Horror Story in Hindi | बंधन

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए एक ऐसी कहानी “Horror Story in Hindi | बंधन” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आप प्रेम  और परम्पराओं के एक अलग ही पहलु को समझेंगे| सतीश भारद्वाज की लिखी यह कहानी आपको एक अलग ही अनुभव से ओतप्रोत करेगी|


Horror Story in Hindi | बंधन

राजन चार्टर्ड एकाउंटेंट था| उज्ज्वल भविष्य था उसका, एक गरीब परिवार में पैदा हुआ था| लेकिन उसके पिता ने भले बड़ी संपत्ति ना जोड़ी हो परन्तु अपने बेटे और बेटी को शिक्षित करने की तरफ विशेष ध्यान दिया|

एक ही कमरा था उसमें ही एक किनारे पर रसोई थी| कमरे के बाहर आगे खाली पड़ी जगह में शोचालय और स्नानघर बना हुआ था| ये खाली प्लाट और इसमें बना एक कमरा राजन के पिता की पुस्तैनी सम्पति थी| इस एक कमरे के अलावा और कुछ निर्माण करने लायक आय कभी राजन के पिता की नहीं हुई थी|

लेकिन इतनी दुरूह परिस्थति में भी राजन ने CA की परीक्षाएं पास की, जो सभी के लिए प्रेरणादायक उदाहरण था| राजन ने अपनी किताबो के अलावा अन्य किसी बात पर कभी ध्यान ही नहीं दिया था, जिसका असर ये था कि राजन हद से ज्यादा सज्जन था|

लेकिन आज उस खाली प्लाट पर एक सुंदर घर था| इसके लिए राजन की अपनी कमाई तो नहीं लेकिन राजन का CA होना जरुर जिम्मेदार था| राजन के नौकरी लगने के बाद ही राजन के पिता सुरेश ने भी अपनी मुनीमगीरी की नौकरी छोड़ दी थी| वैसे भी एक लकड़ी की टाल पर मुनीमगिरी करके कोई ख़ास तनख्वाह तो मिलती नहीं थी|

राजन सुहाग सेज पर प्रतीक्षा कर रही सुमेधा के निकट आया| सुमेधा भी CA थी| दोनों एक साथ एक ही कम्पनी में जॉब करते थे| बढ़िया तनख्वाह थी दोनों की ही|

उन दोनों का मिलन दोनों को एक स्वप्न के सामान लग रहा था| हालाँकि दोनों पहले से ही प्रेम सम्बन्ध में थे तो दोनों के मध्य की दूरियां और मर्यादाएं तो पहले ही समाप्त हो चुकी थी| लेकिन फिर भी दोनों के लिए ये रात ख़ास थी क्योंकि आज दोनों ने एक दुसरे का वरण सामाजिक परम्पराओं के अनुसार किया था|

उनका कमरा भी उनके स्वप्नों के समान ही अत्यंत सुन्दरता से सजा हुआ था| फूलो से पूरा कमरा और सुहाग सेज सजी थी| कमरे में मद्धिम प्रकाश फैला था| दोनों एक दुसरे से बस आँखों से ही बात कर रहे थे| और आँखों से ही राजन ने सुमेधा के समक्ष अपना प्रणय निवेदन किया, आज फिर|

दोनों अब जब एकदूसरे को पा चुके थे तो एक दुसरे में समा जाना चाहते थे| राजन जैसे ही सुमेधा के निकट गया तो सुमेधा के शरीर की गंध ने राजन के नथुनों को उद्दीपित कर दीया| लेकिन जिस गंध से राजन को मदहोश हो जाना चाहिए था| उस गंध से राजन एकदम से घबरा सा गया|

उसे ये गंध जानी पहचानी लगी| हाँ कभी ये गंध उसके इस कक्ष और उसके जीवन का हिस्सा थी| जब भी रात्रि में या सुबह नहाने के बाद राशि उसके पास आती थी या कमरे में भी आती थी तो ये ही गंध उसके दिमाग में भर जाती थी|

राशि राजन की पहली पत्नी थी…..

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राजन ने पहले कभी भी ये गंध सुमेधा के शरीर में महसूस नहीं की थी| राजन को सुमेधा की शारीरिक बनावट भी एकदम से राशि जैसी ही लगने लगी| उसे लग रहा था जैसे उसने सुमेधा को नहीं बल्कि राशि को ही आलिंगनबद्धकिया हुआ है| राजन जड़वत सुमेधा के पीछे उसे आलिंगनबद्ध किये खड़ा रह गया और उसके मुहं से अनायास ही निकला “रा रा रा …राशि”|

“राशि” इस नाम को सुनते ही सुमेधा पर तुषारापात हो गया|

सुमेधा जो अब तक प्रेम और वासना से लाल हो रही थी अब ये लाली उसके क्रोध के परिणाम में बदल गयी| वो झटके से राजन की तरफ घूमते हुए पीछे हटी और गुस्से में लेकिन फुसफुसाते हुए बोली “आर यु गोन मैड….आज भी उस अनपढ़ जाहिल का नाम याद आ रहा है तुम्हे”

राजन के चेहेरे पर पसीना था इस सितम्बर की रात में भी| वो सकपकाते हुए बोलता हुआ सुमेधा की तरफ बढ़ा “सो सो सो..सॉरी सुमेधा बट मुझे तुम्हारे शरीर से ये खुशबू…..पहले कभी एसी खुशबु नहीं आई तुम्हारे शरीर से”

सुमेधा का मुड़ कुछ ज्यादा ही ख़राब हो गया था| वो एकदम तिलमिलाते हुए बोली “अपनी बकवास बंद करो तुम, तुम्हे मुझमे से उस गवाँर की खुशबु आ रही है या फिर तुम्हे आज बी वो ही याद आती है?”

सुमेधा क्रोध के साथ प्रश्नवाचक दृष्टी से उसकी तरफ देख रही थी|

राजन ने स्थिति को सँभालते हुए कहा “डोंट टेक इट अदरवाइज, प्लीज माई डियर सुम्मु, कौन सा परफ्यूम लगाया है आज तुमने?”

सुमेधा ने झल्लाते हुए कहा “जैसन वु, तुम्हारी उस गवाँर राशि ने कभी इसका नाम भी नहीं सुना होगा, मुझे तो डाउट है कि उसे बॉडी को परफ्यूम करना आता भी होगा| आज हमारी सुहागरात है और तुम उस मरी हुई औरत के ख्यालो में खोये हो|”

सुमेधा के लिए ये बेहद ही निराशाजनक था कि उसकी सुहागरात को ही उसका पति अपनी पहली पत्नी के नाम से उसे पुकारे| राजन ने भी इस परफ्यूम का नाम पहली बार ही सुना था| लेकिन वो अब भी ये ही सोच रहा था कि ये खुशबु उसने राशि के शरीर में एक बार नहीं हर बार महसूस की थी| और फिर उसका वो एहसास… कि उसकी बाहों में सुमेधा नहीं बल्कि राशि है|

उसे ये ही लग रहा था कि वो गलत नहीं हो सकता| राशि और सुमेधा की देह यष्टि में बहुत अंतर था| सुमेधा पतली दुबली थी जबकि राशि का शरीर स्वस्थ था| उसका मस्तिष्क चकरा रहा था| राशि की मौत को एक वर्ष बीत गया था और सुमेधा के साथ राजन के सम्बन्ध ढाई वर्ष से थे लगभग 2 वर्ष से तो वो दोनों हर मर्यादा को लांघ चुके थे|

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लेकिन उसे पहले कभी भी ये महसूस नहीं हुआ| सुमेधा सो चुकी थी या सोने का बहाना कर रही थी| राजन की मन:स्थिति अब बदल चुकी थी| कुछ देर पहले तक वो सुमेधा के अंक में उतर जाने को तैयार था परन्तु अब नहीं| वो भी बेड के एक कोने में लेट गया|

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राजन 4 वर्ष पहले कि यादों में खो गया| राजन के CA का एग्जाम क्वालीफाई करते ही उसकी नौकरी घर के निकट ही एक बड़े कारखाने में लग गयी थी| वो अपनी जिन्दगी से बहुत ज्यादा खुश था| वो शाम को ऑफिस से घर अपनी नयी मोटर साइकिल पर वापस आया था| घर जिसमें बस एक कमरा था वो भी बहुत पुराना निर्माण था|

घर के बाहर ही एक बुल्लेरो गाडी खड़ी थी| जो किसी पडोसीकी तो नहीं थी| राजन अपनी बाइक आंगन में खड़ी करके कमरे में प्रविष्ट हुआ तो देखा दो लोग उसके पिता की ही आयु के बैठे हैं| राजन को देखते ही उसके पिता सुरेश बोल पड़े “लो आ गया”

राजन ने सभी को नमस्कार किया| उन दोनों ने राजन से उसी नौकरी के सम्बन्ध में कुछ बातें की| राजन को ये अभी भी नहीं पता चला पाया था कि ये हैं कौन?

फिर वो दोनों लोग उठकर चलते हुए राजन के पिता सुरेश से बोले “तो देखिएगा जी विचार करके, हम तो उम्मीद लेकर ही आयें हैं”

फिर सुरेश उन दोनों को बाहर तक विदा करने गया|

राजन ने अपनी माँ मंजू से पूछा “कौन थे मम्मी ये?”

मंजू ने गौरवान्वित भाव के साथ कहा “जहाँ गुड़ होगा वहाँ मक्खी तो आयेंगी ही”

राजन के कुछ समझ नहीं आया और हाथ के पंजे को चक्राकार घुमाकर पुन: अपनी उत्कंठा का प्रदर्शन किया|

मंजू ने कहा “तुझे देखने वाले थे बावले”

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राजन ने सुनकर अपने कपडे बदलने शुरू कर दिए|

सुरेश भीतर आया तो मंजू ने प्रश्न किया “ये गाडी इनकी ही थी?”

सुरेश : हाँ इनकी ही होगी, बढ़िया पैसे वाले लोग हैं| मेन मार्किट में ही कई दुकाने हैं, खेती बाड़ी भी अच्छी है और अपना आढत और ब्याज का भी तगड़ा काम है| लाखो महीने का तो किराया ही आता है|

मंजू : कितने बच्चे हैं?

सुरेश : इकलोती लड़की है| बस एक भाई है| दो चाचाओं में से एक के दो लड़के दुसरे के एक्लाद्का और एक लड़की है| अभी तो लड़की के दादा दादी भी जिन्दा हैं| सब एकसाथ ही रहते हैं| देखा है एक बार इनका घर, राकेश कि रिश्तेदारी है इनसे| उसके साथ ही गया था| 1000 गज से भी ज्यादा में बना हुआ है मकान|

मंजू : क्या राकेश ने ही बताया था इन्हें राजन के बारे में?

सुरेश ने सहमती में सर हिला कर जवाब दिया|

सुरेश एक तेज तर्रार व्यक्ति था| पुरे परिवार पर एक कड़ा नियंत्रण था सुरेश का| जबकि राजन एक सीधा युवक था पूरी तरह से पिता के नियंत्रण में रहने वाला| राजन की जिन्दगी का छोटे से छोटा निर्णय भी सुरेश ही लेता था|

मंजू ने निराशा के साथ कहा “लड़की को तो ब्याह दिया क्योंकि दुसरे के घर जाना था| पर बहु तो इस घर में ही आएगी, इस एक कोट्ठे में कैसे कर ले इसका ब्याह?”

सुरेश ने अपनी चिरपरिचित शैली में कहा “तू चुप रह मै सब कर लूँगा”

मंजू चुप हो गयी|

राजन को वैसे भी इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ना था क्योंकि क्या करना है ये सब निर्णय सुरेश को ही लेने थे और इस बात से आज तक राजन को कोई असुविधा भी नहीं हुई थी| बल्कि वो तो आदि था इस व्यवस्था का, वो अपने पिता के बिना एक छोटा सा निर्णय लेने में भी सक्षम नहीं था| उसे सब किताबी कीड़ा कहते थे|

अपनी अतीत की यादों में खोये पता नहीं कब राजन को नींद आ गयी और सुमेधा भी सो चुकी थी|

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सुबह राजन की आँख एक हलकी सी गुनगुनाहट से खुली| जब उसके कानों में मधुर स्वर लहरी गूंजी “सजना है मुझे.. सजना के लिए …हाँ हाँ …हाँ हाँ ..हाँ हाँ.. ह्म ह्म ह्म ह्म ह्म ह्म”

राजन के सामने राशि साक्षात् खड़ी थी अपने उस चिरपरिचित अंदाज़ में ही| गीले खुले बालों में बालों की नोंक तक आ गयी पानी की बुँदे मोतियों की तरह लग रही थी| ये गाना राशि अक्सर गुनगुनाया करती थी|

राजन एकदम से हडबडा कर उठ खड़ा हुआ| उसके चेहेरे पर पसीना था और घबराहट में उसकी आँखें फटकर गोल हो गयीं थी| सुमेधा ने उसका कन्धा जोर से झटकते हुए कहा “क्या हुआ राजन? राजन..राजन तुम ठीक तो हो?”

सुमेधा ने अपने नर्म हाथो में उसका चेहरा ले लिया और उसे अपनी छाती से लगाने की कोशिश की लेकिन राजन ने झटक कर उसे अपने से अलग कर दिया और सीधा प्रश्न किया “कौन सा गाना गा रहीं थी तुम?”

सुमेधा के कुछ समझ नहीं आया और वो राजन के निकट जाती हुई बोली “ये हो क्या रहा है तुम्हे?”

राजन ने अब थोडा गुस्से में पूछा “यार बस ये बताओ तुम कोई गाना गुनगुना रहीं थी क्या?”

सुमेधा ने घबराते हुए कहा “हाँ यार अब इसमें क्या प्रोब्लम है?”

राजन : कौन सा गाना गा रहीं थी ?

सुमेधा ने थोडा सा अपने दिमाग पर जोर डालते हुए जवाब दिया “सजना है मुझे सजना के लिए”

फिर सुमोधा ने राजन से पूछा “क्या हुआ तुम कुछ नार्मल नहीं लग रहे”

राजन बिना कुछ जवाब दिए कमरे से बाहर चला गया|

सुबह से दोपहर होते होते राजन कुछ सामान्य हो चला था| लेकिन वो सुमेधा के ज्यादा नकट नहीं आया था| वैसे भी आने जाने वालो का तांता लगा था| शाम को ही सुमेधा के परिवार वाले उसे लेने आ गए| एक दिन सुमेधा अपने घर रहने वाली थी फिर वापस आकर दोनों सिंगापूर जाने वाले थे, हनीमून के लिए|

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राजन अकेला अपने कमरे में था| वो सुबह और रात की घटनाओं के बारे में ही सोच रहा था| सुमेधा को राजन ने पहले भी गुनगुनाते हुए सुना था| राशि और सुमेधा की आवाज़ में बड़ा फर्क था और शैली में भी|

जहाँ सुमेधा एक बड़े शहर से थी और उच्च शिक्षित थी  तो उसकी भाषा शैली बहुत ही नियंत्रित थी, राशि की भाषा शैली देशज थी क्योंकि उसका जीवन एक छोटे से कस्बे में बीता था और वो पढ़ी हुई भी बस इंटर तक ही थी|राशि एक सामान्य से ज्यादा स्वस्थ देहयष्टि, गौरवर्ण और एक मोहक चेहरे की स्वामिनी थी|

देहाती परिवेश में पली होने के कारण उसके स्वभाव में हिचकिचाहट थी, वो ज्यादा खुलकर वार्तालाप नहीं कर पाती थी और जहाँ तक फैशन और कपडे पहनने की समझ है तो परम्परागत और सिमित ही थी| जिस कारण वो 16 श्रृंगार तो कर सकती थी परन्तु स्वयं को एक आधुनिक नारी के रूप में ढाल पाने की समझ उसमें नहीं थी|

दोनोकी आवाजें भी एकदम भिन्न थी लेकिन फिर भी सुबह जो आवाज़ राजन ने सुनी थी वो एकदम राशि की ही आवाज़ थी| राशि की मौत के बाद एक वर्ष तक राजन को कभी ये एहसास नहीं हुआ कि राशि कभी उसकी जिन्दगी में थी भी| बल्कि शादी के बाद जैसे ही उसके जीवन में सुमेधा आई तभी से राजन के लिए राशि महत्वहीन हो गयी थी|

राशि के जीवित रहते भी कभी राजन को उसकी उपस्थिति अपनी जिन्दगी में महसूस नहीं होती थी| शादी के एक वर्ष बाद से ही राशि राजन के परिवार के लिए एक बोझ बन गयी थी|

राजन पुन: अपनी अतीत की यादों में खो गया| जब उसके रिश्ते की बात राशि से चल रही थी|

राशि के पिता ने सुरेश को भरोषा दिया कि राशि उनकी अकेली लड़की है और वो उसके लिए राजन जैसा ही सज्जन लड़का तलाश रहे थे| सुरेश भी उत्साहित था कि उसके CA पुत्र के कारण एक अमीर परिवार में उसकी रिश्तेदारी हो रही है| सुरेश के सामने बस एक ही समस्या थी उसका एक कमरे का घर वैसे उस प्लाट का आकार तो पर्याप्त था लेकिन उसमें निर्माण को काफी पैसा चाहिए था|

राशि के पिता ने सुरेश को विश्वास में लेते हुए कहा “सुरेश जी मेरी एक लड़की है| बहुत सोच रखा है उसके लिए, मुझसे आप दावत से अलग 50 लाख नकद ले लो और उसका क्या करना है आप खुद देख लेना| लेकिन शादी जल्दी ही करनी पड़ेगी, मेरे बेटे का रिश्ता पक्का हो चूका है उन्हें बस इसलिए रोक रखा है कि पहले बेटी की शादी करूँगा”

सुरेश के दिमाग में सारे समीकरण घूम गए थे| उसने कृतज्ञता प्रकट करते हुए राशि के पिता से कहा “ये तो जी आपकी महानता है| मेरे पास तो जी बस मेरी औलाद ही है संपत्ति के नाम पर| आप कहाँ और हम कहाँ? समस्या ये ही है जी कि इस एक कमरे में कैसे बहु को ब्याह कर लाऊं?”

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राशि के पिता ने अब थोडा खोलकर सारा समीकरण समझाया “देखो जी राशि का 50 लाख राजन का ही है| दो तीन महीने में मकान खड़ा हो जाता है| प्लाट आपका है ही बढ़िया, शादी के बाद जब तक गौना होगा तब तक तो जी मकान बनके खड़ा हो जागा”

हालाँकि ये समीकरण सुरेश के दिमाग में भी था लेकिन वो अपने मुहँ से बोलने से बच रहा था| सुरेश के पास कुल संपत्ति के नाम पर बस ये एक प्लाट ही था| इसकी कीमत भी ज्यादा से ज्यादा 25 लाख होगी, बाकी इससे अलग कुल जमा तो 2 लाख भी सुरेश के पास नहीं थे| जो थे वो भी राजन की तनख्वाह ही थी|

बिटिया की शादी का 3 लाख का क़र्ज़ भी सुरेश पर था| सुरेश के भीतर की मज़बूरी और लालच को राशि के पिता ने अपने प्रस्ताव से बंधक बना लिया था|

राजन और राशि का विवाह हो गया| सुरेशकी उम्मीदों से भी ज्यादा ही बढ़िया शादी हुई थी| लेकिन जिन 50 का वादा था उसमें थोड़ी सी कमी रह गयी थी| राशि के पिता ने 25 लाख नकद दिए थे और 25 लाख की एक फिक्स करवा दी थी|

सुरेश ने जब ये प्रश्न किया तो राशि के पिता ने समझा दिया “25 लाख में तो जी मकान भी बन जागा और जो समान एसी-टीबी हो वो भी आ जागा| बाकी वो 25 लाख पहले से ही फिक्स थे जी, बीच में तुडवा के आपका ही नुकसान होगा| आप मकान का काम छेड़ो जी, क्यूँ अपनी फिक्स तोड़ो? जो कुछ कमी बेसी रह जागी तो हम हैं जी| अब राजन थारा ई ना म्हारा भी बेट्टा है जी”

सुरेश को भी ये बात सही लगी| वैसे भी राशि के पिता ने वो 25 लाख की फिक्स सुरेश को सौंप दी थी|

शादी के बाद राजन की सुहाग रात नहीं मन सकी थी क्योंकि एक ही कमरा था| राजन जिसने कभी ब्लू फिल्म भी ढंग से नहीं देखी थी उसके लिए ये एक बड़ी सजा के सामान था| राशि अपने घर गयी और पुरे तीन महीने बाद गौना होकर वापस आई जबतक मकान बन चूका था|

विवाह के तीन महीने बाद राजन और राशि का मिलन हुआ था|

अपने अतीत की यादों में खोये हुए ही राजन को नींद आ गयी|

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सुमेधा अपने घर से वापस आ गयी| अज रात सुमेधा अपनी सुहाग रात को एक बार और विशेष बना देना चाहती थी| वैसे तो इन दोनों के मध्य शादी से पहले भी कुक ऐसा बचा नहीं था जो विशेष हो|

राजन को सुमेधा ने कमरे से बाहर भेजा और 30 मिनट बाद आने को कहा| 30 मिनट बाद जब राजन कमरे आया तो वो सुमेधा को देखता ही रह गया|

सुमेधा ने एक बेहद ही उत्तेजक लाल रंग की लौन्जरी पहनी थी| उस पारदर्शक लौन्जरी में सुमेधा के पतले शरीर के पुष्ट उभार और भी ज्यादा उभर कर दिखाई दे रहें थे| राजन वैसे भी सुमेधा का दीवाना था तो उसके इस रूप ने राजन को सम्मोहित कर दिया|

राजन के भीतर एक बेसब्री जाग गयी और उसने झटके से अपने सारे कपडे उतार कर सुमेधा को बाहों में भर लिया| दोनों एक दुसरे में समां जाने को आतुर थे| दोनों ने एक दुसरे के शरीर को अपने मुहँ के द्रव्य से सराबोर कर दिया था|

राजन उत्तेजना के वशीभूत एकदम पागल सा हो चूका था| इस सब में राजन का बाजू सुमेधा की गर्दन पर आ गया और उसका दबाव इतना ज्यादा हो गया कि सुमेधा का दम घुटने लगा| राजन सुमेधा के कानों को चूम रहा रहा था और अपनी प्रणय यात्रा को तीव्रता से आगे बढ़ा रहा था|

सुमेधा ने अपनी घुटी सी आवाज़ में राजन से कहा “मार कैई दम लोगे क्या?, मेरा गला दबा दिया तमनै तो”

ये शब्द राजन के कानों में बिजली की तरह कौंध गए, वो ही आवाज़ और वो ही शब्द और वो ही भाषा शैली| उसने झटके से ऊपर उठते हुए देखा तो कमरे के नाईट बल्ब की हलकी नीली रौशनी में उसे अपने आगोश में राशि दिखाई दी| वो झटके से पीछे हट गया| उसके मुहँ से एक भयाक्रांत आवाज़ निकली “राशि”|

आज फिर सुमेधा के सपनो पर प्रहार हो गया था| सुमेधा जल उठी थी, वो लगबघ चीखते हुए बोली “तुम पागल हो चुके हो, अपना इलाज करवाओ समझे”

राजन एकदम से यथार्थ में वापस आया था| उसने सुमेधा के आगे हाथ जोड़ने की मुद्रा में कहा “प्लीज चिल्लाओ मत सुम्मो, पापा मम्मी जाग जायेंगे”

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सुमेधा एकदम से शांत हो गयी और गुस्से में बोली “तुम क्या बक रहे हो, वो भी तो देखो”

सुमेधा आज कुछ ज्यादा ही अभद्रता पर उतर गयी थी| राजन ने सुमेधा से कहा “तुमने क्या बोला था …वो कुछ ऐसा.. “मार कैई दम लोगे क्या?…”

सुमेधा ने अपने माथे पर हाथ रखते हुए कहा “अब यार जब तुम मेरा गला दबाओगे तो कुछ तो कहूँगी ना| या फिर मर जाऊं…यु आर सच अ डैम डंप”

राजन ने गुस्से में कहा “मेरा हाथ तुम्हारे गले पर नहीं था…और इतने देशी अंदाज़ में तुम बात नहीं करती”

सुमेधा : तो मै झूठ बोल रहीं हूँ क्या? मै तुम्हारी तरह बेवकूफ नहीं समझे| अगर तुमसे कुछ नहीं होता है या फिर आज भी तुम्हे उस गवाँर की ही याद आती है तो मुझसे शादी क्यों की? और किसी देशी अंदाज़ में नहीं बात की मैंने, मैंने बस ये कहा “गला घूंट रहा है मार डालोगे क्या?”

