Category Archives: Emotional Stories

Emotional Stories in Hindi

साथियों नमस्कार,

Hindi Short Stories के इस अंक में आप सभी का स्वागत है  | वेबसाइट के इस अंक में आपको कई सारी  Emotional Stories in Hindi  पढने को मिलेगी  | दोस्तों, कहानियों का हमारी ज़िन्दगी में काफी महत्त्व होता है  | बचपन में हम दादी-नानी की कहानियां सुनकर काफी कुछ सिखते थे, उन कहानियों में हम खुद को जोड़ कभी राजा या कभी रानी बन जाते थे  | आज फिर हम आपको हमारी कहानियों के माध्यम से  मोहोब्बत की उन गलियों में ले जाने का प्रयत्न कर रहें हैं, जहाँ  आप फिर  से  Emotional हो जाएँगे  |

धन्यवाद!

Inspirational Story in Hindi | पर्दा

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए “रशिश कौल” की लिखी एक ऐसी कहानी “Inspirational Story in Hindi | पर्दा”  लेकर आएं हैं जो समाज के उस वर्ग के दर्द को बयां करती है जो आज भी अछुता है| आशा है आपको हमारा यह संकलन पसंद आएगा|


Inspirational Story in Hindi | पर्दा

करीब आधे घंटे देरी से चली रेल, कुछ कोहरे की वजह से और कुछ आदतन। राहत की सांस ली जब देखा किसी को अपनी सीट से उठने के लिए बोलना नही पड़ेगा…बैग उठा के रखा सीट के नीचे और कानों में हेडफोन ठूस के पसार गया|

बाहरी दुनिया में न कोई दिलचस्पी बची थी मेरी और न ही कोई उम्मीद…बस कुछ था, तो इंतेज़ार मेरे स्टेशन के आने का और एक छोटी सी आस की तब तक कोई आकर “थोड़ा सा” सरकने को न बोले।

तभी कंधे पर एक हाथ महसूस हुआ, फिर एक हल्का सा झटका और फिर आयी थपकी। एक बार तो जी में आया कि चुप चाप गाने सुनता रहूँ पर यकीन मानिए, दिन के सफर में अगर आप समझते है कि अपनी आरक्षित सीट पर अकेला बैठ कर आप गाने सुनते हुए घर तक जाएंगे तो शास्त्रो में कड़े शब्दों में आपके लिए “मूर्ख, अज्ञानी, दुःसाहसी और निर्लज्ज” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है।

मैंने सर उठा के पीछे देखे तो करीब मेरी उम्र का लड़का खड़ा था , हाथ में सूटकेस लिए…अपना सामान सीट के नीचे रखने का इशारा करते हुए। मैंने अपना बैग आगे सरकाया और उसने अपना..यदि श्री कृष्ण ने अपने मुख में यशोदा माँ को समस्त ब्रम्हाण्ड समाया दिखाया हो तो हमारी रेल सीट के नीचे भी एक छोटी -मोटी आकाश गंगा तो शर्तिया समा जाती होगी।

“भाई ज़रा आप थोड़ा सा…” उसके पूरा बोलने से पहले ही में खिड़की से चिपक कर बैठ गया। जितना अफसोस मुझे अपने पैर फैला कर सफर ना करने का था उससे कई ज़्यादा दुख इस बात का था कि बैग सरकाने के चक्कर मे मेरे हैडफ़ोन कानों से निकल गए और बाहरी दुनिया का शोरगुल फिर से कानों में रौद्र तांडव करने लगा।

“भाईजान, दिल्ली जाओगे?” याद नही इतनी विनम्रता से आखरी बार किसने पूछा था कुछ, शायद लोन चिपकाने वाली लड़की ने।
“ह्म्म्म”, मैंने भी सर हिलाते हुए जवाब दे दिया, और हाथों को हैडफ़ोन की तारे सुलझाने में लगा दिए।

“बढ़िया है , में भी वही जाऊंगा…क्या करते है आप?”
अब यहां पर मेरे हाथ और दिमाग तेज़ी से चलने लगे गए…ये मेरी सीट हड़पने वाला आदमी कोई मामूली आदमी नही था, ये उन लोगो में से एक था जो आपसे घंटो बिना रुके बात करने की क्षमता रखते है|

ये आपको बताएंगे कि आपके अपने शहर में फलां चीज़ मशहूर है , और कैसे मोदी की लहर के सामने सब धराशाई हो गया कैसे नोटेबन्दी ने सारे कालेधन वालो को नाको चने चबवा दिए…सफर कुछ लंबा हो तो ये मेहंदीपूर बालाजी की महिमा का भी वर्णन ज़रूर करेंगे।

तो  कुल मिला के सार ये है कि मुझे तीन चीज़े आज तक समझ नही आई: GST, सब्ज़ी वाले से ये पूछने का फायदा की “भैया ये ताज़ी है ना”, और तीसरा इन महाशय से वार्तालाप कैसे और क्यों जारी रखे।

“चाय चाय, गरमा गरम चाय” अभी मुँह खोलने ही वाला था कि एक दम स्टीक समय पर वो चाय बेचने वाला आ गया। उसका ध्यान चाय पे जो भटका मैंने शुक्र मनाया और फटाक से कान सील कर दिए अपने। दिल्ली अभी तीन घंटे दूर थी और मेरी बैटरी बस आधे घंटे की मेहमान मालूम पड़ रही थी।

चार्ज पे लगा लेता पर ये कम्बखत व्हाट्सएप्प वाले ग्रुप ने दिलो-दिमाग पर बैटरी फटने का खौफ बिठा दिया है। अब मैं मानता तो नही इस चीज़ को लेकिन फिर मानता तो मैं भूतो को भी नही हूँ, पर अंधेर सुनसान गली में गुज़रते हुए हनुमान चालीसा अपने आप प्रवाहित होने लगता है..

ऊपर बैठे हनुमान जी ने भी शायद तभी सिंगल रहने का श्राप दिया हुआ है। मानो या न मानो, लेकिन ये “अगर हुआ तो?” वाला वाक्य ही है जिसकी वजह से बड़े बड़े नास्तिको को रिज़ल्ट के समय हाथ जोड़े खड़ा देखा है।

खैर, आधा घंटा कब हुआ पता नही चला और बैटरी ने भी जवाब दे दिया, अब जवाब मुझे अच्छा लगा या नही  ये सुनने की ज़हमत नही उठाई उसने..बस आंखें मूंद गयी अपनी।

कायदे से देखा जाए तो अब तारे लपेट कर जेबों में भरने का वक़्त आ चुका था, पर राजनीति में मेरा नाम अज्ञानियों के वर्गो में शुमार होता है और क्रिकेट की बात छेड़ने के लिए बचे हुए ढाई घंटे कम थे। तो मैंने ये अनुमान लगा लिया कि बचा हुआ वक़्त में अपनी गयी गुज़री ज़िन्दगी पर विलाप करने और आगे के जीवन पर चिंतन करने में लगा सकता हूँ, सो जैसा था वैसे ही चलने दिया।

“अम्मी! मज़ाक चल रहा है इधर क्या? में दिल्ली पहुंचने वाला हूँ…अब कहाँ से वापस जाऊँ?”

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अब बात में भले ही ना करूँ पर इतना ज़रूर समझ गया था कि सफर काटने लायक सामग्री का प्रबंध हो गया था, बस ज़रूरत थी कान लगाके उसका चिल्लाना सुनने की।

“अब अब्बा को नही पसंद तो मैं क्या करूँ? अब जो है वो है…हाँ-हाँ मालूम है खाला भी आएंगी तो क्या? कम से कम आप तो साथ हो न मेरे?”

उस तरफ की आवाज़ बोल क्या रही है समझ तो नहीं आ रहा था पर सवाल के बाद की चुप्पी खूब पता लग रही थी।

“अम्मी।हो ना साथ आप, मेरे?”

उस तरफ से कोई आवाज़ नही आई, पतानी वो जवाब का इंतज़ार कर रहा था या जवाब अपनाने में दिक्कत हो रही थी उसे, पर लगभग दो मिनट तक कोई कुछ नही बोला, सिवाए स्टेशन के लाउडस्पीकर के।

“अम्मी, गे होना जुर्म तो नहीं ना..अब अल्लाह ने ही ऐसे भेजा है तो कुछ सोच के ही भेजा होगा ना?”

