Category Archives: Hindi Poem

2 October Gandhi Jayanti | गाँधी जयंती विशेष

साथियों नमस्कार, हिंदी भाषा की सबसे बड़ी वेबसाइट Hindi Short Stories पर आपका स्वागत है| आज के इस खास अंक “2 October Gandhi Jayanti | गाँधी जयंती विशेष” में हम आपके लिए हमारी मण्डली के लेखक “धीरज व्यास” द्वारा लिखी गई एक शानदार कविता लेकर आएं हैं|

आशा है आपको हमारा यह संकलन पसंद आएगा| आपको हमारा यह संकलन कैसा लगता है कृपया कमेंट सेक्शन में हमें ज़रूर बताएं|


2 October Gandhi Jayanti | गाँधी जयंती विशेष

“कर दिया कमाल”

तर्ज:- दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल

फसा दिया फैला के तूने मंदी का ये जाल,
मीडिया के महानायक तूने कर दिया कमाल…
संकट में भी चलती रही तेरी राजनेतिक ये चाल,
वाह रे प्रधान सेवक तूने कर दिया कमाल!!

कोरोना से लड़ी तूने अजब सी ये लड़ाई,
ज्योति जलाई तो कभी तूने ताली थाली बजाई…
ऐसे में झूलते पडोसीयों नें भी आँख दिखाई,
वाह रे फ़क़ीर तूने खूब करामत करवाई||

विदेशी मोबाइलों में से चीनी एप्प को दिया निकाल,
इसको भी मीडिया नें मान लिया एक धमाल…
आ सकता है कोरोना में पहला नंबर अगले साल,
वाह रे चोकीदार तूने कर दिया कमाल||

नौकरी की राह देख रहा थे ये ज़माना,
बद से बदतर हुआ अब नौकरी पाना…
ऐसे में पकोड़ों का भी अब जल भुन जाना,
तू भी फैकुं बड़ा है अब उस्ताद पुराना||

काट डाली तूने ढूँढ़ कर अर्थ वाली डाल,
इस पर चला दी तूने आत्मनिर्भर वाली चाल…
बढ़ा दी हम बेरोजगारों की ये खूब तूने जमात,
वाह रे विकास पुरुष तूने क्या कर दिया कमाल||

2 October Gandhi Jayanti | गाँधी जयंती विशेष
लेखक:- धीरज व्यास पाली


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हिंदी दिवस 2020 पर कविता | राष्ट्रभाषा पर बहस चले

हिंदी दिवस 2020 पर कविता | राष्ट्रभाषा पर बहस चले

साथियों नमस्कार, आज हम हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में आपके लिए एक खास कविता “हिंदी दिवस 2020 पर कविता | राष्ट्रभाषा पर बहस चले“लेकर आएं हैं| यह कविता हमारी मण्डली के लेखक बरुण कुमार सिंह ने लिखा है| आपको यह कविता कैसी लगी हमें Comment Section में ज़रूर बताएं|


हिंदी दिवस 2020 पर कविता | राष्ट्रभाषा पर बहस चले

 

नमस्कार! प्रणाम! हम भूल चले,
हैलो! हाय! बाय! हम बोल चले।
चरण स्पर्श! भूल चले,
आलिंगन को हाथ बढ़े।
संस्कृति को भूल चूकें,
विकृति को बढ़ चले।
पौराणिकता को भूल चले,
आधुनिकता को हाथ बढ़े।
अपव्यय पर हाथ रूके,
मितव्यय पर हाथ बढ़े।
कृत्रिमता को भूल चले,
अकृत्रिमता को बढ़ चले।
सुप्रीमकोर्ट में बहस बेमानी है,
न्याय की चौखट पर,
राष्ट्रभाषा हारी है,
मंजिल अभी बाकी है।
सितम्बर में हिन्दी दिवस मने,
हिन्दी पखवाड़ा विसर्जन बने।
राष्ट्रभाषा पर बहस चले,
हिन्दी पर राजनीति जारी है।
बरुण कुमार सिंह
ए-56/ए, प्रथम तल, लाजपत नगर-2
नई दिल्ली-110024
मो. 9968126797

हिंदी थी वह

हिंदी थी वह, जो लोगो के ह्रदयो में उमंग भरा करती थी,
हिंदी थी वह भाषा, जो लोगो के दिलो में बसा करती थी !!

