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Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

साथियों नमस्कार,  आज हम आपके लिए एक ऐसी कहानी “Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद” लेकर आएं हैं, जिसे पढने के बाद गरीब और गरीबी के प्रति आपकी सोच में परिवर्तन आ जाएगा| यह पूरी कहानी आपकी सोच को बदल कर रख देगी…


Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

‘कहाँ जा रहा है तू ?’ गंजू ने दौड़ कर जाते हुए संजू से पूछा।

‘मन्दिर’ दौड़ते दौड़ते ही संजू ने जवाब दिया।

गंजू ने तेज़ दौड़ लगाकर संजू की कमीज पकड़ ली।  संजू गिरते गिरते बचा।

‘क्या है… पकड़ा क्यों है… बता तो दिया था मैं मन्दिर जा रहा हूं’ संजू बौखलाया।

‘पर भागता हुआ क्यों जा रहा था … ऐसी क्या बात हो गई ?’ गंजू ने कहा ।

‘तू भूल गया… आज मंगलवार है… आज के दिन एक बहुत बड़ा सेठ मन्दिर में आता है और खूब सारी चीजें बाँट कर जाता है… अगर देर कर दी तो बहुत सारी चीजें खत्म हो जायेंगी।  वैसे भी लम्बी लाईन लग जाती है।  पहले ही देर हो रही थी और अब एक तो तूने आवाज़ लगा दी, फिर पकड़ कर रोक लिया।  छोड़ मेरी कमीज … फट जायेगी … तूने चलना है तो चल … अब तो तेजी से भाग कर जाना पड़ेगा’ संजू ने गंजू को डाँट लगाई।

‘चलो भागो…’ कहते हुए दोनों ही मन्दिर की ओर दौड़ पड़े।

रामभक्त हनुमान जी के इस मन्दिर में हर मंगलवार को बेकाबू भीड़ होती है। अनेक भक्त तरह तरह के प्रसाद चढ़ाते और फिर मन्दिर के बाहर गरीबों में बाँटते।

बहुतेरे भक्त अपनी गाड़ियों में खाने का काफी सामान लाते और लाइन लगवा कर बाँटते। लाइन में लगे प्रसाद पाने वाले लाइन में तो जरूर लगे रहते थे पर एक दूसरे को ऐसे पकड़े रहते थे कि बीच में कोई जगह न बचे ताकि कोई अन्य आकर उस में न घुस जाये।

जब दानी लोग प्रसाद बाँटना शुरू करते तो लाइन में हलचल शुरू हो जाती।  सबसे पीछे खड़ा अपने से आगे वाले को हलका सा धक्का भी मारता तो उसका प्रभाव लाइन में सबसे आगे खड़े तक पहुँचता, ठीक वैसे ही जैसे बिना इंजन की खड़ी रेलगाड़ी में जब इंजन आकर लगता है तो सभी डिब्बे हिल जाते हैं।

Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

कभी-कभी तो इस धक्के में इतना बल का प्रयोग होता है कि सबसे आगे वाला गिरता गिरता बचता है और चिल्लाता है ‘ठीक से नहीं खड़े हो सकते तुम’।

यूँ तो अनेक भक्त प्रसाद बाँट रहे थे।  पूड़ी-आलू की सब्जी का प्रसाद सबसे ज्यादा बँटता था।  इस प्रसाद से वहाँ प्रसाद पाने वालों की क्षुधा शांत हो जाती थी।  प्रसाद पाने वालों को स्वाद की नहीं पेट भरने की चिन्ता होती है।

कुछ प्रसाद पाने की इच्छा रखने वाले ऐसे भी थे जो लाइन में खड़े नहीं हो सकते थे।  वे मन्दिर के सामने सड़क किनारे पटरी पर बैठे थे।  यदि कुछ दानी भक्तों की दयालु नज़र उन पर पड़ जाती जो वे उन्हें वहीं जाकर प्रसाद दे आते और वे काँपते हाथों से प्रसाद पकड़ते।

अक्सर प्रसाद काफी गर्म होता था क्योंकि कुछ दानी भक्त मन्दिर के बाहर स्थित हलवाई की दुकान से ताज़ा ताज़ा प्रसाद बनवा कर बाँटते। पर मुश्किल यह थी कि पत्ते के बने दोनों में प्रसाद पकड़ना प्रसाद पाने वाले के लिए रोहित शेट्टी के शो ‘खतरों के खिलाड़ी’ के खतरनाक स्टंट से कम नहीं होता था।

गर्म पूड़ी और सब्जी का दोना हाथ में आते ही उसकी गर्माहट से हथेलियाँ जल उठती थीं।  एक हथेली से दूसरी हथेली में और दूसरी हथेली से पहली हथेली में पलटते पलटते बुरा हाल हो जाता था।  बीच बीच में फूँक भी मारते रहते।

अब दानी सज्जनों का इस ओर तो ध्यान जाता नहीं था।  वे तो बस प्रसाद खत्म होने तक जल्दी जल्दी बाँटते रहते और खत्म होते ही निकल जाते। उधर जब हथेलियाँ प्रसाद की प्रचण्ड गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पातीं तो उंगलियों से गर्म पूड़ी और सब्जी का निवाला बनाकर मुँह में डाला जाता जो बहुत देर से प्रसाद पाने की प्रतीक्षा कर रहा होता था।

उंगलियां भी जैसे जल जातीं थीं। पर जैसे ही गर्म निवाला मुँह में जाता तो मुँह खुला ही रह जाता और कभी कभी जलन से कराह उठता था तथा जलन को शान्त करने के लिए खुले मुँह से जोर जोर से साँस ली जाती जिससे कि निवाला ठंडा हो जाये।  फिर जैसे-तैसे उसे पेट की अग्नि को शांत करने के लिए निगल ही लिया जाता।

चबाने का मतलब होता कि मुँह ही जल जाये।  मुँह से होता हुआ गर्म निवाला जब अन्दर की ओर बढ़ता तो खाने की नली भी जल उठती और मुँह को कोसती।  मुँह बेचारा भी क्या करता।  वह तो पहले ही जल चुका होता था।  इधर जब खाना पेट में पहुँचता तो भूख की अग्नि गर्म निवाला पहुँचते ही शान्त होने के बजाय बिफर उठती ‘आग में आग कौन डालता है ?’

शरीर में गरम प्रसाद की गर्मी का ताण्डव नृत्य होता।  पेट कराह उठता ‘भूख शान्त करने के बजाय जलाने की यह सजा क्यों ?’ ‘जो मिल रहा है उसे संभालो, हम सबकी किस्मत में यही लिखा है’ हाथ मुंह उसकी कराहट पर बोल उठते।

चूँकि अनुभवी लोगों के लिए यह अनुभव पहला नहीं होता था कुछ अनुभवी प्रसाद पाने वाले अपने साथ पहले ही कुछ व्यवस्था कर लाते थे। उनके मैले-कुचैले थैलों में प्लास्टिक के पुराने बर्तन होते थे और साथ में प्लास्टिक की बोतल में पानी।  बर्तन साफ नहीं होते थे पर इसकी उन्हें चिन्ता नहीं होती थी।  वे तो बस उसे अपने कंधे पर पड़े अंगोछे से पोंछ कर तसल्ली कर लेते थे कि बर्तन साफ हो गया।

इसी तरह प्लास्टिक की बोतल में बंद पानी जो न जाने कब का भरा होता था वही पीते थे।  पर उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुँच चुके वृद्ध जल्दी जल्दी प्रसाद बाँटने वालों के गति से तालमेल नहीं बैठा पाते और बर्तन होते हुए भी उन्हें गर्म दोने पकड़ने पड़ जाते।  जीवन जीने की जंग में कितने घाव सहने पड़ते हैं ये कोई इनसे पूछे।

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कोई घर परिवार तो है नहीं जहाँ बिठा कर आराम से भोजन करवाया जाये। जब आलू-पूड़ी का प्रसाद खा लेने के बाद पेट जैसे तैसे भर लिया तो और खाने की गुंजाइश नहीं होती तो और बँट रहे प्रसाद का क्या करें।  कोई गाय-बैल तो हैं नहीं जो एक बार खूब सारा भर लें और बाद में बैठ कर जुगाली करते रहें।

पर फिर भी पेट भरने के बाद प्रसाद पाने वाले वहाँ से हट नहीं जाते और वे बार-बार प्रसाद की लाइनों में लगते हैं।  इस बार उनके पास प्लास्टिक की थैलियां होती हैं जिनमें वे प्रसाद भरते जाते हैं।  एक ही थैली में पूड़ी, आलू और कभी कभी हलवा यानि मिक्स्ड प्रसाद।  बाँटने वालों के पास इतना समय कहाँ कि वे अलग-अलग थैलियों में प्रसाद दें।

लेने वालों की मजबूरी होती है।  वे गर्मागर्म पूड़ी के करारेपन को गर्म आलू की सब्जी में डूबते देख रहे होते हैं कि इतने में हलवा छपाक से आ पड़ता है।  मजबूरी जो कराये वह कम।  शायद यहीं से आइडिया लेकर कुछ बिस्कुट निर्माताओं ने 50ः50 बिस्कुटों का उत्पादन किया होगा जिसमें मीठे और नमकीन दोनों का स्वाद होता है।

कुछ नौजवान भी प्रसाद बाँट रहे होते हैं पर वे आलू-पूड़ी न होकर बिस्कुट के पैकेट होते हैं।  उन्हें भी भर लेने की लालसा तीव्र होती है।  कभी कभी तो वे हाथ से खींच लिये जाते हैं और बाँटने वाले देखते ही रह जाते हैं।  लेने वाले जब कभी चाय पियेंगे तो साथ में यही बिस्कुट काम आयेंगे।  कितना सोचना पड़ता है इन प्रसाद पाने वालों को, प्रसाद बाँटने वालों से भी अधिक।

गंजू और संजू भी अपना पेट आलू-पूड़ी से भर चुके होते हैं।  उन्हें तो इन्तज़ार है सेठ जी के आने का।  इतने में संजू अपनी निकर की जेब में हाथ डालता है।  ‘जेब में क्या है ?’ गंजू पूछता है ।  जवाब में संजू जेब से निकाल कर हवा में लहराते हुए ‘अरे ये खाली थैली है, प्रसाद इकट्ठा करने के लिये’।

‘तू तो बड़ा समझदार है, मुझे तो यह आइडिया ही नहीं आया, एक और है तेरे पास’ गंजू अनुनय विनय करते हुए बोला।  ‘नहीं’ जवाब मिला। उसे इस बात की ईष्र्या होने लगी थी कि संजू तो आज ज्यादा प्रसाद इकट्ठा कर लेगा।  वह इधर उधर सड़क पर देखने लगा कि शायद कोई थैली मिल जाये।

उसकी निगाह एक थैली पर गयी जिसमें कुछ मिला जुला प्रसाद पड़ा था।  उसने तुरन्त वह थैली उठाई और उसे उलट दिया ।  यानि बाहर का हिस्सा अन्दर और अन्दर का हिस्सा बाहर जिससे प्रसाद बाहर फेंका जा सके।  फिर उसने प्रसाद किनारे लगे डस्टबिन में फेंक दिया और अब बाहरी हिस्से को हाथों से पोंछ लिया।