उसका गला एकदम भर आया, कहना बहुत कुछ था उससे पर उससे कहीं ज़्यादा रोक भी रहा था, शायद सब एक साथ कह देना चाहता था। बात वो शायद अपने आप से ही कर रहा होगा क्योंकि दूसरी तरफ की खामोशी के बदले अब काल काटने की बीप बज रही थी।

अपनी सीट से उठा और बाहर चला गया एकदम से, एक बार सोचा बात कर लूँ पर देर हो चुकी थी।

तभी नज़र सामने बैठे एक बुजुर्ग से चच्चा पर पड़ी जो उंगलियो को खास कोण में मोड़कर इशारा कर रहे थे,शायद पूछ रहे थे कि क्या हुआ इसको…मैंने भी कंधो को झटकते हुए दिखाया दिया कि मालूम नहीं, एक इशारा आपके दस मिनट बचा सकता है जानकर अच्छा लगा.. पर याद नही आ रहा था कि चचा अभी प्रकट हुए या पहले के बैठे हुए थे।

“ये गे क्या होता है बेटा?”

असमंजस में फसा दिया था, करने को तो मैं कंधे भी झटका सकता था पर अब जो ‘बेटा’ बोल दिया था ,  भारतीय सभ्यता और संस्कृति खतरे में भी आ सकती थी।

“समलैंगिक…आ गया समझ?”

समझ तो अभी भी नही आया पर ताऊ ये दिखाना नही चाहते थे, सर हिला के वापस धर लिया पीछे।

“भाईजान बैग रह गया था, पकड़ाएंगे ज़रा?”

मैंने नीचे उस अनंत गुफा से सामान निकाल कर पकड़ाया और पहली बार उसकी आंखों पे नज़र पड़ी, मुँह धोकर छुपाने की कोशिश तो खूब की थी पर लाल रंग ही ऐसा है, छुपाये नहीं छुपता।

“ठीक हो आप?” अब पूछने का फायदा तो नही था कुछ पर शायद बाद मैं मलाल रह जाता।
बदले में वो हल्का सा मुस्कुराया, या यूं कहें कि सांस ज़रा ज़ोर से बाहर निकाली।

“निज़ामुद्दीन जा रहे थे भाईजान, पर क्या है ना घरवालो को हम कुछ ज़्यादा ही भाते है…तो अब्बा ने कह दिया कि  बरकत मांगने जा रहे है, मेरे जैसा आदमी जाएगा तो हुज़ूर-ऐ-पाक खफा हो जाएंगे”

“मेरे जैसा मतलब?” मैं ये दिखाना नही चाहता था कि उसकी सारी बातें सुनी थी मैंने, पर शायद उसे सब पता था पहले ही।

“क्या है ना, की जो था सब सच बोल दिया एक दिन , दुसरो से झूठ बोल भी लूँ, पर खुद को धोखे में रखना यानी खुदा को धोखे में रखना। और वैसे भी, जब अल्लाह को फर्क नही पड़ता तो इन लोगो के लिए क्यों बंद रखूं अपने आप को?”

मैं हर वक़्त सोचता हूँ कि काश मुझे बचपन से इंटीग्रेशन और ट्रिग्नोमेट्री के बदले इन परिस्तिथियों को संभालना सिखाया होता , पर शायद ना उस वक़्त इतनी समझ थी और ना आज भी इतनी अकल है।

वो कुछ सुनने की आस लगाए बैठे था मुझसे, शायद ये की उसकी कोई गलती नही थी…पर शायद गलत आदमी से उम्मीद लगा के बैठ गया वो। उस आदमी से जिसे उसके दुख से ज़्यादा इस बात की खुशी थी कि पूरी सीट अब उसकी है।
गाड़ी धीरे धीरे चलने लगी, और उससे प्लेटफार्म पे तब तक देखता रहा जब तक भीड़ में खो नही गया वो।

“एक्सक्यूज़ मी?”
पीछे मुड़ा तो एक घुंगराले बालो वाली लड़की स्लिंग बैग लेके खड़ी थी।
“कैन यु प्लीज़…” उसके पूरा बोलने से पहले ही में खिड़की से चिपक कर बैठ गया।

उसने बैग सीट पे रखा और अपनी बिसलेरी की बोतल का ढक्कन घुमाने लगी।

“डेल्ही?” मैं दिल्ली बोलता पर कही गवार न समझ बैठे इसलिए पता नही क्यों , खैर… वो हाँ बोल के मुस्कुराई और कानों में हैडफ़ोन लगा के आंखे मूंद ली, मेरी बैटरी की तरह।पतानी उसने सुना या नहीं पर मैंने उससे पूछा था कि वो क्या करती है।

अब कुछ करने को था नही तो सामने बैठे ताऊ के रेडियो पर ही ध्यानमग्न होने का सोच लिया। उस आदमी का चेहरा रह रह कर आंखों के सामने आ रहा था और कानो में गूंज रहा था मध्धम आवाज़ में रेडियो पर ये गाना
“पर्दा नहीं जब कोई खुदा से,बंदों से पर्दा करना क्या”

Inspirational Story in Hindi | पर्दा

रशीश कौल 


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Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी

साथियों नमस्कार, हिंदी शार्ट स्टोरीज में आपका एक बार फिर स्वागत है| आज हम आपके लिए एक खास कहानी “Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी” लेकर आएं हैं जिसे हमारी मण्डली के लेखक “सतीश भारद्वाज” ने लिखा है| आपको हमारी यह कहानी कैसी लगती है हमें निचे दिए गए कमेंट सेक्शन में ज़रुर बताएं|

Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी

वो फौजी के साथ ब्याह कर ससुराल आई थी| कुछ ही दिन की छुट्टी मिली थी फौजी को| फौजी जानता था कि छुट्टी ख़त्म होने के बाद कई महीने विरह की आग में जलना पड़ेगा उसे भी और उसकी पत्नी को भी|

लेकिन विरह की घडी कुछ ज्यादा ही जल्दी आ गयी| छुट्टियां रद्द कर दी गयीं थी, कारगिल में जंग शुरू हो चुकी थी| 10 दिन पहले ही आने का बुलावा आ गया|

फौजी की पत्नी के चेहेरे पर मायूशी साफ़ दिख रही थी| उसके नैनों की चंचलता खो गयी थी| भरे सागर जैसी गहरी आँखों से पानी बस बाँध तोड़कर बहने को तैयार था|

फौजी ने अपनी पत्नी को आलिंगनबद्ध किया और बोला “फौजी से ब्याह किया है तूने तो मन को मजबूत तो करना ही पड़ेगा| बस तेरा पति ही नहीं हूँ अपनी प्लाटून का सिपाही और भारत माँ का बेटा भी हूँ मैं| आँसू मत बहाना क्योंकि जब फौजियों कि बीवियों की आँखों से आँसू बहते हैं तो वो देश के देश उजाड़ जाते हैं”

उसकी पत्नी ने अपने मनोभावों को नियंत्रित करते हुए कहा “जानती हूँ ज्यादा हक तो माँ और प्लाटून का ही है आप पर, ये दुराहत तो सहना ही पड़ेगा”

फौजी ने बाहों का कसाव मजबूत करते हुए कहा “कैसी बात कर रही है? सबकी मांगो के सिंदूर सलामत रहें, भैयादुज़ पर किसी बहन के आँखों में आँसू ना हो और होई पर हर माँ ख़ुशी से व्रत रखे बस इसलिए ही तो फौजी सीमा पर खड़ा होता है”

फौजी की पत्नी के चेहेरे पर एक मुस्कान फ़ैल गयी और वो बोली “जानती हूँ और इसका अभिमान भी है फौजी,आगे भी मान रखूंगी”

फौजी ने अपनी आँखो में याचना के भाव लाते हुए कहा “कल जब मै जाऊ तो तू मुझे दुल्हन की तरह सजकर विदा करना| वैसे भी अभी तो तू नयी नवेली दुल्हन ही है”

उसकी पत्नी की मुस्कराहट में प्रेम से भरी स्वीकृति थी|

…………

फौजी को विदा करने के लिए उसकी पत्नी ने सोलह श्रृंगार किये| आज वो उस दिन से भी ज्यादा सुन्दर लग रही थी जब वो दुल्हन बनकर फेरों की वेदी पर आई थी|

फौजी ने चुटकी ली “मुझे नहीं पता था तू बनाव श्रृंगार में इतनी माहिर है| आज तुझे देखकर लग रहा है कि तुझसे सुंदर कुछ नहीं|”

फौजी कि पत्नी ने भी चुटकी ली “कहीं फौजी का मन तो नहीं डोल रहा| अपनी प्लाटून से दगा करने की तो नहीं सोच रहा|”

फौजी : ना री ऐसा तो यो मन है ही ना, प्लाटून से दगा तो ना हो पाएगी|

फौजी की पत्नी ने कहा “एक बार जीतकर आ जाओ, अपने फौजी का स्वागत आज से भी ज्यादा सुन्दर श्रृंगार करके करेगी तेरी पत्नी| ऐसा श्रृंगार जैसा किसी ने कभी ना किया होगा”

फौजी ने आश्चर्य से कहा “इससे भी ज्यादा सुंदर हो सकता है कुछ?”