हिंदी को ना जाने क्या हुआ, रहने लगी हैरान परेशान,
पूंछा तो कहती है अब कहाँ है, मेरा पहले सा सम्मान…!!

मैं तो थी लोगो की भाषा, मैं तो थी क्रांति की परिभाषा,
मैं थी विचार-संचार का साधन, मैं थी लोगो की अभिलाषा…!!

मुझको देख अपनी दुर्दशा, आज होती है बड़ी निराशा,
सुन यह दुर्दशा व्यथा हिंदी की, ह्रदय में हुआ बड़ा अघात ,
बात तो सच है वास्तव में, हिंदी के साथ हुआ बड़ा पक्षपात…!!

हिंदी जो थी जन जन की भाषा, और क्रांति की परिभाषा,
वह हिंदी कहती है लौटा दो उसका सम्मान, यही है उसकी अभिलाषा..!!

अपने ही देश में हिंदी दिवस को तुम, बस एक दिन ना बनाओ,
मैं तो कहती हूँ, हिंदी दिवस का यह त्यौहार तुम रोज मनाओ…!!

आओ मिलकर प्रण ले, हम सब करेंगे हिंदी का सम्मान,
पूरी करेंगे हिंदी की अभिलाषा, देंगे उसे दिलो में विशेष स्थान…!!


हिंदी जीवन है सदियों से,

हिंदी है मेरा अभिमान!
हिंदी को गर पूजूं न में,
मिट जाए मेरी पहचान!!
जिस धरती पर हुए अनेकों,
महापुरुष जो थे निष्काम!
उस भूमि और उस हिंदी को.
हमारा शत-शत प्रणाम!!

ह से हिंदी 

“ह” से “ह्रदय” ह्रदय से “हिंदी”, हिंदी दिल में रखता हूँ,

“नुक्ता”लेता हूँ “उर्दू” से, हिन्दी उर्दू कहता हूँ..

शब्द हो अंग्रेज़ी या अरबी, या कि फारसी तुर्की हो,

वाक्य बना कर हिन्दी में, हिन्दी धारा में बहता हूँ..

हिंदी-ह्रदय विशाल बहुत है, हर भाषा के शब्द समेटे,

शुरू कहीं से करूं मगर, हिंदी में ख़तम मैं करता हूँ..

केशव का हो कठिन काव्य, या मधुर छंद रसखान के हों,

मैं कबीर का समझ के दर्शन, सूर के रस में रमता हूँ..

तुलसी सदृश दास हिन्दी का, बन कर स्वयं समर्पित हो

मातृ रूपिणी हिन्दी तुमको, नमन कोटिशः करता हूँ…

—प्राणेन्द्र नाथ मिश्र


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Hindi Poem on Daughter | में बेटी हूँ

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए एक ऐसी कविता “Hindi Poem on Daughter | में बेटी हूँ” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आपको बेटियों पर गर्व महसूस होगा|


Hindi Poem on Daughter | बेटीयों और बहनों की अस्मिता का सवाल है

दरीन्दगी से भरे मानुष रूप किसे किसका ख्याल है,
लूट रही है इज्जत और झूठों का मायाजाल है|
21वीं सदी में मनुष्य का मनुष्य ही काल है,
बेटीयों और बहनों की अस्मिता का सवाल है||
घूम रहे हैं भेड़िये निर्भीक हर चौराहे पर,
उनकी जान बचाने के लिए…
कुछ भेड़िये खाल ओढ़े बैठे हैं संसद भवन पर.
कुछ तो अर्थों से बलात्कार का परिभाषा…
प्रयत्न करते बदलने का|
ये राम नहीं दूशासन का काल है.
बेटियों और बहनो की अस्मिता का सवाल है||
बेटियों और बहनों के साथ होता रहा दुर्व्यवहार,
खुद को सामाजिक समझने वाला इंसान
देखता रहा हर बार…
न्याय व्यवस्था फीकी है उम्मीद करें तो किस पर,
पुलिस प्रशासन सोयी है भीभीषण की गहरी नींद में
किसी की बहन होना किसी की बेटी होना
अब हो गया जी का जंजाल है….
बेटियों और बहनो की अस्मिता का सवाल है||
अब तो जागो मानवों अगर है तुममे मानवता,
दिखा दो गीदड़ों को तुम अपनी विशेषता|
सजा दो ऐसी दुस्टों को कांप जाए उनकी रूह भी,
बहन, बेटी, भाई सभी से है अब गुहार…
खोलो आँखे अपनी और अत्याचार पर करो प्रहार||
अब हम सब को मिल कर यह करना कमाल है,
बेटियों और बहनों की अस्मिता का सवाल है||
विजय नारायण

