Category Archives: Spiritual Stories

साथियों नमस्कार

आध्यात्मिक कहानियां ( Spiritual Stories ) का हमारी ज़िन्दगी में खास महत्त्व होता है | आध्यात्मिक कहानियों में Moral Stories , Motivational Stories , Inspirational Stories का समावेश होता है |  हिन्दू धर्म में  36 करोड़ देवी देवताओं को पूजा जाता जाता है | हर देवी-देवता को अपनी खास शक्ति के लिए जाना जाता है| जैसे, धन की देवी लक्ष्मी, बुद्धि की देवी सरस्वती, बल के देवता हनुमान आदि ! हर देवी-देवता की इन शक्तियों के पीछे कई सारीआध्यात्मिक कहानियां (Spiritual Stories) होती है, जिनसे हम बहुत कुछ सीखकर हमारी ज़िन्दगी को और बेहतर बना सकते हैं |

हमारी वेबसाइट Hindi Short Stories भी यही चाहती है,कि हमारे पाठकों भी इन आध्यात्मिक कहानियों (Spiritual Stories) से कुछ सीखें और अपनी ज़िन्दगी को और खास बनाए |

धन्यवाद !!

Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत

आदरणीय पाठक, आज के इस अंक में हम आपके लिए लेकर आएं हैं एक ऐसी कहानी “Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत” जिसे पढ़कर आप हिन्दू संस्कृति और हिंदुत्व को और भी बारीकी से जान पाएँगे| आपको यह कहानी कैसी लगती है हमें “Comment Section” में ज़रूर बताएं|

Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत

पता है वो पड़ोस वाली सरिता क्या बता रही थी ?
मुझे कहाँ से पता होगा | तुमसे बोला तो तुम जानो रमेश ने कहा|
अनीता – तुम अपने व्यंग बाण हर समय चला दिया करो, ये भी नहीं कि जरा देख लो की सामने वाले की बातो मे कितनी गंभीरता है|
रमेश – अच्छा भागवान गलती हो गयी, बताओ क्या कहना है?
अनीता – सरिता बता रही थी, कि उसकी नन्द के कई साल से संतान नहीं थी फिर वह फलां शहर से कोई 20-25 किलोमीटर आगे किसी गाँव मे टेकरी पर “हर सिद्धि “ माता का मंदिर है वहाँ गयी थी| कहते है वहां मन्नत पुरी होती है| हम भी जाकर आयें क्या?
रमेश – अच्छा तुम्हें बस मन्नत पुरी हो जाये इसलिए जाना है?
साधारणत: ऐसा कोई मनुष्य नहीं होगा जिसके पास कोई इच्छा न हो जिसे वह पुरा करना चाहता हो| जब उसे पता चले कि फलां जगह जाने से वह इच्छा पुरी भी हो जाएगी तो बेचारा भला मानुस वहां जाने से क्यों चुकने लगा| इससे अच्छा मार्केटिंग का तरीका कोई हो भी नहीं सकता| मन्नत पुर्ती के नाम पर कुछ भी आसानी से  बिक सकता है|
बड़े धार्मिक लोग है अपने देश के भगवान के नाम पर किसी तर्क के लिए अपने दिमाग मे स्थान नहीं रखते बस मन्नत पुरी हो जाये तो काहे का तर्क और काहे का वितर्क| रमेश का तो यही मानना था |
अनीता – इनसे तो बस बहस करवा लो, सारी दुनिया कह रही है पर वो सब तो बेवकुफ है| भगवान ने सारी समझदारी का ठेका तो बस इन्हे ही दे दिया है|
स्त्रीहट और बालहट के आगे भला किसकी चलती है रमेश को तो अनुमति देनी ही थी| अगले रविवार को जाना तय हुआ|
रमेश और अनीता की बच्ची बबली बड़ी खुश थी कि अगले रविवार को हम घुमने जाने वाले है| बच्चो को क्या मतलब कि कहाँ जाना है| उनके लिए तो बाहर जाना मतलब मनोरंजन है क्योंकि बबली के लिए अभी तक बाहर जाने का अनुभव केवल नानी के घर जाने का था लेकिन इस बार तो नानी के घर की तरह किसी बड़े शहर थोड़े जाना है| जहां जाते ही सादर सत्कार और मेहमान नवाजी शुरू हो जाती है|
रमेश का सोचना तो यही था कि बबली को ले जाकर क्या करेंगे! परेशानी ये थी कि बबली के दादा – दादी भी गाँव गए हुए थे तो इसे कहाँ छोड़कर जायें इसलिए मजबूरी मे साथ ले जाना पड़ा|
आप पढ़ रहें हैं Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत
रविवार को सुबह दस बजे की ट्रेन थी, टिकट भी लेना था सो थोड़ा जल्दी ही पौने दस तक स्टेशन पहुंच गये|  चार नंबर प्लेटफॉर्म पर ठीक दस बजे ट्रेन आ गयी| भारतीय रेल जब समय पर आये तो बड़ा सुकुन सा महसूस होता है| इसकी वजह है कि हम हमेशा उसकी समयबद्धता को लेकर आशंकित रहते है और उसके देरी से आने के बुरे अनुभव तो हमारे जहन मे हैं ही|
जनरल डब्बे मे चढ़े और गनीमत रही की सीट भी जल्द ही मिल गयी, ट्रेन मे ज्यादा भीड़ नहीं थी| संयोग से हमारे पास वाली सीट पर बैठे सज्जन जो की शिक्षक थे और उनकी पत्नी भी उसी मन्नत सिद्धि वाली जगह जा रहे थे|
आपस मे बातचीत शुरू हुई तो मंदिर की मान्यता को लेकर और कई कथा किस्से सुनने को मिले| शिक्षक महोदय आप को भी मान्यता पर यकीन है या हमारी तरह पत्नी की इच्छा के चलते आपको भी आना पड़ा, रमेश ने शिक्षक महोदय से पुंछा|
शिक्षक – हम तो स्वेच्छा से आये है| मुझे तो प्राचीन स्थलो, देवस्थानों पर जाना वहाँ का जनजीवन देखना, रहस्यो को जानने मे ख़ासी दिलचस्पी है| पर लगता है आप बेमन से आये है|
रमेश – मई की चिलचिलाती धूप मे लोग जाते है, कंही ठंडी जगह पर और हम है कि परेशान होते हुए जा रहे है इस आस मे कि मन्नत पुरी होती है|
शिक्षक – क्या पता होती भी हो? जब जा ही रहें तो विश्वास रखिए|
शाम के पाँच बजे ट्रेन उस जंक्शन पर पहुंची जहां से अभी 20-25 किलोमीटर का सफर करना बाकी था| दिन भर की थकान सभी के चेहरे पर साफ दिख रही थी लेकिन आस्था मे शक्ति अपार होती है|
थोड़ी देर उसी जंक्शन पर रुक कर जलपान किया और अब आगे प्रस्थान के लिए बस पकडनी थी| जंक्शन से रिक्शा कर पहले बस अड्डे गये ,जहां से गाँव के लिए छ: बजे की बस मिली जिसने रात आठ बजे उस गाँव मे उतार दिया|
रमेश को अब बबली को गोद मे लेना पड़ा| बेचारी बच्ची खुद पछता रही होगी कि वह यहाँ क्यों आ गयी| यात्रा का इतना कठिन अनुभव उसने पहली बार किया है वरन हर छुट्टियों मे नानी के घर जाती जो मात्र दो घंटे का रास्ता है उसमे भी स्टेशन पर ही मामा तैयार खड़े मिलते थे|
ये गाँव वैसा नहीं था जैसी आप आम हिंदुस्तान के गाँव कि कल्पना करते है| यहां बिजली भी थी, रहने कि व्यवस्था भी अच्छी थी, बड़े–बड़े होटल भले न हों पर धर्मशालाएँ अच्छी थी|
रोड़े भी टूटी फूटी नहीं थी और परिवहन व्यवस्था भी ठीक थी| बस से उतरते ही एक व्यक्ति रिक्शा लेकर आया और कहा मंदिर जाने आयें है| रमेश ने हाँ मे उत्तर दिया|
रिक्शे वाले ने अपना ग्राहक भाँप कर बोला कि अब तो मंदिर सुबह ही जाना होगा, चलिए आपको मंदिर के पास ही एक धर्मशाला तक छोड़ दूँ| सुबह वंही से मंदिर चले जाइएगा|
रमेश – कितने रुपये लोगे ?
साहब वैसे तो सौ रुपये लेते है पर आप अस्सी दे दीजिएगा! ये कहते हुए रिक्शे वाले ने अपने व्यापारिक कौशल का परिचय दिया| अरे भई अब क्या सोचना, चलो बस अब तो शरीर आराम मांग रहा है कहकर शिक्षक महोदय ने सहमति जाता दी|
शहरो का वातावरण गांवो से कई ज्यादा प्रदुषित होता है| बड़ी–बड़ी इमारतों ने ऐसा कब्जा जमा रखा है कि पेड़ पौधे तो दिखाई नहीं देते| हाँ बस दिखावट के लिए छोटे– छोटे गमले रख लिए जाते है जिन्हे देख गालिब की बात याद आती है “दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है”
जहां शहर मे कूलर, एसी मे भी आदमी को चैन नहीं मिल रहा वंही गाँव मे छत पर ही क्या हवा चल रही है, आनंद आ रहा है न शिक्षक साहब! क़हते हुए रमेश ने शिक्षक महोदय की ओर नजरे घुमाई|
शिक्षक महोदय – गांवो मे आज भी परिवेश प्रकृति से जुड़ा हुआ है| जो आनंद यंहा है वो और कंही नहीं है|
सबने छत पर ही अपनी–अपनी खाट बिछा ली और थकान तो इतनी कि तुरंत नींद भी आ गयी| सुबह ज्यों ही रमेश की आंखे खुली सामने चाय लिए अनीता खड़ी थी| आज वास्तव मे बहुत अच्छी नींद आई रमेश ने कहा, अनीता ने चाय का प्याला आगे बढ़ाते हुए आदेशात्मक स्वर मे बोला तो अब जल्दी से नहाँ भी लो फिर दर्शन के लिए भी जाना है|
नौ बजे तक सभी तैयार हो गये, बस अब निकलना था| मंदिर पैदल दुरी पर ही था, रमेश द्वारा नाश्ते के लिए पुंछने पर अनीता ने बताया कि पहले दर्शन कर आते है फिर खाना पीना कर लेंगे पर बबली को रास्ते मे कुछ खिला देंगे बाजार से| “चलो जैसा तुम ठीक समझो ” के साथ रमेश ने अपनी सहमति व्यक्त की
रास्ते मे बबली ने कचौरी खाई बाकि किसी ने कुछ नहीं लिया| कोई पाँच मिनट की पैदल यात्रा के बाद वह स्थान आया जहां से अब पहाड़ी का रास्ता तय करना था हालांकि सीढ़िया थी जो मंदिर तक जाती थी , करीब तीन सौ सीढ़ियाँ होंगी|
नारियल, लड्डू, धूप, दीप, सिंदुर, फूल से सजी थालियाँ जिसकी पचास रुपये कीमत थी, ऐसी दो थालियाँ ली और मंदिर तक पहुँचने के अंतिम पड़ाव की यात्रा शुरू की गयी| कुछ पचास सीढ़ियो के बाद रमेश को बबली को गोद मे उठाना पड़ा| मंदिर के पट नौ बजे खुलते थे और खुलते से ही अथाह भीड़ दर्शन को बेताब रहती|
बाजार मे खाने–पीने की दुकाने हों या कपड़ो की, खेल–खिलौने हों या जूते चपल्लो की, पूजन सामग्री की हों या मिठाई की हर जगह लोग ही लोग दिखाई देते| ये अत्यंत व्यस्त बाजार था| जैसे – जैसे सीढ़ियों पर चढ़ते जा रहे थे ऊंचाई बढने के कारण नीचे स्थित पूरा बाजार सपष्ट दिखने लगा था|
मंदिर के अंदर भक्तों का तांता लगा हुआ था पर मंदिर के अंदर व्यवस्थाएं सुचारु होने के कारण दर्शन के लिए  कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा| दर्शन के बाद बाहर आते से ही रमेश ने शिक्षक महोदय के समक्ष एक सवाल रख दिया कि क्या लगता है आपको यहां मन्नते पुरी होतीं है?
शिक्षक महोदय बड़ी विनम्रता से बोले की पूरे गाँव की अर्थव्यवस्था इसी मंदिर के भरोसे है, किसी की दुकान है तो किसी का भोजनालय और सभी की कमाई तो इस मंदिर के भक्तो से ही है| इस हिसाब से उनके परिवारों की तो रोज की आशा आकांशाओ की पूर्ति इसी मंदिर के भरोसे होती है|
अब बताइए इतने लोगो की मन्नत तो रोज ये मंदिर पुरी कर रहा है, रमेश स्तब्ध सा रह गया उसके पास कहने को कुछ नहीं था इसलिए केवल सर हिला कर सहमति प्रकट कर दी|
लौटते वक्त रास्ते मे बबली ने पिता का हाथ पकड़ा हुआ था उसने अचानक सवाल किया कि पापा सब कह रहे थे यहाँ मन्नत पुरी होती है| रमेश ने बबली को गोद मे लिया और कहा “हां होती है अगर आप दिल से मांगो तो” इस जवाब को सुनकर अनीता हैरान थी उसने पुनः मुड़कर मंदिर की ओर नमस्कार किया|
अनीता को अब यकीन हो चला था कि ये मंदिर वास्तव मे चमत्कारी है जिसके दर्शन मात्र से ही रमेश के विचारो मे परिवर्तन आ गया|

Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत

कल्पित हरित


साथियों अगर आपके पास कोई भी कहानी, कविता या रोचक जानकारी हो तो हमें हमारे ईमेल एड्रेस hindishortstories2017@gmail.com पर अवश्य लिखें!

दोस्तों! आपको हमारी यह कहानी “Best Hindi Dharmik Kahani | मन्नत” कैसी लगी हमें कमेंट में ज़रूर लिखे| और हमारा फेसबुक पेज जरुर LIKE करें!

यह भी पढ़ें:-

Best Hindi Dharmik Kahani | शबरी की साधना

भगवान का सत्कार | Purani Dharmik Kahaniya

कृष्ण सुदामा | Krishna Sudama Story

Vedavati | वेदवती की कथा

साथियों नमस्कार! आज हम आपके लिए हमारे वैद-पुराणों की एक ऐसी कथा “वेदवती की कथा | Vedavati in Hindi” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आप अपने आपको भारतीय होने पर गोरवान्वित महसूस करेंगे| यह कथा हमें भेजी है पीयूष गोएल ने| आपको हमारा यह संकलन कैसा लगता है हमें Comment Section में ज़रूर बताएं|


Vedavati | वेदवती की कथा

एक बार कुशध्वज नाम के एक राजा थे । वह अत्यंत ज्ञानी थे इसलिए उन्हें देवगुरु ब्रहस्पति के पुत्र की भी उपाधि प्राप्त थी । उनकी एक पुत्री थी , जब उसका जन्म हुआ तब वह रोने के स्थान पर वेदों की महिमा गाने लगी , जिससे प्रसन्न होकर उसके माता पिता ने उस कन्या का नाम वेदवती रखा । वेदवती भगवान विष्णु को बहुत मानती थी ।

एक बार वेदवती तप करने बैठी थी । उसे तप करते करते तीन दिवस पूर्ण हुए । वह भूखी प्यासी थी । उनके पिता कुशध्वज ने जब यह देखा तो वह चिंतित हो उठे उन्होंने वेदवती की तपस्या भंग करने का निश्चय किया । तभी वातावरण में नारायण – नारायण नाम की ध्वनि उतपन्न हुई । वह ध्वनि देवऋषि नारद की थी ।

देवरिषि प्रकट हुए ओर उन्होंने राजा को वेदवती की तपस्या भंग करने से मना किया । ओर कहा की  आप ऐसा न करिए क्योकिज़22 वेदवती इस समय भगवान विष्णु के तप में लीन है , इस वक्त वेदवती को उठाना बिल्कुल एक शिशु से उसकी माता छीनने जैसा है । इसलिए हमारा निवेदन है कि कृपा कर आप वेदवती को उनकी साधना से न उठाए । यह बात सुनकर कुशध्वज रुक गए ओर वह चले गए ।

अप पढ़ रहें हैं Vedavati | वेदवती की कथा

कुशध्वज अपनी पुत्री के विषय मे चिंतित थे क्योंकि वेदवती का स्वभाव बिल्कुल भक्तिमय था और वह अपने तप में अधिक लीन रहती थी । कुशध्वज को यह चिंता थी कि वेदवती का विवाह कैसे होगा ? कोंन करेगा वेदवती से विवाह ? वेदवती की संतान होगी या नही ?