फौजी कि पत्नी ने कहा “जीत कर वापस आना और खुद देख लेना”

फौजी ने प्रेम से परिपूर्ण मुस्कान से उत्तर दिया लेकिन कुछ नहीं बोला और मुडकर चल दिया|

फौजी की पत्नी ने अभिमान के साथ कहा “जीत कर ही आना फौजी”

फौजी रुका और बिना उसकी तरफ देखे कहा “हाँ जीतकर ही आऊंगा, बस ये नहीं कह सकता कि मैं तुझे आगे बढकर गले से लगाऊंगा या तू मुझे आगे बढकर गले लगाएगी”

इतना कहकर फौजी चल दिया|

फौजी की पत्नी ने उत्तर दिया “जीत कर आया तो तेरी कसम सारी लोक लाज भूलकर तुझे गले से लगा लेगी तेरी पत्नी”

फौजी ने चलते चलते ही हाथ हिलाकर अभिवादन किया|

आप पढ़ रहें हैं हिंदी कहानी Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी

युद्ध चरम पर था| पता नहीं कितने घरो के चिराग अपनी आहुति दे रहे थे इस यज्ञ में| उस फौजी ने भी अपना धर्म निभाया, जो भी शत्रु उसके सामने आया वो धराशायी हो गया| जितने घाव फौजी के शरीर पर बनते थे उसका रूप उतना ही विकराल हो जाता था|

काल प्रतीक्षा कर रहा उसकी पूर्णाहुति की इस राष्ट्र यज्ञ में लेकिन शायद उसके विकराल स्वरुप को देखकर काल भी ठिठक गया| और जब तक उस फौजी ने मोर्चा ना जीत लिया काल भी उसके निकट नहीं आया| फौजी अपने प्राणों का उत्सर्ग कर चूका था उसका चेहरा तेजमय था|

………..

फौजी का मृत शरीर उके घर लाया गया| ऐसा कोई नहीं था जिसके नेत्रों से अश्रु धरा ना बह रही हो| पुरे गाँव को गर्व था फौजी की वीरता पर| पीढ़ियों तक उसकी वीरता के किस्सेगाँव का माँ बढायेंगे|

फौजी की पत्नी आई और  कपडा हटाकर फौजी का चेहरा देखा| चेहेरे पर कुछ लगा था, उसने उसे हटाया और दोनों हाथों से बलैयां लेते हुए बोली “कितनी सजती है वर्दी मेरे फौजी पर, किसी की नज़र ना लगे”

फिर उसने फौजी के शरीर को अपने अंक में ले लिया|

तभी एक हवा का झोंका आया और उसके कानो में फौजी की आवाज़ सुनाई दी “एक वादा तो निभा दिया पर दूसरा नहीं निभाया तूने, बोल रही थी कि ऐसा श्रृंगार करेगी जैसा किसी ने ना किया होगा| लेकिन तूने तो ना लाली लगाई ना सिंदूर”

फौजी की पत्नी ने तुनक कर उत्तर दिया “जा नहीं करती श्रृंगार फौजी, दुराहत कर गया ना मेरे साथ| बस माँ से ही प्यार था तुझे”

फिर उसने फौजी के चेहेरे को अपने हाथो में लेकर कहा “तेरी वीरता के मान का ऐसा श्रृंगार चढ़ा है फौजी कि अब किसी श्रृंगार की जरुरत ही नहीं| तूने अपना खून बहाया तो मैंने अपना सिंदूर वार दिया भारत माँ के चरणों में| तुझसे एक रत्ती भी कम नहीं है भारत माँ से मेरा प्यार फौजी”

फौजी की पत्नी के चेहेरे पर स्वाभिमान का तेज बिखर रहा था| एक भी आँसू नहीं था उसकी आँखों में| वो सौंदर्य की अप्रतिम प्रतिमा लग रही थी| रति और कामदेव भी ऐसा श्रृंगार नहीं कर सकते जैसा श्रृंगार उस फौजी के प्रति उसके प्रेम के अभिमान ने किया था|

Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी

सतीश भारद्वाज 


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Story on Friendship in Hindi | हैप्पी फ्रेंडशिप डे

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए एक ऐसी कहानी ” Story on Friendship in Hindi | हैप्पी फ्रेंडशिप डे ” लेकर आएं हैं जो आपको दोस्ती के एक नए अहसास से अवगत करवाएगी| आपको हमारी यह कहानी कैसी लगती है हमें कमेंट में ज़रूर बताए|


Story on Friendship in Hindi | हैप्पी फ्रेंडशिप डे

(सब दोस्त जा रहे हैं,एक दोस्त पीछे से आवाज़ देता आता है।सब पीछे मुड़ कर देखते है।)

समीर: आज फिर तू अकेला,आयुष कहाँ है???
राज: अरे पता नही यार , इतनी देर से उसका इंतेज़ार कर रहा हूँ अब भी उस के घर से ही आ रहा हूँ।
सादिम : तो क्या कहा उसने , आया क्यों नही??
राज : अरे यार वही,एक्टिंग का भूत जो उसके सर पर सवार है, उसी वजह से उस प्रधान के भांजे के चक्कर में लगा पड़ा है। उसी के पीछे घूमता रहता है,अब हम लोगो को कहाँ पूछेगा वो!

राज के चेहरे पर अफसोस था।

सलीम : जब से यह प्रधान का भांजा साद मुंबई से आया है तब से आयुष को पता नही क्या हो गया है बस इस चक्कर में है कि किसी तरह उसको इम्प्रेस करले ताकि वह इसको मुंबई ले जा सके और यह अपना बचपन का ऐक्टर बन्ने का सपना पूरा कर सके।

समीर : हाँ और उसे मौका भी तो मिल गया उस साद को इम्प्रेस करने का, अभी जब उस का लेपटाप खराब हुआ था और गाँव में कोई नही मिला ठीक करने वाला तो उसने आयुष को बुलाया था। तब से आयुष उसके साथ ही है।

सादिम : हाँ और अब तो उसने हम लोगो का फोन भी उठाना छोड़ दिया है।

सलीम : छोड़ यार क्या अफसोस करना, जब उसको कोई फिक्र नही है तो हम लोग क्यों परेशान हों।

समीर : सलीम ठीक कह रहा है यार वैसै भी सुना है  अपने मोहल्ले वाले चाचा के बाग में आम लगे हमारा इंतेज़ार कर रहे हैं।

सादिम : ठीक है बस फिर आज का खाना चाचा के बाग़ में चल राज हम लोग चलते हैं। और तू फिक्र क्यों करता है देखना इंशाअल्लाह आयुष को अपनी गलती का अहसास जल्दी होगा।

सब दोस्त बाग की तरफ जा  रहे हैं और समीर को याद आया कि उन सब में कैसे आयुष सबसे ज़्यादा एक्साइटेड होता था बाग़ में जाने के नाम पर।

“अबे सालों जल्दी चलो क्या मर मर कर चल रहे हो वह चाचा आ गया तो गये हमारे आम आज के”

आयुष नें समीर की कमर में एक ज़ोर की धप रसीद की थी।

साले बहुत हाथ चल रहे हैं तेरे रूक तू!!!!
समीर आयुष के पीछे भागा तो रस्ते में पड़े एक पत्थर से ज़ोर का टकराया था

हाहाहा…… मिल गयी सज़ा तुझे तो पहले ही आयूष उसे देख कर हसते हुए बोला।
छोड़ूंगा नी फिर भी तुझे अब बच तू!!!!
समीर उठ कर अपने कपड़े झाड़ते हुए उसकी तरफ भागा था।

अरे समीर किधर जा रहा है इधर चलना है हमें!!!
सलीम की आवाज़ पर उसनें चौंक कर आसपास देखा था।
हाँ चल वह चुपचाप सबके साथ हो लिया

Story on Friendship in Hindi | हैप्पी फ्रेंडशिप डे

सादिम : पछली बार जब हम आए थे याद है आयुष ने क्या किया था??

