Hindi Poem on Daughter | में बेटी हूँ

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए एक ऐसी कविता “Hindi Poem on Daughter | में बेटी हूँ” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आपको बेटियों पर गर्व महसूस होगा|


Hindi Poem on Daughter | बेटीयों और बहनों की अस्मिता का सवाल है

दरीन्दगी से भरे मानुष रूप किसे किसका ख्याल है,
लूट रही है इज्जत और झूठों का मायाजाल है|
21वीं सदी में मनुष्य का मनुष्य ही काल है,
बेटीयों और बहनों की अस्मिता का सवाल है||
घूम रहे हैं भेड़िये निर्भीक हर चौराहे पर,
उनकी जान बचाने के लिए…
कुछ भेड़िये खाल ओढ़े बैठे हैं संसद भवन पर.
कुछ तो अर्थों से बलात्कार का परिभाषा…
प्रयत्न करते बदलने का|
ये राम नहीं दूशासन का काल है.
बेटियों और बहनो की अस्मिता का सवाल है||
बेटियों और बहनों के साथ होता रहा दुर्व्यवहार,
खुद को सामाजिक समझने वाला इंसान
देखता रहा हर बार…
न्याय व्यवस्था फीकी है उम्मीद करें तो किस पर,
पुलिस प्रशासन सोयी है भीभीषण की गहरी नींद में
किसी की बहन होना किसी की बेटी होना
अब हो गया जी का जंजाल है….
बेटियों और बहनो की अस्मिता का सवाल है||
अब तो जागो मानवों अगर है तुममे मानवता,
दिखा दो गीदड़ों को तुम अपनी विशेषता|
सजा दो ऐसी दुस्टों को कांप जाए उनकी रूह भी,
बहन, बेटी, भाई सभी से है अब गुहार…
खोलो आँखे अपनी और अत्याचार पर करो प्रहार||
अब हम सब को मिल कर यह करना कमाल है,
बेटियों और बहनों की अस्मिता का सवाल है||
विजय नारायण

में बेटी हूँ

जी हाँ! में बेटी हूँ,
जिसके जन्म लेती ही…
माता पिता करने लगते हैं उसके दहेज़ की व्यवस्था|

जी हाँ! में वही बेटी हूँ,
में जनि जाती हूँ लक्ष्मी के रूप में भले…
पर मुझ पर किए जाते हैं अन्याय अनेक|

जी हाँ! में बेटी हूँ,
जिसके लिए नारे लगाए जाते हैं कई…
परन्तु कोख में ही ख़त्म कर दिया जाता है मुझे!
और तो और पढने से भी वंचित रखा जाता है मुझे|

जी हाँ! में वही बेटी हूँ,
पढ़ लिख कर आगे बढ़ना चाहती हूँ में,
समाज की इस व्यवस्था को बदलना चाहती हूँ में|

रचयिता – सपना कुमारी साह


बेटी

चहकतेविहान का आफ़ताब है बेटी,
महकते शाम का महताब है बेटी|

ज़िन्दगी के छंदों का अलंकार है बेटी,
कविता के पन्नों का संस्कार है बेटी|

वत्सल के श्रृंगार का रस है बेटी,
कल के संसार का यश है बेटी||


तुम मेरी सखी बनोंगी ना

सुख में दुःख में संग मेरे रहना,
तुम मेरी सखी बनोंगी ना!

जब में रुठुं, तुम मुझे मानाने आना…
हंस दो न बस एक बार,
बोल-बोल कर मुझको गले लगाना…
बोलो ऐसा करोगी ना,
तुम मेरी सखी बनोंगी ना!!

माँ, आज यह पहनों…आज यह ओढो,
कहकर मुझसे लाड जाताना…
आज यह खाना…आज वह खाना,
अपनी फरमाइशें बताना…
खूब प्यार में करती तुमसे,
तुम भी इतना प्यार करोगी ना ?
तुम मेरी सखी बनोंगी ना||

रचयीता – निभा अम्बुज जैन


अन्याय देखकर आंख उठाती,

नही तो लज्जा का अवतार है।

कितने कष्ट भी उसने झेले,

पर सहनशीलता भरमार है।

टूटने लगता जो कभी हौसला,

तो बनती सच्ची ढार है।

छेड़ो कभी जो राक्षस बनकर,

तो “दुर्गा” सी अंगार है।

रचयिता – प्रिया त्रिपाठी


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