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Story in Hindi | हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानियां

Story in Hindi | हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानियां

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए “Story in Hindi | हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानियां” लेकर आएं है जिन्हें पढ़कर आप ज़िन्दगी के कुछ अनसुलझे पहलुओं के बारे में जान पाएँगे| दोस्तों, कहानियों की दुनियां अपने आप में एक अलग ही दुनियां होती है|

जब हम बचपन में  दादी-नानी से कहानियां सुना करते थे तो हमारा पूरा ध्यान कहानी के पात्रों और कहानी के माध्यम से कही गई बात पर होता था|

बचपन की कहानियां कई बार हमें हमारे ज़िन्दगी के लक्ष्य से अवगत करा जाती है| कई बार जब हम ज़िन्दगी में हमारे लक्ष्य से भटक जाते हैं तो किसी “महान व्यक्ति की कहानियां” हमें हमेशा ज़िन्दगी में आगे बढ़ते रहने और संघर्ष करने की प्रेरणा देती है|

आज हम आपके लिए ऐसी ही कुछ कहानियां लेकर आएं हैं जिन्हें पढ़कर आप खुद को उर्जावान महसूस करेंगे| पढ़िए Story in Hindi | हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानियां


चिंता की सुबह | Hindi Kahani

एक राज्य में एक साधू रहता था जो शहर-शहर जाकर भिक्षाव्रती करता और अपना पेट पालता था| साधू उतना ही मांगता जितने की उसको आवश्यकता होती| वह न तो कल के लिए कुछ सोचता और न ही कल के लिए कुछ बचाता| बस यही उसकी दिनचर्या थी|

एक बार वह भिक्षाव्रती करते-करते राज्य की राजधानी पहुंचा| लेकिन जब तक वह राजधानी के अन्दर पहुँच पाता तब तक अँधेरा हो चूका था| शहर के दरवाज़े भी तब तक बंद हो चुके थे| साधू ने वहीँ विश्राम कर सुबह शहर में जाने की योजना बनाई और दरवाजे के समीप ही सोने के लिए स्थान ढूंढने लगा|

सर्दी के दिन थे और रात थोड़ी ठंडी ही थी| साधू ने देखा पास ही एक भट्टी थी| भट्टी में अभी भी गर्माहट थी| साधू ने भट्टी के समीप ही सोने का विचार किया| साधू ने अपना बिछोना बिछाया और भट्टी के समीप ही सो गया|

महल के दरवाजे के समीप ही राजा का महल था| सुबह सूरज की पहली किरण के साथ राजा की नींद खुली और उन्होंने अपनि रानी से पुछा – “कहो रात केसी रही”| उधर भट्टी में सोए साधू की नींद राजा की आवाज़ से खुल गई| राजा का प्रश्न सुन साधू ने जवाब दिया, – “कुछ आप जैसी और कुछ आप से अच्छी”

राजा के कानो में जैसे ही साधू की आवाज पड़ी वे बड़े ही आश्चर्यचकित हुए, उन्होंने महल की बालकनी से बहार देखा लेकिन उन्हें कोई नज़र न आया| उन्होंने वही सवाल फिर दोहराया, “कहो रात कैसी बीती”!

साधू के कानों में जैसे ही राजा के शब्द पड़े वह फिर बोला. “कुछ आप जैसी और कुछ आप से अच्छी”! अब राजा की उत्सुकता की सीमा न थी| उन्होंने अपने सैनिकों को इस आवाज़ के बारे में पता लगाने को कहा|

राजा के सैनिक जैसे ही महल के बाहर इस आवाज़ का पता लगाने आए उन्हें भट्टी के समीप एक साधू लेटा हुआ दिखाई दिया| राजा के सैनिकों ने सोचा हो न हों राजा की बातों का जवाब यही साधू दे रहा था|

उन्होंने साधू को जगाया और साथ महल चलने को कहा| साधू ने सोचा जरुर उसने राज्य का कोई नियम तोड़ा है इसलिए राजा ने उसे दंड देने के लिए महल में बुलाया है|

साधू डरते-डरते महल पहुंचा| राजा उत्सुकतावश उस व्यक्ति से मिलने के लिए आतुर था जो उसके सवाल का जवाब दे रहा था| सिपाही साधू को लेकर जैसे ही महल में पहुंचे राजा ने उत्सुकतावश साधू से पुछा की जब मैं सुबह उठकर अपनी रानी से पुछ रहा था की “रात कैसी बीती” तो आपने जवाब दिया “कुछ आपके जैसी और कुछ आपसे अच्छी”!आप कृपा कर मुझे यह बताएं की आप तो इस ठण्ड में भी खुले आसमान के निचे सो रहे थे तो फिर आपकी रात मुझसे अच्छी कैसे बीती|

