Mothers Day Story in Hindi – यादगार दिवाली

Mothers Day Story in Hindi

यह कहानी “Mothers Day Story in Hindi – यादगार दिवाली” एक ऐसी माँ की कहानी है जो अपने बेटे का इंतजार कई सालों से करती है और अपने पड़ोसियों को कहती है की देखना इस बार मेरा बेटा दिवाली पर ज़रूर आएगा और यह दिवाली  “यादगार दिवाली” होगी|

क्या उसका बेटा इस बार दीपावली पर घर आता है ? उसकी दिवाली किस तरह यादगार होती है जानने के लिए पढ़िए Mothers Day Story in Hindi – यादगार दिवाली


Mothers Day Story in Hindi – यादगार दिवाली

शाम होने को थी और जमना देवी शाम वाली पूजा की तैयारीयां कर रही थी तभी ऊपर किराये पर रहने वाली गुड्डू की मम्मी ने उसे आवाज लगाईं “माताजी रावण दहन का समय हो गया है। आप ऊपर आ जाओ”, “आयी बेटी” कहकर जमना धीरे धीरे सीढीयां चढ़ते हुए छत पर पहुँची।

रावण दहन का कार्यक्रम शुरू हो चुका था और आसमान रंग बिरंगे तारो से भरा हुआ था। थोड़ी देर बाद आतिशबाजी कम हो गयी और रावण को आग  लगा देने से पटाखो के शोर से पूरा इलाका गूंज उठा। करीब आधे घंटे चले इस कार्यक्रम को देख कर जमना नीचे पहुंची।

पूजा करने के बाद वो केलेंडर लेकर बैठ गयी। केलेंडर में देखने लगी की दिवाली कितनी तारीख को है? उस दिन कौन सा वार है? ऐसे ही मन में उठे और सवालों का जब उसे जवाब मिल गया तो केलेंडर को रख कर बाकी बचे हुए अपने कामों में लग गयी।

अगले दिन सुबह उठ कर सारे काम रोज से थोडा जल्दी निपटा कर दरवाजे के पास आकर बैठ गयी । मौहल्ले से गुजरने वाले हर आदमी को देख तो रही थी पर उसकी आँखे किसी और की राह देख रही थी ।

काफी देर बाद मौहल्ले में डाकिये को आता देख तुरंत सड़क पर आ कर उसे आवाज लगाई । डाकिये ने उसे देख कर सर हिलाकर डाक नहीं होने का उसे अहसास करा दिया । वो चुपचाप घर में चली गयी ।

अब इसी तरफ की दिनचर्या रोज होने लगी । डाकिया आने तक उसकी राह देखना और उसके मना करने पर वापस घर के अन्दर चले जाना ।

गुड्डू की मम्मी तीन चार दिन तो यह सब देखती रही पर एक दिन उससे रहा नहीं गया और जमना के पास जाकर बोली “माताजी आप रोज डाकिये की राह क्यों देखते हो ? ऐसी किसकी चिट्ठी आने वाली है?”

जमना बोली “चिट्ठी की नहीं मेरे बेटे राजू के तार की राह देख रही हुँ” इस पर गुड्डु की मम्मी ने आश्चर्य से पूछा “आपको क्या पता तार आने वाला है ?” जमना बोली “अरे बेटी तुमें नहीं पता हैं । यही समय होता है उसके तार आने का । दशहरे के दो तीन दिन बाद में उसका तार आ जाता है और दिवाली से पहले पहले वो खुद यहां आ जाता है ।

पहले हर साल आता था मिलने पर जब से यह नयी कम्पनी पकडी है काम में ऐसा फंसा हुआ है कि छः सालों से नहीं आ पाया” गुड्डु की मम्मी इस पर बोली “मुझे कैसे पता होगा  माताजी । इस घर में रहते हुए, मुझे तो सिर्फ चार साल ही तो हुए हैं।