राजन को अब अपनी गलती का एहसास हुआ तो उसने सुमेधा से याचना करते हुए उसको बाहों में भरने का प्रयास किया और कहा “सॉरी बेबी, फॉरगेट इट, बट यार तुम तो कभी इस अंदाज़ में बात भी नहीं करती एकदम देशी”

सुमेधा ने झटके से उसे अलग किया और बोली “भाड़ में जाओ यार तुम”

सुमेधा की आँखे सजल हो गयी थी| वो बिस्तर पर जाकर लेट गयी| राजन ने एक बार फिर उसके कंधे को छूने का प्रयास किया तो उसने एक झटके से अलग कर दिया|

राजन भी एक तरफ को लेट गया|

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लेटते ही राजन पुन: अपने द्वन्द में खो गया| राजन को ये ही लग रहा था कि उसका हाथ सुमेधा के गले पर नहीं था| और सुमेधा की भाषा शैली बहुत ही सभ्य है लेकिन वो अंदाज़ तो एकदम देहाती था बिलकुल राशि की तरह| राजन पूर्ण निश्चिन्त था कि वो आवाज़ औ वो शब्द सुमेधा के नहीं वो तो राशि के ही थे|

राजन एक बार फिर अतीत की यादों में खो गया|

शादी के बाद राशि अपने मायके चली गयी थी| दोनों का मिलन अधुरा ही रहा था क्योंकि एक कमरे में जब परिवार के अन्य सदस्य और मेहमान भी हों तो वो संभव ही नहीं था|

लगभग तीन महीने में मकान बना और तब तक राशि अपने मायके में ही रही| इस दौरान राजन और राशि फोन के माध्यम से संपर्क में रहे| राशि की देशज भाषा और शैली राजन को बहुत अच्छी लगती थी| हालाँकि राशि काफी संभलकर बात करती थी लेकिन जैसे ही बातों का दौर लम्बा खींचता तो राशि अपनी नैसर्गिक शैली में पहुँच जाती थी|

तुम या आप की जगह तम बोलकर राजन को संबोधित कर देती थी| राजन को ये बहुत अच्छा लगता था| ऐसे ही और भी कई अपभ्रंश थे जो राजन को राशि की शैली में भाते थे और वो बातो में उलझा कर प्रयास करता कि राशि उन शब्दों को बोले|

दोनों के मध्य बहुत अच्छा समय बीत रहा था| दोनों फोन पर बात करते तो वो अधूरे रह गए मिलन की पीड़ा इनके प्रेम को और भी गहरा कर देती थी| लेकिन फिर भी इस सम्बन्ध में वासना की प्रधानता नहीं थी|

राजन अपनी यादों से वर्तमान में वापस आया तो सहसा ही उसके मस्तिष्क में एक प्रश्न आया कि क्या सुमेधा उन परिस्थितियों में उसे अपनाती? जब उसके पास रहने को घर भी नहीं था| फिर उसने स्वयं को ही उत्तर दिया “नहीं…कभी नहीं”

वो ना चाहते हुए भी पुन: अतीत में खोने लगा|

राशि ससुराल वापस आ गयी थी और आज कोई कारण नहीं था जो इन दो आत्माओं के मिलन को रोक सके|

दोनों के मिलन की बेला वो खुबसूरत रात आ गयी थी| जैसा सामान्यतया होता है, ऐसी इनकी सुहागरात थी ही नहीं| क्योंकि शादी के तीन महीने बाद ना तो कोई हँसी ठिठोली करने वाला था और ना ही कोई ऐसा जो इनकी सुहाग सेज को फुलों से महकाता या सजाता|

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जब सुहाग रात थी तब ये संभव नहीं हो पाया था और तीन महीने बाद, आज कोई औचित्य नहीं था इस सब का| परन्तु एक सुहाग रात को सुन्दर और अविस्मरणीय बनाने हेतु फूलों से सजी सुहाग सेज नहीं बल्कि दो प्रेम करने वाले ह्रदय चाहिए होतें हैं| और इन दोनों का प्रेम एक दुसरे के प्रति अविरल और निश्छल था|

दोनों ने ही आज से पहले अपने परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त किसी विपरीत लिंगी के साथ कोई आत्मीय संपर्क नहीं रखा था| राजन कभी अपनी किताबों से बाहर नहीं आ पाया था तो राशि ने कभी अपने परिवार के कड़े अनुशासन में पारिवारिक मर्यादों को नहीं लांघा था| दोनों एकदूसरे से मिलन को तडपे थे तीन महीने तक|

प्रेम क्या है? ये दोनों को अपने विवाह के बाद मिली इस विरह वेदना ने बताया था| लगातार हुई फोन के माध्यम से बातचीत ने दोनों मध्य व्याप्त झिझक को दूर कर दिया था और दोनों ने एकदूसरे को अपने ऊपर पूर्ण अधिकार प्रदान कर दिया था|

प्रारम्भ में इन दोनों के मध्य इतनी ज्यादा झिझक थी कि इनकी रिंग सेरेमनी में जब दोनों ने एकदूसरे को अंगूठी पहनायी तो सभी ने इन दोनों के चेहेरे की घबराहट और चेहेरों पर आये पसीने को देखा था| खूब मज़ाक उड़ाया था सभी ने इनका|

राजन को आज भी मिलन की वो पहली रात याद थी| दोनों ने अपने जीवन का पहला चुम्बन लिया था| एकदूसरे के शरीर के स्पर्श ने दोनों को उत्तेजना के चरम पर पहुंचा दिया था| कब शुरवात हुई और कब दोनों संसर्ग पथ पर आगे बढ़ लिए ये दोनों को ही ध्यान नहीं था|दोनों ने एकदूसरे को अपना सबकुछ समर्पित कर दिया था|

इन उत्तेजना और प्रेम के रोमांच से भरपूर क्षणों में राजन का बाजू राशि की गर्दन पर चला गया और अपनी उत्तेजना में राजन को ध्यान ही नहीं रहा और उसने राशि का गला जोर से दबा दिया तभी राशि की आवाज़ आई ““मार कैई दम लोगे क्या?, मेरा गला दबा दिया तमनै तो”

प्यार और उत्तेजना से भरपूर इन क्षणों में राशि की इस बात और इस अंदाज़ पर राजन की हंसी छुट पड़ी और दोनों ही कुछ क्षणों तक हसते रहे थे| ये घटना राजन और राशि की यादों से चिपक गयी थी क्योंकि उनके प्रथम मिलन से जुडी थी ये घटना|

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सुबह राजन अपने ऑफिस चला गया लेकिन दोपहर तक ही वापस भी आ गया| सुमेधा ने छुट्टी ले रखी थी| उनके कमरे में रात हुई बहस के समय सुमेधा तेज़ आवाज में बोल रही थी तो सुरेश और मंजू तक भी आवाजें पहुँच गयी थी|

दोपहर के समय सुमेधा अपने कमरे में अकेले थी और राजन बाहर जाकर बैठ गया था| तभी कमरे के दरवाज़े को किसी ने खटखटाया| राशि ने देखा सुरेश था| राशि बेड से उठकर खड़ी हो गयी और सुरेश भीतर आ गया|

सुरेश ने प्यार से पूछा “और बेटे जी ठीक तो हो? कोई समस्या तो नहीं?”

सुमेधा ने एक औपचारिक मुस्कान के साथ कहा “बढ़िया पापा जी”

फिर सुरेश ने थोडा हिचकिचाते हुए कहा “बेटा जी मुझे नहीं पता देखो रात क्या हुआ और क्यों हुआ? लेकिन तुम्हारी गुस्स्से में चिल्लाने की आवाज़ बाहर तक आ रही थी| कोई दिक्कत हो तो बताओ?…राजन ने कोई गलती की हो तो बताओ?”

राशि ने कहा “कुछ नहीं पापा जी वो बस ऐसे ही बहस हो गयी थी”

सुरेश ने एक सत्यान्वेषण मुस्कान लाते हुए कहा “फिर तुम दोनों आपस में बात क्यों नहीं कर रहे हो”

राशि को अब कुछ सूझ नहीं रहा था क्या कहे? उसने बनाते हुए जवाब दिया “वो पापा ऐसा कुछ नहीं है, नथिंग इज सीरियस, सब ठीक है, आप परेशान मत होइए, ये हम दोनो के बिच का इश्यु है हम दोनों रिजोल्व कर लेंगे”

अब सुरेश ने अधिकार के साथ कहा “देखो बेटा… मै इस घर का मुखिया हूँ| अब कुछ भी होगा तो उसे ठीक करना और देखना मेरा काम है”

राशि को अब सुरेश की बातें अच्छी नहीं लग रहीं थी| उसे ये सुरेश का अपनी व्यक्तिगत जिन्दगी में अनाधिकृत अतिक्रमण लग रहा था| वैसे भी उसकी मन:स्थिति बहुत खराब थी क्योंकि शादी के बाद तीन रातें बीत चुकी थी जिनमे से दो रातें उसने राजन के साथ बिताई थी और दोनों ही रातों में उसको एक बहुत ही खराब अनुभव से गुजरना पड़ा था|

विवाह के बाद जो एक पति पत्नी के मध्य होता है वैसा तो कुछ भी नहीं हुआ था|

सुमेधा ने अब थोडा सख्ती के साथ कहा “पापा आप मुखिया हो इससे मुझे कोई समस्या नहीं, घर के निर्णय आप लेते हो और लेते रहो, आई डोन् माइंड बट …… मेरे और राजन के बीच के मामले को हम ही सुलझाएंगे| उस बारे में आपको मै क्या बताऊ? ……ये हमदोनो पति पत्नी की पर्सनल लाइफ है| इसमें तो आपको या मेरे मम्मी पापा को इंटरफेयर करने का कोई हक नहीं है| और ना ही ये सही है”

सुमेधा ने ये बात बेहद ही कड़क अंदाज़ में कही थी| सुरेश की आगे कुछ बोलने कि हिम्मत ही नहीं हुई|

Horror Story in Hindi | बंधन

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सुरेश बाहर आकर बैठ गया| उसकी हिम्मत ही नहीं हुई किसी और से भी इस विषय में बात करने की| वो पुरानी यादों में खो गया|

उसे याद आया राशि और राजन की शादी को 6 महीने बीत चुके थे| इस दौरान एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि राशि और राजन दोनों अकेले कहीं घुमने गए हों| रिश्तेदारियों में हुए कुछ कार्यक्रमों में भी राशि और राजन यदि गए भी तो सुरेश और मंजू साथ होते थे|

राशि से जुड़े मामलो पर भी राजन अकेले निर्णय नहीं लेता था बल्कि वो पहले सुरेश से पूछता था| यहाँ तक कि राशि की बहुत सी छोटी छोटी खरीदारी के लिए भी राजन बोल देता था कि मम्मी से बोल दो वो ला देंगी|

राशि अपना व्यक्तिगत जरुरी सामान मायके से ही ले आती थी| एक दिन राशि को एक पड़ोस की महिला ने एक टिक्की वाले के सम्बन्ध में बताया तो राशि का भी मन हुआ कि राजन के साथ जाकर खाए|

राशि ने राजन को फोन करके अपनी इच्छा बताई और उसे थोडा जल्दी आने को कहा|

राजन शाम को ऑफिस से आ गया तो राशि तैयार थी| लेकिन राजन ने तबियत खराब होने का बहाना भर दिया|राशी का मुड़ ख़राब हो गया और दोनों के मध्य गर्मागर्मी होने लगी| राजन उसे बाहर ले जाने से बच रहा था|

तभी सुरेश भी कमरे में आ गया और मामले की जानकारी होने पर राशि को बाहर का ना खाने पर खूब लम्बा प्रवचन सुनाया| और चलते हुए कहा “बेटा राशि, कुछ भी चाहिए मुझसे बोल, मै लाकर दूंगा, मै इस घर का मुखिया हूँ, और जैसे मेरे लिए राजन है ऐसे ही तू”

सुरेश अतीत से वापस आया तो उसको याद आया कि उसके इतना कहने पर भी उस दिन राशि कुछ नहीं बोलीथी| लेकिन आज सुमेधा के कड़े शब्द उसके दंभ को भीतर तक भेद गए थे|

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……….

उस रात सुमेधा और राजन में कोई वार्तालाप नहीं हुआ| राजन सुमेधा के निकट जाने से डर रहा था| पिछले दिनों घटी घटनाओं ने उसे बहुत डरा दिया था| जबकि सुमेधा को लगता था कि राजन के दिलो दिमाग पर राशि ही छाई है|

सुमेधा बस ये सोच सोच कर परेशान थी कि जिस राशि से छुटकारा पाने को और उससे शादी करने के लिए पता नहीं राजन ने क्या-क्या किया था? आज बार बार उसे उस राशि की ही याद क्यों आ जाती है?

अगले दिन सुबह ही सुमेधा भी तैयार होकर अपने ऑफिस के लिए चल दी| राजन ने आश्चर्य से पूछा “तुमने तो छुट्टी ली हुई थी”

सुमेधा ने बेपरवाही से जवाब दिया “अरे अब पेंडिंग वर्क बाद में भी तो मुझे ही करना पड़ेगा ना| यहाँ भी कौन सा काम है तो ऑफिस ही चलती हूँ|”

राजन ने समझाने के अंदाज़ में कहा “यार जब लीव सेंक्शन हैं तो क्यों जा रही हो? यहाँ अभी तुमे मिलने के लिए मेहमान भी आ ही जातें हैं| इतनी जल्दी ऑफिस जाना शुरू कर दोगी तो यार….. इसका अच्छा इम्प्रैशन नहीं जाएगा”

सुमेधा पहले से ही क्रोध के आवेग को दबाये हुए थी लेकिन राजन की बात उसे एसी लगी जैसे कि ये तो उसकी अस्मिता का खुला अतिक्रमण है| सुमेधा ने धीमी आवाज़ लेकिन कड़े लहजे में कहा “राजन आई एम् नोट राशि….आई एम् नोट अ ब्लडी फूल एंड इलिट्रेट रूरल वुमन| आई एम् अ प्रोफेशनल एंड आई हैव माई चोइस एंड माई ओन व्यू…सो डोन्ट इंट्रूज़”

राजन को राशि का ये रवैया बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई प्रत्युत्तर देने की|

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अपने ऑफिस में सुमेधा ने काम तो कुछ भी नहीं किया| उसे राजन से किये आने व्यवहार को लेकर भी आत्मग्लानी हुई|

सुमेधा ऑफिस से बीच में ही समय निकालकर सीधे बाज़ार गयी और राजन के लिए कुछ ख़रीदा|

शाम को दोने एकसाथ अपने ऑफिस से वापस आये| सुमेधा का मुड़ अब सही था| रात्रि में जब राजन कमरे में आया तो सुमेधा ने उल्लास के साथ एक गिफ्ट रैप राजन के हाथ में रख दिया|

राजन सुमेधा के चेहेरे पर मुस्कराहट देखकर एकदम ताज़ा हो गया था| राजन ने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुए गर्दन को बलखाते हुए बिना शब्दों के सुमेधा से इस गिफ्ट के सम्बन्ध में पूछा तो सुमेधा ने चहक कर उत्तर दिया “तुम्हारा गिफ्ट है| खोलकर देख लो”

फिर उसने मादक अंदाज़ में अपनी छाती के उभारो को राजन के सामने प्रदर्शित करते हुए कहा “और फिर अपने इस गिफ्ट को भी खोल लेना”

राजन ने तेज़ी से गिफ्ट को खोलना शुरू कर दिया| रैपिंग खोलते ही उसके सामने मुफ़्ती शर्ट्स का एक गत्ते का डब्बा था| राजन ने डब्बा खोला तो उसमें हलके नीले रंग की और गहरे नीले रंग से कढाई की हुई एक सुन्दर कमीज थी|

राजन जिसके चेहेरे पर एक उत्त्सुकता और उल्लास भरी मुस्कान तैर रही थी अब उसके भाव बदल गए थे| उसकी आँखे फट गयी थी और उसके चेहेरे पर पसीना तैर गया था और भय से चीखते हुए राजन ने उस डब्बे को ऐसे दूर फेंक दिया जैसे कि उसके हाथ में कोई बम हो|

सुमेधा भी घबरा गयी थी उसने राजन को पकड़ते हुए कहा “क्या हुआ राजन?”

राजन ने डरते हुए पूछा “कहाँ से लायी ये कमीज तुम?”

सुमेधा ने राजन के माथे पर हाथ रखते हुए कहा “यार ऑफिस के बीच से ही मुफ़्ती कलेक्सन पर गयी थी वहीँ से लायी, आपके लिए”

सुमेधा ने उस पैकेट को उठाकर उसकी जाँच की और बोली “कुछ भी तो नहीं है, हो क्या गया है तुम्हे?”

फिर सुमेधा ने वो पैकेट राजन की तरफ बढाया, लेकिन राजन घबरा कर पीछे हट गया|

राजन तुरंत कमरे से बाहर चला गया और मकान की छत पर जाकर बैठ गया|

सुमेधा परेशान हालत में कमरे में ही खड़ी रह गयी|

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राजन को छत पर भी अकेले डर लग रहा था| उसे बिलकुल समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ हो क्या रहा है| उसने इतनी धीमी आवाज़ में कि वो अन्य किसी को ना सुने आवाज़ लगायी “राशि ..राशि..राशि …राशि”

राजन चारो तरफ देख रहा था| फिर उसने कहा “राशि तुम यहीं हो ना? सामने आओ … अब क्या मरकर भी मेरा पीछा नहीं छोडोगी?”

राजन दिवार से सटकर अपने घुटनों को सिकोड़ कर उनमे अपना सर घुसा कर बैठ गया| बैठे बैठे राजन फिर से अतीत की याद में खो गया|

राशि और राजन के मिलन की रात के अगली सुबह ही जब राजन ऑफिस जाने को तैयार हो रहा था तो राशि ने एक गिफ्ट राजन की तरफ बढाया|

राजन ने गिफ्ट लेते हुए पूछा “क्या है ये?”

राशि ने शर्माते हुए कहा “वो आपके लिए बुरशैट ख़रीदी थी, आज इसे ही पहनकर जाओ ना ऑफिस”

राजन ने खुश होते हुए उस पैक को खोला तो हलके नीले रंग की एक कमीज जिस पर गहरे नीले रंग की सुंदर कढाई थी| आज सुमेधा जो कमीज लायी थी वो हुबहू उस कमीज जैसी ही थी|

राजन झटके से वर्तमान में आया|

राजन का दिमाग चकराया हुआ था| जब भी वो सुमेधा के निकट जाने का प्रयास करता था तो राशि कहीं ना कहीं बीच खड़ी महसूस हो रही थी| ये घटनाएँ बता रहीं थी कि राशि यहीं कहीं हैं, बिलकुल उसके पास… हर समय , हर क्षण|

राजन भागकर नीचे आया| राजन जिस कमरे में आया था ये छोटा सा कमरा था जो स्टोर की तरह उपयोग हो रहा था| राजन ने उसमें से एक छोटा सा लोहे का संदूक निकाला और उसे ऊपर लेकर गया|

छत पर जाकर उसने उस संदूक को खोलकर उसमें से कुछ सामान निकालना शुरू किया| ये वो सामान था जो राशि ने कभी उसे उपहार स्वरुप दिया था| इसमें ही उसने उस कमीज को निकाल कर देखा वो वाकई में हुबहू वैसी ही थी|

राजन की घबराहट अब और ज्यादा बढ़ गयी थी| राजन ने अपना सर पकड़ कर खुद से ही कहा “क्यों रखी थी ये मनहूस चीजे संभालकर मैंने? क्यों?”

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उसे कुछ सुझा और वो भागकर नीचे गया| राजन नीचे से माचिस लेकर आया और उसने उस कमीज को आग के हवाले कर दिया और एक-एक कर के उस सन्दुक के सारे सामान को उस आग के हवाले करता चला गया| उस संदूक में सभी उपहार कपडे या फिर कागज़ के कार्ड थे| इन्होने आग तेजी से पकड़ ली| लेकीन आग की ज्वाला कुछ ज्यादा ही तेज़ हो गयी थी, बहुत ही ज्यादा बुलंद| ये देखकर राजन पीछे हट गया|

तब ही राजन को उस भड़कती हुई आग में ही राशि दिखाई दी| राजन पागलपन में बोला “जाओ, जाओ यहाँ से….कोई नहीं यहाँ तुम्हारा”

लेकिन राशि उस आग की ज्वाला से बाहर आकर राजन के सामने खड़ी हो गयी|

राजन की आँखे पथरा गयी थी| राशि का चेहरा शांत था| राशि ने राजन से कहा “इस आग के फेरे लेकर ही तो तुमसे गठबंधन हुआ था| याद है ना सात जन्मो का गठबंधन जोड़ा था हमने| इस आग के सामने ही मेरे हाथ पर हाथ रखकर आपने भी तो वचन उठाया था कि सात जन्मो तक साथ रहेंगे|

वो गठबंधन हमारे शरीरो का ही नहीं था हमारी आत्माओं का भी था| ये चीज़े जल जाएँगी, मेरा शरीर भी जल गया, लेकिन क्या इस आत्मा को जला पाओगे? और ये आग तो गवाह है उस गठबंधन की, तो याद रखना ये अग्नि ही उस गठबंधन की साक्षि है और ये ही उसकी रक्षा करेगी…. हमेशा”

राशि पीछे को मुड़ी और उस अग्नि की ज्वाला में ही समा गयी| राजन पागलो की तरह चिल्लाने लगा “माफ़ कर दो मुझे….प्लीज राशि माफ़ कर दो मुझे…. मैंने गलत किया…. मेरा पीछा छोड़ दो|”

राजन जोर जोर से चिल्ला रहा था तो सुरेश, मंजू और सुमेधा भी ऊपर आ गए| कुछ पडोसी भी आ गए| सुरेश ने राशि का नाम राजन के मुहँ से सुन लिया था| तो वो राजन को शांत करवाते हुए नीचे ले आया|

………..