थैली साफ हो गई पर हाथ सन गए थे जिसे उसने अपने निकर से पोंछ लिया।  अब गंजू को भी तसल्ली हो गई थी कि वह भी प्रसाद इकट्ठा कर लेगा ।

‘सेठ जी की गाड़ी अभी तक नहीं आई।  आज प्रसाद पाने वाले भी ज्यादा हैं।  संजू तू ऐसा कर वहाँ दूर जाकर खड़ा हो जा।  जैसे ही तुझे सेठ जी की गाड़ी नज़र आये तू मुझे इशारा कर दियो और फिर भाग कर आ जाइयो, मैं सबसे आगे खड़ा हो जाऊँगा और तेरे आते ही तुझे भी अपने आगे लगा लूँगा।

कोई पूछेगा तो कह दूँगा कि मुझे कह कर गया था।’ गंजू ने आइडिया दिया।  ‘ठीक है’ कह कर संजू भाग कर दूर चला गया और एक जगह जाकर ऐसे खड़ा हो गया जहाँ गंजू भी नजर आता रहे और आती हुई सेठ जी की गाड़ी भी।

कुछ ही पलों में संजू को सेठ जी की गाड़ी नज़र आई और वह योजना के अनुसार हाथ उठाता हुआ गंजू की तरफ भाग पड़ा।  गंजू ने भी लाइन लगाने का उपक्रम किया।  पर औरों को क्या मालूम कि क्या हो रहा है।  गंजू ने पीछे मुड़कर देखा तो लाइन में वह अकेला ही था।  इतने में संजू भी आ गया और लाइन में अब दो जने हो गये थे।

‘आज मजा आयेगा’ दोनों ही खुशी से कह रहे थे।  इतने में सेठ जी की तथाकथित गाड़ी फर्राटे से उनके पास से निकल गई।  ‘यह क्या, आज सेठ जी ने प्रसाद नहीं बाँटा’ संजू बोला।  ‘अबे तुझे पक्का पता है वह सेठ जी की गाड़ी थी’ गंजू बोला।  ‘हाँ, सेठ जी की गाड़ी ऐसी ही है’ संजू बोला।  ‘ऐसी ही है का क्या मतलब, ऐसी तो कई गाड़ियां हो सकती हैं, तुझे गाड़ी का नम्बर नहीं मालूम’ गंजू बौखलाया।

‘तू तो ऐसे कह रहा है जैसे तुझे नम्बर पढ़ना आता हो, तू पढ़ सकता है गाड़ी का नम्बर, बता सामने वाली गाड़ी का नम्बर क्या है?’ संजू ने पलट कर कहा।  ‘यार कह तो तू ठीक रहा है, हम पढ़े लिखे तो बिल्कुल भी नहीं हैं।  अभी से हमारा यह हाल है तो बड़े होकर क्या होगा ?  हमसे कौन शादी करेगा ?

अगर हो भी गई तो हमारे बच्चे भी क्या यहीं लाइनों में लगेंगे ?’ गंजू ने भविष्य की कल्पना संजू से साझा की थी।  ‘कह तो तू ठीक रहा है गंजू, कुछ सोचना पड़ेगा’ संजू ने सिर खुजाया।  वे यह सब सोच ही रहे थे कि सेठ जी की गाड़ी आ गई और लाइन लग गई।  शोर-शराबे से दोनों का ध्यान टूटा तो देखा कि सेठ जी की गाड़ी में लाया गया प्रसाद बाँटा जाने लगा था।

लम्बी लाइन लग चुकी थी और वे लाइन से बाहर थे।  आज की सोच ने उनकी प्रसाद लेने की इच्छा पर आक्रमण कर दिया था।  प्रसाद पाने की इच्छा छोड़ वे गाड़ी में बैठे सेठ जी के पास गये और उन्हें नमस्ते की।  ‘अरे बेटा, प्रसाद बँट रहा है, जाकर ले लो’ सेठ जी ने प्रेम से कहा।  पर वे वहीं खड़े ही रहे।

‘क्या बात है बच्चो, तुमने प्रसाद नहीं लेना क्या’ दयालु सेठ ने फिर पूछा।  ‘सेठ जी, प्रसाद तो लेना है मगर वह नहीं जो आप बाँटते हैं, हमें कुछ और चाहिए’ दोनों बोले।  ‘बेटा, अगर तुम सोच रहे हो कि मैं प्रसाद में तुम्हें पैसे दूँ तो यह न हो सकेगा, मेरे असूल के खिलाफ है’ सेठ जी ने फिर कहा।

‘नहीं सेठ जी, हमें पैसे भी नहीं चाहियें’ दोनों ने एकसाथ कहा।  ‘तो बच्चो, फिर क्या चाहिए?’ सेठ जी ने उत्सुकता से कहा।  ‘सेठ जी, हम दोनों पढ़ना चाहते हैं, आप हमारे पढ़ाने की व्यवस्था कीजिए’ दोनों ने फिर एकसाथ कहा।

‘क्या … क्या बात है’ कहते हुए सेठ जी गाड़ी से उतर आये।  उन्होंने संजू और गंजू से कहा कि उनकी उम्र के जो भी बच्चे हैं उन्हें इकट्ठा करो। वे दोनों भाग-भाग कर हमउम्र बच्चों को इकट्ठा कर लाये।  10-12 बच्चे इकट्ठे हो गये थे।  सेठ जी ने उन सभी के बारे में जानकारी ली और पूछा ‘तुम में से कौन-कौन पढ़ना चाहता है ?’

हिंदी कहानी Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

सभी के हाथ एकसाथ उठ गये।  सेठ जी हैरान रह गये।  ‘यह मैं क्या प्रसाद बाँटता रहा आज तक, इन दोनों बच्चों ने मेरी आँखें खोल दी हैं, इस प्रसाद के साथ साथ मैं प्रण करता हूँ कि अब मैं शिक्षा का प्रसाद भी बाँटूंगा’ सेठ जी ने मन ही मन कहा।

‘बच्चो, तुम्हारे घरों के पास जो स्कूल है, वहाँ कल सुबह तुम मुझे मिलो, मैं तुम्हारा स्कूल में प्रवेश कराऊँगा और पढ़ाई का पूरा इन्तज़ाम करूँगा।  तुम खूब मन लगाकर पढ़ना और बड़े होकर मेरी तरह बनना’ कहते कहते सेठ जी नरम हो गये थे।  ‘हम भी आप बन सकते हैं’ बच्चों ने एकदम पूछा।

‘हाँ, क्यों नहीं, अगर तुम पढ़ लिख गये तो मेरे से भी ज्यादा आगे बढ़ जाओगे’ सेठ जी ने उत्साहवर्द्धन किया।  ‘वाह, चलो भई चलो, हम सब कल सुबह स्कूल में मिलेंगे’ कहते हुए बच्चे वहाँ से चले गये।  ‘अरे, प्रसाद तो लेते जाओ’ सेठ जी मुस्कुरा कर बोले।  ‘नहीं सेठ जी, आज जो आपने प्रसाद बाँटा है उस प्रसाद को तो हम भी कुछ समय बाद बाँटेंगे और आपको हमेशा याद करेंगे’ बच्चे आह्लादित थे।

‘बच्चो, आज मैंने नहीं तुमने मुझे प्रसाद बाँटा है, अगर तुम न कहते तो मेरे चक्षु नहीं खुलते।  आज तुमने मुझे जीवन में मंगलवार का बहुत बड़ा प्रसाद दिया है कहते हुए सेठ जी अपनी आँखें पोंछने लगे थे।

Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

सुदर्शन खन्ना


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Story of Migrant Labor | मिट्टी

साथियों नमस्कार, आज हम आपसे एक ऐसी कहानी “Story of Migrant Labor | मिट्टी” साझा कर रहें हैं जो कहीं न कहीं सत्यता से प्रेरित है| सतीश भारद्वाज की लिखी इस कहानी को पढने के बाद आपको कोरोना महामारी के सबसे भयावह दौर के बारे में पता चलेगा|


Story of Migrant Labor | मिट्टी

नारायण और उसकी पत्नी सरस्वती दोनों महाराज गंज से दिल्ली में आकर मजदूरी करते थे| दोनों ही एक फैक्ट्री में ठेकेदार के माध्यम से नौकरी करते थे| यमुना किनारे के खादर में बहुत सी झुग्गियां थी जिनमें ये दोनों रहते थे|

वहाँ एक छोटी सी झोपडी किराए पर ले रखी थी| खाली ज़मीनों पर अवैध झुग्गियां बसाकर किराये पर देना एक अवैध परन्तु संगठित व्यवसाय था भारत में, जिसमें बाहुबली और माफिया घुसे हुए थे|

तीन वर्ष की एक बिटिया थी दोनों की और सरस्वती तीन माह की गर्भवती भी थी| सरस्वती के नाम का अपभ्रंश अब सरसुती हो गया था और नारायण को सब नारान बोल देते थे|

कोरोना महामारी ने भारत में दस्तक दे दी थी| नारायण और सरस्वती जैसे मजदूरों को कोरोना भी कुछ है ये पता तब चला जब लॉकडाउन के कारण दिल्ली के बाज़ार पूर्णतया बंद हो गए|

फैक्ट्री मालिक जो कभी इन मजदूरों से सीधे कोई संपर्क नहीं करता था उसने इन्हें खुद तनख्वाह और कुछ अतिरिक्त पैसा दिया और बोल दिया था कि लॉकडाउन खुलने पर बुलवा लूँगा|

दोनों अपने झोपड़े में रहते थे, गर्मी भी अब परवान पर थी| इनके हाथ में पैसा तो था पर बाज़ार बंद होने के कारण कुछ मिल नहीं पा रहा था| जैसे-तैसे करके कोई दूकान खुली मिल जाती तो उससे ही कुछ राशन ले लेते थे| वो भी महंगी दरों पर मिल रहा था|

लेकिन ये लॉकडाउन की ख़ामोशी कुछ ज्यादा ही भयावह होती जा रही थी| पुलिस जहाँ भीड़ देखती वहीँ खदेड़ देती| पूरी दुनिया मुहँ लपेटे घूम रही थी| बहुत सारे मजदूर अपने घरों की तरफ चल दिए थे| लेकिन ये दोनों रुके हुए थे|

इनकी कोलोनी में भी लोग आते थे इनको मास्क और बिस्कुट बाँट कर फोटो खिंचवा कर चले जाते थे| अफवाहों का दौर गर्म था| लोगो में तरह तरह की चर्चा थी कि हवा से भी फ़ैल रही है ये बिमारी तो|

अब लगभग सभी अपने घरो की और चल दिए थे| कोई मौत को निश्चित मानकर अपने परिवार के पास जाने को आतुर था तो कोई काम धंदा ना होने कि मज़बूरी में| सरस्वती अपनी छोटी बच्ची और अपने गर्भ के कारण हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी|

सरस्वती ने बिटिया को सुला दिया था और एक प्लास्टिक के टुकड़े से उसकी हवा कर रही थी| नारायण आया और एक पैकेट बिस्किट का सरस्वती को दे दिया| सरस्वती ने मुस्कुराकर अभिवादन किया|

नारायण ने गंभीरता से कहा “सरसुती, उ ठेकेदार कहवन कि गाडी जा रहन…..फैइजाबाद तक “
सरस्वती की आँखों में चमक थी “क्या? सच…. तो चलो”

नारायण ने निराशा के साथ कहा “ऊ…. वो गाड़ी वाला …..उ दोनों का पाँच हज़ार रूपया मांग रहल” सरस्वती को झटका सा लगा “पाँच हज़ार, इतना काहे, कोनो कोई जहाज में ले जायेगा”

नारायण : सब गाड़ियाँ बन्द हैं… कर्फु लगा है, पैदल चलने पर भी पुलिस डंडा मार रही है
सरस्वती ने कुछ सोचने के बाद कहा “इतने पैसे तो दे ही देंगे, यहाँ भी कब तक रहेंगे? राशन महंगा भी मिलना मुश्किल हो रहा है|

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वो खाना बांटने वाले भी कभी आते हैं तो कभी नहीं…जब आते हैं तब भी फोटो ज्यादा खींचते हैं”
सास्वती ने नारायण के हाथ पर हाथ रख कर कहा “एक बार गाँव पहुँच जाएँ तो कम से कम अपने परिवार से तो मिल लेंगे”

सरस्वती की इस बात से नारायण भावुक हो गया| उसने बिटिया के सर पर हाथ फेरते हुए कहा “सब बोल रहें हैं कि ये बिमारी नहीं छोड़ेगी, अब जब मरना ही है तो अपने गाँव में मरेंगे| पता नहीं यहाँ तो अग्नि भी नसीब होगी या नहीं?”

