कहानी महाभारत के कर्ण की | Karna in Hindi

Karna कर्ण की कहानी
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साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए लेकर आएं हैं महाभारत काल के योद्धा कर्ण की कहानी | Karna in Hindi
आशा है आपको हमारा यह आर्टिकल ज़रूर पसंद आएगा।


कहानी महाभारत के कर्ण की | Karna in Hindi

भारत सोने की चिड़िया के साथ साथ कहानियों की चिड़िया भी थी। और आज भी भारत के कोने कोने में कहानियां बसी हुई है जिन्हे सुनकर आप और मैं बड़े हुए है। अपनी नानी दादी से महाभारत और रामायण सुनकर कब उनके और इन कहानियों के करीब हो गए ,हम खुद भी नहीं जानते।

ना जाने कितने किरदारों से हम सब ने कितना कुछ सीखा और समझा है। ऐसे ही एक किरदार जिनके दानवीर होने के किस्से दिल में आज भी बसे हुए है। जी हां मैं बात कर रही हूं सूर्यपुत्र कर्ण की। कर्ण की कहानी हम सबने सबसे पहले महाभारत में सुनी है जो भारतीय उपमहाद्वीप के संस्कृत महाकाव्यों में से एक है।

कर्ण महाभारत (महाकाव्य) के सबसे प्रमुख पात्रों में से एक है। महाभारत में यूं तो धनुर्धारियों में सभी श्रेष्ठ थे परंतु छ: पांडवों में सबसे बड़े भाई कर्ण सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारियों में से एक थे। कर्ण की दो मां और दो पिता थे। सुनकर थोड़ा अटपटा लग रहा होगा पर ये सच है। उनकी वास्तविक माँ कुन्ती थीं और वास्तविक पिता भगवान सूर्य थे। कर्ण और उनके छ: भाइयों के धर्मपिता महाराज पांडु थे।

अगर आपने कभी महाभारत नही पड़ी है तो ये सुनकर आपको अटपटा जरूर लगा होगा परंतु ये कहानी आपकी सारी शंका दूर कर देगी। तो हुआ यूं कि उनका जन्म पाण्डु और कुन्ती के विवाह के पहले हुआ था । उनका जन्म कुन्ती को मिले एक वरदान स्वरुप हुआ था।उनके विवाह से बहुत पहले जब वह कुँआरी थी, तब उनके पिता के महल में एक बार दुर्वासा ऋषि पधारे।

कहानी महाभारत के कर्ण की | Karna in Hindi

दुर्वासा ऋषि शिव के अवतार माने जाते हैं। दुर्वासा अपने क्रोध के कारण मशहूर थे।पूरे एक वर्ष तक कुन्ती ने उनकी दिन रात बहुत अच्छे से सेवा की। कुन्ती की लगन और सेवाभाव को देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए।दुर्वासा ऋषि बहुत ज्ञानी थे अतः उन्होनें अपनी दिव्यदृष्टि से ये देख लिया कि कुन्ती को पाण्डु से कोई सन्तान नहीं हो सकती इसलिए उन्होंने कुन्ती को ये वरदान दिया कि वह किसी भी देवता का स्मरण करके उनसे सन्तान उत्पन्न कर सकती है।

एक दिन उत्सुकतावश कुँआरेपन में ही कुन्ती ने सूर्य देव का ध्यान शुरू कर दिया। वरदान के अनुसार सूर्य देव प्रकट हुए और उसे एक पुत्र दिया जो तेज़ में सूर्य के ही समान था। ये पुत्र कर्ण ही था। जब भगवान सूर्य ने कुन्ती को कर्ण को दिया तब कर्ण के शरीर पर कवच और कुण्डल चिपका हुआ था । चूँकि कुन्ती अभी भी अविवाहित थी और उनकी इस उत्सुकता में की गई गलती का परिणाम उन्हें मिला।

इसलिए कुंवारी कुन्ती ने लोक-लाज के डर से उस पुत्र को एक बक्से में रखा और अपने बहते आंसुओ के साथ बक्शे को गंगाजी में बहा दिया। महाराज भीष्म के सारथी अधिरथ और उनकी पत्नी राधा ने गंगाजी में एक बक्शे में छोटे से बच्चे को देखा जो गंगाजी में बहता हुआ जा रहा था। जैसे ही उन्होंने उस बच्चे को देखा उन्होंने तुरंत उसे गोद ले लिया और दोनो उस बच्चे का लालन पालन अपनी औलाद की तरह करने लगे।

उन्होंने उसे वासुसेन नाम दिया।इस तरह कर्ण का नाम वासुसेन रखा गया। अपनी पालनकर्ता माता के नाम पर कर्ण Karna को राधेय के नाम से भी जाना जाता है। अपने जन्म के रहस्योद्घाटन होने पर और अंग का राजा बनाए जाने के बाद भी कर्ण ने सदैव उन्हीं को अपना माता-पिता माना और अपनी मृत्यु तक सभी पुत्र धर्मों को बखूबी निभाया। अंग का राजा बनाए जाने के पश्चात कर्ण का एक नाम अंगराज भी हुआ।कर्ण का जीवन अंतत विचार जनक है।