सुमेधा ने सुरेश से कहा “पापा एक मिनट बाहर आओ”

सुरेश चुपचाप बाहर आ गया|

सुमेधा ने सुरेश को पिछले दिनों राजन की अजीब हरकतों के बारे में बताया| सुरेश सुमेधा से बोला “बेटा जी राजन बहुत सीधा है जरुर उसके दिमाग में डर बैठ गया है|”

तभी पीछे से मंजू आई और बोली “मंदिर पै बाबा जी कु दिखा लाओ कल कु”

सुरेश ने झल्लाते हुए कहा “तू चुप रहकर, फ़ालतू बोल्लो जा, मै खुद कर लूँगा”

सुमेधा को सुरेश का इस तरह मंजू से बात करना पसंद नहीं था लेकिन अभी उसने इसपर ध्यान नहीं दिया|

सुमेधा ने सुरेश से कहा “पापा हनीमून अभी मै कैंसिल कर रही हूँ| कल ऑफिस न जाकर मेरठ के साईकैट्रीस्ट है बहुत अच्छे, मुझे और राजन को जानते भी हैं, उन्हें राजन को दिखा लेती हूँ”

मंजू ने हिचकते हुए पूछा “वो कौन होवै हैं”

सुमेधा अभी सोच ही रही थी कि कैसे समझाए तभी सुरेश ने जवाब दिया “दिमाग का डाक्टर”

ये सुनते ही मंजू को झटका सा लगा और वो बोली “अरी मेरा लोंडा पागल थोड़ी ना हो गिया| हद करदी तुन्नै तो”

सुमेधा ने माथे पर हाथ मारते हुए अपनी झल्लाहट का प्रदर्शन किया| सुरेश समझ गया था कि सुमेधा अब कड़ा जवाब देने वाली है तो वो मंजू को फटकार लगाते हुए अन्दर ले गया|

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राजन बिस्तर पर तन्द्रावस्था में था| वो बाकी दुनिया से तो दूर अपने अतीत खोया हुआ था|

शादी के कुछ दिनबाद तक सब कुछ एकदम सही था| राशि एक देहाती परिवार से थी और बस इंटर पास थी लेकिन फिर भी राजन को बहुत भाती थी| परन्तु स्थितियां बदलने के साथ साथ सुरेश की महत्वाकांक्षाओ को भी पंख लग रहे थे|

सुरेश ने हमेशा गरीबी देखी थी लेकिन बेटे के “सी० ऐ०” बनने के बाद उसकी जन्दगी आरामदायक हो गयी थी| राजन के “सी० ऐ०” बनते ही राशि का रिश्ता आया था| जो उस समय सुरेश के लिए सौभाग्य की बात थी| क्योंकि राशि का परिवार एक धनाढ्य परिवार था और दहेज़ भी खूब दिया था| इतना कि सुरेश का मकान बन गया और घर में सारे सुख सुविधा के सामान भी आ गए|

लेकिन जैसे जैसे समय बिता और लोगो ने बाते करनी शुरू की तो सुरेश को अपना फैसला अपनी गलती लगने लगा था| सामान्यतया सुरेश को ये सुनना पड़ता था “राजन की शादी तो किसी भी बड़े परिवार में हो जाती, दहेज़ इससे भी ज्यादा मिल जाता| बल्कि सुरेश तूने गलत किया, राजन का ब्याह किसी “सी० ऐ०” लड़की से ही करना था|”

सुरेश के साथ-साथ मंजू को भी अब लगने लगा था कि उन्होंने जल्दबाजी कर दी|

सुरेश की ये छटपटाहट रह रह कर बाहर भी आने लगी थी| अब वो अक्सर राशि को उसके देहाती अंदाज़ के कारण टोकने लगा था| मंजू को भी अब राशि के पहरने ओढने और खाना बनाने जैसे हर काम में खामी दिखाई देने लगी थी|

लगभग रोज ही शाम को राजन से भी इस विषय में शिकायत की जाती थी| और एक दिन राशि के भी सब्र का बांध टूट ही गया और वो अपनी सास से काफी बहस कर बैठी| मंजू और राशि की बहस जब ज्यादा ही बढ़ने लगी तो सुरेश का गुस्सा कुछ ज्यादा ही चढ़ गया और उसने अपनी बहु राशि पर हाथ उठा दिया| राशि के लिए ये बहुत ही अजीब और हृदय विदारक घटना थी कि ससुर ने उसपर हाथ उठाया|

शाम को आते ही राशि ने राजन से सब बात कही लेकिन राजन पर तो जैसे कोई प्रभाव ही नहीं पड़ा| राशी ने गुस्से में राजन से कहा “शादी से आजतक आप मुझे कहीं बाहर घुमाने भी नहीं ले गए| जब मैंने आपसे बाहर जाने को कहा तो जवाब मेरे ससुर जी ने दिया कि बाहर नहीं जाओगे, हर बात अपने बाप से ही पूछकर करोगे क्या? बाप बोल दे, छोड़ दो तो छोड़ भी दोगे… मुझे पता है”

राजन ने कुछ जवाब नहीं दिया| और वो रात राशि ने आंशुओ के सहारे गुजारी|

लेकिन अब लगभग रोज ही ये होता था| जब भी राजन घर वापस आता था तो उसे सुरेश और मंजू से राशि की शिकायत ही सुनने को मिलती थी| इस गुस्से में राजन ने भी अब राशि पर हाथ उठाना शुरू का दिया था और राशि भी राजन, सुरेश और मंजू से बहस करने लगी थी|

मामला अब दोनों परिवारों के मध्य भी पहुँच गया और दो तीन बार समाज की पंचायते भी हुई|

लेकिन इस सब के बावजूद भी राजन राशि से बहुत ज्यादा दूर नहीं हुआ था| पर अब सुरेश को ये लगने लगा था कि राशि इस घर के लिए मुसीबत है और इससे छुटकारा लेना ही होगा| अक्सर वो राजन के सामने कह दिया करता था “बेटा ये रिश्ता चलने वाला ना ज्यादा दिन”

लेकिन फिर राजन के जीवन में भी कुछ ख़ास बदलाव आये जिन्होंने उसे राशि से दूर करना शुरू दिया|

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……

राजन जिस कम्पनी में था उसमें ही सुमेधा ने ज्वाइन किया था| वो बहुत ही हसमुख और आत्मविश्वास से पूर्ण युवती थी| उसका चेहरा सामान्य था परन्तु उसकी देहयष्टि और उसका आत्मविश्वास से परिपूर्ण आचरण और हसमुख स्वभाव उसे एक आकर्षक व्यक्तित्व बना देते थे|

राजन से उसका संवाद काम को लेकर काफी होता था| राजन उसकी तरफ आकर्षित था और वो भी राजन से आकर्षित थी| ये सम्बन्ध धीरे धीरे आत्मीय होते चले गए| सुमेधा का जीवन खुशहाली में गुज़रा था|

उसके पिता एक “आई० ऐ० एस०” थे| लेकिन राजन के जीवन में उसके वैवाहिक जीवन को लेकर पेचीदगियां शुरू हो चुकीं थी| वो सुमेधा से अपनी वैवाहिक जीवन में चल रही परेशानियों के सम्बन्ध में बात करता रहता था|

एक बार एक ओफिसियल गेटटुगेदर में राजन राशि को अपने साथ ले गया था| राशि की साधारणता और उसकी देशज भाषा तथा हद से ज्यादा हिचकिचाहट के कारण राजन को बहुत शर्मिदगी उठानी पड़ी थी| राशि के साथ समस्या ये थी कि एसा कोई नहीं था जो उसे बताये कि समय और परिवेश के साथ प्राथमिकताएं और आचरण दोनों में बदलाव जरुरी है|

राजन ने भी कभी ये प्रयास नहीं किया| राशि के माता-पिता अपने धन के दंभ में इस मामले को सुलझाने की दिशा में ना बढ़कर हर बार अपने द्वारा दिए गये दहेज़ और राजन के परिवार की अतीत की दरिद्रता को लक्ष्य करते हुए राजन को निचा दिखा देते थे| इससे राजन और राशि एक दुसरे से दूर होते जा रहे थे|

अपने पिता के प्रभाव के वशीभूत राजन ने भी कभी स्वतंत्र होकर राशि से बात करने का प्रयास नहीं किया और सुरेश ने भी उसे ऐसा नहीं करने दिया| क्योंकि सुरेश एक भय से ग्रस्त रहता था कि कहीं राजन उनसे दूर ना हो जाए| सुरेश को हमेशा परिवार में अपने मुखिया के ओहदे की फ़िक्र और उसका दंभ ज्यादा रहता था|

सुमेधा और राजन के सम्बन्ध समय के साथ सीमाएं तोड़ते जा रहे थे और अब उनके मध्य कोई मर्यादा नहीं बची थी| और वहीँ राजन और राशि के मध्य दूरियां बढ़ती ही जा रही थी| बल्कि यदि कभी राशि और राजन के मध्य सहवास होता भी था तो उस समय भी राजन के मस्तिष्क में सुमेधा ही होती थी|

राजन और सुमेधा एकदूसरे के साथ रहना चाहते थे| लेकिन राशि का राजन के जीवन में होना बड़ी समस्या थी| एक दिन सुमेधा राजन के घर आई तो उसके व्यवहार और सबसे बड़ी बात कि वो भी राजन के जितना ही कमा रही थी, इससे सुरेश को भी उसके और राजन के प्रति संभावनाए मिल गयी थीं|

सुमेधा जा चुकी थी| जब तक सुमेधा रही राजन बहुत ही प्रफ्फुलित रहा पर अब राजन ने पुन: वो ही मायूसी का लबादा ओढ़ लिया| ये बात राशि ने भी महसूस की| राजन ऊपर छत पर अकेला खड़ा था| सुरेश ने पीछे से आकर उसके कंधे पर हाथ रखा| राजन एकदम से चोंक गया|

सुरेश :क्या सोच रहे हो

राजन :कुछ नहीं पापा जी

सुरेश :बेटा तेरी जिन्दगी मैंने जल्दबाजी में बर्बाद कर दी

राजन :ऐसा मत कहिये पापा जी

सुरेश :बेटा थोडा रुक जाता तो सुमेधा जैसी लड़की मिलती तुझे| वो तेरे लिए सबसे अच्छी रहती| इस राशि ने तो तेरी जिन्दगी बर्बाद कर दी

राजन ने कोई उत्तर नहीं दिया|

सुरेश : बेटा तेरी माँ भी कह रही थी और मुझे भी लगता है कि अब ऐसे और नहीं चलने वाला| तेरा और राशि का रिश्ता ठीक नहीं है| इसके बारे में कुछ सोचना पड़ेगा|

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राजन सुरेश का अपनी दृष्टि से अन्वेषण करता है|

सुरेश :बेटा जितना लम्बा खिंचेंगे उतना बर्बादी ही होगी,

सुरेश ने एक मौन धारण किया और फिर बोला “देख बेटा अगर सुमेधा जैसी लड़की अब भी तेरी जिन्दगी में आ जाये तो घर बन जाएगा”

राजन इस बात को सुनकर थोडा सकपका गया तो सुरेश ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा “अब बड़ा हो गया है तू और ये कुछ मामले ऐसे होतें हैं जिनपर खुलकर बात कर लेनी चाहिए”

राजन को कुछ हल्का महसूस हुआ| सुरेश ने राजन के मन की बात कही थी, राजन की कल्पनाओं में अब सुमेधा ही थी और वैसे भी दोनों अब हर मर्यादा को लांघकर एक दुसरे को अपना सर्वस्व सौंप चुके थे|

राजन ने एक हलकी सी हिचकिचाहट के साथ अपनी बात कही “लेकिन राशि का क्या पापा?”

सुरेश : बेटा तुझे लगता है ये रिश्ता अब चल पायेगा? और जैसी बेज्जती इसने और इसके घर वालो ने तेरी और हमारी करी है उसके बाद भी तू कहेगा कि तेरे और इसके बिच पति-पत्नी जैसा कुछ बचा है? बेटा अब भी समय है दोनों तलाक लो और वो भी अपनी जिन्दगी को नए तरीके से बनाये और तू भी| इसमें दोनों का ही भला है…..इस बारे में राशि से बात कर..”

राजन भी ये ही चाहता था लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी पर अब उसमें हिम्मत आ गयी थी| उसने निर्णय लिया कि वो इस सम्बन्ध में राशि से बात करेगा|

राजन अतीत की यात्रा में ही खोया हुआ था… फिर गहरी नींद में सो गया|

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अगले दिन सुबह ही सुमेधा ने राजन से तैयार होकर चलने के लिए कहा| राजन ने भी बिना प्रतिरोध के सहमती जाता दी| सुमेधा के पिता ने एक मनोचिकित्सक से समय ले लिया था| पहली बार सुमेधा के पिता को ज्ञात हुआ था कि सुमेधा और राजन के जीवन में बहुत कुछ असामन्य चल रहा है|

सुमेधा और राजन मनोचिकित्सक के क्लिनिक पर पहुँच गए| मेरठ में गिनती के ही मनोचिकित्सक थे| ये एक महिला थी और काफी प्रसिद्द भी थी|

मनोचिकित्सक का क्लिनिक बेहद सुंदर था| राजन और सुमेधा बाहर बठे प्रतीक्षा कर ही रहे थे कि भीतर से बुलावा आ गया| सुमेधा राजन को बाहर ही बैठने को कहकर भीतर गयी और लगभग आधे घंटे उस महिला चिकित्सक के साथ रही|

इतने समय में सुमेधा ने राजन की पूर्ण स्थिति से उसे अवगत करवाया| पिता से जान-पहचान होने के कारण वो चिकित्सक सुमेधा को अतिरिक्त गंभीरता से ले रही थी और अतिरिक्त समय भी दे रही थी| सुमेधा ने राजन के पहले के विवाह से लेकर अब तक की समस्त स्थिति अपने दृष्टिकोण से समझा दी|

महिला चिकित्सक, जो 40 वर्षीय और गंभीर व्यक्तित्व की थी, उसने सुमेधा से साफ़ शब्दों में कहा “देखिये आपने मुझे जो जानकारी दी वो अच्छी हैं और यूजफुल भी| लेकिन ये आपका व्यू है| जबकि मुझे सब्जेक्ट का व्यू भी देखना होगा| तो मुझे पेशेंट … आई मीन आपके पति से अकेले में बात करनी होगी| आपको कोई आपत्ति तो नहीं?”

सुमेधा ने एक मुस्कान के साथ अपनी गर्दन हिलाकर सहर्ष सहमती प्रदान की|

चिकित्सक ने एक मोहक मुस्कान से सुमेधा की सहमती का स्वागत किया और कहा “तो आप बाहर ही बैठिएगा”

फिर उसने राजन को बुलाने का निर्देश अपने सहचर को दिया|

राजन एक आराम दायक कुर्सी पर बैठा हुआ था|चिकित्सक अपने किसी कार्य में व्यस्त थी और उस कार्य को करते हुए ही राजन से सामान्य बातचीत करती रही| ये क्रम लगभग 20 मिनट तक चला| चिकित्सक ने राजन को अपनी इन बातों से एकदम सामान्य कर दिया था|

अब वो राजन के पास आयीं और राजन का अपनी दृष्टि से अवलोकन करते हुए बोली “तो राजन जी मुझसे तो आपका परिचय हो गया”

राजन ने मुस्कान के साथ चिकित्सक को देखा फिर वो चिकित्सक बोली “अब कोशिश करके देखती हूँ कि आप खुद भी जान लो कि तुम क्या चाहते हो अपनी जिन्दगी से?”

राजन घबरा कर उस आराम दायक कुर्सी से नीचे गिर गया| ये क्या? ये तो राशि है, एक बार फिर उसका अतीत उसके सामने था| राजन ने घबराते हुए उस महिला को देखा और जोर से चिल्लाया “राशि तू” फिर वो और भी जोर से चीखा “पापा …..सुमेधा ….बचाओ”

राजन इतनी जोर से चीखा कि बाहर भी आवाज़ चली गयी| सहचर भाग कर भीतर आया और पीछे-पीछे सुमेधा भी आ गयी| राजन बुरी तरह से घबराया हुआ था और चिकित्सक भी उसकी इस हरकत से थोडा असामान्य हो गयी थी|

सुमेधा ने राजन को आगे बढकर अपनी बाहों में भर लिया और उसे शांत करने लगी| तभी चिकित्सक ने पीछे से राजन की पीठ पर हाथ रखते उए उससे कहा “राजन सर”

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राजन ने झटके से उसका हाथ झटका और बस एक ही बात दोहराने लगा “चलो यहाँ से चलो…चलो”

और इतना चिल्लाते हुए वो बहर की तरफ भागा| सुमेधा भी उसके पीछे-पीछे बाहर आ गयी| राजन आकर गाड़ी में सिमट कर बैठ गया| वो काँप रहा था| पार्किंग में खड़े एक दो लोगो ने जब उसे देखा तो उन्हें भी ये असामान्य लगा|

सुमेधा भी आकर गाडी में बैठ गयी और काफी समय तक उसे सामान्य करती रही|

राजन अब शांत हो गया था शायद सो गया था|

पार्किंग पर और भी बहुत से लोग आ गए थे और वो चिकित्सक भी| लोगो ने सुमेधा की मदद को निवेदन भी किया|

चिकित्सक ने एक इंजेक्सन राजन को लगाया वो शायद उसको आराम देने के लिए था|

फिर उस चिकत्सक ने सुमेधा से कहा “आपके साथ अपने ड्राइवर को भेज देती हूँ”

सुमेधा ने कहा “नहीं मैं ड्राइव कर लुंगी”

चिकित्सक ने कुछ सोचते हुए कहा “ठीक है, इन्हें नींद आएगी अब| इन्हें आराम करने देना”

सुमेधा ने बैचेनी भरे स्वर में कहा “ये हो क्या रहा है डॉक्टर, ये ठीक हो भी जायेंगे”

चिकित्सक ने गंभीरता से कहा “ठीक हो जायेंगे, बट कंडीसन क्रीटिकल है| मुझे अलग तरह से और लम्बे समय तक इनका ट्रीटमेंट करना होगा|” दो दिन बाद आप लाइए इन्हें|”

फिर उसने कुछ दवाइयां दी और कहा “ये अभी इन्हें दीजिये सुबह और शाम इससे ये नार्मल रहेंगे| फिर एक और रैपर सुमेधा को देते हुए कहा “यदि कभी ज्यादा टिपिकैलिटी लगे तो ये टेबलेट दे देना और फॉर फर्दर मेरा नंबर तुम्हारे पास है ही”

सुमेधा ने दवाइयां समझते हुए कहा “कोई भी प्रोब्लम होगी तो मैं आपको फोन करुँगी, प्लीज उठा लीजियेगा”

चिकित्सक ने सुमेधा के सर पर हाथ रखते हुए कहा “डोन्ट वरी …. आई विल अवेलेबल एवरीटाइम फॉर यु”

सुमेधा घर पहुँच गयी|

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इंजेक्शन ने असर किया था राजन को गहरी नींद आ गयी थी| लेकिन उसके दिमाग में अतीत का चलचित्र चल रहा था|

जब सुरेश से बात होने पर राजन ने राशि से तलाक के बारे में बात की तो राशि पर जैसे तुषारापात हो गया| वो रोने लगी और राजन से बोली “क्या इसलिए ही शादी की थी? इस घर में डोली में आई हूँ और अर्थी पर ही जाउंगी”

राजन ने विनम्रता के साथ उसे समझाने की कोशिश की “देखो हम दोनों साथ रहेंगे तो ना तुम खुश रहोगी और ना मैं, अभी तुम्हे कोई भी अच्छा लड़का मिल जायेगा| और हम दोनों की जिन्दगी भी खुशहाल हो जाएगी”

लेकिन राशि के लिए ये बेहद ही अजीब था और इसको स्वीकारने को वो किसी भी स्थिति में सहमत नही थी|

पहले की ही भाँती राशि ने ये बात अपने घर बताई और राशि का परिवार इकठ्ठा होकर राजन के घर आ गया| उन्होंने राजन और राजन के परिवार पर बहुत से इल्जाम लगाये| इधर राजन और राजन के परिवार ने भी राशि पर बहुत सारे आरोप लगाये|

मोहल्ले के लोगो ने दोनों पक्षों को बैठाकर बात की तो तब भी दोनों तरफ से सत्य और असत्य आरोप-प्रत्यारोप होते रहे| लेकिन राशि को तलाक देने की बात का समर्थन किसी ने नहीं किया| सुरेश इस विषय पर अब खुद को घिरता हुआ महसूस कर रहा था|

सुरेश के भाई जिनसे उसके पहले से ही सम्बन्ध अच्छे नहीं थे उन्होंने भी सुरेश को ही गलत ठहराया और कहा “जब तो तुझै इतनी जल्दी होरी ही कि परिवार में भी किसी कु ना पुच्छा| आर भाई अब सालभर पिच्छै ई तू तलाक लेन कु कहरा”

इस बहस में राशि ने सुमेधा को लेकर भी राजन पर खुलकर आरोप लगा दिया| सुमेधा और राजन के सम्बन्धो के प्रति राशि काफी समय से आशंकित थी| इस विषय पर राजन ने भी खुद को घिरता हुआ पाया| दोनों पक्षों में सहमती बनायी गयी और राशि और राजन दोनों को ही रिश्ता सुधारने के निर्देश दिए गए|

दो-तीन दिन तक राशि और राजन के मध्य उस विवाद को लेकर तल्खियाँ रही| राजन ऊपर छत पर अकेला खड़ा था विचारमग्न, तब ही पीछे से सुरेश आया| सुरेश को देखते ही राजन की आँखें पनीली हो गयीं|

सुरेश ने राजन को दिलासा देते हुए कहा “तू फ़िक्र मत कर, मैं सब संभाल लूँगा| तू बस जैसे कहूँ वैसे करता रह”

राजन जिसकी सुमेधा को लेकर सारी आशाएं खत्म हो गयी थी, उसके भीतर अपने पिता की बात से एकबार पुन: उम्मीद जाग गयी|

सुरेश ने कहा “देख तू इसके साथ नार्मल रह इसे घुमा-फिरा रोज़| रोज़ बाहर लेजा और बाहर होटल अर रेस्टोरेंट मै ई खिलाकर ला| हमारी इससे कोई बहस भी हो तो तू चुप रह”

राजन ने कहा “इससे क्या होगा?”

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सुरेश ने एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा “बेट्टे सब कु यो लगरा कि हम गलत यो सही, तो सबकी गलत फहमी दूर करनी पड़ेगी|”

तब ही नीचे से राशि आ गयी तो सुरेश चुप हो गया और नीचे चला गया|

राशि ने राजन के हाथ पर अपना हाथ रखा और कहा “क्या हो गया, किसकी नज़र लग गई| देखो मैं मानती हूँ कि आपके जितनी पड़ी-लिखी ना, पर मैं बदल लुंगी खुद को, जैसे आप कहोगे वैसे ही रहूंगी| अपनी भाषा भी सुधार लुंगी| लेकिन मैं आपके बिना नहीं रह सकती”

फिर राशि के आँखों से एक अश्रुधारा बह चली, जिसे उसने अपनी साड़ी के पल्लू से पूछा और बोली “मैंने ये शादी कोई खेल समझकर नहीं की थी| मैं आपसे अलग होने की सोच भी नही सकती| और मेरी गलती क्या है? आप जैसे कहोगे वैसे रहूंगी”

राजन को राशि की बातो से कोफ़्त हो रही थी लेकिन उसे सुरेश की बात याद आई कि तू इसके साथ नॉर्मल रह|सुरेश की पूरी बात तो राजन के समझ आई नहीं थी क्योंकि राशि के आने से बात अधूरी रह गयी थी| लेकिन राजन ने सुरेश के निर्देश को मानते हुए ना चाहते हुए भी एक मुस्कान से राशि की बातों का अनुमोदन किया|

राशि को इससे बहुत ही सुखद अनुभूति हुई और वो माहोल को हल्का बनाने के लिए बोली “देखिये ना आज तो मैं अपने देस्सी अंदाज़ में नहीं बात कर रही”

फिर राशि ने अपना सर राजन की छाती से चिपका लिया और बोली “ठीक है… हमारा रिश्ता हमारे माँ-बाप ने तय किया है, लेकिन आगे की जिन्दगी तो हमे ही गुजारनी है| मैंने खुद को पहचानने और समझने की कोशिश की है|”

फिर राशि ने गर्दन उठा कर राजन की आँखों में देखते हुए कहा ““अब कोशिश करके देखती हूँ कि आप खुद कु भी जान लो, कि आप क्या चाहते हो अपनी जिदगी से?………हम दोनों को ही ये फैसला करना होगा कि हमें अपनी जिन्दगी को कैसे चलाना है?”

राशि ने बहुत गूढता भरी बातें कहीं थी लेकिन राजन जो राशि के सम्बन्ध में एक पूर्वाग्रह बना चूका था कि राशि के साथ वो खुश नहीं रह सकता, उसे राशि की भावनाएं और उसकी बातें समझ ही नहीं आ रहीं थी|

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…..