सरस्वती ने भी निराशा से कहा “वो जरमन बता रहा था कि मुर्दों को कंधे देने को भी कोई तैयार नहीं है| सड़ रहे हैं मुर्दे…”

नारायण ने कुछ देर चिंतन किया और फिर निर्णायक शैली में बोला “सामान बाँध, अब गाँव में ही जायेंगे”

……………..

ठेकेदार इन सब से पैसे ले रहा था लेकिन फिर भी उसका अंदाज़ ऐसा था जैसे कि इनपर एहसान कर रहा हो| वो ही इन्हें ज्यादा कमाई के सपने दिखाकर दिल्ली लाया था| उसका व्यापार ये ही था, पूर्वी उत्तर प्रदेश से मजदूरों को लाकर यहाँ की फैक्ट्रियों में उनसे काम करवाना|

ठेकेदार ने नारायण के सामान के गट्ठर देखे और बोला “दुनिया में परलय आ रही है और तू ये सामान की गठरी ठाए घूम रहा है| अब तो लालच छोड़ दे नरान| बस राम नाम भज अब| शुकर है ये ले जाने को तैयार हो गए नहीं तो सड़को पर झाँकने भी नहीं दे रही पुलिस”

नारायण ने ध्यान नहीं दिया और ट्रक में चढ़ गया| अपने सामान की गठरी भी उसने ट्रक में ही लाद ली| ट्रक वाले से गोरखपुर तक छोड़ने की बात तय हुई थी और उसने पैसे पहले ही ले लिए थे| ट्रक में नारायण के अलावा 15 या 20 लोग और भी थे जिन्हें उस क्षेत्र में ही जाना था|

ट्रक ड्राइवर ठेकेदार से बोला “मथुरा को ले जाऊँगा, वहाँ चेकिंग से बच जायेंगे, आगे का रास्ता आगे देखेंगे नहीं तो टूंडला मैनपूरी कन्नोज को होते हुए चलेंगे”

ठेकेदार ने ट्रक में चढ़ते हुए कहा “भईया तुमै बताय दिए हैं कि कितै-कितै उतारनो सबन नै, अब जो सही लगे करो| जो जाने वो ताने…. हमतै कछु ना कहो”

सभी को बेहद सुकून महसूस हो रहा था ये सोचकर कि चलो अब अपने गाँव पहुँच जायेंगे| मजदूरों में से ही एक मजदूर ने ट्रक चलते ही महादेव के नाम का उद्दघोष किया बाकी ने भी साथ दिया|

एक मजदूर ने तम्बाखू हथेली पर निकाला और उसमें से कुछ ख़राब तुनके और पत्ती बीनने लगा| तभी नारायण ने आत्मीयता से कह “थोरा सा बढाय लो भईया” उस मजदूर ने मुस्कराहट से नारायण को प्रतिउत्तर दिया|

फिर और भी लोगो ने उसकी तरफ याचना भरी दृष्टि से देखा तो उसने 8 से 10 लोगो के लायक तम्बाखू हथेली पर निकाल लिया और अपनी मस्ती में तम्बाखू और चुने को सधे हुए हाथो से मिश्रण बनाकर रगड़ते हुए गुनगुनाने लग “रउआ…. बिना के पूजी बिरही…..हैह्ह्ह्हह दरद कैसा ……ह्ह्ह्ह”

तभी उसके कंधे पर एक साथी मजदूर ने हाथ रखा तो उसने अपनी गुनगुनाहट को विराम दिया और मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा| उस मजदूर ने संजीदगी से कहा “भईया आये रहे थे कि कछु पैसा कमाकर घर भिजवाएंगे…..बस इसलिए उहाँ वो इहाँ हम बिरहा की आग में जलते रहे”

तम्बाखू रगड़ रहे मजदूर ने खींसे निपोर कर कहा “तो भईया इहाँ आके भइल कोल्हू का बैइल…..कछु हाथ लगा का”

उस मजदूर ने मायूसी से उत्तर दिया “ठेकेदार बोले थे कुछ दिन बाद वापस आ जाना कछु पैसा जोडकर….जो जोड़ा वो तो ले लिहिस इसने… भाड़ा”

तम्बाखू रगड़ते रगड़ते वो मजदूर फिर हंसकर बोला “का भईया भीख ना माँगा वाहे खातिर मजदूरी किये ना| लेकिन का हुआ ……लाइन में लग लग भीख मांगी खाने की……. और ससुरो से फोटू भी खिंचवाए”

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इस बात पर सरस्वती जो अभी तक घूँघट किये मौन थी, वो तुनक कर बोल पड़ी “बहुत लज्जा आती थी, का करे पेट के मारे सब सहना पड़ी| और बार बार पैकेटवा को पकरा कर फोटो खींचते थे”

नारायण को उसका मर्दों के बीच यूँ बोलना अच्छा नहीं लगा| उसने उस पर अपना मर्दाना रोब ज़माते हुए कहा “काहे खखुआ के चढ़ी बईठल, खामोश रहो ना”

इतने समय में उस मजदूर के पारंगत हाथो ने तम्बाखू को रगड़ कर उसे मटमैली से हरी रंगत में बदल दिया था| जब उसने जोरदार थपकी लगाई तो उसकी गंध सबके नथुनों को उत्तेजित कर गयी|

मजदूर तम्बाखू से भरी हथेली आगे बढ़ाते हुए बोला “ई ससुरा कुरोना का का डीएम घुट गइस रगड़ा खाकर| लियो भईया पर तनी हमार लिए बी छोर दीयों” सब मजदूर ठठाकर हंस दिए

सबने थोडा थोडा पत्ती लेकर अपने होठों में दबा ली| नारायण की बिटिया सरस्वती की गोद में ही सो गयी थी| कुछ लोग ऊँघ रहे थे तो कुछ आपसी चर्चा में मशगुल थे|

अभी 2 घंटे का सफ़र ही हुआ था कि गाडी में एकदम से ब्रेक लगे और गाड़ी रुक गयी| अभी वो
सदाबाद के पास ही आये थे| पुलिस चेकिंग से बचने को ड्राइवर अलग रास्तो से आया था|

ठेकेदार भागकर पीछे आया और हडबडाहट में बोला “ उतरो सब नीचे” फिर वो उन्हें सड़क से हटकर अलग रास्ते पर ले गया और आगे जाकर बोला “इस रास्ते से आगे जाकर सड़क पर मिलो सब, चेकिंग चल रई है|

एक बार पकड़ लिया तो उसकी गाडी जपत हो जायेगी और हमे तुमे कर देंगे बंद…….. पुरे मास के लिए” मजदूरों के चेहरे पर अब परेशानी साफ़ दिखने लगी| उन्होंने पैसे सारे दे दिए थे, एक मजदूर बोला “अरे ठेकेदार साहब पुलस से कछु कह सुनकर देख लो ना”

ठेकेदार ने माथे में सलवट डालते हुए कहा “इतनी बुद्धि तो मुझे भी दी है भगवान् ने, बात करेंगे लेकिन भईया इतनो को देखकर आगे ना जाने देंगे”

नारायण थोडा हिचकते हुए बोला “वो आ तो जायेगा हमें लेने ठेकेदार साहब” ठेकेदार ने नारायण के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा “नरान तुम ई ना हो हज़ारो कु काम दिलवाया यहाँ, और अब उनके देश भी पहुंचा रहा हूँ| भिया यो विपदा ई एसी आई है…… कम से कम अपने परिवार से तो मिल लेंगे”

एक मजदूर ने गंभीर आवाज़ में कहा “यो बिमारी तो जी पता नी कितनो मारेगी| अब तो बस इतना होजा कि अंत काल में अपनी मिट्टी मिल जाए बाबु जी”

उसकी इस बात से कई मजदूरों की आँखों में से पानी बह निकला| सरस्वती ने अपने साड़ी के पल्लू से अपनी आँख साफ़ की|

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ठेकेदार ट्रक वाले के साथ गया और वो सब बताये रस्ते के अनुसार चल दिए| जहाँ उन्हें बताया था वो सब वहाँ पहुँच गए| बहुत समय तक इंतज़ार भी किया सूरज सर पर चढ़ आया था लेकिन ठेकेदार का कोई ठिकाना नहीं था|

ठेकेदार का फोन भी नहीं उठ रहा था| काफी प्रयासों के बाद ठेकेदार ने नारायण का फोन उठाया और घबराहट में बोला “ओ नरान, भैया सब आगे बढ़ लो उहाँ से| पुलिस ने गाडी ज़ब्ती कर ली”

नारायाण ने घबराहट में कहा “का कह रहे हो बाबूजी, हमारा का होगा इस परदेश में?”
फोन लाउड मोड़ पर था तो सभी सुन रहे थे|

उधर से ठेकेदार ने कहा “भईया जइसा बोले रहे वइसा करो| ना पुलिस आ रही है सबउको लेने| फिर डाल देंगे कहीं बंदी में| और इहाँ मरे तो भईया पता ना देह को अग्नि भी नसीब हो या ना”

और इतना कहकर ठेकेदार ने फोन काट दिया| अब सभी मजदूरों में घबराहट थी| तभी एक बोला भईया इहाँ से तो चलो पहले ना तो पुलिस आती ही होगी”

जिस मजदूर ने चुना रगड़ा था वो एकदम से बोला “आती ना होगी भईया, भेजी होगी उ छिनार के जने ठेकेदार ने| सब रूपया पईसा तो ठग ही लिए”

अब ठेकेदार का फोन बंद आ रहा था| पुलिस की एक गाड़ी आई और सभी को लाठिया कर खदेड़ना शुरू कर दिया| वो सब गाँव की पगडण्डी की तरफ चले गए तो पुलिस वाले भी वहाँ से चल दिए|

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मजदूर अभी भी तय नहीं कर पा रहे थे कि करें तो करें क्या? अब किसी के पास ज्यादा पैसे भी नहीं बचे थे| तभी एक मजदूर बोला “अरे ओ भइया चोरासी कोस परिकम्म्मा किये हो कभी?”
लगभग अधिकतर ने कहा “किये हैं भईया”

