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साथियों नमस्कार !

दोस्तों, आप सभी को याद है कैसे हम बचपन में रात हो जाने पर दादी नानी की गोदी में जाकर बेठ जाते थे और उनसे कहानी (Moral Stories) सुनने की जिद किया करते थे | उन कहानियों के राजा-रानी खुद को मानकर हम दादी-नानी लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते गए ज़िन्दगी की भागदौड़ में बचपन की कहानियां जाने कहाँ छुट गई हमें पता ही नहीं चला | कभी-कभी हम उन्हीं कहानियों में खुद को ढूंढने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमें बचपन की वो कहानियां नहीं मिलती |

इसीलिए हमारी वेबसाइट की खास पाठकों के लिए हम ढेर सारी Moral Stories लेकर आएं हैं, जिन्हें पढ़कर आप खुद को बचपन की उन गलियों में  महसूस करेंगे जहाँ कभी आप अठखेलियाँ किया करते थे |

धन्यवाद !!

Moral Stories in Hindi | असली शिक्षक

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए गुरु शिष्य पर आधारित एक ऐसी कहानी “Moral Stories in Hindi | असली शिक्षक” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आपको एक शिक्षक और विधार्थी के बिच के प्रेम व् सामंज्यास को समझने का मौका मिलेगा| आपको हमारी यह कहानी कैसे लगती है हमें Comment Section में जरुर बताएं|


Moral Stories in Hindi | असली शिक्षक

सोमवार की सुबह दिवार पर लटकी संगीतमाय घडी 11 बजने का आभास पहले संगीत से फिर 11 घंटे बजाकर कराती है। रवि के घर में उसके स्कूल जाने की तैयारियां अब जोर पकड़ने लगती है।

वैसे तो रोज इस समय तक सारी तैयारियां हो जाती है पर आज रवि दो दिन से स्कूल जा रहा है| इस कारण तैयारियों का कार्यक्रम तनिक देरी से चल रहा है।

रवि सुबह जल्दी 6 बजे उठ गया था और टूशन जाकर भी आ गया लेकिन वहां से वापस आ कर अखबार पढ़ते पढ़ते उसे नीदं आ गई जो उसकी आँख अभी तोड़ी देर पहले खुली।

स्कूल ड्रेस को वह खुद इस्त्री कर रहा है पर अभी जूते पोलिश करना, बस्ता जमाना भी तो बाकी है। ड्रेस को इस्त्री करते करते रवि अपनी माँ से बोला ”खाना बना कर मेरा टिफिन भी पैक कर देना” माँ ने आश्चर्य से पूछा ”आज लंच टाइम में खाना खाने घर नहीं आएगा क्या?”

उसने बताया “शुक्रवार को स्कूल में बोल रहे थे कि गेट पर ताला लगा दिया जाएगा, जो स्कूल समय में कोई भी बाहर ना जा सके। इसलिए, मेरे तो टिफिन डाल दो क्या पता लंच में आज घर आ पाऊ या या नहीं।” इतना बोल वो वापस तैयारियों में जुट गया।

रवि पास के सरकारी स्कूल में पिछले कुछ सालों से पढ़ रहा है। बचपन से प्राईवेट स्कूल में पढ़ा होने के कारण उसकी अच्छे से तैयार होकर स्कूल जाने की आदत पड़ी हुई थी वरना उसकी कक्षा के कुछ छात्र तो बगैर जूते, कुछ सलवटों से भरी ड्रेस पहने, कुछ के शर्ट बाहर निकले हुए, और कुछ तो बगैर बस्ते हाथ में दो चार किताब लिए हुए आ जाते थे।

समय रहते सारी तैयारी हो गई और रवि तय समय पर स्कूल के लिए निकल पड़ा। स्कूल पहुँच कर रवि सीधा अपनी कक्षा में पहुँचा। बस्ते को कक्षा में रख कर प्रार्थना में जाने के लिए अपने दोस्त विनोद के साथ मैदान की तरफ जाने लगा।

रास्ते में उसने “शनिवार का दिन स्कूल में कैसा रहा” इसके बारे में विनोद से पूछा तो वह बोला ”यार तु तो “शनिवार को आया नहीं पर उस दिन गजब हो गया।

लंच के बाद उपप्रधानाचार्य सर कक्षा में आये और अपनी कक्षा में सिर्फ 5 छात्रों को देखकर काफी नाराज हुए, फिर माॅनीटर से हाजरी भी नोट करवाई।”

”बाकी के सारे कहां गये थे ?” रवि ने पूछा। ”लंच में कुछ खाना-खाने स्कूल से बाहर गये थे जो वापस आए ही नहीं। आज पता नहीं क्या होगा ? मुझे तो अजीब सा ड़र लग रहा हैं।”

विनोद बस इतना बोल के चुप हो गया। ”डर मत यार। मैं तो छुट्टी पर था और तु कक्षा में मौजूद था। तो हम दोनो को डरने की जरूरत नहीं। डरेंगे तो वे बाकी के 60 छात्र जो कक्षा से भाग गए थे।” रवि विनोद को ये सब बोल हिम्मत बढ़ा ही रहा था कि प्रार्थना सभा स्थल आ गया और वे दोनो लाईन में खड़े हो गए।

प्रार्थना अपने निर्धारित समय पर चालु हो गई और जैसे ही खत्म हुई मंच पर से उपप्रधानाचार्य की आवाज माईक से गूंजी ”कक्षा बाहरवीं के छात्रों में से जिनका मैं नाम ले रहा हुँ उनको छोड़ कर बाकी के सारे छात्र उधर अलग लाईन बनाएँ|

विनोद का नाम मंच से बोला गया सो वो तो बच गया लेकिन रवि का नाम नहीं बोले जाने से उसे ताज्जुब हुआ। न चाहते हुए भी रवि को उस अलग वाली लाईन में खड़ा होना पड़ा।

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माईक पर अब बोला गया ”पूरी स्कूल अच्छे से देख लो इस लाईन को। ये सभी भागने वाले महान छात्र है। इनका आज सभी लोग देखलो मैं क्या ईलाज करता हूँ।  “उस लाईन की तरफ हाथ करते हुए, फिर से बोले ”मुर्गा बनो सभी”। ये सुनकर रवि की धड़कने तेज हो गई।

लाईन के सारे लड़के एक दूसरे को देखते रहे पर मुर्गा कोई नहीं बना। ये देख मंच से मुर्गा बनने का निर्देश फिर से गुस्से के साथ दिया गया। डर के मारे धीमें धीमें सारे लड़के मुर्गा बनने लगे लेकिन रवि खड़ा रहा।

वो खड़ा-खड़ा मन ही मन में सोचता रहा मेरी क्या गलती? मैं तो आया ही नहीं था। मैं क्यों मुर्गा बनु। रवि को खड़ा देख कर उपप्रधानाचार्य और ज्यादा गुस्से में आ कर मंच से चिल्लाए, ”लड़के! मुर्गा बन जल्दी”।

रवि ने सर हिलाकर मना कर दिया तो उनका धेर्य जबाव दे गया और मंच पर से तेजी से उतर कर सीधे रवि के पास पहुँचे |आव देखा न ताव उसका कान पकड़ कर मरोड़ दिया।

रवि हिम्मत करके जोर से बोला ”सर मैं छुट्टी पर था। “मैं भागा नहीं” पर वो कहां सुनने वाले थे। उन्होने एक जोरदार थप्पड़ रवि के गाल पर जड़ दिया और उसे झुका कर कमर में मुक्का भी मार दिया।

प्रार्थना में खड़े सभी लोगों का ध्यान इन दोनो पर आ गया। रवि जोर से चिल्लाया ”मेरी कोई गलती नहीं सर। मैंने तो माॅनीटर को छुट्टी की अर्जी भी दे रखी थी। आप उससे पुछते क्यों नही।”

वक्त की नजाकत को समझ माॅनीटर भी दौड कर झट से आ गया और कहा ”हाँ सर। रवि का प्रार्थना पत्र मेरे पास आया हुआ था और वो सच में छुट्टी पर ही था।” माॅनीटर की बात उनके कानो में जाती तब तक वे एक और थप्पड़ रवि को लगा चुके थे।

उपप्रधानाचार्य के रूकने पर रवि के सब्र का बांध टूट गया। ”मुझे ऐसी स्कूल में पढ़ना ही नहीं मैं तो घर जा रहा हुँ।” ऐसा बोलकर वो प्रार्थना स्थल से निकल पड़ा। पिछे से उसके सर चिल्लाए, ”जा चला जा। अब अपने पापा को स्कूल लाएगा तभी स्कूल में आ पाएगा”

रवि गुस्से से लबरेज पर मन से रूआंसा कक्षा में गया और अपना बस्ता उठा कर तेजी से वहां से चला गया। घर पहुँच कर जैसे ही रवि ने माँ और दादी को देखा तो उसकी आँखो से धड़ा धड़ आँसु पड़ने लगे। उसे रोता देख दोनो ने एक साथ पूछा ”क्या हुआ स्कूल में?”

रोते-रोते उसने सारी बात बतायी तो दोनो को बहुत गुस्सा आया पर खुद को और रवि को कैसे भी करके उसके पापा के आने तक का इंतजार करने का समझाया। पापा लंच में घर आए, तब तक रवि चुपचाप बैठा बैठा कुछ सोचता व रोता रहा।

माँ और दादी ने उसे खाना खीलाने की बहुत कोशिश की पर उसने कुछ नहीं खाया। पापा के घर आते ही रवि की दादी ने सारी बात बताते हुए, बोला ”अभी के अभी जा कर आ इसकी स्कूल और पता कर बात क्या है ? फालतु में मार दिया मेरे बच्चे को।”

पापा रवि को लेकर स्कूल पहुँचे। प्रधानाचार्य शहर से बाहर गए हुए थे और उपप्रधानाचार्य अन्य शिक्षकों साथ स्टाफ रूम में बैठे हुए थे। दोनो स्टाफ रूम पहुँचे और रवि के पापा ने उनको कहा ” सरजी गलती होने पर भले आप इसे पचास थप्पड़ मारों पर आपने तो बगैर गलती इसे मार दिया। एक बार इसकी बात तो सुनते।”

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इतना सुनते ही स्टाफ रूम में दूसरे अध्यापक भी आ गए| रवि के पापा सरकारी अधिकारी है इसलिए स्कूल में कई लोग उन्हे जानते है वे भी वहां आ गए| सर जी का गुस्सा अभी उतरा नहीं था सो उन्होने बेरूखी से जवाब दिया ”क्या हो गया मारा तो। इतना तो शिक्षक को हक होता है मारने का और गेहुं के साथ एक दो जौं पीस ही जाते है इसमें इतना बवाल काहे का।

इतने में रवि के दादा घर से होकर स्कूल पहुंचें| उनका शहर में बहुत रूतबा था जो वो सीधे स्टाफ रूम में आकर जोर से बोलने लगे, “कौन है वो मास्टर जिसने मेरे पोते को मारा है। उसकी इतनी हिम्मत मेरे बच्चे को हाथ लगाया। मैं उसका तबादला करा दूंगा।

उपप्रधानाचार्य उनके सामने आकर उनसे जोर से कुछ बोलने लगे तो उनकी बात काट कर रवि के दादा बोले ”जेल भिजवा दूंगा और नौकरी भी चली जाएगी मैंने पुलिस केस कर दिया तो।”

ये सुनते ही कक्षा के अन्य अध्यापक जो अध्यापक दल का नेता था रवि के दादा से भीड़ गया। स्टाफ रूम का माहौल अब तो ऐसा हो गया जैसे कोई सब्जी मंड़ी हो। दोनो पक्ष ज़ोर-ज़ोर  से चिल्लाने लगे। बड़ी मुश्किल से रवि और उसके पापा ने दादा को शांत करा कर रवाना किया।

उनके जाते ही सारे अध्यापक उपप्रधानाचार्य और संघ के नेता अध्यापक के साथ हो गए और रवि व उसके पापा को तरह तरह के ताने मारने लगे| एक बोला ”जमाना बहुत खराब है। गुरू की कोई इज्जत ही नहीं बची है।” दूसरा बोला ”मार दिया तो क्या हो गया? अब क्या माफी  मांगे पूरी कक्षा से|

एक अन्य बोला ”पुराने जमाने में लोेग स्कूल में कहने को आते थे कि मेरे बच्चे को मार मार के सुधारो और अब आज के जमाने के लोग लड़ने के लिए आ जाते है कि मेरे बच्चे को क्यों मारी।

एक के बाद एक कईयों ने अपनी भड़ास निकाली। सब के ताने सुन रवि ने अपने पापा का हाथ पकड़ा और उनसे बोला ”पापा चलो यहां से। मुझे नहीं पढ़ना इस स्कूल में। मुझे टी-सी- दिलवा दो। मै प्राईवेट ही बोर्ड की परीक्षा दे दूंगा| ये सुन कर आध्यापक बोला ”ये बात ,कदम सही है। हमें भी हमारे यहां नहीं चाहिए ऐसे विद्यार्थी|

ऐसा नहीं कहते बेटे। मैं बात कर रहा हुँ न।” रवि के पापा ने उसे समझाते हुए कहा। एक तरफ तो रवि के पापा रवि और उपप्रधानाचार्य में सुलह कराने की कोशिश कर रहे थे तो दूसरी तरफ अन्य अध्यापक उन्हें ताने मारने में व्यस्थ थे।

इन सब शोरगुल के बीच स्कूल के सबसे वरिष्ठ अध्यापक बाबुलाल अखबार पढ़ने का नाटक करते हुए सब चुप चाप देख रहे थे। आखिरकार जब उनसे रहा नहीं गया तो उठ कर बोले “ये कोई वक्त और मौका नहीं है आपसी एकता दिखाने का। इस बच्चे के साथ गलत हुआ है। हमें हमारी गलती माननी चाहिए।

हमारा काम सिर्फ पढ़ाना ही नहीं हैं। पढ़ाई के प्रति छात्रों का रूझान बनाये रखना भी हमारी जिम्मेदारी हैं। हमें हमारे सम्मान की चिंता छोडकर बच्चे के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए।”

इतना सुन कर स्टाफ रूम में ख़ामोशी हो गयी क्योंकि सभी लोग बाबुलाल की बहुत इज्जत करते थे। बाबुलालजी रवि के पास गये और उसके सिर पर हाथ फेर कर उससे बोले ”बेटा गुस्से में आदमी को सही गलत का कोई ध्यान नहीं रहता।

इस कारण उससे गलती हो जाती है। इस बात को एक बुरा सपना समझ कर भूल कर पढाई और अपने आने वाले भविष्य के बारे में सोचो।”

”पर ये सारे लोग नहीं भूलेंगे। मेरे कम सत्रांक भेजेंगे| मुझे कक्षा में नीचा दिखाएँगे मुझे जानबुझ कर तंग करेंगे ऐसे माहौल में पढ़ा नहीं जा सकता।” रवि ने उखड़े मन से जवाब दिया।”

कोई कुछ नहीं कहेगा तुझको। कोई कुछ भी कहे तो वो कक्षा छोड़ कर मेरी कक्षा में आ जाना। खाली समय में में मेरे पास आ जाना मै अतिरिक्त पढ़ा भी दूंगा तुझे। कोई टी-सी- नहीं लेना। तु तो मेरे बेटा जैसा है।

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ऐसा बोल उन्होने उसे गले लगा लिया। बाबुलाल के गले लग कर रवि का गुस्सा शांत हुआ और स्कूल में पढ़ने को तैयार हो गया। रवि को बिना गलती मिलें उस दंड और अपमान को भुलाने में कुछ वक्त लगा।

कुछ दिन बाद उसने वापस स्कूल जाना शुरू भी कर दिया। पर अब वह जब भी पढ़ने बैठता उसे वो घटना फिर याद आ जाती और पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता।

ये बात उसने बाबुलालजी को जा कर बोली। तो उन्होने समझाया की अगर तुम अपमान का बदला लेना चाहते हो तो ईज्जत पा कर लो। पढ़ाई कर के ऐसा परिणाम लाओ की तुम्हारी पूरे स्कूल में ईज्जत हो।