उस रात के अगले दिन ही जब राजन अपने ऑफिस में गया तो वहाँ सुरेश का फोन आया राजन को|

सुरेश : कुछ बीजी तो नहीं

राजन : नहीं पापा बताओ

सुरेश : थोडा अलग कु हो ले, कल जो बात अधूरी रहगि थी वो पूरी करनी है|

राजन अपनी कुर्सी से उठकर बाहर अकेले में आ गया और बोला “हाँ पापा जी, अब बताओ”

सुरेश : देख यो राशि अर इसका परिवार बहुत तेज़ है तो ये ऐसे तो मानने के ना, अर बेटा उन्हें पता है कि उनकी इस लड़की को तेरे से अच्छा लड़का ना मिलने का तो वे तो अब इसे तेरे गले में ही गेरे रखेंगे|

राजन ने एक हुंकार भर कर सहमती जताई

सुरेश : तो करना यो है कि ये जो सब कहरे कि हम गलत हैं अर यो राशि सही तो उनकी गलत फहमी भी दूर करनी पड़ेगी| तू इसके साथ नोर्मल रह| लेकिन भाई हम कुछ ना कुछ ऐसा करेंगे कि यो लड़े| जब यो काम रोज़ होगा तो सबको लगेगा कि यो राशि चैन से रहने वाली है ही नहीं| भाई सबकू बताना ही ना दिखाना भी पड़ेगा कि यो राशि लड़ाकू-बदतमीज़ ही नहीं बल्कि करेक्टरलैस बी है|

राजन ने कुछ नहीं कहा और सहमती में हुंकार भरी

सुरेश ने फिर कहा “मेरी वकील से बात हो गयी है| इसकी कुछ लड़ते हुए या बदतमीजी करते हुए रिकोर्डिंग करनी पड़ेगी|”

तभी राजन ने कहा “लेकिन अगर बदतमीजी ना की तो”

सुरेश : तो बेट्टे करवानी पड़ेगी| तुझे जैसे मैं कहू तू वैसे करता रहिये बस बाकी मैं संभाल लूँगा|

राजन ने सहमती जताते हुए फोन काट दिया|

राजन ने कभी भी या किसी भी विषय में अपने पिता से कोई असहमति प्रकट नहीं की थी| राजन के जीवन का हर निर्णय उसके पिता ही लेते थे|

तन्द्रावस्था में अतीत की इन यादों में खोये-खोये ही राजन गहरी नींद में समा गया|

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——–

अगले दिन राजन ऑफिस नहीं गया| बल्कि अपने कमरे में लेटा रहा| सुमेधा ऑफिस गयी थी|

शाम को जब सुमेधा वापस आई तो उसने देखा कि घर में पूजा पाठ हो रहा है| सुमेधा को सुरेश ने बैठने को कहा तो वो भी बैठ गयी पूजा में| राजन भी उस पूजा पाठ में बैठा हुआ है|

एक कमरा जो स्टोर की तरह उपयोग किया जा रहा था| उसे खाली कर दिया गया था| वो तांत्रिक उस कमरे में कुछ ख़ास अनुष्ठान कर रहा था| अपना अनुष्ठान पूर्ण करने के बाद पुजारी ने उस कमरे को बंद करके उसपर ताला लगवा दिया और कुछ ख़ास अनुष्ठान उस ताले और दरवाज़े पर भी किये|

तांत्रिक ने अनुष्ठान के अंतिम चरण में परिवार को कुछ ख़ास निर्देश देते हुए कहा “इस कमरे को कभी मत खोलना और ये जो इस दरवाजे पर यन्त्र टाँगे हैं, ये अभिमंत्रित यन्त्र हैं इन्हें बिलकुल मत हटाना| मैंने उसकी आत्मा को इस कमरे में ही बंदी कर दिया है और बाकी घर को भी कील दिया है| लेकिन सुरेश तुम्हे ये घर छोड़ना पड़ेगा, जितनी जल्दी हो सके छोड़ दो इस घर को|

तांत्रिक अपना काम करके वापस चला गया| और राजन वापस अपने कमरे में आकर लेट गया| सुमेधा अपने कार्यों में लग गयी और बाकी लोग भी|

राजन उठकर घर की छत पर आ गया और घुमने लगा| छत पर एक हलकी रौशनी का बल्ब जल रहा था जिससे हल्का सा प्रकाश छत के आगे वाले एक कोने को प्रकाशित किये हुए था| तभी सुमेधा ऊपर आई और राजन को प्यार से गले से लगाया| राजन को सुमेधा का ये प्रेमालाप बहुत सुखद लगा| दोनों का जबसे विवाह हुआ था तबसे ये एकदूसरे के निकट आ ही नहीं पा रहे थे|

राजन ने निराशा भरे स्वर में कहा “ये घर छोड़ना पड़ेगा”

सुमेधा ने बड़े प्यार से राजन की आँखों में आँखे डालकर कहा “मैंने आपसे शादी की है आपके घर से नहीं…..ऐसे हज़ार घर कुर्बान कर दूंगी आपके प्यार पर|”

राजन ने ये शब्द सुनते ही सुमेधा के चेहेरे को देखा तो उसका हृदय मानो एक दम रुक गया| क्योंकि सुमेधा नहीं राशि उसे अपनी बाहों में जकड़े खड़ी थी| राजन ने स्वयं को उसकी जकड से दूर करने का प्रयास किया तो जैसे उसके हाथ पैर काम ही नहीं कर पा रहे थे| और राशि मुस्कुराते हुए बोल रही थी “मुझे ये घर नहीं चाहिए बस आप की जरुरत है”

राजन के हाथ पैर और समस्त शक्ति जैसे ख़त्म हो गयी थीं और वो एकदम से चिल्लाया “सुमेधाआआआ…..बचाओ”

राजन इतनी तेज आवाज़ में चिल्लाया था कि पड़ोसियों को भी उसकी आवाज़ आ गयी थी| सुरेश और मंजू ऊपर आ गए, एक दो पडोसी भी आ गए| सुमेधा उसे संभालने का और समझाने का प्रयास कर रही थी लेकिन राजन डर से एक कोने में ज़मीन पर सिकुड़ कर बैठ गया था और बस ये ही बोल रहा था “जाओ जाओ यहाँ से, जाओ…. सुमेधा और मेरी जिदगी से”

पड़ोसियों की मदद से राजन को नीचे उसके कमरे में लाकर लिटा दिया और मोहल्ले से ही एक चिकित्सक को बुलाकर जो इंजेक्सन मनोचिकित्सक ने दिया था वो लगवा दिया गया|

राजन अभी भी बुदबुदाए जा रहा था| लेकिन उस दवाई का असर उसपर होना शुरू हो गया था|

सुरेश ने सुमेधा से पूछा “क्या हुआ था?”

सुमेधा ने रुआंसी होकर कहा “कुछ भी तो नहीं, ऊपर अकेले खड़े थे तो मैं चली गयी| बस यूँ ही बातें कर रहे थे कि वो चिल्लाने लगे| इन्हें हर वक़्त लगता है राशि इनके सामने ही खड़ी है|”

मंजू ने रोते हुए कहा “कल फिर बुलाओ बाबा जी को कुछ करके जायेंगे”

सुरेश ने एक झिडकी देते हुए उसे चुप करवा दिया|

राजन को उसके कमरे में लाकर मनोचिकत्सक की बतायी दावा दे दी गयी और राजन नींद के नशे में खोने लगा| नींद के नशे में ही वो पुन: अतीत की यादों में खो गया|

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राशि के साथ एक तरह का प्रपंच शुरू हो गया था| वो नहीं समझ पा रही थी कि ये हो क्या रहा है? उसको उकसाया जाता था फिर जब वो कुछ भी कहना शुरू करती तो सुरेश और मंजू घर से बाहर निकल जाते और चीखने चिल्लाने लगते कि देखो हमारी बहु हमारे साथ मारपीट कर रही है या हमें घर से निकाल रही है|

राशि को मोहल्ले वालो ने समझाना शुरू कर दिया “तू ये गलत कर रही है, सास ससुर भी माता पिता के ही समान हैं, अब बुढ़ापे में ये कहाँ जायेंगे?”

लेकिन राशि के कुछ भी समझ नहीं आ रहा था| अब राजन ने भी राशि से बात करना बंद कर दिया था| लेकिन कभी-कभी सुरेश, मंजू और राजन एकदम से अत्यंत मधुरता से राशि से बात करने लगते थे| राशि के समझ ही नहीं आता था कि अब उसकी रिकोर्डिंग की जा रही है| ये रिकोर्डिंग वो इसलिए कर रहे थे ताकि दिखा सकें कि वो राशि का कितना ख्याल रखते हैं?

कभी कभी राशि के साथ खूब बदतमीज़ी की जाती थी और फिर कुछ समय पश्चात सभी उसके साथ बेहद ही विनम्रता से पेश आने लगते थे| लेकिन राशि गुस्से में उल्टा सीधा कहती रहती थी| उन घटनाओं की भी योजनाबद्ध रूप से रिकोर्डिंग की जाती थी फिर सभी को वो दिखाई जाती थी कि देखो हम कितने प्यार से पेश आतें हैं लेकिन राशि लगातार बदतमीज़ी करती रहती है|

सुरेश, मंजू और राजन सब सुरेश की योजना के अनुसार काम कर रहे थे| राजन, सुरेश और मंजू के द्वारा उसे चरित्रहीन भी बताया जा रहा था| ये तीनो सफल भी हो रहे थे| इनके सभी पड़ोसियों को लगने लगा था कि राशि चरित्रहीन भी है और असभ्य भी| लोकल थाने में भी बात करके और कुछ पैसे दरोगा को देकर उसे भी अपने विश्वास में ले लिया गया था|

कई बार पुलिस को बुलवाकर भी राशि को महिला पुलिस से डांट लगवाई गयी थी| राजन लगभग रोज़ उसे पीटने लगा था| लेकिन दुनिया को वो ये ही बोलता कि राशि उसके साथ मारपीट करती है| ये सारा षडयंत्र सुरेश के दिमाग की उपज था| राशि को भीतर ही भीतर मानसिक रूप से तोडा जा रहा था और उसको बदनाम भी किया जा रहा था| कई बार पुलिस को बुलाया गया ये कहकर की राशि ने आत्महत्या की कोशिश की है|

एक दिन राशि ने रात्रि के समय राजन से इस विषय पर बात करने का प्रयास किया| राजन अपने लैपटॉप पर ही कुछ कार्य कर रहा था|

राशि ने राजन को पीछे से प्यार से उसके कंधो पर अपनी बाहों का पाश बनाया और उसके सर को चूमा| राजन जो एक पहियों वाली कुर्सी पर बैठा था उसने अपनी कुर्सी को घुमाकर बेहद ही रूखे अंदाज़ में राशि को पीछे हटाया और कहा “काम करने दो यार”

राशि ने फिर राजन को अपनी बाहों में भर लिया और प्यार से बोली “आपको लगता है मैं मम्मी या पापा जी को घर से निकल जाने को कहूँगी?”
राजन ने रूखे अंदाज़ में कहा “क्या कहूँ? तुमने मेरा विश्वास ही तोड़ दिया है पूरी तरह”

राशि ने प्रेम पूर्ण भाव से कहा “मैंने आपसे शादी की है आपके घर से नहीं…..ऐसे हज़ार घर कुर्बान कर दूंगी आपके प्यार पर| मुझे ये घर नहीं चाहिए बस आप की जरुरत है,

राजन ने एक झटके से राशि को अपने दूर किया और कमरे से बाहर चला गया| उस कमरे में राशि के साथ अब उसके अंशु ही रहते थे| राशि जब भी राजन से बात करना चाहती थी तो राजन उसे अनदेखा कर देता था|

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राजन की स्थिति को लेकर सुमेधा बहुत परेशान रहने लगी थी| अब राजन अकेले में भी बड़बड़ाता रहता था|

सुमेधा जब भी राजन को मनोचिकित्सक के पास चलने को कहती तो वो टाल देता था| बल्कि अब तो वो झल्लाकर सुमोधा को डांट देता था| आज फिर सुमोधा ने हिम्मत करके राजन को मनोचिकत्सक के पास चलने को कहा तो राजन एक दम से बोखला गया|

राजन ने चिल्ला कर कहा “मै पागल नहीं हूँ, लेकिन तुम मुझे पागल सिद्ध करना चाहती हो| तुम्हारे दिमाग में चल क्या रहा है? क्यों तुम मुझे पागल सिद्ध करने पर तुली हो?”

सुमेधा को ये आरोप असहनीय था वो भी चिल्लाकर बोली “पागल नहीं तो और क्या हो? शादी के बाद से एक भी दिन हम दोनों पति-पत्नी की तरह नहीं रह पायें हैं|”

राजन ने चिल्लाकर कहा “क्या होता है पति-पत्नी? बस वो बिस्तर की गर्मी मिटाना| तुम्हे बस वो ही चाहिए”

सुमेधा : मैंने उस बारे में नहीं कहा, और जब तुम वहाँ तक बात को ले ही जा रहे हो तो सुनो किसको नहीं चाहिए वो? ये भी जिन्दगी का हिस्सा है और बहुत जरुरी हिस्सा है|

राजन : अरे तुम्हारी जिन्दगी का बस वो ही एक हिस्सा है| और तुम जैसी औरत से उम्मीद भी क्या है जो शादी से पहले ही मेरे साथ सबकुछ कर चुकी थी| और सिर्फ मेरे साथ ही क्यों …… इतना कहकर राजन रुक गया था

राजन मानसिक रूप से विक्षिप्त हो चूका था उसे स्वयं नहीं पता था कि वो क्या कह रहा है?

सुमेधा को अपने चरित्र पर ये आरोप बहुत ही ज्यादा असहनीय पीड़ा दे गया और वो आप खो बैठी| गुस्से में उसने मेज पर रखा लेपटोप उठाकर फेंक दिया| और चिल्लाते हुए बोली “क्या कहा तुमने? मेरे तुम्हारे अलावा और भी रिलेशन रहे होंगे तो सुनो वो तुम्हारा मैटर नहीं है|

तुम तड़प रहे थे मुझसे शादी करने को और तुमने ही साजिशे करके अपनी पहली बीवी को आत्महत्या करने पर मजबूर किया| और अपनी मर्दानगी की गलत फहमी निकाल दो| कभी भी तुम एक नार्मल मेल तो साबित हुए ही नहीं हो| अगर तुम इम्पोटेंट हो तो बोलो, उसका भी इलाज़ संभव है”

राशि भी गुस्से में आपा खो बैठी थी तो अब वो भी बिना सोचे समझे तीखे शब्द बाणों से प्रहार कर रही थी|”

कोई कमज़ोर से कमज़ोर मर्द भी अपनी मर्दानगी पर सवाल उठते नहीं देख सकता| राजन के लिए भी सुमेधा का ये हमला असहनीय था| उसने गुस्से में आकर सुमेधा को एक जोरदार तमाचा जड़ दिया| इस पर सुमेधा और भी ज्यादा तेज़ चिल्लाने लगी और अब तो वो राजन को बार बार नामर्द, जाहिल और गवांर बोल रही थी |

सुरेश और मंजू बाहर बैठे सब सुन रहे थे, उनसे भी अब नहीं रहा गया और मंजू ने कमरे में आकर सुमेधा को सुनाना शुरू कर दिया|

मंजू : सुमेधा तू तो जाहिलों से भी बड़ी जाहिल है| शर्म ना आरी तुझै, अपने पति कु क्या-क्या भोंकरी तू? कोई सुनेगा तो क्या कहगा?

सुमेधा को उनके मध्य मंजू का बोलना अच्छा नहीं लगा और वो गुस्से में भी थी तो उसने मंजू को भी कड़क अंदाज़ में कहा “तुम्हारे पुरे परिवार का पता है मुझे ज्यादा संस्कारों की बात मत करो| जानती हूँ क्या-क्या नहीं किया तुमने उस राशि के साथ| तुम गवाँरु लोगो के लिए वो ही सही थी”

इस पर सुरेश बीच में बोल पड़ा “राजन अपनी घरवाली को समझा, ये इज्जतदार घर है, यहाँ अच्छी तरह से ही रहे”

सुमेधा अब सुरेश पर बिखर गयी “क्या बकवास कर रहे हो? हो क्या आप लोग मेरे पापा के सामने? आप जैसे लोग मेरे पापा के ऑफिस में घुस भी नहीं सकते|”

इतने में ही राजन ने एक और चांटा सुमेधा को मार दिया, इस पर सुमेधा पूरी तरह बिखर गयी और राजन को एक जोरदार धक्का दिया जिससे वो निचे गिर गया| सुरेश ने आगे बढ़कर सुमेधा को एक जोरदार धक्का पीछे को दिया|

अब सुमेधा चिल्लाती हुई घर से निकली “तुम जंगली लोगो की इतनी हिम्मत कि मुझे मारोगे| मैं अनपढ़ राशि नहीं हूँ, अभी पापा को फोन करती हूँ और देखो क्या हाल होगा तुम्हारा| जानते भी हो मेरे पापा आई०ऐ०एस० हैं और मेरा भाई भी आई०ऐ०एस० है”

अब सुरेश को थोडा होश आया तो उसे एहसास हुआ कि वाकई में ये राशि नहीं है और ना ही इसका परिवार राशि के परिवार जैसा है| वो सुमेधा के पीछे गया और उससे गिड़गिड़ाने लगा “बेट्टी तू म्हारे घर की मालकिन है| तू समझ नहीं रही, तेरे साथ की जरुरत है राजन को| हमारा क्या? हम तो कुछ दिन हैं फिर तुम दोनों का ही है ये सब”

सुमेधा ने चिल्लाकर कहा “है क्या तुम्हारे पास? जितना है उतना तो मेरा परिवार एक साल में खर्च कर देता है| ये घर जो राशि के घर वालो के पैसे से बना है ये सामान जो मेरे और राशि से पैसे से ख़रीदा गया है| क्या हो तुम लोग?”

इतने में मंजू फिर बाहर आई और गुस्से में बोली “तेरे भित्तर दिखरे तेरे संस्कार तो”

मंजू मौके की नजाकत को नहीं समझ रही थी लेकिन सुरेश समझ चूका था| उसने मंजू को चुप करने के लिए मंजू की पीठ पर एक जोरदार थप्पड़ मारकर उसे धक्के देकर उसके कमरे में धकेल दिया और मंजू को डांटते हुए बोला “अन्दर मर बदतमीज औरत, तुझे पता ई ना कि बहु बेटियों से कैसे बात की जा”

सुरेश को मंजू को यूँ मारते देख सुमेधा को और भी ज्यादा बुरा लगा और उसने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा “तुम सब जंगली हो, जंगली”

सुमेधा ऊपर छत पर चली गयी और फोन पर अपने पिता से बात करने लगी|

राजन दुनिया से बेखबर अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करके लेट गया| दरअसल में अब राजन को बाहरी दुनिया से कोई मतलब रह ही नहीं गया था| वो एक बेहद ही असामान्य मानसिक स्थिति में जा चूका था|

सुरेश अब घबराया हुआ था|

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……..

सुमेधा ने अपने पिता को फ़ोन लगाया और रोते हुए सारा विषय बताया|

उधर से सुमेधा के पिता ने बेहद ही शांत भाव से कहा “बेटा समझाया था तुम्हे कि तुम गलती कर रही हो| इतने अच्छे अच्छे प्रपोजल को ठुकरा कर तुम इसकी दूसरी पत्नी बनी|

आस्ट्रेलिया से इतना अच्छा जॉब ऑफर था जिसे तुमने ठुकरा दिया| तब तो तुमने ना हमारी सुनी और ना अपने भाई की| पूरी फैमिली में कोई भी नहीं था जो तुम्हारे डिसीजन को सही बताये लेकिन तुमने अपनी जिद पूरी की”

सुमेधा ने रोत हुआ कहा “पापा राजन गलत नहीं है”

इतना सुनते ही सुमेधा के पिता ने कड़क अंदाज़ में कहा “चुप रहो तुम, वो भी उस परिवार का ही हिस्सा है| लालची हैं ये सब लोग, पहली शादी भी दहेज़ के लालच मे की, फिर इस राजन ने ही तुम्हे बेवकूफ बनाया”

सुमेधा अब कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं थी| सुमेधा के पिता ने प्यार भरे अंदाज़ में कहा “सुनो सुमेधा अब जो होगा मेरे हिसाब से होगा| भेज रहा हूँ ड्राइवर को चुपचाप यहाँ आ जाओ”

सुमेधा ने सहमती जाता दी|

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……

सुरेश पर सुमेधा के पिता का फोन आया| सुरेश के चेहेरे पर पसीना आ गया| वैसे भी सुरेश सुमेधा के परिवार से घबराता था क्योंकि सुमेधा का पिता और भाई दोनों बड़े अधिकारी थे| सुरेश ने फोन उठाते ही चापलूसी वाले अंदाज़ में कहा “नमस्कार सर को”

सुमेधा के पिता ने अभिवादन का कोई जवाब ना देते हुए सीधे कहा “वो मेरा ड्राइवर आ रहा है… सुमेधा को लेने, उसकी पैकिंग करवा दो”

सुरेश ने गिड़गिड़ाने वाले अंदाज़ में कहा “अजी वो बच्चो के बिच में थोड़ी सी गलत फहमी हो गयी थी जी, मै सब संभाल लूँगा”

सुमेधा के पिता ने अब कड़क अंदाज़ में कहा “मै पूछ नहीं रहा हूँ बता रहा हूँ”

सुरेश अब निरुत्तर था फिर भी बोला “अजी वो ऐसे झगड़ों में घर जाना ठीक नहीं होगा| दो चार दिन में राजन खुद छोड़ आएगा|”

सुमेधा के पिता ने कहा “दो चार दिन सुमेधा यहाँ रह लेगी तो उसका मन ठीक हो जायेगा फिर ले जाना”

इतना कहकर सुमेधा के पिता ने फोन काट दिया|

सुरेश भी चुप हो गया| कुछ देर में ही ड्राइवर आ गया था| मेरठ से यहाँ तक आने में वैसे भी आधा घंटे से ज्यादा नहीं लगता था| सुमेधा ने अपना कुछ सामन पैक कर लिया था| वो सामान लेकर चली गयी| राजन अपनी ही धुन में अपने कमरे में लेटा रहा| और अपने अतीत की यादों में खोया रहा|

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राशि के साथ राजन रोज झगड़ा और मारपीट कर रहा था| अब तो मंजू और सुरेश भी उस पर हाथ उठा देते थे| बात बढ़ने पर एक दिन राशि के घरवाले आये और मोहल्ले के लोगो को बैठकर बात-चित हुई| अब सुरेश का षडयंत्र काम कर गया था| मोहल्ले के कुछ लोगो ने भी कहा कि राशि ही झगड़ा करती है| राशि पर खुलकर झूठे आरोप लगाये गए उसके चरित्र पर भी लांछन लगाया गया|

सुरेश ने खुलकर कहा “अब कोई सोलुसन ना बचा जी, अब तो एक ई रास्ता है कि इन दोनों का तलाक होजा अर दोनों अपने हिसाब से अपनी जिन्दगी को आगे बढायें”

लेकिन सुरेश की इस बात का विरोध सभी ने किया और राशि के माँ-बाप से कहा कि राशि को समझाएं|

ये सब सुनकर राशि के परिवार वाले भी निरुत्तर थे| राशि के पिता ने राशि को कड़े लहजे में कहा “सुन तू डोली में विदा होकर आई है तो याद रख… यहाँ से विदाई अर्थी पर ही होगी| क्यूँ अपने कुनबे का नाम उछाल रही है”

राशि ने रोते हुए कहा “झूठ बोल रहें हैं ये सब”

इस पर मंजू बोल पड़ी “देख लो जी यो तो तुम सब के सामने ई जुबान लड़ा री तो सोच्चो बाद में क्या हाल करती होगी”

राशि के पिता ने राशि को डांटते हुए कहा “सुन मेरी बात अब तेरी शिकायत झूठ कु बी ना सुन लूँ, याद रखिये तू”

राशि अब एकदम शांत हो गयी और जब वो लोग चलने लगे तो राशि ने बेहद ही शांत भाव से कहा “पिताजी अब आपको कोई शिकायत नहीं मिलेगी”

राशि के घरवाले बेफिक्र होकर चले गए|

राशि के घरवाले इस मामले को पुलिस या कोर्ट तक नहीं ले जाना चाहते थे क्योंकि वो जानते थे कि वहाँ मामला गया तो तलाक निश्चित है| और वो लोग इस स्थिति के लिए तैयार नहीं थे| अत: राशि के परिवार वालो का बस एक ही प्रयास था कि सामाजिक दबाव से इस रिश्ते में आ चुकी दरारों को भरा जाए|

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सुमेधा को अपने घर गए हुए 2 दिन हो गए थे| सुमेधा की माँ, उसके पिता और उसके भाई ने उसे विभिन्न तरीकों से बस ये ही समझाया था कि उसने राजन से शादी करके एक बहुत बड़ी गलती की है|

सुमेधा के पिता ने सुमेधा को गंभीरता से बताया था “सुमेधा मेरी वहाँ के थाना इंचार्ज से बात हुई है| वो बता रहा था कि शायद राजन और उसके परिवार ने राशि का मर्डर किया है लेकिन राशि के परिवार की चुप्पी की वजह से इंवेस्टिगेशन ऑफिसर से मिलकर मामले को आत्म हत्या बना दिया गया|”

सुमेधा ने आश्चर्य चकित होकर कहा “लेकिन पापा मैंने वो वीडियोज भी देखि हैं, जिनमे राशि सुसाइड कन्फेस कर रही है”

सुमेधा के पापा ने सुमेधा के सर पर हाथ रख कर कहा “बेटा सिस्टम को मेरे ज्यादा तुम नहीं समझ सकती हो, यहाँ कुछ भी हो जाता है, कुछ भी मतलब… कुछ भी|”

सुमेधा के पिता ने एक दिन उस महिला मनोचिकित्सक को अपने घर पर बुलाया और उसने भी सुमेधा से बात की

मनोचिकित्सक : बेटा सॉरी बट राजन की सिचुवेसन बेहद ही क्रिटिकल है|

सुमेधा : आखिर उसकी प्रोबलम क्या है?

मनोचिकत्सक : बेटा उस दिन मुझे बस 30 मिनट का समय ही मिला उतने से कुछ बाते मैं डाइग्नोसिस कर पायी हूँ, एंड आई ऍम टोटली श्योर अबाउट दीज थिंग्स

सुमेधा की आँखों में उसकी उत्सुकता साफ़ दिख रही थी| उसने पूछा “क्या बातें?”

मनोचिकत्सक : बेटा पहली बात राजन इज अ ग्रीडी पर्सन, और तुमसे शादी करने के पीछे उसकी कोई बड़ी महत्वाकांक्षा थी|

सुमेधा : तो अब तो मुझसे शादी हो गयी ना फिर वो पागल क्यों है?