तब वो बोला “तो चलऊ फिर करते हैं डबल परिकम्मा, वैसे भी पईसा बचा नहीं….और भईया यहाँ रहो या अपने गाम में ये बिमारी छोड़ेगी भी नहीं”

नारायण ने दार्शनिक भाव में कहा “भईया जब मिटना ही है तो अपनी मिट्टी में जाकर मिटेंगे”
और इस तरह सब पैदल और एक लम्बी यात्रा पर निकल लिए| इनमें से सभी का गंतव्य 1000 किलोमीटर से भी ज्यादा था|

लेकिन जीवन भर मजदूरी करने वाला मेहनत से नहीं डरता| वो जानता है अपने शरीर की अंतिम सीमा तक उससे काम कैसे लेना है| उस पुरे दिन वो सभी चले और रात भी काफी समय चलने के बाद एक जगह उन्होंने रात काटी| सुबह फिर चल दिए|

अब उनके पास खाने की भी समस्या हो चली थी परन्तु देहात में उन्हें रास्ते में सहानुभूति भी खूब मिली और भोजन भी| देश का मिडिया 1947 के बाद के इस सबसे बड़े पलायन पर जमकर टीआरपी बटोर रहा था|

लेकिन ये जो पलायन कर रहे थे, इनकी आँखों में बस अपना परिवार और अपना गाँव था| इनमे से किसी को नहीं पता था कि वो एक बड़े वैश्विक मिडिया इवेंट के मुख्य पात्र हैं| ये पलायन
मीडिया में अब कोरोना से ज्यादा चर्चा बटोर रहा था|

तभी चलते चलते सरस्वती को दर्द होने लगा| बाकी मजदूरों को आगे चलने को बोलकर नारायण अपनी बेटी और सरस्वती के साथ वहीँ रुक गया| उसके साथ एक मजदूर और उसकी पत्नी और रुक गये|

उस मजदूर ने नारायण की बेटी को एक बिस्किट जो उसे रस्ते के एक गाँव में मिला था वो दिया| बिस्किट लेते ही उस बच्ची के थके हुए मासूम चेहेरे पर एक सुन्दर मुस्कान फ़ैल गयी जैसे घुप्प अँधेरे में कोई रौशनी की किरण फ़ैल जाती है|

इस महामारी के दौर में भी प्रकृति ने अपनी अप्रतिम सुन्दरता इस बच्ची के मुखमंडल पर बिखेर
दी थी|

सरस्वती एकदम से ज़मीन पर बैठ गयी और पीड़ा से कराहते हुए बोली “अब ना हो पायेगा, देह में बिलकुल जान ना बची है…..पता नही पीड़ा बढती ही जा रही है” और उसके मुख से एक कराहट निकली|

नारायण ने उसके माथे पर हाथ फेरते हुए उसे पानी पिलाया और बोला “हे सरसुती थोड़ी हिम्मत करो रे”

लेकिन सरस्वती की कराहा और पीड़ा बढती ही गयी|
साथी मजदूर ने नारायण को कहा “अरे हो नरान, भोजाई को छाँव में बैठा, कुछ देर बाद आगे चलते हैं”

नारायण ने परेशान होते हुए कहा “भईया यहाँ बियाबान में कहाँ रुके……कोनो मदद भी ना मिले यहाँ तो”

उस मजदूर ने कहा “नरान आगे ना चल पयेगी भोजाई…देख तो तनिक”

सरस्वती को दोनों लोग उठाकर छाँव में ले गए| तभी नारायण ने ध्यान दिया कि सरस्वती को रक्तश्राव हो रहा है| सरस्वती की साड़ी रक्त से पूरी तरह ख़राब हो गयी थी|

सरस्वती दर्द से करहा रही थी| साथ में चल रही स्त्री ने नारायण और साथी मजदूर को अलग जाने का इशारा किया और सरस्वती को संभालने में लग गयी| उसने अपनी एक धोती से पर्दा कर दिया|

नारायाण किसी अनिष्ट की आशंका से घबराकर रोने लगा और साथी मजदूर उसे ढाढस बंधाने लगा| नारायाण की बिटिया को नहीं पता था कि ये क्या हो रहा है? लेकिन वो माँ की दर्द भरी कराहट और नारायण का क्रंदन देखकर घबरा गयी थी|

नारायण को कुछ होश आया तो वो रोती हुई बिटिया को थोडा दूर ले गया| जहाँ उसकी माँ की कराहट की आवाज़ कम आ रही थी| कुछ समय बाद जब सरस्वती शांत हो गयी तो नारायण सरस्वती को देखने उसके पास आया|

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उस महिला ने सरस्वती को दूसरी साड़ी पहना दी थी और रक्त से सनी उसकी साड़ी वहीँ पास में पड़ी हुई थी| उस महिला ने नारायण के पास आकर भीगी आँखों से कहा “भईया सरसुती का लल्ला न रही”

नारायण सरस्वती के पास गया और उसके सर पर हाथ फेरने लगा| उसकी बिटिया कुलबुलाते हुए उसकी गोद में छिप गयी| दर्द से अब राहत थी लेकिन ह्रदय में उसके अजन्मे बच्चे के यूँ काल का ग्रास बन जाने के घाव थे|

ये मानसिक पीड़ा उस दैहिक दर्द से भी ज्यादा थी| अपनी बेटी के कोमल हाथो के स्पर्श से सरस्वती के चेहेरे पर एक शान्ति का भाव आ गया|

सरस्वती ने रोते हुए नारायाण से कहा “देखिये ना हमाये लल्ला ने तो अभी दुनिया देखि भी नहीं थी और लील गयी ये महामारी उसे”

नारायण ने उसे अपने अंक में लेते हुए कहा “रो मत सरसुती, बिटिया घबरा जाई….भगवान् सब सही करेगा”

सरस्वती ने भगवान् को कोसते हुए कहा “हम मजदूरों का कोई भगवान् नहीं……कहीं नहीं जाना मुझे, बस अब तो यहीं मर जाउंगी अपने लल्ला के साथ ही” और सरस्वती हिड्की दे कर रोने लगी|

नारायाण ने कहा “ना सरसुती ना….एसी बात ना कर| जी को तनी मजबूत कर| यहाँ परदेश में ना मरेंगे, मरना है तो अपने गाँव जाकर ही मरेंगे अपनों के साथ”

सरस्वती ने अपनी हिचकी को रोकते हुए कहा “ये भी तो अपना ही था| जिन बच्चो के खातिर इतना दूर आये मेहनत मजूरी करे खातिर, वो ही ना रहे तो काहे लाने गाँव जाएँ”

नारायण ने तब उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा “अपनी मिट्टी की खातिर सरसुती…..जिस मिट्टी से पैदा भये उस मिट्टी में ही मिलेंगे| यो हमारी धरती ना सरसुती…….चलना तो पड़ेगा”

नारायण की बात सुनकर से सरस्वती अतीत की यादों में पहुँच गयी| जब वो पहली बार गोने के बाद मायके से चली थी तो माँ ने रोते हुए विदा करते समय कहा था “यहाँ से तेरी विदाई हो गयी बिटिया, अब अंतिम विदाई ससुराल से ही हो बस”

सरस्वती को याद आया कि जब वो गाँव में आई थी नयी नवेली दुल्हन बनकर तो बस परिवार और कुटुंब ही नहीं पुरे मोहल्ले में उल्लास का माहोल था| वो हर व्यक्ति की बहु, बेटी या भोजाई बनकर आई थी|

मर्यादाओं का बड़ा भार उसके कंधो पर था| चूल्हे को लिपते समय उठने वाली वो सोंधी खुसबू उसके नथुनों में भर गयी| उसके ससुराल की हवाओं की खुसबू और वहाँ की मिट्टी की खुसबू ने उसके मस्तिस्क और उसकी कल्पनाओं को महका दिया|

सरस्वती के निस्तेज चेहेरे पर एक तेज़ आ गया और जोश के साथ वो उठकर चल दी अपनी मिट्टी के लिए, अपने गाँव के लिए|

सतीश भारद्वाज

Story of Migrant Labor | मिट्टी

मेरी ये रचना “Story of Migrant Labor | मिट्टी” समर्पित है उस मजदूर वर्ग को जिसने 1947 के बाद भारत में सबसे बड़ा पलायन सहा| ये शब्द उन मजदूरों की पीड़ा और जिजीविषा की बानगी भर है| कोरोना महामारी के समय मजदूरों के पलायन में एसी अनेक करुणा भरी और साहस से परिपूर्ण घटनाओं का साक्षी ये समय रहेगा| मजदूर ने मेहनत करके शहर खड़े किये, इस देश को खड़ा किया लेकिन भीख नहीं मांगी| जब समस्त विश्व कोरोना महामारी से सहम गया था तब उस मजदूर ने उस जीवटता का परिचय दिया जो इतिहास के पन्नों पर उस मजदूर के अपनी मिट्टी से प्रेम की तरह ही अमिट छाप बना गयी|


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ननंद | Emotional Story in Hindi

                  ननंद | Emotional Story in Hindi

दुनियां में हर इन्सान की अहमियत है और हर एक इन्सान की अपनी एक अलग सोच| इस दुनियां में हर इन्सान दुनिया की सोच बदलने की ताक़त रखता है| आज की हमारी युवा पीढ़ी और परिवार के बिच गई मुद्दों पर अलग-अलग सोच है| हमारी आज की कहानी इसी सोच के एक पहलु को बयां करती है, आइये पढ़ते हैं ननंद | Emotional Story in Hindi


                           ननंद | Emotional Story in Hindi

शिखा !  परिवार की लाडली बिटिया या फिर यूँ कहें की परिवार की आन, बान और जान| जब घर में होती तो ऐसा लगता मानों घर में आसमान टूट पड़ा हो| घर में इधर उधर धमा-चोकड़ी करना और खूब सारी बातें करना उसके पसंदीदा कामों में से एक था| शिखा के दादाजी शिखा को बहुत प्यार करते थे, लेकिन आजकल उन्हें शिखा की एक चिंता और खाए जा रही थी और वो थी शिखा की शादी की चिंता| बस दादाजी अब हर परिवार में शिखा का ससुराल ढूंढते| लेकिन शिखा को शादी नाम से ही इतनी चिढ थी कि शादी का नाम सुनते ही वह गुस्सा होकर, मुह फुला कर दुसरे कमरे में बैठ जाती|

खैर, थोड़ी देर में उसका गुस्सा खुद-ब-खुद उतर जाता और वो वापस अपनी धमा-चोकड़ी में व्यस्त हो जाती| काफी खोज-बिन के बाद भी शिखा के दादाजी को कोई ऐसा परिवार नज़र नहीं आया जहाँ वे अपनी लाडली बिटिया की शादी कर सके| इसलिए उन्होंने अपने बचपन के दोस्त से इस बारे में राय लेने का निश्चय किया| बस फिर क्या था वे अपने दोस्त रायबहादुर से मिलने बरेली की और निकल पड़े |