कोंन  पुरुष वेदवती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करेगा ? क्या वेदवती आजीवन अविवाहित रहेगी ? राजा ने यह सारी बात अपनी रानी को बताई ।

रानी भी अपनी पुत्री के स्वभाव से चिंतित रहती थी । फिर  उनके अंधकार भरे जीवन में एक ज्योत जली जब वेदवती ने एक दिन अपने पिता से कहा की वेदवती ने अपने आप के लिए एक वर पसन्द किया है ।

यह सुनकर कुशध्वज अति प्रसन्न हुए ओर वह अति प्रशंसा के भाव मे कहने लगे की पुत्री ! मुझे तुमसे यही आशा थी कि तुम अपने योग्य एक वर का चयन अवश्य करोगी । मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुमने जिस वर का चयन करा होगा , वह वर निसन्देह अति मनमोहक व अति ज्ञानी होगा परन्तु उस वर का नाम व पता तो बताओ ताकि हम उस वेद के पास तुम्हारा विवाह प्रस्ताव रख सके ।

यह सुनकर वेदवती ने अपने पिता से कहा कि वह वर अत्यंत मनमोहक ओर ज्ञानी है , उसका नाम श्री विष्णु है और वह वैकुंठ में रहते है । यह सुनकर कुशध्वज चिंतित हो उठे , उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उनके पैरों के तले से  जमीन खिंच गयी हो । वह कभी शांत होते तो कभी अपनी पुत्री को निहारते ।

काफी देर तक कोई वार्तालाप नही हुआ , फिर कुशध्वज ने अपनी चुप्पी फोड़ते हुए कहा कि पुत्री ! तुम खुद नही जानती की तुम क्या कह रही हो , तुम जिन विष्णु की बात कर रही हो , उनकी कृपा से सृष्टि की रक्षा होती है । फिर रानी ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी और बोली कि भगवान कभी विवाह नही करते , ओर फिर नारायण तो विवाहित है तभी उन्हें लक्ष्मीपति  कहा जाता है ।

इसलिए तू यह विचार अपने मन – मस्तिष्क से सदैव के लिए निकाल दे । रानी व राजा ने अपनी बात सम्पूर्ण करी । पर वेदवती तो अपने तन -मन – धन से नारायण को अपना पति मां चुकी थी और किसी भक्त को भगवान से छीनना धरती से सूर्य छीनने जैसा है ।

वेदवती अपनी बात पर अड़ी रही तब कुशध्वज को देवऋषि की सिख याद आई ओर् उन्होंने रानी से कहा कि प्रिये ! अब वेदवती को न रोको बस इतना समझ लो कि अब हमारी पुत्री अपने ससुराल के लिए विदा हो चुकी है ।

वेदवती भगवान विष्णु को प्राप्त करने के लिए एक वटवृक्ष के नीचे बैठकर तप करने लगी । उसने कई वर्षों तक तप किया । उसके तपोबल ने वटवृक्ष के नीचे ही वैकुंठ धाम बना दिया । उसकी यह तपस्या इतनी कठिन थी जितनी देवता भी तपस्या नही कर सकते । भगवान विष्णु सब देख रहे थे ।

ईस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु  प्रकट हुए ऒर उन्होंने वेदवती से वर मांगने को कहा तब वेदवती ने भगवान नारायण को अपने पति रूप में मांगा तब भगवान बोले कि मैं तो विवाहित हु प्रणति मैं अपने किसी अवतार में तुम्हे अपनी पत्नी अवश्य बनाऊंगा ,  फिर भगवान चले गए ।

वेदवती दुबारा तप करने लगी । तभी रावण वहां आया , वह वेदवती की सुंदरता देख मोहित हो गया ओर उसके सम्भोग करने की इच्छा करने लगा । तब वेदवती ने रावण को श्राप दिया की वेदवती ही रावण के वध का कारण बनेगी । फिर वेदवती रथ में सवार होकर स्वर्ग की ओर चली गई ।

समय बीता और एक दिन रावण सीता का अपहरण करने आ गया तब वेदवती ने सीता का रूप धारण करा ओर रावण ने वेदवती का ही अपहरण करा ।

श्री राम ने रावण का वध किया और सद्वती को मुक्ति दिलाई । सीता की अग्नि परीक्षा इसलिए हुई ताकि श्री राम सीता को वापस प्राप्त कर सके । जब अग्नि परीक्षा समाप्त हुई तब सीता ने श्री राम से कहा कि वेदवती ने बहुत दुख सहे है इसलिए आप वेदवती को अपनी पत्नी बनाए । तब श्री राम ने ऐसा ही किया|

Vedavati | वेदवती की कथा

पियूष गोएल


साथियों अगर आपके पास कोई भी कहानी, कविता या रोचक जानकारी हो तो हमें हमारे ईमेल एड्रेस hindishortstories2017@gmail.com पर अवश्य लिखें!

दोस्तों! आपको हमारी यह कहानी “Vedavati | वेदवती की कथा” कैसी लगी हमें कमेंट में ज़रूर लिखे| और हमारा फेसबुक पेज जरुर LIKE करें!

यह भी पढ़ें:-

कृष्ण सुदामा | Krishna Sudama Story

दानवीर कर्ण | Danveer Karna

Hindi Story | भगवान का सत्कार

Hindi Story | भगवान का सत्कार

दोस्तों एक बार फिर आपके बिच एक और नई कहानी “Hindi Story | भगवान का सत्कार “के साथ हाज़िर हैं! क्या कभी आपने सोचा है की कभी अगर भगवान् खुद आपके घर भोजन कने आए तो क्या होगा|

जी हाँ, आज की हमारी कहानी इसी पर केन्द्रित है! इस कहानी में एक गरीब ब्राम्हण है जिसके परीक्षा लेने भगवान् खुद उसके घर भोजन करने आते है| अप देखना यह है की क्या वह ब्राम्हण भगवान् को भोजन करा पता है ? पढ़े पूरी कहानी….


Hindi Story | भगवान का सत्कार

एक गाँव में दामोदर नाम के एक गरीब ब्राह्मण रहा करते थे! ब्राह्मण को लोभ और लालच बिलकुल भी न था! वे दिन भर गाँव में भिक्षा व्रती करते और जो भी रुखा सुखा मिल जाता उसे भगवन का प्रशाद समझ कर ग्रहण कर लेते|

तय समय पर भ्रम्हं का विवाह संपन्न हुआ| विवाह के उपरांत ब्राह्मण ने अपनी स्त्री से कहा की देखो अब हम गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर रहें हैं, गृहस्थ जीवन का सबसे पहला नियम होता है अतिथि सत्कार करना, गुरु आगया का पालन करना और भजन कीर्तन करना|

में चाहे घर में रहूँ न रहूँ लेकिन घर में अगर कोई अतिथि आए तो उनका बड़े अच्छे से अतिथि सत्कार करना| चाहे हम भूखे रह जाएँ लेकिन हमारे घर से कोई भी भूखा जाने न पाएं!