मनोचिकत्सक : सुमेधा कोई ऐसा पाप है जो उसने किया और अब वो उसके अपराधबोध में जी रहा है| शायद उसकी पहली पत्नी की आत्महत्या का जिम्मेदार वो खुद को मानता है| और सुमेधा तुम तो अब उसके दिमाग में या उसकी जिन्दगी में कहीं हो ही नहीं|

वो बस अपने उस अपराधबोध से घिरा है पूरी तरह| उसे अपनी पहली पत्नी दिखाई देती है तो साफ़ है कि वो अपनी पहली पत्नी का अपराधी मानता है खुद को| वो अपराधबोध से पूरी तरह से घिरा है सुमेधा|

सुमेधा को ये बात सुनकर अपने पिता की वो बात याद आई कि शायद राजन के परिवार ने राशि की हत्या की है| सुमेधा के मस्तिष्क में ख्याल आया कि हो ना हो राजन ने राशि की हत्या की है| सुमेधा का ह्रदय इस पीड़ा और धोखे से करहा उठा|

सुमेधा के परिवार के द्वारा लगातार सुमेधा को समझाया जा रहा था| सुमेधा राजन को फोन करने का प्रयास कर रही थी तो वो फोन नहीं उठा रहा था|

धीरे धीरे सुमेधा में राजन के परिवार और राजन के प्रति घृणा और राशि के प्रति एक सहानुभूति पैदा होने लगी थी| सुमेधा एक हद तक खुद को भी राशि का अपराधी मानकर चल रही थी| क्योंकि राजन के विवाहित होने के बाद भी सुमेधा ने उससे सम्बन्ध बनाये और कहीं ना कहीं राजन को राशि से दूर करने में सुमेधा की भी भूमिका रही थी|

ऐसे ही लगभग 10 दिन बीत गए थे| इस दौरान सुमेधा ने राजन को देखने जाने की इच्छा प्रकट की तो उसके परिवार ने रोक दिया| और अब सुमेधा के भीतर ही राजन से मिलने की इच्छा नहीं हो रही थी| सुमेधा अपनी नौकरी पर भी नहीं जा रही थी| सुमेधा ने नौकरी से त्यागपत्र भी दे दिया था|

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…..

सुमेधाड्राइंगरूम में बैठकर एक पत्रिका पढ़ रही है| तभी उसके पिता ने सुमेधा के एयर टिकेट्स और आस्ट्रेलिया का वीजा उसके हाथ में ला कर रख दिया|

सुमेधा : ये क्या है पापा?

सुमेधा के पिता ने बेफिक्री से उत्तर दिया “आस्ट्रेलिया में एक बड़े बिजनिस ग्रुप में अच्छा प्रोफाइल है| कल ही आस्ट्रेलिया के लिए फ्लाईट है, वहाँ पर मेरे दोस्त का बेटा जो खुद एक बड़े ग्रुप में “सी ई ओ” है वो तुम्हे पूरा सपोर्ट करेगा|”

सुमेधा को कुछ समझ नहीं आ रहा था| फिर सुमेधा की माँ आई और आँखों में आंसु बहते हुए बोली “देख सुमेधा अब जो हम कहें वो कर, अगर अब भी तू उन भिखारियों के घर में गयी तो हमसे तेरा कोई सम्बन्ध नहीं रहेगा| तू खुद देख चुकी हैं अब उनको|

सुमेधा के दिमाग में वो मजंर घूम गया कि कैसे रजन ने उसको मारा और राजन के पिता ने भी हाथ उठाया|

फिर उसको सहसा ही ख्याल आया कि यदि परिवार से नाता तोड़कर वहाँ गयी भी तो क्या है वहाँ?

लालची सास ससुर और एक पागल पति जो उसे कभी भी पीटेगा|

फिर सुमेधा को सहसा फांसी के फंदे पर लटकता अपना मृत शरीर दिखाई दिया जैसे कभी राशि फांसी पर झूल गयी थी|

सुमेधा अब अपने परिवार के सामने समर्पण कर चुकी थी|

सुमेधा ने बस एक ही सवाल अपने पिता से किया “पापा राजन की और मेरी शादी हुई है”

सुमेधा के पिता ने सुमध के कंधे पर हाथ रखकर कहा “वो मैं देख लूँगा, तुम बस अपनी पैकिंग करो और वहाँ जाकर यहाँ का सब भूलकर अपने कैरियर पर ध्यान लगाओ बस”

सुमेधा चुपचाप अपने कमरे में चली गयी और अपनी तैयारी में लग गयी|

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सुमेधा अपने घर गयी लेकिन राजन पर जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा था| वो अपने कमरे में ही रहा और अगले दिन भी कमरे में ही बंद रहा| राजन कमरे में बैठा अपने अतीत की यादों में चला गया|

जब राशि के घरवाले भी राशि को ही गलत ठहरा कर चले गए तो पहली बार जीवन में राशि ने अकेलापन महसूस किया| राशि के लिए एक वर्ष पहले तक जीवन बेहद ही खुबसूरत था, जब उसकी शादी हुई थी| तब वो एक इज्ज़तदार परिवार की बेटी थी और एक पढेलिखे लड़के से ब्याहकर इस घर में आई थी|

लेकिन इतनी जल्दी, जीवन सच्चाई उसके लिए बदल गयी थी| राशि पर उसके परिवार के सामने पता नहीं क्या-क्या आरोप लगाये गए, उसे चरित्रहीन तक कहा गया| वो मानसिक रूप से अब बिलकुल टूट गयी थी| सुरेश ये ही चाहता था कि राशि मानसिक रूप से टूट जाए| लेकिन राशि को उसके परिवार वाले वापस नहीं ले गए तो इससे राजन और सुरेश को झटका लगा|

राजन ने राशि से किसी भी तरह का संवाद करना अब पूरी तरह से बन्द कर दिया था| अब राशि उस घर में तो थी लेकिन जैसे वो किसी को दीखाई ही नहीं देती थी| उसे कोई खाने को भी नहीं पूछता था| रसोई में वो जाकर जो मिलता बनाकर खा लेती| उस समय भी राजन की माँ कुछ ना कुछ ताने देती रहती थी|

राजन अब राशि के सामने ही सुमेधा से खुलकर फोन पर प्यारभरी बातें करता था|

राशि को अब खुद अपने अस्तित्व से घृणा हो रही थी|

राजन सुबह ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था, तब ही राशि आई और बोली “सुनिए आप मुझसे कितनी भी नफरत कीजिये, लेकिन पता नहीं क्यों? मै आपसे प्यार करना नहीं छोड़ सकती”

राजन ने राशि कि तरफ देखे बिना उससे कहा “प्यार? कैसा प्यार है? यार करती होती तो मुझे खुश रहने देती…छोडकर चली जाती मुझे”

राशि की आँखों में आंसू आ गए और उसने कहा “आपकी ख़ुशी के लिए मैं अपना कुछ भी कुर्बान कर दूंगी”

राजन कमरे से बाहर निकल गया था| पता नहीं उसने ये सूना भी या नहीं|

Horror Story in Hindi | बंधन

….

राजन ऑफिस में ही था तभी उस पर सुरेश का फोन आया, सुरेश घबराया हुआ था “राजन तू घर ना आइयो अभी”

राजन ने कहा “क्या हुआ”

सुरेश : वो ई जिसका डर था बेट्टे, राशि ने आत्महत्या कर ली, तू अभी ऑफिस मै ई रहियो|

इतना कहकर सुरेश ने फोन काट दिया|

तभी राजन की दृष्टि मोबाइल के नॉटीफिकेसन पर गयी, जिसे वो अनदेखा कर रहा था| राशि ने उसे व्हाट्सएप पर मैसेज किया हुआ था| राजन राशि के मैसेज को देखता ही नहीं था|

राजन ने तुरन्त व्हाट्सएप खोला तो उसमें राशि ने वीडियो भेज रखा था| विडिओ में राशि ने नेत्रों से कहा “आज मैं आपकी हर मुसीबत को दूर कर दूंगी| अब मुझे भी खुद से घृणा हो गयी है, मेरी जिन्दगी सबके लिए मुसीबत है| कोई भी तो ऐसा नहीं जिसकी ख़ुशी का कारण मै बन सकूँ, सब परेशान हैं| देखिये ना… मेरे घरवाले भी मुझसे परेशान हैं|”

राशि ने फिर एक रुमाल से पाने आंसू पोछे और फिर एक करुण मुस्कान चेहेरे पर लाकर बोली “आपसे मुझे आज भी प्यार है| आज जब इस दुनिया को छोडकर जाने का फैसला कर लिया है, तब भी मुझे दुःख है तो बस आपसे दूर होने का, पता नहीं मरकर भी आपको भुला पाउंगी या नहीं| और हाँ आप घबराइयेगा नहीं ये विडिओ दिखा देना पुलिस को”

फिर राशि चेहेरे के सभी भावों को छुपाते हुए एक गंभीरता चेहेरे पर लाते हुए बोली “देखिये मेरे पति बहुत अच्छे हैं, इनसे मुझे किसी तरह की कोई शिकायत नहीं| मुझे किसी से भी कोई शिकायत नहीं| मै खुद अपनी जिन्दगी से परेशान होकर अपनी जिन्दगी को ख़त्म कर रहीं हूँ| यदि मेरा परिवार भी आकर इसके लिए मेरे पति या मेरे ससुरालियों पर कोई केस करना चाहे तो उनकी बात ना मानी जाये”

यहाँ विडिओ ख़तम हो गया|

राजन की आँखों से एक बूंद बाहर को निकली लेकिन फिर उसकी आँखों के सामने सुमेधा का चेहरा आया और उसने अपनी आँखों को पोंछ लिया| लेकिन राजन समझ नहीं पा रहा था कि वो खुश है या दुखि|

Horror Story in Hindi | बंधन

…..

राशि ने उस स्टोर नुमा कमरे में ही फांसी लगाकर आत्महत्या की थी जिसका ताला तांत्रिक ने लगवाया था|

राशि ने अपने पिता को भी एक वीडियो भेजी थी जिसमें उसने उनसे कोई भी केस ना करने को कहा था| राशि के परिवार वालों ने हंगामा भी किया लेकिन राशि के ही मोबाइल से दोनों वीडियो मिल गए थे तो सुरेश के लिए आसानी हो गयी थी मामले को दबाने में|

राशि के पिता को अपने वो शब्द कचोट रहे थे जो उसने आखरी बार राशि को बोले थे| इस मामले में राजन या राजन के परिवार का कुछ नहीं बिगड़ा और फिर राशि के परिवार वाले भी चुप बैठ गए थे|

इसके कुछ समय बाद ही सुमेधा और राजन ने शादी कर ली|

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सुरेश ने कई बार सुमेधा के फोन पर उससे संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन वो नंबर लगातार स्विच ऑफ आ रहा था| इधर राजन की हालत लगातार बिगडती जा रही थी| उसने अपने ऑफिस जाना छोड़ दिया था| वो बस अपने ही कमरे में रहता था और अपने आप से ही बातें करता रहता था|

राजन के ऑफिस से भी जब कुछ लोग मिलने आये तो राजन उनसे नहीं मिला| राजन का खाना यदि उसके कमरे में पहुंचा दिया जाता तो ले लेता था| अपने आप से तो वो कुछ बोलता ही नहीं था| कई बार तो वो खाने के लिए भी दरवाज़ा नहीं खोलता था|

इस तरह लगभग एक महिना बीत गया था| सुरेश परेशान होकर सुमेधा के घर पर गया तो वहाँ उसे कोई नहीं मिला वो वापस आ गया| अगले दिन सुरेश सुबह जल्दी ही निकल लिया और सुबह के 8 भी नहीं बजे थे कि वो सुमेधा के घर पहुँच चूका था|

चोकीदार ने उसे अन्दर नहीं घुसने दिया| ये सुरेश को बहुत ख़राब लगा और उसका माथा भी ठनक गया| सुमेधा का पिता बाहर आया और बहुत ही रूखे अंदाज़ में बोला “क्या बात है क्यों आये हो यहाँ?”

सुरेश ने चेहेरे पर जबरदस्ती एक मुस्कान लाते हुए कहा “समधि जी वो बहु से बात नहीं हो पा रही थी तो”

सुमेधा के पिता ने चेहेरे पर कड़ी बेरुखी लाते हुए कहा “कौन समधी और कौन बहु? अपनी औकात में रहो और फिर कभी इधर दिखे तो मैं क्या कर सकता हूँ? ये तुम्हे बताने या दिखाने की जरुरत नहीं है| रुको दो मिनट”

फिर सुमेधा का पिता घर के भीतर गया और कुछ कागज़ लेकर आया और उन्हें सुरेश की तरफ बढ़ाते हुए बोला “वो जो एक गलती मेरी बेटी से हो गयी थी जिसके कारण तुम्हारी हिम्मत उसे बहु कहकर बुलाने की हो गयी…..उसे भी ठीक करना पड़ेगा| ये हैं तलाक के पेपर्स इनपर राजन के सिग्नेचर करवा कर बता देना मेरा कोई भी आदमी आकर ले जायेगा”

सुरेश के लिए ये अनुभव बहुत ही बुरा था| वो अपमानित महसूस कर रहा था लेकिन कुछ कह नहीं सकता था| सुरश ने बस इतना ही कहा “सुमेधा से बात करवाओ जी एकबार और वो लेकर जाए ना राजन के पास आप कौन या मैं कौन जी इन दोनों की जिन्दगी का फैसला करने वाले”

सुमेधा के पिता ने एक कुटिल मुस्कराहट लाते हुए कहा “ठीक है, कोई नहीं…सुमेधा अपनी जिन्दगी का फैसला ले चुकी है| वो इण्डिया से बाहर है.. पिछले 10 दिन से| बाकी अगर तुम ऐसे नहीं माने तो और भी बहुत से तरीके हैं|

याद रखना अगर तुम्हारी वजह से मेरी बेटी को जरा सी भी परेशानी होती है तो तुम ही नहीं वो तुम्हारा सरकारी नौकरी वाला दमाद …..क्या है वो रोडवेज में क्लर्क ना….ऐसे क्लर्को की नौकरी लगाना या छीन लेना मेरे लिए मिनटों खेल है| और हो सकता है कि इससे भी बुरा कुछ हो जाए”

सुरेश पेपर लेकर चुपचाप घर वापस आ गया| वो जानता था कि एक आई ऐ एस क्या नहीं कर सकता?

Horror Story in Hindi | बंधन

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सुरेश घर आया| राजन अपने कमरे में ही था|

सुरेश ने राजन को आवाज़ लगाकर कहा “बेटा राजन दरवाजा खोल सुमेधा के बारे में बात करनी है”

राजन ने दरवाज़ा खोला तो सुरेश वो कागज़ राजन को पकड़ा कर बदहवास सा बोलने लगा “बेटा वो सुमेधा का बाप बोल रहा था कि सुमेधा विदेश चली गयी| अर देखिये ये कागज़ दिए तलाक के| बेटा ऐसे कैसे होगी? एक बार सुमेधा से तो बात कर”

सुरेश ने बदहवासी में और पता नहीं क्या क्या कहा लेकिन उसने ध्यान ही नहीं दिया कि राजन उन कागजों पर हस्ताक्षर कर रहा है| राजन ने वो कागज़ सुरेश को दिए और बोला “इन्हें सुमेधा के पापा को दे देना”

और सुरेश को लगभग कमरे से धकेल कर बहर करते हुए अपने कमरे का दरवाज़ा फिर से बंद कर लिया|

Horror Story in Hindi | बंधन

……

राजन अपने उस कमरे की जिन्दगी में खो चूका था| लोगो को लगता था कि वो खुद से बातें करता है लेकिन राजन राशि से बातें कर रहा होता था| उसके कमरे में बाकी लोगो को जब वो अकेला दीखता था तो वहीँ राजन उस कमरे में राशि के साथ होता था| राजन की नौकरी भी छुट गयी थी| लोग अब उसे पागल मानते थे| घर का खर्च चलाने के लिए सुरेश को एकबार फिर लकड़ी की टाल पर मुनीम की नौकरी करनी पड़ रही थी|

शुरू में सुरेश ने कुछ तांत्रिको और चिकित्सकों को राजन को दिखाया भी, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा था| सुरेश को मुनीम की नौकरी से बस इतने ही पैसे बचते थे कि घर में दाने पानी का काम चल सके|

राजन की इस हालत को सुरेश ने स्वीकार कर लिया था| अब उसके दिमाग कोई एसी कुटिल चाल नहीं थी जो इन हालात को सुधार सके|

सुमेधा जहाँ राजन को छोड़कर अपनी जिन्दगी में आगे बढ़ गयी थी तो राशि मौत के बाद भी इस दुनिया में राजन के साथ ही थी| राशि और राजन के बंधन को मौत भी नहीं तौड़ पायी थी|

Horror Story in Hindi | बंधन

सतीश भारद्वाज


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Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

साथियों नमस्कार,  आज हम आपके लिए एक ऐसी कहानी “Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद” लेकर आएं हैं, जिसे पढने के बाद गरीब और गरीबी के प्रति आपकी सोच में परिवर्तन आ जाएगा| यह पूरी कहानी आपकी सोच को बदल कर रख देगी…


Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

‘कहाँ जा रहा है तू ?’ गंजू ने दौड़ कर जाते हुए संजू से पूछा।

‘मन्दिर’ दौड़ते दौड़ते ही संजू ने जवाब दिया।

गंजू ने तेज़ दौड़ लगाकर संजू की कमीज पकड़ ली।  संजू गिरते गिरते बचा।

‘क्या है… पकड़ा क्यों है… बता तो दिया था मैं मन्दिर जा रहा हूं’ संजू बौखलाया।

‘पर भागता हुआ क्यों जा रहा था … ऐसी क्या बात हो गई ?’ गंजू ने कहा ।

‘तू भूल गया… आज मंगलवार है… आज के दिन एक बहुत बड़ा सेठ मन्दिर में आता है और खूब सारी चीजें बाँट कर जाता है… अगर देर कर दी तो बहुत सारी चीजें खत्म हो जायेंगी।  वैसे भी लम्बी लाईन लग जाती है।  पहले ही देर हो रही थी और अब एक तो तूने आवाज़ लगा दी, फिर पकड़ कर रोक लिया।  छोड़ मेरी कमीज … फट जायेगी … तूने चलना है तो चल … अब तो तेजी से भाग कर जाना पड़ेगा’ संजू ने गंजू को डाँट लगाई।

‘चलो भागो…’ कहते हुए दोनों ही मन्दिर की ओर दौड़ पड़े।

रामभक्त हनुमान जी के इस मन्दिर में हर मंगलवार को बेकाबू भीड़ होती है। अनेक भक्त तरह तरह के प्रसाद चढ़ाते और फिर मन्दिर के बाहर गरीबों में बाँटते।

बहुतेरे भक्त अपनी गाड़ियों में खाने का काफी सामान लाते और लाइन लगवा कर बाँटते। लाइन में लगे प्रसाद पाने वाले लाइन में तो जरूर लगे रहते थे पर एक दूसरे को ऐसे पकड़े रहते थे कि बीच में कोई जगह न बचे ताकि कोई अन्य आकर उस में न घुस जाये।

जब दानी लोग प्रसाद बाँटना शुरू करते तो लाइन में हलचल शुरू हो जाती।  सबसे पीछे खड़ा अपने से आगे वाले को हलका सा धक्का भी मारता तो उसका प्रभाव लाइन में सबसे आगे खड़े तक पहुँचता, ठीक वैसे ही जैसे बिना इंजन की खड़ी रेलगाड़ी में जब इंजन आकर लगता है तो सभी डिब्बे हिल जाते हैं।

Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

कभी-कभी तो इस धक्के में इतना बल का प्रयोग होता है कि सबसे आगे वाला गिरता गिरता बचता है और चिल्लाता है ‘ठीक से नहीं खड़े हो सकते तुम’।

यूँ तो अनेक भक्त प्रसाद बाँट रहे थे।  पूड़ी-आलू की सब्जी का प्रसाद सबसे ज्यादा बँटता था।  इस प्रसाद से वहाँ प्रसाद पाने वालों की क्षुधा शांत हो जाती थी।  प्रसाद पाने वालों को स्वाद की नहीं पेट भरने की चिन्ता होती है।

कुछ प्रसाद पाने की इच्छा रखने वाले ऐसे भी थे जो लाइन में खड़े नहीं हो सकते थे।  वे मन्दिर के सामने सड़क किनारे पटरी पर बैठे थे।  यदि कुछ दानी भक्तों की दयालु नज़र उन पर पड़ जाती जो वे उन्हें वहीं जाकर प्रसाद दे आते और वे काँपते हाथों से प्रसाद पकड़ते।

अक्सर प्रसाद काफी गर्म होता था क्योंकि कुछ दानी भक्त मन्दिर के बाहर स्थित हलवाई की दुकान से ताज़ा ताज़ा प्रसाद बनवा कर बाँटते। पर मुश्किल यह थी कि पत्ते के बने दोनों में प्रसाद पकड़ना प्रसाद पाने वाले के लिए रोहित शेट्टी के शो ‘खतरों के खिलाड़ी’ के खतरनाक स्टंट से कम नहीं होता था।

गर्म पूड़ी और सब्जी का दोना हाथ में आते ही उसकी गर्माहट से हथेलियाँ जल उठती थीं।  एक हथेली से दूसरी हथेली में और दूसरी हथेली से पहली हथेली में पलटते पलटते बुरा हाल हो जाता था।  बीच बीच में फूँक भी मारते रहते।

अब दानी सज्जनों का इस ओर तो ध्यान जाता नहीं था।  वे तो बस प्रसाद खत्म होने तक जल्दी जल्दी बाँटते रहते और खत्म होते ही निकल जाते। उधर जब हथेलियाँ प्रसाद की प्रचण्ड गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पातीं तो उंगलियों से गर्म पूड़ी और सब्जी का निवाला बनाकर मुँह में डाला जाता जो बहुत देर से प्रसाद पाने की प्रतीक्षा कर रहा होता था।

उंगलियां भी जैसे जल जातीं थीं। पर जैसे ही गर्म निवाला मुँह में जाता तो मुँह खुला ही रह जाता और कभी कभी जलन से कराह उठता था तथा जलन को शान्त करने के लिए खुले मुँह से जोर जोर से साँस ली जाती जिससे कि निवाला ठंडा हो जाये।  फिर जैसे-तैसे उसे पेट की अग्नि को शांत करने के लिए निगल ही लिया जाता।

चबाने का मतलब होता कि मुँह ही जल जाये।  मुँह से होता हुआ गर्म निवाला जब अन्दर की ओर बढ़ता तो खाने की नली भी जल उठती और मुँह को कोसती।  मुँह बेचारा भी क्या करता।  वह तो पहले ही जल चुका होता था।  इधर जब खाना पेट में पहुँचता तो भूख की अग्नि गर्म निवाला पहुँचते ही शान्त होने के बजाय बिफर उठती ‘आग में आग कौन डालता है ?’

