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Inspirational Story in Hindi | पर्दा

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए “रशिश कौल” की लिखी एक ऐसी कहानी “Inspirational Story in Hindi | पर्दा”  लेकर आएं हैं जो समाज के उस वर्ग के दर्द को बयां करती है जो आज भी अछुता है| आशा है आपको हमारा यह संकलन पसंद आएगा|


Inspirational Story in Hindi | पर्दा

करीब आधे घंटे देरी से चली रेल, कुछ कोहरे की वजह से और कुछ आदतन। राहत की सांस ली जब देखा किसी को अपनी सीट से उठने के लिए बोलना नही पड़ेगा…बैग उठा के रखा सीट के नीचे और कानों में हेडफोन ठूस के पसार गया|

बाहरी दुनिया में न कोई दिलचस्पी बची थी मेरी और न ही कोई उम्मीद…बस कुछ था, तो इंतेज़ार मेरे स्टेशन के आने का और एक छोटी सी आस की तब तक कोई आकर “थोड़ा सा” सरकने को न बोले।

तभी कंधे पर एक हाथ महसूस हुआ, फिर एक हल्का सा झटका और फिर आयी थपकी। एक बार तो जी में आया कि चुप चाप गाने सुनता रहूँ पर यकीन मानिए, दिन के सफर में अगर आप समझते है कि अपनी आरक्षित सीट पर अकेला बैठ कर आप गाने सुनते हुए घर तक जाएंगे तो शास्त्रो में कड़े शब्दों में आपके लिए “मूर्ख, अज्ञानी, दुःसाहसी और निर्लज्ज” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है।

मैंने सर उठा के पीछे देखे तो करीब मेरी उम्र का लड़का खड़ा था , हाथ में सूटकेस लिए…अपना सामान सीट के नीचे रखने का इशारा करते हुए। मैंने अपना बैग आगे सरकाया और उसने अपना..यदि श्री कृष्ण ने अपने मुख में यशोदा माँ को समस्त ब्रम्हाण्ड समाया दिखाया हो तो हमारी रेल सीट के नीचे भी एक छोटी -मोटी आकाश गंगा तो शर्तिया समा जाती होगी।

“भाई ज़रा आप थोड़ा सा…” उसके पूरा बोलने से पहले ही में खिड़की से चिपक कर बैठ गया। जितना अफसोस मुझे अपने पैर फैला कर सफर ना करने का था उससे कई ज़्यादा दुख इस बात का था कि बैग सरकाने के चक्कर मे मेरे हैडफ़ोन कानों से निकल गए और बाहरी दुनिया का शोरगुल फिर से कानों में रौद्र तांडव करने लगा।

“भाईजान, दिल्ली जाओगे?” याद नही इतनी विनम्रता से आखरी बार किसने पूछा था कुछ, शायद लोन चिपकाने वाली लड़की ने।
“ह्म्म्म”, मैंने भी सर हिलाते हुए जवाब दे दिया, और हाथों को हैडफ़ोन की तारे सुलझाने में लगा दिए।

“बढ़िया है , में भी वही जाऊंगा…क्या करते है आप?”
अब यहां पर मेरे हाथ और दिमाग तेज़ी से चलने लगे गए…ये मेरी सीट हड़पने वाला आदमी कोई मामूली आदमी नही था, ये उन लोगो में से एक था जो आपसे घंटो बिना रुके बात करने की क्षमता रखते है|

ये आपको बताएंगे कि आपके अपने शहर में फलां चीज़ मशहूर है , और कैसे मोदी की लहर के सामने सब धराशाई हो गया कैसे नोटेबन्दी ने सारे कालेधन वालो को नाको चने चबवा दिए…सफर कुछ लंबा हो तो ये मेहंदीपूर बालाजी की महिमा का भी वर्णन ज़रूर करेंगे।

तो  कुल मिला के सार ये है कि मुझे तीन चीज़े आज तक समझ नही आई: GST, सब्ज़ी वाले से ये पूछने का फायदा की “भैया ये ताज़ी है ना”, और तीसरा इन महाशय से वार्तालाप कैसे और क्यों जारी रखे।

“चाय चाय, गरमा गरम चाय” अभी मुँह खोलने ही वाला था कि एक दम स्टीक समय पर वो चाय बेचने वाला आ गया। उसका ध्यान चाय पे जो भटका मैंने शुक्र मनाया और फटाक से कान सील कर दिए अपने। दिल्ली अभी तीन घंटे दूर थी और मेरी बैटरी बस आधे घंटे की मेहमान मालूम पड़ रही थी।

चार्ज पे लगा लेता पर ये कम्बखत व्हाट्सएप्प वाले ग्रुप ने दिलो-दिमाग पर बैटरी फटने का खौफ बिठा दिया है। अब मैं मानता तो नही इस चीज़ को लेकिन फिर मानता तो मैं भूतो को भी नही हूँ, पर अंधेर सुनसान गली में गुज़रते हुए हनुमान चालीसा अपने आप प्रवाहित होने लगता है..

ऊपर बैठे हनुमान जी ने भी शायद तभी सिंगल रहने का श्राप दिया हुआ है। मानो या न मानो, लेकिन ये “अगर हुआ तो?” वाला वाक्य ही है जिसकी वजह से बड़े बड़े नास्तिको को रिज़ल्ट के समय हाथ जोड़े खड़ा देखा है।

खैर, आधा घंटा कब हुआ पता नही चला और बैटरी ने भी जवाब दे दिया, अब जवाब मुझे अच्छा लगा या नही  ये सुनने की ज़हमत नही उठाई उसने..बस आंखें मूंद गयी अपनी।

कायदे से देखा जाए तो अब तारे लपेट कर जेबों में भरने का वक़्त आ चुका था, पर राजनीति में मेरा नाम अज्ञानियों के वर्गो में शुमार होता है और क्रिकेट की बात छेड़ने के लिए बचे हुए ढाई घंटे कम थे। तो मैंने ये अनुमान लगा लिया कि बचा हुआ वक़्त में अपनी गयी गुज़री ज़िन्दगी पर विलाप करने और आगे के जीवन पर चिंतन करने में लगा सकता हूँ, सो जैसा था वैसे ही चलने दिया।

“अम्मी! मज़ाक चल रहा है इधर क्या? में दिल्ली पहुंचने वाला हूँ…अब कहाँ से वापस जाऊँ?”

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अब बात में भले ही ना करूँ पर इतना ज़रूर समझ गया था कि सफर काटने लायक सामग्री का प्रबंध हो गया था, बस ज़रूरत थी कान लगाके उसका चिल्लाना सुनने की।

“अब अब्बा को नही पसंद तो मैं क्या करूँ? अब जो है वो है…हाँ-हाँ मालूम है खाला भी आएंगी तो क्या? कम से कम आप तो साथ हो न मेरे?”

उस तरफ की आवाज़ बोल क्या रही है समझ तो नहीं आ रहा था पर सवाल के बाद की चुप्पी खूब पता लग रही थी।

“अम्मी।हो ना साथ आप, मेरे?”

उस तरफ से कोई आवाज़ नही आई, पतानी वो जवाब का इंतज़ार कर रहा था या जवाब अपनाने में दिक्कत हो रही थी उसे, पर लगभग दो मिनट तक कोई कुछ नही बोला, सिवाए स्टेशन के लाउडस्पीकर के।

“अम्मी, गे होना जुर्म तो नहीं ना..अब अल्लाह ने ही ऐसे भेजा है तो कुछ सोच के ही भेजा होगा ना?”

उसका गला एकदम भर आया, कहना बहुत कुछ था उससे पर उससे कहीं ज़्यादा रोक भी रहा था, शायद सब एक साथ कह देना चाहता था। बात वो शायद अपने आप से ही कर रहा होगा क्योंकि दूसरी तरफ की खामोशी के बदले अब काल काटने की बीप बज रही थी।

अपनी सीट से उठा और बाहर चला गया एकदम से, एक बार सोचा बात कर लूँ पर देर हो चुकी थी।

तभी नज़र सामने बैठे एक बुजुर्ग से चच्चा पर पड़ी जो उंगलियो को खास कोण में मोड़कर इशारा कर रहे थे,शायद पूछ रहे थे कि क्या हुआ इसको…मैंने भी कंधो को झटकते हुए दिखाया दिया कि मालूम नहीं, एक इशारा आपके दस मिनट बचा सकता है जानकर अच्छा लगा.. पर याद नही आ रहा था कि चचा अभी प्रकट हुए या पहले के बैठे हुए थे।

“ये गे क्या होता है बेटा?”

असमंजस में फसा दिया था, करने को तो मैं कंधे भी झटका सकता था पर अब जो ‘बेटा’ बोल दिया था ,  भारतीय सभ्यता और संस्कृति खतरे में भी आ सकती थी।

“समलैंगिक…आ गया समझ?”

समझ तो अभी भी नही आया पर ताऊ ये दिखाना नही चाहते थे, सर हिला के वापस धर लिया पीछे।

“भाईजान बैग रह गया था, पकड़ाएंगे ज़रा?”

मैंने नीचे उस अनंत गुफा से सामान निकाल कर पकड़ाया और पहली बार उसकी आंखों पे नज़र पड़ी, मुँह धोकर छुपाने की कोशिश तो खूब की थी पर लाल रंग ही ऐसा है, छुपाये नहीं छुपता।

“ठीक हो आप?” अब पूछने का फायदा तो नही था कुछ पर शायद बाद मैं मलाल रह जाता।
बदले में वो हल्का सा मुस्कुराया, या यूं कहें कि सांस ज़रा ज़ोर से बाहर निकाली।

“निज़ामुद्दीन जा रहे थे भाईजान, पर क्या है ना घरवालो को हम कुछ ज़्यादा ही भाते है…तो अब्बा ने कह दिया कि  बरकत मांगने जा रहे है, मेरे जैसा आदमी जाएगा तो हुज़ूर-ऐ-पाक खफा हो जाएंगे”

“मेरे जैसा मतलब?” मैं ये दिखाना नही चाहता था कि उसकी सारी बातें सुनी थी मैंने, पर शायद उसे सब पता था पहले ही।

“क्या है ना, की जो था सब सच बोल दिया एक दिन , दुसरो से झूठ बोल भी लूँ, पर खुद को धोखे में रखना यानी खुदा को धोखे में रखना। और वैसे भी, जब अल्लाह को फर्क नही पड़ता तो इन लोगो के लिए क्यों बंद रखूं अपने आप को?”

मैं हर वक़्त सोचता हूँ कि काश मुझे बचपन से इंटीग्रेशन और ट्रिग्नोमेट्री के बदले इन परिस्तिथियों को संभालना सिखाया होता , पर शायद ना उस वक़्त इतनी समझ थी और ना आज भी इतनी अकल है।

वो कुछ सुनने की आस लगाए बैठे था मुझसे, शायद ये की उसकी कोई गलती नही थी…पर शायद गलत आदमी से उम्मीद लगा के बैठ गया वो। उस आदमी से जिसे उसके दुख से ज़्यादा इस बात की खुशी थी कि पूरी सीट अब उसकी है।
गाड़ी धीरे धीरे चलने लगी, और उससे प्लेटफार्म पे तब तक देखता रहा जब तक भीड़ में खो नही गया वो।

“एक्सक्यूज़ मी?”
पीछे मुड़ा तो एक घुंगराले बालो वाली लड़की स्लिंग बैग लेके खड़ी थी।
“कैन यु प्लीज़…” उसके पूरा बोलने से पहले ही में खिड़की से चिपक कर बैठ गया।

उसने बैग सीट पे रखा और अपनी बिसलेरी की बोतल का ढक्कन घुमाने लगी।

“डेल्ही?” मैं दिल्ली बोलता पर कही गवार न समझ बैठे इसलिए पता नही क्यों , खैर… वो हाँ बोल के मुस्कुराई और कानों में हैडफ़ोन लगा के आंखे मूंद ली, मेरी बैटरी की तरह।पतानी उसने सुना या नहीं पर मैंने उससे पूछा था कि वो क्या करती है।

अब कुछ करने को था नही तो सामने बैठे ताऊ के रेडियो पर ही ध्यानमग्न होने का सोच लिया। उस आदमी का चेहरा रह रह कर आंखों के सामने आ रहा था और कानो में गूंज रहा था मध्धम आवाज़ में रेडियो पर ये गाना
“पर्दा नहीं जब कोई खुदा से,बंदों से पर्दा करना क्या”

Inspirational Story in Hindi | पर्दा

रशीश कौल 


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साथियों नमस्कार, हिंदी शार्ट स्टोरीज में आपका एक बार फिर स्वागत है| आज हम आपके लिए एक खास कहानी “Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी” लेकर आएं हैं जिसे हमारी मण्डली के लेखक “सतीश भारद्वाज” ने लिखा है| आपको हमारी यह कहानी कैसी लगती है हमें निचे दिए गए कमेंट सेक्शन में ज़रुर बताएं|

Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी

वो फौजी के साथ ब्याह कर ससुराल आई थी| कुछ ही दिन की छुट्टी मिली थी फौजी को| फौजी जानता था कि छुट्टी ख़त्म होने के बाद कई महीने विरह की आग में जलना पड़ेगा उसे भी और उसकी पत्नी को भी|

लेकिन विरह की घडी कुछ ज्यादा ही जल्दी आ गयी| छुट्टियां रद्द कर दी गयीं थी, कारगिल में जंग शुरू हो चुकी थी| 10 दिन पहले ही आने का बुलावा आ गया|

फौजी की पत्नी के चेहेरे पर मायूशी साफ़ दिख रही थी| उसके नैनों की चंचलता खो गयी थी| भरे सागर जैसी गहरी आँखों से पानी बस बाँध तोड़कर बहने को तैयार था|

फौजी ने अपनी पत्नी को आलिंगनबद्ध किया और बोला “फौजी से ब्याह किया है तूने तो मन को मजबूत तो करना ही पड़ेगा| बस तेरा पति ही नहीं हूँ अपनी प्लाटून का सिपाही और भारत माँ का बेटा भी हूँ मैं| आँसू मत बहाना क्योंकि जब फौजियों कि बीवियों की आँखों से आँसू बहते हैं तो वो देश के देश उजाड़ जाते हैं”

उसकी पत्नी ने अपने मनोभावों को नियंत्रित करते हुए कहा “जानती हूँ ज्यादा हक तो माँ और प्लाटून का ही है आप पर, ये दुराहत तो सहना ही पड़ेगा”

फौजी ने बाहों का कसाव मजबूत करते हुए कहा “कैसी बात कर रही है? सबकी मांगो के सिंदूर सलामत रहें, भैयादुज़ पर किसी बहन के आँखों में आँसू ना हो और होई पर हर माँ ख़ुशी से व्रत रखे बस इसलिए ही तो फौजी सीमा पर खड़ा होता है”

फौजी की पत्नी के चेहेरे पर एक मुस्कान फ़ैल गयी और वो बोली “जानती हूँ और इसका अभिमान भी है फौजी,आगे भी मान रखूंगी”

फौजी ने अपनी आँखो में याचना के भाव लाते हुए कहा “कल जब मै जाऊ तो तू मुझे दुल्हन की तरह सजकर विदा करना| वैसे भी अभी तो तू नयी नवेली दुल्हन ही है”

उसकी पत्नी की मुस्कराहट में प्रेम से भरी स्वीकृति थी|

…………

फौजी को विदा करने के लिए उसकी पत्नी ने सोलह श्रृंगार किये| आज वो उस दिन से भी ज्यादा सुन्दर लग रही थी जब वो दुल्हन बनकर फेरों की वेदी पर आई थी|

फौजी ने चुटकी ली “मुझे नहीं पता था तू बनाव श्रृंगार में इतनी माहिर है| आज तुझे देखकर लग रहा है कि तुझसे सुंदर कुछ नहीं|”

फौजी कि पत्नी ने भी चुटकी ली “कहीं फौजी का मन तो नहीं डोल रहा| अपनी प्लाटून से दगा करने की तो नहीं सोच रहा|”

फौजी : ना री ऐसा तो यो मन है ही ना, प्लाटून से दगा तो ना हो पाएगी|

फौजी की पत्नी ने कहा “एक बार जीतकर आ जाओ, अपने फौजी का स्वागत आज से भी ज्यादा सुन्दर श्रृंगार करके करेगी तेरी पत्नी| ऐसा श्रृंगार जैसा किसी ने कभी ना किया होगा”

फौजी ने आश्चर्य से कहा “इससे भी ज्यादा सुंदर हो सकता है कुछ?”