ब्राह्मण की बात सुनकर ब्राह्मणी ने मुस्कुराकर कहा अच्छी बात है| में इस सब बातों का ध्यान रखूंगी, आप निश्चिन्त रहें और भजन कीर्तन कर प्रभु भक्ति में ध्यान लगाए!

ब्राम्हण और ब्राह्मणी सुखी सुखी अपना जीवन यापन करने लगे! ब्राम्हण रोज सुबह अपने घर से भिक्षा व्रती के लिए आसपास के गाँव में जाते और जो कुछ भी मिलता उसे प्रभु इच्छा मानकर ग्रहण करते!

ब्राम्हण के घर की स्थिथि बहुत ही सामान्य थी| कभी-कभी तो दोनों पति पत्नी को भूखा ही सोना पड़ता! लेकिन फिर भी दोनों पति पत्नी सुखी सुखी अपना जीवन यापन कर रहे थे| मन में कोई भी द्वेष और लालच न था|

भगवान् बड़े लीलाधर हैं! वे देवलोक में बेठे-बेठे सब कुछ देखते हैं| उनकी लीला बड़ी विचित्र है| वे समय-समय पर अपने भक्तों के दुःख हरने किसी न किसी भेष में आते रहते हैं| वे हमेशा अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं|

एक दिन ब्राम्हण की भक्ति और त्याग से प्रसन्न होकर भगवान् ब्राम्हण के घर साधू का वेश धारण कर ब्राम्हण की परीक्षा लेने पहुंचे| भगवान ब्राम्हण के घर के बाहर बने चबूतरे पर बैठे और भिक्षा के लिए आवाज लगाईं|

ब्राम्हण ने जब साधू महात्मा की आवाज सुनी तो वह बाहर आया| ब्राम्हण को देख साधू महात्मा मुस्कुराए और बोले, “पुत्र आज इस रास्ते पर जाते-जाते मन किया की आज तुम्हारे घर भोजन करूँ”

आप पढ़ रहें हैं Hindi Story | भगवान का सत्कार

पढ़ें राजा विक्रमादित्य और बेताल की कहानी

ब्राम्हण ने प्रसन्नता पूर्वक साधू महात्मा को नमन किया और बोला, “महाराज ! बड़ी अच्छी और प्रसन्नता की बात है की आज आप हमारे घर भोजन करने के लिए पधारे हैं| आइये भीतर चलिए…

इतना कहकर ब्राम्हण साधू महात्मा को घर के भीतर ले आया और बिछोना बिछाकर विश्राम के लिए निवेदन किया| देवयोग से उस दिन ब्राम्हण को भिक्षा में एक दाना न मिला था| उसने रसोई में जाकर देखा तो रसोई में अन्न का एक दाना न था|

ब्राम्हण ने सोचा अब क्या करें| आज तो भिक्षा में कुछ भी नहीं मिला| हम तो भूखा रह सकते थे घर आए अतिथि को भूखा कैसे जाने दें| घर में फाटे पुराने कपड़ों और बर्तन के अलावा कोई भी सामग्री न थी|

ब्राम्हण ने अपनी स्त्री से कहा की आज हमारे घर से अतिथि भूखा ही चला जाएगा| हमने आज तक भगवान की जो भी भक्ति की है उसका कोई मोल न रह जाएगा|

ब्राम्हण की पत्नी ने कहा, “आप घबराते क्यों हैं कुछ न कुछ जतन तो हो ही जाएगा”

पत्नी की बात सुनकर ब्राम्हण ने ब्राम्हणी से पुछा, “तेरे पास कोई गहना है”  \

ब्राम्हणी बोली- “गहना तो नहीं है, और कपडे भी फटे-पुराने हैं”

पत्नी की बात सुनकर ब्राम्हण बोला, – “तो फिर अतिथि सत्कार कैसे करेंगे”

ब्राम्हणी बोली- “आप नाई की दुकान से कैंची ले आओ”

ब्राम्हण नाई की दुकान से कैची ले आया!

ब्राम्हणी ने अपने सर के केश अन्दर अन्दर से काट लिए और बाहर से कैश बांध लिए|

अपने केश ब्राम्हण को देकर ब्राम्हणी बोली- “आप बाज़ार में जाकर ये केश बेच आओ और इनसे जो कुछ भी रूपए मिले उनसे दाल-चावल लेते आना|

ब्राम्हण बाज़ार गया और केश बेचकर बाज़ार से दाल चावल ले आया| दोनों पति-पत्नी ने बड़े आदर से साधू महाराज को भोजन कराया|

भोजन कर साधू महात्मा बोले, “वत्स! इस भरी दोपहर में अब में कहाँ जाऊंगा इसलीये आज दिन में तुम्हारे यही विश्राम कर लेता हूँ|

साधू महाराज की बात सुनकर ब्राम्हण ने प्रसन्नता पूर्वक कहा- “बढ़ी अच्छी बात है महाराज, आपकी सेवा का इस से अच्छा अवसर नहीं मिल सकता| इतना कहकर ब्राम्हण साधू महाराज के चरों के पास बेठकर उनके पैर दबाने लगा|

अब परेशानी महाराज के शाम के भोजन की थी| ब्राम्हण फिर महाराज के भोजन की चिंता करने लगा| अपनी पति को चिंता में देख ब्राम्हणी बोली- “आप व्यर्थ चिंता न करें, में हूँ न…कुछ न कुछ जातां हो जाएगा”

शाम को ब्राम्हणी ने अपने सर के बचे हुए कैश काटकर ब्राम्हण को दिए और ब्राम्हण से दाल-चावल खरीद लेन को कहा|

ब्राम्हण बाज़ार से दाल-चावल ले आया| रात्रि भोजन में भी दोनों पति-पत्नी ने बड़ी ही प्रसन्नता और आदर के साथ साधू महाराज को भोजन कराया|

क्या हुआ जब दानवीर कर्ण से कृष्ण ने मांग लिया सबकुछ 

भोजन करने के बाद साधू महात्मा बड़े प्रसन्न हुए और बोला, “वत्स! तुम्हारे प्रेम से में तृप्त हो गया हूँ, लेकिन अब इस अँधेरे में कहाँ जाऊंगा| सोच रहा हूँ आज रात्रि यहीं विश्राम कर लूँ|

साधू महाराज की बात सुनकर  ब्राम्हण बोला, “महाराज ये जो कुछ भी है सब प्रभु का है| आप निच्शिंत होकर यहाँ विश्राम कर सकते हैं| ये मेरा सोभाग्य है की मुझे आपकी सेवा करने का अवसर प्राप्त हो रहा है|

इतना कहकर दोनों पति-पत्नी साधू महात्मा के चरणों में बेठ गए| साधू महात्मा के सो जाने के बाद महात्मा के चरों में ही दोनों पति-पत्नी सो गए|

जब दोनों पति-पत्नी सो गए तब बाबाजी जाग बैठे और उन्होंने ब्राम्हण को आशीर्वाद दिया की तुम्हारे सरे दुःख-दर्द दूर हो जाए, तुम्हारी पत्नी के केश भी लोट आएं और धन-धान्य से घर भर जाएँ|  इतना कहकर साधू महात्मा अंतर्ध्यान हो गए|

सुबह जब ब्राम्हण और उसकी पत्नी उठे तो उन्होंने देखा की उनके कपडे ठीक हो गए थे, ब्राम्हणी के केश भी वापस आ गए थे| लेकिन साधू-महात्मा कहीं दिखाई नहीं  दे रहे थे|

उन्होंने सोचा हो न हो वे कोई पहुंचे हुए साधू-महात्मा थे जो हमें आशीर्वाद स्वरुप ये सब दे गएँ हैं! ब्राम्हण ने जब अपने घर को देखा तो वह रोने लगे की महाराज, हमने आपको पहचाना नहीं|

कहीं हमसे महाराज की सेवा में कोई कमी तो नहीं रह गई| हम अनजान थे महाराज! हमें क्षमा करो|

ब्राह्मण की विनती सुनकर भगवान प्रकट हुए और बोले, “तुम्हारे प्रेम पूर्वक भोजन करवाने से में बहुत तृप्त हुआ! तुम सुखी रहो…. इतना कहकर भगवान् अंतर्ध्यान हो गए|

इसीलिए कहते हैं महमान में भगवान होता है!