शरीर में गरम प्रसाद की गर्मी का ताण्डव नृत्य होता।  पेट कराह उठता ‘भूख शान्त करने के बजाय जलाने की यह सजा क्यों ?’ ‘जो मिल रहा है उसे संभालो, हम सबकी किस्मत में यही लिखा है’ हाथ मुंह उसकी कराहट पर बोल उठते।

चूँकि अनुभवी लोगों के लिए यह अनुभव पहला नहीं होता था कुछ अनुभवी प्रसाद पाने वाले अपने साथ पहले ही कुछ व्यवस्था कर लाते थे। उनके मैले-कुचैले थैलों में प्लास्टिक के पुराने बर्तन होते थे और साथ में प्लास्टिक की बोतल में पानी।  बर्तन साफ नहीं होते थे पर इसकी उन्हें चिन्ता नहीं होती थी।  वे तो बस उसे अपने कंधे पर पड़े अंगोछे से पोंछ कर तसल्ली कर लेते थे कि बर्तन साफ हो गया।

इसी तरह प्लास्टिक की बोतल में बंद पानी जो न जाने कब का भरा होता था वही पीते थे।  पर उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुँच चुके वृद्ध जल्दी जल्दी प्रसाद बाँटने वालों के गति से तालमेल नहीं बैठा पाते और बर्तन होते हुए भी उन्हें गर्म दोने पकड़ने पड़ जाते।  जीवन जीने की जंग में कितने घाव सहने पड़ते हैं ये कोई इनसे पूछे।

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कोई घर परिवार तो है नहीं जहाँ बिठा कर आराम से भोजन करवाया जाये। जब आलू-पूड़ी का प्रसाद खा लेने के बाद पेट जैसे तैसे भर लिया तो और खाने की गुंजाइश नहीं होती तो और बँट रहे प्रसाद का क्या करें।  कोई गाय-बैल तो हैं नहीं जो एक बार खूब सारा भर लें और बाद में बैठ कर जुगाली करते रहें।

पर फिर भी पेट भरने के बाद प्रसाद पाने वाले वहाँ से हट नहीं जाते और वे बार-बार प्रसाद की लाइनों में लगते हैं।  इस बार उनके पास प्लास्टिक की थैलियां होती हैं जिनमें वे प्रसाद भरते जाते हैं।  एक ही थैली में पूड़ी, आलू और कभी कभी हलवा यानि मिक्स्ड प्रसाद।  बाँटने वालों के पास इतना समय कहाँ कि वे अलग-अलग थैलियों में प्रसाद दें।

लेने वालों की मजबूरी होती है।  वे गर्मागर्म पूड़ी के करारेपन को गर्म आलू की सब्जी में डूबते देख रहे होते हैं कि इतने में हलवा छपाक से आ पड़ता है।  मजबूरी जो कराये वह कम।  शायद यहीं से आइडिया लेकर कुछ बिस्कुट निर्माताओं ने 50ः50 बिस्कुटों का उत्पादन किया होगा जिसमें मीठे और नमकीन दोनों का स्वाद होता है।

कुछ नौजवान भी प्रसाद बाँट रहे होते हैं पर वे आलू-पूड़ी न होकर बिस्कुट के पैकेट होते हैं।  उन्हें भी भर लेने की लालसा तीव्र होती है।  कभी कभी तो वे हाथ से खींच लिये जाते हैं और बाँटने वाले देखते ही रह जाते हैं।  लेने वाले जब कभी चाय पियेंगे तो साथ में यही बिस्कुट काम आयेंगे।  कितना सोचना पड़ता है इन प्रसाद पाने वालों को, प्रसाद बाँटने वालों से भी अधिक।

गंजू और संजू भी अपना पेट आलू-पूड़ी से भर चुके होते हैं।  उन्हें तो इन्तज़ार है सेठ जी के आने का।  इतने में संजू अपनी निकर की जेब में हाथ डालता है।  ‘जेब में क्या है ?’ गंजू पूछता है ।  जवाब में संजू जेब से निकाल कर हवा में लहराते हुए ‘अरे ये खाली थैली है, प्रसाद इकट्ठा करने के लिये’।

‘तू तो बड़ा समझदार है, मुझे तो यह आइडिया ही नहीं आया, एक और है तेरे पास’ गंजू अनुनय विनय करते हुए बोला।  ‘नहीं’ जवाब मिला। उसे इस बात की ईष्र्या होने लगी थी कि संजू तो आज ज्यादा प्रसाद इकट्ठा कर लेगा।  वह इधर उधर सड़क पर देखने लगा कि शायद कोई थैली मिल जाये।

उसकी निगाह एक थैली पर गयी जिसमें कुछ मिला जुला प्रसाद पड़ा था।  उसने तुरन्त वह थैली उठाई और उसे उलट दिया ।  यानि बाहर का हिस्सा अन्दर और अन्दर का हिस्सा बाहर जिससे प्रसाद बाहर फेंका जा सके।  फिर उसने प्रसाद किनारे लगे डस्टबिन में फेंक दिया और अब बाहरी हिस्से को हाथों से पोंछ लिया।

थैली साफ हो गई पर हाथ सन गए थे जिसे उसने अपने निकर से पोंछ लिया।  अब गंजू को भी तसल्ली हो गई थी कि वह भी प्रसाद इकट्ठा कर लेगा ।

‘सेठ जी की गाड़ी अभी तक नहीं आई।  आज प्रसाद पाने वाले भी ज्यादा हैं।  संजू तू ऐसा कर वहाँ दूर जाकर खड़ा हो जा।  जैसे ही तुझे सेठ जी की गाड़ी नज़र आये तू मुझे इशारा कर दियो और फिर भाग कर आ जाइयो, मैं सबसे आगे खड़ा हो जाऊँगा और तेरे आते ही तुझे भी अपने आगे लगा लूँगा।

कोई पूछेगा तो कह दूँगा कि मुझे कह कर गया था।’ गंजू ने आइडिया दिया।  ‘ठीक है’ कह कर संजू भाग कर दूर चला गया और एक जगह जाकर ऐसे खड़ा हो गया जहाँ गंजू भी नजर आता रहे और आती हुई सेठ जी की गाड़ी भी।

कुछ ही पलों में संजू को सेठ जी की गाड़ी नज़र आई और वह योजना के अनुसार हाथ उठाता हुआ गंजू की तरफ भाग पड़ा।  गंजू ने भी लाइन लगाने का उपक्रम किया।  पर औरों को क्या मालूम कि क्या हो रहा है।  गंजू ने पीछे मुड़कर देखा तो लाइन में वह अकेला ही था।  इतने में संजू भी आ गया और लाइन में अब दो जने हो गये थे।

‘आज मजा आयेगा’ दोनों ही खुशी से कह रहे थे।  इतने में सेठ जी की तथाकथित गाड़ी फर्राटे से उनके पास से निकल गई।  ‘यह क्या, आज सेठ जी ने प्रसाद नहीं बाँटा’ संजू बोला।  ‘अबे तुझे पक्का पता है वह सेठ जी की गाड़ी थी’ गंजू बोला।  ‘हाँ, सेठ जी की गाड़ी ऐसी ही है’ संजू बोला।  ‘ऐसी ही है का क्या मतलब, ऐसी तो कई गाड़ियां हो सकती हैं, तुझे गाड़ी का नम्बर नहीं मालूम’ गंजू बौखलाया।

‘तू तो ऐसे कह रहा है जैसे तुझे नम्बर पढ़ना आता हो, तू पढ़ सकता है गाड़ी का नम्बर, बता सामने वाली गाड़ी का नम्बर क्या है?’ संजू ने पलट कर कहा।  ‘यार कह तो तू ठीक रहा है, हम पढ़े लिखे तो बिल्कुल भी नहीं हैं।  अभी से हमारा यह हाल है तो बड़े होकर क्या होगा ?  हमसे कौन शादी करेगा ?

अगर हो भी गई तो हमारे बच्चे भी क्या यहीं लाइनों में लगेंगे ?’ गंजू ने भविष्य की कल्पना संजू से साझा की थी।  ‘कह तो तू ठीक रहा है गंजू, कुछ सोचना पड़ेगा’ संजू ने सिर खुजाया।  वे यह सब सोच ही रहे थे कि सेठ जी की गाड़ी आ गई और लाइन लग गई।  शोर-शराबे से दोनों का ध्यान टूटा तो देखा कि सेठ जी की गाड़ी में लाया गया प्रसाद बाँटा जाने लगा था।

लम्बी लाइन लग चुकी थी और वे लाइन से बाहर थे।  आज की सोच ने उनकी प्रसाद लेने की इच्छा पर आक्रमण कर दिया था।  प्रसाद पाने की इच्छा छोड़ वे गाड़ी में बैठे सेठ जी के पास गये और उन्हें नमस्ते की।  ‘अरे बेटा, प्रसाद बँट रहा है, जाकर ले लो’ सेठ जी ने प्रेम से कहा।  पर वे वहीं खड़े ही रहे।

‘क्या बात है बच्चो, तुमने प्रसाद नहीं लेना क्या’ दयालु सेठ ने फिर पूछा।  ‘सेठ जी, प्रसाद तो लेना है मगर वह नहीं जो आप बाँटते हैं, हमें कुछ और चाहिए’ दोनों बोले।  ‘बेटा, अगर तुम सोच रहे हो कि मैं प्रसाद में तुम्हें पैसे दूँ तो यह न हो सकेगा, मेरे असूल के खिलाफ है’ सेठ जी ने फिर कहा।

‘नहीं सेठ जी, हमें पैसे भी नहीं चाहियें’ दोनों ने एकसाथ कहा।  ‘तो बच्चो, फिर क्या चाहिए?’ सेठ जी ने उत्सुकता से कहा।  ‘सेठ जी, हम दोनों पढ़ना चाहते हैं, आप हमारे पढ़ाने की व्यवस्था कीजिए’ दोनों ने फिर एकसाथ कहा।

‘क्या … क्या बात है’ कहते हुए सेठ जी गाड़ी से उतर आये।  उन्होंने संजू और गंजू से कहा कि उनकी उम्र के जो भी बच्चे हैं उन्हें इकट्ठा करो। वे दोनों भाग-भाग कर हमउम्र बच्चों को इकट्ठा कर लाये।  10-12 बच्चे इकट्ठे हो गये थे।  सेठ जी ने उन सभी के बारे में जानकारी ली और पूछा ‘तुम में से कौन-कौन पढ़ना चाहता है ?’

हिंदी कहानी Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

सभी के हाथ एकसाथ उठ गये।  सेठ जी हैरान रह गये।  ‘यह मैं क्या प्रसाद बाँटता रहा आज तक, इन दोनों बच्चों ने मेरी आँखें खोल दी हैं, इस प्रसाद के साथ साथ मैं प्रण करता हूँ कि अब मैं शिक्षा का प्रसाद भी बाँटूंगा’ सेठ जी ने मन ही मन कहा।

‘बच्चो, तुम्हारे घरों के पास जो स्कूल है, वहाँ कल सुबह तुम मुझे मिलो, मैं तुम्हारा स्कूल में प्रवेश कराऊँगा और पढ़ाई का पूरा इन्तज़ाम करूँगा।  तुम खूब मन लगाकर पढ़ना और बड़े होकर मेरी तरह बनना’ कहते कहते सेठ जी नरम हो गये थे।  ‘हम भी आप बन सकते हैं’ बच्चों ने एकदम पूछा।

‘हाँ, क्यों नहीं, अगर तुम पढ़ लिख गये तो मेरे से भी ज्यादा आगे बढ़ जाओगे’ सेठ जी ने उत्साहवर्द्धन किया।  ‘वाह, चलो भई चलो, हम सब कल सुबह स्कूल में मिलेंगे’ कहते हुए बच्चे वहाँ से चले गये।  ‘अरे, प्रसाद तो लेते जाओ’ सेठ जी मुस्कुरा कर बोले।  ‘नहीं सेठ जी, आज जो आपने प्रसाद बाँटा है उस प्रसाद को तो हम भी कुछ समय बाद बाँटेंगे और आपको हमेशा याद करेंगे’ बच्चे आह्लादित थे।

‘बच्चो, आज मैंने नहीं तुमने मुझे प्रसाद बाँटा है, अगर तुम न कहते तो मेरे चक्षु नहीं खुलते।  आज तुमने मुझे जीवन में मंगलवार का बहुत बड़ा प्रसाद दिया है कहते हुए सेठ जी अपनी आँखें पोंछने लगे थे।

Hindi Emotional Story | मंगलवार का प्रसाद

सुदर्शन खन्ना


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साथियों नमस्कार, आज हम आपसे एक ऐसी कहानी “Story of Migrant Labor | मिट्टी” साझा कर रहें हैं जो कहीं न कहीं सत्यता से प्रेरित है| सतीश भारद्वाज की लिखी इस कहानी को पढने के बाद आपको कोरोना महामारी के सबसे भयावह दौर के बारे में पता चलेगा|


Story of Migrant Labor | मिट्टी

नारायण और उसकी पत्नी सरस्वती दोनों महाराज गंज से दिल्ली में आकर मजदूरी करते थे| दोनों ही एक फैक्ट्री में ठेकेदार के माध्यम से नौकरी करते थे| यमुना किनारे के खादर में बहुत सी झुग्गियां थी जिनमें ये दोनों रहते थे|

वहाँ एक छोटी सी झोपडी किराए पर ले रखी थी| खाली ज़मीनों पर अवैध झुग्गियां बसाकर किराये पर देना एक अवैध परन्तु संगठित व्यवसाय था भारत में, जिसमें बाहुबली और माफिया घुसे हुए थे|

तीन वर्ष की एक बिटिया थी दोनों की और सरस्वती तीन माह की गर्भवती भी थी| सरस्वती के नाम का अपभ्रंश अब सरसुती हो गया था और नारायण को सब नारान बोल देते थे|

कोरोना महामारी ने भारत में दस्तक दे दी थी| नारायण और सरस्वती जैसे मजदूरों को कोरोना भी कुछ है ये पता तब चला जब लॉकडाउन के कारण दिल्ली के बाज़ार पूर्णतया बंद हो गए|

फैक्ट्री मालिक जो कभी इन मजदूरों से सीधे कोई संपर्क नहीं करता था उसने इन्हें खुद तनख्वाह और कुछ अतिरिक्त पैसा दिया और बोल दिया था कि लॉकडाउन खुलने पर बुलवा लूँगा|

दोनों अपने झोपड़े में रहते थे, गर्मी भी अब परवान पर थी| इनके हाथ में पैसा तो था पर बाज़ार बंद होने के कारण कुछ मिल नहीं पा रहा था| जैसे-तैसे करके कोई दूकान खुली मिल जाती तो उससे ही कुछ राशन ले लेते थे| वो भी महंगी दरों पर मिल रहा था|

लेकिन ये लॉकडाउन की ख़ामोशी कुछ ज्यादा ही भयावह होती जा रही थी| पुलिस जहाँ भीड़ देखती वहीँ खदेड़ देती| पूरी दुनिया मुहँ लपेटे घूम रही थी| बहुत सारे मजदूर अपने घरों की तरफ चल दिए थे| लेकिन ये दोनों रुके हुए थे|

इनकी कोलोनी में भी लोग आते थे इनको मास्क और बिस्कुट बाँट कर फोटो खिंचवा कर चले जाते थे| अफवाहों का दौर गर्म था| लोगो में तरह तरह की चर्चा थी कि हवा से भी फ़ैल रही है ये बिमारी तो|

अब लगभग सभी अपने घरो की और चल दिए थे| कोई मौत को निश्चित मानकर अपने परिवार के पास जाने को आतुर था तो कोई काम धंदा ना होने कि मज़बूरी में| सरस्वती अपनी छोटी बच्ची और अपने गर्भ के कारण हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी|

सरस्वती ने बिटिया को सुला दिया था और एक प्लास्टिक के टुकड़े से उसकी हवा कर रही थी| नारायण आया और एक पैकेट बिस्किट का सरस्वती को दे दिया| सरस्वती ने मुस्कुराकर अभिवादन किया|

नारायण ने गंभीरता से कहा “सरसुती, उ ठेकेदार कहवन कि गाडी जा रहन…..फैइजाबाद तक “
सरस्वती की आँखों में चमक थी “क्या? सच…. तो चलो”

नारायण ने निराशा के साथ कहा “ऊ…. वो गाड़ी वाला …..उ दोनों का पाँच हज़ार रूपया मांग रहल” सरस्वती को झटका सा लगा “पाँच हज़ार, इतना काहे, कोनो कोई जहाज में ले जायेगा”

नारायण : सब गाड़ियाँ बन्द हैं… कर्फु लगा है, पैदल चलने पर भी पुलिस डंडा मार रही है
सरस्वती ने कुछ सोचने के बाद कहा “इतने पैसे तो दे ही देंगे, यहाँ भी कब तक रहेंगे? राशन महंगा भी मिलना मुश्किल हो रहा है|

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वो खाना बांटने वाले भी कभी आते हैं तो कभी नहीं…जब आते हैं तब भी फोटो ज्यादा खींचते हैं”
सास्वती ने नारायण के हाथ पर हाथ रख कर कहा “एक बार गाँव पहुँच जाएँ तो कम से कम अपने परिवार से तो मिल लेंगे”

सरस्वती की इस बात से नारायण भावुक हो गया| उसने बिटिया के सर पर हाथ फेरते हुए कहा “सब बोल रहें हैं कि ये बिमारी नहीं छोड़ेगी, अब जब मरना ही है तो अपने गाँव में मरेंगे| पता नहीं यहाँ तो अग्नि भी नसीब होगी या नहीं?”

सरस्वती ने भी निराशा से कहा “वो जरमन बता रहा था कि मुर्दों को कंधे देने को भी कोई तैयार नहीं है| सड़ रहे हैं मुर्दे…”

नारायण ने कुछ देर चिंतन किया और फिर निर्णायक शैली में बोला “सामान बाँध, अब गाँव में ही जायेंगे”

……………..

ठेकेदार इन सब से पैसे ले रहा था लेकिन फिर भी उसका अंदाज़ ऐसा था जैसे कि इनपर एहसान कर रहा हो| वो ही इन्हें ज्यादा कमाई के सपने दिखाकर दिल्ली लाया था| उसका व्यापार ये ही था, पूर्वी उत्तर प्रदेश से मजदूरों को लाकर यहाँ की फैक्ट्रियों में उनसे काम करवाना|

ठेकेदार ने नारायण के सामान के गट्ठर देखे और बोला “दुनिया में परलय आ रही है और तू ये सामान की गठरी ठाए घूम रहा है| अब तो लालच छोड़ दे नरान| बस राम नाम भज अब| शुकर है ये ले जाने को तैयार हो गए नहीं तो सड़को पर झाँकने भी नहीं दे रही पुलिस”

नारायण ने ध्यान नहीं दिया और ट्रक में चढ़ गया| अपने सामान की गठरी भी उसने ट्रक में ही लाद ली| ट्रक वाले से गोरखपुर तक छोड़ने की बात तय हुई थी और उसने पैसे पहले ही ले लिए थे| ट्रक में नारायण के अलावा 15 या 20 लोग और भी थे जिन्हें उस क्षेत्र में ही जाना था|

ट्रक ड्राइवर ठेकेदार से बोला “मथुरा को ले जाऊँगा, वहाँ चेकिंग से बच जायेंगे, आगे का रास्ता आगे देखेंगे नहीं तो टूंडला मैनपूरी कन्नोज को होते हुए चलेंगे”

ठेकेदार ने ट्रक में चढ़ते हुए कहा “भईया तुमै बताय दिए हैं कि कितै-कितै उतारनो सबन नै, अब जो सही लगे करो| जो जाने वो ताने…. हमतै कछु ना कहो”

सभी को बेहद सुकून महसूस हो रहा था ये सोचकर कि चलो अब अपने गाँव पहुँच जायेंगे| मजदूरों में से ही एक मजदूर ने ट्रक चलते ही महादेव के नाम का उद्दघोष किया बाकी ने भी साथ दिया|

एक मजदूर ने तम्बाखू हथेली पर निकाला और उसमें से कुछ ख़राब तुनके और पत्ती बीनने लगा| तभी नारायण ने आत्मीयता से कह “थोरा सा बढाय लो भईया” उस मजदूर ने मुस्कराहट से नारायण को प्रतिउत्तर दिया|

फिर और भी लोगो ने उसकी तरफ याचना भरी दृष्टि से देखा तो उसने 8 से 10 लोगो के लायक तम्बाखू हथेली पर निकाल लिया और अपनी मस्ती में तम्बाखू और चुने को सधे हुए हाथो से मिश्रण बनाकर रगड़ते हुए गुनगुनाने लग “रउआ…. बिना के पूजी बिरही…..हैह्ह्ह्हह दरद कैसा ……ह्ह्ह्ह”

तभी उसके कंधे पर एक साथी मजदूर ने हाथ रखा तो उसने अपनी गुनगुनाहट को विराम दिया और मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा| उस मजदूर ने संजीदगी से कहा “भईया आये रहे थे कि कछु पैसा कमाकर घर भिजवाएंगे…..बस इसलिए उहाँ वो इहाँ हम बिरहा की आग में जलते रहे”

तम्बाखू रगड़ रहे मजदूर ने खींसे निपोर कर कहा “तो भईया इहाँ आके भइल कोल्हू का बैइल…..कछु हाथ लगा का”

उस मजदूर ने मायूसी से उत्तर दिया “ठेकेदार बोले थे कुछ दिन बाद वापस आ जाना कछु पैसा जोडकर….जो जोड़ा वो तो ले लिहिस इसने… भाड़ा”

तम्बाखू रगड़ते रगड़ते वो मजदूर फिर हंसकर बोला “का भईया भीख ना माँगा वाहे खातिर मजदूरी किये ना| लेकिन का हुआ ……लाइन में लग लग भीख मांगी खाने की……. और ससुरो से फोटू भी खिंचवाए”

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इस बात पर सरस्वती जो अभी तक घूँघट किये मौन थी, वो तुनक कर बोल पड़ी “बहुत लज्जा आती थी, का करे पेट के मारे सब सहना पड़ी| और बार बार पैकेटवा को पकरा कर फोटो खींचते थे”

नारायण को उसका मर्दों के बीच यूँ बोलना अच्छा नहीं लगा| उसने उस पर अपना मर्दाना रोब ज़माते हुए कहा “काहे खखुआ के चढ़ी बईठल, खामोश रहो ना”

इतने समय में उस मजदूर के पारंगत हाथो ने तम्बाखू को रगड़ कर उसे मटमैली से हरी रंगत में बदल दिया था| जब उसने जोरदार थपकी लगाई तो उसकी गंध सबके नथुनों को उत्तेजित कर गयी|

मजदूर तम्बाखू से भरी हथेली आगे बढ़ाते हुए बोला “ई ससुरा कुरोना का का डीएम घुट गइस रगड़ा खाकर| लियो भईया पर तनी हमार लिए बी छोर दीयों” सब मजदूर ठठाकर हंस दिए

सबने थोडा थोडा पत्ती लेकर अपने होठों में दबा ली| नारायण की बिटिया सरस्वती की गोद में ही सो गयी थी| कुछ लोग ऊँघ रहे थे तो कुछ आपसी चर्चा में मशगुल थे|

अभी 2 घंटे का सफ़र ही हुआ था कि गाडी में एकदम से ब्रेक लगे और गाड़ी रुक गयी| अभी वो
सदाबाद के पास ही आये थे| पुलिस चेकिंग से बचने को ड्राइवर अलग रास्तो से आया था|

ठेकेदार भागकर पीछे आया और हडबडाहट में बोला “ उतरो सब नीचे” फिर वो उन्हें सड़क से हटकर अलग रास्ते पर ले गया और आगे जाकर बोला “इस रास्ते से आगे जाकर सड़क पर मिलो सब, चेकिंग चल रई है|

एक बार पकड़ लिया तो उसकी गाडी जपत हो जायेगी और हमे तुमे कर देंगे बंद…….. पुरे मास के लिए” मजदूरों के चेहरे पर अब परेशानी साफ़ दिखने लगी| उन्होंने पैसे सारे दे दिए थे, एक मजदूर बोला “अरे ठेकेदार साहब पुलस से कछु कह सुनकर देख लो ना”

ठेकेदार ने माथे में सलवट डालते हुए कहा “इतनी बुद्धि तो मुझे भी दी है भगवान् ने, बात करेंगे लेकिन भईया इतनो को देखकर आगे ना जाने देंगे”

नारायण थोडा हिचकते हुए बोला “वो आ तो जायेगा हमें लेने ठेकेदार साहब” ठेकेदार ने नारायण के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा “नरान तुम ई ना हो हज़ारो कु काम दिलवाया यहाँ, और अब उनके देश भी पहुंचा रहा हूँ| भिया यो विपदा ई एसी आई है…… कम से कम अपने परिवार से तो मिल लेंगे”

एक मजदूर ने गंभीर आवाज़ में कहा “यो बिमारी तो जी पता नी कितनो मारेगी| अब तो बस इतना होजा कि अंत काल में अपनी मिट्टी मिल जाए बाबु जी”

उसकी इस बात से कई मजदूरों की आँखों में से पानी बह निकला| सरस्वती ने अपने साड़ी के पल्लू से अपनी आँख साफ़ की|

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ठेकेदार ट्रक वाले के साथ गया और वो सब बताये रस्ते के अनुसार चल दिए| जहाँ उन्हें बताया था वो सब वहाँ पहुँच गए| बहुत समय तक इंतज़ार भी किया सूरज सर पर चढ़ आया था लेकिन ठेकेदार का कोई ठिकाना नहीं था|

ठेकेदार का फोन भी नहीं उठ रहा था| काफी प्रयासों के बाद ठेकेदार ने नारायण का फोन उठाया और घबराहट में बोला “ओ नरान, भैया सब आगे बढ़ लो उहाँ से| पुलिस ने गाडी ज़ब्ती कर ली”

नारायाण ने घबराहट में कहा “का कह रहे हो बाबूजी, हमारा का होगा इस परदेश में?”
फोन लाउड मोड़ पर था तो सभी सुन रहे थे|

उधर से ठेकेदार ने कहा “भईया जइसा बोले रहे वइसा करो| ना पुलिस आ रही है सबउको लेने| फिर डाल देंगे कहीं बंदी में| और इहाँ मरे तो भईया पता ना देह को अग्नि भी नसीब हो या ना”

और इतना कहकर ठेकेदार ने फोन काट दिया| अब सभी मजदूरों में घबराहट थी| तभी एक बोला भईया इहाँ से तो चलो पहले ना तो पुलिस आती ही होगी”

जिस मजदूर ने चुना रगड़ा था वो एकदम से बोला “आती ना होगी भईया, भेजी होगी उ छिनार के जने ठेकेदार ने| सब रूपया पईसा तो ठग ही लिए”

अब ठेकेदार का फोन बंद आ रहा था| पुलिस की एक गाड़ी आई और सभी को लाठिया कर खदेड़ना शुरू कर दिया| वो सब गाँव की पगडण्डी की तरफ चले गए तो पुलिस वाले भी वहाँ से चल दिए|

…………………

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मजदूर अभी भी तय नहीं कर पा रहे थे कि करें तो करें क्या? अब किसी के पास ज्यादा पैसे भी नहीं बचे थे| तभी एक मजदूर बोला “अरे ओ भइया चोरासी कोस परिकम्म्मा किये हो कभी?”
लगभग अधिकतर ने कहा “किये हैं भईया”

तब वो बोला “तो चलऊ फिर करते हैं डबल परिकम्मा, वैसे भी पईसा बचा नहीं….और भईया यहाँ रहो या अपने गाम में ये बिमारी छोड़ेगी भी नहीं”