साधू ने जब राजा की बात सुनी तो मुस्कुराते हुए बोला, महाराज! क्षमा करें लेकिन मैंने जो भी कहा बिलकुल सत्य कहा है| क्यों की, जब आपको महल में नींद लगी तो आपको भी नहीं ज्ञात था की आप महल में सो रहे हैं| ठीक वैसे ही मुझे भी नींद लगने के बाद यह ज्ञात नहीं रहा की में खुले आसमान के बाहर सो रहा हूँ| और रही आपसे अच्छी रात बीतने का सवाल तो महाराज आपको सुबह उठने के बाद अपने राज्य और परिजनों की चिंता सताने लगी लेकिन में तो फ़क़ीर हूँ मुझे तो कोई चिंता ही नहीं| इसलिए मेरी रात आपसे अच्छी बीती|

इसीलिए कहा गया है…

चाह गयी चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह!
जिनको कछु न चाहिए, सो साहन के साह!!

चिंता की सुबह | Story in Hindi


बहु की सीख | Motivational Story in Hindi

एक पिता ने बड़े ही लाड-प्यार से अपनी पुत्री को पाल पोस कर बड़ा किया| सर्वगुण संपन्न होने पर तय समय पर पिता ने अपनी पुत्री का विवाह कर उसको विदा किया| विदाई के वक़्त जब पुत्री ने पिता का आशिर्वाद लिया तो पुत्री को गले लगाते हुए पिता ने कहा, “बेटा! हमारी रीत ससुराल में नहीं चलेगी| वहां के तौर तरीके अलग होंगे इसलिए ससुराल में जाकर बड़े बूढों के पास बैठकर उनसे सिख लेना”

बेटी जब बहु बनकर ससुराल पहुंची तो उसने देखा उसके पति के अलावा घर में उसकी सासुमाँ और एक दादी सास  थी| बहु जब घर में कुछ दिन रही तो उसने देखा की घर में दादी सास का बहुत अपमान और तिरस्कार हो रहा है| अपमान की हद तो तब हो जाती जब उसकी सास उसकी दादी सास को ठोकर मार देती, गाली देती और खाने के लिए भी कुछ न देती|

लडकी को यह सब देख बहुत बुरा लगा| उसे अपने  माता-पिता द्वारा दीए संस्कार याद आए| उसे अपनी दादी सास पर बहुत दया आई| उसने सोचा घर में बड़े बूढों का तिरस्कार होने से घर नर्क बन जाता है मुझे अपनी दादी सास के लिए कुछ करना चाहिए|

उसने सोचा अगर वह अपनी सास को समझाने का प्रयास करेगी तो उसकी सास उसके साथ भी इसी तरह का बर्ताव करने लगेगी| उसने खुद अपनी दादी सास की सेवा करने का सोचा| अब वह रोज़ घर का काम ख़तम करके अपनी दादी सास के पास बेठ जाती और उनके पैर दबाती|

कुछ दिनों बाद ही सास को बहु का इस तरह दादी सास के पास बैठना और उनकी सेवा करना अच्छा नहीं लगने लगा| एक दिन सास ने बहु को बुलाया और कहा, “बहु! तुम घर का सारा काम छोड़कर हमेशा दादी सास के पास क्यों बेठी रहती हो ?

बहु को पता था की एक न एक दिन उसकी सास उस से यह सवाल जरुर पूछेगी! बहु ने कहा, “माँ जी मेने घर का सारा काम ख़तम कर लिया है| अगर फिर भी कुछ बाकि रह गया है तो काम बताइए|”

सास बोली, “काम तो कुछ नहीं है लेकिन दिन भर दादी सास के पास बेठना ठीक बात नहीं! बहु ने सास की बात को बड़े ध्यान से सुना और कहा, “माँ जी! मेरे पिताजी ने हमेशा मुझे यही सिखाया है की जवान लड़के लड़कियों के बिच कभी नहीं बेठना|

अगर जीवन में कुछ सीखना है तो घर के बड़े बुजुर्गों के पास बेठना| हमारे घर में सबसे बुजुर्ग दादी सास ही है इसलिए में उनके पास बैठती हूँ| मेरे पिताजी ने मुझे विदा करते वक़्त भी कहा था की अब वही तेरा घर है और वहीँ के रीती रिवाज तुझे मानना है इसलिए में घर के रीती रिवाज के बारे में दादी सास से पूछती हूँ की मेरी दादी सास आपकी कैसे सेवा करती है

सास ने जब यह सुना तो घबरा कर पूछा, “बुढ़िया ने क्या कहा तुझे मेरे बारे में ?