Hindi Story | भगवान का सत्कार


रामलाल | हिंदी कहानी

पुराने हो चुके सरकारी जर्जर मकान में यही कोई 15,20 मरीज़ों का इलाज चल रहा था। वे सभी एक कमरे में अलग अलग बिस्तर पर पड़े रहते। दिन में किसी एक समय डॉक्टर और नर्स आते फिर उनकी जरूरत की दवाएं देकर चले जाते।एक दूसरे का हालचाल पूछकर दिन गुजार लिया करते थे।

कमरे के आखिर में एक खिड़की थी जिसके पास से लगा हुआ रामलाल का बिस्तर था। रामलाल रोज़ खिड़की की तरफ झाँकता और मुस्कुराते हुए सबको उस पार की कहानी बताता। रामलाल का मित्र झुमरू जो उसी के गांव से था वो भी उस कमरे में रोज़ उससे खिड़की के बाहर की दुनिया की जानकारी लेता लेकिन मन ही मन रोज़ कामना करता कि रामलाल जल्दी गुजर जाये तो मैं खिड़की के पास वाले बिस्तर पर चला जाऊं।

कुछ दिनों के बाद रामलाल का देहांत हो गया। सभी दुखी थे लेकिन झुमरू को कोई ग़म ना था उसने रात में ही अपना बिस्तर खिड़की के पास शिफ्ट करा लिया था।

सुबह जैसे ही उसकी आँख खुली वो उठकर खिड़की की ओर झांकने लगा। उसने देखा कि खिड़की के उस पार तो दीवार है और सिवाय ईंटो के कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है। मन ही मन वह अपने आपको कोसने लगा और रामलाल को याद करते हुए रोने लगा।

पढ़ें पञ्च तंत्र की कहानियां 


लायक बेटा | Hindi Kahani

रोज़ की तरह सेवकराम सुबह सुबह गार्डन टहलने गए। आज उनके बरसों पुराने मित्र आलोक जी से उनकी मुलाकात हो गयी। बड़ी देर तक वे दोनों कॉलेज की यादों में खो गए।

आलोक जी: अब तो तुम्हारे तीनों लड़के बड़े हो गये होंगे, कहाँ है आजकल।

सेवकराम: बड़ा बेटा रेलवे में बाबू है और छोटा आयकर विभाग में है।

आलोक जी: और मँझला?

सेवकराम: वह एक कंप्यूटर कैफ़े में काम करता है।

आलोक जी: मतलब ये नालायक निकला, और तुम अभी छोटे या बड़े किसके साथ रहते हो?

सेवकराम: बड़े और छोटे बेटे ने शहर में अपना मकान ले लिया है और अपने-अपने परिवार के साथ रहते हैं।
मैं अपने मँझले बेटे-बहू,पोते के साथ एक किराये के मकान में रहता हूँ।


साथियों अगर आपके पास कोई भी रोचक जानकारी या कहानी, कविता हो तो हमें हमारे ईमेल एड्रेस hindishortstories2017@gmail.com पर अवश्य लिखें!

दोस्तों! आपको “Hindi Story | भगवान का सत्कार हमारी यह कहानी कैसी लगी हमें कमेंट में ज़रूर लिखे| और हमारा फेसबुक पेज जरुर LIKE करें!

अब आप हमारी कहानियों का मज़ा सीधे अपने मोबाइल में हमारी एंड्राइड ऐप के माध्यम से भी ले सकते हैं| हमारी ऐप डाउनलोड करते के लिए निचे दी गए आइकॉन पर क्लिक करें!

पढ़ें कहानी – कृष्ण-सुदामा की मित्रता 

पंच रत्न | Hindu Mythology Stories

पंच रत्न | Hindu Mythology Stories

हिन्दू ध्रर्म (hindutva) विश्व का सबसे प्राचीन धर्म है| सदियों से हिन्दू धर्म में कई कहानिया, किस्से चलें आएं है जो हमें कहीं ना कहीं जीवन के किसी न किसी पड़ाव में कोई न कोई शिक्षा जरुर दे जाते हैं| उन्हीं कुछ किस्से कहानियों में से एक कहानी पंच रत्न | Hindu Mythology Stories हम आपके बिच लेकर आएं हैं|

                           पंच रत्न | Hindu Mythology Stories


महर्षि कपिल प्रतिदिन पैदल अपने आश्रम से गंगा स्नान के लिए जाया करते थे| मार्ग में एक छोटा सा गाँव पड़ता था| जहाँ पर कई किसान परिवार रहा करते थे| जिस मार्ग से महर्षि गंगा स्नान के लिए जाया करते थे,  उसी मार्ग में एक विधवा ब्राम्हणी की कुटीया भी पड़ती थी| महर्षि जब भी उस मार्ग से गुजरते, ब्राम्हणी या तो उन्हें चरखा कातते मिलती या फिर धान कुटते| एक दिन विचलित होकर महर्षि ने ब्राम्हणी से इसका कारण पूछ ही लिया| पूछने पर पता चला की ब्राम्हणी के घर में उसके पति के अलावा आजीविका चलने वाला कोई न था| अब पति की म्रत्यु के बाद पुरे परिवार के भरण पोषण की ज़िम्मेदारी उसी पर आ गई थी|

कपिल मुनि को ब्राम्हणी की इस अवस्था पर दया आ गई और उन्होंने ब्राम्हणी के पास जाकर कहा, “भद्रे ! में पास ही के आश्रम का कुलपति कपिल हूँ| मेरे कई शिष्य राज-परिवारों से हैं| अगर तुम चाहो तो में तुम्हारी आजीविका की स्थाई व्यवस्था करवा सकता हूँ, मुझसे तुम्हारी यह असहाय अवस्था देखी नहीं जाती|

ब्राम्हणी ने हाथ जोड़कर महर्षि का आभार व्यक्त किया और कहा, “मुनिवर, आपकी इस दयालुता के लिए में आपकी आभारी हूँ, लेकिन आपने मुझे पहचानने में थोड़ी भूल की है| पंच रत्न | Hindu Mythology Stories
ना तो में असहाय हूँ और ना ही निर्धन| आपके शायद देखा नहीं, मेरे पास पांच ऐसे रत्न हैं जिनसे अगर में चहुँ तो खुद राजा जैसा जीवन यापन कर सकती हूँ| लेकिन मैंने अभी तक  उनकी आवश्यकता अनुभव नहीं किया इसलिए वह पांच रत्न मेरे पास सुरक्षिक रखे हैं| 

कपिल मुनि विधवा ब्राम्हणी की बात सुनकर आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने कहा, “भद्रे ! अगर आप अनुचित न समझे तो आपके वे पांच बहुमूल्य रत्न मुझे भी दिखाएँ| देखू तो आपके पास कैसे बहुमूल्य रत्न है ?