में बेटी हूँ

जी हाँ! में बेटी हूँ,
जिसके जन्म लेती ही…
माता पिता करने लगते हैं उसके दहेज़ की व्यवस्था|

जी हाँ! में वही बेटी हूँ,
में जनि जाती हूँ लक्ष्मी के रूप में भले…
पर मुझ पर किए जाते हैं अन्याय अनेक|

जी हाँ! में बेटी हूँ,
जिसके लिए नारे लगाए जाते हैं कई…
परन्तु कोख में ही ख़त्म कर दिया जाता है मुझे!
और तो और पढने से भी वंचित रखा जाता है मुझे|

जी हाँ! में वही बेटी हूँ,
पढ़ लिख कर आगे बढ़ना चाहती हूँ में,
समाज की इस व्यवस्था को बदलना चाहती हूँ में|

रचयिता – सपना कुमारी साह


बेटी

चहकतेविहान का आफ़ताब है बेटी,
महकते शाम का महताब है बेटी|

ज़िन्दगी के छंदों का अलंकार है बेटी,
कविता के पन्नों का संस्कार है बेटी|

वत्सल के श्रृंगार का रस है बेटी,
कल के संसार का यश है बेटी||


तुम मेरी सखी बनोंगी ना

सुख में दुःख में संग मेरे रहना,
तुम मेरी सखी बनोंगी ना!

जब में रुठुं, तुम मुझे मानाने आना…
हंस दो न बस एक बार,
बोल-बोल कर मुझको गले लगाना…
बोलो ऐसा करोगी ना,
तुम मेरी सखी बनोंगी ना!!

माँ, आज यह पहनों…आज यह ओढो,
कहकर मुझसे लाड जाताना…
आज यह खाना…आज वह खाना,
अपनी फरमाइशें बताना…
खूब प्यार में करती तुमसे,
तुम भी इतना प्यार करोगी ना ?
तुम मेरी सखी बनोंगी ना||

रचयीता – निभा अम्बुज जैन


अन्याय देखकर आंख उठाती,

नही तो लज्जा का अवतार है।

कितने कष्ट भी उसने झेले,

पर सहनशीलता भरमार है।

टूटने लगता जो कभी हौसला,

तो बनती सच्ची ढार है।

छेड़ो कभी जो राक्षस बनकर,

तो “दुर्गा” सी अंगार है।

रचयिता – प्रिया त्रिपाठी


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Hindi Poem on Single | हम सिंगल है

साथियों नमस्कार, आज का हमारा यह आर्टिकल “Hindi Poem on Single | हम सिंगल है” हम खास तौर पर उन युवाओं के लिए लेकर आएं हैं जो सिंगल हैं| आशा है आपको हमारा यह आर्टिकल पसंद आएगा|


