Sumitranandan Pant | सुमित्रानंदन पंत

Sumitranandan Pant
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साथियों नमस्कार, आज हम बात कर रहें हैं हिंदी साहित्य के प्रमुख स्तम्भ सुमित्रा नंदन पंत जी के बारे में। जाने Sumitranandan Pant की के जीवन की कुछ खास किस्से, कहानियों और रचनाओं के बारे में। आशा है आपको हमर्का यह संकलन ज़रूर पसंद आएगा।


Sumitranandan Pant | सुमित्रानंदन पंत

“जग पीड़ित है अति-दुख से
जग पीड़ित रे अति-सुख से”

ये पंक्तियां मेरे दिल के बहुत करीब है।शायद ही किसी कवि ने कभी इतनी बड़ी बात इतनी सरलता से लिखी होगी।
सुमित्रानंदन पंत द्वारा लिखी गई इन पंक्तियों में इस संसार का पूर्ण सत्य छुपा है।

हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत Sumitranandan Pant जी हैं। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग कहा जाता है।

सुमित्रानंदन पंत Sumitranandan Pant (20 मई 1900-28 दिसम्बर 1977) का जन्म अल्मोड़ा (उत्तर प्रदेश) में सुंदर वादियों के बीच बसे गांव कैसोनी गाँव में हुआ था। लंबे घुंघराले बाल वाले पंत जी की मुखाकृति बहुत ही सुंदर और सौम्य थी।

उनका गौर वर्ण और सुगठित शारीरिक सौष्ठव उनकी छवि को सभी से अलग करता था।पंत को छायावाद का विष्णु कहा जाता है|पंत जी की सर्वप्रथम कविता गिरजे का घंटा 1916 ई. में आई थी।आचार्य नंददुलारे वाजपेयी इनको छायावाद का प्रवर्तक मानते हैं| रामचंद्र शुक्ल इनको छायावाद का प्रतिनिधि कवि मानते हैं | रोला इनका सर्वप्रिय प्रिय छंद माना जाता है|

जन्म के छह घंटे बाद ही इनकी माँ का निधन हो गया और इनका पालन-पोषण इनकी दादी ने ही किया। वह गंगादत्त पंत की आठवीं संतान थे। 1910 में शिक्षा प्राप्त करने वे गवर्नमेंट हाईस्कूल अल्मोड़ा गये। यहीं उन्होंने अपना नाम गोसाईं दत्त से बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख लिया।
अपना नाम स्वयं रखना भी अपने आप में एक बड़ी बात होती है। पर पंत जी के लिए कोई बात कहां बड़ी थी।

आप 1918 में अपने मँझले भाई के साथ काशी गये । वहां आपने क्वींस कॉलेज में पढ़ाई की। उसके बाद वहाँ से हाईस्कूल परीक्षा में उत्तीर्ण कर म्योर कालेज में पढ़ने के लिए आप इलाहाबाद चले गए।

आपने 1919 में महात्मा गाँधी के सत्याग्रह से प्रभावित होकर अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ दी और स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय हो गए। आपने अपनी पढ़ाई इसलिए अधूरी छोड़ दी क्योंकि इस आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने भारतीयों से अंग्रेजी विद्यालयों, महाविद्यालयों, न्यायालयों एवं अन्य सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने के आह्वान किया था।

आपने घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषा-साहित्य का पूर्ण स्वाध्याय और अध्ययन करके अपनी शिक्षा जारी रखी।
इलाहाबाद शहर ने आपको बहुत कुछ दिया।वही आपकी काव्यचेतना का विकास हुआ। आपके जीवन में स्थिरता आई ही थी कि कुछ वर्षों के बाद आपको घोर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।

कर्ज से जूझते जूझते आपके पिता का निधन हो गया। कर्ज इतना था कि उसे चुकाने के लिए आपको अपनी पुश्तैनी जमीन और घर तक बेचना पड़ गया। इन्हीं परिस्थितियों में गुजरते हुए आप मार्क्सवाद की ओर उन्मुख हुये।

1931 में आप कुँवर सुरेश सिंह के साथ कालाकांकर, प्रतापगढ़ चले गये और अनेक वर्षों तक आप वहीं रहे। आप के जीवन में महात्मा गांधी का हमेशा काफी गहरा असर रहा । उनके सान्निध्य में आपने आत्मा के प्रकाश का अनुभव पहली बार किया।