बाप रे मरते मरते बचे थे तब तो….
राज को भी पिछली बार की बात याद आई थी।

“अरे बाग में बाद में जाएंगे पहले वह सामने देखो आज की दावत का इंतेज़ाम हो गया”

आयुष ने बालो को हाथ से सैट करते हुए कहा था।

राज : ओ गरीब! रहने दे बस तेरे चक्कर में हमे पिटना नही है तू जा।

आयुष : हाँ रे अम्बानी की बिसरी औलाद, पता है हमें रोज सुबह शाम नोट की बारिश होती होती है तेरे घर पे अब चल चुपचाप।

राज : देख आयुष मैं फिर कह रहा हूँ कोइ गड़बड़ ना हो जाए।
आयुष : अरे कुछ नी होगा, तू वो सामने दावत देख रहा है हम सब जाएंगे और बिरयानी साफ करके अपने रस्ते बस किसी को कुछ पता नी चलेगा कि कौन है किसी ने पूछा तो कह देंगे हम लड़के वाले हैं

सलीम : अबे ये प्रोग्राम ही बनाते रहोगे या चलोगे भी मेरे पेट में तो चूहे कूदने लगे हैं बिरयानी के ख्याल से ही….
राज : हाँ तू तो है ही भिखारियों का लीडर।
सलीम : हाँ बिरयानी के लिए वो भी बनने को तैयार हूँ बस अब चल तू।

सब खाना खा कर उठ रहे होते हैं कि एक आदमी उन सबको देख कर रूक जाता है

आदमी : कौन हो तुम सब और कहाँ से आए हो देखे से भी नही लग रहे मुझे तो!!!

आयुष : जी हाँ हमें भी याद नही आ रहा है कि हमने आपको कभी देखा हो।

आदमी : तो आए कहाँ से हो तुम लोग ये बताओ???

और प्लान के मुताबिक़ आयुष ने कह दिया कि लड़के वालों की तरफ से हैं।

आदमी : कौन से लड़के वाले ???

आयुष : वही लड़का जिसकी शादी का यह खाना हो रहा है।

आदमीं : अच्छा तो जिसकी शादी का यह खाना है उस लड़के की तरफ से हो तुम ???
आयुष ने हाँ में सर हिला दिया

आदमी : और तुम सारे????
जी हाँ हम सब भी इसके साथ ही हैं, सब ने एक साथ सर हिला दिया

अच्छा ये बात है रुको तुम लोग फिर तो इनाम ले कर जाना अगर लड़के वाले हो ,ओय छोटू सुन इधर आ।
उस आदमीं ने एक लड़के को हाथ के इशारे से बुला कर उन सब की तरफ इशारा किया था ।

यह सब लड़के वालो की तरफ से हैं मतलब कि हमारे मेहमान हैं खाना खा लिया है इनहोने बस अब प्रसाद देना है इनको जा तू मेरे कमरे से लेकर आ प्रसाद वही रखा है चारपाई पर।

उस आदमीं ने छोटू को अन्दर जाने का इशारा किया तो उन सब के दिमाग में खतरे की घंटी बजी थी।
और वह खतरा सच भी साबित हो गया जब वह छोटू अन्दर से प्रसाद की जगह एक मोटा सा डन्डा ले कर हाजिर हुआ था।

अबे भागों सालों नही तो मरने के बाद घर वालों को लाश भी नही मिलेगी!!!!!!!!
आयुष ने चिल्लाते हुए सबको भागने का इशारा किया था।

“रुक जाओ तुम सबको तो मैं बताता हूं बारात का खाना खाने आऐ थे ना तुम, बताता हूं अभी कि यह तेरहवीं है बारात नही”

वह आदमी उन सबके पीछे लठ लेकर भागते हुए बोला था

“और उसका तो लठ ही इतना सालिड था कि एक भी पड़ जाता तो तीन साल उठते नही हम लोग”
सलीम को भी पूरा सीन हू बा हू याद आया था।

( राज का फोन बजता है, उसके घर से फोन है)
राज : चलो यार अभी चलता हूँ माँ ने बुलाया है कल मिलते हैं ।
सादिम : हाँ चलो हम सब भी कल मिलते हैं बाय।
सब चले जाते हैं।

अरे सादिम कल तो तेरा ब्रथ डे है ना???

सब इकट्ठे बैठे हुए थे जब सलीम को याद आया था।

सादिम : हाँ तो वही चलते हैं कल, अपनी वाली जगह।

समीर : आयुष को भी पूछ लेते हैं एक बारी!!!

सादिम नहीं आएगा वह देख ले तु भी कोशिश करके (समीर आयुष को फोन करता है)

Story on Friendship in Hindi | हैप्पी फ्रेंडशिप डे

आयुष: हाँ समीर बोल??

समीर : कहाँ है यार तू?? तेरे घर जाओ तो ना मिलता फोन करो तो फोन नहीं उठाता है हुआ क्या है तुझे???

आयुष: हाँ यार बस टाईम ही नहीं मिलता है क्या करुं!!

सादिम :अच्छा ठीक है, तुझे याद है ना कल मेरा ब्रथ डे है तो कल हम सब लोग वही चल रहे हैं जो फिक्स है अपना रेस्टारेंट तू आ जाना सुबह ही।

आयुष: कल अरे सारी यार कल तो नही जा सकता कोई बात नहीं तुम लोग चले जाओ में फिर कभी चला जाऊंगा एक ज़रुरी काम है मुझे कल!

ठीक है यार मत आ मर्जी तेरी!
राज ने पूरी बात सुनने से पहले ही सादिम के हाथ से लेकर फोन काट दिया!

सब इक्टठे बैठे बात कर रहे हैं कि सलीम का फोन बजता है।

मोबाइल की सक्रीन पर आयुष का घर वाला नम्बर देख कर वह हैरान होता है!
हाँ आयुष बोल??
वह फोन उठाते हुए बोला था

लेकिन दूसरी तरफ से कुछ ऐसा कहा गया था कि वह फौरन उठ कर खड़ा हो गया और राज को भी उठा कर खड़ा कर दिया
क्या हुआ भाई कुछ बता तो सही
सादिम और समीर ने एक साथ पूछा

“आयुष के पापा को हार्ट अटैक हुआ है और घर पर कोई नही है, आयुष भी नही! अंकल ने खुद ही कैसे करके फोन किया है हमें अभी चलना है फौरन”।

सलीम ने एक ही साँस में पूरी बात बता दी!
“चल फिर हम लोग भी चलते हैं ”

वह दोनो भी उठ खड़े हुए!

नहीं तुम दोनों डॉक्टर को लेकर आओ तब तक हम लोग जाकर अंकल को देखते है, राज तू बाइक निकाल।
सलीम कहते हुए बाहर निकल गया।

डाक्टर साहब क्या हुआ है ,खतरे की तो कोई बात नही है??

डाक्टर के चेकअप करने के बाद सलीम ने डाक्टर से दवाई का पर्चा लेते हुए पूछा था।

डाक्टर : अब खतरे की कोई बात नही है मैंनें इंजेक्शन दे दिया है बस इनका ख्याल रखें और अकेले बिलकुल ना छोड़ें ऐसे पेशेंट का अकेले में बी पी ज्यादा हाई हो जाता है ।

सादिम : ठीक है डाक्टर साहब बहुत शुक्रिया आऐं मैं आपको बाहर तक छोड़ दूं।

(तभी आयुष आता है)

सलीम भाई कैसे हैं पापा ??

आयुष आँखों में आँसू लिए पापा के सरहाने बैठ गया।

सलीम : वह सो रहे हैं अभी अभी डाक्टर ने उनहें नीन्द का इंजेक्शन दिया है तु फिक्र ना कर सब ठीक है।

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बहुत शुक्रिया यार तुम लोगों का!!! आयुष उठ कर सलीम के गले लग गया।

अच्छा साले!अब तू हमारा शुक्रिया करेगा!!!

कोने में खड़ा राज भी उन दोनों की तरफ आया था।

तेरे पापा हमारे कुछ नी लगते क्या ???

समीर भी बोला तो आयुष नें नम आँखों से अपने दोस्तो को देखा था।

आयुष : सादिम कहाँ है ???

सलीम : वह डाक्टर को छोड़ने गया है। दवाई का पर्चा भी उसके पास है , आ रहा है वह दवाई ले कर।

आयुष : यार मेरी समझ मे नही आ रहा कि मैं कैसे तुम लोगों का शुक्रिया करुं!!!