जिन लोगों ने तुम्हारा अपमान किया है वो ही तुम्हारी प्रशंशा करें यही असली बदला होगा। तुम्हारा आज से यही लक्ष्य होना चाहिए। आज नही तो कल गलती करने वालों को ग्लानी जरूर होगी।”

ये बात रवि के दिमाग में ठीक से बैठ गयी और वो पढाई में लग गया। पूरे साल बाबुलालजी प्यार से उसका हौसला बढ़ाते रहे। कुछ महीनों बाद हुई बोर्ड की परीक्षा में रवि ने अच्छे से सारे पेपर हल किए।

परीक्षा परिणाम में जब रवि प्रथम श्रेणी से पास हुआ तो वह बहुत ख़ुशी से बाबुलाल सर से मिलने स्कूल पहुँचा तो उसे पता चला कि अपनी कक्षा में सिर्फ वो अकेला ही प्रथम श्रेणी से पास हुआ है।

स्कूल वालों को परिणाम से आश्चर्य हुआ फिर भी सबने उसे बधाई दी। अगले दिन अखबार में अपनी फोटो देखते ही रवि की आँख भर आई। उसने अपनी माँ को बोला ”मेरी पूरी स्कूल में बहुत सारे शिक्षक थे। पर वो शिक्षक जिनकी वजह से मुझे यह ख़ुशी मिली वो अकेले बाबुलालजी है। वो ही है पूरी स्कूल के असली शिक्षक है।

Moral Stories in Hindi | असली शिक्षक
लेखक-धीरज व्यास, पाली


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साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए कुछ खास “Hindi Short Stories for Kids” लेकर आएं हैं जिन्हें आप अपने घर परिवार के बच्चों को सुनाकर उन्हें ज़िन्दगी की बड़ी सिख दे सकते हैं| आशा है आपको हमारा यह संकलन पसंद आएगा|


“सोच समझ कर बोल | Hindi Short Stories with Moral”

एक बार की बात है एक संपन्न राज्य में एक राजा निवास करता था| राज्य में सभी सुख-संपन्न थे लेकिन राजा के कोई संतान नहीं थी| संतान सुख न पाकर हमेशा राजा दुखी रहता था|

एक बार राज्य में एक बहुत ही जाने माने साधू अपने साधुओं की टोली के साथ आए| राजा को जब साधू-महात्मा के आने की खबर मिली तो राजा बहुत प्रसन्न हुआ|

अगले दिन ही राजा सुबह-सुबह साधू-महात्मा की कुटीया में पुछा और संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थना करने लगा| राजा की बात सुनकर साधू ने कहा – “राजन! आपके प्रारब्ध में संतान नहीं लिखी है| आपकी इस समस्या के लिए में आपकी कोई मदद नहीं कर सकता|

साधू की बात सुनकर राजा उदास हो गया और उदास मन से ही साधू की कुटिया से लौट गया| इधर साधू-महात्मा के एक शिष्य ने जब राजा को अपने लाव-लश्कर के साथ कुटिया से लौटते देखा तो राजा से यहाँ आने का कारन पूछा|

राजा ने अपनी समस्या साधू के शिष्य के समक्ष रखी| शिष्य ने राजा को आश्वाशन दिया की राजन आप चिंता न करें आपकी मनोकामना जरुर पूरी होगी| शिष्य की बात सुनकर राजा प्रसन्न मन से महल में लौट गया|

इधर साधू-महात्मा को जब शिष्य और राजा की वार्ता का पता चला तो वह  शिष्य पर बहुत नाराज़ हुए की जब राजा के भाग्य में संतान प्राप्ति नहीं थी तो तुमने राजा को संतान प्राप्ति का आश्वाशन क्यों दिया|

गुरूजी की बात सुनकर शिष्य बोला, “गुरूजी! राजा को उदास देखकर मेरे मुह से निकल गया| अब में क्या करूँ”

गुरूजी ने शिष्य को कहा, “अब अपने वचन के कारण तुम्हें ही राजा के घर पुत्र बनकर जन्म लेना पड़ेगा|”

समय पाकर राजा के घर एक पुत्र का जन्म हुआ| राजा का पुत्र सब शुभ लक्षणों से संपन्न था, पर उसमें एक दोष था की वह मुह से कुछ नहीं बोलता था|

राजा ने दूर दूर से कई जाने माने वैध-हकिम बुलाए लेकिन कोई फायदा न हुआ| राजा ने पुरे राज्य में खबर करवा दी की जो भी राजकुमार को बुलवाएगा उसे एक लाख रूपए का इनाम दिया जाएगा|

कई लोग महल में आए, उन्होंने कई तरह के उपाए किए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ|

समय बीतता रहा| समय के साथ-साथ राजकुमार भी बड़ा हुआ| एक दिन राजकुमार कुछ सैनिकों के साथ जंगल में शिकार के लिए गया| वहां एक शिकारी शिकार की तलाश में बैठा था| शिकारी काफी देर से शिकार के लिए पक्षी खोज रहा था लेकिन उज़े कोई भी पक्षी दिखाई नहीं दे रहा था|

आप पढ़ रहे हैं “Hindi Short Stories for Kids | सोच समझ कर बोल”

तभी पास ही के पेड पर बैठा एक पक्षी बोल पड़ा| पक्षी की आवाज़ सुनकर शिकारी की नज़र पक्षी पर पड गई और उसने तीर से निशाना लगा कर पक्षी को मार गिराया|

राजकुमार पास ही से इस पुरे वाकिये को देख रहा था| पक्षी के शिकार बनते ही राजकुमार बोल पड़ा, “बोला तो मरा”| राजकुमार के बोलने पर सब आश्चर्यचकित हो उठे और तुरंत राजकुमार को लेकर राजा के पास पहुंचे|

राजा के पास पहुंचकर सैनिकों से सारी बात महाराज को बता दी| राजा को सैनिकों की बात पर बिलकुल भी यकीन नहीं हुआ| उसे लगा सैनिक एक लाख के इनाम के लिए राजा को राजकुमार के बोलने की झूंठी कहानी बता रहें हैं|

राजा ने सैनिकों की बात को झूठा मानकर सैनिकों को फांसी का हुक्म सुना दिया|

सैनिकों को फांसी का हुक्म सुनकर राजकुमार फिल बोल उठा, “बोला तो मरा”

राजकुमार की बात सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ| राजा ने राजकुमार से साफ-साफ पूरी बात बताने का आग्रह किया|

राजकुमार ने  महाराज को प्रणाम किया और बोला, “महाराज! में वही साधू हूँ जिसने आपको संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दिया था| आपके भाग्य में संतान नहीं थी लकिन में बोल गया और मुझे आपके घर संतान बनकर जन्म लेना पड़ा|

अगर में न बोलता तो मुझे मरकर पुनः जन्म न लेना पड़ता| ऐसे ही शिकार के वक़्त अगर वह पक्षी न बोलता तो वह भी नहीं मरता|

अगर सैनिक मेरे बोलने का समाचार आपको न सुनते तो उन्हें भी फांसी की सजा न होती| यह सब बिना सोचे समझे बोलने का परिणाम है|

इसीलिए मेरे मुह से निकला “बोला तो मरा”

अब में भी जाता हूँ क्यों की में भी बोल गया| बस इतना कहकर राजकुमार मर गया|

इसलिए कहा गया है की “बिना सोच विचार के कभी भी नहीं बोलना चाहिए|”

Hindi Short Stories for Kids | लालची राजा


“सो रूपए की एक बात | Hindi Kahani”

एक नगर में एक सेठ रहता था| सेठ बड़ा ही इमानदार और धार्मिक प्रवृत्ति का इन्सान था| एक दिन सेठ के यहाँ विचरण करते हुए एक पंडित जी आए| पंडित जी के चहरे से झलकते तेज़ से प्रभावित होकर सेठ पंडित से प्रभावित हो गया|

पंडित ने आदरपूर्वक साधू महात्मा को बैठाया और उनकी अच्छे से आवभगत की| जब पंडित जी पुनः जाने लगे तो सेठ ने उनसे अपने व्यापार में लाभ के लिए कुछ बाते बताने का आग्रह किया|

सेठ की बात सुनकर पंडित जी बोले, “सेठ जी! बात तो में आपको बता दूंगा लेकिन एक बात के सो रूपए लूँगा|”

सेठ जी ने पंडित की बात मान ली और बोले, “पंडित जी आप बात बताएं, रुपयों की चिंता आप न करें! आपको रूपए मिल जाएँगे”

पंडित ने पहली बात बताई, “छोटा आदमी यदि बड़ा बन जाए तो उसे बड़ा ही मानना चाहिए, छोटा नहीं समझना चाहिए”

सेठ ने मुनीम जी को पंडित जी को सो रूपए देने का कह दिया| सेठ की बात मानकर मुनीम जी ने पंडित को सो रूपए दे दीए|

पंडित ने आगे और बात बताने का आग्रह किया| पंडित जी बोले, “दुसरे के दोष को प्रकट नहीं करना चाहिए”

सेठ के कहने पर मुनीम ने इस बात के भी सो रुपाए दे दीए|

सेठ बोला, “पंडित जी और कोई बात बताएं”

पंडित जी बोले, “जो काम नोकर से हो जाए उसे करने में अपना समय नहीं लगाना चाहिए” मुनीम ने इस बात के भी सो रूपए दे दीए|

सेठ जी ने पण्डित जी से एक और बात बताने का आग्रह किया| पण्डित जी बोले, “जहाँ एक बार मन फट जाए उस स्थान पर फिर नहीं रहना चाहिए” मुनीम ने इस बात के भी सो रूपए पंडित जी को दे दिए|

सेठ जी ने पंडित की बताई चारों बातों को याद कर लिया और उनको घर और दुकान में कई जगह लिखवा दिया|

कुछ समय बाद सेठ को व्यापार मेंभारी नुकसान हो गया| नुकसान इतना भारी था की सेठ जी का पूरा व्यापार ठप्प हो गया और उन्हें नगर छोड़कर दुसरे नगर व्यापार के लिए जाना पड़ा|

सेठ जी के साथ उनका मुनीम भी था| चलते-चलते वे एक शहर के पास पहुंचे| सेठ ने मुनीम को शहर से कुछ खाने-पिने का सामान लेन के लिए भेजा| सेठ की बात सुनकर मुनीम शहर में खाना लेने के लिए गया|

देवयोग से उस शहर के राजा की म्रत्यु हो गई थी| राजा की कोई संतान नहीं थी और राजगद्दी का कोई भी वारिस न था|

अतः शहर के लोगों ने फैसला किया की जो भी व्यक्ति सुबह की  पहली किरण के साथ शहर में प्रवेश करेगा उसे ही राजा बना दिया जाएगा|

इधर सेठ जी का मुनीम शहर में खाने पिने का सामान लेने के लिए पहुंचा| मुनीम ने जैसे ही शहर में प्रवेश किया लोग उसे हठी पर बिठाकर महल में ले गए और राजगद्दी पर बिठा दिया|

इधर बहुत समय तक मुनीम के वापस न लौटने पर सेठ जी को चिंता हुई और वे मुनीम को ढूंढने शहर में पहुचे| शहर पहुंचकर सेठ जी को पता चला की मुनीम तो अब राजा बन गया है|

सेठ जी महल में जाकर राजा बने मुनीम से मिले| मुनीम ने सारी कथा सेठ को सुना दी| तभी सेठ जी को पंडी जी की कही बात याद आई, “छोटा आदमी यदि बड़ा बन जाए तो उसे बड़ा ही मानना चाहिए , छोटा नहीं समझना चाहिए”

सेठ ने राजा बने मुनीम को प्रणाम किया| मुनिम ने राजा को मंत्री बना दिया|

राजा के घुडसाल का जो अध्यक्ष था उसका रानी के साथ अनेतिक सम्बन्ध था| एक दिन संयोग से सेठ ने राजी को घुड़साल के साथ शयन करते देख लिया|

दोनों को नींद आई हुई थी| सेठ को तभी पंडित की बाद याद आई, “दुसरे के दोष को प्रकट नहीं करना चाहिए” यही सोचकर सेठ ने रस्सी पर अपनी शाल डाल दी ताकि कोई ओर उनको न देख सके|

जब रानी की नींद खुली तो उसने रस्सी पर शाल पड़ी हुई देखि| रानी ने अपने सैनिकों से पता लगवाया की यह किसकी शाल है| सैनिकोंने पता लगाया की यह शाल तो सेठ बने मंत्री की है|

रानी ने सोचा राजा और सेठ में घनी मित्रता है कहीं ऐसा न हो की यह मंत्री राजा के सामने मेरी पोल खोल दे| मुझे पहले ही कुछ ऐसा काम करना चाहिए की मंत्री पहले ही फास जाए|

रानी सेठ की शाल लेकर राजा के पास गई और बोली आज रात को आपका मंत्री बुरी नियत से मेरे पास आया था| लेकिन में उसकी नियत को भांप गई और चिल्लाने लगी| मेरे चिल्लाने से डर के मारे वह भागने लगा और उसकी शाल मेरे हाथ में आ गई|

राजा ने देखा की यह तो वही शाल है जो उसने कभी अपने सेठ को उपहार में दी थी| राजा शाल को पहचान गया और रानी के झांसे में आ गया| राजा की बुद्धि फिर गई और उसने रानी की सलाह से राजा को ख़त्म करने का विचार कर लिया|

राजा ने अगले दिन ही मंत्री को कसी के यहाँ मांस लेन के लिए भेज दिया| इधर राजा ने कसी को पहले ही बोल दिया की महल से जो आदमी मांस लेने के लिए आएगा उसे मार देना है|

इधर सेठ ने सोचा की राजा को पता है की में मांस को चूता तक नहीं लेकिन फिर भी राजा मुझे मांस लेन के लिए कसी के पास भेज रहें हैं जरुर इस बात में कुछ न हेतु है| तभी राजा को पंडित की कही तीसरी बात याद आ गई, की “जो काम नौकर के द्वारा हो सकता है वह काम कभी भी खुद नहीं करना चाहिए|”

सेठ ने मांस लेन के लिए अपने नोकर को भेज दिया| कसाई ने राजा की आज्ञा अनुसार राजा के महल से आए आदमी को मार दिया|

इधर राजा को अपने गुप्तचरों द्वारा पता चला की घुडसाल और रानी के अनेतिक सम्बन्ध है| राजा को अपनी भूल पर बड़ा पश्च्याताप हुआ| बेवजह उसने रानी की बातों में आकर सेठ जी को मरवा दिया|

बाद में राजा को पता चला की सेठ जी तो जिन्दा है| राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई| वह एकांत में सेठ जी के पास गया और उनसे अपने किए पर क्षमा मांगी|

आप पढ़ रहे हैं “Hindi Short Stories for Kids | सो रूपए की एक बात”

राजा ने सेठ से पुचा की आपकी शाल रानी के पास कैसे आई| तब राजा ने पूरी बात बताई की जब उसने रानी और घुडसाल को शयन करते देखा तो उसे पंडित जी कि कही बात याद आई की,  “किसी के भी दोष को प्रकट नहीं करना चाहिए|” मेने इसी बात का अनुसरण किया और अपनी शाल को रस्सी पर ढँक दिया ताकि दोनों को कोई देख न पाए|

वही शाल रानी आपके पास उठा लाई और अपनी मनघडंत कहानी से आप से मुझे मरवाने का प्रयत्न किया|

राजा ने ओने किए पर सेठ से क्षमा मांगी और राजा से पुनः अपना मंत्री पद सम्हालने का अनुरोध किया| तभी राजा को पंडित की कही चौथी बात यद् आई की, “अगर एक बार कहीं से मन फट जाए तो उस स्थान पर दुबारा नहीं रहना चाहिए”

सेठ ने राजा से क्षमा मांगी और कहा, “महाराज! अब में यहाँ नहीं रुक सकता” बस इतना कहकर सेठ जी महल छोड़कर वहां से चले गए|

आप पढ़ रहे थे “Hindi Short Stories for Kids | सो रूपए की एक बात”


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जब हम बचपन में  दादी-नानी से कहानियां सुना करते थे तो हमारा पूरा ध्यान कहानी के पात्रों और कहानी के माध्यम से कही गई बात पर होता था|