फौजी कि पत्नी ने कहा “जीत कर वापस आना और खुद देख लेना”

फौजी ने प्रेम से परिपूर्ण मुस्कान से उत्तर दिया लेकिन कुछ नहीं बोला और मुडकर चल दिया|

फौजी की पत्नी ने अभिमान के साथ कहा “जीत कर ही आना फौजी”

फौजी रुका और बिना उसकी तरफ देखे कहा “हाँ जीतकर ही आऊंगा, बस ये नहीं कह सकता कि मैं तुझे आगे बढकर गले से लगाऊंगा या तू मुझे आगे बढकर गले लगाएगी”

इतना कहकर फौजी चल दिया|

फौजी की पत्नी ने उत्तर दिया “जीत कर आया तो तेरी कसम सारी लोक लाज भूलकर तुझे गले से लगा लेगी तेरी पत्नी”

फौजी ने चलते चलते ही हाथ हिलाकर अभिवादन किया|

आप पढ़ रहें हैं हिंदी कहानी Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी

युद्ध चरम पर था| पता नहीं कितने घरो के चिराग अपनी आहुति दे रहे थे इस यज्ञ में| उस फौजी ने भी अपना धर्म निभाया, जो भी शत्रु उसके सामने आया वो धराशायी हो गया| जितने घाव फौजी के शरीर पर बनते थे उसका रूप उतना ही विकराल हो जाता था|

काल प्रतीक्षा कर रहा उसकी पूर्णाहुति की इस राष्ट्र यज्ञ में लेकिन शायद उसके विकराल स्वरुप को देखकर काल भी ठिठक गया| और जब तक उस फौजी ने मोर्चा ना जीत लिया काल भी उसके निकट नहीं आया| फौजी अपने प्राणों का उत्सर्ग कर चूका था उसका चेहरा तेजमय था|

………..

फौजी का मृत शरीर उके घर लाया गया| ऐसा कोई नहीं था जिसके नेत्रों से अश्रु धरा ना बह रही हो| पुरे गाँव को गर्व था फौजी की वीरता पर| पीढ़ियों तक उसकी वीरता के किस्सेगाँव का माँ बढायेंगे|

फौजी की पत्नी आई और  कपडा हटाकर फौजी का चेहरा देखा| चेहेरे पर कुछ लगा था, उसने उसे हटाया और दोनों हाथों से बलैयां लेते हुए बोली “कितनी सजती है वर्दी मेरे फौजी पर, किसी की नज़र ना लगे”

फिर उसने फौजी के शरीर को अपने अंक में ले लिया|

तभी एक हवा का झोंका आया और उसके कानो में फौजी की आवाज़ सुनाई दी “एक वादा तो निभा दिया पर दूसरा नहीं निभाया तूने, बोल रही थी कि ऐसा श्रृंगार करेगी जैसा किसी ने ना किया होगा| लेकिन तूने तो ना लाली लगाई ना सिंदूर”

फौजी की पत्नी ने तुनक कर उत्तर दिया “जा नहीं करती श्रृंगार फौजी, दुराहत कर गया ना मेरे साथ| बस माँ से ही प्यार था तुझे”

फिर उसने फौजी के चेहेरे को अपने हाथो में लेकर कहा “तेरी वीरता के मान का ऐसा श्रृंगार चढ़ा है फौजी कि अब किसी श्रृंगार की जरुरत ही नहीं| तूने अपना खून बहाया तो मैंने अपना सिंदूर वार दिया भारत माँ के चरणों में| तुझसे एक रत्ती भी कम नहीं है भारत माँ से मेरा प्यार फौजी”

फौजी की पत्नी के चेहेरे पर स्वाभिमान का तेज बिखर रहा था| एक भी आँसू नहीं था उसकी आँखों में| वो सौंदर्य की अप्रतिम प्रतिमा लग रही थी| रति और कामदेव भी ऐसा श्रृंगार नहीं कर सकते जैसा श्रृंगार उस फौजी के प्रति उसके प्रेम के अभिमान ने किया था|

Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी

सतीश भारद्वाज 


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Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

साथियों नमस्कार,  आज हम आपके लिए एक ऐसी कहानी “Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद” लेकर आएं हैं, जिसे पढने के बाद गरीब और गरीबी के प्रति आपकी सोच में परिवर्तन आ जाएगा| यह पूरी कहानी आपकी सोच को बदल कर रख देगी…


Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

‘कहाँ जा रहा है तू ?’ गंजू ने दौड़ कर जाते हुए संजू से पूछा।

‘मन्दिर’ दौड़ते दौड़ते ही संजू ने जवाब दिया।

गंजू ने तेज़ दौड़ लगाकर संजू की कमीज पकड़ ली।  संजू गिरते गिरते बचा।

‘क्या है… पकड़ा क्यों है… बता तो दिया था मैं मन्दिर जा रहा हूं’ संजू बौखलाया।

‘पर भागता हुआ क्यों जा रहा था … ऐसी क्या बात हो गई ?’ गंजू ने कहा ।

‘तू भूल गया… आज मंगलवार है… आज के दिन एक बहुत बड़ा सेठ मन्दिर में आता है और खूब सारी चीजें बाँट कर जाता है… अगर देर कर दी तो बहुत सारी चीजें खत्म हो जायेंगी।  वैसे भी लम्बी लाईन लग जाती है।  पहले ही देर हो रही थी और अब एक तो तूने आवाज़ लगा दी, फिर पकड़ कर रोक लिया।  छोड़ मेरी कमीज … फट जायेगी … तूने चलना है तो चल … अब तो तेजी से भाग कर जाना पड़ेगा’ संजू ने गंजू को डाँट लगाई।

‘चलो भागो…’ कहते हुए दोनों ही मन्दिर की ओर दौड़ पड़े।

रामभक्त हनुमान जी के इस मन्दिर में हर मंगलवार को बेकाबू भीड़ होती है। अनेक भक्त तरह तरह के प्रसाद चढ़ाते और फिर मन्दिर के बाहर गरीबों में बाँटते।

बहुतेरे भक्त अपनी गाड़ियों में खाने का काफी सामान लाते और लाइन लगवा कर बाँटते। लाइन में लगे प्रसाद पाने वाले लाइन में तो जरूर लगे रहते थे पर एक दूसरे को ऐसे पकड़े रहते थे कि बीच में कोई जगह न बचे ताकि कोई अन्य आकर उस में न घुस जाये।

जब दानी लोग प्रसाद बाँटना शुरू करते तो लाइन में हलचल शुरू हो जाती।  सबसे पीछे खड़ा अपने से आगे वाले को हलका सा धक्का भी मारता तो उसका प्रभाव लाइन में सबसे आगे खड़े तक पहुँचता, ठीक वैसे ही जैसे बिना इंजन की खड़ी रेलगाड़ी में जब इंजन आकर लगता है तो सभी डिब्बे हिल जाते हैं।

Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

कभी-कभी तो इस धक्के में इतना बल का प्रयोग होता है कि सबसे आगे वाला गिरता गिरता बचता है और चिल्लाता है ‘ठीक से नहीं खड़े हो सकते तुम’।

यूँ तो अनेक भक्त प्रसाद बाँट रहे थे।  पूड़ी-आलू की सब्जी का प्रसाद सबसे ज्यादा बँटता था।  इस प्रसाद से वहाँ प्रसाद पाने वालों की क्षुधा शांत हो जाती थी।  प्रसाद पाने वालों को स्वाद की नहीं पेट भरने की चिन्ता होती है।

कुछ प्रसाद पाने की इच्छा रखने वाले ऐसे भी थे जो लाइन में खड़े नहीं हो सकते थे।  वे मन्दिर के सामने सड़क किनारे पटरी पर बैठे थे।  यदि कुछ दानी भक्तों की दयालु नज़र उन पर पड़ जाती जो वे उन्हें वहीं जाकर प्रसाद दे आते और वे काँपते हाथों से प्रसाद पकड़ते।

अक्सर प्रसाद काफी गर्म होता था क्योंकि कुछ दानी भक्त मन्दिर के बाहर स्थित हलवाई की दुकान से ताज़ा ताज़ा प्रसाद बनवा कर बाँटते। पर मुश्किल यह थी कि पत्ते के बने दोनों में प्रसाद पकड़ना प्रसाद पाने वाले के लिए रोहित शेट्टी के शो ‘खतरों के खिलाड़ी’ के खतरनाक स्टंट से कम नहीं होता था।

गर्म पूड़ी और सब्जी का दोना हाथ में आते ही उसकी गर्माहट से हथेलियाँ जल उठती थीं।  एक हथेली से दूसरी हथेली में और दूसरी हथेली से पहली हथेली में पलटते पलटते बुरा हाल हो जाता था।  बीच बीच में फूँक भी मारते रहते।

अब दानी सज्जनों का इस ओर तो ध्यान जाता नहीं था।  वे तो बस प्रसाद खत्म होने तक जल्दी जल्दी बाँटते रहते और खत्म होते ही निकल जाते। उधर जब हथेलियाँ प्रसाद की प्रचण्ड गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पातीं तो उंगलियों से गर्म पूड़ी और सब्जी का निवाला बनाकर मुँह में डाला जाता जो बहुत देर से प्रसाद पाने की प्रतीक्षा कर रहा होता था।

उंगलियां भी जैसे जल जातीं थीं। पर जैसे ही गर्म निवाला मुँह में जाता तो मुँह खुला ही रह जाता और कभी कभी जलन से कराह उठता था तथा जलन को शान्त करने के लिए खुले मुँह से जोर जोर से साँस ली जाती जिससे कि निवाला ठंडा हो जाये।  फिर जैसे-तैसे उसे पेट की अग्नि को शांत करने के लिए निगल ही लिया जाता।

चबाने का मतलब होता कि मुँह ही जल जाये।  मुँह से होता हुआ गर्म निवाला जब अन्दर की ओर बढ़ता तो खाने की नली भी जल उठती और मुँह को कोसती।  मुँह बेचारा भी क्या करता।  वह तो पहले ही जल चुका होता था।  इधर जब खाना पेट में पहुँचता तो भूख की अग्नि गर्म निवाला पहुँचते ही शान्त होने के बजाय बिफर उठती ‘आग में आग कौन डालता है ?’

शरीर में गरम प्रसाद की गर्मी का ताण्डव नृत्य होता।  पेट कराह उठता ‘भूख शान्त करने के बजाय जलाने की यह सजा क्यों ?’ ‘जो मिल रहा है उसे संभालो, हम सबकी किस्मत में यही लिखा है’ हाथ मुंह उसकी कराहट पर बोल उठते।

चूँकि अनुभवी लोगों के लिए यह अनुभव पहला नहीं होता था कुछ अनुभवी प्रसाद पाने वाले अपने साथ पहले ही कुछ व्यवस्था कर लाते थे। उनके मैले-कुचैले थैलों में प्लास्टिक के पुराने बर्तन होते थे और साथ में प्लास्टिक की बोतल में पानी।  बर्तन साफ नहीं होते थे पर इसकी उन्हें चिन्ता नहीं होती थी।  वे तो बस उसे अपने कंधे पर पड़े अंगोछे से पोंछ कर तसल्ली कर लेते थे कि बर्तन साफ हो गया।

इसी तरह प्लास्टिक की बोतल में बंद पानी जो न जाने कब का भरा होता था वही पीते थे।  पर उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुँच चुके वृद्ध जल्दी जल्दी प्रसाद बाँटने वालों के गति से तालमेल नहीं बैठा पाते और बर्तन होते हुए भी उन्हें गर्म दोने पकड़ने पड़ जाते।  जीवन जीने की जंग में कितने घाव सहने पड़ते हैं ये कोई इनसे पूछे।

आप पढ़ रहें हैं Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

कोई घर परिवार तो है नहीं जहाँ बिठा कर आराम से भोजन करवाया जाये। जब आलू-पूड़ी का प्रसाद खा लेने के बाद पेट जैसे तैसे भर लिया तो और खाने की गुंजाइश नहीं होती तो और बँट रहे प्रसाद का क्या करें।  कोई गाय-बैल तो हैं नहीं जो एक बार खूब सारा भर लें और बाद में बैठ कर जुगाली करते रहें।

पर फिर भी पेट भरने के बाद प्रसाद पाने वाले वहाँ से हट नहीं जाते और वे बार-बार प्रसाद की लाइनों में लगते हैं।  इस बार उनके पास प्लास्टिक की थैलियां होती हैं जिनमें वे प्रसाद भरते जाते हैं।  एक ही थैली में पूड़ी, आलू और कभी कभी हलवा यानि मिक्स्ड प्रसाद।  बाँटने वालों के पास इतना समय कहाँ कि वे अलग-अलग थैलियों में प्रसाद दें।

लेने वालों की मजबूरी होती है।  वे गर्मागर्म पूड़ी के करारेपन को गर्म आलू की सब्जी में डूबते देख रहे होते हैं कि इतने में हलवा छपाक से आ पड़ता है।  मजबूरी जो कराये वह कम।  शायद यहीं से आइडिया लेकर कुछ बिस्कुट निर्माताओं ने 50ः50 बिस्कुटों का उत्पादन किया होगा जिसमें मीठे और नमकीन दोनों का स्वाद होता है।

कुछ नौजवान भी प्रसाद बाँट रहे होते हैं पर वे आलू-पूड़ी न होकर बिस्कुट के पैकेट होते हैं।  उन्हें भी भर लेने की लालसा तीव्र होती है।  कभी कभी तो वे हाथ से खींच लिये जाते हैं और बाँटने वाले देखते ही रह जाते हैं।  लेने वाले जब कभी चाय पियेंगे तो साथ में यही बिस्कुट काम आयेंगे।  कितना सोचना पड़ता है इन प्रसाद पाने वालों को, प्रसाद बाँटने वालों से भी अधिक।

गंजू और संजू भी अपना पेट आलू-पूड़ी से भर चुके होते हैं।  उन्हें तो इन्तज़ार है सेठ जी के आने का।  इतने में संजू अपनी निकर की जेब में हाथ डालता है।  ‘जेब में क्या है ?’ गंजू पूछता है ।  जवाब में संजू जेब से निकाल कर हवा में लहराते हुए ‘अरे ये खाली थैली है, प्रसाद इकट्ठा करने के लिये’।

‘तू तो बड़ा समझदार है, मुझे तो यह आइडिया ही नहीं आया, एक और है तेरे पास’ गंजू अनुनय विनय करते हुए बोला।  ‘नहीं’ जवाब मिला। उसे इस बात की ईष्र्या होने लगी थी कि संजू तो आज ज्यादा प्रसाद इकट्ठा कर लेगा।  वह इधर उधर सड़क पर देखने लगा कि शायद कोई थैली मिल जाये।

उसकी निगाह एक थैली पर गयी जिसमें कुछ मिला जुला प्रसाद पड़ा था।  उसने तुरन्त वह थैली उठाई और उसे उलट दिया ।  यानि बाहर का हिस्सा अन्दर और अन्दर का हिस्सा बाहर जिससे प्रसाद बाहर फेंका जा सके।  फिर उसने प्रसाद किनारे लगे डस्टबिन में फेंक दिया और अब बाहरी हिस्से को हाथों से पोंछ लिया।

थैली साफ हो गई पर हाथ सन गए थे जिसे उसने अपने निकर से पोंछ लिया।  अब गंजू को भी तसल्ली हो गई थी कि वह भी प्रसाद इकट्ठा कर लेगा ।

‘सेठ जी की गाड़ी अभी तक नहीं आई।  आज प्रसाद पाने वाले भी ज्यादा हैं।  संजू तू ऐसा कर वहाँ दूर जाकर खड़ा हो जा।  जैसे ही तुझे सेठ जी की गाड़ी नज़र आये तू मुझे इशारा कर दियो और फिर भाग कर आ जाइयो, मैं सबसे आगे खड़ा हो जाऊँगा और तेरे आते ही तुझे भी अपने आगे लगा लूँगा।

कोई पूछेगा तो कह दूँगा कि मुझे कह कर गया था।’ गंजू ने आइडिया दिया।  ‘ठीक है’ कह कर संजू भाग कर दूर चला गया और एक जगह जाकर ऐसे खड़ा हो गया जहाँ गंजू भी नजर आता रहे और आती हुई सेठ जी की गाड़ी भी।

कुछ ही पलों में संजू को सेठ जी की गाड़ी नज़र आई और वह योजना के अनुसार हाथ उठाता हुआ गंजू की तरफ भाग पड़ा।  गंजू ने भी लाइन लगाने का उपक्रम किया।  पर औरों को क्या मालूम कि क्या हो रहा है।  गंजू ने पीछे मुड़कर देखा तो लाइन में वह अकेला ही था।  इतने में संजू भी आ गया और लाइन में अब दो जने हो गये थे।

‘आज मजा आयेगा’ दोनों ही खुशी से कह रहे थे।  इतने में सेठ जी की तथाकथित गाड़ी फर्राटे से उनके पास से निकल गई।  ‘यह क्या, आज सेठ जी ने प्रसाद नहीं बाँटा’ संजू बोला।  ‘अबे तुझे पक्का पता है वह सेठ जी की गाड़ी थी’ गंजू बोला।  ‘हाँ, सेठ जी की गाड़ी ऐसी ही है’ संजू बोला।  ‘ऐसी ही है का क्या मतलब, ऐसी तो कई गाड़ियां हो सकती हैं, तुझे गाड़ी का नम्बर नहीं मालूम’ गंजू बौखलाया।

‘तू तो ऐसे कह रहा है जैसे तुझे नम्बर पढ़ना आता हो, तू पढ़ सकता है गाड़ी का नम्बर, बता सामने वाली गाड़ी का नम्बर क्या है?’ संजू ने पलट कर कहा।  ‘यार कह तो तू ठीक रहा है, हम पढ़े लिखे तो बिल्कुल भी नहीं हैं।  अभी से हमारा यह हाल है तो बड़े होकर क्या होगा ?  हमसे कौन शादी करेगा ?