सुमित्रानंदन पन्त जी प्रकृति के सुकुशल कवि माने जाते है। प्रकृति का वर्णन उनके काव्य की सबसे प्रमुख विशेषता रही है। प्रकृति से इतना प्रेम कोई शायद ही कर सकता है। 7 साल की मासूम उम्र में ही आप इतनी सुन्दर रचनाएँ लिखा करते थे।

प्रकृति की गोद में पैदा हुए Sumitranandan Pant जी का प्रकृति से जन्म से ही नाता रहा है। पन्त जी ने प्रकृति की कोमलता और कठोरता को बराबरी से अपने काव्य रचना में जगह दी है। ये सच है कि इन्होंने प्रकृति के कोमल रूप पर उसकी कठोरता से अधिक लिखा है।

आपकी प्रमुख कृतियां हैं : उच्छ्वास, पल्लव, वीणा, ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, युगांतर, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, सत्यकाम, मुक्ति यज्ञ, तारापथ, मानसी, युगवाणी, उत्तरा, रजतशिखर, शिल्पी, सौवर्ण, अतिमा, युगपथ, पतझड़, अवगुंठित, ज्योत्सना, मेघनाद वध।
“खादी के फूल ” हरिवंशराय बच्चन के साथ आपका संयुक्त संग्रह है ।

कवि पन्त ने लिखा है कि ’’कविता करने की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृति-निरीक्षण से मिली है जिसका श्रेय मेरी जन्मभूमि कूर्मांचल प्रदेश को है’’ प्रकृति पन्त के काव्य का कोई क्षणिक तत्व नहीं है, बल्कि एक स्थायी अंग है।प्रकृति को अपनी प्रेरक शक्ति को उन्होंने खुद स्वीकार किया है। सच कहा जाए तो पंत ने प्रकृति को ही अपनी अर्धांगिनी माना है। ये बात उनकी हर कविता में देखी जा सकती है।

उन्होंने उसकी कठोरता को कभी छुपाने की कोशिश नही की पर कोमलता की तारीफ भी अपने पूरे दिल से की।पर एक अच्छे प्रेमी की तरह उन्हें प्रकृति के कोमल एवं सुकुमार रूप ने ही अधिक मोहित किया है। प्रकृति के सुन्दर रूप ने पन्त जी को अधिक लुभाया है। पन्त जी के काव्य में प्रकृति के सभी रूप उपलब्ध होते हैं।

उनके द्वारा किया गया प्रकृति का मानवीकरण वस्तुतः अप्रतिम है। उन्होंने कहा है कि वे घण्टों एकान्त में बैठा प्राकृतिक दृश्यों को एकटक देखा करते थे और कोई अज्ञात आकर्षक उनके भीतर एक अव्यक्त सौन्दर्य का जाल बुनकर उनकी चेतना को तन्मय कर देता था।’’

साल 1907 से 1918 के बीच लिखी गईं आपकी कविताओं को संकलित कर साल 1927 में इसे ”वीणा” के नाम से प्रकाशित किया गया। जबकि आप जब 22 साल के थे तब आपकी पहली किताब ”उच्छावास” और दूसरी किताब ”पल्लव” नाम से प्रकाशित हुई थी।

इसके बाद आपकी प्रसिद्ध रचना ”ज्योत्स्ना” और ”गुंजन” प्रकाशित की गई। सुमित्रा नंदन जी की इन तीनों रचनाओं को कला साधना एवं सौंदर्य की सबसे अनुपम कृति माना जाता है।

उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में उच्छ्वास, ज्योत्सना, पल्लव, स्वर्णधूलि, वीणा, युगांत, गुंजन, ग्रंथि, मेघनाद वध (कविता संग्रह), ग्राम्‍या, मानसी, हार (उपन्यास), युगवाणी, स्वर्णकिरण, युगांतर, काला और बूढ़ा चाँद, अतिमा, उत्तरा, लोकायतन, मुक्ति यज्ञ, अवगुंठित, युग पथ, सत्यकाम, शिल्पी, सौवर्ण, चिदम्बरा, पतझड़, रजतशिखर, तारापथ, आदि शामिल हैं।

छायावादी रचनाएं(1918-1943)

Sumitranandan Pant

उच्छ्वास (1920) ई.
ग्रन्थि (1920) ई.
पल्लव (1926) ई.
वीणा (1927, 1918-1919 की कविताएँ संकलित) ई.
गुंजन (1932) ई.