(सादिम आता है)

शुक्रिया मत कर यह ले दवाई और अंकल का पूरा ख्याल रख और बस टाईम से उनहें दवा देते रहना।

उसके बाद सब चले जाते हैं।

सादिम : आज मूवी देखने चलते हैं।
राज : ठीक है पर आयुष के बिना मज़ा नही आएगा।

“तो मेरे बिना जाना क्यों है ,मै भी चलता हूँ साथ में”
पीछे से आयुष की आवाज़ सुनकर सब ने मुड़ कर देखा था।

समीर : तू कब आया?
आयुष : अभी जब तुम लोग मुझे  याद कर रहे थे।
समीर : हम तो याद करते ही रहते हैं तू ही भूल गया है हमें।

” मुझे माफ करदो यार जो भी मैंने किया उसके लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ”
आयुष ने हाथ में पकड़ा लेप्टाप साइड में रखकर माफी माँगी।

“दोस्तों में यह माफी नही चलती”।
सलीम उसके दोनो हाथों को खोलते हुए बोला था।

“तुझे एहसास हो गया यही काफी है” सादिम ने भी उसके शर्मिंदगी के एहसास को कम किया।
राज : आज तो वैसै भी दोस्तों का दिन है तो आज के दिन सारी नाराज़गिया खत्म।
आयुष : कितना खुश किस्मत हूँ मैं कि तुम सब जैसे दोस्त मिले हैं जो जीते जी ही नही मरने के बाद भी मेरा साथ नही छोड़ेंगे।

सादिम : अरे तू टेंशन ही ना ले मरने के बाद भी हम सब साथ मिल कर ऐसे ही सब को सताया करेंगे जैसै अभी सताते हैं।
राज : और उसी तरह छुप कर चाचा के बाग से आम भी तोड़ेगे जैसे अब तोड़ते हैं।

आयुष : तो चलो फिर इसी बात पर हमेशा की तरह थ्री चियरस हो जाए।
हो जाए!!!!! सब एक साथ बोले थे।
हिप हिप हुर्रे
हिप हिप हुर्रे
हिप हिप हुर्रे

आयुष : यह लो शाम की फिल्म की टिक्ट हम सबकी। और एक और चीज़ भी है।
राज : क्या है???
आयुष : लेप्टाप खोलकर अपनी खुद की बनाई हुई वीडियो प्ले करता है जिसमें उसने उन सब के फोटोज़ एडिट किए हुए थे।

सलीम : यह देखो सादिम ने कैसे मुँह बनाया हुआ है इसमें।

सब हँसने लग जाते हैं।

Story on Friendship in Hindi | हैप्पी फ्रेंडशिप डे 

Afariya Faruqui


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Story of Migrant Labor | मिट्टी

साथियों नमस्कार, आज हम आपसे एक ऐसी कहानी “Story of Migrant Labor | मिट्टी” साझा कर रहें हैं जो कहीं न कहीं सत्यता से प्रेरित है| सतीश भारद्वाज की लिखी इस कहानी को पढने के बाद आपको कोरोना महामारी के सबसे भयावह दौर के बारे में पता चलेगा|


Story of Migrant Labor | मिट्टी

नारायण और उसकी पत्नी सरस्वती दोनों महाराज गंज से दिल्ली में आकर मजदूरी करते थे| दोनों ही एक फैक्ट्री में ठेकेदार के माध्यम से नौकरी करते थे| यमुना किनारे के खादर में बहुत सी झुग्गियां थी जिनमें ये दोनों रहते थे|

वहाँ एक छोटी सी झोपडी किराए पर ले रखी थी| खाली ज़मीनों पर अवैध झुग्गियां बसाकर किराये पर देना एक अवैध परन्तु संगठित व्यवसाय था भारत में, जिसमें बाहुबली और माफिया घुसे हुए थे|

तीन वर्ष की एक बिटिया थी दोनों की और सरस्वती तीन माह की गर्भवती भी थी| सरस्वती के नाम का अपभ्रंश अब सरसुती हो गया था और नारायण को सब नारान बोल देते थे|

कोरोना महामारी ने भारत में दस्तक दे दी थी| नारायण और सरस्वती जैसे मजदूरों को कोरोना भी कुछ है ये पता तब चला जब लॉकडाउन के कारण दिल्ली के बाज़ार पूर्णतया बंद हो गए|

फैक्ट्री मालिक जो कभी इन मजदूरों से सीधे कोई संपर्क नहीं करता था उसने इन्हें खुद तनख्वाह और कुछ अतिरिक्त पैसा दिया और बोल दिया था कि लॉकडाउन खुलने पर बुलवा लूँगा|

दोनों अपने झोपड़े में रहते थे, गर्मी भी अब परवान पर थी| इनके हाथ में पैसा तो था पर बाज़ार बंद होने के कारण कुछ मिल नहीं पा रहा था| जैसे-तैसे करके कोई दूकान खुली मिल जाती तो उससे ही कुछ राशन ले लेते थे| वो भी महंगी दरों पर मिल रहा था|

लेकिन ये लॉकडाउन की ख़ामोशी कुछ ज्यादा ही भयावह होती जा रही थी| पुलिस जहाँ भीड़ देखती वहीँ खदेड़ देती| पूरी दुनिया मुहँ लपेटे घूम रही थी| बहुत सारे मजदूर अपने घरों की तरफ चल दिए थे| लेकिन ये दोनों रुके हुए थे|

इनकी कोलोनी में भी लोग आते थे इनको मास्क और बिस्कुट बाँट कर फोटो खिंचवा कर चले जाते थे| अफवाहों का दौर गर्म था| लोगो में तरह तरह की चर्चा थी कि हवा से भी फ़ैल रही है ये बिमारी तो|

अब लगभग सभी अपने घरो की और चल दिए थे| कोई मौत को निश्चित मानकर अपने परिवार के पास जाने को आतुर था तो कोई काम धंदा ना होने कि मज़बूरी में| सरस्वती अपनी छोटी बच्ची और अपने गर्भ के कारण हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी|

सरस्वती ने बिटिया को सुला दिया था और एक प्लास्टिक के टुकड़े से उसकी हवा कर रही थी| नारायण आया और एक पैकेट बिस्किट का सरस्वती को दे दिया| सरस्वती ने मुस्कुराकर अभिवादन किया|

नारायण ने गंभीरता से कहा “सरसुती, उ ठेकेदार कहवन कि गाडी जा रहन…..फैइजाबाद तक “
सरस्वती की आँखों में चमक थी “क्या? सच…. तो चलो”

नारायण ने निराशा के साथ कहा “ऊ…. वो गाड़ी वाला …..उ दोनों का पाँच हज़ार रूपया मांग रहल” सरस्वती को झटका सा लगा “पाँच हज़ार, इतना काहे, कोनो कोई जहाज में ले जायेगा”

नारायण : सब गाड़ियाँ बन्द हैं… कर्फु लगा है, पैदल चलने पर भी पुलिस डंडा मार रही है
सरस्वती ने कुछ सोचने के बाद कहा “इतने पैसे तो दे ही देंगे, यहाँ भी कब तक रहेंगे? राशन महंगा भी मिलना मुश्किल हो रहा है|

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वो खाना बांटने वाले भी कभी आते हैं तो कभी नहीं…जब आते हैं तब भी फोटो ज्यादा खींचते हैं”
सास्वती ने नारायण के हाथ पर हाथ रख कर कहा “एक बार गाँव पहुँच जाएँ तो कम से कम अपने परिवार से तो मिल लेंगे”

सरस्वती की इस बात से नारायण भावुक हो गया| उसने बिटिया के सर पर हाथ फेरते हुए कहा “सब बोल रहें हैं कि ये बिमारी नहीं छोड़ेगी, अब जब मरना ही है तो अपने गाँव में मरेंगे| पता नहीं यहाँ तो अग्नि भी नसीब होगी या नहीं?”

सरस्वती ने भी निराशा से कहा “वो जरमन बता रहा था कि मुर्दों को कंधे देने को भी कोई तैयार नहीं है| सड़ रहे हैं मुर्दे…”

नारायण ने कुछ देर चिंतन किया और फिर निर्णायक शैली में बोला “सामान बाँध, अब गाँव में ही जायेंगे”

……………..