अगर हो भी गई तो हमारे बच्चे भी क्या यहीं लाइनों में लगेंगे ?’ गंजू ने भविष्य की कल्पना संजू से साझा की थी।  ‘कह तो तू ठीक रहा है गंजू, कुछ सोचना पड़ेगा’ संजू ने सिर खुजाया।  वे यह सब सोच ही रहे थे कि सेठ जी की गाड़ी आ गई और लाइन लग गई।  शोर-शराबे से दोनों का ध्यान टूटा तो देखा कि सेठ जी की गाड़ी में लाया गया प्रसाद बाँटा जाने लगा था।

लम्बी लाइन लग चुकी थी और वे लाइन से बाहर थे।  आज की सोच ने उनकी प्रसाद लेने की इच्छा पर आक्रमण कर दिया था।  प्रसाद पाने की इच्छा छोड़ वे गाड़ी में बैठे सेठ जी के पास गये और उन्हें नमस्ते की।  ‘अरे बेटा, प्रसाद बँट रहा है, जाकर ले लो’ सेठ जी ने प्रेम से कहा।  पर वे वहीं खड़े ही रहे।

‘क्या बात है बच्चो, तुमने प्रसाद नहीं लेना क्या’ दयालु सेठ ने फिर पूछा।  ‘सेठ जी, प्रसाद तो लेना है मगर वह नहीं जो आप बाँटते हैं, हमें कुछ और चाहिए’ दोनों बोले।  ‘बेटा, अगर तुम सोच रहे हो कि मैं प्रसाद में तुम्हें पैसे दूँ तो यह न हो सकेगा, मेरे असूल के खिलाफ है’ सेठ जी ने फिर कहा।

‘नहीं सेठ जी, हमें पैसे भी नहीं चाहियें’ दोनों ने एकसाथ कहा।  ‘तो बच्चो, फिर क्या चाहिए?’ सेठ जी ने उत्सुकता से कहा।  ‘सेठ जी, हम दोनों पढ़ना चाहते हैं, आप हमारे पढ़ाने की व्यवस्था कीजिए’ दोनों ने फिर एकसाथ कहा।

‘क्या … क्या बात है’ कहते हुए सेठ जी गाड़ी से उतर आये।  उन्होंने संजू और गंजू से कहा कि उनकी उम्र के जो भी बच्चे हैं उन्हें इकट्ठा करो। वे दोनों भाग-भाग कर हमउम्र बच्चों को इकट्ठा कर लाये।  10-12 बच्चे इकट्ठे हो गये थे।  सेठ जी ने उन सभी के बारे में जानकारी ली और पूछा ‘तुम में से कौन-कौन पढ़ना चाहता है ?’

हिंदी कहानी Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

सभी के हाथ एकसाथ उठ गये।  सेठ जी हैरान रह गये।  ‘यह मैं क्या प्रसाद बाँटता रहा आज तक, इन दोनों बच्चों ने मेरी आँखें खोल दी हैं, इस प्रसाद के साथ साथ मैं प्रण करता हूँ कि अब मैं शिक्षा का प्रसाद भी बाँटूंगा’ सेठ जी ने मन ही मन कहा।

‘बच्चो, तुम्हारे घरों के पास जो स्कूल है, वहाँ कल सुबह तुम मुझे मिलो, मैं तुम्हारा स्कूल में प्रवेश कराऊँगा और पढ़ाई का पूरा इन्तज़ाम करूँगा।  तुम खूब मन लगाकर पढ़ना और बड़े होकर मेरी तरह बनना’ कहते कहते सेठ जी नरम हो गये थे।  ‘हम भी आप बन सकते हैं’ बच्चों ने एकदम पूछा।

‘हाँ, क्यों नहीं, अगर तुम पढ़ लिख गये तो मेरे से भी ज्यादा आगे बढ़ जाओगे’ सेठ जी ने उत्साहवर्द्धन किया।  ‘वाह, चलो भई चलो, हम सब कल सुबह स्कूल में मिलेंगे’ कहते हुए बच्चे वहाँ से चले गये।  ‘अरे, प्रसाद तो लेते जाओ’ सेठ जी मुस्कुरा कर बोले।  ‘नहीं सेठ जी, आज जो आपने प्रसाद बाँटा है उस प्रसाद को तो हम भी कुछ समय बाद बाँटेंगे और आपको हमेशा याद करेंगे’ बच्चे आह्लादित थे।

‘बच्चो, आज मैंने नहीं तुमने मुझे प्रसाद बाँटा है, अगर तुम न कहते तो मेरे चक्षु नहीं खुलते।  आज तुमने मुझे जीवन में मंगलवार का बहुत बड़ा प्रसाद दिया है कहते हुए सेठ जी अपनी आँखें पोंछने लगे थे।

Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

सुदर्शन खन्ना


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खारा पानी | Hindi Story with Moral

खारा पानी | Hindi Story with Moral

साथियों नमस्कार, आज की हमारी कहानी “खारा पानी | Hindi Story with Moral” राजनीती से ओतप्रोत है| यह कहानी हमारी मण्डली के लेखक सतीश भारद्वाज ने लिखी है| आशा है आपको हमारी यह कहानी बेहद पसंद आएगी|

इस कहानी में लेखक ने राजनीती को साथ में रखकर राजनीती से अलग एक दिल को छु लेने वाले पहलु को निर्देशित किया है|


खारा पानी | Hindi Story with Moral

बुंदेलखंड में हरेन्द्र पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ घूम रहा था| दिल्ली में व्यवसाय अच्छा था, हाल ही में राजनीति में पदार्पण हुआ था| सपना कोई चुनाव जीतकर विधान भवन में जाने का था| अपने सामाजिक सरोकार अच्छे होने के कारण पार्टी में अच्छा पद भी मिल गया था|

गर्मी काफी थी, गाडी का ऐ सी पूरी ताक़त से गाड़ी को ठंडा कर रहा था| गाडी एक छोटे से गावं में रुकी| कुछ झोपड़ियाँ थी, शायद दलित वर्ग की थी| पार्टियों के झंडे तो यहाँ पहुँच गए थे लेकिन विकास नहीं|

हरेन्द्र एक छप्पर के निचे खाट पर बैठ गया| कार्यकर्ता भी वहीँ खड़े हो गए| गावं के कुछ बुजुर्ग और युवक वहां एकत्र हो गए|

हरेन्द्र के साथ एक पुराने नेता थे| जानते थे कैसे पब्लिक को मोहित किया जाता हैं| बैठते ही बोले “पानी मिलेगा क्या?”

एक व्यक्ति ने जोर से एक महिला से कहा “पानी लाओ री”

हरेन्द्र को कुछ अजीब लगा, सोच रहा था की पानी साफ़ भी होगा या नहीं|

नेता जी: और कैसा चल रहा है सब

ग्रामीण: चल का रओ, बस उई खानो कमानो| और काये लाने आये नेता जी इतै|

नेताजी: जनता के बीच आने को भी कोई बहाना चाहिए| हमारी पार्टी बुदेलखंड का विकास चाहती है| बस आप लोगो का आशीर्वाद मिले तो|

ग्रामीण: हमाओ से का लोगे नेताजी| हम का देई|

नेताजी: वोट! तुम्हारा वोट ही तो हमारी ताक़त हैं|

फिर कुछ देर और बातो का दौर चला

इतने में नेता जी को याद आया और बोले “क्या भैया, पानी भूल गए?”

बातो में ही पौन घंटा बीत गया था| पानी के लिए गिलास तो आ गए थे पर पानी नहीं|

ग्रामीण: आयरो नेता जी पानी लेने के लाने उत गयी मुर्हाओं|

तभी एक बुढिया बोली “आऊत तन देर मई नेता जी, लिंगा भौते दूर रऐ, टेम लगै”

तभी हरेन्द्र ने देखा एक औरत अपने सर पर पानी का घड़ा लिए आ रही है पसीने से लथपथ| उसने आते ही सबको पानी दिया|

हरेन्द्र को कुछ बेचैनी हो रही थी| उसने ग्रामीण से पूछा “कितनी दूर से लाये हो पानी? क्या घर में बिलकुल भी नहीं था|”

ग्रामीण: हैओ पानी तो नेताजी, पर मोए लगा ताज़ा पी लेओ| उ कोई एक कोष जाना परै पानी के लाने|

हरेन्द्र पानी पीते पीते ही उस जगह से उठकर थोडा अलग चला गया क्यूंकि अब वो अपनी आँखों के बहाव को रोक नहीं पाया था|

वहां से चलने पर हरेन्द्र बोल पड़ा “मुझे वापस जाना है”

नेताजी ने अचकचा कर “क्यूँ?”

हरेन्द्र: तैयारी करनी है|

नेता जी: तैयारी ही तो चल रही है| एक महीने बाद टिकट चयन होगा| भाई तब तक पार्टी जहाँ बोल रही है वहां घुमो| पार्टी को जरुरत हैं बड़े जनाधार की|

हरेन्द्र: तैयारी टिकट की नहीं करनी है नेता जी| चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं है अभी|

ये सुनकर नेताजी सकपका गए

हरेन्द्र विस्मृत सा बोल रहा था “इन लोगो के वापस पास आना है| उन सब के पास भी जाना है जिन्हें मेरी जरुरत है”

नेताजी मुस्कुराते हुए बोले “भैया विधायक छोड़ नेता बनने का ख्वाब देख रहे हो”

हरेन्द्र: पता नहीं नेताजी, बहुत ही खारा था ये पानी| बहुत सारा नमक अन्दर चला गया| उसका ऋण उतारने को शायद सारी उम्र भी कम पड़ जाए|

खारा पानी | Hindi Story with Moral


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Hindi Story with Love | हिजड़ा

Hindi Story with Love | हिजड़ा

साथियों नमस्कार, आज हम आपको एक ऐसी कहानी “Hindi Story with Love | हिजड़ा” सुनाने जा रहें हैं जो प्रेम, वात्सल्य और ममता से भरी होने के साथ-साथ समाज की रूडिवादी  सोच को भी सोचने पर मजबूर कर देती है|

यह कहानी हमें हमारी मण्डली के लेखक “सतिश जी भारद्वाज” ने भेजी है| हमें पूरा यकीं है आपको हमारी यह कहानी ज़रूर पसंद आएगी|


Hindi Story with Love | हिजड़ा

बस यात्रियों से भर चुकी थी और चलने को तैयार थी| सभी अपना सामान और खुद को संयत करने में लगे थे| एक युगल अपने लगभग पाँच वर्ष के बच्चे के साथ बैठा था| उस बच्चे ने हाथ में एक दो रूपये का सिक्का मजबूती से पकडा था|

बच्चे की माँ ने उस बच्चे से वो सिक्का माँगा तो बच्चे ने देने से इनकार कर दिया|

बच्चे की माँ ने झल्लाकर कहा “गिरा देगा तू इसे कहीं”

लेकिन बच्चे ने ध्यान नहीं दिया और जाहिर कर दिया कि वो सिक्का नहीं देगा|

 तभी बस में एक प्रोढ़ उम्र का हिजड़ा चढ़ा| वो चटक लाल रंग का सूट सलवार पहने हुए था और होठो पर चटक लाली पोती हुई थी| बस में चढ़ते ही उसने ताली पिटते हुए कुछ नवयुवको की तरफ उत्तेजक इशारे किये और उन्हें छेड़ा|

उन युवको ने भी एक मादक मुस्कान के साथ उसको 10 का नोट थमा दिया| हिजड़ा अपनी इन उत्तेजक भाव भंगिमाओ के साथ बस में आगे बढ़ते हुए मांगने लगा|

उस युगल का चार वर्षीया बच्चा उस हिजड़े को उत्त्सुकता से देख रहा था| बच्चे के माता-पिता के साथ कई अन्य यात्रियों को भी उस हिजड़े की हरकतों से घृणा हो रही थी|

बस में कुछ ऐसे यात्री भी थे जिन्हें वो हिजड़ा मनोरंजन का साधन लग रहा था| ऐसे लोगो के मनोरंजन के लिए हिजड़ा अपनी हरकतों को और ज्यादा मादक करके कुछ मादक गीतों के बोल भी गा रहा था|

वो हिजड़ा बस में पीछे कि तरफ बढ़ चूका था और अभी उसने दो ही लोगो से पैसे लिए थे कि उस चार वर्षीय बच्चे ने जोर से उस हिजड़े को आवाज़ लगायी “माँ”

हिजड़े ने ध्यान नहीं दिया, बच्चे ने फिर आवाज़ लगायी “माँ”

अबकी बार हिजड़े ने ये शब्द “माँ” सुना तो लेकिन उस तरफ देखा नहीं|

उस बच्चे को उसकी माँ ने रोकने का प्रयास किया लेकिन बच्चे ने पुन: अपनी पूर्ण शक्ति से आवाज दी “ओ ताली बजाने वाली माँ”

इस बार एक झटके से हिजड़े ने पलट कर देखा| तभी एक व्यक्ति ने उसे देने के लिए एक नोट निकाल लिया था| उस हिजड़े ने वो नोट पकड़ भी लिया था लेकिन उस हिजड़े ने उस नोट को छोड़ दिया|

हिजड़े का ध्यान आकर्षित होते देखकर उस बच्चे की माँ जो बच्चे को रोक रही थी वो थोडा सहम गयी|

हिजड़े के भाव बदल गए थे उसके मुहँ से बस इतना निकला “हाँ मेरे बच्चे”

आप पढ़ रहें हैं सतीश भारद्वाज की लिखी “Hindi Story with Love | हिजड़ा”

बच्चे ने वो सिक्का हिजड़े को दिखाते हुए कहा “माँ ये भी लेलो”

ये शब्द माँ एक बार और सुनकर हिजड़े की आँखे जो अब तक नम सी थी अब उनसे पानी चेहरे पर आ चूका था| जो हिजड़ा अब तक अपनी उत्तेजक भावभंगिमाओं से मात्र मनोरंजन का साधन प्रतीत हो रहा था या कुछ लोगो को असहज किये हुए था|

अब वो हिजड़ा विस्मृत हो गया था| वो यूँ ही आगे बढ़ा, तभी उसे कुछ ध्यान आया उसने रुककर एक यात्री से लिए पैसे उसे लौटा दिए| वो यात्री अवाक हिजड़े को देख रहा था|

तभी बच्चे की एक और आवाज़ आई “माँ आजा”

हिजड़े ने एक रुंधी हुई आवाज में कहा “आ गयी मेरे बच्चे”

हिजड़े ने बच्चे के पास से गुजर कर आगे जिस सवारी से पैसे लिए थे उसे भी लौटा दिए| और बच्चे के पास आकार वो हिजड़ा अपलक उस बच्चे को निहारने लगा|

बच्चे के छोटे से हाथो से हिजड़े ने वो सिक्का लिया और उसे चूमकर माथे लगाया और ऊपर सर उठाकर भगवान् का धन्यवाद किया| बस में सभी इस दृश्य को देखकर अवाक थे|

क्या था आखिर उस दो रूपये के सिक्के में ऐसा जिसके लिए हिजड़े ने बस से इकट्ठे किये हुए सारे पैसे वापस लौटा दिए|