ब्राम्हणी ने आसन बीचा दिया और कहा, “मुनिवर आप थोड़ी देर बैठें, में अभी आपको मेरे रत्न दिखाती हूँ| इतना कहकर ब्राम्हणी फिर से चरखा कातने लगी| थोड़ी देर में ब्राम्हणी के पांच पुत्र विद्यालय से लौटकर आए| उन्होंने आकर महर्षि और माँ के पैर छुए और कहा . “माँ ! हमने आज भी किसी से झूंठ नहीं बोला, किसी को कटु वचन नहीं कहा, गुरुदेव ने जो सिखाया और बताया उसे परिश्रम पूर्वक पूरा किया है|

महर्षि कपिल को और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं पड़ी| उन्होंने ब्राम्हणी को प्रणाम कर कहा, “भद्रे ! वाकई में तुम्हारे पास अति बहुमूल्य रत्न है, ऐसे अनुशाषित बच्चे जिस घर में हो, जिस देश में हो उसे चिंता करने की आवश्यकता ही नहीं है|

पंच रत्न | Hindu Mythology Stories


पढ़ें:- साँस-बहु के बिच के रिश्ते को सम्हालती एक ननद की कहानी  “ननंद”

दोस्तों आपको हमारी यह कहानी “ पंच रत्न | Hindu Mythology Stories  कैसी लगी हमें Comment Section में ज़रूर बताएं और हमारा फेसबुक पेज  जरुर Like करें|

राजा विक्रमादित्य | Vikramaditya Stories in Hindi

राजा विक्रमादित्य | Vikramaditya Stories in Hindi


भैया एक बात तो है! भारत में राजा महाराजा ऐसे रहें हैं, की आज भी उनके किये गए काम और उनकी कही गई बाते कायम है| कहते हैं की इन्सान अपनी गलतियों से ही सीखता है, लेकिन अगर कोई इन्सान अपनी गलतियों से ना सिखाना चाहे और कहानी और किस्सों से सीखकर अपनी ज़िन्दगी की बेहतर बनाना चाहे तो इसमें हर्ज़ ही क्या है| तो गुरु आपको ज़िन्दगी का हर पाठ पढाने और आपकी ज़िन्दगी में कमियाबी की लहर लाने हम लेकर आएं हैं एक और शानदार कहानी राजा विक्रमादित्य | Vikramaditya Stories in Hindi

          राजा विक्रमादित्य | Vikramaditya Stories in Hindi

उज्जैन नगरी में एक निडर और बहुत ही साहसी युवक रहता था| उस राज्य के राजा के कोई भी संतान ना होने के कारण और एक दिन राज्य के राजा के आकस्मिक निधन हो जाने के कारन राज गद्दी का कोई भी वारिस नहीं बचा| एक दिन उस युवक को ज्ञात हुआ की राज्य के राजा के निसंतान मर जाने के कारण राज्य के नए राजा की तलाश हो रही है इसलिए उसने भी इस पद हेतु अपना नाम प्रस्तावित करने की सोची|

बस युवक था तो निडर और साहसी, एक दिन सवेरे-सवेरे ही वह राजा के महल में पहुँच गया और राज्य के मंत्रीयों को उसके राजा पद के योग्य होने की बात कह डाली| राज्य के मंत्रियों ने उसकी बात सुनी और उसे बताया की तुमसे पहले भी कई लोग इस पद के लिए महल में आएं हैं, परन्तु किसी क्षाप वश  उनका निधन उनके राज्याभिषेक की रात में ही हो गया| अगर तुम भी अपना जीवन सुरक्षित चाहते हो तो एसा मत करो|

युवक काफी निडर था| उसने बिना किसी भय के यह चुनोती स्वीकार कर ली| राज्य के राजा होने की सभी परीक्षाएं उत्तीर्ण करने के बाद उसे राजा के लिए योग्य माना गया| तय समय पर युवक का राज्याभिषेक हुआ| राज्याभिषेक होने के बाद उसने विचार किया, कि हो ना हो अवश्य किसी देव या दानव का रोष इस राज्य पर है| अगर उस देव या दानव को किसी तरह संतुष्ट कर लें तो इस समस्या से बचा जा सकता है| राजा ने राज्याभिषेक की रात को ही अपने कक्ष में अनेक व्यंजन बना कर रख दिओये और खुद एक तलवार लेकर कक्ष के कोने में ही छुपकर बेठ गया|

रात को देवराज इंद्र का द्वारपाल, अग्निवेताल वहां आया और उन व्यंजनों को देखकर प्रसन्न हो गया| उसने सोचा क्यों ना में पहले इन व्यंजनों का लुफ्त उठा लु उसके बाद राजा को लेकर चला जाऊंगा| अग्निवेताल उन व्यंजनों को ग्रहण करके बोला, “राजन! यदि तुम रोज़ मेरे लिए इसे ही स्वादिष्ट व्यंजनों का प्रबंध करोगे तो में तुम्हें अभयदान दूंगा| राजा ने अग्निवेताल का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और अग्नि वेताल से बोला, “तुम देवराज इंद्र से पुचकार बताओ कि मेरी उम्र कितनी है?”

अगले दिन अग्निवेताल फिर रजा के कक्ष में आया और राजा को बोला, “राजन! आपकी उम्र 100 वर्ष है|” इतना सुनते ही राजा ने तलवार अग्निवेताल की गर्दन पर रख दिया और कहा – “इसका अर्थ है, कि तुम  मेरा अंत 100 वर्ष के पहले नहीं कर सकते|”

अग्निवेताल राजा की बुद्धिमता व् निडरता से अत्यंत प्रसन्न हुआ और उन्हें एक संपन्न राज्य का वरदान दिया| वही राजा आगे चलकर महाराज विक्रमादित्य के नाम से जाने गए|

राजा विक्रमादित्य | Vikramaditya Stories in Hindi


दोस्तों! आपको हमारी कहानी राजा विक्रमादित्य | Vikramaditya Stories in Hindi कैसी लगी हमें कमेंट में ज़रूर लिखे| और हमारा फेसबुक पेज जरुर LIKE करें!

जाने क्या कुछ खास है उज्जैन में देखने के लिए!

कृष्ण सुदामा | Krishna Sudama Story

कृष्ण सुदामा | Krishna Sudama Story


मित्रता या फिर यूँ कहें दोस्ती ! एक एसा बंधन है जो हमें बाकि सभी रिश्तों की तरह जन्म से नहीं मिलता| यह एक एसा रिश्ता है जो इन्सान जन्म लेने के बाद खुद बनाता है| पुरानों में दोस्ती की कई कहानियां कही गई है| लेकिन दोस्ती के रिश्ते की सही मिसाल अगर किसी ने पेश की है तो वह कृष्ण-सुदामा ने की है| दोस्ती का असली रंग कृष्ण-सुदामा की दोस्ती का है! इसीलिए आज हम आप सभी दोस्तों के लिए लेकर आएं हैं, दोस्ती की कहानी कृष्ण सुदामा | Krishna Sudama Story


शाम हुई सुदामा घर लौटे, आज भगवान् श्री कृष्ण गाएं चराने नहीं गए हुए थे| आज श्री कृष्ण का जन्मोत्सव था| आज माँ यशोदा ने कृष्ण को घर में ही रोक लिया था|
गोप-बालकों ने सुदामा से पुछा, “मनसुख तुम तो अनंन्य भक्त और प्रिय सखा हो श्री कृष्ण के, फिर आज कृष्ण ने तुम्हें प्रसाद के लिए नहीं पुछा| तुम तो कहते थे गोपाल मेरे बिना अन्न का एक ग्रास भी मुह में नहीं डालते हैं|”
हाँ-हाँ ग्वालों ! ऐसा ही है, लेकिन तुम्हें मुझपर विश्वास कहाँ होगा ? कान्हां तो आज भी मेरे पास आए थे और आज तो कान्हां ने अपने हाथों से मुझे प्रसाद खिलाया|

यह झूंठ है, ” यह कहकर गोप बालक श्री कृष्ण को पकड़ लाए और कहने लगे, लो मनसुख ! अब तो कृष्ण सामने खड़े हैं| श्री कृष्ण से ही पुच लो, आज तो इन्होने दहलीज़ के बहार पांव तक नहीं रखा|”
श्री कृष्ण ने भी गोप बालकों का साथ दिया और कहा, ” हाँ-हाँ मनसुख! तुम्हें भ्रम हुआ होगा, में तो आज घर से बहार निकला तक नहीं|

सुदामा ने मुस्कुराते हुए कहा, “धन्य हो नटवर ! तुम्हारी लीलाएँ अपरम्पार है| लेकिन क्या आप यह बता सकते हैं, कि यदि आज आप मेरे पास नहीं आए तो आपका यह पीताम्बर मेरे पास कहाँ से आ गया ? देख लो, अभी भी मिष्ठान का कुछ अंश पीताम्बर में बंधा हुआ है|”
ग्वालों ने पीताम्बर खोल कर देखा – वही भोग, वही मिष्ठान जो पूजा गृह में था, पीताम्बर में बंधा था| मनसुख को वह कौन देने गया किसी को पता नहीं था|

कृष्ण सुदामा | Krishna Sudama Story


दोस्तों! आपको हमारी कहानी कृष्ण सुदामा | Krishna Sudama Story कैसी लगी हमें कमेंट में ज़रूर लिखे| और हमारा फेसबुक पेज जरुर LIKE करें!