ठेकेदार इन सब से पैसे ले रहा था लेकिन फिर भी उसका अंदाज़ ऐसा था जैसे कि इनपर एहसान कर रहा हो| वो ही इन्हें ज्यादा कमाई के सपने दिखाकर दिल्ली लाया था| उसका व्यापार ये ही था, पूर्वी उत्तर प्रदेश से मजदूरों को लाकर यहाँ की फैक्ट्रियों में उनसे काम करवाना|

ठेकेदार ने नारायण के सामान के गट्ठर देखे और बोला “दुनिया में परलय आ रही है और तू ये सामान की गठरी ठाए घूम रहा है| अब तो लालच छोड़ दे नरान| बस राम नाम भज अब| शुकर है ये ले जाने को तैयार हो गए नहीं तो सड़को पर झाँकने भी नहीं दे रही पुलिस”

नारायण ने ध्यान नहीं दिया और ट्रक में चढ़ गया| अपने सामान की गठरी भी उसने ट्रक में ही लाद ली| ट्रक वाले से गोरखपुर तक छोड़ने की बात तय हुई थी और उसने पैसे पहले ही ले लिए थे| ट्रक में नारायण के अलावा 15 या 20 लोग और भी थे जिन्हें उस क्षेत्र में ही जाना था|

ट्रक ड्राइवर ठेकेदार से बोला “मथुरा को ले जाऊँगा, वहाँ चेकिंग से बच जायेंगे, आगे का रास्ता आगे देखेंगे नहीं तो टूंडला मैनपूरी कन्नोज को होते हुए चलेंगे”

ठेकेदार ने ट्रक में चढ़ते हुए कहा “भईया तुमै बताय दिए हैं कि कितै-कितै उतारनो सबन नै, अब जो सही लगे करो| जो जाने वो ताने…. हमतै कछु ना कहो”

सभी को बेहद सुकून महसूस हो रहा था ये सोचकर कि चलो अब अपने गाँव पहुँच जायेंगे| मजदूरों में से ही एक मजदूर ने ट्रक चलते ही महादेव के नाम का उद्दघोष किया बाकी ने भी साथ दिया|

एक मजदूर ने तम्बाखू हथेली पर निकाला और उसमें से कुछ ख़राब तुनके और पत्ती बीनने लगा| तभी नारायण ने आत्मीयता से कह “थोरा सा बढाय लो भईया” उस मजदूर ने मुस्कराहट से नारायण को प्रतिउत्तर दिया|

फिर और भी लोगो ने उसकी तरफ याचना भरी दृष्टि से देखा तो उसने 8 से 10 लोगो के लायक तम्बाखू हथेली पर निकाल लिया और अपनी मस्ती में तम्बाखू और चुने को सधे हुए हाथो से मिश्रण बनाकर रगड़ते हुए गुनगुनाने लग “रउआ…. बिना के पूजी बिरही…..हैह्ह्ह्हह दरद कैसा ……ह्ह्ह्ह”

तभी उसके कंधे पर एक साथी मजदूर ने हाथ रखा तो उसने अपनी गुनगुनाहट को विराम दिया और मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा| उस मजदूर ने संजीदगी से कहा “भईया आये रहे थे कि कछु पैसा कमाकर घर भिजवाएंगे…..बस इसलिए उहाँ वो इहाँ हम बिरहा की आग में जलते रहे”

तम्बाखू रगड़ रहे मजदूर ने खींसे निपोर कर कहा “तो भईया इहाँ आके भइल कोल्हू का बैइल…..कछु हाथ लगा का”

उस मजदूर ने मायूसी से उत्तर दिया “ठेकेदार बोले थे कुछ दिन बाद वापस आ जाना कछु पैसा जोडकर….जो जोड़ा वो तो ले लिहिस इसने… भाड़ा”

तम्बाखू रगड़ते रगड़ते वो मजदूर फिर हंसकर बोला “का भईया भीख ना माँगा वाहे खातिर मजदूरी किये ना| लेकिन का हुआ ……लाइन में लग लग भीख मांगी खाने की……. और ससुरो से फोटू भी खिंचवाए”

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इस बात पर सरस्वती जो अभी तक घूँघट किये मौन थी, वो तुनक कर बोल पड़ी “बहुत लज्जा आती थी, का करे पेट के मारे सब सहना पड़ी| और बार बार पैकेटवा को पकरा कर फोटो खींचते थे”

नारायण को उसका मर्दों के बीच यूँ बोलना अच्छा नहीं लगा| उसने उस पर अपना मर्दाना रोब ज़माते हुए कहा “काहे खखुआ के चढ़ी बईठल, खामोश रहो ना”

इतने समय में उस मजदूर के पारंगत हाथो ने तम्बाखू को रगड़ कर उसे मटमैली से हरी रंगत में बदल दिया था| जब उसने जोरदार थपकी लगाई तो उसकी गंध सबके नथुनों को उत्तेजित कर गयी|

मजदूर तम्बाखू से भरी हथेली आगे बढ़ाते हुए बोला “ई ससुरा कुरोना का का डीएम घुट गइस रगड़ा खाकर| लियो भईया पर तनी हमार लिए बी छोर दीयों” सब मजदूर ठठाकर हंस दिए

सबने थोडा थोडा पत्ती लेकर अपने होठों में दबा ली| नारायण की बिटिया सरस्वती की गोद में ही सो गयी थी| कुछ लोग ऊँघ रहे थे तो कुछ आपसी चर्चा में मशगुल थे|

अभी 2 घंटे का सफ़र ही हुआ था कि गाडी में एकदम से ब्रेक लगे और गाड़ी रुक गयी| अभी वो
सदाबाद के पास ही आये थे| पुलिस चेकिंग से बचने को ड्राइवर अलग रास्तो से आया था|

ठेकेदार भागकर पीछे आया और हडबडाहट में बोला “ उतरो सब नीचे” फिर वो उन्हें सड़क से हटकर अलग रास्ते पर ले गया और आगे जाकर बोला “इस रास्ते से आगे जाकर सड़क पर मिलो सब, चेकिंग चल रई है|

एक बार पकड़ लिया तो उसकी गाडी जपत हो जायेगी और हमे तुमे कर देंगे बंद…….. पुरे मास के लिए” मजदूरों के चेहरे पर अब परेशानी साफ़ दिखने लगी| उन्होंने पैसे सारे दे दिए थे, एक मजदूर बोला “अरे ठेकेदार साहब पुलस से कछु कह सुनकर देख लो ना”

ठेकेदार ने माथे में सलवट डालते हुए कहा “इतनी बुद्धि तो मुझे भी दी है भगवान् ने, बात करेंगे लेकिन भईया इतनो को देखकर आगे ना जाने देंगे”

नारायण थोडा हिचकते हुए बोला “वो आ तो जायेगा हमें लेने ठेकेदार साहब” ठेकेदार ने नारायण के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा “नरान तुम ई ना हो हज़ारो कु काम दिलवाया यहाँ, और अब उनके देश भी पहुंचा रहा हूँ| भिया यो विपदा ई एसी आई है…… कम से कम अपने परिवार से तो मिल लेंगे”

एक मजदूर ने गंभीर आवाज़ में कहा “यो बिमारी तो जी पता नी कितनो मारेगी| अब तो बस इतना होजा कि अंत काल में अपनी मिट्टी मिल जाए बाबु जी”

उसकी इस बात से कई मजदूरों की आँखों में से पानी बह निकला| सरस्वती ने अपने साड़ी के पल्लू से अपनी आँख साफ़ की|

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ठेकेदार ट्रक वाले के साथ गया और वो सब बताये रस्ते के अनुसार चल दिए| जहाँ उन्हें बताया था वो सब वहाँ पहुँच गए| बहुत समय तक इंतज़ार भी किया सूरज सर पर चढ़ आया था लेकिन ठेकेदार का कोई ठिकाना नहीं था|

ठेकेदार का फोन भी नहीं उठ रहा था| काफी प्रयासों के बाद ठेकेदार ने नारायण का फोन उठाया और घबराहट में बोला “ओ नरान, भैया सब आगे बढ़ लो उहाँ से| पुलिस ने गाडी ज़ब्ती कर ली”

नारायाण ने घबराहट में कहा “का कह रहे हो बाबूजी, हमारा का होगा इस परदेश में?”
फोन लाउड मोड़ पर था तो सभी सुन रहे थे|

उधर से ठेकेदार ने कहा “भईया जइसा बोले रहे वइसा करो| ना पुलिस आ रही है सबउको लेने| फिर डाल देंगे कहीं बंदी में| और इहाँ मरे तो भईया पता ना देह को अग्नि भी नसीब हो या ना”