अगले दिन जब वह बरेली पहुंचे तो रायबहादुर ने स्टेशन पर ही उनके लिए गाड़ी भेज दी थी| 10 साल बाद अपने बचपन के दोस्त से मिलने के लिए वे भी बड़े उतावले थे| गाडी धीरे-धीरे रायबहादुर के घर की और बढ़ी ! बड़ा सा बंगलो, बंगलों के आगे बगीचा, गाड़ियाँ और  नोकर-चाकर देख दादाजी का मन ख़ुशी से भर गया|

इन 10 सालों में रायबहादुर ने कितनी तरक्क्की कर ली है, नहीं तो 10 साल पहले रायबहादुर के पास था ही क्या| बस यही सब सोचते-सोचते शिखा के दादाजी अपने दोस्त के बंगलो पहुँच ही गए|

गाड़ी की हॉर्न की आवाज के साथ ही रायबहादुर घर के बाहर अपने दोस्त के स्वागत के लिए आ गए थे| अपने दोस्त को गले लगाकर वे दादाजी को अन्दर ले गए| घर अन्दर से भी काफी शानदार था, अपने दोस्त की सम्पन्नता को देख शिखा के दादाजी भी फुले नहीं समाए|

ननंद | Emotional Story in Hindi

चाय-नाश्ता के बाद रायबहादुर ने उनके खास दोस्त से आने का कोई खास कारण पुछा|  दादाजी ने पोती की शादी के लिए एक अच्छा सा परिवार ढूंढने की का काम सोंपते हुए बिटिया का फोटो रायबहादुर के हाथ में सोंप दिया|

रायबहादुर भी अपने बेटे विक्रम के लिए एक सुयोग्य कन्या की तलाश में थे| तीखे नैन नक्श, चहरे पर तेज और एक बार में ही किसी को पसंद आने वाली शिखा बिटिया को फोटो में देखकर ही उन्होंने शिखा को अपने घर की बहु बनाने का फैसला कर लिया|

रायबहादुर इतना सोच ही रहे थे की इतने में उनका बेटा विक्रम आ गया| विक्रम ने दादाजी के पैर छुए और हाल-चाल पूछने के बाद ऑफिस की और निकल गया| विक्रम के जाने के बाद रायबहादुर ने अपने दोस्त से विक्रम और शिखा के सम्बन्ध के लिए पेशकश की| शिखा के दादाजी को लगा जैसे रायबहादुर ने उनके मुह की बात छिन ली हो|

खेर, प्रसंन्नता से विदा लेकर अपने घर आने का कहकर दादाजी अपने घर की और निकल गए|

विक्रम को शिखा बहुत पसंद थी| लेकिन विक्रम की माँ, विक्रम की शादी अपने से भी बड़े घर में करना चाहती थी लेकिन विक्रम के मनाने पर वह मान गई और तय समय पर विराम और शिखा की शादी हो गई|

ससुराल में शिखा के साँस-ससुर, विक्रम के बड़े भैया-भाभी और शिखा की ही उम्र की एक ननंद थी रागिनी| अपनी साद्की और सबका अच्छे से ख्याल रखने के कारण शिखा ने घर में सबके दिलों में जगह बना ली| लेकिन अपनी तमन कोशिशों के बावजूद अपनी सासू- माँ  का प्यार पाने में असफल रही|वह शिखा के हर काम में कुछ ना कुछ गलती निकाल ही देती थी|

अपनी शादी की रात को ही विक्रम ने शिखा से साफ-साफ कह दिया था,की”घर के किसी भी मामले में में बिलकुल नहीं बोलूँगा| ना तो में किसी बात पर माँ से बहस करूँगा और ना ही तुम्हारा साथ दूंगा| तुम्हें अपनी समझदारी से ही काम लेना होगा|”

लेकिन शिखा की लाख कोशिशों के बावजूद भी सासू-माँ के व्यव्हार में कोई परिवर्तन नहीं आ रहा था| शिखा की ननद जरुर उसकी माँ से शिखा भाभी के प्रति इस तरह के व्यहवार पर उलझ जाती लेकिन इस से भी केवल बात बढ़ने के अलावा कुछ नहीं होता| इसी तरह करीब एक साल निकल गया| शिखा और विक्रम को जुड़वाँ बेटियाँ हुई| यह समय शिखा के लिए अग्नि परीक्षा का समय था| शिखा का दर्द शिखा के लिए आंसू बन गया था ससुराल में शिखा को सम्हालने वाला कोई नहीं था और विक्रम और उनके पापा ने शिखा को अपने मायके भेजने के लिए पहले ही मना कर दिया था|

ननंद | Emotional Story in Hindi

एक दिन रागिनी कॉलेज से आई तो उसने सभी को कॉलेज के सालाना कार्यक्रम में आने के लिए कहा और यह भी कहा की कॉलेज में उसकी भी दो थी प्रस्तुतियां है इसलिए आप सभी का चलना बहुत ज़रूरी है| खैर, ना चाहते हुए भी शिखा को अपनी दोनों जुड़वाँ बेटियों के साथ रागिनी के कॉलेज जाना पड़ा|

कार्यक्रम की शुरुआत में गीत संगीत की कई प्रस्तुतियां हुई| उसके बाद माडलिंग राउंड शुरू हुआ| दर्शकों ने तालियों के साथ सभी का उत्साहवर्धन किया| माडलिंग में रागिनी ने भी हिस्सा लिया था| आखरी राउंड में रागिनी के साथ चार और लड़कियों को सेलेक्ट किया गया जहाँ सभी से जज द्वारा एक-एक सवाल पूछकर विजेता घोषित करना था| सवाल-जवाब का दौर शुरू हुआ| इसी कड़ी में जज साहिबा ने रागिनी से सवाल पुछा, “अगर घर में तुम्हारी माँ और भाभी में से किसी एक का साथ देना हो तो तुम किसका साथ दोगी”

पुरे सदन में ख़ामोशी छाई थी| सभी रागिनी के ज़वाब की प्रतीक्षा कर रहे थे| तभी रागिनी ने थोडा आगे बढ़कर कहा, “अगर भाभी सही हो तो अपनी भाभी का”

जज साहिबा ने आगे पुछा, ” क्यों ?”

रागिनी ने ज़वाब दिया, “क्यों की मुझे भी कल किसी की भाभी बनना है”

जवाब सुनते ही पुरे सदन में तालियाँ गूंज उठी| सभी रागिनी की सोच और उसके सटीक जवाब की प्रशंशा कर रहे थे|

रागिनी को विजेता घोषित किया गया| पुरुस्कार लेने से पहले रागिनी ने सभी से कुछ कहने के लिए माइक थामते हुए कहा, “हर बेटी अपनी माँ से बहुत प्यार करती है और माँ भी अपनी बेटी के दिल के सबसे करीब होती है| इसी तरह हमारे घर की बहुएं भी तो किसी की बेटियां है| आज हम किसी की बेटियां है कल से किसी की भाभियाँ और बहुएं बनेंगी| अगर कल से हमें कुछ दुःख हुआ तो हमारी माँ को भी दुःख होगा और इसी तरह हमारे घर की बहु को दुःख हुआ तो उनकी माँ को भी दुःख पहुंचेगा| और इस दुनियां में किसी भी इन्सान को किसी की भी माँ को दुःख  पहुँचाने का कोई हक़ नहीं है इसीलिए हर साँस अपनी बहु को अपनी बेटी समझे तो आगे चलकर उनकी बेटी भी खुश रहेगी|”

रागिनि के इतना कहते ही पूरा सदन एक बार फिर तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा|

ननंद | Emotional Story in Hindi

                         तालियों की गडगडाहट के बिच ही शिखा की साँस ने शिखा को गले से लगा लिया|

पढ़ें कैसे एक छोटे से बाचे ने अपनी नादानी से एक बड़े झगडे को सुलझा दिया :- हिंदी कहानी -पिज़्ज़ा 

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Hindi Kahaniya | परिवार

Hindi Kahaniya | परिवार

साथियों नमस्कार, Hindi Kahaniya के इस अंक में हम आपके लिए लेकर आएं हैं एक पिता-पुत्र की मार्मिक कहानी “परिवार” जिसे पढ़कर आपको अपने बच्चों की परवरिश से लेकर उनके आपके प्रति चल रहे विचारों को बखूभी से समझने का मौका मिलेगा! आशा है आपको हमारी यह कहानी पसंद आएगी….


परिवार

हर रात की तरह आज भी में देर रात घर पहुंचा! हमेशा से कोई भी गलत आदत न होने के कारण कॉलोनी में कोई भी मुझे देर रात आने पर गलत नज़रों से नहीं देखता था! में हमेशा इस बात को लेकर गर्व करता की लोग अपने बच्चों को मेरी उपलब्धियों का उदारहण देकर अच्छा पढने-लिखने की सलाह देते हैं|

खैर, यही सब सोचते हुए मैंने अपनी चाबी से घर का दरवाज़ा खोला|हांलाकि मुझे पता था की जब तक में घर नहीं पहुँचता तब तक दीप्ती को नींद नहीं आती थी, पर में अपने पांच साल के बेटे चिंटू को नींद से नहीं जगाना चाहता था|

दरवाज़े की हलकी सी आहट पाकर दीप्ती हमेशा की तरह कमरे से बहार आई, तब तक में मुह-हाथ धोने बाथरूम की तरफ जा चूका था और हमेशा की तरह दीप्ती खाना गरम करने किचन में चली गई| हर रोज़ ऐसा ही होता था, सुबह घर से निकलने के बाद हमारी मुलाकात रात को खाने पर ही होती थी|

दीप्ती को इस तरह की जीवन शैली से कोई Problem नहीं थी| एक हाई-क्लास सोसाइटी में अपनी साख बनाने के लिए हर किसी को इस हद तक की  मेंहनत करना ही पड़ती थी|

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चिंटू सो गया ? (खाना खाते हुए मैंने दीप्ती से पूछा)
हाँ काफ़ी देर से आपका इंतजार कर रहा था, लेकिन फिर इंतजार करते-करते ही सो गया (दीप्ती ने शिकायत भरे लहज़े से कहा)

लेकिन, हर बार की तरह मेने मुस्कुराकर बात को टाल दिया!

अगली सुबह

रात को देर से सोने के कारण हर रोज़ में सुबह देर से ही उठता था| लेकिन जब तक में उठता तब तक चिंटू स्कूल चला जाता था| चिंटू की हमेशा शिकायत रहती की में उसे कभी बाहर घुमाने नहीं ले जाता, और शायद  इसी बात को लेकर वो मुझसे नाराज़ भी था!