हिजड़े की आँखों से अब अविरल अश्रु धारा बह रही थी| हिजड़े की जिन आँखों थोड़ी देर पहले मादकता थी अब वो वात्सल्य से भर चुकी थी| हिजड़े ने बच्चे के सर को चूमा, हिजड़ा बुदबुदा कर बच्चे को दुआएं दे रहा था|

हिजड़े ने अपनी एक थैली में से 100 रूपये निकाल कर बच्चे के हाथ पर रख दिए| बच्चे की माँ ने उसे रोकते हुए कहा “ये क्या कर रहीं हैं आप”

हिजड़े ने अपने दुपट्टे से अपना मुहँ पूछा और बोला “बीबी आज से मेरी उम्र भी इसके नाम और इसके सारे दुःख मेरे नाम,  बीबी तेरा बेटा है तुझे बना रहे, भगवान् सुखो से तेरी जिन्दगी भर दे”

हिजड़े ने फिर से आंशुओ से भीग चुके चेहरे को दुपट्टे से साफ़ किया और बच्चे के चेहेरे को अपने हाथो में लेकर चूमा और बोला “बीबी मुझे तो पैदा होते ही मेरी माँ ने भी रिश्ता तोड़ लिया था, हम हिजड़ो का जनम होता ही ऐसा है|

बीबी जिन्दगी में पहली बार आज इस बच्चे ने माँ कहा तो लगा… हाँ मैं भी इंसान हूँ| बीबी इस बच्चे ने मुझे क्या दे दिया तू ना समझेगी”

फिर वो हिजड़ा उस सिक्के को अपनी छाती से लगाये बस से उतर लिया और जाते जाते वो बस बच्चे को दुआए और आशीष देता चला जा रहा था|

बच्चे ने अपने पिता को वो सो रूपये का नोट दिखाया तो पिता ने उस नोट को अपने माथे से लगाया और अपनी पत्नी से बोला “संभाल कर रखना इसे, ये आशीर्वाद है एक माँ का…. अपने बेटे को”

Hindi Story with Love | हिजड़ा 

लेखक- सतीश भारद्वाज 

फोन नंबर :9319125343


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साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए कुछ खास “Hindi Short Stories for Kids” लेकर आएं हैं जिन्हें आप अपने घर परिवार के बच्चों को सुनाकर उन्हें ज़िन्दगी की बड़ी सिख दे सकते हैं| आशा है आपको हमारा यह संकलन पसंद आएगा|


“सोच समझ कर बोल | Hindi Short Stories with Moral”

एक बार की बात है एक संपन्न राज्य में एक राजा निवास करता था| राज्य में सभी सुख-संपन्न थे लेकिन राजा के कोई संतान नहीं थी| संतान सुख न पाकर हमेशा राजा दुखी रहता था|

एक बार राज्य में एक बहुत ही जाने माने साधू अपने साधुओं की टोली के साथ आए| राजा को जब साधू-महात्मा के आने की खबर मिली तो राजा बहुत प्रसन्न हुआ|

अगले दिन ही राजा सुबह-सुबह साधू-महात्मा की कुटीया में पुछा और संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थना करने लगा| राजा की बात सुनकर साधू ने कहा – “राजन! आपके प्रारब्ध में संतान नहीं लिखी है| आपकी इस समस्या के लिए में आपकी कोई मदद नहीं कर सकता|

साधू की बात सुनकर राजा उदास हो गया और उदास मन से ही साधू की कुटिया से लौट गया| इधर साधू-महात्मा के एक शिष्य ने जब राजा को अपने लाव-लश्कर के साथ कुटिया से लौटते देखा तो राजा से यहाँ आने का कारन पूछा|

राजा ने अपनी समस्या साधू के शिष्य के समक्ष रखी| शिष्य ने राजा को आश्वाशन दिया की राजन आप चिंता न करें आपकी मनोकामना जरुर पूरी होगी| शिष्य की बात सुनकर राजा प्रसन्न मन से महल में लौट गया|

इधर साधू-महात्मा को जब शिष्य और राजा की वार्ता का पता चला तो वह  शिष्य पर बहुत नाराज़ हुए की जब राजा के भाग्य में संतान प्राप्ति नहीं थी तो तुमने राजा को संतान प्राप्ति का आश्वाशन क्यों दिया|

गुरूजी की बात सुनकर शिष्य बोला, “गुरूजी! राजा को उदास देखकर मेरे मुह से निकल गया| अब में क्या करूँ”

गुरूजी ने शिष्य को कहा, “अब अपने वचन के कारण तुम्हें ही राजा के घर पुत्र बनकर जन्म लेना पड़ेगा|”

समय पाकर राजा के घर एक पुत्र का जन्म हुआ| राजा का पुत्र सब शुभ लक्षणों से संपन्न था, पर उसमें एक दोष था की वह मुह से कुछ नहीं बोलता था|

राजा ने दूर दूर से कई जाने माने वैध-हकिम बुलाए लेकिन कोई फायदा न हुआ| राजा ने पुरे राज्य में खबर करवा दी की जो भी राजकुमार को बुलवाएगा उसे एक लाख रूपए का इनाम दिया जाएगा|

कई लोग महल में आए, उन्होंने कई तरह के उपाए किए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ|

समय बीतता रहा| समय के साथ-साथ राजकुमार भी बड़ा हुआ| एक दिन राजकुमार कुछ सैनिकों के साथ जंगल में शिकार के लिए गया| वहां एक शिकारी शिकार की तलाश में बैठा था| शिकारी काफी देर से शिकार के लिए पक्षी खोज रहा था लेकिन उज़े कोई भी पक्षी दिखाई नहीं दे रहा था|

आप पढ़ रहे हैं “Hindi Short Stories for Kids | सोच समझ कर बोल”

तभी पास ही के पेड पर बैठा एक पक्षी बोल पड़ा| पक्षी की आवाज़ सुनकर शिकारी की नज़र पक्षी पर पड गई और उसने तीर से निशाना लगा कर पक्षी को मार गिराया|

राजकुमार पास ही से इस पुरे वाकिये को देख रहा था| पक्षी के शिकार बनते ही राजकुमार बोल पड़ा, “बोला तो मरा”| राजकुमार के बोलने पर सब आश्चर्यचकित हो उठे और तुरंत राजकुमार को लेकर राजा के पास पहुंचे|

राजा के पास पहुंचकर सैनिकों से सारी बात महाराज को बता दी| राजा को सैनिकों की बात पर बिलकुल भी यकीन नहीं हुआ| उसे लगा सैनिक एक लाख के इनाम के लिए राजा को राजकुमार के बोलने की झूंठी कहानी बता रहें हैं|

राजा ने सैनिकों की बात को झूठा मानकर सैनिकों को फांसी का हुक्म सुना दिया|

सैनिकों को फांसी का हुक्म सुनकर राजकुमार फिल बोल उठा, “बोला तो मरा”

राजकुमार की बात सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ| राजा ने राजकुमार से साफ-साफ पूरी बात बताने का आग्रह किया|

राजकुमार ने  महाराज को प्रणाम किया और बोला, “महाराज! में वही साधू हूँ जिसने आपको संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दिया था| आपके भाग्य में संतान नहीं थी लकिन में बोल गया और मुझे आपके घर संतान बनकर जन्म लेना पड़ा|

अगर में न बोलता तो मुझे मरकर पुनः जन्म न लेना पड़ता| ऐसे ही शिकार के वक़्त अगर वह पक्षी न बोलता तो वह भी नहीं मरता|

अगर सैनिक मेरे बोलने का समाचार आपको न सुनते तो उन्हें भी फांसी की सजा न होती| यह सब बिना सोचे समझे बोलने का परिणाम है|

इसीलिए मेरे मुह से निकला “बोला तो मरा”

अब में भी जाता हूँ क्यों की में भी बोल गया| बस इतना कहकर राजकुमार मर गया|

इसलिए कहा गया है की “बिना सोच विचार के कभी भी नहीं बोलना चाहिए|”

Hindi Short Stories for Kids | लालची राजा


“सो रूपए की एक बात | Hindi Kahani”

एक नगर में एक सेठ रहता था| सेठ बड़ा ही इमानदार और धार्मिक प्रवृत्ति का इन्सान था| एक दिन सेठ के यहाँ विचरण करते हुए एक पंडित जी आए| पंडित जी के चहरे से झलकते तेज़ से प्रभावित होकर सेठ पंडित से प्रभावित हो गया|

पंडित ने आदरपूर्वक साधू महात्मा को बैठाया और उनकी अच्छे से आवभगत की| जब पंडित जी पुनः जाने लगे तो सेठ ने उनसे अपने व्यापार में लाभ के लिए कुछ बाते बताने का आग्रह किया|

सेठ की बात सुनकर पंडित जी बोले, “सेठ जी! बात तो में आपको बता दूंगा लेकिन एक बात के सो रूपए लूँगा|”

सेठ जी ने पंडित की बात मान ली और बोले, “पंडित जी आप बात बताएं, रुपयों की चिंता आप न करें! आपको रूपए मिल जाएँगे”

पंडित ने पहली बात बताई, “छोटा आदमी यदि बड़ा बन जाए तो उसे बड़ा ही मानना चाहिए, छोटा नहीं समझना चाहिए”

सेठ ने मुनीम जी को पंडित जी को सो रूपए देने का कह दिया| सेठ की बात मानकर मुनीम जी ने पंडित को सो रूपए दे दीए|

पंडित ने आगे और बात बताने का आग्रह किया| पंडित जी बोले, “दुसरे के दोष को प्रकट नहीं करना चाहिए”

सेठ के कहने पर मुनीम ने इस बात के भी सो रुपाए दे दीए|

सेठ बोला, “पंडित जी और कोई बात बताएं”

पंडित जी बोले, “जो काम नोकर से हो जाए उसे करने में अपना समय नहीं लगाना चाहिए” मुनीम ने इस बात के भी सो रूपए दे दीए|

सेठ जी ने पण्डित जी से एक और बात बताने का आग्रह किया| पण्डित जी बोले, “जहाँ एक बार मन फट जाए उस स्थान पर फिर नहीं रहना चाहिए” मुनीम ने इस बात के भी सो रूपए पंडित जी को दे दिए|

सेठ जी ने पंडित की बताई चारों बातों को याद कर लिया और उनको घर और दुकान में कई जगह लिखवा दिया|

कुछ समय बाद सेठ को व्यापार मेंभारी नुकसान हो गया| नुकसान इतना भारी था की सेठ जी का पूरा व्यापार ठप्प हो गया और उन्हें नगर छोड़कर दुसरे नगर व्यापार के लिए जाना पड़ा|

सेठ जी के साथ उनका मुनीम भी था| चलते-चलते वे एक शहर के पास पहुंचे| सेठ ने मुनीम को शहर से कुछ खाने-पिने का सामान लेन के लिए भेजा| सेठ की बात सुनकर मुनीम शहर में खाना लेने के लिए गया|

देवयोग से उस शहर के राजा की म्रत्यु हो गई थी| राजा की कोई संतान नहीं थी और राजगद्दी का कोई भी वारिस न था|

अतः शहर के लोगों ने फैसला किया की जो भी व्यक्ति सुबह की  पहली किरण के साथ शहर में प्रवेश करेगा उसे ही राजा बना दिया जाएगा|

इधर सेठ जी का मुनीम शहर में खाने पिने का सामान लेने के लिए पहुंचा| मुनीम ने जैसे ही शहर में प्रवेश किया लोग उसे हठी पर बिठाकर महल में ले गए और राजगद्दी पर बिठा दिया|

इधर बहुत समय तक मुनीम के वापस न लौटने पर सेठ जी को चिंता हुई और वे मुनीम को ढूंढने शहर में पहुचे| शहर पहुंचकर सेठ जी को पता चला की मुनीम तो अब राजा बन गया है|

सेठ जी महल में जाकर राजा बने मुनीम से मिले| मुनीम ने सारी कथा सेठ को सुना दी| तभी सेठ जी को पंडी जी की कही बात याद आई, “छोटा आदमी यदि बड़ा बन जाए तो उसे बड़ा ही मानना चाहिए , छोटा नहीं समझना चाहिए”

सेठ ने राजा बने मुनीम को प्रणाम किया| मुनिम ने राजा को मंत्री बना दिया|

राजा के घुडसाल का जो अध्यक्ष था उसका रानी के साथ अनेतिक सम्बन्ध था| एक दिन संयोग से सेठ ने राजी को घुड़साल के साथ शयन करते देख लिया|

दोनों को नींद आई हुई थी| सेठ को तभी पंडित की बाद याद आई, “दुसरे के दोष को प्रकट नहीं करना चाहिए” यही सोचकर सेठ ने रस्सी पर अपनी शाल डाल दी ताकि कोई ओर उनको न देख सके|

जब रानी की नींद खुली तो उसने रस्सी पर शाल पड़ी हुई देखि| रानी ने अपने सैनिकों से पता लगवाया की यह किसकी शाल है| सैनिकोंने पता लगाया की यह शाल तो सेठ बने मंत्री की है|

रानी ने सोचा राजा और सेठ में घनी मित्रता है कहीं ऐसा न हो की यह मंत्री राजा के सामने मेरी पोल खोल दे| मुझे पहले ही कुछ ऐसा काम करना चाहिए की मंत्री पहले ही फास जाए|

रानी सेठ की शाल लेकर राजा के पास गई और बोली आज रात को आपका मंत्री बुरी नियत से मेरे पास आया था| लेकिन में उसकी नियत को भांप गई और चिल्लाने लगी| मेरे चिल्लाने से डर के मारे वह भागने लगा और उसकी शाल मेरे हाथ में आ गई|

राजा ने देखा की यह तो वही शाल है जो उसने कभी अपने सेठ को उपहार में दी थी| राजा शाल को पहचान गया और रानी के झांसे में आ गया| राजा की बुद्धि फिर गई और उसने रानी की सलाह से राजा को ख़त्म करने का विचार कर लिया|

राजा ने अगले दिन ही मंत्री को कसी के यहाँ मांस लेन के लिए भेज दिया| इधर राजा ने कसी को पहले ही बोल दिया की महल से जो आदमी मांस लेने के लिए आएगा उसे मार देना है|

इधर सेठ ने सोचा की राजा को पता है की में मांस को चूता तक नहीं लेकिन फिर भी राजा मुझे मांस लेन के लिए कसी के पास भेज रहें हैं जरुर इस बात में कुछ न हेतु है| तभी राजा को पंडित की कही तीसरी बात याद आ गई, की “जो काम नौकर के द्वारा हो सकता है वह काम कभी भी खुद नहीं करना चाहिए|”

सेठ ने मांस लेन के लिए अपने नोकर को भेज दिया| कसाई ने राजा की आज्ञा अनुसार राजा के महल से आए आदमी को मार दिया|

इधर राजा को अपने गुप्तचरों द्वारा पता चला की घुडसाल और रानी के अनेतिक सम्बन्ध है| राजा को अपनी भूल पर बड़ा पश्च्याताप हुआ| बेवजह उसने रानी की बातों में आकर सेठ जी को मरवा दिया|

बाद में राजा को पता चला की सेठ जी तो जिन्दा है| राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई| वह एकांत में सेठ जी के पास गया और उनसे अपने किए पर क्षमा मांगी|

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राजा ने सेठ से पुचा की आपकी शाल रानी के पास कैसे आई| तब राजा ने पूरी बात बताई की जब उसने रानी और घुडसाल को शयन करते देखा तो उसे पंडित जी कि कही बात याद आई की,  “किसी के भी दोष को प्रकट नहीं करना चाहिए|” मेने इसी बात का अनुसरण किया और अपनी शाल को रस्सी पर ढँक दिया ताकि दोनों को कोई देख न पाए|

वही शाल रानी आपके पास उठा लाई और अपनी मनघडंत कहानी से आप से मुझे मरवाने का प्रयत्न किया|

राजा ने ओने किए पर सेठ से क्षमा मांगी और राजा से पुनः अपना मंत्री पद सम्हालने का अनुरोध किया| तभी राजा को पंडित की कही चौथी बात यद् आई की, “अगर एक बार कहीं से मन फट जाए तो उस स्थान पर दुबारा नहीं रहना चाहिए”

सेठ ने राजा से क्षमा मांगी और कहा, “महाराज! अब में यहाँ नहीं रुक सकता” बस इतना कहकर सेठ जी महल छोड़कर वहां से चले गए|

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घरु | Hindi Stories


साथियों नमस्कार, भारत-पाकिस्तान विभाजन की कई कहानियां आपने पढ़ी होंगी! लेकिन यकीं मानिये “सतीश भारद्वाज” की लिखी यह कहानी “घरु | Hindi Stories” आपके दिल को छु जाने वाली है! आपकी प्रतिक्रियाओं का हमें इंतज़ार रहेगा…


घरु | Hindi Stories

परितोष तेजवानी घर में आते ही सबसे पहले अपने पिता जगमोहन तेजवानी के पास आया| जगमोहन  तेजवानी 83 वर्ष के विधुर वृद्ध थे| सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त, परितोष भी प्रोढ़ अवस्था में आ चूका था और एक नामचीन पत्रकार है|

{जगमोहन  अपने कमरे में अपनी कुर्सी पर बैठे नित्य की भांति अपने ही विचारों में लीन है| धीमी आवाज़ में मल्लिका पुखराज के गाने चल रहे हैं}

परितोष ने अपने पिता के हाथो को अपने हाथों से नरमी के साथ पकड़ा और बोला “पापा जी”| जगमोहन का ध्यान भंग हुआ और पुत्र को देखकर एक हलकी सी मुस्कराहट अपने चहरे पर बिखेर दी| चेहरे की झुर्रियों में भी जगमोहन आँखे उनकी मुस्कान की गवाही दे रही थी|

परीतोश की आँखों में चमक थी उसने उत्साह से कहा “पापा तयारू कर लो, हम घरु जायेंगे”(पापा तैयारी कर लो हम घर जायेंगे)

जगमोहन एकदम से चंचल हो उठा और बोला “क्या जामपुर?”

