का बदला लेने की ठान ली| हिरनी का जंगल में सबसे प्रिय मित्र था नेवला| शोक में डूबी हिरनी रोटी बिलखती सीधे अपने मित्र नेवले के पास गई और रोते हुए अपनी पूरी व्यथा सुना दी| हिरनी की व्यथा सुनकर नेवले को भी बहुत दुःख हुआ| उसने दुःख जताते हुए हिरनी से कहा, मित्र हिरनी! तुम्हारी व्यथा सुनकर मुझे भी दुःख हो रहा है| मेरे बस में होता तो में उस दुष्ट अजगर के अभी सौ टुकड़े कर डालता लेकिन में कर भी क्या सकता हूँ, वह कोई छोटा मोटा सांप नहीं है जिसे में मार सकूँ वह तो एक विशालकाय अजगर है जो अपनी पूंछ के एक वार से ही मुझे अधमरा कर सकता है| लेकिन यहाँ पास में ही चीटियों का एक बहुत बड़ा झुण्ड रहता है जिसके रानी मेरी बहुत अच्छी मित्र है| हमें उस से सहायता मांगना चाहिए|

Sanghatan ki Shakti Moral Stories in Hindi

हिरनी ने निराश होते हुए कहा, ” मित्र! जब तुम्हारे जैसा बड़ा जिव उस अजगर का कुछ नहीं बिगाड़ सकता तो फिर वह छोटी सी चींटी क्या कर लेगी| नेवले ने हिरनी की चिंता को समझते हुए कहा, “मित्र हिरनी! तुम ऐसा बिलकुल भी मत सोचो, चिन्ति रानी के पास चींटियों की एक बहुत बड़ी सेना है और तुम जानती ही हो की संगठन में बड़ी शक्ति होती है| मुझे चींटी रानी पर पूरा विश्वास है वह हमारी सहायता ज़रूर करेंगी|

हिरनी को नेवले की बातों से आशा की एक किरण नज़र आई| नेवला, हिरनी को साथ लेकर चींटी रानी के पास गया और चींटी रानी को अपनी पूरी व्यथा सुना दी| चिन्ति ने कुछ देर सोचा और फिर कहा, “मित्र, हम तुम्हारी सहायता ज़रूर करेंगे| बस तुम किसिस भी तरह उस दुष्ट अजगर को नदी किनारे वाले पह्रिले नुकीले पत्थरों वाले रास्ते की और ले आओ| नेवले को अपनी मित्र चींटी रानी पर पूरा विश्वास था इसलिए वह अपनी जान जोखिम में डालकर इस कार्य के लिए तैयार हो गया|

अगले दिन नेवला अजगर के बिल के बहार जाकर खड़ा हो गया और जोर-जोर से अपनी आवाज़ निकलने लगा| अपने क्षत्रु की आवाज़ सुनकर अजगर क्रोध में भर गया और नेवले को सबक सिखाने के लिए उसकी और लपका| अजगर को आता देख नेवला नदी किनारे वाले पथरीले नुकीले पत्थरों वाले रास्ते की और दौड़ा| नेवले का पिछा करते हुए अजगर भी उसी रास्ते की और नेवले के पीछे-पीछे गया| पथरीले रास्ते के नुकीले पत्थरों की वजह से कुछ दुरी तक जाने में ही अजगर का शरीर छिल गया और जगह-जगह से खून निकलने लगा|

बस उसी समय चींटियों की सेना ने अजगर पर हमला कर दिया और अजगर के शरीर के चिली हुए हिस्से के मांस को नोचने लगी| अचानक हुए चींटियों के इस हमले से अजगर तड़प उठा और जमीं पर अपना शरीर पटकने लगा जिससे अजगर का और मांस छिल गया और चींटियों को आक्रमण के नए-नए स्थान मिलने लगे| कुछ ही देर में दुष्ट अजगर ने तड़प तड़प कर दम तौड़ दिया|

इसीलिए कहते हैं दोस्त, संगठन में शक्ति होती है| अगर संघठन में एकता हो तो कोई भी काम कियस जा सकता है| राम-राम

Sanghatan ki Shakti Moral Stories in Hindi


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सोने के कंगन | Sone Ke Kangan Moral Story in Hindi

सोने के कंगन | Sone Ke Kangan Moral Story in Hindi


Sone Ke Kangan Moral Story in Hindi

किसी वन में एक बुढा शेर रहता था| जीवन के अंतिम पढ़ाव पर अब उसके शरीर ने जवाब दे दिया था| जवानी के दिनों में पूरे जंगल में उसका खोफ था लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव में अब उसके दांत और पंजे काफी कमज़ोर हो गए थे| कुछ दिन तो शेर शिकार के लिए पुरे जंगल में भटकता रहा लेकिन कोई शिकार नहीं होने के कारण वह थक हार कर नदी के किनारे बेठ गया| अब वह रोज नदी किनारे बेथ जाता और किसी शिकार की प्रतीक्षा करता लकिन उसे कोई भी शिकार नहीं मिलता|