हमेशा की तरह मैंने उठ कर दीप्ती को आवाज़ लगाई, और बाथरूम में घुस गया| थोड़ी देर में ही दीप्ती नहाने के लिए गरम पानी ले आई|

तुम नहीं होती तो मेरा क्या होता (हमेशा की तरह मैंने पानी की बाल्टी लेते हुए अपना घिसा-पिटा डायलॉग मारा, और हमेशा की तरह ही दीप्ती मुस्कुराते हुए खाने की तैयारी करने किचन में चली गई)

खैर, Office के लिए तैयार होकर जब में Dining Table पर आया तो चिंटू मुह फुलाए बेठा था|

क्या बात है, जनाब आज स्कूल नहीं गए (मेने प्यार से चिंटू के बालों पर हाथ घुमाते हुए बोला)
आज Sunday है! (चिंटू ने घुस्से भरी आवाज़ से कहा)

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<काम की भाग-दौड़ में, मै यह भी भूल गया था…की आज Sunday है, और आज दिन में मैंने चिंटू के साथ मूवी जाने का Promise किया था| लेकिन आज तो मुझे Clint Meeting के लिए office जाना था>

मुझे office जाता देख चिंटू को अपना movie प्लान खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा था और शायद इसी लिए वो मुझसे गुस्से से बात कर रहा था|

पापा आप एक घंटे के कितने पैसे कमा लेते हो (अचानक चिंटू ने पूछा)

<चिंटू ने पहले कभी इस रवैये से मुझसे बात नहीं की थी, शायद गुस्से में उसने ऐसा कह दिया>

परिवार-Short Story in Hindi

लगभग 1000 रूपए (मेने कहा)
क्या आप मुझे 500 रूपए उधार दे सकते हो (चिंटू ने कहा)
लेकिन तुम्हे पैसे क्यों चाहिए (मेने थोडा गंभीर होते हुए पूछा)

मुझे चाहिए (चिंटू ने बनावटी मुह बनाते हुआ कहा)

खैर, मैंने चिंटू को 500 रूपए दे दिए
चिंटू उठा और अन्दर से अपनी गुल्लक ले आया

चिंटू ने अपनी गुल्लक से 500 रूपए निकाल कर 1000 रूपए मेरे हाथ में रखते हुए कहा, “क्या आप कल मुझे आपका एक घंटा दे सकते हैं, मुझे आपके साथ बैठ कर खाना खाना है”

बहुत बिगाड़ रखा है, तुम्हारी मम्मी ने तुम्हे….(चिंटू की इस हरकत पर मैंने गुस्से से चिंटू को एक थप्पड़ लगाते हुए कहा)

आज Office जाते हुए मेरे मन में बस यही सोच रहा था, कि “इस भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में क्या सब कुछ ख़रीदा जा सकता है” हांलाकि में भी तो चिंटू को यही सिखा रहा था|

कहानी का तर्क यही है की परिवार के लिए पैसा कमाने की चाह में हम परिवार को समय देना ही भूल जाते हैं| ज़िन्दगी में सबके बिच में ताल-मेल बिठा कर चलना ही समझदारी है!

परिवार | Hindi Kahaniya

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Hindi Kahaniya | सरपरस्त 

मजहर की एक छोटी सी दुकान थी, सूट-सलवार और चुन्नी बेचने की! दिन भर में थोड़ी बहुत कमाई हो जाती थी| इतनी की वो संतुष्ट
था| गरीब तबके के लोगो को उसकी दूकान पर कुछ ना कुछ मिल ही जाता था, अपनी बीवी या बेटियों को खुश करने के लिए|

दूकान के पीछे ही एक कमरे का छोटा सा घर था उसका! कमरे और दूकान के बीच की एक जगह में छप्पर पड़ा था, जो इस घर का आंगन,
रसोई सब कुछ था| मजहर के परिवार में उसकी बीवी “जैमुमा” और बस एक 14 वषीय बेटी “अंदलीब” थी|

यूूँ तो उसकी बीवी को कई बार गर्भवती हुई लेकिन कुल बच्चो में से बस ये एक बेटी ही जिंदा बची थी| जो की अपने माँ-बाप की बहुत लाडली थी| मजहर की बीवी सिलाई-कढाई का काम करती थी और “अंदलीब” मजहर की बेटी  भी इसी काम में पारंगत हो गयी थी|

“मजहर” के सामने ही “रहबर” की कस्बे की सबसे बड़ी जनाना कपड़ो की दूकान थी| रहबर की दूकान भी उसके घर में ही थी| रहबर की
गिनती कस्बे के रईस लोगो में होती थी| मुस्लिम समाज में तो उसे ख़ासा मुकाम हंसील था| क्यों की रहबर “इमदाद” भी बहुत करता
था| उसकी दूकान का कढाई-बुनाई का काम मजहर की बीवी ही करती थी|

दोनों दुकाने कहने को जनाना कपड़ो की ही थी लेकिन दोनों में कोई मुकाबला नहीं था| रहबर की दूकान पर हर तरह का जनाना कपडा मिलता था तो वहीूँ मजहर की दूकान पर गिनती का और सस्ता सामान था| मजहर बोलता था की रहबर मिया की छाूँव में उसका भी पेट पल रहा है|

वो कहते हैं ना, की सबसे बड़ी बात है आत्मसंतोष… तो मजहर और उसका परिवार अपनी सिमित सी कमाई और ज़िन्दगी में बेहद खुश
था|

लेकिन, शायद उनकी इस छोटी सी ख़ुशी को भी नज़र सी लग गयी थी| मजहर दिखने में तो पतला दुबला सा ही था लेकिन उसे देखकर कभी नहीं लगा की  वो अपने भीतर कोई गंभीर बीमारी पाले बैठा है|

मजहर के दिल में छेद था और एक दिन वो भी आया जब उसके दिल ने उसका साथ छोड़ दिया| इद्दत का समय तो गुजर गया लेकिन अब जैमुमा के सामने अपना और अपनी बेटी अंदलीब का पेट पालने का सवाल था|

क्या करे! एक औरत यूूँ दूकान पर भी नहीं बैठ सकती थी, बिरादरी में उल्टी सीधी बातें होने लगेंगी| जो सिलाई-कढाई का काम वो करती थी
उससे भी कोई इतनी कमाई नहीं होती थी|

अब घर में बस वो दोनों अकेली बैठी रहती थी| कहने को तो महीने से भी ज्यादा बीत गया था, लेकिन उन दोनों की आूँखें अभी भी नहीं सूख
पायीं थी| तभी जैमुमा को बाहर दूकान में कोई आहट सुनाई दी| वो उठकर बाहर आई तो देखा रहबर खड़ा है|

जैमुमा ने चुन्नी से चेहरा छुपाते हुए दूकान में पड़े तख़्त पर उसे बैठने के लिए कहा और खुद लकड़ी की बेंच पर बैठ गयी| रहबर कुछ कहता इतने वो बोल पड़ी “सिलाई-कढाई” का काम अब शुरू कर दूंगी, आप भिजवा देना”

आप पढ़ रहें हैं Hindi Kahaniya | सरपरस्त 

रहबर ने गला साफ़ करते हुए कहा “उसकी फिक्र मत करो, कोई और जरुरत हो तो बताओ?
जैमुमा बोली “जी कुछ नहीं बस खैर है, रह रहें हैं आपके साए में”

तभी अंदलीब पानी लेकर आ गयी| रहबर ने पानी पिया और फीर बोला “देख जैमुमा मजहर मेरे छोटे भाई जैसा था…मुझे पता है की
खाली सिलाई-कढाई के काम से तो तेरा खर्च नहीं चलेगा| तू ऐसा कर मेरे घर पर घर के काम में हाथ बटा दिया कर और अंदलीब भी
मेरी बेटी अनम के साथ खेल लेगी|

तू तो जानती है अम्मी तो बिस्तर पर ही है, और रुखसाना उम्मीद से है| डॉक्टर ने पूरे आराम को बोला है”

जैमुमा को लगा की रहबर को वाकई खुदा ने फ़रिश्ता बना कर भेज दिया उसके पास| वो कुछ बोलती इससे पहले ही रहबर फिर
बोलने लगा “देख ये मत समझना की तुझे या तेरी बेटी को घर की नौकरानी बनने को कह रहा हूँ…ना बिलकुल भी नहीं| तू मेरे भाई की
बेवा है|

तेरी इज्जत मेरे दिल में रुखसाना से लेश मात्र भी कम नहीं| अंदलीब भी मेरे लिए मेरी बेटी जैसी ही है| देख वहीँ कुछ घर के
काम में मदद कर देना…अपना घर समझ कर और जो सिलाई-कढाई का काम हो वो भी वहीँ पर कर देना| सिलाई-कढाई से अलग
कुछ कमाई हो जाएगी|”

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जैमुमा को भला इसमें क्या दिक्कत होती, वैसे भी रहबर की बेटी अनम भी अंदलीब की अच्छी सहेली थी| अनम 12 साल की थी और इससे छोटे दो बच्चे और थे रहबर के, और इससे बड़े दो बेटे जो बाहर रहकर पढ़ रहे थे|

जैमुमा और अंदलीब सुबह से ही रहबर के घर पर चले जाते थे| पुरे दिन दोनों माँ बेटी रहबर के घर में ही रहते थे| रुखसाना और
अनम का व्यवहार भी बहुत ही अच्छा था| दोनों समय का खाना रुखसाना उन्हें अपने घर पर ही खिलाती थी| और सिलाई-कढाई से
अलग कुछ और पैसे भी उन्हें रहबरसे मिल जाया करते थे|

सब सही चल रहा था| लेकिन कुछ दिनों बाद ही जैमुमा ने महसूस किया की रहबर उससे बात करने के बहाने तलाशता रहता है| शुरू जैमुमा को ये अपना वहम लगा लेकिन बाद में उसने महसूस किया की रहबर कहीं ना कहीं उसके नजदीक आने की फ़िराक में रहता था|

एक दिन जब वो रसोई का काम कर रही थी| अंदलीब अलग कमरे में कुछ कढाई का काम कर रही थी|उसने रहबर की आवाज सुनी| अब
उसे रहबर की आवाज से कोफ़्त सी होने लगी थी| आजकल उसके कान भी कुछ ज्यादा ही सजग रहते थे| रहबर अंदलीब को शायद कुछ काम बताने आया था|

तभी रहबर की अम्मी ने जैमुमा को आवाज लगायी| वो एकदम भीतरी कमरे में रहती थी| जैमुमा उसके पास गयी| अपनी कुर्खली आवाज में वृद्धा बोली “पेशाब की हाजत लगी है, ज़रा उठाकर गुसलखाने तक ले चल”

जैमुमा ने बेहद ही मधुर आवाज में कहा “जी अम्मी”

जैमुमा बूढी अम्मा को अपने कंधे का सहारा देकर गुसलखाने को लेकर चल दी| चलते चलते अम्मा उसे दुवाएं देती चल रही थी| ये उसकी
पुरानी आदत थी “अल्लहा तुझे हर नैमत बख्शे, अंदलीब को शाजादे जैसा शोहर मिले” और भी पता नहीं क्या क्या|

चलते-चलते वो समय को भी कोस लेती थी, की क्यों इस बेचारी को बेवा बना दिया|

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जैमुमा ने अम्मा को वापस बिस्तर पर लेटाते हुए उससे पूछा “और कुछ दरकार तो नहीं अम्मी”

अम्मा ने अनुग्रमहत होते हुए कहा “ना मेरी बच्ची तू देख ले अपना काम”

जैमुमा बाहर आई तो देखा अनम रसोई में ही बैठी है| जैमुमा ने पूछा “अंदलीब कहाूँ है?”

अनम ने बेपरवाही से कहा “वो तो सिलाई कर रही है| अब्बू कु छ काम बता रहें हैं उसे”

इतना सुनते ही जैमुमा का माथा ठनक गया| वो तेज कदमो से बाहर के उस कमरे की तरफ भाग ली!