परितोष ने जोर देकर कहा “हाँ, टहु दिहुं बाद” (हाँ तिन दिन बाद)

जगमोहन ने संक्षिप्त उत्तर दिया “ठिकू” (अच्छा है) और अपनी कुर्सी से सर टिका कर आँख बंद कर ली|

परितोष कुछ देर और अन्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में बैठा रहा फिर उठकर बाहर चला गया|

जगमोहन  पुरानी यादों में चला गया था शायद|

आज से कोई 70 साल पहले की बात होगी जब भारत की स्वतंत्रता के साथ ही विभाजन भी हो गया था| विभाजन रेखा के दोनों तरफ ही बड़ा कत्लेआम और विस्थापन हुआ था| जगमोहन तेजवानी का परिवार सिन्धी परिवार था|

जगमोहन के पिता का पंजाब के राजनपुर जिले के जामपुर क़स्बे में तम्बाकू का व्यापार था| “जामपुर” “सुलतान पहाड़ीयों” और “सिन्धु नदी” से बनी मनोरम वादियों में बसा पंजाब, पकिस्तान की सीमा पर सिंध से सटा क़स्बा था|

तीन भाई-बहनों में बहन सबसे बड़ी थी, एक और छोटा भाई था| माता पिता के साथ ही जगमोहन के दादा दादी भी रहते थे| दूकान के साथ ही घर था| कुछ जमीन जायदाद भी बना रखी थी|

विभाजन के समय जब कत्लेआम शुरू हुआ तो जगमोहन का परिवार भी उस आग की चपेट में आ गया| अपने पुरे परिवार में से बस जगमोहन ही वापस आ पाया था भारत| भारत में जगमोहन को उसकी बुआ ने पाला था| जगमोहन के फूफा सरकारी नौकरी में थे|

विभाजन के समय सरकारी नौकरी वालो की तो अदला बदली दोनों तरफ की सरकारों ने कर ली थीं लेकिन जो किसान या व्यापारी थे वो आग के दरियाओं को पार करके विस्थापित हुए थे|

जगमोहन के परिवार के साथ पकिस्तान में क्या हुआ?  ये कभी भी जगमोहन ने किसी से नहीं बताया| उस समय का जिक्र आते ही जगमोहन एक मौन धारण कर लेता था और उसकी आँखे पनीली हो जाती थीं|

परितोष ने भी बाकी लोगो की तरह कई बार जानना चाहा था कि उस समय क्या हुआ था? लेकिन जगमोहन ने कभी कुछ नहीं बताया| आज भी जगमोहन को आबिदा परवीन के गीत बहुत सुहाते थे|

हालाँकि वो विभाजन से बाद में पैदा हुई थीं| सिंध और पंजाब, पकिस्तान से सम्बद्ध समाचारो पर जगमोहन का ख़ास ध्यान रहता था| वह परितोष से कई बार कहता था “कडहिं घरु वञणु छा?” (कभी घर जायेंगे क्या?)|

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जगमोहन ने कभी भी इस विभाजन को स्वीकार ही नहीं किया था| जगमोहन  उस विभीषिका से बचकर आ तो गया था लेकिन शायद अपना बचपन, यौवन, हास्य, विनोद, करुणा सब वहीँ छोड़ आया था| एक भावना विहीन शरीर मात्र रह गया था जगमोहन |

लेकिन सिन्धु के जल प्रवाह की वो मोनारम ध्वनि से उत्त्पन्न संगीत, सुलतान पहाड़ियों की हवाओं कि वो सुंगंध आज भी उसके मन में बसी थी जो दिल्ली में भी भी उसको कभी जैसे सहला जाती थी| और यूँ ही मौन बैठे बैठे उसके चहरे पर एक मोहक मुस्कान आ जाती थी|

वो मुस्कान उसे एकदम एक बच्चे की तरह बना देती थी वो हसने लगता था, ठेठ सिन्धी भाषा में या कभी पंजाबी में कुछ भी बोल उठता था, जैसे वो लड़ रहा हो कभी अपने भाई बहनों से तो कभी अपने दोस्तों से|

हालाँकि जगमोहन को अच्छी हिंदी आती थी| वो खो जाता था कंचो या गिल्ली डंडे के खेल में| फिर शांत हो जाता था| किसी राजनैतिक मजलिस या जुलुस में अगर जगमोहन “अल्लहा हु अकबर” का नारा सुनता था तो बेचैन हो उठता था| वो अपने दोनों कानो को अपने हाथो से कसकर भींच लेता था|

सबको लगता था की जगमोहन पागल है| परन्तु अपना कार्य जगमोहन अन्य लोगो से ज्यादा गंभीरता से और कुशलता से करता था| बस वो किसी के साथ ज्यादा घुलता मिलता नहीं था| जगमोहन एक अच्छा पिता और पति रहा लेकिन उसके आचरण में ये असामन्यता हमेशा बनी रही| जगमोहन की बुआ ने और बाद में बेटे परितोष ने उसका इलाज भी करवाया लेकिन कुछ नहीं हुआ था|

दोनों देशो की सरकारें पुन: सम्बन्ध सामान्य करने की प्रक्रिया के दौर में थे| भारत से एक सांस्कृतिक प्रतिनिधि मंडल पकिस्तान जा रहा था| जिसमें परितोष भी था| परितोष ने भारतीय विदेश सचिव से अपने पिता के बारें में चर्चा की और उन्हें साथ ले जाने की बात रखी तो उसे अनुमति मिल गयी थी| भारत में पकिस्तान के राजदूत ने खास व्यवस्था करवाई थी जगमोहन को जामपुर भेजने की|

…….

लाहोर में कुछ औपचारिक मित्रवत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद आज जगमोहन जामपुर जा रहा था| भारत की मीडिया पकिस्तान की दरियादिली की चर्चाओं में तल्लीन थीं कि कैसे एक बिछड़े को उसकी जड़ों से मिलवाने को पकिस्तान सरकार ने मानवता का परिचय दिया है|

पाकिस्तानी जनता के जगमोहन के लिए बेहद मार्मिक और अपनत्व लिए सन्देश प्रचारित किये जा रहे थे| सत्यता का तो पता नहीं लेकिन भारतीय मिडिया चैनलों ने दोनों देशो के रिश्तों की बर्फ को पूरी तरह पिंघाल दिया था| जगमोहन की हालत को देखते हुए उसे मिडिया से बहुत दूर रखा जा रहा था|

सरकारी गाडी से सेना के चार जवान, एक पाकिस्तानी पत्रकार, दो पाकिस्तानी सरकारी अधिकारी, जगमोहन और परितोष को जामपुर ले जा रहे थे| परितोष यहाँ के दृश्य को देखकर मुग्ध था| “हिन्दुकुश पर्वतमाला का ही हिस्सा सुलतान पहाड़ी दिख रहीं थी| सिन्धु नदी ने यहाँ की धरती को उपजाऊ बना रखा था| जिससे यहाँ की हरयाली यहाँ की खूबसूरती को और बढ़ा रहीं थी| जगमोहन अपने में ही मगन था|

जामपुर क़स्बा शुरू भी नहीं हुआ था की जगमोहन ने एकदम से गाडी रुकवा दी| जगमोहन गाडी से बाहर आकर चारो तरफ देखने लगा| जगमोहन  की दृष्टी कुछ तलाश रही थी| तभी साथ आये पाकिस्तानी पत्रकार जिसे हिंदी अच्छी आती थी उसने कहा “यहाँ कभी एक पुराना मंदिर हुआ करता था| नयी सड़क बनाने के लिए उसे यहाँ से शिफ्ट कर दिया गया|”

परितोष ने उसकी बात सुनकर कहा “लगभग सभी मंदिर रास्तो में आ रहे थे इसलिए पकिस्तान सरकारों ने शिफ्ट कर दिए” ये शिफ्ट शब्द कुछ ज्यादा ही जोर डालकर बोला था परितोष ने| परितोष के इस कटाक्ष पर पाकिस्तानी पत्रकार ने दृष्टी चुराने का असफल प्रयास किया|

जगमोहन को उनके इस वार्तालाप से कोई मतलब नहीं था| वो अपनी ही धुन में कस्बे की तरफ चल दिया|

पाकिस्तानी पत्रकार ने कहा “सर कार से ही चलिए, अभी एक किलोमीटर चलना पड़ेगा, बिच शहर में कहीं होगा आपका ठिकाना”

जगमोहन ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और पैदल ही चलता रहा| जगमोहन  के बूढ़े शरीर में उर्जा का स्तर एकदम से बढ़ गया था| अब उसके कदम भी नहीं बहक रहे थे| जगमोहन कस्बे के भीतर आ गया था|

बहुत ज्यादा बदल चूका था ये क़स्बा, पहले से बड़ा भी हो गया था| लेकिन शायद यहाँ की जमीन का हर टुकड़ा पहचानता था जगमोहन को| वो कभी किसी गली में चला जाता| कुछ देर देखता रहता, साथ आया पाकिस्तानी बताता कि यहाँ कभी कोई पुरानी ईमारत हुआ करती थी|

कभी जगमोहन किसी पुरानी ईमारत के सामने रुक कर खड़ा हो जाता| उस ईमारत के भीतर जाता और घूमकर बहर आ जाता| वो चले जा रहा था अपनी पुरानी यादों में खोया| ना जगमोहन किसी से कुछ पुछ रहा था ना ही किसी को कुछ बता रहा था| वो चल रहा था जैसे कहाँ कहाँ जाना है ये उसने पहले से ही निश्चित किया हुआ है|

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चलते हुए जगमोहन एक खँडहर के सामने जाकर रुक गया| अब तक कुछ स्थानीय लोग भी कौतुहलवश साथ हो लिए थे| उस खंडहर को देखते ही जो स्थानीय लोग अभी तक इस तमाशे को आनंद से देख रहे थे, अब उनके सुर्ख चहरे सफ़ेद हो गए थे| एक स्थानीय के मुहँ से निकला “शैतानी रूहों का डेरा”

परितोष ने उन बातों पर ध्यान नहीं दिया| वो जगमोहन के पास आकर खड़ा हो गया| जगमोहन की आँखों में पूरा शहर घूमते समय एक बालसुलभ चमक थी लेकिन इस खंडहर के सामने आते ही उसकी आँखे झर झर बह चली थीं|

खंडहर कभी घर ही था| बाहर एक किनारे पर बड़ा सा कमरा और बरामदा था आगे फिर बड़ा सा आंगन था| उस आंगन में एक लोहे का खंम्बा था जिस पर लटका जीर्ण शीर्ण जंग खाया तराजू आज भी दिख रहा था| कभी मुख्य दरवाजे पर लकड़ी का दरवाजा रहा होगा क्योंकि जली हुई लकड़ी की देहल आज भी दिख रही थी|

पुरे आंगन में इंटें बिछी थीं, लेकिन फिर भी काफी ऊँची झाड़ियाँ हो गयी थीं| आंगन में ही दो बड़े पेड़ थे जिन पर जंगली बेल चढ़ गयीं थी| स्थानीय लोग इस खंडहर के पास भी नहीं आते थे| देखने में भी ये जगह बहुत डरावनी थी|

जगमोहन उस खंडहर के भीतर दाखिल होने लगा| तभी एक स्थानीय ने घबराते हुए कहा साहब इस जर्रे में तो आदमजात तो आदम जात कोई परिंदा भी कभी बैठे नहीं देखा|

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भयानक रूहें घुमती हैं यहाँ| रोकिये उन्हें भीतर जाने से| परितोष ने उस आदमी की बातों पर ध्यान नहीं दिया और जगमोहन के साथ खंडहर में भीतर दाखिल हो गया| लेकिन बाहर खड़े स्थानीय लोगो के चहरे भय से पीले जर्द हो गए थे|

जो स्थानीय लोग एक भीड़ के रूप में इनके साथ चल रहे थे अब वो सब वहाँ से दूर हो गए| बस उनके साथ आये लोग और एक दो स्थानीय ही वहाँ खड़े रह गए थे|

……….

जगमोहन  ने बाहर के उस कमरे में प्रवेश किया| कभी इसे जलाया गया था इसका अनुमान कमरे को देखकर हो रहा था| ये इस घर में आत्माओं के होने की जो बात लोगो के दिलों में बैठ गयी थी उसकी वजह से ये आज 70 साल बाद भी ज्यों का त्यों ही था, जैसा कभी दंगाइयों ने इसे कर दिया था और जगमोहन छोड़कर गया था|

जगमोहन ने बराबर में खड़े परितोष के हाथ को अपनी हथेली से दबाया और बोला “ये हमारी तम्बाकू की दुकान थी| पीले रंग की पुताई थी पुरे मकान पर”

फिर जगमोहन उस कमरे से बाहर आकर आंगन में आया और बताने लगा “यहाँ बहुत भीड़ रहती थी पुरे दिन, तम्बाकू और पैसो का लेनदेन होता था|”

परीतोष को अजीब लग रहा था| आज पहली बार जगमोहन बोल रहा था उस समय के बारे में|

फिर जगमोहन बाहरी आंगन से मकान के भतरी हिस्से में प्रविष्ट हो गया| एक बड़ा बरामदा फिर एक अपेक्षाकृत छोटा आंगन और उसके बाद फिर एक कमरों की पंक्ति| बरामदे में ही ऊपर जाने को जीना था| प्रथम दृष्टी में ही परितोष को इतना दिख गया था|

जगमोहन  ने अन्दर के बरामदे की तरफ इशारा करके कहा “यहाँ मेरी दादी बैठी रहती थी और तेरी बुआ और तेरी दादी भी उनके साथ यहीं बैठती थी| मैं और तेरा चाचा जब पाठशाला से आ जाते थे तो हम कभी यहाँ बैठ जाते थे|

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जब माँ घुड़क देती थी तो बाहर चले जाते थे| बाहर से भी पिताजी धमका कर भगा देते थे, तो फिर हम दादा जी के पास चले जाते थे” जगमोहन ने एक भीतरी कक्ष की तरफ इशारा करके कहा| बड़ी बड़ी झाड़ियों में जगमोहन  यूँ ही सरलता से घुसा चला जा रहा था|

परितोष भी जैसे उस समय में ही पहुँच गया था| उसे भी इस बात का अनुमान ही नहीं था की यहाँ कितनी बड़ी झाड़ियाँ हैं| वो अपने और जगमोहन के लिए झाड़ियाँ में से रास्ता बनाने का प्रयास जरुर कर रहा था|

फिर जगमोहन अन्दर आ गया आंगन में उसके बाद वो एक कमरे में गया| उस कमरे में एक लकड़ी का तख़्त पड़ा हुआ था| जो आज भी यूँ ही था|

अन्दर पक्का निर्माण होने के कारण झाडिया तो नहीं उगी थीं लेकिन मकड़ी के जालों से और धुल और कुछ जंगली बेलों से भरा था वो कमरा| उस घर में कदम रखने से भी सब डरते थे इसलिए उस घर का सामान भी किसी ने नहीं छेड़ा था| वहाँ बस प्रकृति का वास था पूरी तरह से|

उस कमरे के भीतर एक और कमरा था| जगमोहन ने उस कमरे में प्रवेश किया| परितोष ने देखा कि दो सेना के जवान डरते डरते भीतरी आंगन में आकर खड़े हो गए थे|

इस भीतरी कक्ष में अँधेरा था इसलिए परितोष ने मोबाइल टॉर्च जला ली थी रौशनी के लिए| कमरे के बिलकुल मध्य में एक पक्का ऊँचा आधार बना कर एक भण्डारण कक्ष बनाया हुआ था| पुराने मकानों में इसे बनाया जाता था जो कच्चा मिटटी का भी होता था, जिसे सामान्य रूप से अनाज भण्डारण के हेतु उपयोग करते थे|

जगमोहन  उसके आधार के पीछे की तरफ गया और आधार में ही बनी एक खोह को देखने लगा| अँधेरा था तो परितोष ने मोबाइल से टौर्च जला ली थी| जगमोहन ने उस खोह में घुसने का प्रयास किया लेकिन घुस नहीं पाया| जगमोहन  बाहरी कक्ष में आ गया| शायद वो अब थक गया था इसलिए गर्द और मकड़ी के जालो से भरी दिवार से ही टेक लगाकर खड़ा हो गया|

जगमोहन कुछ देर अपने में ही गुम रहा और फिर बोलना शुरू किया| “बहुत खुश थे हम यहाँ पर, अच्छा व्यवसाय था तेरे दादा का| लोगो में रसूख भी अच्छा था| यहाँ के मदरसों और मस्जिदों में सबसे ज्यादा दान तेरे दादा ही करते थे| मैं पुरे दिन मोनिस, अल्लामा के साथ खेलता था|

मोनिस का बाप असलाम और अल्लामा का बड़ा भाई मुश्ताक तेरे दादा के यहाँ ही नौकरी करते थे| असलाम को हम भाई बहन ताया बुलाते थे| जब विभाजन के बाद दंगे शुरू हुए तो तेरे दादा ने यहाँ से जाने का निर्णय कर लिया था| बुआ से भी बात हो गयी थी|

लेकिन शायद देर कर दी थी पिताजी ने| हमें पाठशाला भेजना बंद कर दिया था| माहोल बदल चूका था एकदम से| उस दोपहर के समय ही पिताजी भी खाना खाकर भीतर ही आराम करने आ गए थे|”

जगमोहन को एक सिहरन सी महसूस हुई और उसका बदन हल्का सा कंप-कपां गया| जगमोहन के शारीर की इस हलचल को परितोष ने भी अनुभव किया| वो जगमोहन से बोला “पापा आप ठीक तो हो ना, चले क्या?”