बचपन की कहानियां कई बार हमें हमारे ज़िन्दगी के लक्ष्य से अवगत करा जाती है| कई बार जब हम ज़िन्दगी में हमारे लक्ष्य से भटक जाते हैं तो किसी “महान व्यक्ति की कहानियां” हमें हमेशा ज़िन्दगी में आगे बढ़ते रहने और संघर्ष करने की प्रेरणा देती है|

आज हम आपके लिए ऐसी ही कुछ कहानियां लेकर आएं हैं जिन्हें पढ़कर आप खुद को उर्जावान महसूस करेंगे| पढ़िए Story in Hindi | हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानियां


चिंता की सुबह | Hindi Kahani

एक राज्य में एक साधू रहता था जो शहर-शहर जाकर भिक्षाव्रती करता और अपना पेट पालता था| साधू उतना ही मांगता जितने की उसको आवश्यकता होती| वह न तो कल के लिए कुछ सोचता और न ही कल के लिए कुछ बचाता| बस यही उसकी दिनचर्या थी|

एक बार वह भिक्षाव्रती करते-करते राज्य की राजधानी पहुंचा| लेकिन जब तक वह राजधानी के अन्दर पहुँच पाता तब तक अँधेरा हो चूका था| शहर के दरवाज़े भी तब तक बंद हो चुके थे| साधू ने वहीँ विश्राम कर सुबह शहर में जाने की योजना बनाई और दरवाजे के समीप ही सोने के लिए स्थान ढूंढने लगा|

सर्दी के दिन थे और रात थोड़ी ठंडी ही थी| साधू ने देखा पास ही एक भट्टी थी| भट्टी में अभी भी गर्माहट थी| साधू ने भट्टी के समीप ही सोने का विचार किया| साधू ने अपना बिछोना बिछाया और भट्टी के समीप ही सो गया|

महल के दरवाजे के समीप ही राजा का महल था| सुबह सूरज की पहली किरण के साथ राजा की नींद खुली और उन्होंने अपनि रानी से पुछा – “कहो रात केसी रही”| उधर भट्टी में सोए साधू की नींद राजा की आवाज़ से खुल गई| राजा का प्रश्न सुन साधू ने जवाब दिया, – “कुछ आप जैसी और कुछ आप से अच्छी”

राजा के कानो में जैसे ही साधू की आवाज पड़ी वे बड़े ही आश्चर्यचकित हुए, उन्होंने महल की बालकनी से बहार देखा लेकिन उन्हें कोई नज़र न आया| उन्होंने वही सवाल फिर दोहराया, “कहो रात कैसी बीती”!

साधू के कानों में जैसे ही राजा के शब्द पड़े वह फिर बोला. “कुछ आप जैसी और कुछ आप से अच्छी”! अब राजा की उत्सुकता की सीमा न थी| उन्होंने अपने सैनिकों को इस आवाज़ के बारे में पता लगाने को कहा|

राजा के सैनिक जैसे ही महल के बाहर इस आवाज़ का पता लगाने आए उन्हें भट्टी के समीप एक साधू लेटा हुआ दिखाई दिया| राजा के सैनिकों ने सोचा हो न हों राजा की बातों का जवाब यही साधू दे रहा था|

उन्होंने साधू को जगाया और साथ महल चलने को कहा| साधू ने सोचा जरुर उसने राज्य का कोई नियम तोड़ा है इसलिए राजा ने उसे दंड देने के लिए महल में बुलाया है|

साधू डरते-डरते महल पहुंचा| राजा उत्सुकतावश उस व्यक्ति से मिलने के लिए आतुर था जो उसके सवाल का जवाब दे रहा था| सिपाही साधू को लेकर जैसे ही महल में पहुंचे राजा ने उत्सुकतावश साधू से पुछा की जब मैं सुबह उठकर अपनी रानी से पुछ रहा था की “रात कैसी बीती” तो आपने जवाब दिया “कुछ आपके जैसी और कुछ आपसे अच्छी”!आप कृपा कर मुझे यह बताएं की आप तो इस ठण्ड में भी खुले आसमान के निचे सो रहे थे तो फिर आपकी रात मुझसे अच्छी कैसे बीती|

साधू ने जब राजा की बात सुनी तो मुस्कुराते हुए बोला, महाराज! क्षमा करें लेकिन मैंने जो भी कहा बिलकुल सत्य कहा है| क्यों की, जब आपको महल में नींद लगी तो आपको भी नहीं ज्ञात था की आप महल में सो रहे हैं| ठीक वैसे ही मुझे भी नींद लगने के बाद यह ज्ञात नहीं रहा की में खुले आसमान के बाहर सो रहा हूँ| और रही आपसे अच्छी रात बीतने का सवाल तो महाराज आपको सुबह उठने के बाद अपने राज्य और परिजनों की चिंता सताने लगी लेकिन में तो फ़क़ीर हूँ मुझे तो कोई चिंता ही नहीं| इसलिए मेरी रात आपसे अच्छी बीती|

इसीलिए कहा गया है…

चाह गयी चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह!
जिनको कछु न चाहिए, सो साहन के साह!!

चिंता की सुबह | Story in Hindi


बहु की सीख | Motivational Story in Hindi

एक पिता ने बड़े ही लाड-प्यार से अपनी पुत्री को पाल पोस कर बड़ा किया| सर्वगुण संपन्न होने पर तय समय पर पिता ने अपनी पुत्री का विवाह कर उसको विदा किया| विदाई के वक़्त जब पुत्री ने पिता का आशिर्वाद लिया तो पुत्री को गले लगाते हुए पिता ने कहा, “बेटा! हमारी रीत ससुराल में नहीं चलेगी| वहां के तौर तरीके अलग होंगे इसलिए ससुराल में जाकर बड़े बूढों के पास बैठकर उनसे सिख लेना”

बेटी जब बहु बनकर ससुराल पहुंची तो उसने देखा उसके पति के अलावा घर में उसकी सासुमाँ और एक दादी सास  थी| बहु जब घर में कुछ दिन रही तो उसने देखा की घर में दादी सास का बहुत अपमान और तिरस्कार हो रहा है| अपमान की हद तो तब हो जाती जब उसकी सास उसकी दादी सास को ठोकर मार देती, गाली देती और खाने के लिए भी कुछ न देती|

लडकी को यह सब देख बहुत बुरा लगा| उसे अपने  माता-पिता द्वारा दीए संस्कार याद आए| उसे अपनी दादी सास पर बहुत दया आई| उसने सोचा घर में बड़े बूढों का तिरस्कार होने से घर नर्क बन जाता है मुझे अपनी दादी सास के लिए कुछ करना चाहिए|

उसने सोचा अगर वह अपनी सास को समझाने का प्रयास करेगी तो उसकी सास उसके साथ भी इसी तरह का बर्ताव करने लगेगी| उसने खुद अपनी दादी सास की सेवा करने का सोचा| अब वह रोज़ घर का काम ख़तम करके अपनी दादी सास के पास बेठ जाती और उनके पैर दबाती|

कुछ दिनों बाद ही सास को बहु का इस तरह दादी सास के पास बैठना और उनकी सेवा करना अच्छा नहीं लगने लगा| एक दिन सास ने बहु को बुलाया और कहा, “बहु! तुम घर का सारा काम छोड़कर हमेशा दादी सास के पास क्यों बेठी रहती हो ?

बहु को पता था की एक न एक दिन उसकी सास उस से यह सवाल जरुर पूछेगी! बहु ने कहा, “माँ जी मेने घर का सारा काम ख़तम कर लिया है| अगर फिर भी कुछ बाकि रह गया है तो काम बताइए|”

सास बोली, “काम तो कुछ नहीं है लेकिन दिन भर दादी सास के पास बेठना ठीक बात नहीं! बहु ने सास की बात को बड़े ध्यान से सुना और कहा, “माँ जी! मेरे पिताजी ने हमेशा मुझे यही सिखाया है की जवान लड़के लड़कियों के बिच कभी नहीं बेठना|

अगर जीवन में कुछ सीखना है तो घर के बड़े बुजुर्गों के पास बेठना| हमारे घर में सबसे बुजुर्ग दादी सास ही है इसलिए में उनके पास बैठती हूँ| मेरे पिताजी ने मुझे विदा करते वक़्त भी कहा था की अब वही तेरा घर है और वहीँ के रीती रिवाज तुझे मानना है इसलिए में घर के रीती रिवाज के बारे में दादी सास से पूछती हूँ की मेरी दादी सास आपकी कैसे सेवा करती है

सास ने जब यह सुना तो घबरा कर पूछा, “बुढ़िया ने क्या कहा तुझे मेरे बारे में ?

बहु ने बड़ी ही चतुराई और शालीनता के साथ जवाब दिया. “माँ जी! दादी सास कह रही थी की अगर तेरी सास मुझे गाली नहीं दे और ठोकर नहीं मारे तो में सेवा ही मान लूँ! बहु की बात सुनकर सास ने बहु से पुछा, “क्या तू भी मेरे साथ ऐसा ही करेगी ?

बहु सास के इसी प्रश्न के इंतज़ार में थी| बहु ने कहा, माँ जी! मुझे पिताजी ने बड़ों से घर के रीती रिवाज सिखने को कहा था| अगर घर के रीती रिवाज बुजुर्गों के अपमान करने के हैं तो मुझे भी रीती रिवाज मानने पड़ेंगे|

बहु का जवाब सुनकर सासु माँ को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी| उसने सोचा जैसा व्यहवार में अपनी सास के साथ करुँगी मेरी बहु भी वही सीखेगी और फिर वह भी मेरे साथ वैसा ही व्यहवार करने लग जाएगी| सास अब दिन भर इसी बात के विचार में रहती|

अगले ही दिन बहु ने घर के एक कोने में ठीकरी (खाना खाने का एक मिटटी का बर्तन) इकठ्ठा करना शुरू कर दिया| घर के कोने में ठीकरी पड़ी देख सास ने बहु से इतनी सारी ठीकरी इकठ्ठा करने का कारण पुछा – “बहु तुमने यह ठीकरी क्यों जमा की है|”

बहु ने बड़ी ही विनम्रता से कहा – माँ जी! आप दादी सास को ठीकरी में ही भोजन देती है| इसलिए मेने सोचा की बाद में ठीकरी मिले न मिले इसलिए अभी से ही आपके लिए ठीकरी जमा कर देती हूँ|  बहु का जवाब सुनकर सास घबरा गई और उसने पुछा- तू मुझे ठीकरी में खाना परोसेगी क्या|

बहु ने कहा – माँ जी! मेरे पिताजी ने कहा था की यहाँ के रीती रिवाज वहां नहीं चलेंगे| वहां की रीती अलग होगी| अब जो यहाँ की रीती है मुझे वैसे ही करना होगा| बहु की बात सुनकर सास ने कहा, “यह यहाँ कि रीती थोड़े ही है| तू अब दादी सास को थाली में भोजन दिया करना| बहु सास की बात सुनकर बहुत खुश हुई| बहु की चतुराई से अब दादी सास को थाली में भोजन मिलने लगा|

अगले दिन बहु ने देखा की घर में सबके खाना खाने के बाद बचा हुआ खाना बूढी दादी सास को दिया जाता था| बहु उस खाने को बड़े गौर से देखने लगी|

बहु को इस तरह खाने को देखने पर सास ने पुछा “बहु! क्या देखती हो ?

बहु ने कहा – “सिख रही हूँ घर में बूढों को क्या खाने को दिया जाना चाहिए”

बहु की बात सुनकर सास ने घबरा कर कहा, “बेटा! यह कोई घर की रीत थोड़े हे| कल से तू दादी सास को पहले भोजन दिया करना”

बस अगले दिन से ही दादी सास को बढ़िया भोजन मिलने लगा| धीरे-धीरे बहु ने सास की सारी आदतों को बदल दिया| अगर बहु अपनी सास को उपदेश देती की उन्हें बड़े बूढों के साथ इस तरह का व्यहवार नहीं करना चाहिए तो सास उसकी बात कभी नहीं मानती| इसलिए आज की युवा पीढ़ी को चाहिए की उपदेश देने के बजाए खुद के आचरण में सुधार करना चाहिए|

इसलिए कहा गया है – “बातों का असर नहीं पड़ता, आचरण का पड़ता है”

Story in Hindi | हिंदी की सर्वश्रेष्ठ कहानियां

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Hindi Story for Children | प्रभु इच्छा | लालच का फल 

Hindi Story for Children | प्रभु इच्छा

साथियों, कई बार हमने अपने किसी परिचित से यह कहते हुए ज़रूर सुना होगा की “प्रभु इच्छा”! आज हम आपको इस कहानी “Hindi Story for Children | प्रभु इच्छा” के माध्यम से यही बताने का प्रयत्न कर रहें हैं की भगवान् जो कुछ भी करता है अच्छे के लिए ही करता है|


एक बहुत ही पहुंचे हुए महात्मा थे| वे गाँव-गाँव में घूमकर अपने ज्ञान की गंगा पुरे देश में बहाया करते थे| वे किसी भी गाँव में अपना डेरा डालते फिर वहां के लोगो में ज्ञान रूपी गंगा का समावेश करते और अगले गाँव की और निकल पड़ते|

एक बार महात्मा घूमते-घूमते एक शहर के पास पहुंचे| लेकिन रात हो जाने के कारन शहर का दरवाज़ा बंद हो गया था| महात्मा ने रात वहीँ व्यतीत करके सुबह शहर में जाने का विचार किया और वहीँ दरवाज़े के पास बिछोना बिछाकर लेट गए|

उसी रात लम्बी बीमारी के चलते उस राज्य के राजा की म्रत्यु हो गई| राजा के कोई संतान नहीं थी| इसीलिए राजगद्दी पर बेठने के लिए पूरा राजपरिवार झगड़ने लगा| सभी राजा के अगले वहिस होने का दावा करने लगे| राजगद्दी के लिए होने वाले झगडे का कोई हल न निकलते देख राजदरबारियों ने एक अनोखा निर्णय लिया|

राजदरबारियों ने सर्वसम्मिति से यह निर्णय लिया की अगले दिन सुबह शहर का दरवाजा खुलने पर जो व्यक्ति सबसे पहले शहर के अन्दर कदम रखेगा उसी को राज्य का राजा घोषित कर दिया जाएगा| सभी ने राजदरबारियों के इस निर्णय को स्वीकार कर लिया|

अलगे दिन सुबह जैसे ही शहर का दरवाजा खुला, महात्मा  अपना बिछोना उठा कर शहर के अन्दर की और चल पड़े| जैसे ही महात्मा ने शहर के अन्दर कदम रखा पूरा शहर महात्मा की जय-जयकार करने लगा| राज दरबारी महात्मा को आदर पूर्वक महल में लेकर आए| महात्मा को समझ नहीं आ रहा था की यह सब क्या हो रहा है|

महात्मा ने राजदरबारियों से इस आदर सत्कार और जयजयकार का कारण पुछा तो राजदरबारियों ने महाराज की मृत्यु के बाद पनपे विवाद और विवाद के हल के लिए सबसे पहले शहर आने वाले व्यक्ति को राजा बनाने की बात महात्मा जी को बता दी|

महात्मा जी को पूरी बात समझ आ गई| उन्होंने राज्य की प्रजा और राजदरबार द्वारा दीए गए आदर-सत्कार को स्वीकार किया और स्नान करके राजा की पोशाक पहन ली| राज गद्दी पर बेठने के बाद महात्मा ने नोकरों को एक बक्सा लाने का आदेश दिया और बक्से में अपनी धोती, पीताम्बर और वस्त्र रख कर उसे बंद कर सुरक्षित स्थान पर रखवा दिया|

अब महात्मा एक राजा की तरह अपना राज-पाठ चलाने लगे|  महात्मा जी को धन, लोभ और वैभव से कोई मोह तो था नहीं सो वे निष्काम भाव से इस कार्य को प्रभु इच्छा समझ कर राज्य की सेवा करने लगे| महात्मा जी के राज-पाठ सम्हालने के बाद राज्य की प्रजा ख़ुशी-ख़ुशी अपना जीवन यापन करने लगी जिसके परिणाम स्वरुप कुछ ही दिनों में राज्य की काफी उन्नति हो गई|