कमरे का दरवाजा बंद था| ये देखते ही जैमुमा बदहवास हो गयी और अंदलीब को तेज आवाज लगाते हुए तेज-तेज दरवाजा पीटने
लगी| ये कमरे उपरी मंजिल पर थे तो निचे तक तो आवाज नहीं जा रही थी|

लेकिन आवाज सुनकर रुखसाना आ गयी|

रुखशाना को जैमुमा की बदहवाशी कुछ नगवांर गुजरी|

उसने झल्लाते हुए कहा “क्या कयामत टूट पड़ी क्यों इतना चिल्ला रही हो?”

तभी कमरे का दरवाजा खोलकर रहबर बाहर आया| उसके चहेरे पर पसीना था और वो घबराया हुआ था| अंदलीब भागकर अपनी
माूँ से लिपट गयी|

जैमुमा पागल सी हो गयी और चिल्लाते हुए बोली “क्या हुआ, क्या किया इस शैतान ने तेरे साथ?”

अंदलीब रोते हुआ बोली “अम्मी तुम ना आती तो बर्बाद हो गयी थी मैं”

अंदलीब 14 साल की थी तो अब बहुत कुछ समझती थी|

रहबर सकपकाते हुए बोला “अरे कुछ नहीं बस सिलाई का काम बता रहा था इसे, खान साहब अपनी बेटी के लहंगे पर कुछ ख़ास
कढाई और जरीदारी का काम करवाना चाहते थे”

रहबर आगे भी कु छ कहना चाहता था लेकिन जैमुमा ने उसको एक जोरदार तमाचा मारते हुए उससे कहा “कमरे के दरवाजे बंद करके
काम समझा रहा था जलील आदमी, शर्म नहीं आई तुझे, तेरी बेटी की उम्र की है ये”

रुखसाना जैमुमा को शांत करते हुए बोली “चुप हो जा जैमुमा”

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इतने में ही रहबर बोल पड़ा “एक तो तुझे सहारा दिया और उल्टा मेरे पर ही इल्जाम लगा रही है, मेरी बेटी और मेरी बीवी के सामने
ही मुझ पर झूठे इल्जाम लगा रही है हरामी औरत…तू खुद बच्चलन है, और तेरी ये बदचलन बेटी” वो इससे आगे कुछ बोलता तभी
रुखसाना अपनी जलती हुई आवाज में चिल्लाई “आप नीचे जाओ रहबर मिया”

रहबर ने देखा की रुखसाना की ऑंखें जल रहीं हैं| वो चुपचाप नीचे दूकान में चला गया|

अंदलीब अब भी रो रही थी|  जैमुमा ने अंदलीब से कहा चल बेटी अब यहाूँ नहीं आयेंगे| फिर वो रुखसाना की तरफ देखते हुए बोली “क्या रुखसाना तुझे भी नहीं दिखाई देता ये सब, तू तो एक औरत है| कुछ भी नहीं बोली”

रुखसाना की आँखे अब भी बह रहीं थी| वो रोते हुए बोली “क्या बोल सकती हूँ मैं जैमुमा? और कहाँ जायेगी तू भी अगर यहाँ नहीं आएगी तो?

जैमुमा, मैं भी तेरी तरह औरत हूँ और औरत हमेशा मर्द की जमीन ही तो रही है| मर्द जब चाहे उसका सीना चीर दे और
जब चाहे उस पर अपनी गंदगी उलट दे…..औरत को तो खामोश ही रहना है|”

जैमुमा ने ताना मारते हुए कहा “वाह रुखसाना अपने शोहर को सही साबित करने को क्या खूब कही….मतलब यहाँ रोज़ अपनी और
अपनी बेटी की अस्मत लुटवाऊं”

रुखसाना ने फिर कहा “जैमुमा मैं कौन होती हूँ किसी को सही साबित करने वाली? और ना ही तुझे यहाँ आने या ना आने को कुछ बोल
रही हूँ| जैमुमा मैं बस ये बता रही हूँ की मैं एक औरत हूँ इसलिए मैं कु छ नहीं| हम औरतो को तो कुरान की आयतों में भी कोई सहारा
नहीं, वो भी इन मर्दों की ही ढाल हैं|”

जैमुमा ने अब चीखते हुए कहा “जब तेरी बेटी के सीने पर कोई शैतान चढ़ेगा तब देखूंगी क्या बोलेगी| अभी तो तू भुस पर लीप रही
है|”

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रुखसाना को ये बात बुरी लगी,  वो बोली “अल्ल्ल्हा ना करे कभी ऐसा हो और अंदलीब के साथ भी कभी अल्लाह ऐसा ना होने
दे….तेरी मर्ज़ी जैमुमा| तुझसे बड़ी हूँ और तुझसे ज्यादा दुनिया देखि है|

याद रख इस दुनिया में हर औरत तेरी तरह मजबूर है और हर मर्द में तुझे एक रहबर ही मिलेगा| मर्द अपनी बीवी के नजदीक भी उस ही मकसद से आता है और दूसरी किसी और औरत के करीब भी उसी मकसद से जाता है|”

रुखसाना की बातें सुनकर जैमुमा को बुरा तो लगा लेकिन जैमुमा को बिना कुछ कहे वह अंदलीब को लेकर अपने घर चली गयी|

जैमुमा आ तो गयी थी लेकिन अब उसके लिए ज़िन्दगी का सफ़र एक अंधी गली बन कर रह गया था| उसे समझ ही नहीं आ रहा था की वह क्या करे?  सिलाई-कढाई का जो काम रहबर दे देता था अब तो उसे वो भी नहीं मिलेगा|

जैमुमा आज दूकान को देख रही थी तीन महीने से सब सामान ज्यों का त्यों ही पड़ा था| तभी अन्दर रुखसाना आई| उसे देखते ही
जैमुमा का चेहरा बिगड़ गया|

उसने बुझी सी आवाज में जैमुमा से कहा “कैसी है जैमुमा, सब खैरियत?”

जैमुमा ने उखड़े से अंदाज में जवाब दिया “खैरियत सब, आज यहाँ आने की तकलीफ क्यों की”

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रुखसाना ने मुट्ठी में रखे हुए हुए कुछ नोट जैमुमा के सामने रख दीए|

जैमुमा ने उन रुपयों को बेरुखी से देखते हुए कहा “क्या रुखसाना आपा, ये पैसे दे रही हो मुझे चुप रहने को…. लेकिन मैं तो चुप ही हूँ”

रुखसाना ने बुझी सी आवाज में कहा “एक औरत की इज्जत को कोई मर्द ही पैसे में तौल सकता है एक औरत ऐसा कभी नहीं करेगी
जैमुमा| तूने जो काम किया है ये उसके पैसे हैं, तू लेकर तो आई नहीं थी”

जैमुमा ने बेहद ही सख्त लहजे में कहा “रखिये ये अपने पैसे आप अपने पास, मुझे नहीं चाहिए”

रुखसाना की आूँखों में अब आंसू थे, वो रूवांसी होते हुए बोली “जैमुमा इतने बड़े बोझ तले मुझे मत दबा| ये तेरी ईमान की कमाई है|
हाथ जोडती हूँ इसे रख ले|”

जैमुमा ने कुछ नहीं कहा और रुखसाना वहां से चली गयी|
जैमुमा भीतर कमरे में चली गयी और फिर से इस उहा-पोह में उलझ गयी की करे तो क्या करे?

अगले रोज सुबह जैमुमा जब उठी तो देखा अंदलीब दूकान को सवांर रही है| जैमुमा दूकान में आई और बोली “ये क्या कर रही है?”
अंदलीब ने बेपरवाही से जवाब दिया “दूकान खोलनी तो है ही तो सफाई ही कर लूूँ|”

जैमुमा को ये बेहद ही अजीब लगा| वो झल्लाकर बोली “कौन खोलेगा दूकान?”
अंदलीब : हमारी दूकान है तो हम ही खोलेंगे अम्मी!

जैमुमा (आूँखे बड़ी करते हुए) : तेरा दिमाग ख़राब हो गया है क्या?  बिरादरी क्या कहेगी? किसी जनानी को दूकान पर बैठेते देखा है क्या?

अंदलीब : तो फिर अम्मी ऐसा करें घर में पड़ा है चूहों का चालान, दोनों उसे ही खा लेते हैं| अम्मी ये दुनियां  रहबर जैसे मदों से भरी
हुई है, हर जगह वो ही मिलेंगे|

जैमुमा (भावुक होते हुए) : ख़ुदकुशी गुनाह है मेरी बच्ची| ऐसी बात मत कर….अल्लाह कोई ना कोई रास्ता जरुर दिखाएगा|

अंदलीब : अल्लहा ने तो रास्ता दिखाया हुआ था अम्मी…. ये दूकान| बस हम ही आूँखें मूंदे बैठे थे|

जैमुमा को अंदलीब की बातें समझ नहीं आ रही थी| उसने तो कभी किसी मुस्लिम औरत को दूकान पर बैठे नहीं देखा था|

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जैमुमा ने समझाने के अंदाज में कहा “बेटी ये तो कादिरों के अंदाज हैं| उनकी औरते बैठती हैं यूँ बाजारों में| मुसलमानों में तो औरते
परदे में ही रहती है मेरी बच्ची| ये तू क्या करने को कह रही है?

अंदलीब : अम्मी हकीक़त में तो हम पदों में रहने वाली हैं बाजारू| जब चाहे कोई भी मर्द आकर लुट ले| कादिर तो बोल दिया अम्मी
लेकिन क्या देखा नहीं की कितनी इजात हैं उनमे औरतो की? उनकी औरते काम करती हैं तो इसका मतलब यह नहीं है की वो किसी की भी जागीर है|

जैमुमा उसे एकटक निहार रही थी| अपने हाथो से जैमुमा ने अंदलीब की नज़र उतारते हुए कहा “क्या बच्ची ज़िम्मेदारी ने तो बहुत
ज्यादा समझदार बना दिया तुझे” जैमुमा ने अपनी आूँखों के आंसू अपने दुपट्टे से पूंछे और अंदलीब को बाहों में भर लिया|

अगले दिन कस्बे में बहुत सी चर्चाएँ थी| क्यों की अंदलीब और जैमुमा दूकान पर बैठी ग्राहकों को सामान दिखा रही थी| बाज़ार में सभी को ये
बहुत ही अजीब लग रहा था|

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लेकिन अंदलीब और जैमुमा ने दूकान पर बचे हुए सामान और रुखसाना के दीए पैसो से शुरुवात कर दी थी| औरतो के दूकान पर होने
से औरतो की आमद कु छ ज्यादा हो गयी थी|

जो एजेंट रहबर की दूकान पर थोक में माल बेचने आते थे उनकी निगाह इस छोटी  दूकान पर भी पड़ी| रहबर सबसे तो सामान लेता नहीं था तो जिनका सामान रहबर अपनी दूकान पर नहीं बेच रहा था उन्होंने जैमुमा को दूकान पर अपना सामान बेचने को दे दिया| जैमुमा को ये सामान उधार में मिल गया था|

उन दोनों माँ-बेटी का व्यवहार भी इतना अच्छा और मधुर था की ग्राहकों को वो मोह ही लेती थी| इस तरह चार महीने में ही जैमुमा की दूकान से पीछे का हिस्सा भी लगभग दूकान में ही तब्दील हो गया था| ग्राहकों की भीड़ उसकी दूकान से टूटती ही नहीं थी| अब उसकी दूकान पर वो महंगा सामान भी मिलता था जो रहबर की दूकान पर था|