यह भी पढ़ें:- दानवीर कर्ण Danveer Karna Story in Hindi

दानवीर कर्ण Danveer Karna Story in Hindi

दानवीर कर्ण Danveer Karna Story in Hindi


कर्ण के बारे में महाभारत और पुरानों में कई कहानियां है जहाँ कर्ण को दानवीर कर्ण (दानवीर कर्ण Danveer Karna Story in Hindi) कहा गया है| इस कहानी में आप जानेंगे की क्यों श्री कृष्ण ने कर्ण को दानवीर कर्ण कहा है|


              दानवीर कर्ण Danveer Karna Story in Hindi

एक बार श्री कृष्ण भरी सभा में कर्ण की दानवीरता की प्रशंशा कर रहे थे| अर्जुन भी उस समय सभा में उपस्थित थे, वे कृष्ण द्वारा कर्ण की दानवीरता की प्रशंशा को सहन नहीं कर पा रहे थे| भगवान् कृष्ण ने अर्जुन की और देखा और पल भर में ही अर्जुन के मनोभाव जान लिए| श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्ण की दानशीलता का ज्ञान कराने का निश्चय किया|

कुछ ही दिनों बाद नगर में एक ब्राह्मण की पत्नी का देवलोक गमन हो गया| ब्राह्मण अर्जुन के महल में गया और अर्जुन से विनती करते हुए कहा – “धनंजय! मेरी पत्नी मर गई है, उसने मरते हुए अपनी आखरी इच्छा जाहिर करते हुए कहा था कि मेरा दाह संस्कार चन्दन की लकड़ियों से ही करना, इसलिए क्या आप मुझे चन्दन की लकड़ियाँ दे सकते हैं?
ब्रम्हां की बात सुनकर अर्जुन ने कहा – “क्यों नहीं?” और अर्जुन ने तत्काल कोषाध्यक्ष को तुरंत पच्चीस मन चन्दन की लकड़ियाँ लेन की आगया दे दी, परन्तु उस दिन ना तो भंडार में और ना ही बाज़ार में चन्दन की लकड़ियाँ उपस्थित थी| कोषाध्यक्ष ने आकर अर्जुन को सारी व्यथा सुने और अर्जुन के समक्ष चन्दन की लकड़ियाँ ना होने की असमर्थता व्यक्त की|अर्जुन ने भी ब्राह्मण को अपनी लाचारी बता करखली हाथ वापस भेज दिया|

ब्राह्मण अब कर्ण के महल में पहुंचा और कर्ण से अपनी पत्नी की आखरी इच्छा के अनुरूप चन्दन की लकड़ियों की मांग की| कर्ण के समक्ष भी वही स्थति थी, ना तो महल में और ना ही बाज़ार में कहीं चन्दन की लकड़ियाँ उपस्थित थी| परन्तु कर्ण ने तुरंत अपने कोषाध्यक्ष को महल में लगे चन्दन के खम्भे निकाल कर ब्राह्मण को देने की आगया दे दी| चन्दन की लकड़ियाँ लेकर ब्राह्मण चला गया और अपनी पत्नी का दाह संस्कार संपन्न किया|

शाम को जब श्री कृष्ण और अर्जुन टहलने के लिए निकले| देखा तो वही ब्राह्मण शमशान पर कीर्तन कर रहा है| जिज्ञासावश जब अर्जुन ने ब्राह्मण से पुचा तो ब्राह्मण ने बताया की कर्ण ने अपने महल के खम्भे निकाल कर मेरा संकट दूर किया है, भगवान् उनका भला करे|

यह देखकर भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन से बोले, “अर्जुन! चन्दन के खम्भे तो तुम्हारे महल में भी थे लेकिन तुम्हें उनकी याद ही नहीं आई| यह सुनकर अर्जुन लज्जित हो गए और उन्हें विश्वास हो गया की क्यों कर्ण को लोग “दानवीर कर्ण” कहते हैं|


दोस्तों! आपको हमारी कहानी दानवीर कर्ण Danveer Karna Story in Hindi कैसी लगी हमें कमेंट में ज़रूर लिखे| और हमारा फेसबुक पेज जरुर LIKE करें!

पढ़ें कहानी :- बिहारी जी के चार लड्डू-Spiritual Story in Hindi

ननंद | Emotional Story in Hindi

पिज़्ज़ा हिंदी कहानी | Pizza A Short Story in Hindi

बरसात | Barsaat Hindi Kahani

परिवार-Short Story in Hindi

काफी-Coffee Emotional Story in Hindi

गिलहरी का योगदान-Spiritual Story in Hindi

गिलहरी का योगदान-Spiritual Story in Hindi


पढ़िए गिलहरी की शरीर पर दिखने वाली धारियों के पीछे की पूरी कहानी, रामायण (Ramayan) के इस अंश से!

यह कहानी तब की है जब भगवान् राम (Ram) माँ सीता को दुष्ट रावण (Ravan) के चंगुल से छुड़ाने के लिए लंका तक जाने के लिए एक पुल का निर्माण कर रहे थे| माँ सीता तक पहुँचने वाले इस पुल के निर्माण में महाबली हनुमान और उनकी पूरी वानर सेना लगी थी| महावीर हनुमान और उनकी पूरी वानर सेना बड़े-बड़े पत्थरों पर “श्री राम” लिखकर पुल का निर्माण कर रही थी| तभी भगवान् राम की नज़र एक गिलहरी पर पड़ी, जो पहले समुद्र किनारे पड़ी धुल पर लोट कर  धुल अपने शरीर पर चिपका लेती और फिर पुल पर आकर झिटक देती| वह लगातार इस काम को करती जा रही थी| काफी देर तक उस गिलहरी को ऐसा करते देख भगवान् राम उस गिलहरी के पास गए और गिलहरी को प्यार से अपने हाथों से उठा कर बोले- यह तुम क्या कर रही हो|

गिलहरी ने भगवान् राम को प्रणाम किया और बोली- महाबली हनुमान और उनकी पूरी सेना बड़े-बड़े पत्थरों से इस पुल का निर्माण कर रही हैं, लेकिन में छोटी सी गिलहरी यह सब नहीं कर सकती इसिलिए मुझसे जितना बन पड रहा है में वो कर रही हूँ|में भी इस काम मे अपना छोटा सा योगदान देना चाहती हूँ| भगवान् राम गिलहरी के इस भाव से बहुत ज्यादा प्रसन्न हुए और गिलहरी की पीठ पर प्यार से हाथ फेरने लगे| कहा जाता है की उस निस्वार्थ प्रेम में इतनी ताकत थी की गिलहरी की पीठ पर आज तक भगवान् राम की धरियों के निशान है|

गिलहरी का योगदान-Spiritual Story

कहानी का तर्क यही है, कि किसी भी काम में हमारा योगदान चाहे छोटा सा हो लकिन निस्वार्थ भाव से किया गया काम हमेशा बड़े परिणाम लेकर आता है|