और इतना कहकर ठेकेदार ने फोन काट दिया| अब सभी मजदूरों में घबराहट थी| तभी एक बोला भईया इहाँ से तो चलो पहले ना तो पुलिस आती ही होगी”

जिस मजदूर ने चुना रगड़ा था वो एकदम से बोला “आती ना होगी भईया, भेजी होगी उ छिनार के जने ठेकेदार ने| सब रूपया पईसा तो ठग ही लिए”

अब ठेकेदार का फोन बंद आ रहा था| पुलिस की एक गाड़ी आई और सभी को लाठिया कर खदेड़ना शुरू कर दिया| वो सब गाँव की पगडण्डी की तरफ चले गए तो पुलिस वाले भी वहाँ से चल दिए|

…………………

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मजदूर अभी भी तय नहीं कर पा रहे थे कि करें तो करें क्या? अब किसी के पास ज्यादा पैसे भी नहीं बचे थे| तभी एक मजदूर बोला “अरे ओ भइया चोरासी कोस परिकम्म्मा किये हो कभी?”
लगभग अधिकतर ने कहा “किये हैं भईया”

तब वो बोला “तो चलऊ फिर करते हैं डबल परिकम्मा, वैसे भी पईसा बचा नहीं….और भईया यहाँ रहो या अपने गाम में ये बिमारी छोड़ेगी भी नहीं”

नारायण ने दार्शनिक भाव में कहा “भईया जब मिटना ही है तो अपनी मिट्टी में जाकर मिटेंगे”
और इस तरह सब पैदल और एक लम्बी यात्रा पर निकल लिए| इनमें से सभी का गंतव्य 1000 किलोमीटर से भी ज्यादा था|

लेकिन जीवन भर मजदूरी करने वाला मेहनत से नहीं डरता| वो जानता है अपने शरीर की अंतिम सीमा तक उससे काम कैसे लेना है| उस पुरे दिन वो सभी चले और रात भी काफी समय चलने के बाद एक जगह उन्होंने रात काटी| सुबह फिर चल दिए|

अब उनके पास खाने की भी समस्या हो चली थी परन्तु देहात में उन्हें रास्ते में सहानुभूति भी खूब मिली और भोजन भी| देश का मिडिया 1947 के बाद के इस सबसे बड़े पलायन पर जमकर टीआरपी बटोर रहा था|

लेकिन ये जो पलायन कर रहे थे, इनकी आँखों में बस अपना परिवार और अपना गाँव था| इनमे से किसी को नहीं पता था कि वो एक बड़े वैश्विक मिडिया इवेंट के मुख्य पात्र हैं| ये पलायन
मीडिया में अब कोरोना से ज्यादा चर्चा बटोर रहा था|

तभी चलते चलते सरस्वती को दर्द होने लगा| बाकी मजदूरों को आगे चलने को बोलकर नारायण अपनी बेटी और सरस्वती के साथ वहीँ रुक गया| उसके साथ एक मजदूर और उसकी पत्नी और रुक गये|

उस मजदूर ने नारायण की बेटी को एक बिस्किट जो उसे रस्ते के एक गाँव में मिला था वो दिया| बिस्किट लेते ही उस बच्ची के थके हुए मासूम चेहेरे पर एक सुन्दर मुस्कान फ़ैल गयी जैसे घुप्प अँधेरे में कोई रौशनी की किरण फ़ैल जाती है|

इस महामारी के दौर में भी प्रकृति ने अपनी अप्रतिम सुन्दरता इस बच्ची के मुखमंडल पर बिखेर
दी थी|

सरस्वती एकदम से ज़मीन पर बैठ गयी और पीड़ा से कराहते हुए बोली “अब ना हो पायेगा, देह में बिलकुल जान ना बची है…..पता नही पीड़ा बढती ही जा रही है” और उसके मुख से एक कराहट निकली|

नारायण ने उसके माथे पर हाथ फेरते हुए उसे पानी पिलाया और बोला “हे सरसुती थोड़ी हिम्मत करो रे”

लेकिन सरस्वती की कराहा और पीड़ा बढती ही गयी|
साथी मजदूर ने नारायण को कहा “अरे हो नरान, भोजाई को छाँव में बैठा, कुछ देर बाद आगे चलते हैं”

नारायण ने परेशान होते हुए कहा “भईया यहाँ बियाबान में कहाँ रुके……कोनो मदद भी ना मिले यहाँ तो”

उस मजदूर ने कहा “नरान आगे ना चल पयेगी भोजाई…देख तो तनिक”

सरस्वती को दोनों लोग उठाकर छाँव में ले गए| तभी नारायण ने ध्यान दिया कि सरस्वती को रक्तश्राव हो रहा है| सरस्वती की साड़ी रक्त से पूरी तरह ख़राब हो गयी थी|

सरस्वती दर्द से करहा रही थी| साथ में चल रही स्त्री ने नारायण और साथी मजदूर को अलग जाने का इशारा किया और सरस्वती को संभालने में लग गयी| उसने अपनी एक धोती से पर्दा कर दिया|

नारायाण किसी अनिष्ट की आशंका से घबराकर रोने लगा और साथी मजदूर उसे ढाढस बंधाने लगा| नारायाण की बिटिया को नहीं पता था कि ये क्या हो रहा है? लेकिन वो माँ की दर्द भरी कराहट और नारायण का क्रंदन देखकर घबरा गयी थी|

नारायण को कुछ होश आया तो वो रोती हुई बिटिया को थोडा दूर ले गया| जहाँ उसकी माँ की कराहट की आवाज़ कम आ रही थी| कुछ समय बाद जब सरस्वती शांत हो गयी तो नारायण सरस्वती को देखने उसके पास आया|

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उस महिला ने सरस्वती को दूसरी साड़ी पहना दी थी और रक्त से सनी उसकी साड़ी वहीँ पास में पड़ी हुई थी| उस महिला ने नारायण के पास आकर भीगी आँखों से कहा “भईया सरसुती का लल्ला न रही”

नारायण सरस्वती के पास गया और उसके सर पर हाथ फेरने लगा| उसकी बिटिया कुलबुलाते हुए उसकी गोद में छिप गयी| दर्द से अब राहत थी लेकिन ह्रदय में उसके अजन्मे बच्चे के यूँ काल का ग्रास बन जाने के घाव थे|

ये मानसिक पीड़ा उस दैहिक दर्द से भी ज्यादा थी| अपनी बेटी के कोमल हाथो के स्पर्श से सरस्वती के चेहेरे पर एक शान्ति का भाव आ गया|

सरस्वती ने रोते हुए नारायाण से कहा “देखिये ना हमाये लल्ला ने तो अभी दुनिया देखि भी नहीं थी और लील गयी ये महामारी उसे”

नारायण ने उसे अपने अंक में लेते हुए कहा “रो मत सरसुती, बिटिया घबरा जाई….भगवान् सब सही करेगा”

सरस्वती ने भगवान् को कोसते हुए कहा “हम मजदूरों का कोई भगवान् नहीं……कहीं नहीं जाना मुझे, बस अब तो यहीं मर जाउंगी अपने लल्ला के साथ ही” और सरस्वती हिड्की दे कर रोने लगी|

नारायाण ने कहा “ना सरसुती ना….एसी बात ना कर| जी को तनी मजबूत कर| यहाँ परदेश में ना मरेंगे, मरना है तो अपने गाँव जाकर ही मरेंगे अपनों के साथ”

सरस्वती ने अपनी हिचकी को रोकते हुए कहा “ये भी तो अपना ही था| जिन बच्चो के खातिर इतना दूर आये मेहनत मजूरी करे खातिर, वो ही ना रहे तो काहे लाने गाँव जाएँ”

नारायण ने तब उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा “अपनी मिट्टी की खातिर सरसुती…..जिस मिट्टी से पैदा भये उस मिट्टी में ही मिलेंगे| यो हमारी धरती ना सरसुती…….चलना तो पड़ेगा”

नारायण की बात सुनकर से सरस्वती अतीत की यादों में पहुँच गयी| जब वो पहली बार गोने के बाद मायके से चली थी तो माँ ने रोते हुए विदा करते समय कहा था “यहाँ से तेरी विदाई हो गयी बिटिया, अब अंतिम विदाई ससुराल से ही हो बस”

सरस्वती को याद आया कि जब वो गाँव में आई थी नयी नवेली दुल्हन बनकर तो बस परिवार और कुटुंब ही नहीं पुरे मोहल्ले में उल्लास का माहोल था| वो हर व्यक्ति की बहु, बेटी या भोजाई बनकर आई थी|