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वैसे परदेश में रहने वाले धीमें धीमें हम देशी लोगों को भूलने लगते हैं । देखते हैं क्या होता हैं इस बार ” जमना ने बड़े गर्व से जवाब दिया “भूलते होंगे पर मेरा बेटा राजू और मेरी बहु रजनी ऐसे नहीं हैं ।

परदेश रहकर भी अपने संस्कारो को कभी नहीं भूले है दोनो । अरे वो तो राजू के पापा ऐसे अचानक से दुनिया छोड़ के चले गये और परिवार की जिम्मेदारी उस पर आ गयी । नहीं तो राजू हमेशा परदेश जाने का मना ही करता था ।”

गुड्डु की मम्मी ने उलहाना देते हुए, बोला “तो आपको इस बुढ़ापे में अकेला क्यों छोड के गया । साथ में ले जाता आपको ।” आवाज में थोड़ा वजन दे कर जमना ने कहा “वो तो खुब पीछे पड़ा लेकिन मैनें ही जिद्द पकड रखी थी नहीं जाने की । मेरा मन तो अपने पति के बनाये इस घर में ही लगता हैं और मुझे यहां कौनसी तकलीफ है ?

अच्छा सा घर है रहने को, खर्चे का पैसा राजू याद रख हर महीने भेज देता है, प्यारे से पडौसी है और रहा मेरा ख्याल वो तुम रखती होना एक बेटी की तरह । और क्या चाहिए ?”

सहमति दिखाते गुड्डु की मम्मी बोली “हाँ आप मेरी माँ जैसी ही हो पर आपको क्या पता इस बार वो लोग जरूर आएँगे ?” जमना ने दिल पर हाथ रख कर बोला “मेरा मन कह रहा है बेटी इस साल वो जरूर आएगा और कई सालों बाद दिवाली का मज़ा आएगा”

“रामजी आपकी इस मन वाली बात की लाज राखें” ऐसा बोल वो ऊपर चली गयी ।

अगले दिन जमना सुबह उठ कर जैसे ही तैयार हुई तो मंदिर चलने का बुलावा आया । उसके जाने का बिल्कुल मन नहीं था लेकिन पडौसन पीछे ही पड गयी कि किसी संत का आगमन है दर्शन करेंगे तो उसने गुड्डु की मम्मी को बुलाया और उसे डाकिये से तार का पता करने तक नीचे ही रहने का बोल कर फिर मंदिर गयी ।

तीन चार घंटे के बाद घर लौटते ही उसने पानी तक नहीं पीया बस एक सांस गुड्डु की मम्मी को आवाज देने लगी । छत पर कपड़े सुखा रही गुड्डु की मम्मी को थोड़ी देर लगी नीचे आने में ।

उसके आते ही जमना ने झट से उससे पूछा “तार आया राजू का ?”वो चुपचाप खडी रही तो जमना निराश होकर नीचे बैठने लगी तभी वो चिल्ला कर बोली “तार आ गया माताजी देखो” ये सुनते ही जमना एकदम से खडी हो गयी और गुड्डु की मम्मी के हाथ से छीन कर तार को पढा ।

जमना के खुशी का ठीेकाना नहीं रहा । दिवानी की तरह हाथ में तार को लिये लिये काफी देर तक दौडती रही । उसके बाद तैयारीयों में लग गयी ।

उसके पास पाँच दिनों का समय था तैयारीयां करने को पर वो तो ऐसे जुट गयी जैसे एक दिन ही बचा हो तैयारी को । घर की सफाई और रंग रोगन करवा कर उसने घर को नया जैसा बनवा दिया और वो भी सिर्फ चार दिनों में ।

पांचवा दिन उसे इंतजार करने को बहुत लम्बा लगा ,ये सोच उसने साज सज्जा वाले को दिवाली पर होनी वाली सजावट का काम दिखाने और समझाने को बुलवा लिया ।