जय श्री राम

hindishortstories.com

यह भी पढ़े-केदारनाथ-जागृत महादेव|Kedarnath-Mahadev|Spiritual Story

Vrindavan ki Sachi Ghatna | बिहारी जी किसी का उधार नही रखते

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए वृन्दावन धाम के एक ऐसे चमत्कार की कहानी “Vrindavan ki Sachi Ghatna | बिहारी जी किसी का उधार नही रखते” बताने जा रहे हैं जिसे पढ़कर आप भी आश्चर्यचकित हो जाएँगे|


Vrindavan ki Sachi Ghatna | बिहारी जी किसी का उधार नही रखते

एक बार की बात है। वृन्दावन (Vrindawan Dham) में एक संत रहा करते थे। उनका नाम था कल्याण, वे बाँके बिहारी जी के परमभक्त थे। एक बार उनके पास एक सेठ आया, अब था तो सेठ…लेकिन कुछ समय से उसका व्यापार ठीक से नही चल रहा था।

उसको व्यापार में बहुत नुकसान हो रहा था। सेठ उन संत के पास गया और उनको अपनी सारी व्यथा बताई और कहा,  महाराज मेरे व्यापार में कुछ दिनों से काफी नुकसान हो रहा है आप कोई उपाय करिये।

संत ने कहा सेठ जी अगर मैं ऐसा कोई उपाय जानता तो आपको अवश्य बता देता। लेकिन मैं ऐसी कोई विद्या नही जानता जिससे मैं आपके व्यापार को ठीक कर सकु, ये मेरे बस में नही है। हमारा तो एक ही सहारा है, बिहारी जी….

इतनी बात हो ही पाई थी, कि बिहारी जी (Bihari ji) के मंदिर खुलने का समय हो गया। संत सेठ जी को बिहारी जी के मंदिर में ले आये और अपने हाथ को बिहारी जी की ओर करते हुए सेठ जी को बोले, आपको जो कुछ भी मांगना है…जो कुछ भी कहना है…इनसे कह दो।

ये सबकी कामनाओ को पूर्ण कर देते है। सेठ जी ने बिहारी जी से प्रार्थना की, दो चार दिन वृन्दावन में रुके और फिर चले गए। कुछ समय बाद सेठ जी का सारा व्यापार धीरे-धीरे ठीक हो गया। अब सेठ जी समय-समय पर बिहारी जी के दर्शन करने वृन्दावन आने लगे।

लेकिन कुछ समय बाद सेठ जी थोडे अस्वस्थ हो गए, वृन्दावन आने की शक्ति भी अब उनके शरीर मे नही रही। एक बार उसका एक जानकार वृन्दावन धाम (Vrindawan dham) की यात्रा पर जा रहा था इस बात को जानकर सेठ जी को बड़ी प्रसन्नता हुई!

सेठ जी ने उसे कुछ पैसे दिए (750 रुपये) और कहा कि ये धन तू बिहारी जी की सेवा में लगा देना और उनको पोशाक धारण करवा देना। वो भक्त जब वृन्दावन आया तो उसने सेठ जी के कहे अनुसार बिहारी जी (Bihari ji) के लिए पोशाक बनवाई और उनको भोग भी लगवाया।

लेकिन इन सब व्यवस्था में धन थोड़ा ज्यादा खर्च हो गया। लेकिन उस भक्त ने सोचा…चलो कोई बात नही, थोड़ी सेवा बिहारी जी (Bihari ji) की हमसे भी बन गई।

बिहारी जी किसी का उधार नही रखते

अब इधर मंदिर बंद हुआ तो बिहारी जी रात को सेठ जी के स्वप्न में पहुच गए। सेठ जी को स्वप्न में ही बिहारी जी ने कहा, तुमने जो मेरे लिए सेवा भेजी थी वो मेने स्वीकार की…लेकिन उस सेवा में 249 रुपये ज्यादा लगे है, तुम उस भक्त को ये रुपय लौटा देना।

ऐसा कहकर बिहारी जी अंतर्ध्यान हो गए। सेठ जी की जब सुबह आँख खुली तो वे बिहारी जी की लीला देख कर आश्चर्य चकित रह गए। सेठ जी जल्द से जल्द तैयार हो कर उस भक्त के घर पहुच गए और उसको सारी बात बताई।

यह सब जानकर वो भक्त आश्चर्य चकित रह गया, कि ये बात तो सिर्फ मैं ही जनता था और तो मैने किसी को बताई भी नही। सेठ जी ने उनको वो 249 रुपये दिए और कहा… “मेरे सपने में श्री बिहारी (Bihari ji) जी आए थे, वो ही मुझे ये सब बात बता कर गए है”…

ये लीला देखकर वो भक्त खुशी से मुस्कुराने लगा और बोला जय हो बिहारी जी की इस कलयुग में भी हमारे बिहारी जी किसी का कर्ज किसी के ऊपर नही रहने देते। जो एक बार इनकी शरण ले लेता है। फिर उसे किसी से कुछ माँगना नही पड़ता, उसको सब कुछ मिलता चला जाता है।।

बोलो श्री वृन्दावन बिहारी लाल की जय
hindishortstories.com

साथियों आपको “Vrindavan ki Sachi Ghatna | बिहारी जी किसी का उधार नही रखते” हमारा यह आर्टिकल कैसा लगा हमें कमेंट सेक्शन में ज़रूर बताएं और हमारा फेसबुक पेज जरुर LIKE करें|

साथियों अगर आपके पास कोई भी रोचक जानकारी या कहानी, कविता हो तो हमें हमारे ईमेल एड्रेस hindishortstories2017@gmail.com पर अवश्य लिखें!

अब आप हमारी कहानियों का मज़ा सीधे अपने मोबाइल में हमारी एंड्राइड ऐप के माध्यम से भी ले सकते हैं| हमारी ऐप डाउनलोड करते के लिए निचे दी गए आइकॉन पर क्लिक करें!

यह भी पढ़ें

बिहारी जी के चार लड्डू-Spiritual Story in Hindi

केदारनाथ-जागृत महादेव|Kedarnath-Mahadev Spiritual Story In Hindi

केदारनाथ-जागृत महादेव|Kedarnath-Mahadev Spiritual Story In Hindi


केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?  दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी!

एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham) की यात्रा पर निकला। पहले के ज़माने में यातायात सुविधाएँ ना होने के कारण, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में उसे  जो भी मिलता उससे केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता और मन में भगवान शिव (Shiv) का ध्यान करता रहता। चलते-चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदारनाथ धाम (Kedarnath Temple) पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। उसने पंडित जी से प्रार्थना की – कृपा कर के दरवाजे खोलकर मुझे प्रभु के दर्शन करवा दीजिये। लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद और नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवान शिव को याद किया, कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह  सभी से प्रार्थना कर रहा था, लेकिन किसी ने भी उसकी एक नही सुनी।
पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। यह कह कर सभी वहा से चले गये। लेकिन वह वहीं पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी और चारों तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे अपने शिव पर पूरा विश्वाश था, कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। तभी उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आकर बैठ गया। पूछा – बेटा कहाँ से आये हो ? उसने अपना सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा यहाँ आना व्यर्थ हो गया बाबा जी। सन्यासी बाबा ने उसे समझाया, खाना भी दिया और बहुत देर तक उससे बाते करते रहे। सन्यासी बाबा को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।
इन्ही बातों-बातों में उस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी अपनी पूरी मंडली के साथ आ रहे है। उसने पंडित को प्रणाम किया और बोला – कल  तो आप ने कहा था, कि अब मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई यहाँ पर नहीं आएगा, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा – तुम वही हो ना जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे और मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! भक्त ने आश्चर्य से कहा – नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे रात में,  मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया।

Kedarnath-Mahadev

पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। उन्होंने कहा – लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी,  कि एक सन्यासी मंदिर के पट बंद होने के बाद यहाँ आया था – लम्बा, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए और मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। हम आपकी भक्ति को प्रणाम करते हैं!

हर हर महादेव…..

यह भी पढ़े:-कहानी-बिहारी जी के चार लड्डू Spiritual Story in Hindi

hindishortstories.com