नारायण ने दार्शनिक भाव में कहा “भईया जब मिटना ही है तो अपनी मिट्टी में जाकर मिटेंगे”
और इस तरह सब पैदल और एक लम्बी यात्रा पर निकल लिए| इनमें से सभी का गंतव्य 1000 किलोमीटर से भी ज्यादा था|

लेकिन जीवन भर मजदूरी करने वाला मेहनत से नहीं डरता| वो जानता है अपने शरीर की अंतिम सीमा तक उससे काम कैसे लेना है| उस पुरे दिन वो सभी चले और रात भी काफी समय चलने के बाद एक जगह उन्होंने रात काटी| सुबह फिर चल दिए|

अब उनके पास खाने की भी समस्या हो चली थी परन्तु देहात में उन्हें रास्ते में सहानुभूति भी खूब मिली और भोजन भी| देश का मिडिया 1947 के बाद के इस सबसे बड़े पलायन पर जमकर टीआरपी बटोर रहा था|

लेकिन ये जो पलायन कर रहे थे, इनकी आँखों में बस अपना परिवार और अपना गाँव था| इनमे से किसी को नहीं पता था कि वो एक बड़े वैश्विक मिडिया इवेंट के मुख्य पात्र हैं| ये पलायन
मीडिया में अब कोरोना से ज्यादा चर्चा बटोर रहा था|

तभी चलते चलते सरस्वती को दर्द होने लगा| बाकी मजदूरों को आगे चलने को बोलकर नारायण अपनी बेटी और सरस्वती के साथ वहीँ रुक गया| उसके साथ एक मजदूर और उसकी पत्नी और रुक गये|

उस मजदूर ने नारायण की बेटी को एक बिस्किट जो उसे रस्ते के एक गाँव में मिला था वो दिया| बिस्किट लेते ही उस बच्ची के थके हुए मासूम चेहेरे पर एक सुन्दर मुस्कान फ़ैल गयी जैसे घुप्प अँधेरे में कोई रौशनी की किरण फ़ैल जाती है|

इस महामारी के दौर में भी प्रकृति ने अपनी अप्रतिम सुन्दरता इस बच्ची के मुखमंडल पर बिखेर
दी थी|

सरस्वती एकदम से ज़मीन पर बैठ गयी और पीड़ा से कराहते हुए बोली “अब ना हो पायेगा, देह में बिलकुल जान ना बची है…..पता नही पीड़ा बढती ही जा रही है” और उसके मुख से एक कराहट निकली|

नारायण ने उसके माथे पर हाथ फेरते हुए उसे पानी पिलाया और बोला “हे सरसुती थोड़ी हिम्मत करो रे”

लेकिन सरस्वती की कराहा और पीड़ा बढती ही गयी|
साथी मजदूर ने नारायण को कहा “अरे हो नरान, भोजाई को छाँव में बैठा, कुछ देर बाद आगे चलते हैं”

नारायण ने परेशान होते हुए कहा “भईया यहाँ बियाबान में कहाँ रुके……कोनो मदद भी ना मिले यहाँ तो”

उस मजदूर ने कहा “नरान आगे ना चल पयेगी भोजाई…देख तो तनिक”

सरस्वती को दोनों लोग उठाकर छाँव में ले गए| तभी नारायण ने ध्यान दिया कि सरस्वती को रक्तश्राव हो रहा है| सरस्वती की साड़ी रक्त से पूरी तरह ख़राब हो गयी थी|

सरस्वती दर्द से करहा रही थी| साथ में चल रही स्त्री ने नारायण और साथी मजदूर को अलग जाने का इशारा किया और सरस्वती को संभालने में लग गयी| उसने अपनी एक धोती से पर्दा कर दिया|

नारायाण किसी अनिष्ट की आशंका से घबराकर रोने लगा और साथी मजदूर उसे ढाढस बंधाने लगा| नारायाण की बिटिया को नहीं पता था कि ये क्या हो रहा है? लेकिन वो माँ की दर्द भरी कराहट और नारायण का क्रंदन देखकर घबरा गयी थी|

नारायण को कुछ होश आया तो वो रोती हुई बिटिया को थोडा दूर ले गया| जहाँ उसकी माँ की कराहट की आवाज़ कम आ रही थी| कुछ समय बाद जब सरस्वती शांत हो गयी तो नारायण सरस्वती को देखने उसके पास आया|

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उस महिला ने सरस्वती को दूसरी साड़ी पहना दी थी और रक्त से सनी उसकी साड़ी वहीँ पास में पड़ी हुई थी| उस महिला ने नारायण के पास आकर भीगी आँखों से कहा “भईया सरसुती का लल्ला न रही”

नारायण सरस्वती के पास गया और उसके सर पर हाथ फेरने लगा| उसकी बिटिया कुलबुलाते हुए उसकी गोद में छिप गयी| दर्द से अब राहत थी लेकिन ह्रदय में उसके अजन्मे बच्चे के यूँ काल का ग्रास बन जाने के घाव थे|

ये मानसिक पीड़ा उस दैहिक दर्द से भी ज्यादा थी| अपनी बेटी के कोमल हाथो के स्पर्श से सरस्वती के चेहेरे पर एक शान्ति का भाव आ गया|

सरस्वती ने रोते हुए नारायाण से कहा “देखिये ना हमाये लल्ला ने तो अभी दुनिया देखि भी नहीं थी और लील गयी ये महामारी उसे”

नारायण ने उसे अपने अंक में लेते हुए कहा “रो मत सरसुती, बिटिया घबरा जाई….भगवान् सब सही करेगा”

सरस्वती ने भगवान् को कोसते हुए कहा “हम मजदूरों का कोई भगवान् नहीं……कहीं नहीं जाना मुझे, बस अब तो यहीं मर जाउंगी अपने लल्ला के साथ ही” और सरस्वती हिड्की दे कर रोने लगी|

नारायाण ने कहा “ना सरसुती ना….एसी बात ना कर| जी को तनी मजबूत कर| यहाँ परदेश में ना मरेंगे, मरना है तो अपने गाँव जाकर ही मरेंगे अपनों के साथ”

सरस्वती ने अपनी हिचकी को रोकते हुए कहा “ये भी तो अपना ही था| जिन बच्चो के खातिर इतना दूर आये मेहनत मजूरी करे खातिर, वो ही ना रहे तो काहे लाने गाँव जाएँ”

नारायण ने तब उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा “अपनी मिट्टी की खातिर सरसुती…..जिस मिट्टी से पैदा भये उस मिट्टी में ही मिलेंगे| यो हमारी धरती ना सरसुती…….चलना तो पड़ेगा”

नारायण की बात सुनकर से सरस्वती अतीत की यादों में पहुँच गयी| जब वो पहली बार गोने के बाद मायके से चली थी तो माँ ने रोते हुए विदा करते समय कहा था “यहाँ से तेरी विदाई हो गयी बिटिया, अब अंतिम विदाई ससुराल से ही हो बस”

सरस्वती को याद आया कि जब वो गाँव में आई थी नयी नवेली दुल्हन बनकर तो बस परिवार और कुटुंब ही नहीं पुरे मोहल्ले में उल्लास का माहोल था| वो हर व्यक्ति की बहु, बेटी या भोजाई बनकर आई थी|

मर्यादाओं का बड़ा भार उसके कंधो पर था| चूल्हे को लिपते समय उठने वाली वो सोंधी खुसबू उसके नथुनों में भर गयी| उसके ससुराल की हवाओं की खुसबू और वहाँ की मिट्टी की खुसबू ने उसके मस्तिस्क और उसकी कल्पनाओं को महका दिया|

सरस्वती के निस्तेज चेहेरे पर एक तेज़ आ गया और जोश के साथ वो उठकर चल दी अपनी मिट्टी के लिए, अपने गाँव के लिए|

सतीश भारद्वाज

Story of Migrant Labor | मिट्टी

मेरी ये रचना “Story of Migrant Labor | मिट्टी” समर्पित है उस मजदूर वर्ग को जिसने 1947 के बाद भारत में सबसे बड़ा पलायन सहा| ये शब्द उन मजदूरों की पीड़ा और जिजीविषा की बानगी भर है| कोरोना महामारी के समय मजदूरों के पलायन में एसी अनेक करुणा भरी और साहस से परिपूर्ण घटनाओं का साक्षी ये समय रहेगा| मजदूर ने मेहनत करके शहर खड़े किये, इस देश को खड़ा किया लेकिन भीख नहीं मांगी| जब समस्त विश्व कोरोना महामारी से सहम गया था तब उस मजदूर ने उस जीवटता का परिचय दिया जो इतिहास के पन्नों पर उस मजदूर के अपनी मिट्टी से प्रेम की तरह ही अमिट छाप बना गयी|


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Hindi Poem on Single | हम सिंगल है

साथियों नमस्कार, आज का हमारा यह आर्टिकल “Hindi Poem on Single | हम सिंगल है” हम खास तौर पर उन युवाओं के लिए लेकर आएं हैं जो सिंगल हैं| आशा है आपको हमारा यह आर्टिकल पसंद आएगा|


Hindi Poem on Single | हम सिंगल है

हम सिंगल है,
ऐसा नहीं कि हमें प्यार नहीं हुआ…
हुआ और ना जाने कितनी बार हुआ,
पर उनकी कसम कभी ऐतबार ना हुआ!!
एक तरफा रह गया कभी तीर उनके दिल के पार ना हुआ,
हम सिंगल है,
ऐसा नहीं कि हमें प्यार नहीं हुआ…
प्यार की लत हमें बहुत बचपन में  लग गई,
और डर की लत उससे भी पहले लग गई!!
ओ हमारे नाम से बदनाम भी हो गई,
पर डर के आगे जीत है मेरे जीवन में बस कहनाम रह गई!!
हम सिंगल है,
ऐसा नहीं कि हमें प्यार नहीं हुआ…
उनके हमारे मोहब्बत के किस्से सरेआम हो गए,
हम छोटे से गांव में भी रहकर बदनाम हो गए!!
जब दौर आया मोहब्बत के इजहार का,
तब हम उनके लिए आम हो गए!!
हम सिंगल है,
ऐसा नहीं कि हमें प्यार नहीं हुआ….
कसूर मेरा मै लड़का हूं रोजी रोटी भी कमाना था,
उनकी याद मिटाने के लिए गांव छोड़ शहर भी जाना था!!
शहर की चकाचौंध ने उन्हें भुला दिया,
लेकिन ये दिल है उनसे कोई अच्छी मिली अब दिल उनका दीवाना था!!
हम सिंगल है,
ऐसा नहीं कि हमें प्यार नहीं हुआ…
Anand Maurya

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13 कार्ड रम्मी ऑनलाइन खेलें और पैसे कमाएं | कुछ महत्वपूर्ण बिंदु

साथिओं नमस्कार, आज हम आपके लिए एक ऐसी जानकारी “13 कार्ड रम्मी ऑनलाइन खेलें और पैसे कमाएं | कुछ महत्वपूर्ण बिंदु“:लेकर आएं हैं जिसे पढने के बाद आप अपने फ्री समय में भी पैसा कहा सकते हैं पढ़ें पूरा आर्टिकल


13 कार्ड रम्मी ऑनलाइन खेलें और पैसे कमाएं | कुछ महत्वपूर्ण बिंदु

आज, हर कोई प्रौद्योगिकी में लिप्त है। 4 जी इंटरनेट की दुनिया में, बहुत से लोग वास्तविक दुनिया के बजाय स्मार्टफोन पर समय बिता रहे हैं।

उनमें से बहुत से लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, जबकि कुछ ऑनलाइन 13-कार्ड रम्मी गेम खेलकर अपने स्मार्टफोन को कमाई के हथियार के रूप में उपयोग करते हैं।

एक ऑनलाइन 13 कार्ड रम्मी गेम के प्रवेश के साथ, इसने हर किसी के दिल में एक बहुत ही विशेष स्थान हासिल किया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि रम्मी खेलने से आप एक अविश्वसनीय कमाई विकल्प के संपर्क में आ जाएंगे।

यदि आप ऑनलाइन रम्मी खेलना जानते हैं, तो यह एक तनाव-बस्टर के रूप में भी काम कर सकता है।

13-कार्ड रम्मी के बारे में याद रखने के लिए महत्वपूर्ण बिंदु:

यदि आप भी इस खेल से प्यार करते हैं और बहुत सारा पैसा कमाने की उम्मीद कर रहे हैं, तो आइए देखें कि
ऑनलाइन रम्मी कैसे खेलें।

● आपका पहला कदम उन सभी कार्डों को उचित क्रम में सेट करना होना चाहिए। इसलिए, जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ेगा, आप किसी महत्वपूर्ण कार्ड का उपयोग करने से नहीं चूकेंगे और अपनी रणनीति के बारे में स्पष्ट रहेंगे।

● 13 कार्ड के दौरान रम्मी गेम को आपको एक अनुक्रम तैयार करने की आवश्यकता होती है जिसे ध्यान में रखते हुए आपको कार्ड छोड़ना होगा। एक अनुक्रम में एक ही सूट के शुद्ध अनुक्रम समूह 3 या 4 कार्ड बनाने के लिए, उदाहरण के लिए, हीरे के 2-3-4 कार्ड।

● इस खेल में जोकर का उपयोग बहुत महत्वपूर्ण है। आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आप इसे अपने अनुक्रमों के उच्च मूल्य के लिए उपयोग कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, आपको 3 और 4 के बजाय Q और K के साथ एक समूह बनाने के लिए एक जोकर रखना चाहिए।

● एक बार जब आप एक शुद्ध अनुक्रम बना लेते हैं, तो आप अब एक जोकर की मदद से एक और अनुक्रम बनाने के लिए आगे बढ़ सकते हैं।

● सभी सही कार्ड प्राप्त करने के बाद, एक सेट बनाने का प्रयास करें। उदाहरण के लिए, एक ही मूल्य के समूह 3 या 4 कार्ड लेकिन विभिन्न सूट जैसे, या प्रत्येक सूट।

● एक त्वरित निर्णय लेने की कोशिश करें; ताकि आपके विरोधियों को आपकी चाल के बारे में सोचने के लिए ज्यादा समय न मिले, इसके लिए आपको अपने कार्ड को अपने दिमाग में रखना होगा।

● सेट बनाते समय कार्ड समूह में रंग संयोजन की बेहतर व्यवस्था करें, ताकि गलती का अनुपात जितना संभव हो उतना कम हो जाएगा।

● बड़े नुकसान को रोकने के लिए उच्च मूल्य कार्ड को समाप्त करने पर रखें। मान लीजिए कि आपके पास 4 और 9 के 2 कार्ड हैं और आपको उनमें से किसी एक को निकालने की आवश्यकता है, तो कार्ड 9 निकाल दिया जाएगा।

निष्कर्ष
ऑनलाइन रम्मी कैसे खेलें, इसके बारे में सभी के माध्यम से जाना, यह कहना गलत नहीं होगा कि 13 कार्ड ऑनलाइन रम्मी गेम नियमों और रणनीति का खेल है। एक बार जब आप इसे सही कर लेते हैं, तो आप अपने बैंक बैलेंस को उच्च बना सकते हैं।

ऑनलाइन 13-कार्ड की रम्मी कैसे खेलें, यह याद रखने के लिए ये महत्वपूर्ण बिंदु आपको खेल को बेहतर तरीके से समझने में सहायता कर सकते हैं।

अब, आपको केवल 13-कार्ड रम्मी चैंपियन के रूप में बाहर आने के लिए अपने खेल में इसे बुद्धिमानी से लागू करने की आवश्यकता है।


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Best 3 Bollywood Biography Movies | जीवनी पर आधारित फिल्मे

साथियों नमस्कार, आज हम आपको कुछ ऐसी फिल्मों “Best 3 Bollywood Biography Movies | जीवनी पर आधारित फिल्मे” के बारे में बताने जा रहें हैं जो किसी न किसी महँ व्यक्ति के जिवन से प्रेरित है| इन फिल्मों को बनाने का उद्देश्य आम आदमी के जीवन में एक सकारात्मक परिवर्तन लाना था|

ऐसी कुछ फिल्में जो आपको अपने जीवन में जरुर देखना चाहिए| तो आइये बिना किसी देरी किए पढ़ें हमारा पूरा  आर्टिकल!


Best 3 Bollywood Biography Movies | जीवनी पर आधारित फिल्मे

दोस्तों, फ़िल्में हम सभी के जीवन पर एक गहरा प्रभाव डालती है| हम जिस तरह की फिल्में देखना पसंद करते हैं असल में हम हमारे जीवन में ठीक उसी तरह का परिवर्तन लाना चाहते हैं| इसीलिए अगर आपको फिल्में देखने का शौक है तो हमारे द्वारका बताई गई इन फिल्मों को देखना न भूलें|

1.  Black Friday | ब्लैक फ्राइडे 

स्त्रोत

साल 1993 के बॉम्बे ब्लास्ट तो आपको याद ही होंगे| फिल्म ब्लैक फ्राइडे बॉम्बे ब्लास्ट और उसके बाद पुलिस जाँच की पूरी कहानी बयां करती है| यह फिल्म देखना इसलिए भी महत्वपूर्ण है की इस फिल्म से हमें भारतीय पुलिस के जाँच करने के तरीके पता चलते हैं| हालाँकि इस फिल्म को बनने के बाद भारत में रिलीज़ होने में लगभग तिन साल लग गए| अनुराग कश्यप द्वारा निर्देशित यह फिल्म साल 2007 में बनी थी|

2. No One Killed Jessica | नो वन किल्ड जेसिका

स्त्रोत

साल 2011 में आई इस फिल्म नई दिल्ली के जेसिका लाल हत्याकांड पर आधारित है| नई दिल्ली में रहने वाले एक माडल जेसिका लाल की हत्या कथित तौर पर मनु शर्मा ने कर दी थी जो की कांग्रेस के एक मनोनीत सदस्य विनोद शर्मा का बेटा था| जिसके बाद अदालत नें मनु शर्मा और कई अन्य लोगों को साल 2006 में बा-इज्जत बरी कर दिया था| यह फिल्म इसी जेसिका लाल हत्याकांड पर आधारित है| इस फिल्म में रानी मुखर्जी और विद्या बालन ने अभिनय किया है|

3. Talwar | तलवार

स्त्रोत

नो वन किल्ड जेसिका की ही तरह 2008 के नोएडा के डबल मर्डर केस पर साल 2015 में आई फिल्म तलवार| इस केस में हत्या के मामले में घर में एक लड़की और घर के ही एक नौकर की हत्या कर दी गई थी| जिसमें अपनी बेटी आरुशी और नौकर हेमराज की हत्या के मामले में माता-पिता को ही दोषी ठहराया गया था| इस फिल्म में इरफ़ान खान, कोंकणा सेन शर्मा और नीरज काबी प्रमुख भूमिकाओं में है|

Best 3 Bollywood Biography Movies | जीवनी पर आधारित फिल्मे


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Poem on Womens | महिलाओं के लिए कविता

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए “Poem on Womens | महिलाओं के लिए कविता” लेकर आएं हैं जिन्हें पढ़कर आपको महिलाओं और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक प्रोत्साहन मिलेगा| आप इन कविताओं को किसी भी सभा या उत्सव में पढ़कर सुना सकते हैं|


Poem on Womens | हाँ डरती हूँ में

हाँ डरती हूँ में..जब घर से बाहर निकलती हूँ में..
स्कूल के स्कर्ट से लेकर ,साड़ी पहन कर जब भी सफ़र करती हूँ में ..
पता नहीं डर उन घुरती निगाहो का हैं या उन तानो का…
जो अपने आस -पास रोजाना सुनती हूँ में…
हाँ आज कल नहीं बहुत पहले से डरती हूँ में..
समझ नहीं पाई क्यों कुछ कहने से पहले, टोक दिया जाता हैं..
ओर अगर कुछ कहुँ तो ज्यादा समझदार हूँ कह कर बातो का रुख मोड़ दिया जाता हैं!
किचन से लेकर ड्राइविंग के उदाहरणो के जुबानी तारो में बांध दिया जाता हैं
हाँ में उन जुबानी तारो को तोड़ने से डरती हूँ ..
क्यों की में खुद से जुड़े लोगों ओर रिश्तो का लिहाज करती हूँ,
हाँ शायद इसलिए खुद से डरती हूँ में..
काश मेरे घरवालो ने मुझे ना डरना सिखाया होता..
इस सोच को बस अपनी सोच में ही रखती हूँ में..
जैसे मुझे रोका जाता था..
आने वाली पीढी को में बस थोड़े बदले हुए अन्दाज से टोकती हूँ में..
क्यों की आज से नहीं जन्म से समाज में मेरे चारो ओर खड़े रहे जो,
उन अनदेखे चार लोगों से आज भी डरती हूँ में..
हाँ आज से नहीं सदियों से डरती हूँ में..
अनीता दयाल 

Women’s Day Quotes Poems | महिलाओं के लिए कविता

मेरी उम्र पूछने वाले,
मेरी तकदीर का लिखा कैसे जान जाते हो…
अठारह कहूँ तो  संभलकर रहना बहक जाऊँगी,
यह कैसे कह जाते हो!!
और इककतीस कहूँ तो शादी नहीं होगी,
इसका इतना दुख तुम कयो मनाते हो…
मेरी उम्र पूछने वाले,
मेरी तकदीर का लिखा कैसे जान जाते हो!!
अरे मेरी उम्र पर नजर रखने वाले पहले अपनी तो जी ले,
महज कुछ पलों के राही थोड़ी सी तो सीख ले ले…
तुझे एहसास भी है इस उम्र के खेल में मैंने कितना कुछ हारा है,
मेरी उम्र पूछने वाले मेरी तकदीर लिखा कैसे जान जाते हो ॥

खुद के लिए जीना चाहती हूँ  | Poem on Women’s Empowerment

शौर-शराबे और इस हलचल से दूर,
शांत जीवन जीना चाहती हूँ…
जीती रही अब तक सबके लिए,
कुछ पल अब खुद के लिए जीना चाहती हूँ!!

उन्मुक्त सरिता की तरह मेरा मन,
सिमटता रहा जीवन-कूप के भीतर,
फैला था चरों और मरुस्थल,
धरा टेल फिर भी बहता रहा निर्झर!!

संघर्ष करते करते,
शायद अब मायने ही खो गए…
समंदर में उतारते,
लहरों के भंवर में खो गए!!

वसुंधरा सी सहनशीलता,
है मुझमें सागर सी गहराई,
संसार चक्र की धुरी बनी,
ममता ने जो ली अंगडाई!!

हूँ आदि, मध्य और अंत भी में ही,
जीवन का मूल और सृष्टिकर्ता भी में ही!!


स्त्री शक्ति | Poem on Womens

कभी किसी स्त्री को कम मत समझना,
ब्रह्मा विष्णु शिव जिसके सामने शीश झुकाए,
वह जगदंबा कहलाए!!

हर स्त्री में जगदंबा का वास है,
हर स्त्री में कुछ ना कुछ खास है…
तीनो लोक जिस के गुण गाए,
वह जगदंबा कहलाए!!

जिसके होने से यह जीवन चक्र चलता जाए,
वह एक माँ कहलाए…
जो हर वक्त पुरुष को उसकी रक्षा का एहसास दिलाए,
वह बहन कहलाए !!


वो फिर उठ खड़ी होगी | Hindi Poems on Nari Shakti

वो फिर उठ खड़ी होगी,  तुम्हें राख कर देगी…
वो जवाला है तबाह बेहीसाब कर देगी!!
करके जो उसका अस्तित्व समाप्त, तुम खुश हुए बैठे हो…
अपने को ज्यादा और उसे कम समझे बैठे हो!!
वो फिर उठ खड़ी होगी, शमशीर बना लेगी…
तोड़ कर सारी जंजीरे, अब वो अपनी तकदीर बना लेगी!!
घर हो चाहे कचहरी, हो चाहे कोई भी व्यवसाय…
सूझबूझ से देगी वो अपनी राय!!
रोंद के यह जंगल वो फिर वा़पस आएगी,
पोछ के वो आँसू फिर तुमहे ललकारे गी!!
वो फिर उठ खड़ी होगी, तुम्हें राख कर देगी,

वो जवाला है तबाह बेहीसाब कर देगी!!