रहबर के ग्राहक भी अब टूटकर जैमुमा की दूकान पर जा रहे थे| रहबर अपनी झल्लाहट ये कहकर निकाल लेता था, की “मुझे ईमान का खाना है जनाब, लोग उनका सामान नहीं उनकी जवानी देखने जाते हैं| इखलाक नाम की चीज ही नहीं रही| हमने नहीं देखा की हम मुसलमानों की औरते यूूँ बाजारू हो जाएँ”

लेदकन कु छ समय बाद रहबर को जैमुमा की दूकान पर बढती भीड़ से दिक्कत होने लगी थी| क्योंकि अब उसकी दूकान के ग्राहक टूटकर
जैमुमा की दूकान पर जा रहे थे|

एक तो रहबर उससे पहले से ही चिढ रहा था क्योंकी रहबर को लगता था की जैमुमा और उसकी बेटी ने उसके सम्मान को ठेस पहुंचाई थी| उसने जो भी अंदलीब के साथ करने की कोशिश की थी वो तो उसे अपना हक लगता था|

अब रहबर की छटपटाहट बढती ही जा रही थी| वो अक्सर समाज के लोगो के मध्य अब जैमुमा के यूँ दूकान पर बैठने का विरोध करता रहता था|

जैमुमा की दूकान पर अलसुबह अभी ग्राहक आने भी शुरू नहीं हुए थे की शहर काजी और कुछ अन्य लोग आकर खड़े हो गये| जैमुमा
भीतर ही थी और अंदलीब दूकान लगा रही थी|

शहर काजी और अन्य लोगो को देखकर अंदलीब ने सर को ढककर उनका अभिवादन किया और उन्हें बैठने को कहते हुए अन्दर चली
गयी| थोड़ी देर बाद जैमुमा बाहर आई|

जैमुमा : सलाम वालिकुम काजी जी

शहर काजी ने देखा की जैमुमा ने बस सर पर एक चुन्नी ढकी हुई है| शहर काजी के माथे में बल पड़ गए| लेकिन फिर अपना जायका ठीक करते हुए शहर काजी ने अभिवादन का उत्तर दिया “वालेकुम अस्सलाम वा रहमतौल्ल्हा”

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शहर काजी ने दूकान को देखते हुए कहा “बीबी मजहर मिया जब तक जिंदा रहे उन्होंने हर मजहबी शिनाख्त को इस घर में
बरक़रार रखा| लेकिन अब देख रहा हूँ की कादिरों के चलन पर आते जा रहें हो”

जैमुमा समझ गयी थी दक शहर काजी आज क्यों आया है? वैसे भी वो समझ रही थी दक अब उसकी दूकान मुसलमानों को खटक रही
है| कितने ही लोग थे जो मजहर की मौत के बाद रहबर की ही तरह इन दोनो माँ-बेटी पर अपनी सरपरस्ती का एहसान करना चाहते थे| ये दूकान और जैमुमा की आत्मनिर्भरता अब उनके आड़े आ रही थी|

जैमुमा ने संभल कर जवाब दिया: शहर काजी जी हर मजहबी तालीम का सम्मान अब भी इस घर में होता है| बाकी खाली मजहबी
तकरीरो को पढ़ लेने से पेट तो नहीं भर जाता ना| पेट भरने के लिए भी कुछ तो करना ही पड़ेगा|

शहर काजी को जैमुमा से ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी| बड़े बड़े रईस मुसलमान जिसके आगे गीड़गीड़ाते हों उसे एक औरत वो
भी बेवा यूँ सीधे जवाब कैसे दे देगी भला?

शहर काजी ने मौके की नजाकत को समझते हुए जैमुमा से कहा “आज शाम को मदरसे में आ जाना जैमुमा कुछ बात करनी है और
बिरादरी के कुछ लोग रहेंगे तो थोडा ख़याल रखना”

शहर काजी का इशारा उसके द्वारा बुरका ना पहनने को लेकर था| शहर काजी चले गए| अंदलीब बाहर आई और बोली “क्यों आये थे शहर काजी जी? अब इन्हें भी ददक्कत है हमारी दूकान से..”

जैमुमा ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन वो जानती थी कि कितनी बड़ी मुसीबत उन पर टूट पड़ी है|

मदरसे में कस्बे के 10-15 लोग इकठ्ठा थे| रहबर भी बैठा था| जैमुमा अभी तक नहीं आई थी| उनमें आपस में बातें चल रही थी| रहबर बोल रहा था “जनाब हम तो कुछ कह नहीं सकते| चालचलन तो इन दोनों माँ-बेटियों का पहले से ही गलत था बस ये है की मजहर था तो निगाह थी इन पर, अब तो ये आजाद हो गयीं हैं|

मैंने घर पर काम के लिए बोल दिया था और अपनी तरफ से जो हो रही थी वो मदद कर रहा था| लेकिन इन्हें तो खुला चुगना था|” तभी एक व्यक्ति बोला “काजी जी माँ-बेटी बिना चुन्नी के यूँ ही झुक-झुक कर मदों से बातें करती हैं| लोंडे खूब आते हैं खरीदारी करने को, उन्हें भला क्या चाहिए और”

रहबर ने उसकी बात बीच में रोकते हुए कहा “साहब मैं तो सामने ही रहता हूँ, सारे आला करम देखता हूँ इन माँ-बेटियों के| लोंडो से हंस-हंस कर बातें करती हैं, और दो तीन हिन्दुओं के लोंडे तो अब लगे बंधे आ रहें हैं| वो तो देर सबेर भी आने लगे हैं…..और दूकान
नहीं सीधे भीतर घूसते हैं| लोगो में तरह तरह की बातें हो रही हैं”

ये हिन्दुओं के लोंडो वाली बात रहबर ने झूठ कही थी लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव इसने ही किया था वहां के लोगो पर| इतने में ही जैमुमा आ गयी तो उन लोगो में एकदम चुप्पी छा गयी|

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जैमुमा ने बुरका पहना हुआ था| शहर काजी ने आते ही जैमुमा की सुने बिना ही अपनी कहानी शुरू कर दी “सुन जैमुमा जिस तरह तू और तेरी बेटी यूँ बाज़ार में बैठ रहीं हैं ये इस्लामी चलन नहीं और जायज़ भी नहीं| तू दूकान बंद कर अपनी और रही बात तेरे खर्चे की तो रहबर मिया तुझे काम देने को तैयार हैं|

इनके घर पर काम कर तुझे रोटी भी मिलेगी और पैसा भी| जल्द ही हम तेरी बेटी के लिए कोई अच्छा सा लड़का देखकर उसका निकाह कर देंगे, उसकी फिक्र तू मत कर|”

जैमुमा को सुनकर बड़ा अजीब लगा| किसी ने उसकी सुनी ही नहीं बस तुरंत अपना फैसला सुना दिया| जैमुमा ने कहा “काजी जी रहबर मिया की नियत मेरी बेटी को लेकर ठीक नहीं है और मैं जानती हूँ की आपको भी इन्होने ही भड़काया है”

इस इल्जाम के लगते ही रहबर बिगड़ पड़ा “काजी जी मैं इसलिए ही इस मसले में नहीं पड़ना चाह रहा था| ये बदजात औरत मुझ पर ही
इल्जाम लगा गयी| जब तक मैंने हमेशा इसकी मदद की”

शहर काजी और वहां बैठे बाकी लोगो ने रहबर का ही समर्थन किया| शहर काजी अब कड़े लहजे में बोले “बदजुबानी मत कर बेवकूफ औरत| जनानी है उस तरह ही रह| बेवा हो गयी तो इसका मतलब ये नही की अब तूम दोनों माँ-बेटी की अपनी मर्ज़ी से चलेगी| दूकान-वुकान बंद कर और जैसा कहा है वैसा कर”

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जैमुमा को अब गुस्सा आ गया “काजी जी कोई चोरी या जीना खोरी नहीं कर रहीं हूँ| और मेरी बेटी पर मुझे फक्र है| वो कोई गाडी चोर नहीं है तुम्हारे बेटे की तरह| जिसे तुम थानों में जाकर छुड़ा कर लाते हो”

शहर काजी के तीन लड़के थे और तीनो ही पक्के वाले गाडी चोर और अपराधी किस्म के थे| लेकिन शहर काजी के बेटे थे तो शहर
काजी कुछ ना कुछ करके उन्हें बचा ही लेता था| लेकिन यूँ सब लोगो के बीच में एक औरत उस पर ऐसे ऊँगली उठा दे, ये उसे अच्छा
नहीं लगा| वो एकदम चीख पड़ा और एक भद्दी गाली उसने जैमुमा को दी|

जैमुमा ने रहबर को उस दिन जो तमाचा मारा था वो रहबर भूल नहीं पाया था| रहबर के पौरुष पर गहरी चोट लगी थी उस दिन| आज रहबर को मौका मिल गया था| रहबर उठा और एक जोरदार लात जैमुमा के पेट पर मारी जैमुमा की चीख निकल गयी और वो जमीन पर गिर गयी|

जैमुमा की आँखों में अँधेरा छा गया था| शहर काजी बोला “बकवास करती है बदजात औरत| एक तो तेरी मदद करना चाहते हैं ऊपर से हम पर ही गलत इल्जाम डाल रही है|

जितना कहा है उतना सुन, समझी नहीं तो मजहब की तौहीन तो तुझे करने नहीं देंगे बिलकुल भी|”

जैमुमा अब मजबूर हो उनकी बाते सुन रही थी| रहबर ने कहा “काजी जी इसकी बेटी गलत नहीं है लेकिन ये उसे भी गलत बना देगी|”
शहर काजी ने रहबर से कहा “कोई नहीं आप अपने घर का काम काज करवाओ उससे, बाकी मदरसे में भी दिन में एक बार आ जाया
करेगी और कुछ साफ-सफाई कर दिया करेगी| कुछ पैसे मदरसे से भी दिलवा दूंगा”

शहर काजी ने भी अपनी संभावनाएं तलाश ली अंदलीब को लेकर| वहां खड़े बाकी लोग बोल पड़े “सुभान अल्लहा काजी जी, आप हैं तो किसी गरीब को कोई ददक्कत नहीं होगी”

शहर काजी ने चहेरे पर मुस्कान लाते हुए कहा “बस अल्लहा की मेहरबानी हैं, आप जैसो की इमदाद से हो जाता है सबकुछ”
फिर सब लोग वहां से चल दिए|

जैमुमा और उसकी बेटी की ज़िन्दगी का फैसला हो गया था| रहबर कुछ याद करते हुए पीछे मुड़ा और शहर काजी से कहा “वो काजी जी जो आप बता रहे थे मदरसे में वाटर कूलर और कुछ सामान के लिए… मैं आपको पैसे भिजवा दूंगा, मंगवा लीजिए आप| देखिये दूकान से फुर्सत नहीं हो पाती है और फिर आपकी तो जानकारी भी बहुत है मुझसे सही सौदा करेगा कोई आपके लिए”

शहर काजी ने सहमती में  गर्दन हिलाई और आँखे मिचमिचाकर कर मुस्कुराते हुए अनुग्रह प्रकट किया|

Hindi Kahaniya | सरपरस्त 
लेखक- सतीश भारद्वाज


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