आप पढ़ रहें हैं कहानी “प्रभु इच्छा – Hindi Story for Children”

अब राज्य में कोई भी व्यक्ति दुखी नहीं था| पूरा राज्य महात्मा जी के राजा बनने से खुश था| राज्य की उन्नति से राज्य का खजाना भी भर गया|

राज्य की खुशहाली और उन्नति देखकर आस पास के राज्य के राजाओं की नज़र राज्य पर पड़ने लगी| उन्होंने सोचा की महात्मा जी को राज करना तो आता है लेकिन युद्ध करना नहीं| अगर महात्मा जी के राज्य पर आक्रमण कर दिया जाए तो इतने सम्रद्ध राज्य को आसानी से जीत लिया जा सकता है|

बस यही सोच कर राज्य के पडोसी राजा ने राज्य पर चढाई कर दी| राज्य की और दसरे राज्य की सेना आते देख सेनापति ने राजा को पडोसी राज्य के आक्रमण की सुचना दी| सेनापति की बात सुनकर महात्मा जी ने किसी भी तरह की सैन्य कार्यवाही करने से इनकार कर दिया और कहा “धन-सम्पदा के लिए प्राणों की आहुति देना का कोई ओचित्य नहीं है”|

कुछ ही देर में सेनापति महात्मा के पास फिर समाचार लेकर आया की, महाराज! क्षत्रु की सेना राज्य की सीमा में प्रवेश कर चुकी है, अगर आप आक्रमण का आदेश नहीं देंगे तो क्षत्रु राज्य में प्रवेश कर जाएगा| सेनापति के बात सुनकर महात्मा ने फिर किसी भी प्रकार की सेन्य कार्यवाही से इंकार कर दिया|

जब पडोसी राज्य की सेना राज्य के समीप आ गई तो महात्मा जी ने सेनापति के हाथों “यहाँ आने का कारण बताने का सन्देश भिजवाया”| महात्मा का सन्देश पाकर पडोसी राज्य के राजा ने सन्देश भिजवाया की, “हम यहाँ आपका राज्य लेने आए हैं”

महात्मा मुस्कुराए और बोले, “राज्य के लिए युद्ध करना और इतने सरे सैनिकों का बलिदान लेना सही नहीं है| धन-सम्पदा और राज-पाठ के लिए युद्ध करना कतई सही नहीं हैं| अगर तुम इस राज्य की सेवा करना चाहते हो तो में ख़ुशी-ख़ुशी  यह राज्य तुम्हें सोंपता हूँ|”

महात्मा ने उसी वक़्त सेनिकों को वह बक्सा लाने का आदेश दिया| बक्से से  उन्होंने अपने साधू का वेश निकाला, हाथों में कमंडल लिया और पडोसी राज्य के राजा को राज्य सोंपते हुए कहा, “इतने दिनों तक इस राज्य की सेवा मैंने की अब आप करें…. जब में इस राज्य में आया था तब इस राज्य को सम्हालने वाला कोइ नहीं था अब आप इ राज्य को सम्हालने की ज़िम्मेदारी ले रहें हैं तो में फिर से पभु कार्य में लग पाउँगा| आपका बहुत-बहुत धन्यवाद|”

राजा को महात्मा के साधुवाद ने इतना प्रभावित किया की राजा ने महात्मा के राज-पाठ को अपने हाथों में लेकर राज्य का पूर्ण व् सुचारू रूप से गठन किया| देखते ही देखते वह राज्य देश का सबसे खुशहाल राज्य बन गया|

साथियों, कहानी “Hindi Story for Children | प्रभु इच्छा” का उद्देश्य यह नहीं है की क्षत्रु के सामने अपना सबकुछ रख दो बल्कि कहानी का उद्देश्य यह है की महात्मा की तरह जो भी काम सामने आ जाए उसे निष्काम भाव से प्रभु इच्छा समझ कर अच्छे से करो| सही मन से किया गया काम कभी भी गलत परिणाम लेकर नहीं आता|

प्रभु इच्छा | Hindi Story for Children

पढ़ें धीरू भाई अम्बानी के फर्श से अर्श तक पहुँचने की पुरी कहानी|


Hindi Story for Children | लालच का फल

साथियों, हम सभी यह बातभली भांति जानते हैं की लालच बुरी बला है| लेकिन फिर भी हम जाने अंजाने इस लालच के जाल में फास ही जाते हैं| आज हम इस कहानी के “Hindi Story for Children | लालच का फल”  माध्यम से आप सभी को एक बार फिर लालच से होने वाले नुकसानों से अवगत कराने जा रहें हैं|

एक गाँव में एक व्यापारी रहता था| व्यापारी का कारोबार काफी बड़ा था| आस-पास के गाँव में भी व्यापारी का व्यापर फैला हुआ था| व्यापारी हमेशा अपने साथ अपने एक नौकर को रखता था| व्यापारी जब भी व्यापार के सिलसिले में किसी दुसरे गाँव में जाता तो हमेशा अपने नौकर को अपने साथ ले जाता था|

एक बार व्यापारी अपने नौकर के साथ पास ही के एक गाँव में व्यापर के सिलसिले में जा रहा था| तभी रास्ते में चलते-चलते व्यापारी की अपने नौकर से बहस हो गई|

कुछ ही देर में बहस इतनी बढ़ गई की व्यापारी ने अपने नोकर पर चिल्लाते हुआ कहा – मुर्ख ! तू जब मेरे पास आया था तब बिल्कुल भी काम का नहीं था, तू तो पूरा गधा था, मैंने तूझे सारा काम सिखा कर गधे से इन्सान बनाया… फिर भी तू मेरा कहा काम आज भी सही से नहीं करता फिर तुझे गधे से इन्सान बनाने का क्या फायदा|

तभी पास ही जाने वाले एक यात्री ने व्यापारी और उसके नौकर के बिच होने वाली बहस को सुन लिया और सोचा, “ये आदमी गधे को इन्सान बना देता है,  अवश्य ही यह कोई न कोई जदुगर होगा|

यात्री व्यापारी के पास आया और बोला, – महोदय! में पास ही के एक गाँव में रहता हूँ और गधों का व्यापार करता हूँ| मेरे पास कई गधे हैं लेकिन में इन गधों से तंग आ गया हूँ| आज में इन दो गधों को बेचने के उद्देश्य से पास के गाँव जा रहा था तभी मैंने आपके गधे को इन्सान बनाने की बात सुन ली| में आपको मेरे दोनों गधे सोंप रहा हूँ कृपा कर आप मेरे दोनों गधों को इन्सान बना दें|

व्यापारी यात्री की बात सुनकर पूरा माजरा समझ गया| व्यापारी शुद्ध बनिया था| उसने यात्री की बात सुनी और बोला, भाईजी आपने बिलकुल सही पहचाना| में गधों को इन्सान बना देता हूँ| में आपको इन दोनों गधों को भी इन्सान बना दूंगा, लेकिन इसके लिए आपको थोड़े पैसे खर्च करना पड़ेंगे|

आप पढ़ रहें हैं कहानी “लालच का फल – Hindi Story for Children”

यात्री ने व्यापारी की शर्त को मान लिया और अपने दोनों गधे व्यापारी को सोंप दीए| व्यापारी ने दोनों गधों को ले लिया और यात्री से एक महीने बाद आने को कह दिया| यात्री व्यापारी की बात सुनकर ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर चला गया| इधर व्यापारी ने दोनों गधों को जाकर बाजार में मोटे दामों पर बेंच दिया|

एक महीने बाद जब यात्री व्यापारी के पास गधे के बदले में दो इन्सान लेने आया तो व्यापारी बोला, “भाईजी मेने इन्सान बनाने के लिए दोनों गधों पर मसाला चढ़ा दिया है लेकिन तुम्हारे गधे इन्सान बनने में बहुत ही ज्यादा समय ले रहें हैं| अभी गधों को इन्सान बनने में कुछ वक़्त और लगेगा| तुम कुछ वक़्त बाद आकर दोनों इंसानों को ले जाना|

व्यापारी की बात सुनकर यात्री फिर से अपने गाँव चला गया और एक महीने बाद पुनः लौटा और गधे के बदले में बने इन्सान देने की बात कही| यात्री को देखकर व्यापारी बोला, “अरे मेने तुम्हें कुछ वक़्त बाद आने को बोला लेकिन तुम तो एक महीने बाद आ रहे हो| तुम्हारे गधे तो कब से इन्सान बन गए हैं और उनकी नोकरी भी लग गई है|

एक गधा तो शिक्षक बन गया है और स्कूल में बच्चों को पढ़ता है| दूसरा गधा डाक्टर बन गया है और अस्पताल में मरीजों का उपचार करता है| तुम देरी से आए इसलिए दोनों पढ़ लिख कर नौकरी पर लग गए हैं अब तुम जानों तुम्हें क्या करना है….

व्यापारी की बात सुनकर यात्री को बड़ा दुःख हुआ| वह घांस लेकर अपने दोनों गधों को लेने निकल पड़ा| सबसे पहले यात्री स्कूल गया और वहां के शिक्षक को घांस दिखाते हुए बोला, “आ जा में तेरा मालिक हूँ…आआ ले यह घांस ले ले|” यात्री को स्कूल में इस तरह की हरकतें करते देख शिक्षक को लगा की स्कूल में कोई पागल घुस आया है और शिक्षक ने उसे स्कूल से बाहर निकलवा दिया|

अब यात्री घांस लेकर गाँव के अस्पताल में पहुँच गया और वहां के डॉक्टर को घांस दिखाते हुए बोला, “मैंने तुझे गधे से इन्सान बनाया है अब तू मुझे ही भूक गया… देख में तेरे लिए घांस लेकर आया हूँ आ जा मेरे पास आ जा|

गाँव वालों ने जब यात्री को डॉक्टर के साथ इस तरह की हरकतें करते हुए देखा तो उन्होंने भी यात्री को पागल ही समझा और यात्री को गाँव के बाहर निकाल दिया|

अब यात्री सब तरह से थक हार कर फीर से उस व्यापारी के पास पहुंचा जिसको उसने अपने कीमती गधे इन्सान बनाने के लिए दी थे|

यात्री व्यापारी के पास पहुंचा और बोला, “महोदय! मेने आपको अपने सबसे कीमती गधे इन्सान बनाने के लिए दी थे अब इन्सान बनने के बाद वे दोनों मुझे पागल कहते हैं|

व्यापारी मुस्कुराया और बोला, “भाई जी मैंने तो पहले ही बोला था की आपने आने में बहुत देर कर दी अब गधों को काबू में तो रखा जा सकता हैं लेकिन इंसानों को काबू में कैसे रखा जा सकता है| इसीलिए दोनों अपने मन मुताबिक अपने अपने काम में लग गए|

व्यापारी की बात सुनकर यात्री मुह लटकाकर अपने गाँव लौट गया|

तो दोस्तों कहानी का सारांश यही है, की “आज के इस जीवन में सभी लालच के चक्कर में दिनों दिन लालची होते जा रहें हैं| इस लालच में वे प्रकृति के बनाए नियमों को भी ताक पर रखने में परहेज़ नहीं करते| इसलिए हमें लालच छोड़कर हमेशा ईमानदारी और संयम से काम करना चाहिए|”

लालच का फल – Hindi Story for Children

धन्यवाद…
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Kahaniya in Hindi | जादुई वस्त्र – लालची सेठ

Kahaniya in Hindi

साथियों, प्रेरणादायक कहानियां ( Kahaniya in Hindi ) हमारे जीवन में एक बहुत बड़ा महत्त्व रखती है| बचपन में जब दादी-नानी हमें कहानियां सुनाया करती थी तो कहानी कहानी में ही हम पूरी दुनियां का ज्ञान हांसिल कर लेते थे| आज हम आपके लिए ऐसी दो शानदार कहानियां लेकर आए हैं जिन्हें पढ़कर या अपने घर परिवार के बच्चों को सुनाकर आप उन्हें जीवन के बारे में कई बाते सिखा सकते हैं! आइये पढ़ते हैं Kahaniya in Hindi | जादुई वस्त्र – लालची सेठ


Kahaniya in Hindi | जादुई वस्त्र

एक राज्य में एक मुर्ख राजा रहता था| अपने पूर्वजों के दीए राज्य व् धन दोलत के बूते वह राज्य की राज गद्धी पर तो बैठ  गया लेकिन अपनी मुर्खता के कारण राज्य में कोई भी राजा को मुर्ख बना कर अपना काम निकाल लेता था| 

राजा बहुत ही सीधा-साधा था| लेकिन अपनी मुर्खता के चलते वह कभी भी किसी से भी नाराज हो जाता, किसी पर भी क्रोध करने लगता और किसी को भी म्रत्यु दंड दे देता था| राजा के इस स्वाभाव से पूरा राज्य दुखी था|

एक दिन राज्य के ही एक होंशियार व्यक्ति ने राजा को सबख सिखाने का मन बनाया और राज दरबार में पहुँच गया| राजदरबार में पहुंचकर व्यक्ति बोला – महाराज की जय हो… महाराज! में पास ही के एक गाँव का रहने वाला कपड़ों का व्यापारी हूँ| आज में आपके लिए एक अमूल्य भेंट लेकर यहाँ आया हूँ जिसे देखकर आप बड़े ही खुश हो जाएँगे|

राजा व्यापारी की बात सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ| राजा ने व्यापारी से भेंट स्वीकार करने का आश्वासन देते हुए भेंट राजदरबार में प्रस्तुत करने का आदेश दिया|

राजा की बात सुनकर व्यापारी बोला – महाराज! मुझे अपने पूर्वजों ने एक अमूल्य वस्त्र उपहार में दिया है| जो बहुत ही खुबसूरत और जादुई है| अगर आप वह वस्त्र पहनेंगे तो इस देश में आप सा सुन्दर राजा दूसरा न होगा| लेकिन उस वस्त्र से आपके लिए पोषक बनाने में मेरे कारीगरों को पचास हजार अशर्फियों की लागत आएगी जो आपको व्यय करना होगी|

राजा वस्त्र की तारीफ सुनकर इतना मंत्रमुग्ध हो गया की उसने अपने मंत्री को व्यापारी को पचास हज़ार अशर्फियाँ देने का आदेश दे दिया| व्यापारी अशर्फियाँ लेकर राजा दरबार से चला गया और दो दिन बाद राजा के लिए वह पोशाक ले आने का आश्वासन दिया|

दो दिन बाद वह व्यापारी एक बहुत ही चमचमाता हुआ बक्सा लेकर राजदरबार पहुंचा| बक्सा देखकर ऐसा लग रहा था, मानों बक्से में बहुत ही बड़ा खज़ाना छुपा हो| बक्से की चमचमाहट और खूबसूरती देखकर राजा मंत्रमुग्ध हो गया|

व्यापारी ने बक्से को राजदरबार के बीचोंबीच रख दिया और बोला – महाराज! इस पोशाक को बनाने में मेरे कारीगरों ने बड़ी ही मेंहनत की है| लेकिन इस पोशाक की खास बात यह है की यह पोशाक सिर्फ उसी इन्सान को दिखती है जो असली माँ-बाप का हो| अगर इस राजदरबार में किसी इन्सान का कोई दूसरा बाप होगा तो उसको यह पोशाक दिखाई नहीं देगी|

व्यापारी की बात सुनकर पूरा राजदरबार उस पोशाक को देखने के लिए आतुर हो उठा| अब व्यापारी ने उस बक्से से पोशाक निकालने का ढोंग शुरू कीया जो की वास्तव में उस बक्से में थी ही नहीं| पोशाक को अपने हाथों में लेने का ढोंग करते हुए वह पोशाक की सुन्दरता की तारीफें करने लगा|

आप पढ़ रहें हैं “Kahaniya in Hindi | जादुई वस्त्र

व्यापारी की बात सुनकर राजदरबार में उपस्थित सभी राज दरबारी उस पोशाक की तारीफ करने लगे जो की वास्तव में थी ही नहीं| सभी यह सोच रहे थे की अगर वे पोशाक नज़र न आने की बात राज दरबार में कहेंगे तो सभी यही मानेंगे की वे असली माँ-बाप की औलाद नहीं है|

कई राजदरबारी तो यह सोच रहे थे की हो सकता है की वास्तव में वे असली माँ बाप की औलाद नहीं है क्यों की दरबार में उपस्थित बाकी सभी को तो वह वस्त्र दिखाई दे ही रहा है| बस इसी तरह सबने व्यापारी की बातों में हाँ कर दी और महाराज भी यही सोच कर चुप रहे की केवल उन्हें छोड़कर सभी को वह पोशाक दिखाई दे रही है|

अब व्यापारी ढोंग करते हुए वह पोशाक लेकर राजा के पास पहुंचा और राजा को धोती और पगड़ी देते हुए पहनने के लिए आग्रह किया| राजा तो पहले से ही मुर्ख था, उसे मुर्ख बनाने में व्यापारी को ज्यादा समय नहीं लगा| अब मंज़र कुछ ऐसा था की राजा जी जैसे इस धरती पर आए थे ठीक वैसे ही हो गए यानी की पुरे निर्वस्त्र|

अब पुरे राजदरबार के सामने महाराज बिलकुल निर्वस्त्र खड़े थे लेकिन राजा के म्रत्युदंड के डर से किसी भी राजदरबारी में यह हिम्मत नहीं थी की वह राजा को यह कह सके की वह बिलकुल निर्वस्त्र खड़े हैं|

राजा को पोशाक पहनाने के बाद व्यापारी ने राजा की इतनी तारीफ की के राजा जी फुले नहीं समाए और ऐसे ही निर्वस्त्र रनिवास की और चल पड़े|

रानियों ने जैसे ही महाराज को निर्वस्त्र देखा तो हसने लगी और बोली – महाराज! आज क्या आपने मदिरा का सेवन कर लिया है ? क्षमा करें, आप पुरे महल में यूँ निर्वस्त्र होकर क्यों घूम रहे हैं|

रानियों को वस्त्र न दिखने पर राजा मुस्कुराए और बोले – महारानी! अवश्य ही आप असली माँ-बाप की नहीं हो| क्यों की यह जादुई वस्त्र हैं, यह केवल उन्हीं इंसानों को दीखते हैं जो असली माँ-बाप के हो| आपने मुझसे इतनी बड़ी बात क्यों छुपाए रखी ?