कुछ दिन बाद ही वह भूख से तिलमिला उठा, भूख से विचलित होकर वह  एक बार भगवान से प्रार्थना कर रहा था तभी उसकी नज़र पास ही पड़े एक सोने के कंगन पर पड़ी| शेर ने वह कंगन उठाया और उसे ध्यान से देखने लगा| कंगन देख कर उसके दिमाग में सोने के कंगन से शिकार की एक योजना आई|

अब शेर नदी के किनारे हाथ में कंगन डाल कर बेठ गया और हर आने जाने वाले यात्रियों से कहने लगा “सुनो! मेरे पास यह सोने का कंगन है, इसे आप दान के रूप में ग्रहण कर लो| इससे में पुण्य का भागी बनूँगा और मेरा जीवन सुधर जाएगा|”

लैकिन शेर के हाथ में कंगन होते हुए भी भला कौन यात्री उसके पास जाने की हिम्मत करता| आने-जाने वाले सभी यात्री शेर के पास जाने से पहले यही सोचते कि, शेर के पास जाते ही शेर उन्हें मार कर खा जाएगा फिर सोने का कंगन किस काम का|

एक दिन एक लालची व्यक्ति नदी के पास से गुजरा, व्यक्ति ने जब शेर की बात सुनी तो वह सोच में पड गया कि, अगर में शेर से यह सोने का कंगन ले लूँ तो मेरा आने वाला जीवन बड़े आराम से कट जाएगा| बस यही सोच कर वह शेर की और बढ़ा|

शेर को उस व्यक्ति में अपने शिकार की साफ झलक दिखाई दी| शिकार को पास आते देख शेर खुश हो गया| मोटे ताजा व्यक्ति को अपने पास  आते देख शेर ने भगवान् को धन्यवाद दिया,  कि है इश्वर! आप इस व्यक्ति को मेरे सोने के जाल में फसा दो ताकि बहुत दिनों बाद में आज भोजन कर पाउँ|

लालच में आकर राहगीर शेर के पास आकर बोला “है वनराज! आपके पास सोने का कंगन है और आप यह कंगन दान करना चाहते हैं| लेकिन यह कंगन आप मुझे कैसे दान करेंगे| इसके अलावा आप एक हिंसक पशु है फिर आप यह दान क्यों करना चाहते हैं| अगर में आपके पास यह कंगन लेने पहुंचा और आपने मुझे मार डाला तो …?

राहगीर की बात सुनकर शेर ने बड़े आदरपूर्वक ज़वाब दिया, “तुम्हारी शंका बिल्कुल सही है, मैंने अपनी युवास्था में कई प्राणियों का शिकार कर अपनी भूख शांत की है| लकिन अब अंत समय में , में कुछ दान-पुण्य करके अपने जीवन को साकार बनाना चाहता हूँ|

राहगीर शेर की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर उसके पास आया और बोला, लाइए वनराज! यह सोने का कंगन मुझे दे दीजिये| में आपका जीवन भर ऋणी रहूँगा|

राहगीर की बात सुनकर शेर बोला, “में आपको यह कंगन देने के लिए तैयार हूँ लेकिन उससे पहले आप इस नदी में स्नान कर के पवित्र हो जाइये क्यों की में हमेशा पवित्र लोगों को ही दान देता हूँ!

Sone ke Kangan Moral Story in Hindi

राहगीर शेर के जाल में पहुँच चूका था, भला अब उसे नदी में स्नान करने में क्या आपति होती! शेर की बात सुनकर राहगीर स्नान करने के लिए नदी में उतर गया|

लकिन यह क्या, जैसे ही वह नदी में उतरा वह नदी में धसता चला गया| जल्द ही उसे यह अहसास हो गया था की नदी में पानी नहीं दलदल था| उसने वहां से निकलने की काफी कोशिश की लेकिन वह असफल रहा| अंत में उसने शेर से विनती की, कि महाराज! मुझे इस दलदल से बहार निकालिए नहीं तो में इसमें धस के मर जाऊंगा|

राहगीर की बात सुनकर शेर मन ही मन मुस्कुराया और बोला, “में अभी आपका कल्याण करता हूँ|” यह कहकर शेर ने उस राहगीर को अपने पंजों में दबोच लिया और उसका काम तमाम कर दिया|

जो काम वह बुढा शेर अपनी शक्ति से नहीं कर सकता था उसने वह अपनी बुद्धि से कर दिया|

कहानी का तर्क यही है, कि लालच बुरी बाला है मेरे दोस्त….इतिहास गवाह है लालची व्यक्ति हमेशा लालच के कारण  किसी ना किसी  परेशानी में पड़ा है!

Sone Ke Kangan Moral Story in Hindi


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