Hindi Poem on Single | हम सिंगल है

हम सिंगल है,
ऐसा नहीं कि हमें प्यार नहीं हुआ…
हुआ और ना जाने कितनी बार हुआ,
पर उनकी कसम कभी ऐतबार ना हुआ!!
एक तरफा रह गया कभी तीर उनके दिल के पार ना हुआ,
हम सिंगल है,
ऐसा नहीं कि हमें प्यार नहीं हुआ…
प्यार की लत हमें बहुत बचपन में  लग गई,
और डर की लत उससे भी पहले लग गई!!
ओ हमारे नाम से बदनाम भी हो गई,
पर डर के आगे जीत है मेरे जीवन में बस कहनाम रह गई!!
हम सिंगल है,
ऐसा नहीं कि हमें प्यार नहीं हुआ…
उनके हमारे मोहब्बत के किस्से सरेआम हो गए,
हम छोटे से गांव में भी रहकर बदनाम हो गए!!
जब दौर आया मोहब्बत के इजहार का,
तब हम उनके लिए आम हो गए!!
हम सिंगल है,
ऐसा नहीं कि हमें प्यार नहीं हुआ….
कसूर मेरा मै लड़का हूं रोजी रोटी भी कमाना था,
उनकी याद मिटाने के लिए गांव छोड़ शहर भी जाना था!!
शहर की चकाचौंध ने उन्हें भुला दिया,
लेकिन ये दिल है उनसे कोई अच्छी मिली अब दिल उनका दीवाना था!!
हम सिंगल है,
ऐसा नहीं कि हमें प्यार नहीं हुआ…
Anand Maurya

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Poem on Womens | महिलाओं के लिए कविता

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए “Poem on Womens | महिलाओं के लिए कविता” लेकर आएं हैं जिन्हें पढ़कर आपको महिलाओं और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक प्रोत्साहन मिलेगा| आप इन कविताओं को किसी भी सभा या उत्सव में पढ़कर सुना सकते हैं|


Poem on Womens | हाँ डरती हूँ में

हाँ डरती हूँ में..जब घर से बाहर निकलती हूँ में..
स्कूल के स्कर्ट से लेकर ,साड़ी पहन कर जब भी सफ़र करती हूँ में ..
पता नहीं डर उन घुरती निगाहो का हैं या उन तानो का…
जो अपने आस -पास रोजाना सुनती हूँ में…
हाँ आज कल नहीं बहुत पहले से डरती हूँ में..
समझ नहीं पाई क्यों कुछ कहने से पहले, टोक दिया जाता हैं..
ओर अगर कुछ कहुँ तो ज्यादा समझदार हूँ कह कर बातो का रुख मोड़ दिया जाता हैं!
किचन से लेकर ड्राइविंग के उदाहरणो के जुबानी तारो में बांध दिया जाता हैं
हाँ में उन जुबानी तारो को तोड़ने से डरती हूँ ..
क्यों की में खुद से जुड़े लोगों ओर रिश्तो का लिहाज करती हूँ,
हाँ शायद इसलिए खुद से डरती हूँ में..
काश मेरे घरवालो ने मुझे ना डरना सिखाया होता..
इस सोच को बस अपनी सोच में ही रखती हूँ में..
जैसे मुझे रोका जाता था..
आने वाली पीढी को में बस थोड़े बदले हुए अन्दाज से टोकती हूँ में..
क्यों की आज से नहीं जन्म से समाज में मेरे चारो ओर खड़े रहे जो,
उन अनदेखे चार लोगों से आज भी डरती हूँ में..
हाँ आज से नहीं सदियों से डरती हूँ में..
अनीता दयाल 

Women’s Day Quotes Poems | महिलाओं के लिए कविता

मेरी उम्र पूछने वाले,
मेरी तकदीर का लिखा कैसे जान जाते हो…
अठारह कहूँ तो  संभलकर रहना बहक जाऊँगी,
यह कैसे कह जाते हो!!
और इककतीस कहूँ तो शादी नहीं होगी,
इसका इतना दुख तुम कयो मनाते हो…
मेरी उम्र पूछने वाले,
मेरी तकदीर का लिखा कैसे जान जाते हो!!
अरे मेरी उम्र पर नजर रखने वाले पहले अपनी तो जी ले,
महज कुछ पलों के राही थोड़ी सी तो सीख ले ले…
तुझे एहसास भी है इस उम्र के खेल में मैंने कितना कुछ हारा है,
मेरी उम्र पूछने वाले मेरी तकदीर लिखा कैसे जान जाते हो ॥

खुद के लिए जीना चाहती हूँ  | Poem on Women’s Empowerment

शौर-शराबे और इस हलचल से दूर,
शांत जीवन जीना चाहती हूँ…
जीती रही अब तक सबके लिए,
कुछ पल अब खुद के लिए जीना चाहती हूँ!!