आप नाजायज हैं और महल में नाजायज़ को रहने का कोई हक़ नहीं| इसीलिए हम अभी और इसी वक़्त आपको महल से बाहर करते हैं| बस इतना कहकर राजा ने अपने सैनिकों को आदेश देकर रानी को महल से बाहर निकाल दिया|

तो साथियों, इसीलिए कहा गया है

उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये। पयः पान भुजङ्गानां केवलं विषवर्धनं।।

यानि की मूर्खों को उपदेश देना उनके क्रोध को शांत करना नहीं वरन बढ़ाना है…

Kahaniya in Hindi

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कृष्ण सुदामा | Krishna Sudama Story


Kahaniya in Hindi – लालची सेठ

एक मंदिर में एक ब्राम्हण रहता था| जो दिन रात भगवान् की सेवा में लगा रहता| ब्राम्हण की एक पुत्री थी रूपवती| ब्राम्हण रोज सवेरे उठकर भगवान् की पूजा-पाठ में लग जाता| रूपवती की भी भगवान् में बड़ी आस्था थी| बचपन से ही वह भगवान् की भक्ति में लगी रहती| भगवान् के लिए पुष्प व् पूजन सामग्री एकत्रित करना उसी की ज़िम्मेदारी थी|

समय के साथ-साथ रूपवती बड़ी हुई| अब ब्राम्हण को रूपवती के विवाह की चिंता सताने लगी थी| ब्राम्हण ने सोचा क्यों ने में मंदिर में कथा करना शुरू कर दूँ, जिससे की चढ़ावे में कुछ पैसा आने से मुझे थोड़ी आमदनी भी हो जाएगी और गाँव वालों में भी भगवान् के प्रति आस्था बढ़ेगी|

बस यही सोचकर ब्राम्हण ने अगले दिन से ही मंदिर प्रांगण में ही कथा करना शुरू कर दिया| ब्राम्हण का मानना था की चाहे गाँव वाले उसकी कथा न सुने, लेकिन मंदिर में विराजे भगवान् तो उसकी कथा सुंनेगे ही|

अब ब्राम्हण की कथा में  कुछ गाँव वाले आना शुरू हो गए| एक दिन गाँव का ही एक कंजूस सेठ मंदिर में भगवान् का दर्शन करने के लिए आया और दर्शन करने के बाद मंदिर की परिक्रमा करने लगा| तभी उसे मंदिर के अन्दर कुछ आवाज़े सुनाइ दी| उसने मंदिर की पीछे की दिवार पर कान लगा कर सुना तो मंदिर के अन्दर दो लोग एक दुसरे से बात कर रहे थे|

उसने बड़े धयान से सुना… मंदिर के अन्दर भगवान् राम और हनुमान जी आपस में बात कर रहे थे| भगवान् राम हनुमान जी से ब्राम्हण की कन्या के कन्यादान के लिए दो सो रुपयों का प्रबंधन करने का कह रहे थे| भगवान् राम का आदेश पाकर हनुमान जी ने ब्राम्हण को दो सौ रूपए देने की बात भगवान् राम को कही|

आप पढ़ रहें हैं “Kahaniya in Hindi – लालची सेठ”

सेठ जी ने जब भगवान् राम और हनुमान जी की बात सुनी तो कथा के बाद वे ब्राम्हण से मिले और कथा से होने वाली आय के बारे में पूछा| सेठ जी की बात सुनकर ब्राम्हण बोला – सेठ जी, कथा में बहुत ही कम लोग आ रहें हैं, भला इतने कम श्रद्धालुओं में क्या आय होगी|

सेठ जी ने ब्राम्हण को आश्वासन देते हुए कहा की आज कथा में जो भी आय हो वह ब्राम्हण उन्हें दे दें,  इसके बदले में सेठ जी ब्राम्हण को सौ रूपए दे देंगे| ब्राम्हण को भला क्या एतराज़ होता, उन्होंने सेठ जी की बात मान ली| उधर सेठ जी यह सोच रहे थे की ब्राम्हण को आज कथा में हनुमान जी दो सौ रुपए देने वाले हैं जो में ब्राम्हण से ले लूँगा और बदले में उसे सौ रूपए दे दूंगा| जिससे की मेरी सौ रुपए की कमाई हो जाएगी|

शाम को कथा समाप्त होने पर सेठ जी ब्राम्हण के पास आए| उन्हें यकीन था की आज ब्राम्हण को दो सौ रूपए की आय हुई होगी| ब्राम्हण सेठ जी को देखते ही सेठ जी की पास आया और बोला – “सेठ जी आज तो काफी कम भक्त कथा में आए थे जिससे बहुत ही कम आय हुई है| बस दस रूपए ही इकठ्ठा हो पाए हैं!”

सेठ अब करता भी क्या| उसने ब्राम्हण को दिए वचन के अनुसार ब्राम्हण को सौ रूपए दे दिए और इस सौदे में तो सेठ जी को नुकसान हो गया| सेठ जी हनुमान जी पर बहुत गुस्सा हुए की उन्होंने ब्राम्हण को दौ सौ रुपयों की मदद भी नहीं की और भगवान् को दिया अपना वचन भी पूरा नहीं किया|

सेठ जी को हनुमान जी पर बहुत गुस्सा आया| वे गुस्से में मंदिर के अन्दर गए और उन्होंने हनुमान जी की मूर्ति को धक्का दे दिया| सेठ जी ने जैसे ही हनुमान जी की मूर्ति को धक्का देने के लिए अपना हाथी मूर्ति पर रखा हाथ वहीँ चिपक गया| भला हनुमान जी के पकड़ से कोई बच सकता है|

तभी सेठ जी को को फिर एक आवाज़ सुनाई दी| अब भगवान् राम हनुमान जी से ब्राम्हण को दौ सौ रूपए देने के बारे में पुछ रहे थे| भगवान् राम का आदेश सुनकर हनुमान जी बोले  “प्रभु..सौ रूपए की मदद तो हो गई है, बाकि बचे सौ रुपयों के लिए सेठ जी को पकड़ के रखा है| जैसे ही वे सौ रूपए देंगे उनको छोड़ देंगे|

सेठ जी ने जैसे ही भगवान् राम और हनुमान जी के बीच की बात सुनी उन्होंने सोचा, “अगर गाँव वालों ने देख लिया की में हनुमान जी की मूर्ति को धक्का मार रहा था और हनुमान जी ने मुझे पकड़ लिया है तो मेरी बहुत बदनामी होगी|”

बस फिर क्या था, “सेठ जी ने हनुमान जी को ब्राम्हण को सौ रूपए देने का वादा किया”

हनुमान जी ने सेठ की बात मानकर उसका हाथ छोड़ दिया और सेठ जी ने अपने वादे अनुसार ब्राम्हण को सौ रूपए दे दिए और सर पकड़ कर चलते बने|

साथियों, इसीलिए कहा गया है ज्यादा लोभ हमेशा हानिकारक होता है| सेठ को उसके लालच की सज़ा मिल गई और ब्राम्हण को उसकी भक्ति का फल| इसीलिए कहा गया है जैसी करनी वैसी भरनी…

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children story in hindi | कहानी बच्चों की

children story in hindi | कहानी बच्चों की

साथियों नमस्कार, हम सभी जीवन में कभी न कभी किसी न किसी काम को लेकर आलस कर जाते हैं| लेकिन किसी काम में किया गया आलस उस काम को हमेशा ख़राब कर देता है| आज हम आपके लिए ऐसी ही “children story in hindi | कहानी बच्चों की”  लेकर आएं हैं जो आपको आलस में किए गए कार्य के दुष्परिणामों से अवगत करवाएगी! आइये इन कहानियों के माध्यम से ज़िन्दगी के एक नए पहलु को जानते हैं…

                     Children Story in Hindi | आलस्य

यह एक ऐसे किसान की कहानी है जो अपने पुरखों की दी हुई ज़मीन-जायदाद के कारण था तो काफी धनि लेकिन उसमें एक कमी थी, और वह थी आलस करना| जीवन के शुरूआती दिनों से ही वह आलसी बनता गया| पहले तो उसने कई कामों को टालना शुरू कर दिया लेकिन ज़िन्दगी के सफ़र में जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रहा था ठीक वैसे-वैसे वह और भी आलसी होता चला जा रहा था| अब तो आलम यह था की आलस में उसने खेतों पर जाना तक छोड़ दिया|

अब तो आलस में उसे अपने घर-परिवार तक की सुध न थी| अपने गाय-भेंसों की भी सुध न लेता| उसका सारा काम अब नोंकरों के भरोसे चलने लगा| उसके आलस से अब पुरे घर की व्यवस्था बिगड़ने लगी| खेती में ध्यान न देने के कारण अब उसको खेती में नुकसान होने लगा| उसके पालतू पशुओं ने भी धीरे-धीरे अब दूध देना बंद कर दिया|

एक दिन उस किसान का दोस्त उससे मिलने उसके गाँव आया| उसने गाँव में जैसे ही अपने किसान के घर जाने का रास्ता पूछा गाँव वालों ने उसे उसके घर की पूरी दशा बता दी| खैर, अब था तो उसका ही मित्र… सौ उसने उस किसान के घर जाने और उसे समझाने का मन बनाया| वह जैसे ही अपने मित्र किसान के घर पहुंचा उसे अपने मित्र के घर की दशा देखकर बहुत दुःख हुआ|

उसे पता था की अब आलस ने उसके मित्र को इस कदर जकड लिया था की अब उसे समझाने में भी कोई लाभ न था| उसने अपने मित्र की दशा पर चिंतित होते हुए अपने मित्र से कहा –  मित्र, तुम्हारी परेशानियाँ देखकर मेरे ह्रदय को काफी दुःख पहुंचा हैं| लेकिन मेरे पास तुम्हारी इन साडी परेशानियों को दूर करने का एक ऐसा उपाय है जिसे करके तुम फिर से धनि व् खुश्हर जीवन जी सकते हो|

किसान अपनी दशा से खुद बड़ा परेशान था लेकिन उसे अपने आलसीपन का आभास तक न था| उसने अपने मित्र से कहा – मित्र मेरी इस दशा के कारण धन, वैभव और सम्मान सब कुछ मेरे हाथ से चला गया है| तुम तो मेरे प्रिय मित्र हो में तुम्हारे बताए हुए उपाय पर अमल जरुर करूँगा|

किसान के मित्र ने कहा – मित्र, सुबह-सुबह दिन दिकलने से पहले एक देवदूत प्रथ्वी पर आता है| जो कोई भी उस देवदूत का सर्वप्रथम दर्शन कर लेता है उसे जीवन में सब कुछ मिल जाता है| अगर तुम उस देव्देत के दर्शन कर लो तो तुम्हारा खोया हुआ धन, वैभव और सम्मान  तुम्हें वापस मिल सकता है|

किसान अपने जीवन से अब काफी परेशान हो चूका था| गाँव में भी उसकी अब कोई इज्ज़त नहीं करता था| उसने अपने मिटा की बात मानने का फैसला किया| अगले ही दिन वह सवेरे-सवेरे उठकर देवलोक से आए देवदूत की खोज में निकल पड़ा| चलते-चलते वह अपने खेतों के पास पहुँच गया था| अगले ही पल उसने देखा की एक आदमी उसके खेत में पड़े गेहूं के ढेर से गेहूं की चौरी कर रहा है| किसान को आते देख चोर वहां से भाग खड़ा हुआ|

चलते चलते अब वह थक चूका था| खेतों से लौटकर अब वह अपनी गोशाला की और आया तो उसने देखा की उसका एक नोकर उसकी भेंस का दूध निकालकर ले जा रहा है| किसान ने अपने नोकर को रोका और इस तरह चोरी छिपे दूध ले जाने पर अपने नोकर को फटकार लगाई|

थोड़ी देर आराम कर के वह फिर देवदूत की खोज में अपने खेतों की और निकल गया| वह अभी खेतों पर पहुंचा ही था की उसे पता चला की खेतों  पर अभी तक मजदुर नहीं आए थे| उसने रुक कर मजदूरों के आने का इंतज़ार किया, जब मजदुर खेत पर आए तो उन्हें भी देरी से आने पर डाट लगाई| अब वह सुबह से जहाँ-जहाँ भी गया वहां उसका कोई न कोई नुकसान होने से बच गया|

आप पढ़ रहें हैं Children Story in Hindi | कहानी बच्चों की

देवदूत को खोजने में अब किसान रोज़ सुबह जल्दी उठ कर देवदूत को खोजने निकलने लगा| किसान की दिनचर्या में आए इस परिवर्तन से अब उसके नोंकरों में कामचोरी के प्रति डर बेठ गया| अब उसके नोंकरों ने ठीक से काम करना शुरू कर दिया| सबेरे जल्दी उठने से चोरों को उसके आने का भय होने लगा और उसके खेतों से होने वाली चोरियां बंद हो गई|

अब खेती में उसे फायदा होने लगा| दूध की होने वाली चोरियों के बंद हो जाने से उसकी गोशाला से भी उसे फायदा होने लगा| सुबह सुबह की सेर से उसकी सेहत भी ठीक होने लगी|

कुछ ही दिनों में किसान का मित्र फिर अपने मित्र के पास आया| अपने मित्र को मिलकर किसान बहुत खुश हुआ और उस से उस के बताए उपाय से होने वाले फायदों के बारे में बताया और कहा – मित्र! देवदूत की खोज में, मुझे सबेरे जल्दी उठने से काफी फायदा हुआ| देवदूत से में जो कुछ भी मांगने वाला था वह मुझे मिल गया है लेकिन देवदूत के दर्शन मुझे अभी तक नहीं हो पाए हैं|

किसान की बात सुनकर उसका मित्र मुस्कुराया और बोला – मित्र! वह देवदूत तुम स्वयं हो| तुम आलस्य में खुद को ही भूल गए थे| सुबह जल्दी उठकर देवदूत की खोज में तुम खुद से मिले और तुमने अपने कमों पर ध्यान देना शुरू कर दिया जिससे तुम्हें खेती में भी फायदा होने लगा और तुम्हारा खोया हुआ धन, सम्पदा और सम्मान तुम्हें वापस मिल गया|

अपने मित्र की बात सुनकर किसान ने उसे गले से लगा लिया….