कथा शैली के भीतर कथा का अनुसरण करने वाले महाभारत के भीतर कर्ण के जन्म का वर्णन चार बार किया गया है। भगवान परशुराम जो शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होंने स्वयं कर्ण की श्रेष्ठता को स्वीकार किया था।

कर्ण की रुचि कुमार अवास्था से ही अपने पिता अधिरथ के समान रथ चलाने कि बजाय युद्धकला में अधिक थी। आचार्य द्रोण उस समय युद्धकला के सर्वश्रेष्ठ आचार्यों में से एक थे।तो कर्ण और उसके पिता अधिरथ एक दिन उनसे मिले। द्रोणाचार्य उस समय कुरु राजकुमारों को शिक्षा दिया करते थे । तब किसी को भी कर्ण की असली सच्चाई मालूम नही थी, खुद कर्ण को भी नही।

कहानी महाभारत के कर्ण की | Karna in Hindi

उस समय वे एक सारथी पुत्र की तरह द्रोणाचार्य से शिक्षा लेने के लिए गए थे और द्रोण केवल क्षत्रियों को ही शिक्षा दिया करते थे इसलिए उन्होंने कर्ण को शिक्षा देने से मना कर दिया था।

द्रोणाचार्य द्वारा मना करने पर कर्ण ने हिम्मत नहीं हारी। उनकी असम्मति के उपरान्त कर्ण ने परशुराम से सम्पर्क किया जो कि केवल ब्राह्मणों को ही शिक्षा दिया करते थे। परशुराम के सामने कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर उनसे शिक्षा का आग्रह किया। परशुराम ने कर्ण का आग्रह खुशी खुशी स्वीकार किया और कर्ण को अपने समान ही युद्धकला और धनुर्विद्या में निष्णात किया। इस प्रकार कर्ण परशुराम का एक अत्यन्त परिश्रमी और निपुण शिष्य बना।

कर्ण को एक आदर्श दानवीर माना जाता है क्योंकि कर्ण के दानवीरता के किस्से हर जगह फैले हुए थे। उन्होंने कभी किसी माँगने वाले को दान में कुछ भी देने से कभी भी मना नहीं किया। यहां तक कि कई बार इसके परिणामस्वरूप उसके अपने ही प्राण संकट में तक पड़ गए परंतु वे अटल रहे अपने इस व्यक्तित्व को लेकर।

उनकी दानवीरता से जुड़ा एक वाक्या महाभारत में है जब अर्जुन के पिता भगवान इन्द्र ने कर्ण से उसके कुंडल और दिव्य कवच माँगे और कर्ण ने बिना कुछ सोचे अपने शरीर में बचपन से चिपके आए कवच उन्हें दे दिए। कर्ण को कुछ श्राप तो उनकी इसी दानवीरता के कारण मिले थे।

कर्ण को उसके गुरु परशुराम और पृथ्वी माता से भी श्राप मिला था। इसके अतिरिक्त भी कर्ण को बहुत से श्राप मिले थे।
जब कर्ण की शिक्षा अपने अन्तिम चरण पर थी तब की बात है। एक दोपहर को गुरु परशुराम कर्ण की जंघा पर सिर रखकर विश्राम कर रहे थे। कुछ देर बाद अचानक कहीं से वहा एक बिच्छू आ गया और उसकी दूसरी जंघा पर काट कर घाव बनाने लगा।

कहानी महाभारत के कर्ण की | Karna in Hindi

कर्ण के जंघा से रक्त आने लगा परंतु गुरु का विश्राम भंग ना हो जाए इसलिए कर्ण बिच्छू को दूर ना हटाकर उसके डंक को सहता रहा। कुछ देर में गुरुजी की निद्रा टूटी और उन्होनें देखा की कर्ण की जाँघ से बहुत रक्त बह रहा है। इतनी सहनशीलता हर किसी में नहीं होती इसलिए उन्होनें कहा कि केवल किसी क्षत्रिय में ही इतनी सहनशीलता हो सकती है कि वह बिच्छु डंक को सह ले, ना कि किसी ब्राह्मण में। परशुरामजी बहुत क्रोध में आ गए।

उन्होंने उसे मिथ्या भाषण के कारण श्राप दे दिया कि जब भी कर्ण को उनकी दी हुई शिक्षा की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, उस दिन वह शिक्षा उसके काम बिलकुल नहीं आएगी।

कर्ण ने अपने गुरु से क्षमा माँगी और कहा कि उसके स्थान पर यदि कोई और शिष्य भी होता तो वो भी यही करता। उस समय कर्ण स्वयं भी यह नहीं जानता था कि वह किस वंश से है,उसे कुन्ती और उनके वरदान के बारे में कुछ नही पता था। यद्यपि कर्ण को क्रोधवश श्राप देने पर परशुराम जी को ग्लानि हुई परंतु वे अपना श्राप वापस नहीं ले सकते थे।