वो पूरे जोश से उसे सजावट का निर्देश देने लगी जिसे सुन कर पडौस की महिलाएं बाहर आ गयी और बोली “जमना बाई ना तो आपके बहु की यह पहली दिवाली है ना ही पोते की । फिर ऐसी सजावट क्यूँ”

जमना ने कहा “मैं, मेरे परिवार से छः साल बाद मिल रही हुँ और मेरा पोता गोलू अब आठ साल को हो गया है । इसलिए, मैं चाहती हुँ इस दिवाली को सबके लिए बेमिसाल बना दूँ । देख लेना तुम सब यादगार होगी ये दिवाली ”

ये सुन सभी महिलाऐं खुश होकर जमना से बाते करने बैठ गयी । बातों बातों में ऑटो रिक्शा की आवाज जैसे ही उन लोगों के कानो में पड़ी वे सब रास्ते पर नजरें गड़ा खडे हो गए ।

रिक्शे में से राजू, रजनी और गोलू को उसमें से निकलते देख पूरे मौहल्लें में खुशी लहर दौड पडी । राजू और रजनी सब बड़ो के पैर छुते छुते जमना के पास पहुँचे तो जमना ने उनको गले लगा दिया । खुशी के मारे जमना के आँसु छलक पडे ।

आँसु को पोंछ कर जमना ने दूर खडे पोते को आवाज लगायी “गोलू मेरे बच्चे आ जा ।” गोलू इन सब दृश्यों को कौतूहल भरी निगाहों से देख रहा था । जमना ने इस बार उसे हाथ से पास आने का इशारा किया तो वो धीमी चाल से चल कर उसके पास आकर खडा हो गया ।

जमना उसे गले लगाकर बोली “कुछ याद है मेरे बारे में या सब कुछ भूल गया । छोटा था तो दिन भर मेरी गोदी में ही बैठा रहता था । अब क्यों दूर खडा है” गोलू ने कुछ जवाब नहीं दिया पर मुस्कुरा दिया । घर के अन्दर पहुँच कर बातो का ऐसा दौर चला कि घंटों उसमें कब बीत गए, पता नहीं चला ।

गोलू कुछ देर तो वहां बैठा रहा बाद में उठ कर पूरा घर घुम कर आ गया । वापस आकर वो बोला “आज बातें ही करना है या खाना भी खाना है” ये सुन सब हँसे और सभा समाप्त करके खाने की तैयारी करने चले गये ।

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एक दो दिन यहां बिताने के बाद गोलू को अब यहां अच्छा महसूस होने लगा । दिन भर घर मे घुमता रहता और जमना से कोई ना कोई सवाल पूछता रहता । जमना उसके सवालों के बहुत प्यार से जवाब देती ।

धीरे धीरे दोनों में दोस्ती हांने लगी । जमना गोलू को उसके और उसके पापा के बचपन की फोटो दिखाती और उससे जुडे किस्से भी सुनाती । बदले में गोलू भी उसे परदेश केकिस्से बताता । गोलू ने उसे यह भी बताया कि परदेश में उसके पापा भी ऐसे ही उसको यहां के खुब किस्से सुनाते थे ।

यह जानकर जमना को बहुत अच्छा लगा । मौहल्लें के कुछ लडको को बुलवा कर जमना ने गोलू से उसकी दोस्ती भी करवा दी ताकि उसका यहां पर मन लगा रहे ।

एक तरफ गोलू नये दोस्तो और अपनी दादी में व्यस्थ था और दूसरी तरफ उसके मम्मी पापा अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने में । दादी और पोते में मजा मस्ती चलती रहती । रोज सुबह जब भी गोलू उठ कर दादी के पास आता वो उससे कहती “तुने बहुत अच्छी बाते सीख रही है बस बड़ो के पैर छुना नहीं सीखा है ।

बेटा बड़ो के पैर रोज छुने चाहिए, और त्योहारो पर तो जरूर” गोलू का इस पर रोज यही जवाब होता “आदर मन में होता है दादी पैरो में नहीं” ऐसे कई तर्क वितर्क उन दोनो में चलते रहते थे।