तो साथियों इस कहानी Children Story in Hindi | कहानी बच्चों की से हमें एक नहीं दो-दो बातें सिखने को मिलती है| पहली तो यह की हमें कभी आलस्य नहीं करना चाहिए और अपने काम को कभी भी कल के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए| और दूसरी यह की हमेशा अपने किसी भी मित्र को परेशानी में देखकर उसकी सहायता करना चाहिए| संकट के समय काम आने वाला ही सच्चा मित्र होता है|


साथियों इसी कहानी के साथ हम आपको एकता के सूत्र में पिरोने वाली एक और कहानी children story in hindi | एकता में शक्ति बताने जा रहें हैं जिसे पढ़कर अप यह जानेंगे की जीवन में संगठित रहना क्यों आवश्यक है|

Children Story in Hindi | एकता में शक्ति

एक पिता के चार पुत्र थे| पिता ने अपने चारों पुत्रों को सामान शिक्षा और संस्कार दीए| चारों पुत्र बड़े हुए और अपने माता-पिता का सम्मान करते हुए जीवन यापन करने लगे| पूरा गाँव उन चारों पुत्रों का सम्मान करता था|

बस परेशानी इस बात की थी की चारों  लड़कों की आपस में बिलकुल भी नहीं जमती थी| चारों जब भी साथ होते किसी न किसी बात पर झगड़ पड़ते| छोटी-छोटी बातों का आए दीन बड़े झगड़ों का कारण बन जाना आम बात थी|

किसान अब अपने इन चारों पुत्रों के झगड़ों से तंग आ चूका था| इस समस्या से निजात पाने के लिए वह गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति के पास पहुंचा और अपनी समस्या बताते हुए अपनी समस्या का उपाय बताने के लिए प्रार्थना की| गाँव के उस बुजुर्ग व्यक्ति ने किसान की परेशानी को बड़े ध्यान से सुना और उसे अपनी परेशानी को हल करने के लिए एक युक्ति बताई…

बुजुर्ग की सलाह लेकर किसान अपने घर लौटा और उसने अपने चारों पुत्रों को अपने पास बुलाया| किसान के चारों पुत्र बड़े ही संस्कारी और आज्ञाकारी थे| पिता के बुलाने पर चारों आगले ही पल पिता के समक्ष उपस्थित थे|

किसान ने चार सुखी लकड़ियों को इकठ्ठा कर एक गट्ठर बनाया और उसे अपने लड़कों के सामने रख कर कहा, – “तुम चारों में से जो इन लकड़ियों के गट्ठर को तौड़ देगा वह उसे इनाम में एक बैल देगा| किसान के चारों पुत्र आदतन लकड़ियों के गट्ठर को सबसे पहले तोड़ने के लिए झगडने लगे|

किसान से सबसे पहले अपने छोटे बेटे को गट्ठर तोड़ने का आदेश दिया| किसान के सबसे छोटे बेटे ने लकड़ियों के गट्ठर को तोड़ने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया लेकिन लकड़ियाँ टस से मस नहीं हुई|

इसी तरह बारी-बारी से चारों पुत्रों ने अपनी पुऋ ताकत से लकड़ियों को तोड़ने की कोशिश की लेकिन कोई भी लकड़ियों के उस गट्ठर को तौड़ नहीं पाया|

अगले ही पल किसान ने अपने चारों लड़कों को गट्ठर से निकालकर एक-एक  लकड़ी दी और उसे तोड़ने को कहा| इस बार सभी लड़कों ने एक-एक लकड़ी को बड़ी आसानी से तोड़कर फेंक दिया|

यह सब देखकर किसान ने अपने चारों पुत्रों को पास बैठाया और कहा, – “जब तक यह लकड़ियाँ एक साथ थी तब तक तुममें से कोई भी इन्हें तौड़ नहीं पाया लेकिन इनके अलग-अलग होते ही तुम सबने बड़ी ही आसानी से इन लकड़ियों को तौड़ कर फेंक दिया|

बिलकुल इसी तरह यदि तुम चारों भी लकड़ियों के इस गट्ठर की तरह एक साथ मिलकर रहोगे तो कोई भी तुम्हें तोड़ने और हनी पहुँचाने की कोशिश नहीं करेगा और यदि तुम अलग-अलग टहनियों की बहती रहोगे तो कोई भी तुम्हें नुकसान पहुंचा सकता है|

किसान के चारों लड़कों को अपने पिता की बात समझ आ गई और उन्होंने आपस में झगडा छोडकर मिलकर रहना शुरू कर दिया| देखते ही देखते किसान का पूरा परिवार सबसे सम्रद्ध और वैभवशाली बन गया|

तो साथियों, इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की हमें हमेशा मिल जुलकर एक साथ रहना चाहिए| अगर परिवार में फुट होगी तो हर कोई उसका फायदा उठाने की कोशिश करेगा|

Children Story in Hindi | कहानी बच्चों की


तो साथियों हमें आशा है की आपको हमारी इन कहानियों से ज़रूर ज़िन्दगी के एक नए पहलु को जानने का मोका मिला होगा|

संगठन और संगठन की शक्ति पर पढ़िए हमारी शानदार कहानी

संघटन की शक्ति | Sanghatan ki Shakti Moral Stories in Hindi

संगठन | Short Story on Unity


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नई कहानियां | जीवन का मूल्य

                       नई कहानियां | जीवन का मूल्य

साथियों नमस्कार, Hindi Short Stories के कहानियों के इस खजाने में हम हर बार कुछ  नई कहानियां लेकर आते हैं| इस बार भी हम एक नई कहानी “जीवन का मूल्य” आपके लिए लेकर आएं है जिसे पढ़कर आपको भी जीवन के बारे में कुछ अलग पहलु देखने को मिलेगा| हमारी वेबसाइट पर अपना अमूल्य समय बिताने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद…


नई कहानियां में एक और कहानी

“जीवन का मूल्य”

नई कहानियां | किसी गाँव में एक जौहरी  रहता था| वह काफी बुद्धिमान था| हमेशा अपने काम में लगा रहता| लेकिन नियति में उसके कुछ और ही लिखा था| अपनी जवानी के दिनों में ही किसी बीमारी के चलते वह चल बसा| वह अपने पीछे अपनी पत्नी और एक लड़के को छोड़ गया| लोगों ने जब उसकी पत्नी को अकेला देखा तो उसका सारा धन धीरे-धीरे हड़प लिया| धन के नाम पर अब जौहरी की पत्नी के पास बस एक मोती बचा था जो मरते समय जौहरी ने अपनी पत्नी को दिया था| उस मोती की कीमत का कोई मोल नहीं था|

जौहरी का लड़का जब बड़ा हुआ तो उसकी विधवा पत्नी ने वह मोती अपने बेटे को दिया और कहा…
बेटा! यह मोती मुझे तुम्हारे पिताजी ने मरते समय दिया था| इसकी कीमत का मुझे कोई अंदाज़ा नहीं है लेकिन तुम्हारे पिताजी ने कहा था की यह एक अनमोल मोती है| जो कोई भी व्यक्ति इस मोती का मोल लगाएग वह अपनी बुद्धि का मूल्य तुम्हे बताएगा, यानी की जैसी उस इन्सान की बुद्धि होगी ठीक वैसा ही इस मोती का मूल्य होगा|

अब तुम इस मोती को लेकर बाज़ार में जाओ और इस मोती का मूल्य पता करो, लेकिन ध्यान रहे इस मोती को उसी व्यक्ति को देना जहाँ तुम्हें इसका सही मूल्य मिले| जौहरी का लड़का अब मोती लेकर बाज़ार में मोती का मूल्य पता करने निकल पड़ा| उसने कई जगह मोती का मूल्य पता किया| बाज़ार में निकलते हुए उसे एक सब्जी बेचने वाला दिखाई दिया, उसने सब्जी वाले से मोती का मूल्य बताने की बात कही| सब्जी वाले ने मोती को पहले तो अच्छे से देखा और फिर मोती के बदले में 4 गाजर देने की बात कही|

लड़का मोती को लेकर आगे गया| कुछ ही देर बाद उसे बाज़ार में एक सोने-चांदी की दुकान दिखाई दी| उसने दुकानदार को मोती का मूल्य बताने को कहा| सोनार ने मोती का मूल्य 100 रूपए के बराबर बताया| लड़का मोती लेकर वहां से भी आगे बढ़ा| आगे कुछ दूर चलने पर उसे एक जौहरी की दुकान दिखाई दी| उसने जौहरी से भी मोती के मूल्य के बारे में जानना चाहा| जोहरी मोतीयों का भी व्यापार करता था, सो उसे मोतियों की भी अच्छी खासी जानकारी थी| उसने मोती का मूल्य एक हज़ार रुपये बताया|

अब लड़का आश्चर्यचकित था, वह जैसे-जैसे बाज़ार में मोती का मूल्य पुछ रहा था मोती का मूल्य बढ़ता ही जा रहा था| अब उसके मन में मोती का सही मूल्य जानने को लेकर उत्सुकता हुई| वह किसी भी कीमत पर मोती का सही मूल्य जानने के लिए आतुर था| कुछ ही दिनों में वह एक जाने-माने जौहरी के पास मोती का सही मूल्य जानने के लिए पहुंचा| जौहरी हीरे-मोती का बहुत बड़ा व्यापारी था|

लड़के ने जौहरी के सामने रखकर जैसे ही मोती दिखाया, मोती देखते ही जौहरी आश्चर्यचकित हो गया, उसने आश्चर्य से लड़के से पुछा-
यह मोती तुम्हे कहाँ मिला – (लड़के ने अपने पिताजी द्वारा मरते समय मोती देने और माँ द्वारा मोती का मूल्य पता करने की सारी बात जौहरी को बता दी)

नई कहानियां

लड़के की बात सुनते ही जौहरी सारा माज़रा समझ गया|

उसने लड़के को अपने पास बिठाया और कहा….
बेटा! यह मोती अनमोल है| दुनियां में इस तरह का और कोई भी मोती नहीं है| मेरे पास जो कुछ भी है अगर वह सब भी में तुम्हें दे दूँ तब भी इस मोती का मोल नहीं किया जा सकता|

जौहरी की बात सुनकर लड़के ने जौहरी से निवेदन किया…
सेठ जी, पिताजी की मौत के बाद हमें अकेला पाकर लोगो ने हमारा सारा धन छल-कपट से हड़प कर लिया है| धन-सम्पदा के नाम पर अब इस मोती के सिवा हमारे पास और कुछ भी नहीं है| अगर आप इस मोती का सही मोल लगा देंगे तो में यह मोती आपको दे दूंगा जिससे हमारी तंगी भी दूर हो जाएगी और यह मोती भी सही हाथों में चला जाएगा|

जौहरी को उस लड़के पर तरस आ गया|
उसने लड़के के सर पर हाथ फेरते हुए कहा…
बेटा! इस अनमोल मोती का मूल्य तो में नहीं लगा सकता लेकिन जो भी तुम हमसे इस मोती के बदले में लेना चाहो तुम ले सकते हो…

वह कैसे ? (लड़के ने जौहरी की बात पर गौर करते हुए पुछा…)

जौहरी ने लड़के को उसकी तीनों दुकानों के बारे में बताया और कहा… “हमारी तीनों दुकानों में से तुम्हें पहली दुकान में 15 मिनट का समय दिया जाएगा उन 15 मिनट में तुम जितना सामान उस दुकान से निकाल लोगे वह सामान तुम्हारा हो जाएगा| ठीक वैसे ही दूसरी दुकान में तुम्हें 25 मिनट और तीसरी दुकान में तुम्हें 60 मिनट का समय दिया जाएगा| तुम तय समय में जितना सामान दुकान से निकाल लोगे वह सब तुम्हारा हो जाएगा|

जौहरी की बात सुनकर लड़का बहुत खुश हुआ| लड़के ने सोचा मोती की इससे अच्छी कीमत मुझे नहीं मिल सकती| बस यही सोचकर उसने जौहरी की शर्त मान ली और वह मोती जौहरी को सोंप दिया|

कुछ ही देर में जौहरी ने अपने मुनीम को बुलाया और लड़के से हुई सारी बातचीत मुनीम को समझा दी| मुनीम लड़के को लेकर पहली दुकान में पहुंचा| लड़का दुकान को देखते ही दुकान की सुन्दरता में खो गया| दुकान में जगह-जगह हीरे-जवाहरात सजे थे| इतनी ज्यादा दौलत उसने पहले कभी नहीं देखि थी| वह इस धन-दौलत में वह इतना खो गया की उसे समय का ख्याल ही नहीं रहा कब जौहरी के दीए 15 मिनट पुरे हो गए|

मुनीम लड़के को लेकर दूसरी दुकान में पहुंचा| यह दुकान सोने-चांदी से भरी थी| लड़का सोने-चांदी की चमक को देखकर आश्चर्यचकित था| वह कभी सोने का हार अपने गले में डालकर खुद को शीशे में देखता तो कभी हाथ में कुंदा पहनकर खुद को अमिर समझता| देखते ही देखते यहाँ भी 25 मिनट पुरे हो गए और मुनीम ने लड़के को दुकान से बहार निकलने का आदेश दे दिया|

मुनीम अब लड़के को लेकर तीसरी दुकान में पहुंचा| इस दुकान में एशों-आराम की सारी चीजें मौजूद थी| ऐसी-ऐसी चीजें जो लड़के ने अपनी ज़िन्दगी में कभी नहीं देखि थी| इन सब चीजों को देखकर लड़का पागल हो गया| वह कभी सोफे पर जा कर बेठता तो कभी दिवार पर लगी झूमर को निहारता| “नई कहानियां ” कभी बड़े-बड़े हाथियों के साथ खेलता तो कभी अलग-अलग तरह की घड़ियों को अपनी कलाई पर बांध के देखता| इस बार भी देखते ही देखते 60 मिनट का समय पूरा हो गया|

मुनीम ने अगले ही पल लड़के को बाहर निकलने का आदेश दे दिया| बाहर निकलते-निकलते लड़के ने जुट की बनी एक थैली उठा ली| अब शर्त के अनुसार उस बेशकीमती मोती की किमत वह जुट की बनी थैली थी| लड़के ने बाहर निकलकर जुट की बनी थैली को देखा लेकिन उसमें कारीगरों के रखने का सामान जैसे हथोडा, चीणी और पत्थर आदि पड़े थे|

जोहरी ने शर्त अनुसार वह थैली उस लड़के को दे दी| मोती की कीमत उस जोहरी ने लगाई थी लेकिन लड़के ने अपने मंदबुद्दी का परिचय देते हुए उस मोती को कोडियों के भाव बेच दिया|

साथियों, हमारा जीवन भी उस मोती की ही भातीं अमूल्य है! हमें भी जीवन में हमारे जिवन को मूल्यवान बनाने के लिए तिन मोके मिलते हैं| जीवन के प्रथम पढ़ाव के पंद्रह वर्ष अच्छे से शिक्षा ग्रहण करने के लिए उसके बाद अगले 25 वर्ष खुद को साबित करने और कुछ बनने के लिए व ज़िन्दगी के आखरी वर्ष धर्म कर्म करने के लिए|

लेकिन हम भी जिंदगी की चकाचौंध में इतने अंधे हो जाते हैं की हमें समझ ही नहीं आता के ज़िन्दगी के किस पड़ाव पर हमें क्या हाँसिल करना हैं| इसीलिए ज़िन्दगी की चकाचौंध में न फसकर हमें हमेशा हमारे लक्ष्य की और अग्रसर होना चाहिए व् इस अमूल्य जीवन का भरपूर मज़ा उठाना चाहिए|


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Baccho ki Kahani | बच्चों की कहानियां 