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जगमोहन ने ध्यान नहीं दिया और फिर बोलना शुरू किया “मैं दादा जी के साथ इस कमरे में था| तभी शोर शराबा हुआ, कुछ जाने पहचाने नारे भी लग रहे थे “अल्लह हु अकबर” के| मुझे इन नारों से डर नहीं लगता था| जामपुर और आसपास के कई गाँव और कस्बो की मस्जिदें तेरे दादा और परदादा के पैसो से ही बनी थीं|

मौलवी कहा करते थे “आस पास जहाँ भी रोज मुक़द्दस अजान होती है या बच्चे तालीम लेतें हैं तो आपको जरुर दुआ देते हैं| आपको खुदा यूँ ही सलामत रखे| आप नजीर हो इंसानियत की शाह जी|”

जगमोहन फिर मौन में खो गया| अब तक वो दोनों सिपाही भी पास आ गए थे और बहर खड़े बाकी दोनों सिपाही और कर्मचारी भी भीतर आ गए थे| वो सब भी अत्यंत उत्सुकता से जगमोहन को सुन रहे थे| जगमोहन परितोष से हिंदी में ही बात किया करता था|

जगमोहन ने मौन को तोड़ते हुए बोलना शुरू किया “शाह जी ही कहते थे तेरे दादा को यहाँ लोग| बहार जोर जोर से नारों की आवाज़ सुनकर बाकी सब घरवाले कुछ परेशान हो गए थे| पिताजी कमरे से निकले और बहार आंगन में जाने को ही थे कि तुरंत तेज धमाका हुआ|

किसी ने पिताजी को गोली मार दी| घर में चीख पुकार मच गयी थी| मेरे दादा जी बाहर की तरफ भागे| वो भीड़ “अल्लहा हु अकबर” के नारे लगाते हुए तुरंत अन्दर घुस गयी थी| मैंने अपनी आँखों से देखा कि उस भड़ी में सबसे आगे असलाम और मुश्ताक थे|

जिन्हें मेरे दादा-दादी इदी दिया करते थे| चेटीचंड का हलवा खिलाया करते थे| मुश्ताक ने तलवार से मेरे दादा की गर्दन काट डाली, भीड़ ने दादी को भी मार दिया| तेरे चाचा के जो आठ बरस का था उसके नाज़ुक से शरीर को तलवार बल्लमों से चिर कर उसके ऊपर को ही भीद गुजर गयी|

मुश्ताक ने तेरी बुआ जो 14 वर्ष की नहीं थी थी उसे यहीं आंगन में पकड़ कर भीड़ से कहा ये है हमारा इनाम इन काफिरों की औरतें| इन्हें नहीं मारेंगे| भीड़ में से ही एक ने मेरी माँ को पकड रखा था| ये वो था जिसे कुछ दिन पहले पिताजी ने उसके बेटे के इलाज के लिए पैसे दिए थे| मैं कमरे में छुपा सब देख रहा था|”

जगमोहन को एक हिचकी आ गयी थी| परितोष जिसकी आँखों से अब आंसू बिना रुके बह रहे थे उसने कहा “चलो चलते हैं पापा”

जगमोहन ने हाथ के इशारे से मना किया और फिर बोलना शुरू किया “मेरी आँखों के सामने उस भीड़ ने इस आंगन में मेरी बहन और मेरी माँ का…”

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इतना कहकर ही जगमोहन ने लम्बी सांस ली और फिर बोला “जो मेरी माँ को काकी ताई बुलाते थे आज वो वहसीयों की तरह उसे नोच रहें थे| मेरी छोटी सी मासूम बहन जिनको चाचा ताऊ कहती थी वो उसे नोच रहे थे|

मुश्ताक ने कहा कि इसे मैंने ही अपनी गोद में जवान किया है तो सबसे पहला हक मेरा| मेरी बहन और माँ उस भीड़ के लिए इनाम थी अल्लहा का और हम सजा भुगत रहे थे हिन्दू होने की|

तेरी दादी और बुआ को तलवार या बन्दुक से क़त्ल नहीं किया गया था बल्कि उन्हें तो इतनी भीड़ ने नोचा के वो मर गयी| तेरी 13 साल की बुआ और दादी में हिस्सा बांटने को पूरा क़स्बा खड़ा था| भीड़ उन दोनों के मर जाने के बाद भी उनकी लाशों को नोचती रही|

मेरी बहन चीख रही थी| सबसे उसका कोई न कोई रिश्ता था, कभी कहती भाई छोड़ो कभी कहती ताया जी दर्द हो रहा है| उस बेचारी को तो बस दर्द का ही एहसास हो रहा था| उसे क्या पता था कि उसके साथ ये सब अल्लहा की हुकूमत कायम करने को किया जा रहा है|

फिर उसकी चीखे बंद हो गयीं थी| मेरी माँ गिडगिडा रही थी भीड़ के सामने “वो बोल रही थी कि जो करना है मेरे साथ कर लो ये बच्ची है इसे छोड़ दो| वो सबको पुराने रिश्ते याद दिला रही थी| लेकिन उस भीड़ पर तो एक मजहबी जूनून सवार था| ये सब हो रहा था और भीड़ “अल्लहा हु अकबर” के नारे लगा रही थी|

मैं ये देखकर पत्थर हो गया था| शैतानो और भूतों की कहानिया कभी कभी दादा जी सुनाया करते थे| लेकिन उन किस्सों के शैतान भी इतने डरवाने नहीं थे जितनी वो भड़ी थी….वो इंसानों की भीड़|  मुझसे जब नहीं देखा गया तो मैं अन्दर जाकर कोठी के नीचे उस खोह में छुप गया|

भीड़ को उनका इनाम मिल गया था| किसी का ध्यान ही नहीं गया मेरी तरफ| वो जितना लूट सकते थे लुटा और फिर बाहर आग लगा दी थी| मुझे नहीं पता मैं कितने दिन अन्दर छुपा रहा,…..मुझे रौशनी और आदमजात से भी से डर लगने लगा था|

अँधेरे में बाहर आता और फिर छुप जाता, जो खाने पिने को मिलता घर में खा लेता| उस दिन के बाद मैंने मेरे परिवार के मुर्दों को भी नहीं देखा| क्योंकि मैं रौशनी में बाहर निकलता ही नहीं था| बस एक तीखी बदबू मुर्दा शरीर की नांक में घुस जाती थी|”

कुछ देर चुप रहने के बाद जगमोहन ने फिर बोलना शुरू किया “एक रात मैं यहाँ से बाहर निकला और चलता चला गया| दिन में छुप जाता रात में चल पड़ता| फिर मुझे एक जगह भीड़ दिखाई दी, वो शरणार्थियों का शिविर था| वहाँ से मुझे भारत भेज दिया| मुझे फूफा बुआ का पता मालूम था तो उनके पास पहुँच दिया गया|”

फिर जगमोहन बाहर आंगन की तरफ चल दिया| अब परितोष ही नहीं उन पाकिस्तानियों की आँख से पानी बह रहा था| जगमोहन ने एक कोने की तरफ ऊँगली करके कहा “देख यहाँ चूल्हा था हमारा, हम भाई बहन यहीं पास बैठकर गर्म गर्म खाते थे|”

एक कमरे की तरफ ऊँगली करके जगमोहन बोला “यहाँ हमारी चक्की थी जिसे माँ या दादी चलाती थी”

जगमोहन पुरे आंगन में घूम रहा था और अब अपनी ही धुन में बोल रहा था “ माँ सुम्मो बहन डूबीरो जाई, इनानु हलवा खुवा?” (माँ सुम्मो बहन दुबली हो रही है इसे हलवा खिला) फिर जगमोहन ठेठ सिन्धी में कुछ बोलने लगा जो परितोष के भी समझ नहीं आया| बस वो सुन रहा था कभी दादा कभी दादी, कभी पिता जी तो कभी चाचा लालराम का नाम| जगमोहन की शारीरिक भावभंगिमा एकदम से एक 13 वर्ष के बच्चे जैसी हो गयीं थी|

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फिर जगमोहन उस कमरे में चला गया, परितोष उसके पीछे चल रहा था| जगमोहन का पैर किसी चीज़ से टकराया उसने उसे उठाया तो वो टुटा हुआ हुक्का था| जगमोहन ने उसे अपनी छाती से यूँ लगा लिया जैसे कोई माँ अपने नवजात बच्चे को बाहों में भर लेती है|

जगमोहन उस लकड़ी के तख़्त के पास पहुंचा और एक छोटे बच्चे की तरह बोला “दादा नींड आइ, तमारी गोदी मा आवी जाऊं”(दादा नींद आ रही है, तुम्हारी गोद में आ जाऊं)

इतना कहने के बाद जगमोहन एक बच्चे की तरह उस वर्षो की गर्द और गंदगी जमे तख़्त पर लेट गया| वो कुछ ऐसे लेटा था जैसे कोई छोटा बच्चा अपने दादा की गोद में खिलंदरी करके लेट जाता है|

परितोष रोकना तो चाहता था अपने पिता जगमोहन को उस धुल और गंदगी भरे तख़्त पर लेटने से लेकिन रोक नहीं पाया| वो देख रहा था आज अपने पिता के रूप में उस 14 साल के जगमोहन को खलेते हुए| जगमोहन  तख़्त पर लेटकर एकदम शांत हो गया था| परितोष ने कुछ देर तक चुप खड़ा रहा फिर उसने जगमोहन को आवाज दी “पप्पा …. पप्पा”

जगमोहन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी| परितोष ने जगमोहन का कन्धा पकड़ कर उसे हिलाया तो वो एक तरफ को निढाल होकर लेट गया और उसका हाथ तख़्त से नीचे लटक गया| परितोष घबरा गया और जोर से जगमोहन को हिलाकर बोला “पप्पा”

एक पाकिस्तानी फौजी ने पास आकर जगमोहन को देखा और परितोष से बोला “सर अब ये नहीं उठेंगे, ये अब अपने परिवार के साथ हैं……. पाक परवर दिगार की उस दुनियां में जहाँ कोई भी मजहबी शैतान इनकी खुशियों को आग नहीं लगा पायेगा”

परितोष ने टोर्च की रौशनी जगमोहन के चेहेरे पर डाली तो उस बूढ़े जगमोहन के झुर्रियों से भरे चेहेरे में जामनगर के उस बच्चे जगमोहन की झलक दिख रही थी|

 ” घरु | Hindi Stories “

लेखक-सतीश भारद्वाज (Satish Bhardwaj)

पढ़ें सतिश भारद्वाज की लिखी कहानी “भतेरी” 

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Kahaniya in Hindi | जादुई वस्त्र – लालची सेठ

Kahaniya in Hindi

साथियों, प्रेरणादायक कहानियां ( Kahaniya in Hindi ) हमारे जीवन में एक बहुत बड़ा महत्त्व रखती है| बचपन में जब दादी-नानी हमें कहानियां सुनाया करती थी तो कहानी कहानी में ही हम पूरी दुनियां का ज्ञान हांसिल कर लेते थे| आज हम आपके लिए ऐसी दो शानदार कहानियां लेकर आए हैं जिन्हें पढ़कर या अपने घर परिवार के बच्चों को सुनाकर आप उन्हें जीवन के बारे में कई बाते सिखा सकते हैं! आइये पढ़ते हैं Kahaniya in Hindi | जादुई वस्त्र – लालची सेठ


Kahaniya in Hindi | जादुई वस्त्र

एक राज्य में एक मुर्ख राजा रहता था| अपने पूर्वजों के दीए राज्य व् धन दोलत के बूते वह राज्य की राज गद्धी पर तो बैठ  गया लेकिन अपनी मुर्खता के कारण राज्य में कोई भी राजा को मुर्ख बना कर अपना काम निकाल लेता था| 

राजा बहुत ही सीधा-साधा था| लेकिन अपनी मुर्खता के चलते वह कभी भी किसी से भी नाराज हो जाता, किसी पर भी क्रोध करने लगता और किसी को भी म्रत्यु दंड दे देता था| राजा के इस स्वाभाव से पूरा राज्य दुखी था|

एक दिन राज्य के ही एक होंशियार व्यक्ति ने राजा को सबख सिखाने का मन बनाया और राज दरबार में पहुँच गया| राजदरबार में पहुंचकर व्यक्ति बोला – महाराज की जय हो… महाराज! में पास ही के एक गाँव का रहने वाला कपड़ों का व्यापारी हूँ| आज में आपके लिए एक अमूल्य भेंट लेकर यहाँ आया हूँ जिसे देखकर आप बड़े ही खुश हो जाएँगे|

राजा व्यापारी की बात सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ| राजा ने व्यापारी से भेंट स्वीकार करने का आश्वासन देते हुए भेंट राजदरबार में प्रस्तुत करने का आदेश दिया|

राजा की बात सुनकर व्यापारी बोला – महाराज! मुझे अपने पूर्वजों ने एक अमूल्य वस्त्र उपहार में दिया है| जो बहुत ही खुबसूरत और जादुई है| अगर आप वह वस्त्र पहनेंगे तो इस देश में आप सा सुन्दर राजा दूसरा न होगा| लेकिन उस वस्त्र से आपके लिए पोषक बनाने में मेरे कारीगरों को पचास हजार अशर्फियों की लागत आएगी जो आपको व्यय करना होगी|

राजा वस्त्र की तारीफ सुनकर इतना मंत्रमुग्ध हो गया की उसने अपने मंत्री को व्यापारी को पचास हज़ार अशर्फियाँ देने का आदेश दे दिया| व्यापारी अशर्फियाँ लेकर राजा दरबार से चला गया और दो दिन बाद राजा के लिए वह पोशाक ले आने का आश्वासन दिया|

दो दिन बाद वह व्यापारी एक बहुत ही चमचमाता हुआ बक्सा लेकर राजदरबार पहुंचा| बक्सा देखकर ऐसा लग रहा था, मानों बक्से में बहुत ही बड़ा खज़ाना छुपा हो| बक्से की चमचमाहट और खूबसूरती देखकर राजा मंत्रमुग्ध हो गया|