बहु ने बड़ी ही चतुराई और शालीनता के साथ जवाब दिया. “माँ जी! दादी सास कह रही थी की अगर तेरी सास मुझे गाली नहीं दे और ठोकर नहीं मारे तो में सेवा ही मान लूँ! बहु की बात सुनकर सास ने बहु से पुछा, “क्या तू भी मेरे साथ ऐसा ही करेगी ?

बहु सास के इसी प्रश्न के इंतज़ार में थी| बहु ने कहा, माँ जी! मुझे पिताजी ने बड़ों से घर के रीती रिवाज सिखने को कहा था| अगर घर के रीती रिवाज बुजुर्गों के अपमान करने के हैं तो मुझे भी रीती रिवाज मानने पड़ेंगे|

बहु का जवाब सुनकर सासु माँ को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी| उसने सोचा जैसा व्यहवार में अपनी सास के साथ करुँगी मेरी बहु भी वही सीखेगी और फिर वह भी मेरे साथ वैसा ही व्यहवार करने लग जाएगी| सास अब दिन भर इसी बात के विचार में रहती|

अगले ही दिन बहु ने घर के एक कोने में ठीकरी (खाना खाने का एक मिटटी का बर्तन) इकठ्ठा करना शुरू कर दिया| घर के कोने में ठीकरी पड़ी देख सास ने बहु से इतनी सारी ठीकरी इकठ्ठा करने का कारण पुछा – “बहु तुमने यह ठीकरी क्यों जमा की है|”

बहु ने बड़ी ही विनम्रता से कहा – माँ जी! आप दादी सास को ठीकरी में ही भोजन देती है| इसलिए मेने सोचा की बाद में ठीकरी मिले न मिले इसलिए अभी से ही आपके लिए ठीकरी जमा कर देती हूँ|  बहु का जवाब सुनकर सास घबरा गई और उसने पुछा- तू मुझे ठीकरी में खाना परोसेगी क्या|

बहु ने कहा – माँ जी! मेरे पिताजी ने कहा था की यहाँ के रीती रिवाज वहां नहीं चलेंगे| वहां की रीती अलग होगी| अब जो यहाँ की रीती है मुझे वैसे ही करना होगा| बहु की बात सुनकर सास ने कहा, “यह यहाँ कि रीती थोड़े ही है| तू अब दादी सास को थाली में भोजन दिया करना| बहु सास की बात सुनकर बहुत खुश हुई| बहु की चतुराई से अब दादी सास को थाली में भोजन मिलने लगा|

अगले दिन बहु ने देखा की घर में सबके खाना खाने के बाद बचा हुआ खाना बूढी दादी सास को दिया जाता था| बहु उस खाने को बड़े गौर से देखने लगी|

बहु को इस तरह खाने को देखने पर सास ने पुछा “बहु! क्या देखती हो ?

बहु ने कहा – “सिख रही हूँ घर में बूढों को क्या खाने को दिया जाना चाहिए”

बहु की बात सुनकर सास ने घबरा कर कहा, “बेटा! यह कोई घर की रीत थोड़े हे| कल से तू दादी सास को पहले भोजन दिया करना”

बस अगले दिन से ही दादी सास को बढ़िया भोजन मिलने लगा| धीरे-धीरे बहु ने सास की सारी आदतों को बदल दिया| अगर बहु अपनी सास को उपदेश देती की उन्हें बड़े बूढों के साथ इस तरह का व्यहवार नहीं करना चाहिए तो सास उसकी बात कभी नहीं मानती| इसलिए आज की युवा पीढ़ी को चाहिए की उपदेश देने के बजाए खुद के आचरण में सुधार करना चाहिए|

इसलिए कहा गया है – “बातों का असर नहीं पड़ता, आचरण का पड़ता है”

Story in Hindi | हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानियां

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भाग्य | Kahani in Hindi

                                 भाग्य | Kahani in Hindi


कहते हैं की इन्सान के भाग्य में जो लिखा होता है उसे वही नसीब होता है| हमारी आज की कहानी “भाग्य | Kahani in Hindi” भी इसी पर आधारित है|


                                          भाग्य | Kahani in Hindi

एक गाँव में एक काफी धनवान सेठ रहते थे| नाम था जिका संपत राव| धन-सम्पदा, एशो-आराम की उनको कोई कमी न थी| परन्तु पुत्र सुख उनके भाग में न था| बड़े जतन, पूजा-पाठ करने के बाद सेठानी को पुत्री हुई| सेठ जी ने अपनी पुत्री को ही बड़े लाड-प्यार से एक पुत्र की तरह पाल-पोस कर बड़ा किया| सेठानी हमेशा सेठ जी को एक पुत्र गोद लेने का कहती लेकिन सेठ जी पुत्र सुख उनके भाग्य में न होने की बात कहकर सेठानी जी की बात टाल जाते|