Baccho ki Kahani | बच्चों की कहानियां

साथियों नमस्कार, कहते हैं की बच्चों को अगर कहानियों और कविताओं के माध्यम से कोई बात समझाने की कोशिश की जाए तो बच्चे उस बात को बखूभी ढंग से समझ पते हैं| इसीलिए हम हमारी वेबसाइट Hindi Short Stories के माध्यम से आपके लिए कुछ ऐसी Moral Stories लेकर आएं हैं जिन्हें आप अपने बच्चों को सुनकर उन्हें जीवन के कई पाठ और सिख आसानी से सिखा सकते हैं| आइये पढ़ते हैं Baccho ki Kahani | बच्चों की कहानियां

 Baccho ki Kahani | पिता और पुत्र 

एक गाँव में एक जवान बाप अपने छोटे से पुत्र के साथ रहता था| एक बार वह बच्चे को गोद में लिये आँगन में  बैठा था। तभी कहीं से उड़कर एक कौआ उनके सामने खपरैल पर आकर बैठ गया।

पुत्र ने जिज्ञासावश पितासे पूछा-‘यह क्या है?’
पिता ने उत्तर दिया -“बेटा! यह कौआ है।”

पुत्र ने कुछ देर बाद फिर पुछा – “यह क्या है?”
पिता ने फिर सहजता से कहा – यह कौआ है।’

पुत्र बार-बार पूछता था क्या है ?
पिता स्नेह से बार-बार कहता था – ‘कौआ है।’

कुछ वर्षों में पुत्र बड़ा हुआ और पिता बूढ़ा हो गया। एक दिन पिता उसी आँगन में चटाई पर बैठा था। तभी घर में कोई उसके पुत्र से
मिलने आया।

पिता ने जिज्ञासावश  पूछा—’कौन आया है?’
पुत्रने नाम बता दिया।

थोड़ी देर में कोई और आया और पिताने फिर वही पूछा।
इस बार झल्लाकर पुत्रने कहा-‘आप चुपचाप पड़े क्यों नहीं रहते। आपको कुछ करना-धरना तो है नहीं।
कौन आया? कौन गया? दिनभर यही क्यों पूछते रहते हो|

पिताने लम्बी साँस खींची। हाथसे सिर पकड़ा। बड़े दु:खभरे स्वरमें धीरे-धीरे वह कहने लगा-‘बेटा, जब तुम छोटे थे तो बार-बार मुझसे एक ही सवाल पुछा करते थे और में तुम्हें हर बार प्यार से बताता था| और अब मेरे बार-बार पूछने पर तुम क्रोध करते हो| तुम सैकड़ों बार एक ही बात पूछते थे —’यह क्या है?’ मैंने कभी तुम्हें झिड़का नहीं। मैं बार-बार तुम्हें बताता-‘कौआ है।’

अपने मातापिताका तिरस्कार करनेवाले ऐसे पुत्र बहुत बुरे माने जाते हैं। इसलिए हमें सदा इस बात का ध्यान रखना है कि माता-पिता ने हमारे पालन-पोषणमें कितना कष्ट उठाया है। और हमसे कितना स्नेह किया है|


Baccho ki Kahani | इश्वर हर जगह है 

एक गाँव में एक दातादीन नाम का किसान रहता  था| दातादीन अपने लड़के “गोपाल” को रोज शाम को सोने से पहले “प्रेरणादायक कहानियाँ” सुनाया करता था।

एक दिन उसने अपने पुत्र गोपाल से कहा – बेटा! एक बात कभी मत भूलना कि भगवान् सब कहीं हैं।’
गोपालने इधर-उधर देखकर पूछा-‘पिताजी! अगर भगवान् सब कहीं हैं? वह मुझे तो कहीं दीखते नहीं’
दातादीन ने कहा – हम भगवान् को देख नहीं सकते, किन्तु वे हर जगह हैं और हमारे सब कामों को देखते रहते हैं।’

गोपाल ने पिता की बात याद कर ली। कुछ दिन बाद अकाल पड़ा। दातादीन के खेतों में फसल के नाम पर कुछ नहीं हुआ। दातादीन रत दिन चिंता में रहने लगा| फ़लस ना होने की चिंता उसे दिनों दिन खाए जा रही थी| एक दिन अपने पुत्र गोपाल को लेकर रात के अँधेरे में वह गाँव से बाहर गया।
वह दूसरे किसान के खेत से चोरी करके एक गट्ठा अन्न काटकर घर लाना चाहता था।

उसने अपने पुत्र गोपाल को मेड पर खडा करके कहा – ‘तुम चारों ओर देखते रहो, कोई इधर आए या
देखे तो मुझे बता देना।’ गोपाल अपने पिता दातादीन की बात मानकर मेड के पास खड़ा हो गया|

जैसे ही दातादीन खेत में अन्न काटने बैठा गोपाल ने कहा – ‘पिताजी! रुकिये।’
दातादीन घबराकर गोपाल के पास आया और पूछा-‘क्यों, कोई देखता है क्या ?’

गोपाल ने कहा – हाँ, देखता है। ‘
दातादीन ने चारों ओर देखा। जब कोई कहीं नहीं दीखा तो उसने अपने पुत्र से पूछा — ‘कहाँ ? कौन देखता है?’

गोपाल ने अपने पिता की और देखता हुए कहा – “पिताजी! आपने ही तो कहा था कि ईश्वर सब कहीं है और सबके सब काम देखता है। तब तो वह आपको खेत काटते भी देख रहा होगा”

दातादीन पुत्रकी बात सुनकर लज्जित हो गया। चोरी का विचार छोड़कर वह घर लौट आया।

इसीलिए कहा गया है, इश्वर हर जगह है और हम सबके कामों को देख रहा है| इसलिए हमें बिना किसी को हानि पहुंचाएं हमेशा ईमानदारी और संयम से काम लेना चाहिए| बैमानी से किए गए कार्य हमेशा नुकसानदायक होते है|


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लालची राजा | Hindi Kahaniya for Kids

                            Hindi Kahaniya for Kids


पाठकों नमस्कार, कहा गया है बच्चों को अगर उनकी ही भाषा में कोई बात समझाई जाए तो वे बेखुभी समझते हैं| लेकिन अब हर बच्चे के साथ बच्चा तो नहीं बना जा सकता| इसलिए अगर बच्चों को कोई शिक्षाप्रद बात बताना है तो उन्हें कहानी के माध्यम से बताई जा सकती है| इसीलिए आज हम आपके लिए ऐसी कहानियां (Hindi Kahaniya for Kids) लेकर आएं हैं जिन्हें आप अपने बच्चो को सुनाकर उन्हें ज़िन्दगी के बारे में बता सकते हैं! लीजिये पेश है आज की कहानी………

                   लालची राजा | Hindi Kahaniya for Kids

यूनान देश के एक राज्य में एक लालची राजा रहता था| राजा इतना लालची था की उसे अपनी पुत्री के सिवा इस दुनियां में अगर कोई दूसरी चीज प्यारी थी तो वह बस सोना ही था| उसने इतना सोना इच्क्ट्हा कर लिया था की पूरा राज्य भी अगर बैठकर खाए तो सोना ख़त्म न हो, लेकिन फिर भी वह रात-दिन सोना इक्कठा करने के स्वप्न देखा करता था|

ऐसे ही एक दिन राजा अपने खजाने में बैठा सोने की इटे और अशर्फियाँ  गिन रहा था तभी वहां पर एक देवदूत प्रकट हुए| उन्होंने राजा को असरफियन और सोने की इटें गिनते देखा तो आश्चर्य से बोले, “आप राजा होते हुए खजाने में बैठकर अशर्फियाँ गिन रहें हैं, आपके पास इतना धन है फिर भी आपको संतोष नहीं”

राजा देवदूत की बात सुनकर नमन करता हुआ बोला, “मेरे पास धन कहाँ है, मेरे पास तो बस यह बहुत थोडा सा सोना है”

देवदूत बोला, “इतना धन होते हुए भी तुम्हें संतोष नहीं, बताओ कितना धन चाहिए तुम्हें ?”

राजा ने कहा, “महात्मा! में तो चाहता हूँ की में जिस वास्तु को छू लूँ वह सोने की हो जाए|

राजा की बात सुनकर देवदूत मुस्कुराया और बोला, “कल सबेरे से तुम जिस भी वास्तु को छुओगे वह सोने की हो जाएगी, तथास्तु!”

इतना कहकर देवदूत देवलोक को चले गए| इधर राजा को देवदूत की बात सुनकर रात भर नींद नहीं आई| राजा बस सबेरे के इंतजार में लेटा रहा| सवेरे जैसे ही सूर्य की पहली किरण महल की दीवारों पर पड़ी राजा को देवदूत की कही बात फिर से याद आ गई| उसने उठकर एक कुर्सी पर हाथ रखा वह सोने की हो गई| एक मेज को छुआ वह सोने की हो गई| राजा की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, ख़ुशी के मरे वह उछालने नाचने लगा| वह पागलों की भातीं अपने बागीचे में गया और पेड़ों को छुने लगा| उसने फुल, पत्ते, डालियाँ, गमले सब छुए और सब सोने के हो गए| राजा के पास सोने का पार नहीं रहा|

कुछ ही देर में राजा थक गया| सोने के लालच में उसे यह भी ध्यान नहीं रखा की और उसके कपडे और जुते भी सोने के होकर  भारी हो गए हैं| थकान के कारण वह प्यासा था और उसे भूख भी लगी थी| अब बागीचे से राजमहल लोटकर वह एक सोने की कुसी पर आकर बैठ गया|

एक नोकर ने राजा के सामने स्वादिष्ट भोजन और पानी लाकर रख दिया| जैसे ही राजा ने सोने को हाथ लगाया पूरा भोजन सोने का बन गया| पानी पिने के लिए जैसे ही राजा ने ग्लास को उठाया, गिलास और पानी भी सोने का हो गया| अब राजा के सामने सोने की रोटियां, सोने के चावल, सोने के आलू और सोने की मिठाइयाँ पड़ी थी| वह भूखा और प्यासा था लेकिन सोना चबाकर उसकी भूख और प्यास नहीं मिट सकती थी|

खुद को इस अवस्था में पाकर राजा की आँखों से आंसू निकल पड़े| उसी समय राजा की पुत्री खेलते-खेलते वहां पहुंची और अपने पिता को रोते देख उनकी गोद में बैठकर अपने पिता के आसूं पोंछने लगी| राजा ने अपनी पुत्री को गले लगा लिया, लेकिन अब वहां उसकी पुत्री कहाँ थी वह तो अब सोने की एक मूर्ति बन गई थी जिसे गोद में उठाना भी मुश्किल था| बिचारा राजा सर पिट-पिट कर रोने लगा|

देवदूत देवलोक से सब कुछ देख रहे थे| उन्हें राजा की ऐसी हालत देखकर राजा पर तरस आ गया| देवदूत फिर राजा के सामने प्रकट हुए| देवदूत को देखकर राजा देवदूत के पैरों में गिर पड़ा और अपनी गलती पर पछताते हुए अपना वरदान वापस लेने के लिए देवदूत से प्रार्थना करने लगा|

देवदूत ने मुस्कुराते हुए राजा से पुचा, क्या तुम्हें अब सोना नहीं चाहिए ? बताओ, एक गिलास पानी मूल्यवान है या फिर सोना ? एक टुकड़ा रोटी भली या सोना ?

राजा ने हाथ जोड़ते हुए कहा, “हे देव! मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है| में जान गया हूँ की सोना महत्वपूर्ण नहीं है, सोने के बिना मनुष्य का कोई भी काम नहीं अटकता लेकिन अन्न जल के बिना मनुष्य का जीवन नहीं बच सकता| में अब कभी भी सोने का लोभ नहीं करूँगा|

राजा की बात सुनकर देवदूत मुस्कुराए और एक कटोरे में जल भरकर राजा को दिया और बोले, “राजन! इस जल को सभी जगह छिड़क दो|”

देवदूत के कहे अनुसार आजा ने वह जल अपनी पुत्री, मेज, कुर्सी, भोजन और बागीचे पर छिड़क दिया| देखते ही देखते सभी चीजे पहले के समान हो गई|

कहानी से शिक्षा:- दोस्तों कहानी पढने के बाद आपको हमारी बात सो समझ आ ही गई होगी| इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की धन के पीछे न भागकर जीवन को भरपूर जीने का लुफ्त उठाना चाहिए|

Hindi Kahaniya for Kids


                  बिना विचारे काम मत करो | Hindi Kahaniya for Kids

एक गाँव में एक किसान रहता था| किसान बहुत ही महानती, इमानदार और दयालु था| एक बार किसान जब अपने खेत से काम करके लौट रहा था तो उसे रास्ते में एक नेवला घायल अवस्था में मिला| नेवले को देख किसान को उस पर दया आ गई और वह उसे अपने घर ले आया| किसान ने नेवले की बड़े अच्छे से देखभाल की| कुछ ही दिनों में नेवला बिलकुल स्वस्थ हो गया|

अब वह नेवला किसान का पालतू बन गया था| वह दिन भर किसान के आँगन में ही रहता| एक दिन किसान अपनी फसल बेचने पास ही के गाँव की एक मंडी में गया था| घर पर किसान की स्त्री अकेली थी| सुबह घर का सारा काम निपटा कर किसान की स्त्री अपने बच्चे को दूध पिलाने के बाद बच्चे को आंगन में ही सुला कर घर का काम निपटाने लगी|

कुछ ही देर में वहां एक काला सांप अपने बिल से निकल कर आया| किसान का बच्चा वहीँ आँगन में एक कपडे के ऊपर सो रहा था| नेवले ने देखा की सांप धीरे-धीरे नेवले की और ही आ रहा है तो उसने आव देखा न ताव, सीधा जा कर सांप से भीड़ गया| कुछ ही देर में सांप और नेवला लहूलुहान हो गए| लेकिन आखिरकार जीत नेवले की और और नेवले ने सांप के टुकड़े=टुकड़े कर उसे मार गिरा दिया|

सांप को मारने के बाद नेवला जैसे ही घर के अन्दर पहुंचा किसान की स्त्री नेवले के मुह पर खून को लगा देखकर आग बबूला हो गई| किसान की स्त्री को लगा की हो न हो इस नेवले ने मेरे बच्चे को काटा है और इसके मुह पर मेरे ही बच्चे का खून लगा है| बस किसान की स्त्री के इतना सोचने भर की देर थी की उसने आव देखा न ताव अपने हाथ में पकडे झाड़ू से नेवले को मारना शुरू कर दिया| किसान की स्त्री ने नेवले को तब तक मारा जब तक की वह मुर्चित होकर जमीन पर गिर न गया|

नेवले को अपने किए की सजा देने के बाद किसान की स्त्री को अपने बच्चे की याद आई| किसान की स्त्री दौड़कर आँगन में आई, उसने देखा की उसका बच्चा आँगन में सुख से सो रहा है और पास ही एक काला सांप मरा पड़ा है| अगले ही पल किसान की स्त्री को अपने गलती का अहसास हो गया| वह दौड़कर घर में गई और मरे हुए नेवले को गोद में उठा कर रोने लगी| लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी| अब भलारोने से क्या लाभ…

इसीलिए कहा गया है…

बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताए…काम बिगाड़े आपनो, जग में होत हसाए!!