उन्मुक्त सरिता की तरह मेरा मन,
सिमटता रहा जीवन-कूप के भीतर,
फैला था चरों और मरुस्थल,
धरा टेल फिर भी बहता रहा निर्झर!!

संघर्ष करते करते,
शायद अब मायने ही खो गए…
समंदर में उतारते,
लहरों के भंवर में खो गए!!

वसुंधरा सी सहनशीलता,
है मुझमें सागर सी गहराई,
संसार चक्र की धुरी बनी,
ममता ने जो ली अंगडाई!!

हूँ आदि, मध्य और अंत भी में ही,
जीवन का मूल और सृष्टिकर्ता भी में ही!!


स्त्री शक्ति | Poem on Womens

कभी किसी स्त्री को कम मत समझना,
ब्रह्मा विष्णु शिव जिसके सामने शीश झुकाए,
वह जगदंबा कहलाए!!

हर स्त्री में जगदंबा का वास है,
हर स्त्री में कुछ ना कुछ खास है…
तीनो लोक जिस के गुण गाए,
वह जगदंबा कहलाए!!

जिसके होने से यह जीवन चक्र चलता जाए,
वह एक माँ कहलाए…
जो हर वक्त पुरुष को उसकी रक्षा का एहसास दिलाए,
वह बहन कहलाए !!


वो फिर उठ खड़ी होगी | Hindi Poems on Nari Shakti

वो फिर उठ खड़ी होगी,  तुम्हें राख कर देगी…
वो जवाला है तबाह बेहीसाब कर देगी!!
करके जो उसका अस्तित्व समाप्त, तुम खुश हुए बैठे हो…
अपने को ज्यादा और उसे कम समझे बैठे हो!!
वो फिर उठ खड़ी होगी, शमशीर बना लेगी…
तोड़ कर सारी जंजीरे, अब वो अपनी तकदीर बना लेगी!!
घर हो चाहे कचहरी, हो चाहे कोई भी व्यवसाय…
सूझबूझ से देगी वो अपनी राय!!
रोंद के यह जंगल वो फिर वा़पस आएगी,
पोछ के वो आँसू फिर तुमहे ललकारे गी!!
वो फिर उठ खड़ी होगी, तुम्हें राख कर देगी,

वो जवाला है तबाह बेहीसाब कर देगी!!


रुकती नहीं हूँ | महिला शशक्तिकरण के लिए कविता

गिरती हूँ उठती हूँ
चहकती हूँ बहकती हूँ
सहमती हूँ मुस्कराती हूँ
गूँजती हूँ गाती हूँ
बस……….
रुकती नहीं हूँ
मेरी नींव कुछ य़ूं मजबूत हो चली हैं
कि मैंने ठहरना नहीं दौड़ना सीख लिया है
बिना पंखों के उड़ान भरना सीख लिया है
मैंने सहेली के साथ साथ पहेली बनना सीख लिया है
मैंने अपना रास्ता खुद तय करना सीख लिया है
मेरी नींव इतनी मजबूत हो चुकी हैं
की मैंने अहसान लेना छोड़ दिया है
Poem on Womens
Ritika Pathak

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Poem on Mother in Hindi | माँ पर कविता

भूख-Hindi Kavita

Poem on Lockdown | लॉकडाउन पर कविता

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए “Poem on Lockdown | लॉकडाउन पर कविता“लेकर आएं हैं आशा है आप सभी अपने-अपने घरों में सुरक्षित होंगे|


Poem on Lockdown | लॉकडाउन पर कविता

हर रोज़ सन्नाटा यहाँ हर रोज बढ़ते हैं फासले,
रोज मोतें हो रही, हर रोज़ बढ़ते मामले!
वो वक़्त के मजदुर है साहब पर वक़्त से मजबूर है
सभी जगह लग गए ताले, वो जाएं कहाँ जो मीलों दूर है!!