तब उन्होनें कर्ण Karna को अपना विजय नामक धनुष प्रदान किया और अपनी गलती के प्रायश्चित में उसे ये आशीर्वाद दिया कि उसे वह वस्तु मिलेगी जिसे वह सर्वाधिक चाहता है – अमिट प्रसिद्धि। कुछ लोककथाओं में ये भी माना जाता है कि बिच्छू के रूप में स्वयं इन्द्र देव थे, जो उसकी वास्तविक क्षत्रिय पहचान को उजागर करना चाहते थे इसलिए उन्होंने ये सारा खेल रचा था।

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद कर्ण परशुरामजी के आश्रम से चला गया। वहा से जाने के पश्चात, वो कुछ समय तक भटकता रहा। इस दौरान वह शब्दभेदी विद्या सीख रहा था। अभ्यास के दौरान उसने एक दिन एक गाय के बछड़े को कोई वनीय पशु समझ लिया और उस पर शब्दभेदी बाण चला दिया। उनके बाण से वो बछडा़ मारा गया।

इसके बाद उस गाय के स्वामी ब्राह्मण ने कर्ण को श्राप दिया कि जिस प्रकार उसने एक असहाय पशु को मारा है, वैसे ही एक दिन वह भी मारा जाएगा। जब वह सबसे अधिक असहाय होगा और जब उसका सारा ध्यान अपने शत्रु से कहीं अलग किसी और काम पर होगा तब वह भी अपने प्राण त्याग देगा। हालांकि ये भूल उनसे अंजाने में हुई थी पर शायद ये श्राप उनकी किस्मत में ही लिखा था।

लोक कथाओं में भी कर्ण का कई जगह जिक्र हुआ है। कहानी महाभारत के कर्ण की | Karna in Hindi
आन्ध्र की लोक कथाओं के अनुसार एक बार कर्ण कहीं जा रहा था, तब रास्ते में उसे एक कन्या मिली जो अपने घडे़ से घी के बिखर जाने के कारण बहुत ज्यादा रो रही थी। जब कर्ण ने उसके सन्त्रास का कारण जानना चाहा तो उसने बताया कि उसे भय है कि उसकी सौतेली माँ उसकी इस असावधानी पर नाराज होंगी।

दयालु कर्ण ने तब उससे चुप होने को कहा और उसे नया घी लाकर देने का वादा किया। परंतु कन्या ने आग्रह किया कि उसे वही मिट्टी में मिला हुआ घी ही चाहिए और उसने नया घी लेने से साफ मना कर दिया। तब कन्या पर दया करते हुए कर्ण ने घी युक्त मिट्टी को अपनी मुठ्ठी में लिया और बिना सोचे विचारे उसे निचोड़ने लगा ताकि मिट्टी से घी निचुड़कर घड़े में गिर जाए। इस प्रक्रिया के दौरान उसने अपने हाथ से एक पीड़ायुक्त महिला की ध्वनि सुनी।

जब उसने अपनी मुठ्ठी खोली तो धरती माता को अपने हाथो में पाकर आश्चर्यचकित हो गया। पीड़ा से क्रोधित धरती माता ने कर्ण की आलोचना की और कहा कि उसने एक बच्ची के घी के लिए उन्हें इतनी पीड़ा दी। और तब धरती माता ने गुस्से में कर्ण को श्राप दिया कि एक दिन उसके जीवन के किसी महत्वपूर्ण निर्णायक युद्ध में वह भी उसके रथ के पहिए को वैसे ही पकड़ लेंगी जैसे उसने उन्हें अपनी मुठ्ठी में पकड़ा है, जिससे वह उस युद्ध में अपने शत्रु के सामने असुरक्षित और असहाय हो जाएगा।

इस प्रकार, कर्ण को तीन श्राप मिले । दुर्भाग्य से ये तीनों ही श्राप कुरुक्षेत्र के महत्वपूर्ण निर्णायक युद्ध में फलीभूत हुए, जब वह युद्ध में अस्त्र विहीन, रथ विहीन और असहाय हो गया था। शायद ये सभी श्राप उनके जीवनकाल में पहले से ही लिखे जा चुके थे।

महाभारत के युद्ध में वह अपने भाइयों के विरुद्ध लड़ा और अंत में अपनी जान गवां बैठा। कर्ण की छवि आज भी भारतीय जनमानस में एक महायोद्धा की है। वो जीवनभर प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ता रहा। बहुत से लोगों का यह आज भी मानना है कि कर्ण को कभी भी वह सब नहीं मिला जिसका वह वास्तविक रूप से अधिकारी था क्योंकि उसकी वास्तविक पहचान उसकी मृत्यु तक अज्ञात ही रही।

कर्ण को आज भी एक दानवीर और महान योद्धा की तरह याद किया जाता है।

कहानी महाभारत के कर्ण की | Karna in Hindi
Written BY – मानसी जैन
mansi2219mj@gmail.com


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