प्रगतिवादी रचनाएं(1935-1945)

युगांत (1936) ई.
युगवाणी (1938) ई.
ग्राम्‍या (1940) ई.

अरविंद दर्शन से प्रभावित रचनाएं (1946-1948)[ अंतश्चेतनावादी युग]
स्वर्णकिरण (1947) ई.
स्वर्णधूलि (1947) ई.
उत्तरा (1949) ई.
युगपथ (1949) ई.

मानवतावादी (आध्यात्मिक) रचनाएं (1949 ई. के बाद)[नव मानवता वादी युग]
अतिमा (1955) ई.
वाणी (1957) ई.
चिदंबरा (1958) ई.
पतझड़ (1959) ई.
कला और बूढ़ा चाँद (1959) ई.

लोकायतन (1964 ई., महाकाव्य)(दो खंड एवं सात अध्यायों मे विभक्त)
गीतहंस (1969) ई.
सत्यकाम (1975 ई., महाकाव्य)
पल्लविनी
स्वच्छंद (2000) ई.
मुक्ति यज्ञ
युगांतर
तारापथ
मानसी
सौवर्ण
अवगुंठित
मेघनाद वध

सुमित्रानंदन पंत Sumitranandan Pant जी ने जिस तरह खड़ी और प्रांजल भाषा का इस्तेमाल कर अपनी भावनाओं को बेहद सरल और सरस तरीके से अपनी कृतियों में प्रकट किया है, वह प्रसंशनीय है। उनकी खड़ी और प्रांजल भासा का ही ही नतीजा था कि उनकी कविताएं पाठकों के दिल में बस जाती थी।

इसके साथ ही उनकी भाषा शैली में मधुरता और कोमलता का भाव है। किसी पाठक को अपनी किताबों से अंत तक बांध पाने की कला उन्हें बखूबी आती थी। इसी वजह से पाठक उनकी किताबों में शुरु से अंत तक बंधें रहते हैं।

पंत जी ने 1938 में ‘रूपाभ’ जो एक प्रगतिशील मासिक पत्रिका है उसका सम्पादन किया। श्री अरविन्द आश्रम की यात्रा से आप में आध्यात्मिक चेतना का विकास हुआ। 1950 से 1957 तक आप आकाशवाणी में परामर्शदाता रहे।

1958 में ‘चिदम्बरा’ प्रकाशित हुआ जो कि ‘युगवाणी’ से ‘वाणी’ काव्य संग्रहों की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन है , इस संकलन की वजह से 1968 में उन्हें ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ पुरस्कार प्राप्त हुआ।

1960 में ‘कला और बूढ़ा चाँद’ काव्य संग्रह के लिए उन्हें ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ प्राप्त हुआ। वो 1961 में उन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया गया। 1964 में विशाल महाकाव्य ‘लोकायतन’ का प्रकाशन हुआ जिसके लिए उन्हें सोवियत नेहरू शांति पुरस्कार से विभूषित किया गया।

उनके अनेक काव्य संग्रह कालान्तर में प्रकाशित हुए है। वह जीवन-पर्यन्त रचनारत रहे। अविवाहित होने के बावजूद भी पंत जी के अंतस्थल में नारी और प्रकृति के प्रति आजीवन सौन्दर्यपरक और सम्मानपूर्ण भावना रही।

सुमित्रानंदन जी Sumitranandan Pant का स्थान हिन्दी साहित्य के विशिष्ट कवियों में आता है। उनका प्रकृति प्रेम उनकी हर कविता में छलकता है।
पंत जी को जानना शायद इतना आसान नहीं है,पर उनकी सारी कविता और कहानियों को इखट्ठा किया जाए तो शायद उनके मन को समझा जा सकता है।

उनके द्धारा साहित्य में दिए गए महत्वपूर्ण योगदान के लिए वे हमेशा याद किए जाएंगे।
28 दिसम्बर 1977 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा किया पर उनका नाम और उनकी रचनाएं सदा के लिए अमर हो गई।