एसे ही दिन निकलते चले गए, और दिवाली का दिन भी आ गया । जमना ने घर को दुल्हन सा सजवाया जिसे देख सभी अभीभूत थे । सुबह उठकर गोलू जमना के पास आया तो त्यौहार के दिन टोकना उचित नहीं समझते हुए, उसने गोलू को सिर्फ “हैप्पी दिवाली” बोला ।

गोलू वापस हैप्पी दिवाली बोलकर दादी के गले लग और तैयार होने चला गया । घर में सबका पूरा दिन पकवान बनाने और शाम की पूजा की तैयारीयों में बीत गया । शाम को सबने मिलकर धूमधाम से पूजा की ।

पूजा के बाद गोलू ने दादी को एक खास तोहफा दिया । वो खास तोहफा था जमना का पैर छु कर उसे प्रणाम  करना । ये तोहफा पाकर जमना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा । काफी देर तक तरह तरह के आर्शीवाद वो उसे देती रही ।

गोलू ने उसे रोक कर बोला “बस दादी बस । हम दिवाली की रोशनी देखने बाजार जा रहे है । हमें लौटने पर देर होगी आप समय पर सो जाना” जमना बोली “जाओ बेटा जाओ और देखो कितना सुंदर है अपना शहर”

इतने में रजनी भी आ गयी और रवाना होने से पहले बोली “माजी सुबह पाँच बजे गोवर्धन पूजा का महुर्त हैं । हमें आवाज लगा देना अगर आँख ना खुले तो ।”

जमना बोली “हाँ बेटी जरूर । तुम तसल्ली से जाकर आओ” ये सुनकर राजू, रजनी और गोलू खुशी खुशी बाजार चले गए । उनके जाने के बाद भी जमना इतनी खुश और संतुष्ट थी कि बार बार प्रभु को आज के दिन का धन्यवाद देती रही ।

कुछ देर बाद अपनी सारी खुशी को लिए हुए, वो सोने चली गयी । देर रात को वो तीनों बाहर से लौटे और थके हुए सो गए । रजनी सुबह पाँच बजे से पहले उठ गयी और तैयार होकर सास से मिलने पहुँची तो कमरे में अभी भी अंधेरा देख कर उसे आश्चर्य हुआ क्योंकि जमना तो रोज सुबह जल्दी उठती थी ।

रजनी ने कमरे की लाईट जलाई तो देखा जमना सो रही है वो भी बेहतरीन मुस्कान के साथ । उसने दो बार आवाज लगाई लेकिन वो उठी नहीं । उसने शरीर को हाथ लगाया तो वो एकदम ठंडा पडा था ।

ये देखकर रजनी घबरा गयी और “माजी माजी” जोर से चिल्लाने लगी । ये सुनकर राजू और गोलू दोनो आ गए । राजू दौड के डाॅक्टर को लेने गया और गोलू चुपचाप खडा रहा । डाॅक्टर ने आकर जाँचा और कहा “साॅरी” । इतना सुन कर रजनी जोर से जोर से रोने लगी ।

गोलू ने जाकर दादी का हाथ पकड़ा और रोकर बोला “ दादी उठो पैर छुता हुँ । उठो दादी उठो” रूंदन सुन कर पडौसी और ऊपर से गुड्डु के घरवाले भी आ घऐ । हर कोई यह देख कर हैरान था कि जमना बाई का चेहरा इतना जीवंत कैसे लग रहा है ।

सबको ऐसा लग रहा था कि वो सच में बस सो रही है वो भी मुस्कान के साथ । पडौसी की महिलाओं के कानों में एक ही आवाज बार बार गूंज रही थी “देख लेना तुम सब यादगार होगी ये दिवाली।”

Mothers Day Story in Hindi – यादगार दिवाली
लेखक:- धीरज व्यास, पाली


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