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Story for Kids in Hindi | सच्चा स्वांग

                 Story for Kids in Hindi | सच्चा स्वांग


कहते हैं की बच्चों को अगर कोई बार कहानी के रूप में समझाई जाए तो उसे वे बखूभी ढंग से समझते हैं| हमारी वेबसाइट का उद्देश्य भी कहानियों (Hindi Stories) के माध्यम से बच्चों को ज्ञानवर्धक बातों को समझाना है| लीजिये इसी कड़ी में हम आपके लिए लाएं हैं “सच्चा स्वांग | Story for Kids in Hindi


                          Story for Kids in Hindi | सच्चा स्वांग

एक राज्य में एक राजा था| एक दिन राजा के पास एक बहुरुपिया आया और बोला, “महाराज में एक बहुरुपियाँ हूँ, मुझमे देवी की एक एसी शक्ति है की में एक बार जो स्वांग धारण कर लेता हूँ उसे पूरी शिद्दत के साथ निभाता हूँ और कभी चुकता नहीं हूँ| राजा बहुरूपिये की बात सुनकर काफी मोहित हुआ और उसे एक विरक्त त्यागी महात्मा का स्वांग लाने का आदेश दिया| बहुरूपिये ने राजा के आदेश को स्वीकार किया और महल से चला गया|

काफी दिनों तक बहुरुपिया एक गुप्त स्थान पर रहा और दाढ़ी बढ़ने पर साधू का स्वांग लेकर शहर में आया| वह सबके साथ एक संत की तरह बर्ताव करने लगा| किसी के साथ कोई राग, द्वेष न रखता| सबको अच्छी-अच्छी बातें सुनाता, हर परेशानी में शहरवासियों को एक संत की तरह सहायता करता| धीरे-धीरे उसकी ख्याति पुरे शहर में फ़ैल गई| 

राजा ने जब शहर में प्रख्यात संत के आने की खबर सुनी तो उसने अपने मंत्री को भेजा की जाकर देखो की वही बहुरुपिया है या कोई संत है? मंत्री ने जाकर देखा तो बहुरूपिये को पहचान लिया और राजा को आकर सारी बात बता दी| मंत्री की बात सुनकर राजा ने अगले ही दिन संत के दर्शन को जाने की घोषणा कर दी| अगले दिन राजा पुरे लाव-लश्कर के साथ एक थाल में  बहुत सारी अशर्फियाँ और एक थाल में भेंट-पूजा का सामान लेकर पुरे ठाठ बाट के साथ वहां गया| रास्ते में जिसने भी राजा को संत के दर्शन के लिए जाते हुए देखा तो यही सोचा की संत बड़े ही पहुचे हुए महात्मा है जिनके दर्शन को राजा खुद जा रहें है| कुछ ही देर में काफी लोग संत की कुटीया के समीप एकत्रित हो गए|

राजा ने  संत की कुटीया में प्रवेश किया और अशर्फियों से भरा थाल संत के समक्ष रख दिया| संत ने अशर्फियाँ अथवा रूपया कपडा कुछ भी लेने से मन कर दिया और “शिव-शिव” कहते हुए वहां से चले गए| राजा के इस व्यहवार को देखकर नगरवासी बहुत नाराज हुए| लोग कहने लगे, अच्छा सत्संग होता था राजा को पता नहीं क्या सूझी कि संत महात्मा को अशर्फियाँ भेंट की| भला रूपया और अशर्फियाँ महात्मा के किस काम की|

अगले दिन बहुरुपिया अपने असली रूप में राजा के महल में उपस्थित हुआ और राजा के दरबार में आकर बोला कि अन्नदाता! इनाम मिल जाए तो बड़ी महरबानी हो! बहुरूपिये की बात सुनकर राजा बोला, “तू बड़ा मुर्ख है! मेने इतनी सारी अशर्फियाँ, रुपिया, कपडा तुम्हारे समक्ष रखा लेकिन तुमने कुछ भी लेने से इनकार कर दिया और अब इनाम मांगने के लिए यहाँ आया है|”

राजा की बात सुनकर बहुरुपिया बोला, “महाराज! उस वक़्त मेने साधू का स्वांग लिया था, फिर में वह काम कैसे कर सकता था की साधू के स्वांग को बट्टा लग जाए| अगर में उस वक़्त आपका इनाम स्वीकार कर लेता तो नगर की जनता मेरे स्वांग का भेद जान जाती|” बहुरूपिये की बात राजा को समझ आ गई| वह बहुरूपिये से बहुत प्रसन्न हुआ और बहुत सारा इनाम बहुरूपिये को दिया|

कुछ दिनों बाद राजा को फिर से स्वांग देखने की इच्छा हुई और उसने अपने मंत्री से बहुरूपिये को दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया| अगले दिन बहुरुपिया जब राजा के दरबार में उपस्थित हुआ तो राजा ने बहुरुपिए को “सिंह” का स्वांग लेने का आदेश दिया| रजा की बात सुनकर बहुरूपिये नें राजा के समक्ष हाथ जोड़ते हुए कहा, “महाराज! आप तो जानते ही हैं, माँ भगवती की शक्ति से में जो भी स्वांग लेता हूँ उसे पूरी शिद्दत के साथ निभाता हूँ| सिंह का स्वांग बहुत खतरनाक है, इसमें कुछ भी नुकसान हो सकता है|” लेकिन राजा नें बहुरूपिये की एक न सुनी और उसे किसी भी कीमत पर सिंह का स्वांग करने का आदेश दिया|

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अगले ही दिन बहुरुपिया सिंह की खाल पहन कर, सिंह की तरह गुर्राता हुआ दरबार में आया और आकर दरबार के बीचों-बिच बैठ गया| समीप ही राजा का लड़का खेल रहा था| लड़का खेलते खेलते वहां आया और सिह को पीछे से लकड़ी मार दी| बस फिर क्या था सिंह बना बहरूपिया गुर्राया और चट से अपने बड़े बड़े नाखूनों से बच्चे की गर्दन पर वार करते हुए बच्चे को मार दिया| यह सब इतना जल्दी हुआ की जब तक दरबार में बेठे लोग समझ पते तब तक राजकुमार की मौत हो चुकी थी|

राजा को जब राजकुमार की मौत की खबर मिली तो राजा बहुत दुखी हुआ और बहुरूपिये को बंदी बनाकर दरबार में पेश करने कका आदेश दिया| बहुरूपिये ने महाराज से हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए कहा, “महाराज! मेने आपको पहले ही इस तरह के नुक्सान के लिए आगाह किया था लेकिन फिर भी आपने आदेश दिया| मैंने को केवल अपना स्वांग पूरा किया है|

राजा बहुरूपिये को म्रत्यु दंड देना चाहता था लेकिन अपने दी वचन से प्रतिबद्ध था| राजा के पास एक नाई रहता था| उसने राजा को सलाह दी की बहुरूपिये को “सती” का  स्वांग रचने का आदेश दे| सती, पति के पीछे जल जाती है, अतः यह भी जल के मर जाएगा| जिससे आपका वचन भी पूरा हो जाएगा और इस बहुरूपिये को दंड भी मिल जाएगा| अगले ही पल राजा ने बहुरूपिये को सती का स्वांग लाने की आज्ञा दे दी|

शहर में एक लावारिस मुर्दा पड़ा हुआ था |अगले दिन बहुरुपिए ने उस लावारिस मुर्दे को लेकर सती का स्वांग बनाया| सोलह श्रृंगार करके ढोल  नगाड़ों के साथ वह नगर से निकला| लोगों ने देखा कोई “स्त्री” सती होने जा रही है| राजा के पास जब यह समाचार पहुंचा तो उसने मंत्री से पता लगाने को कहा| मंत्री ने पता लगाकर राजा को बताया की यह वही बहुरुपिया है और सती का स्वांग लेकर आया है| राजा ने अपने सिपाहियों को आदेश दिया की इस बहुरूपी को अच्छे से जलाया जाए जिससे यह बच न पाए|

इधर बहुरुपिया उस मुर्दे को लेकर नदी के पास बने शमशान घाट पंहुचा| लोगों ने देखते ही देखते वहां काफी साडी लकड़ियाँ इकट्ठी कर दी| सटी का संग बना बहुरुपिया मुर्दे को लेकर लकड़ियों के ऊपर बेठ गया| लकड़ियों में आग लगा दी गई| इतने में जोर की आंधी और बारिश शुरू हो गई| लोगों में कोई उस बहुरूपिये का सगा तो था नहीं इसलिए आंधी और बारिश आने से सब लोग भाग गए| इधर बारिश से अंग बुझ गई और नदी में पानी बढ़ जाने से सब लकड़ियाँ बह गई| बहुरुपिया लकड़ियों के ऊपर बैठा रहा और तैरते हुए किनारे पहुँच गय| देवी का इष्ट होने से बहुरूपिये के प्राण बच गए|

कुछ महीने बीतने के बाद एक दिन बहुरुपिया राजा के महल में पहुंचा और राजा को बोला, “महाराज! कुछ इनाम मिल जाए| राजा बहुरूपिये को देख कर चक्र गया और बोला, “अरे! तू तो जल के मर गया था ना ?”

राजा की बात सुनकर बहुरूपिये ने विनम्रता पूर्वक जवाब दिया, हाँ महाराज! जल तो गया था लेकिन शक्ति माँ की कृपा से वापस आ गया हूँ| राजा बोला, “क्या तू अमरे बाप-दादा से मिला?” बहुरुपिया बोला, “हाँ महाराज! सबसे मिल कर आया हूँ|

हमारे लिए कुछ समाचार लाया ? (महाराज ने पुछा)

जी हाँ, महाराज..,आपके बाप-दादा अच्छे हैं लेकिन वहां उनकी हजामत और नाख़ून बहुत बढे हुए हैं| इसीलिए उन्होंने वहां घर के नाई को बुलाया है| (बहुरूपिये ने कहा)

और नाई वहां जाएगा कैसे….(राजा बोला)

वैसे ही जैसे आपके बाप-दादा गए, में गया…क्यों की जाने का रास्ता तो एक ही है|

नाइ ने जब बहुरूपिये की बात सुनी तो सोचा की अब तो मेरी मौत पक्की है| राजा के आदेश को कोण नहीं मानेगा, इधर राजा ने आदेश दिया और उधर मुझे सूली पर चढ़ा दिया जाएगा|

इतना सोचते ही नाई ने जाकर बहुरूपिये के पैर पकड़ लिए और बोला, “भाई! तुम किसी तरह मुझे बचा लो| मेरे घर में मेरे सिवा कमाने वाला और कोई नहीं है, मेरा घर बर्बाद हो जाएगा| नाइ की बात सुनकर बहुरुपिया बोला, “मित्र! राजा से सटी का स्वांग लेन की सलाह देने वाला तू ही था अब तू भी जा| बहुरूपिये की बात सुनकर नाई बहुरूपिये के सामने बहुत गिदगिड़ाया और अपने किए की मांफी मांगी|

नाई को यूँ गिडगिडाते देख बहुरूपिये ने सोचा, “नाइ से मेरा कोई वेर नहीं है| गलती सबसे होती है लेकिन माफ़ कर देना ही सबसे उचित है| यही सोचकर बहुरूपिये ने बारिश और आंधी से जन बचने वाली पूरी बात राजा को जाकर बता दी और कहा, “महाराज! सती का स्वांग लेने से में डरता नहीं, आप जो भी स्वांग देंगे में स्वीकार कर लूँगा और पूरी शिद्दत के साथ निभाऊंगा चाहे उसके लिए मुझे अपने प्राण ही क्यों न त्यागना पड़े| अब मेरे स्वांग के लिए आप मुझे जो भी इनाम दें मुझे स्वीकार है|

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कहानी का सार यही है की बहुरूपिये की तरह हमें भी अपने स्वांग को पूरी शिद्दर के साथ निभाना चाहिए| पिता का, भाई का, बहन का, माँ का जो भी स्वांग इश्वर ने मनुष्य को सोंपा है उसे कभी नहीं बिग्फादना चाहिए| को अपने कर्तव्यों का पालन ठीक तरह से करता है विपत्ति आने पर इश्वर भी उसका साथ देते हैं| 


           कहानी एक फूंक की दुनियां

एक गाँव में एक बहुत बड़े त्यागी संत रहा करते थे| दिन भर भगवान का भजन करते और जो कुछ भी गाँव वालों से मिलता उस से अपना भरण-पोषण कर दिन-रात भगवान् की भक्ति में लीन रहते| गाँव भर में उनका बहुत मान सम्मान था| कभी-कभी गाँव वाले अपनी समस्याओं को लेकर उनके यहाँ आते और अपनी समस्याओं का हल पाकर प्रसन्न मन से जाते| संत के इस जीवन से एक दिन एक व्यक्ति प्रसन्न हो गया और संत का शिष्य बन गया| व्यक्ति पढ़ा-लिखा था अतः कुछ ही वर्षों में वह वेद विज्ञान का ज्ञाता हो गया और उसने गाँव वालों को व्याख्यान देना शुरू कर दिया|

धीरे-धीरे बहुत से व्यक्ति उसके पास आने लगे| संत ने उसे समझाया की व्याख्यान देना अच्छी बात नहीं है हमें इस जाल में नहीं फसना चाहिए| संत की बात सुनकर भी शिष्य नहीं मन और दुसरे गाँव में जाकर व्याख्यान देने लगा| अब दूर-दूर तक शिष्य की ख्याति होने लगी| दूर-दूर से लोग उनके व्याख्यान सुनने के लिए आने लगे, यहाँ तक की खुद राजा भी उनके व्याख्यान सुनने के लिए आने लगे|

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गुरूजी को पता था की किसी दिन व्याख्यान देने की यह प्रवृति उनके शिष्य को किसी बड़ी मुसीबत में फसा सकती है| गुरूजी की अपने शिष्य पर दया आ गई| एक दिन तडके गुरूजी अपने शिष्य के पास पहुंचे तब शिष्य के प्रवचन का समाय था| शिष्य ने जैसे ही अपने गुरूजी को सभा मंडप की और आते हुए देखा तो कहा- “अरे! आज तो हमारे गुरु महाराज हमारे बिच में पधारे हें| लोगों ने जब गुरु महाराज को देखा तो बड़ी मात्रा में गुरूजी के चारों और एकत्रित हुए| गुरूजी को बड़े आदर सम्मान के साथ ऊँचे आसन पर बिठाया गया| लोगों ने गुरूजी का बड़ा आदर, सम्मान और महिमा की|

अगले ही दिन गुरूजी के सम्मान में एक बहुत बड़ी सभा आयोजित की गई जिसमें दूर -दूर से लोग गुरूजी के दर्शन को एकत्रित हुए| सभा में राज्य के राजा को भी आने का न्योता दिया गया| अगले दिन जब सभा आयोजित हुई तो गुरूजी को न जाने क्या सूझी की अपने आसन से उठे राजा के पास गए और “भर्रर्रर्रर…………….” कर के उपानवायु छोड़ दी! लोगों ने जब गुरूजी के इस व्यहवार को देखा तो कहा, “चेला तो ठीक है, लैकिन गुरूजी में कुछ नहीं है”| गुरूजी के इस व्यहवार से लोगों के साथ-साथ राजा भी नाराज हुए| तभी गुरूजी ने शाम को ही वहां से प्रस्थान करने की घोषणा की| लोग मन ही मन प्रसन्न हुए “चलो जल्दी ही आफत टली”

“हें तो महाराज के गुरूजी ही, थोडा आदर सम्मान से विदा करेंगे तो अच्छा लगेगा”  बस यही सोचकर सभी लोग गुरूजी को विदा करने गाँव के बाहर तक आए| वहां एक मरी हुई चिड़िया पड़ी थी, गुरूजी ने उसे अपनी उँगलियों से पकड़कर ऊपर उठा लिया और सबको दिखाने लगे| लोग गुरूजी को देखने लगे गुरूजी यह क्या करते हैं| तभी गुरूजी ने चिड़िया के सामने जोर से फूंक मरी तो चिड़िया “फुर्रर्रर्र……….” करके उड़ गई| लोग गुरूजी के इस चमत्कार को देखकर आश्चर्यचकित हो गए| अब लोग कहने लगे गुरूजी तो बड़े सिद्ध महात्मा है और गुरूजी की चरों और जय जयकार होने लगी|

यह देख गुरूजी ने  अपने शिष्य को पास बुलाया और कहा, “वत्स! तुम समझे या नहीं ?

गुरूजी की बात सुनकर शिष्य ने कहा, “क्या समझना है गुरूजी”?

गुरूजी मुस्कुराए और बोले, ” इस दुनियां की किमत समझी या नहीं तूने, यह सब दुनियां फूंक की है| एक फूंक में भाग जाए और एक फूंक में आ जाए, फूंक एक क्षण भर का होता है इसका क्या मोल है| इसलिए ऊँचे आसन पर बैठकर, व्याख्यान देने से कोई बड़ा नहीं हो जाता| इसिकिये इस मान बड़ाई में  न फसकर भगवान् का भजन करो|


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