व्यापारी ने बक्से को राजदरबार के बीचोंबीच रख दिया और बोला – महाराज! इस पोशाक को बनाने में मेरे कारीगरों ने बड़ी ही मेंहनत की है| लेकिन इस पोशाक की खास बात यह है की यह पोशाक सिर्फ उसी इन्सान को दिखती है जो असली माँ-बाप का हो| अगर इस राजदरबार में किसी इन्सान का कोई दूसरा बाप होगा तो उसको यह पोशाक दिखाई नहीं देगी|

व्यापारी की बात सुनकर पूरा राजदरबार उस पोशाक को देखने के लिए आतुर हो उठा| अब व्यापारी ने उस बक्से से पोशाक निकालने का ढोंग शुरू कीया जो की वास्तव में उस बक्से में थी ही नहीं| पोशाक को अपने हाथों में लेने का ढोंग करते हुए वह पोशाक की सुन्दरता की तारीफें करने लगा|

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व्यापारी की बात सुनकर राजदरबार में उपस्थित सभी राज दरबारी उस पोशाक की तारीफ करने लगे जो की वास्तव में थी ही नहीं| सभी यह सोच रहे थे की अगर वे पोशाक नज़र न आने की बात राज दरबार में कहेंगे तो सभी यही मानेंगे की वे असली माँ-बाप की औलाद नहीं है|

कई राजदरबारी तो यह सोच रहे थे की हो सकता है की वास्तव में वे असली माँ बाप की औलाद नहीं है क्यों की दरबार में उपस्थित बाकी सभी को तो वह वस्त्र दिखाई दे ही रहा है| बस इसी तरह सबने व्यापारी की बातों में हाँ कर दी और महाराज भी यही सोच कर चुप रहे की केवल उन्हें छोड़कर सभी को वह पोशाक दिखाई दे रही है|

अब व्यापारी ढोंग करते हुए वह पोशाक लेकर राजा के पास पहुंचा और राजा को धोती और पगड़ी देते हुए पहनने के लिए आग्रह किया| राजा तो पहले से ही मुर्ख था, उसे मुर्ख बनाने में व्यापारी को ज्यादा समय नहीं लगा| अब मंज़र कुछ ऐसा था की राजा जी जैसे इस धरती पर आए थे ठीक वैसे ही हो गए यानी की पुरे निर्वस्त्र|

अब पुरे राजदरबार के सामने महाराज बिलकुल निर्वस्त्र खड़े थे लेकिन राजा के म्रत्युदंड के डर से किसी भी राजदरबारी में यह हिम्मत नहीं थी की वह राजा को यह कह सके की वह बिलकुल निर्वस्त्र खड़े हैं|

राजा को पोशाक पहनाने के बाद व्यापारी ने राजा की इतनी तारीफ की के राजा जी फुले नहीं समाए और ऐसे ही निर्वस्त्र रनिवास की और चल पड़े|

रानियों ने जैसे ही महाराज को निर्वस्त्र देखा तो हसने लगी और बोली – महाराज! आज क्या आपने मदिरा का सेवन कर लिया है ? क्षमा करें, आप पुरे महल में यूँ निर्वस्त्र होकर क्यों घूम रहे हैं|

रानियों को वस्त्र न दिखने पर राजा मुस्कुराए और बोले – महारानी! अवश्य ही आप असली माँ-बाप की नहीं हो| क्यों की यह जादुई वस्त्र हैं, यह केवल उन्हीं इंसानों को दीखते हैं जो असली माँ-बाप के हो| आपने मुझसे इतनी बड़ी बात क्यों छुपाए रखी ?

आप नाजायज हैं और महल में नाजायज़ को रहने का कोई हक़ नहीं| इसीलिए हम अभी और इसी वक़्त आपको महल से बाहर करते हैं| बस इतना कहकर राजा ने अपने सैनिकों को आदेश देकर रानी को महल से बाहर निकाल दिया|

तो साथियों, इसीलिए कहा गया है

उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये। पयः पान भुजङ्गानां केवलं विषवर्धनं।।

यानि की मूर्खों को उपदेश देना उनके क्रोध को शांत करना नहीं वरन बढ़ाना है…

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Kahaniya in Hindi – लालची सेठ

एक मंदिर में एक ब्राम्हण रहता था| जो दिन रात भगवान् की सेवा में लगा रहता| ब्राम्हण की एक पुत्री थी रूपवती| ब्राम्हण रोज सवेरे उठकर भगवान् की पूजा-पाठ में लग जाता| रूपवती की भी भगवान् में बड़ी आस्था थी| बचपन से ही वह भगवान् की भक्ति में लगी रहती| भगवान् के लिए पुष्प व् पूजन सामग्री एकत्रित करना उसी की ज़िम्मेदारी थी|

समय के साथ-साथ रूपवती बड़ी हुई| अब ब्राम्हण को रूपवती के विवाह की चिंता सताने लगी थी| ब्राम्हण ने सोचा क्यों ने में मंदिर में कथा करना शुरू कर दूँ, जिससे की चढ़ावे में कुछ पैसा आने से मुझे थोड़ी आमदनी भी हो जाएगी और गाँव वालों में भी भगवान् के प्रति आस्था बढ़ेगी|

बस यही सोचकर ब्राम्हण ने अगले दिन से ही मंदिर प्रांगण में ही कथा करना शुरू कर दिया| ब्राम्हण का मानना था की चाहे गाँव वाले उसकी कथा न सुने, लेकिन मंदिर में विराजे भगवान् तो उसकी कथा सुंनेगे ही|

अब ब्राम्हण की कथा में  कुछ गाँव वाले आना शुरू हो गए| एक दिन गाँव का ही एक कंजूस सेठ मंदिर में भगवान् का दर्शन करने के लिए आया और दर्शन करने के बाद मंदिर की परिक्रमा करने लगा| तभी उसे मंदिर के अन्दर कुछ आवाज़े सुनाइ दी| उसने मंदिर की पीछे की दिवार पर कान लगा कर सुना तो मंदिर के अन्दर दो लोग एक दुसरे से बात कर रहे थे|

उसने बड़े धयान से सुना… मंदिर के अन्दर भगवान् राम और हनुमान जी आपस में बात कर रहे थे| भगवान् राम हनुमान जी से ब्राम्हण की कन्या के कन्यादान के लिए दो सो रुपयों का प्रबंधन करने का कह रहे थे| भगवान् राम का आदेश पाकर हनुमान जी ने ब्राम्हण को दो सौ रूपए देने की बात भगवान् राम को कही|

आप पढ़ रहें हैं “Kahaniya in Hindi – लालची सेठ”

सेठ जी ने जब भगवान् राम और हनुमान जी की बात सुनी तो कथा के बाद वे ब्राम्हण से मिले और कथा से होने वाली आय के बारे में पूछा| सेठ जी की बात सुनकर ब्राम्हण बोला – सेठ जी, कथा में बहुत ही कम लोग आ रहें हैं, भला इतने कम श्रद्धालुओं में क्या आय होगी|

सेठ जी ने ब्राम्हण को आश्वासन देते हुए कहा की आज कथा में जो भी आय हो वह ब्राम्हण उन्हें दे दें,  इसके बदले में सेठ जी ब्राम्हण को सौ रूपए दे देंगे| ब्राम्हण को भला क्या एतराज़ होता, उन्होंने सेठ जी की बात मान ली| उधर सेठ जी यह सोच रहे थे की ब्राम्हण को आज कथा में हनुमान जी दो सौ रुपए देने वाले हैं जो में ब्राम्हण से ले लूँगा और बदले में उसे सौ रूपए दे दूंगा| जिससे की मेरी सौ रुपए की कमाई हो जाएगी|

शाम को कथा समाप्त होने पर सेठ जी ब्राम्हण के पास आए| उन्हें यकीन था की आज ब्राम्हण को दो सौ रूपए की आय हुई होगी| ब्राम्हण सेठ जी को देखते ही सेठ जी की पास आया और बोला – “सेठ जी आज तो काफी कम भक्त कथा में आए थे जिससे बहुत ही कम आय हुई है| बस दस रूपए ही इकठ्ठा हो पाए हैं!”

सेठ अब करता भी क्या| उसने ब्राम्हण को दिए वचन के अनुसार ब्राम्हण को सौ रूपए दे दिए और इस सौदे में तो सेठ जी को नुकसान हो गया| सेठ जी हनुमान जी पर बहुत गुस्सा हुए की उन्होंने ब्राम्हण को दौ सौ रुपयों की मदद भी नहीं की और भगवान् को दिया अपना वचन भी पूरा नहीं किया|

सेठ जी को हनुमान जी पर बहुत गुस्सा आया| वे गुस्से में मंदिर के अन्दर गए और उन्होंने हनुमान जी की मूर्ति को धक्का दे दिया| सेठ जी ने जैसे ही हनुमान जी की मूर्ति को धक्का देने के लिए अपना हाथी मूर्ति पर रखा हाथ वहीँ चिपक गया| भला हनुमान जी के पकड़ से कोई बच सकता है|

तभी सेठ जी को को फिर एक आवाज़ सुनाई दी| अब भगवान् राम हनुमान जी से ब्राम्हण को दौ सौ रूपए देने के बारे में पुछ रहे थे| भगवान् राम का आदेश सुनकर हनुमान जी बोले  “प्रभु..सौ रूपए की मदद तो हो गई है, बाकि बचे सौ रुपयों के लिए सेठ जी को पकड़ के रखा है| जैसे ही वे सौ रूपए देंगे उनको छोड़ देंगे|

सेठ जी ने जैसे ही भगवान् राम और हनुमान जी के बीच की बात सुनी उन्होंने सोचा, “अगर गाँव वालों ने देख लिया की में हनुमान जी की मूर्ति को धक्का मार रहा था और हनुमान जी ने मुझे पकड़ लिया है तो मेरी बहुत बदनामी होगी|”

बस फिर क्या था, “सेठ जी ने हनुमान जी को ब्राम्हण को सौ रूपए देने का वादा किया”

हनुमान जी ने सेठ की बात मानकर उसका हाथ छोड़ दिया और सेठ जी ने अपने वादे अनुसार ब्राम्हण को सौ रूपए दे दिए और सर पकड़ कर चलते बने|

साथियों, इसीलिए कहा गया है ज्यादा लोभ हमेशा हानिकारक होता है| सेठ को उसके लालच की सज़ा मिल गई और ब्राम्हण को उसकी भक्ति का फल| इसीलिए कहा गया है जैसी करनी वैसी भरनी…

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children story in hindi | कहानी बच्चों की

children story in hindi | कहानी बच्चों की

साथियों नमस्कार, हम सभी जीवन में कभी न कभी किसी न किसी काम को लेकर आलस कर जाते हैं| लेकिन किसी काम में किया गया आलस उस काम को हमेशा ख़राब कर देता है| आज हम आपके लिए ऐसी ही “children story in hindi | कहानी बच्चों की”  लेकर आएं हैं जो आपको आलस में किए गए कार्य के दुष्परिणामों से अवगत करवाएगी! आइये इन कहानियों के माध्यम से ज़िन्दगी के एक नए पहलु को जानते हैं…

                     Children Story in Hindi | आलस्य

यह एक ऐसे किसान की कहानी है जो अपने पुरखों की दी हुई ज़मीन-जायदाद के कारण था तो काफी धनि लेकिन उसमें एक कमी थी, और वह थी आलस करना| जीवन के शुरूआती दिनों से ही वह आलसी बनता गया| पहले तो उसने कई कामों को टालना शुरू कर दिया लेकिन ज़िन्दगी के सफ़र में जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रहा था ठीक वैसे-वैसे वह और भी आलसी होता चला जा रहा था| अब तो आलम यह था की आलस में उसने खेतों पर जाना तक छोड़ दिया|

अब तो आलस में उसे अपने घर-परिवार तक की सुध न थी| अपने गाय-भेंसों की भी सुध न लेता| उसका सारा काम अब नोंकरों के भरोसे चलने लगा| उसके आलस से अब पुरे घर की व्यवस्था बिगड़ने लगी| खेती में ध्यान न देने के कारण अब उसको खेती में नुकसान होने लगा| उसके पालतू पशुओं ने भी धीरे-धीरे अब दूध देना बंद कर दिया|

एक दिन उस किसान का दोस्त उससे मिलने उसके गाँव आया| उसने गाँव में जैसे ही अपने किसान के घर जाने का रास्ता पूछा गाँव वालों ने उसे उसके घर की पूरी दशा बता दी| खैर, अब था तो उसका ही मित्र… सौ उसने उस किसान के घर जाने और उसे समझाने का मन बनाया| वह जैसे ही अपने मित्र किसान के घर पहुंचा उसे अपने मित्र के घर की दशा देखकर बहुत दुःख हुआ|

उसे पता था की अब आलस ने उसके मित्र को इस कदर जकड लिया था की अब उसे समझाने में भी कोई लाभ न था| उसने अपने मित्र की दशा पर चिंतित होते हुए अपने मित्र से कहा –  मित्र, तुम्हारी परेशानियाँ देखकर मेरे ह्रदय को काफी दुःख पहुंचा हैं| लेकिन मेरे पास तुम्हारी इन साडी परेशानियों को दूर करने का एक ऐसा उपाय है जिसे करके तुम फिर से धनि व् खुश्हर जीवन जी सकते हो|

किसान अपनी दशा से खुद बड़ा परेशान था लेकिन उसे अपने आलसीपन का आभास तक न था| उसने अपने मित्र से कहा – मित्र मेरी इस दशा के कारण धन, वैभव और सम्मान सब कुछ मेरे हाथ से चला गया है| तुम तो मेरे प्रिय मित्र हो में तुम्हारे बताए हुए उपाय पर अमल जरुर करूँगा|

किसान के मित्र ने कहा – मित्र, सुबह-सुबह दिन दिकलने से पहले एक देवदूत प्रथ्वी पर आता है| जो कोई भी उस देवदूत का सर्वप्रथम दर्शन कर लेता है उसे जीवन में सब कुछ मिल जाता है| अगर तुम उस देव्देत के दर्शन कर लो तो तुम्हारा खोया हुआ धन, वैभव और सम्मान  तुम्हें वापस मिल सकता है|

किसान अपने जीवन से अब काफी परेशान हो चूका था| गाँव में भी उसकी अब कोई इज्ज़त नहीं करता था| उसने अपने मिटा की बात मानने का फैसला किया| अगले ही दिन वह सवेरे-सवेरे उठकर देवलोक से आए देवदूत की खोज में निकल पड़ा| चलते-चलते वह अपने खेतों के पास पहुँच गया था| अगले ही पल उसने देखा की एक आदमी उसके खेत में पड़े गेहूं के ढेर से गेहूं की चौरी कर रहा है| किसान को आते देख चोर वहां से भाग खड़ा हुआ|

चलते चलते अब वह थक चूका था| खेतों से लौटकर अब वह अपनी गोशाला की और आया तो उसने देखा की उसका एक नोकर उसकी भेंस का दूध निकालकर ले जा रहा है| किसान ने अपने नोकर को रोका और इस तरह चोरी छिपे दूध ले जाने पर अपने नोकर को फटकार लगाई|

थोड़ी देर आराम कर के वह फिर देवदूत की खोज में अपने खेतों की और निकल गया| वह अभी खेतों पर पहुंचा ही था की उसे पता चला की खेतों  पर अभी तक मजदुर नहीं आए थे| उसने रुक कर मजदूरों के आने का इंतज़ार किया, जब मजदुर खेत पर आए तो उन्हें भी देरी से आने पर डाट लगाई| अब वह सुबह से जहाँ-जहाँ भी गया वहां उसका कोई न कोई नुकसान होने से बच गया|

आप पढ़ रहें हैं Children Story in Hindi | कहानी बच्चों की

देवदूत को खोजने में अब किसान रोज़ सुबह जल्दी उठ कर देवदूत को खोजने निकलने लगा| किसान की दिनचर्या में आए इस परिवर्तन से अब उसके नोंकरों में कामचोरी के प्रति डर बेठ गया| अब उसके नोंकरों ने ठीक से काम करना शुरू कर दिया| सबेरे जल्दी उठने से चोरों को उसके आने का भय होने लगा और उसके खेतों से होने वाली चोरियां बंद हो गई|

अब खेती में उसे फायदा होने लगा| दूध की होने वाली चोरियों के बंद हो जाने से उसकी गोशाला से भी उसे फायदा होने लगा| सुबह सुबह की सेर से उसकी सेहत भी ठीक होने लगी|

कुछ ही दिनों में किसान का मित्र फिर अपने मित्र के पास आया| अपने मित्र को मिलकर किसान बहुत खुश हुआ और उस से उस के बताए उपाय से होने वाले फायदों के बारे में बताया और कहा – मित्र! देवदूत की खोज में, मुझे सबेरे जल्दी उठने से काफी फायदा हुआ| देवदूत से में जो कुछ भी मांगने वाला था वह मुझे मिल गया है लेकिन देवदूत के दर्शन मुझे अभी तक नहीं हो पाए हैं|

किसान की बात सुनकर उसका मित्र मुस्कुराया और बोला – मित्र! वह देवदूत तुम स्वयं हो| तुम आलस्य में खुद को ही भूल गए थे| सुबह जल्दी उठकर देवदूत की खोज में तुम खुद से मिले और तुमने अपने कमों पर ध्यान देना शुरू कर दिया जिससे तुम्हें खेती में भी फायदा होने लगा और तुम्हारा खोया हुआ धन, सम्पदा और सम्मान तुम्हें वापस मिल गया|

अपने मित्र की बात सुनकर किसान ने उसे गले से लगा लिया….