उत्तराखण्ड में बसे कौसानी गांव में, जहाँ उनका जन्म हुआ था तथा उनका बचपन बीता था, वहां आज ‘सुमित्रा नंदन पंत साहित्यिक वीथिका’ नामक संग्रहालय बन चुका है। इस में उनसे जुड़ी हर चीज संभाल कर सुरक्षित तरीके से रखी गई है। कपड़े, चश्मा, कलम आदि उनकी व्यक्तिगत वस्तुएं बहुत संभाल कर सुरक्षित रखी गई हैं।

संग्रहालय में उनको मिले ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रशस्तिपत्र, हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा मिला साहित्य वाचस्पति का प्रशस्तिपत्र भी मौजूद है। उनकी जिंदगी में मिले सारे पुरुषकार उस घर में मौजूद है । साथ ही उनकी रचनाएं लोकायतन, आस्था आदि कविता संग्रह की पांडुलिपियां भी वहा सुरक्षित रखी हुई हैं। कालाकांकर के कुंवर सुरेश सिंह और हरिवंश राय बच्चन से किये गये उनके पत्र व्यवहार की प्रतिलिपियां भी यहां मौजूद हैं।

प्रत्येक वर्ष संग्रहालय में उनकी स्मृति में पंत व्याख्यान मेले का आयोजन होता है। यहाँ से ‘सुमित्रानंदन पंत व्यक्तित्व और कृतित्व’ नामक पुस्तक भी प्रकाशित की गई है।

उनका रिश्ता सबसे मजबूत इलाहाबाद से रहा और शायद इसी वजह से उनके नाम पर इलाहाबाद शहर में स्थित हाथी पार्क का नाम बदलकर ‘सुमित्रानंदन पंत बाल उद्यान’ रख दिया गया है। कुछ तो अलग बात थी उनमें की सन 2015 में पन्त जी की याद में एक डाक-टिकट तक जारी किया गया था।

विशेष⇒तथ्य : Sumitranandan Pant

sumitranandan pant ka vastvik naam kya tha

⇔ छायावाद का ‘घोषणा पत्र ‘(मेनिफेस्टो) पंत द्वारा रचित ‘पल्लव’ रचना की भूमिका को कहा जाता है|

⇒ पंत की सर्वप्रथम छायावादी रचना ⇒उच्छ्वास 1920 ई.

⇔ युगांत रचना पंत जी के छायावादी दृष्टिकोण की अंतिम रचना मानी जाती है|

⇒ युगवाणी रचना में पंत जी ने प्रगतिवाद को ‘युग की वीणा’ बतलाया है|

⇔ प्रकृति के कोमल पक्ष अत्यधिक वर्णन करने के कारण इनको प्रकृति का सुकुमार कवि भी कहा जाता है|

⇒महर्षि अरविंद दवारा रचित ‘भागवत जीवन’ से यह इतने प्रभावित हुए थे कि उनकी जीवन दशा ही बदल गई|

⇔इन्हे ‘रावणार्यनुज’ भी कहा जाता है|

⇒ यह अपनी सूक्ष्म कोमल कल्पना के लिए अधिक प्रसिद्ध है मूर्त पदार्थों के लिए अमूर्त उपमान देने की परंपरा पंत जी के द्वारा ही प्रारंभ की हुई मानी जाती है|

⇒ पंतजी भाषा के प्रति बहुत सचेत थे उनकी रचनाओं में प्रकृति की जादूगरी जिस भाषा में अभिव्यक्त हुई है उसे समय पंत ‘चित्र भाषा(बिबात्मक भाषा)’ की संज्ञा देते हैं|

मैं इस लेख का अंत
उनकी कविता की कुछ पंक्तियों से करना चाहती हूं

कौन जान सका किसी के हृदय को ?
सच नहीं होता सदा अनुमान है !

कौन भेद सका अगम आकाश को ?
कौन समझ सका उदधि का गान है ?

है सभी तो ओर दुर्बलता यही,
समभता कोई नहीं-क्या सार है !

निरपराधों के लिए भी तो अहा !
हो गया संसार कारागार है ! !

मानसी जैन
mansi2219mj@gmail.com


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