जीवन की गति अवरुद्ध है, गतिरुद्ध है सारा शहर…
हर रोज बेबसी है, हर रोज़ बस है कोरोना का कहर!!
आना जाना हुआ बंद, बंद हुई सारी यात्राएं,
घरों में कैद होकर यह व्यथा अब किसे सुनाएं!!

पहले सी दिखती नहीं अब रौनकें बाज़ार की,
हर जगह मंदी पड़ी है व्यापै की!!

Poem on Lockdown | लॉकडाउन पर कविता


सन्नाटे का शोर है

सन्नाटे का शोर है
कोरोना का जोर है

धरती सूनी ,सूना अंबर , मानव है कैद घरों के अंदर ।
लॉकडाउन का जोर है

सन्नाटे का शोर है ।

लॉकडाउन का पालन कर हंसते – हंसते
हाथ किसी से ना मिला करले नमस्ते ।

दूर . दूर रहकर भी निभाओ रिश्ते
इस चुनौती को स्वीकार करो हंसते – हंसते ।

सन्नाटे का शोर इक दिन मिट जाएगा
जब विश्व से कोरोना का कहर हट जाएगा ।

Poem on Lockdown | लॉकडाउन पर कविता


“प्रभु और मानव संवाद “

प्रभु आई तेरे द्वार करो स्वीकार अरज है हमारी,
प्रभु दूर करो महामारी।।

चारों ओर हाहाकार मचा,
कोरोना का तांडव है मचा।।

प्रभु वायरस से मुक्त कराओ,
हमे इससे बचाओ, अरज है हमारी प्रभु राखो लाज हमारी।।

प्रभु मानव हैलाचार पडा,
सबका व्यापार है ठप्प पडा।।

प्रभु दूर करो ये तबाही,
प्रभु मिटाओ ये महामारी।।

प्रभु सूनी धरती सूना अंबर,
मानव है कैद घरो के अंदर।।

अब हम है लाचार,
आप ही करो उद्धार।।

प्रभु दूर करो महामारी

तब प्रभु ने कहा – हे मानव !!

मैने धरती पर तुम्हें भेजा था,
पर सेवा का उपदेश दिया।।

तूने मानी ना बात हमारी
मै कैसे करूं मदद तुम्हारी।।

तूने धरती पर अत्याचार किया,
भ्रष्टाचार किया दुराचार किया।।

अब दंड की पारी तुम्हारी,
मै कैसे करूं मदद तुम्हारी।।

नारी का तूने अपमान किया,
कन्याओं से दुराचार किया।।

बढ गई थी ताकत तुम्हारी,
इसलिये औकात दिखाई तुम्हारी ।

मैने मानवता का तुम्हें ज्ञान दिया
तुमने जात-पात मे बांट दिया।।

मानव ने मानव पर अत्याचार किया,
सारी प्रकृति को तूने वीरान किया।।

तूने किसी की ना देखी लाचारी,
अब भुगतने की तेरी बारी।।

मैने पहले भी तुम्हें चेताया था,
बद्रीनाथ मे तांडव मचाया था।।

पर तूने ना दिखाई समझदारी,
तू भी समझ मेरी लाचारी।।

अंबर मे तूने छेद किया,
धरती को भी तूने भेद दिया।।

मैने लाख तुम्हें सचेत किया,
पर तूने मुझे ही चुनौती दे डाली।।

अब जात-पात का भेद मिटा,
मानवता के गुण मन मे जगा।।

माता-पिता का मान बढा,
मातृभूमि का सम्मान बढा।।

मुझसे टकराने की तू मत कर तैयारी,
तभी मदद करुंगा तुम्हारी।।

Poem on Lockdown | लॉकडाउन पर कविता


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माँ पर कविता | Poem on Mother in Hindi

प्यार भरी शायरी | Love Quotes in Hindi

Poem on Life in Hindi | जिंदगी से क्यूँ डरना

जिंदगी से क्यूँ डरना

साथियों नमस्कार, आज के अंक में हम आपके लिए लेकर आएं हैं Hindi Short Stories की लेखिका “रुपाली सिंह” द्वारा लिखी ज़िन्दगी से जुडी एक ऐसी कविता “जिंदगी से क्यूँ डरना | Poem on Life in Hindi” जो आपको ज़िन्दगी जीने के नए आयामों से अवगत करवाएगी| इस कविता को पढने के बाद आप ज़िन्दगी  को एक नए सिरे से देखना शुरू करेंगे| आशा है आपको हमारा यह संकलन ज़रूर पसंद आएगा|