तो साथियों इस कहानी Children Story in Hindi | कहानी बच्चों की से हमें एक नहीं दो-दो बातें सिखने को मिलती है| पहली तो यह की हमें कभी आलस्य नहीं करना चाहिए और अपने काम को कभी भी कल के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए| और दूसरी यह की हमेशा अपने किसी भी मित्र को परेशानी में देखकर उसकी सहायता करना चाहिए| संकट के समय काम आने वाला ही सच्चा मित्र होता है|


साथियों इसी कहानी के साथ हम आपको एकता के सूत्र में पिरोने वाली एक और कहानी children story in hindi | एकता में शक्ति बताने जा रहें हैं जिसे पढ़कर अप यह जानेंगे की जीवन में संगठित रहना क्यों आवश्यक है|

Children Story in Hindi | एकता में शक्ति

एक पिता के चार पुत्र थे| पिता ने अपने चारों पुत्रों को सामान शिक्षा और संस्कार दीए| चारों पुत्र बड़े हुए और अपने माता-पिता का सम्मान करते हुए जीवन यापन करने लगे| पूरा गाँव उन चारों पुत्रों का सम्मान करता था|

बस परेशानी इस बात की थी की चारों  लड़कों की आपस में बिलकुल भी नहीं जमती थी| चारों जब भी साथ होते किसी न किसी बात पर झगड़ पड़ते| छोटी-छोटी बातों का आए दीन बड़े झगड़ों का कारण बन जाना आम बात थी|

किसान अब अपने इन चारों पुत्रों के झगड़ों से तंग आ चूका था| इस समस्या से निजात पाने के लिए वह गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के पास पहुंचा और अपनी समस्या बताते हुए अपनी समस्या का उपाय बताने के लिए प्रार्थना की| गाँव के उस बुजुर्ग व्यक्ति ने किसान की परेशानी को बड़े ध्यान से सुना और उसे अपनी परेशानी को हल करने के लिए एक युक्ति बताई…

बुजुर्ग की सलाह लेकर किसान अपने घर लौटा और उसने अपने चारों पुत्रों को अपने पास बुलाया| किसान के चारों पुत्र बड़े ही संस्कारी और आज्ञाकारी थे| पिता के बुलाने पर चारों आगले ही पल पिता के समक्ष उपस्थित थे|

किसान ने चार सुखी लकड़ियों को इकठ्ठा कर एक गट्ठर बनाया और उसे अपने लड़कों के सामने रख कर कहा, – “तुम चारों में से जो इन लकड़ियों के गट्ठर को तौड़ देगा वह उसे इनाम में एक बैल देगा| किसान के चारों पुत्र आदतन लकड़ियों के गट्ठर को सबसे पहले तोड़ने के लिए झगडने लगे|

किसान से सबसे पहले अपने छोटे बेटे को गट्ठर तोड़ने का आदेश दिया| किसान के सबसे छोटे बेटे ने लकड़ियों के गट्ठर को तोड़ने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया लेकिन लकड़ियाँ टस से मस नहीं हुई|

इसी तरह बारी-बारी से चारों पुत्रों ने अपनी पुऋ ताकत से लकड़ियों को तोड़ने की कोशिश की लेकिन कोई भी लकड़ियों के उस गट्ठर को तौड़ नहीं पाया|

अगले ही पल किसान ने अपने चारों लड़कों को गट्ठर से निकालकर एक-एक  लकड़ी दी और उसे तोड़ने को कहा| इस बार सभी लड़कों ने एक-एक लकड़ी को बड़ी आसानी से तोड़कर फेंक दिया|

यह सब देखकर किसान ने अपने चारों पुत्रों को पास बैठाया और कहा, – “जब तक यह लकड़ियाँ एक साथ थी तब तक तुममें से कोई भी इन्हें तौड़ नहीं पाया लेकिन इनके अलग-अलग होते ही तुम सबने बड़ी ही आसानी से इन लकड़ियों को तौड़ कर फेंक दिया|

बिलकुल इसी तरह यदि तुम चारों भी लकड़ियों के इस गट्ठर की तरह एक साथ मिलकर रहोगे तो कोई भी तुम्हें तोड़ने और हनी पहुँचाने की कोशिश नहीं करेगा और यदि तुम अलग-अलग टहनियों की बहती रहोगे तो कोई भी तुम्हें नुकसान पहुंचा सकता है|

किसान के चारों लड़कों को अपने पिता की बात समझ आ गई और उन्होंने आपस में झगडा छोडकर मिलकर रहना शुरू कर दिया| देखते ही देखते किसान का पूरा परिवार सबसे सम्रद्ध और वैभवशाली बन गया|

तो साथियों, इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की हमें हमेशा मिल जुलकर एक साथ रहना चाहिए| अगर परिवार में फुट होगी तो हर कोई उसका फायदा उठाने की कोशिश करेगा|

Children Story in Hindi | कहानी बच्चों की


तो साथियों हमें आशा है की आपको हमारी इन कहानियों से ज़रूर ज़िन्दगी के एक नए पहलु को जानने का मोका मिला होगा|

संगठन और संगठन की शक्ति पर पढ़िए हमारी शानदार कहानी

संघटन की शक्ति | Sanghatan ki Shakti Moral Stories in Hindi

संगठन | Short Story on Unity


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नई कहानियां | जीवन का मूल्य

                       नई कहानियां | जीवन का मूल्य

साथियों नमस्कार, Hindi Short Stories के कहानियों के इस खजाने में हम हर बार कुछ  नई कहानियां लेकर आते हैं| इस बार भी हम एक नई कहानी “जीवन का मूल्य” आपके लिए लेकर आएं है जिसे पढ़कर आपको भी जीवन के बारे में कुछ अलग पहलु देखने को मिलेगा| हमारी वेबसाइट पर अपना अमूल्य समय बिताने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद…


नई कहानियां में एक और कहानी

“जीवन का मूल्य”

नई कहानियां | किसी गाँव में एक जौहरी  रहता था| वह काफी बुद्धिमान था| हमेशा अपने काम में लगा रहता| लेकिन नियति में उसके कुछ और ही लिखा था| अपनी जवानी के दिनों में ही किसी बीमारी के चलते वह चल बसा| वह अपने पीछे अपनी पत्नी और एक लड़के को छोड़ गया| लोगों ने जब उसकी पत्नी को अकेला देखा तो उसका सारा धन धीरे-धीरे हड़प लिया| धन के नाम पर अब जौहरी की पत्नी के पास बस एक मोती बचा था जो मरते समय जौहरी ने अपनी पत्नी को दिया था| उस मोती की कीमत का कोई मोल नहीं था|

जौहरी का लड़का जब बड़ा हुआ तो उसकी विधवा पत्नी ने वह मोती अपने बेटे को दिया और कहा…
बेटा! यह मोती मुझे तुम्हारे पिताजी ने मरते समय दिया था| इसकी कीमत का मुझे कोई अंदाज़ा नहीं है लेकिन तुम्हारे पिताजी ने कहा था की यह एक अनमोल मोती है| जो कोई भी व्यक्ति इस मोती का मोल लगाएग वह अपनी बुद्धि का मूल्य तुम्हे बताएगा, यानी की जैसी उस इन्सान की बुद्धि होगी ठीक वैसा ही इस मोती का मूल्य होगा|

अब तुम इस मोती को लेकर बाज़ार में जाओ और इस मोती का मूल्य पता करो, लेकिन ध्यान रहे इस मोती को उसी व्यक्ति को देना जहाँ तुम्हें इसका सही मूल्य मिले| जौहरी का लड़का अब मोती लेकर बाज़ार में मोती का मूल्य पता करने निकल पड़ा| उसने कई जगह मोती का मूल्य पता किया| बाज़ार में निकलते हुए उसे एक सब्जी बेचने वाला दिखाई दिया, उसने सब्जी वाले से मोती का मूल्य बताने की बात कही| सब्जी वाले ने मोती को पहले तो अच्छे से देखा और फिर मोती के बदले में 4 गाजर देने की बात कही|

लड़का मोती को लेकर आगे गया| कुछ ही देर बाद उसे बाज़ार में एक सोने-चांदी की दुकान दिखाई दी| उसने दुकानदार को मोती का मूल्य बताने को कहा| सोनार ने मोती का मूल्य 100 रूपए के बराबर बताया| लड़का मोती लेकर वहां से भी आगे बढ़ा| आगे कुछ दूर चलने पर उसे एक जौहरी की दुकान दिखाई दी| उसने जौहरी से भी मोती के मूल्य के बारे में जानना चाहा| जोहरी मोतीयों का भी व्यापार करता था, सो उसे मोतियों की भी अच्छी खासी जानकारी थी| उसने मोती का मूल्य एक हज़ार रुपये बताया|

अब लड़का आश्चर्यचकित था, वह जैसे-जैसे बाज़ार में मोती का मूल्य पुछ रहा था मोती का मूल्य बढ़ता ही जा रहा था| अब उसके मन में मोती का सही मूल्य जानने को लेकर उत्सुकता हुई| वह किसी भी कीमत पर मोती का सही मूल्य जानने के लिए आतुर था| कुछ ही दिनों में वह एक जाने-माने जौहरी के पास मोती का सही मूल्य जानने के लिए पहुंचा| जौहरी हीरे-मोती का बहुत बड़ा व्यापारी था|

लड़के ने जौहरी के सामने रखकर जैसे ही मोती दिखाया, मोती देखते ही जौहरी आश्चर्यचकित हो गया, उसने आश्चर्य से लड़के से पुछा-
यह मोती तुम्हे कहाँ मिला – (लड़के ने अपने पिताजी द्वारा मरते समय मोती देने और माँ द्वारा मोती का मूल्य पता करने की सारी बात जौहरी को बता दी)

नई कहानियां

लड़के की बात सुनते ही जौहरी सारा माज़रा समझ गया|

उसने लड़के को अपने पास बिठाया और कहा….
बेटा! यह मोती अनमोल है| दुनियां में इस तरह का और कोई भी मोती नहीं है| मेरे पास जो कुछ भी है अगर वह सब भी में तुम्हें दे दूँ तब भी इस मोती का मोल नहीं किया जा सकता|

जौहरी की बात सुनकर लड़के ने जौहरी से निवेदन किया…
सेठ जी, पिताजी की मौत के बाद हमें अकेला पाकर लोगो ने हमारा सारा धन छल-कपट से हड़प कर लिया है| धन-सम्पदा के नाम पर अब इस मोती के सिवा हमारे पास और कुछ भी नहीं है| अगर आप इस मोती का सही मोल लगा देंगे तो में यह मोती आपको दे दूंगा जिससे हमारी तंगी भी दूर हो जाएगी और यह मोती भी सही हाथों में चला जाएगा|

जौहरी को उस लड़के पर तरस आ गया|
उसने लड़के के सर पर हाथ फेरते हुए कहा…
बेटा! इस अनमोल मोती का मूल्य तो में नहीं लगा सकता लेकिन जो भी तुम हमसे इस मोती के बदले में लेना चाहो तुम ले सकते हो…

वह कैसे ? (लड़के ने जौहरी की बात पर गौर करते हुए पुछा…)

जौहरी ने लड़के को उसकी तीनों दुकानों के बारे में बताया और कहा… “हमारी तीनों दुकानों में से तुम्हें पहली दुकान में 15 मिनट का समय दिया जाएगा उन 15 मिनट में तुम जितना सामान उस दुकान से निकाल लोगे वह सामान तुम्हारा हो जाएगा| ठीक वैसे ही दूसरी दुकान में तुम्हें 25 मिनट और तीसरी दुकान में तुम्हें 60 मिनट का समय दिया जाएगा| तुम तय समय में जितना सामान दुकान से निकाल लोगे वह सब तुम्हारा हो जाएगा|

जौहरी की बात सुनकर लड़का बहुत खुश हुआ| लड़के ने सोचा मोती की इससे अच्छी कीमत मुझे नहीं मिल सकती| बस यही सोचकर उसने जौहरी की शर्त मान ली और वह मोती जौहरी को सोंप दिया|

कुछ ही देर में जौहरी ने अपने मुनीम को बुलाया और लड़के से हुई सारी बातचीत मुनीम को समझा दी| मुनीम लड़के को लेकर पहली दुकान में पहुंचा| लड़का दुकान को देखते ही दुकान की सुन्दरता में खो गया| दुकान में जगह-जगह हीरे-जवाहरात सजे थे| इतनी ज्यादा दौलत उसने पहले कभी नहीं देखि थी| वह इस धन-दौलत में वह इतना खो गया की उसे समय का ख्याल ही नहीं रहा कब जौहरी के दीए 15 मिनट पुरे हो गए|

मुनीम लड़के को लेकर दूसरी दुकान में पहुंचा| यह दुकान सोने-चांदी से भरी थी| लड़का सोने-चांदी की चमक को देखकर आश्चर्यचकित था| वह कभी सोने का हार अपने गले में डालकर खुद को शीशे में देखता तो कभी हाथ में कुंदा पहनकर खुद को अमिर समझता| देखते ही देखते यहाँ भी 25 मिनट पुरे हो गए और मुनीम ने लड़के को दुकान से बहार निकलने का आदेश दे दिया|

मुनीम अब लड़के को लेकर तीसरी दुकान में पहुंचा| इस दुकान में एशों-आराम की सारी चीजें मौजूद थी| ऐसी-ऐसी चीजें जो लड़के ने अपनी ज़िन्दगी में कभी नहीं देखि थी| इन सब चीजों को देखकर लड़का पागल हो गया| वह कभी सोफे पर जा कर बेठता तो कभी दिवार पर लगी झूमर को निहारता| “नई कहानियां ” कभी बड़े-बड़े हाथियों के साथ खेलता तो कभी अलग-अलग तरह की घड़ियों को अपनी कलाई पर बांध के देखता| इस बार भी देखते ही देखते 60 मिनट का समय पूरा हो गया|

मुनीम ने अगले ही पल लड़के को बाहर निकलने का आदेश दे दिया| बाहर निकलते-निकलते लड़के ने जुट की बनी एक थैली उठा ली| अब शर्त के अनुसार उस बेशकीमती मोती की किमत वह जुट की बनी थैली थी| लड़के ने बाहर निकलकर जुट की बनी थैली को देखा लेकिन उसमें कारीगरों के रखने का सामान जैसे हथोडा, चीणी और पत्थर आदि पड़े थे|

जोहरी ने शर्त अनुसार वह थैली उस लड़के को दे दी| मोती की कीमत उस जोहरी ने लगाई थी लेकिन लड़के ने अपने मंदबुद्दी का परिचय देते हुए उस मोती को कोडियों के भाव बेच दिया|

साथियों, हमारा जीवन भी उस मोती की ही भातीं अमूल्य है! हमें भी जीवन में हमारे जिवन को मूल्यवान बनाने के लिए तिन मोके मिलते हैं| जीवन के प्रथम पढ़ाव के पंद्रह वर्ष अच्छे से शिक्षा ग्रहण करने के लिए उसके बाद अगले 25 वर्ष खुद को साबित करने और कुछ बनने के लिए व ज़िन्दगी के आखरी वर्ष धर्म कर्म करने के लिए|

लेकिन हम भी जिंदगी की चकाचौंध में इतने अंधे हो जाते हैं की हमें समझ ही नहीं आता के ज़िन्दगी के किस पड़ाव पर हमें क्या हाँसिल करना हैं| इसीलिए ज़िन्दगी की चकाचौंध में न फसकर हमें हमेशा हमारे लक्ष्य की और अग्रसर होना चाहिए व् इस अमूल्य जीवन का भरपूर मज़ा उठाना चाहिए|


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