रुकती नहीं हूँ | महिला शशक्तिकरण के लिए कविता

गिरती हूँ उठती हूँ
चहकती हूँ बहकती हूँ
सहमती हूँ मुस्कराती हूँ
गूँजती हूँ गाती हूँ
बस……….
रुकती नहीं हूँ
मेरी नींव कुछ य़ूं मजबूत हो चली हैं
कि मैंने ठहरना नहीं दौड़ना सीख लिया है
बिना पंखों के उड़ान भरना सीख लिया है
मैंने सहेली के साथ साथ पहेली बनना सीख लिया है
मैंने अपना रास्ता खुद तय करना सीख लिया है
मेरी नींव इतनी मजबूत हो चुकी हैं
की मैंने अहसान लेना छोड़ दिया है
Poem on Womens
Ritika Pathak

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Poem on Mother in Hindi | माँ पर कविता

भूख-Hindi Kavita

Poem on Lockdown | लॉकडाउन पर कविता

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए “Poem on Lockdown | लॉकडाउन पर कविता“लेकर आएं हैं आशा है आप सभी अपने-अपने घरों में सुरक्षित होंगे|


Poem on Lockdown | लॉकडाउन पर कविता

हर रोज़ सन्नाटा यहाँ हर रोज बढ़ते हैं फासले,
रोज मोतें हो रही, हर रोज़ बढ़ते मामले!
वो वक़्त के मजदुर है साहब पर वक़्त से मजबूर है
सभी जगह लग गए ताले, वो जाएं कहाँ जो मीलों दूर है!!

जीवन की गति अवरुद्ध है, गतिरुद्ध है सारा शहर…
हर रोज बेबसी है, हर रोज़ बस है कोरोना का कहर!!
आना जाना हुआ बंद, बंद हुई सारी यात्राएं,
घरों में कैद होकर यह व्यथा अब किसे सुनाएं!!

पहले सी दिखती नहीं अब रौनकें बाज़ार की,
हर जगह मंदी पड़ी है व्यापै की!!

Poem on Lockdown | लॉकडाउन पर कविता


सन्नाटे का शोर है

सन्नाटे का शोर है
कोरोना का जोर है

धरती सूनी ,सूना अंबर , मानव है कैद घरों के अंदर ।
लॉकडाउन का जोर है

सन्नाटे का शोर है ।

लॉकडाउन का पालन कर हंसते – हंसते
हाथ किसी से ना मिला करले नमस्ते ।

दूर . दूर रहकर भी निभाओ रिश्ते
इस चुनौती को स्वीकार करो हंसते – हंसते ।

सन्नाटे का शोर इक दिन मिट जाएगा
जब विश्व से कोरोना का कहर हट जाएगा ।

Poem on Lockdown | लॉकडाउन पर कविता


“प्रभु और मानव संवाद “

प्रभु आई तेरे द्वार करो स्वीकार अरज है हमारी,
प्रभु दूर करो महामारी।।

चारों ओर हाहाकार मचा,
कोरोना का तांडव है मचा।।

प्रभु वायरस से मुक्त कराओ,
हमे इससे बचाओ, अरज है हमारी प्रभु राखो लाज हमारी।।

प्रभु मानव हैलाचार पडा,
सबका व्यापार है ठप्प पडा।।

प्रभु दूर करो ये तबाही,
प्रभु मिटाओ ये महामारी।।

प्रभु सूनी धरती सूना अंबर,
मानव है कैद घरो के अंदर।।

अब हम है लाचार,
आप ही करो उद्धार।।

प्रभु दूर करो महामारी

तब प्रभु ने कहा – हे मानव !!

मैने धरती पर तुम्हें भेजा था,
पर सेवा का उपदेश दिया।।

तूने मानी ना बात हमारी
मै कैसे करूं मदद तुम्हारी।।

तूने धरती पर अत्याचार किया,
भ्रष्टाचार किया दुराचार किया।।

अब दंड की पारी तुम्हारी,
मै कैसे करूं मदद तुम्हारी।।

नारी का तूने अपमान किया,
कन्याओं से दुराचार किया।।

बढ गई थी ताकत तुम्हारी,
इसलिये औकात दिखाई तुम्हारी ।

मैने मानवता का तुम्हें ज्ञान दिया
तुमने जात-पात मे बांट दिया।।

मानव ने मानव पर अत्याचार किया,
सारी प्रकृति को तूने वीरान किया।।

तूने किसी की ना देखी लाचारी,
अब भुगतने की तेरी बारी।।

मैने पहले भी तुम्हें चेताया था,
बद्रीनाथ मे तांडव मचाया था।।

पर तूने ना दिखाई समझदारी,
तू भी समझ मेरी लाचारी।।

अंबर मे तूने छेद किया,
धरती को भी तूने भेद दिया।।

मैने लाख तुम्हें सचेत किया,
पर तूने मुझे ही चुनौती दे डाली।।

अब जात-पात का भेद मिटा,
मानवता के गुण मन मे जगा।।

माता-पिता का मान बढा,
मातृभूमि का सम्मान बढा।।

मुझसे टकराने की तू मत कर तैयारी,
तभी मदद करुंगा तुम्हारी।।

Poem on Lockdown | लॉकडाउन पर कविता


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पढ़ें  कविता 

माँ पर कविता | Poem on Mother in Hindi

प्यार भरी शायरी | Love Quotes in Hindi

हिंदी कहानी – हाय

साथियों नमस्कार, आज के इस संकलन में हम एक बार फिर हमारी मण्डली के लेखक सतीश भरद्वाज की लिखी “हिंदी कहानी – हाय” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आप भावनाओं के सागर में कुछ इस कदर बह जाएँगे की आपको खुद इस कहानी में होने का अहसास होगा|


हिंदी कहानी – हाय

एक बुढा आदमी तेज कदमो से चलकर आया और खंडहर बन चुके मकान के आगे आकर खड़ा हो गया| ये एक छोटा सा कमरा था जिसकी कड़ियाँ टूटकर नीचे गिर गयी थीं और सामने एक छोटे से आँगन में अब कूड़ा कचरा बिखरा पड़ा था और ऊँची ऊँची झाडिया उगी हुई थीं| काफी समय से ये खंडहर यूँ ही पड़ा था|

बुढा सामने खड़ा हो गया उसकी आँखे सजल थी| फिर उसने एक ऊँची लेकिन करुण पुकार लगायी “ऐ शरबतिया, ऐ माफ़ी दे दे….री क्यूँ इतना जहर घोल री तू| माफ़ करदे शरबतिया…मुझसै बड़ा पाप हो गिया था| मेरी मति मलीन होगी थी री|”

फिर वो बुढा वहीँ धरती पर बैठ गया और जोर जोर से रोने लगा| इतने में ही दो तीन लोग वहाँ आये और उनमें से ही एक युवक ने इस बूढ़े को कन्धा पकड़ कर उठाया “पिताजी घर चलिए, नहीं तो फिर तबियत बिगड़ जाएगी”

बूढ़े ने उसका हाथ झटकते हुए अपनी ही धुन में फिर गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया “री तू तो चाच्ची लगै इन बालको की| ये भी तो तेरे ई बालक हैं| क्यूँ इनका जनम ख़राब कररी तू…..री शरबतिया, दिके अपने नाम कि लाज रखले …बकस दे हम सब कु”

वहाँ और भी लोग इकट्ठा हो गए थे “वो युवक प्यार से समझाते हुए हुए उस बूढ़े को वापस ले गया| तभी वहाँ खड़े एक आदमी ने कहा “भाई भोत बुरी पड़ी शरबतिया की हाय तो लम्बरदार पै”

“लम्बरदार चतर सिंह” ये ही नाम था इस बूढ़े का| देवला गाँव का सबसे धनवान और सबसे बड़ा किसान|

आज से 5 वर्ष पहले की एक घटना, जिसके बाद आज लम्बरदार इस हालत में था|

आप पढ़ रहें हैं सतीश भारद्वाज की लिखी हिंदी कहानी – हाय  

…… …… ……

पाँच वर्ष पहले …

शरबतिया, एक विधवा जो अपने बेटे के साथ रहती थी| इसके और इसके बेटे सुनील के अलावा और कोई नहीं था इनके परिवार में| पति बहुत पहले ही चल बसे थे|

रोजी रोटी के लिए दुसरो के घरों में या दुसरो के खेतो पर मजदूरी कर लेती थी| अपने बेटे सुनील को इसने किसी तरह की कोई कमी नहीं होने दी थी| इसके लाड प्यार का असर ये हुआ कि इनके बेटे ने कभी अपनी जिम्मेदारी को समझा ही नहीं| कस्बे में पढने जाता था तो वहाँ कुछ आवारा लडको से दोस्ती हो गयी|

लेकिन वो आवारा लड़के तो अमीर परिवार से थे तो उनकी आवारगी तो उनका शोक थी| लेकिन सुनील के लिए तो कोई भी शोक ऐब ही था क्योंकि शोक करने लायक गुंजाइश ही नहीं थी|

अपने दोस्तों के साथ उनकी मोटरसाइकिलो और उनकी कारो में घूमता था| कभी-कभी गाँव में भी उनकी कार को लेकर आ जाता था| गाँव वालो को तो इस बात से ही बहुत चिढ थी कि सुनील कभी उनके खेतो पर मजदूरी करने नहीं आया| फिर उसका प्राइवेट स्कुलो में पढना और यूँ गाड़ियों में घुमने से तो बहुत सो की छातियों पर सांप लोटते थे|

एक दिन सुनील अपने किसी दोस्त की कार लेकर आ रहा था कि उसके दुर्भाग्यसे चतर सिंह के बुजुर्ग पिता को कार से टक्कर लग गयी| एक्सीडेंट के नाम से ही कोई भी घबरा जाये ये तो फिर चतर सिंह के पिता थे| सुनील घबराहट में गाड़ी को लेकर भाग गया|

लोगो ने देख लिया था कि टक्कर मारने वाला सुनील है, शरबतिया का बेटा| चतर सिंह के पिता को अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था| जान को खतरा तो नहीं था लेकिन चोटें गंभीर थी फिर आयु भी बहुत हो चली थी, 80 के करीब जा रहे थे|

चतर सिंह या किसी के भी लिए सुनील का यूँ गाडियों और मोटरसाइकिल पर घूमना वैसे भी नागवार ही था| लेकिन आज तो सुनील से बड़ी गलती हो गयी थी| हिंदी कहानी | हाय 

चतर सिंह के घेर में ही गाँव के लगभग सभी सम्मानित लोग बैठे थे| शरबतिया भी बेचारी अपने बेटे सुनील के साथ अपराधीन सी खड़ी थी|

चतर सिंह ने एक तंज कसते हुए कहा “सो बिगा सै बी जादा ई धरती बोरा भाई मैं, अर होर भी काम धंदे… पर रोज नवी नवी गाड़ियों में घूमना तो म्हारे बी बसकी ना”

फिर चतर सिंह ने शरबतिया की तरफ देखते हुए कहा “शरबतिया, कोई नौकरी तो तेरा लौंडा कर ना रा…अर तू बी तुझ मुझ के खेत मै ई मजदूरी करै, कोई केस्सर तो बो ना रखी| फेर रोज नवी नवी गाडी आर ये अजब गजब ढाल की मोटरसाइकिल कहाँ सै आ जा तेरे लोंडे पै”

तभी वहाँ बैठे लोगो में से एक बोला “अजी पढ़न के ना पै पता नी क्या गुल खिलारा यो लोंडा, मुझै तो लगै ये सब गाडी चोरी चकारी की ई चलारा दिक्खै”

शरबतिया जो पहले ही अपराध बोध से दबी पड़ी थी ये हमला तो उसपर बहुत भारी पड़ गया| वो ज़मीन झुकते हुए बोली “चोरी वोरी ना जी, वो तो उसके दोस्तों की हैं जी| बस शोक मै ले आया जी, मै तो ना करू ही जी| पर बस आप तो जानो ई हो आजकल के बालको का मन”

चतर सिंह ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा “हाँ गाम मै बिरसे बि भोत पड़े उसके खात्तर, फेर गाड़ियों मै वो नी तो क्या हम फिरेंगे”

शरबतिया ने रोते हुए चतर सिंह के पैरो को पकड़ते हुए कहा “लम्बरदार जी गलती होगी, वो बि थारा ई बालक है.. माफ़ करदो जी| आज के बाद गाम मै बि न दिखै”

आप पढ़ रहें हैं हिंदी कहानी हाय 

चतर सिंह को जैसे एकदम ताव आ गया “मेरे बुड्ढे बाप कु मरता छोड़ कै भाग गिया अर तू बोलरी माफ़ कर दूँ| उस लोफर कु माफ़ कर दूँ ?”

तभी चतर सिंह का ही ख़ास बोल पड़ा “तेरे लोंडे का तो शोक हो गिया अर म्हारा क्या हाल बन गिया| पता डाक्टर नै अपरेसन बोल दिया हड्डी का| पचास्सो हज़ार का खर्चा आ जागा”

शरबतिया गिड़गिड़ा कर रो रही थी, उस आदमी के भी पैरो में गिर गयी|

तभी वहाँ बैठा एक आदमी बोल पड़ा “सुण री सारा खर्चा तू ई देगी इलाज का”

शरबतिया इस बात पर घबरा गयी| जो मजदूरी में कमाती थी उसमें से सभी कुछ तो खर्च हो जाता था| अपने बेटे सुनील को भी अच्छे स्कुल में पढ़ा रही थी|

जो थोड़े बहुत जेवर थे वो भी बेच ही चुकी थी| घबराते हुए बोली “खर्चा? अभी तो कुछ ना मेरे पास, पर सुनील का टेस्ट पास हो गिया सरकारी नौकरी का…एक एक पाई चूका दूंगी खर्चे की”

तभी एक और व्यक्ति बोल पड़ा “अच्छा तेरा लोंडा तो जागा नौकरी पै अर हम यहाँ डोब भरैन्गे, देख पुलस मै रपट कर दी| या तो सारा खर्चा अर दंड अभी के अभी दे ना तो सांज तक दरोगा जी अपने आप सलट लेंगे”

शरबतिया एकदम से घबरा गयी और चतर सिंह के पैर पकड़ लिए और रोती हुई बोली “माफ़ कर दो लम्बरदार…जिन्नगी बर्बाद मत करो मेरे बेट्टे की| यो थारे सामने खड़ा…. जो सजा देनी दे लो पर मुझ विधवा का सहारा ना छिन्नो”

चतर सिंह बोल पड़े “गरीब ….तू कहाँ की गरीब? लोंडा तेरा गाड़ियों मै घूमरा”

शरबतिया ने उठकर सुनील के चांटे मारते हुए कहा “लम्बरदार सही कहरे तम, खूब समझाऊ ही कि चद्दर सै बाहर पैर ना काढ़, हम मजदुर गरीब हैं”

इतने में ही चतर सिंह के युवा बेटे ने उठकर सुनील के कई चांटे जड़ दिए| और लोगो ने भी सुनील की पिटाई शुरू कर दी|

सुनील के ऊपर पड़ने वाला हर प्रहार शरबतिया को चोट पहुंचा रहा था| लेकिन वो रोते हुए बस ये कहा रही थी “इसे सजा दे लो जी जो देनी है| थारा ही बालक है जी, थारे भरोसे ई इस गाम मै पड़ी ही आज तक| ना तो मुझ विधवा का क्या सहारा?”

तभी पुलिस आ गयी “पुलिस को देखकर शरबतिया घबरा गयी| सुनील के चेहेरे पर खून निकल रहा था लेकिन उसकी घबराहट भी साफ़ दीख रही थी|

पुलिस सुनील को पकड़ कर ले जाने लगी “शरबतिया ने दरोगा के पैर पकड़ लिए, पंचायत में बैठे हर आदमी के पैरो में गिरकर वो गिड़गिड़ायी लेकिन किसी ने नहीं सुनी और पुलिस सुनील को ले गयी|

शरबतिया ने चतर सिंह से कहा “लम्बरदार मुझ गरीब की हाय मत ले, बकस दे हमें| दुबारा मै या मेरा लोंडा तुझै दिखै बी ना गाम मै, लम्बरदार रहम कर मुझ विधवा पर”

लम्बरदार ने ताव में आते हुए कहा “री वो आवारा है जहाँ जागा वहाँ लोफर पाना ई करैगा”

शरबतिया ने याचना करते हुए कहा “ना लम्बरदार सुधर जागा| नौकरी लगन वाली उसकी, उसकी जिन्दगी ख़राब ना करो”

चतर सिंह ने कहा “शरबतिया मेरा लोंडा ऐसा आवारा होत्ता या ऐसा काण्ड करता तो घर मै बी ना बड़ण देत्ता| खुद पुलिस कु सौंप देत्ता”

अब शरबतिया का सब्र का बाँध टूट गया था| उसने अपनी बिखरी आवाज़ में कहा “लम्बरदार बड़े बोल ना बोल, सबके सामनै आं उसके बोल्ले बोल| मेरे सुनील सै गलती हुई पर इतनी बी बड़ी ना हुई के उसकी जिन्दगी बर्बाद कर दो तुम गाम वाले”

लेकिन वहाँ किसी पर शरबतिया की वेदना और पीड़ा का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था|

शरबतिया उठकर चल दी और चलते चलते कहा “लम्बरदार याद रखिये अपने बड़े बोल बी अर इस विधवा कु बी…..एक दिन तू खुद कहगा कि तुन्नै सही ना करा हा, जब तेरे बोल तेरे सामने आकर खड़े हो जावेंगे| तब तुझे पता चलेगा कि एक गरीब की हाय क्या कर सकती है?” हाय | हिंदी कहानी 

…… …… ……

शरबतिया उठकर चली गयी वहाँ से| लेकिन शायद ये उस घटना का असर था या कोई दुर्योग कि शरबतिया की दो दिन बाद ही मौत हो गयी| दुर्घटना का मुकदमा था तो सुनील कुछ दिन बाद ही छुट गया और गाँव छोडकर चला गया|

फिर कभी सुनील गाँव में नहीं आया| सब कुछ सामान्य चल रहा था| चतर सिंह बहुत ही खुश था अपनी जीत पर, लोगो को शान से अपनी पितृभक्ति के बारे में बताता था कि कैसे उसके पिता को चोट देने वाले को उसने गाँव बदर कर दिया|

किसी को एहसास नहीं था उस दुःख और पीड़ा का जो शरबतिया ने सही थी|

शरबतिया का मकान भी जैसे उस दुःख को नहीं सह पाया और टूटकर बिखरने लगा था|

हिंदी कहानी – हाय 

…… …… ……

उस घटना से एक वर्ष बाद एक दिन जब चतरसिंह अपनी बैठक में बैठा था तभी गाँव का एक आदमी आया, वो घबराया हुआ था| अपनी फूली हुई सांस को सँभालते हुए उसने चतर सिंह से कहा “लम्बरदार जी रोहित ने गाडी सै टक्कर मार दी जी”| रोहित चतर सिंह का इकलोता पुत्र है|

चतर सिंह एक दम से खड़ा हो गया और बस इतना ही कह पाया “कहाँ? कैसा है रोहित?”

उस आदमी ने कहा “ वो जी कस्बे के जटिया मोहल्ले में, एक बुढिया थी, टक्कर लगते ई मरगी जी” फिर थोडा रुकते हुए बोला “वो जी दरोगा जी का फोन आया हा, बतारे हे कि रोहित दारु के नशे मै धुत्त था जी, मोहल्ले वालो ने गाडी बी तोड़ दी जी अर रोहित कु बी मार लगाई”

चतर सिंह के चेहरे पर अब घबराहट छा गयी| वो उठकर अन्दर गया और फोन पर दरोगा से बात की फिर निराश होकर बहर आ गया|

उस आदमी ने पूछा “क्या कहरे दरोगा जी?”

चतर सिंह ने दुखि मन से कहा “चिक काटनी पड़ी दरोगा जी कु, भीड़ लगा दी ही उन्होंने थाणे में| मेडिकल हो रा अब”

उस आदमी ने घबराते हुए कहा “मेडिकल मै तो दारु बी आ जागी जी”

फिर चतर सिंह अन्दर जाकर कुछ देर बाद बहर आया और कस्बे की तरफ अपने कुछ शुभचिंतको को लेकर चल दिया| देर रात चतर सिंह वापस आया| कोई भी समझोते को तैयार नहीं हुआ था| रोहित को पुलिस हिरासत में ही रहना पड़ा|

लेकिन चतर सिंह का दुर्भाग्य बस यहीं नही रुका| अगले दिन प्रात: चतर सिंह वापस कस्बे में जाने की तैयारी रहा था, उसके कुछ ख़ास शुभचिंतक भी आ गए थे|

चतर सिंह के मोबाइल की घंटी बजी, उसके दामाद का फोन आया था| वो बहुत ही परेशान था, चतर सिंह की बेटी का विवाह दो वर्ष पहले हुआ था और वो विवाह के बाद पहली बार गर्भवती थी|

चतर सिंह के दामाद ने बाताया “पिताजी रात जैसे ही रोहित के एक्सीडेंट की खबर सुनी तो घबरा गयी| बस क्या कहूँ जी तबियत ख़राब होती चली गयी| डोक्टर के पास भी ले गये लेकिन जी बच्चा मिस्करेज हो गया| इसकी तो हालत अब ठीक है पर मेरे घर में ख़ुशी आने से पहले ही …”इतना कहते ही वो रोने लगा|

चतर सिंह के हाथ से मोबाइल छुटकर ज़मीन पर गिर गया| वो खुद भी धम्म से ज़मीन पर पसर गया| वहाँ खड़े लोग परेशान हो गए और फोन को उठाकर दामाद से बात करने लगे|

हिंदी कहानी | हाय 

…… …… ……

चतर सिंह को दरवाजे पर शरबती खड़ी दिखाई दी| वो वितृष्णा भरी दृष्टि से देख रही थी| लेकिन उसके चेहेरे पर एक मुक्तिभाव प्रदर्शित करती मुस्कान दिखाई दे रही थी|

चतर सिंह उठकर अपने उस दिवास्वप्न के पीछे भाग लिया और भागते भागते शरबती के खंडहर बन चुके मकान के बाहर आकर ज़मीन पर बैठ गया और चिल्लाने और रोने लगा “शरबती मुझे माफ़ कर दे, मेरे जीवन में जहर मत घोल, री अपने नाम की लिहाज कर| शरबती है तेरा नाम, मिठास बाँट जहर मत घोल”

चतर सिंह के कानों में शरबती के वो बोल गूंज रहे थे “लम्बरदार याद रखिये अपने बड़े बोल बी अर इस विधवा कु बी…..एक दिन तू खुद कहगा कि तुन्नै सही ना करा हा, जब तेरे बोल तेरे सामने आकार खड़े हो जायेंगे| तब तुझे पता चलेगा कि एक गरीब की हाय क्या कर सकती है?”

समय अपनी गति से गतिमान रहा सब कुछ बदल गया था| सुनील कभी गाँव में वापस नहीं आया उसकी सरकारी नौकरी लग गयी थी और विवाह भी हो गया था| रोहित के मामले में भी समझोता हो गया था उसका भी विवाह हो गया था|

चतर सिंह की बेटी के घर में भी एक सुंदर पुत्री ने जन्म ले लिया था| सबका जीवन खुशहाल हो गया था| किसी को याद भी नहीं आती थी वो घटनाएं लेकिन चतर सिंह का जीवन जैसे बस उस दिन पर आकर ठहर गया था| वो पागल हो चूका था, उसे घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था|

लेकिन यदि वो कभी घर से बहर निकलता भी था तो सीधा शरबती के खंडहर बन चुके मकान पर आकर ही ठहरता था और शरबती से माफ़ी मांगने लगता था| उसे आज भी शरबती दिखाई देती थी|

हिंदी कहानी – हाय 

लेखक:

सतीश भारद्वाज

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Maha Shivratri Status | महाशिवरात्रि शायरी स्टेटस

साथियों नमस्कार, आज के इस अंक में हम आपके लिए लेकर आएं हैं महाशिवरात्रि पर कुछ खास “Maha Shivratri Status | महाशिवरात्रि शायरी स्टेटस” जिन्हें आप अपने दोस्तों रिश्तेदारों को भेजकर उन्हें महाशिवरात्रि की शानदार शुभकामनाएँ दे सकते हैं|


Maha Shivratri Status | महाशिवरात्रि शायरी स्टेटस

1. लोग नहीं समझेंगे मगर,
ये धन, दौलत, रुतबा सब तुम्हारे बिना व्यर्थ है महादेव!

2. ना महीनों की गिनती है ना सालों का हिसाब है,
मुहोब्बत आज भी महांकाल से बेइंतहा बेहिसाब है!!

3. डमरू बाजे जब शंकर का, दुनिया घुमा देता है…
भरोसा अगर महादेव पर है तो शक ना कर, महादेव जब चाहे तब बाज़ी घुमा देता है!!

4. बस महादेव के आने का इंतज़ार कर रहें हैं,
दिल साइन में नहीं आँखों में धड़क रहा है!!

5. महाशिवरात्रि की करो तैयारी,
आ रहें हैं डमरू धारी!!

6. ॐ नमः शिवाय शब्द में सारा जग समाए,
हर इच्छा पूरी कर जाए भोले बाबा वो कहलाए!!

Mahashivratri Status in Hindi

7. दुनिया वालों से हमें कोई काम नहीं है साहब,
दुनियां बनाने वाले महादेव को हम जानते हैं!!

8. में चूम लूँ मौत को, अगर मेरी एक प्रार्थना वो स्वीकारती हो…
बस मेरी चिता की राख से….बाबा महांकाल की भस्म आरती हो!!


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