खेर, हर बेटी की तरह सेठ जी की बेटी भी शादी योग्य हुई और तह समय पर शुभ मुहूर्त देखकर सेठ जी ने अपनी बेटी की शादी  धनवान व्यक्ति से कर दी| परन्तु बेटी के भाग्य में धन सुख न था| शादी के कुछ समय बाद ही बेटी का पति जुआरी, शराबी निकल गया और शराब और जुए में उसकी सारी धन-सम्पदा समाप्त हो गई|

बेटी को  इस तरह दुखी देखकर सेठानी जी भी दुखी होती| एक दिन सेठानी जी ने सेठ जी के पास जाकर अपनी बेटी के दुःख पर चिंता जताते हुए कहा, “आप दुनिया की मदद करते हो लेकिन यहाँ हमारी खुद की बेटी दुखी है| आप उसकी मदद क्यों नहीं करते ?

सेठ जी भी बेटी के दुःख से दुखी थे लेकिन वे जानते थे की जिस तरह उनके भाग्य में पुत्र प्राप्ति नहीं थी ठीक उसी तरह बेटी के भाग्य में भी अभी सुख नहीं है| उन्होंने सेठानी जी को समझाते हुए कहा, “भाग्यवान! अभी उसके भाग्य में सुख नहीं लिखा है, जब उसका भाग्य उदय होगा तो अपने आप सब मदद को तैयार हो जाएँगे और खोई हुई धन-सम्पदा फिर से प्राप्त हो जाएगी| लेकिन सेठानी जी को तो अपनी बेटी के दुःख की चिंता खाए जा रही थी|

भाग्य | Kahani in Hindi

एक दिन सेठ जी किसी काम से दुसरे शहर गए हुए थे| तभी उनके दामाद का सेठ जी के घर आना हुआ| सेठानी जी ने बड़ी आव-भगत से अपने दामाद का आदर किया और उन्हें स्वादिष्ट भोजन ग्रहण करवाया| तभी उनके मन में बेटी की मदद करने का विचार मन में आया और उन्होंने सोचा क्यों न मोतीचूर के लड्डुओं के बिच में सोने की अशर्फियाँ रखकर बेटी के घर भिजवा दी जाए|

बस सेठानी जी के सोचने भर की देर थी| उन्होंने जल्दी से मोतीचूर के लड्डू बनाए और एक-एक सोने की अशर्फी लड्डुओं के बिच रखकर दामाद को टिका लगाकर देशी घी के लड्डू जिनमे अशर्फियाँ थी देकर विदा किया| लड्डू लेकर दामाद जी घर की और निकले| रास्ते में उन्हें एक मिठाइयों की दुकान दिखाई दि| दामाद जी ने सोचा इतना वजन कौन घर लेकर जाए, क्यों न लड्डू मिठाई की दुकान पर बेच दिए जाए|

बस फिर क्या था, दामाद जी के सोचने भर की देर थी| उन्होंने लड्डुओं से भरी ठेली मिठाई की दुकान पर बेचकर नगद पैसे ले लिए और खुश होकर घर की और निकल पड़े|

उधर सेठ जी बाहर से आए तो उन्होंने सोचा क्यों न घर के लिए देसी घी के मोतीचूर के लड्डू ले चलू| आगे जाकर सेठ जी भी उसी दुकान पर गए जहाँ उनके दामाद ने मोतीचूर के लड्डू बेचें थे| सेठ जी ने दुकानदार से लड्डू मांगे, दुकानदार ने लड्डुओं की वही थैली सेठ जी को दे दी जो उनके दामाद कुछ ही देर पहले दुकानदार को बेचकर गए थे|

लड्डू लेकर सेठ जी घर आए और लड्डुओं की थैली सेठानी जी को दी| लड्डुओं की वही थैली देख सेठानी जी ने लड्डुओं को फोड़कर देख तो उनमे से अशर्फियाँ निकली| अशर्फियाँ देख सेठानी जी ने माथा पकड़ लिया और बेटी की मदद करने के लिए दामाद जी को लड्डुओं में अशर्फियाँ छुपाकर देने की बात सेठ जी को बताई|

सेठानी जी की बात सुनकर सेठ जी ने कहा, “भाग्यवान! में न कहता था की अभी धन सुख उनके भाग्य में नहीं है इसलिए तुम्हारी दी गई अशर्फियाँ फिर से घूम-फिर कर तुम्हारे पास ही आ गई|”

तो दोस्त इसलिए कहते हैं, “भाग्य से बड़ा कोई नहीं, जो इन्सान के भाग्य में लिखा होता है उसे वही नसीब होता है”

भाग्य | Kahani in Hindi


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