जिंदगी से क्यूँ डरना | Poem on Life in Hindi

क्यूँ डरना की जिंदगी में क्या होगा…
क्यूँ डरना की किसी खास व्यक्ति को खोने से क्या होगा.. जीवन तो बदलाव का रूप हैं..
प्यार का पैगाम हैं.. मिलने – बिछड़ने का पयाम हैं..
ये काफिलों का सिलसिला नए – पुराने मुसाफिरों के साथ तय होता रहेगा…

जब पता हैं, जिंदगी मिलने – बिछड़ने का पयाम हैं.. प्यार का पैगाम हैं…
तो यूँ भयभीत होकर राह तय करने से क्या होगा…
स्वाभिमान की लड़ाई नहीं होती हैं आसान….
आहे इसकी होती हैं तूफान…
सांसो मैं होती हैं घुटन..
सीने मैं होती हैं बहोत सी चुभन…

पर आज सच्चाई के लिए नहीं उठे,
तो सारी उम्र एक बात के लिए यूँ रो – रोकर क्या होगा..
रोना – हँसना, गुस्सा होना और उम्मीदों को कायम रखना…
भावनाओ के प्रकार हैं.. इन्हें प्रदर्शित करने का ज्ञान नहीं…
तो, यूँ दूसरों पर इल्जाम लगाने से क्या होगा..

Rupali Singh
MUMBAI


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“Poem on Nature in Hindi | प्रकृति पर कविता”

वाह प्रकृति तेरी लीला न्यारी
कहीं मड़ते बादल,
कहीं बरसता पानी,
कभी चलती तेज हवाएं,
कभी बिल्कुल थम जाती,
वाह प्रकृति तेरी लीला न्यारी,
कभी सूरज की रोशनी ,
तेज चिलचिलाती,
घनी अंधेरी रातों में,
चाँद तारे की रोशनी टिमटिमाती,
वाह प्रकृति तेरी लीला न्यारी, 
कहीं काले आसमां,
तो कहीं सफेद का रूप ले लेती,
कहीं फूल मुरझाये,
तो कहीं नयी कलियाँ खिलती प्यारी,
वाह प्रकृति तेरी लीला न्यारी,
कहीं सर्दी में लकड़ियाँ जलती,
कहीं वर्फ से ढकी गालियाँ मिलती,
हर समय, हर छड़,
तू बदलती प्यारी,
वाह प्रकृति तेरी लीला न्यारी, 
कहीं सुबह ओस की बूंदे,
तो कहीं सूरज की किरणें दिखलाती प्यारी,
जंगलों में मोर नाचता,
और आसमां में चिड़ियाँ चहचहाती प्यारी,
वाह प्रकृति तेरी लीला न्यारी, 
 अजय राजपूत (झाँसी)

“Small Poem on Nature | प्रकृति पर कविता”

किसी ने तुझे तू कहा
तो तुझे सारी रात नींद न आई
सोचता हूँ उसने कैसे
ज़िन्दगी दरवाज़े के बाहर
गुजारी होगी

आदमी चाँद पर पहुँच कर
क्या इतराता है
जब आदमी आदमी का ही
पेट भर न सका

आदमी वो है
जिसने चिड़ियों से दाने छीने
आदमी वो है
जिसने बादलों से पेड छीने

कोई पतंगा घर में घुस आया
तो सहन नहीं कर पाता
आदमी पतंगे के घर में घुस आया है
यह सच भी पचा न सका

नदी को कोसता है
की उसका घर बहा ले गई
सच यह है की
आदमी ने नदियों से रास्ता छिना

फिर भी किस बात पर
इतराता है आदमी
किसी का क्या हुआ जो
आदमी आदमी का न हुआ

© शैलेन्द्र सिंह “अनुपम”

Poem on Nature in Hindi

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