मर्यादाओं का बड़ा भार उसके कंधो पर था| चूल्हे को लिपते समय उठने वाली वो सोंधी खुसबू उसके नथुनों में भर गयी| उसके ससुराल की हवाओं की खुसबू और वहाँ की मिट्टी की खुसबू ने उसके मस्तिस्क और उसकी कल्पनाओं को महका दिया|

सरस्वती के निस्तेज चेहेरे पर एक तेज़ आ गया और जोश के साथ वो उठकर चल दी अपनी मिट्टी के लिए, अपने गाँव के लिए|

सतीश भारद्वाज

Story of Migrant Labor | मिट्टी

मेरी ये रचना “Story of Migrant Labor | मिट्टी” समर्पित है उस मजदूर वर्ग को जिसने 1947 के बाद भारत में सबसे बड़ा पलायन सहा| ये शब्द उन मजदूरों की पीड़ा और जिजीविषा की बानगी भर है| कोरोना महामारी के समय मजदूरों के पलायन में एसी अनेक करुणा भरी और साहस से परिपूर्ण घटनाओं का साक्षी ये समय रहेगा| मजदूर ने मेहनत करके शहर खड़े किये, इस देश को खड़ा किया लेकिन भीख नहीं मांगी| जब समस्त विश्व कोरोना महामारी से सहम गया था तब उस मजदूर ने उस जीवटता का परिचय दिया जो इतिहास के पन्नों पर उस मजदूर के अपनी मिट्टी से प्रेम की तरह ही अमिट छाप बना गयी|


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हिंदी कहानी – हाय

साथियों नमस्कार, आज के इस संकलन में हम एक बार फिर हमारी मण्डली के लेखक सतीश भरद्वाज की लिखी “हिंदी कहानी – हाय” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आप भावनाओं के सागर में कुछ इस कदर बह जाएँगे की आपको खुद इस कहानी में होने का अहसास होगा|


हिंदी कहानी – हाय

एक बुढा आदमी तेज कदमो से चलकर आया और खंडहर बन चुके मकान के आगे आकर खड़ा हो गया| ये एक छोटा सा कमरा था जिसकी कड़ियाँ टूटकर नीचे गिर गयी थीं और सामने एक छोटे से आँगन में अब कूड़ा कचरा बिखरा पड़ा था और ऊँची ऊँची झाडिया उगी हुई थीं| काफी समय से ये खंडहर यूँ ही पड़ा था|

बुढा सामने खड़ा हो गया उसकी आँखे सजल थी| फिर उसने एक ऊँची लेकिन करुण पुकार लगायी “ऐ शरबतिया, ऐ माफ़ी दे दे….री क्यूँ इतना जहर घोल री तू| माफ़ करदे शरबतिया…मुझसै बड़ा पाप हो गिया था| मेरी मति मलीन होगी थी री|”

फिर वो बुढा वहीँ धरती पर बैठ गया और जोर जोर से रोने लगा| इतने में ही दो तीन लोग वहाँ आये और उनमें से ही एक युवक ने इस बूढ़े को कन्धा पकड़ कर उठाया “पिताजी घर चलिए, नहीं तो फिर तबियत बिगड़ जाएगी”

बूढ़े ने उसका हाथ झटकते हुए अपनी ही धुन में फिर गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया “री तू तो चाच्ची लगै इन बालको की| ये भी तो तेरे ई बालक हैं| क्यूँ इनका जनम ख़राब कररी तू…..री शरबतिया, दिके अपने नाम कि लाज रखले …बकस दे हम सब कु”

वहाँ और भी लोग इकट्ठा हो गए थे “वो युवक प्यार से समझाते हुए हुए उस बूढ़े को वापस ले गया| तभी वहाँ खड़े एक आदमी ने कहा “भाई भोत बुरी पड़ी शरबतिया की हाय तो लम्बरदार पै”

“लम्बरदार चतर सिंह” ये ही नाम था इस बूढ़े का| देवला गाँव का सबसे धनवान और सबसे बड़ा किसान|

आज से 5 वर्ष पहले की एक घटना, जिसके बाद आज लम्बरदार इस हालत में था|

आप पढ़ रहें हैं सतीश भारद्वाज की लिखी हिंदी कहानी – हाय  

…… …… ……

पाँच वर्ष पहले …

शरबतिया, एक विधवा जो अपने बेटे के साथ रहती थी| इसके और इसके बेटे सुनील के अलावा और कोई नहीं था इनके परिवार में| पति बहुत पहले ही चल बसे थे|

रोजी रोटी के लिए दुसरो के घरों में या दुसरो के खेतो पर मजदूरी कर लेती थी| अपने बेटे सुनील को इसने किसी तरह की कोई कमी नहीं होने दी थी| इसके लाड प्यार का असर ये हुआ कि इनके बेटे ने कभी अपनी जिम्मेदारी को समझा ही नहीं| कस्बे में पढने जाता था तो वहाँ कुछ आवारा लडको से दोस्ती हो गयी|

लेकिन वो आवारा लड़के तो अमीर परिवार से थे तो उनकी आवारगी तो उनका शोक थी| लेकिन सुनील के लिए तो कोई भी शोक ऐब ही था क्योंकि शोक करने लायक गुंजाइश ही नहीं थी|

अपने दोस्तों के साथ उनकी मोटरसाइकिलो और उनकी कारो में घूमता था| कभी-कभी गाँव में भी उनकी कार को लेकर आ जाता था| गाँव वालो को तो इस बात से ही बहुत चिढ थी कि सुनील कभी उनके खेतो पर मजदूरी करने नहीं आया| फिर उसका प्राइवेट स्कुलो में पढना और यूँ गाड़ियों में घुमने से तो बहुत सो की छातियों पर सांप लोटते थे|

एक दिन सुनील अपने किसी दोस्त की कार लेकर आ रहा था कि उसके दुर्भाग्यसे चतर सिंह के बुजुर्ग पिता को कार से टक्कर लग गयी| एक्सीडेंट के नाम से ही कोई भी घबरा जाये ये तो फिर चतर सिंह के पिता थे| सुनील घबराहट में गाड़ी को लेकर भाग गया|

लोगो ने देख लिया था कि टक्कर मारने वाला सुनील है, शरबतिया का बेटा| चतर सिंह के पिता को अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था| जान को खतरा तो नहीं था लेकिन चोटें गंभीर थी फिर आयु भी बहुत हो चली थी, 80 के करीब जा रहे थे|

चतर सिंह या किसी के भी लिए सुनील का यूँ गाडियों और मोटरसाइकिल पर घूमना वैसे भी नागवार ही था| लेकिन आज तो सुनील से बड़ी गलती हो गयी थी| हिंदी कहानी | हाय 

चतर सिंह के घेर में ही गाँव के लगभग सभी सम्मानित लोग बैठे थे| शरबतिया भी बेचारी अपने बेटे सुनील के साथ अपराधीन सी खड़ी थी|

चतर सिंह ने एक तंज कसते हुए कहा “सो बिगा सै बी जादा ई धरती बोरा भाई मैं, अर होर भी काम धंदे… पर रोज नवी नवी गाड़ियों में घूमना तो म्हारे बी बसकी ना”

फिर चतर सिंह ने शरबतिया की तरफ देखते हुए कहा “शरबतिया, कोई नौकरी तो तेरा लौंडा कर ना रा…अर तू बी तुझ मुझ के खेत मै ई मजदूरी करै, कोई केस्सर तो बो ना रखी| फेर रोज नवी नवी गाडी आर ये अजब गजब ढाल की मोटरसाइकिल कहाँ सै आ जा तेरे लोंडे पै”

तभी वहाँ बैठे लोगो में से एक बोला “अजी पढ़न के ना पै पता नी क्या गुल खिलारा यो लोंडा, मुझै तो लगै ये सब गाडी चोरी चकारी की ई चलारा दिक्खै”

शरबतिया जो पहले ही अपराध बोध से दबी पड़ी थी ये हमला तो उसपर बहुत भारी पड़ गया| वो ज़मीन झुकते हुए बोली “चोरी वोरी ना जी, वो तो उसके दोस्तों की हैं जी| बस शोक मै ले आया जी, मै तो ना करू ही जी| पर बस आप तो जानो ई हो आजकल के बालको का मन”

चतर सिंह ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा “हाँ गाम मै बिरसे बि भोत पड़े उसके खात्तर, फेर गाड़ियों मै वो नी तो क्या हम फिरेंगे”

शरबतिया ने रोते हुए चतर सिंह के पैरो को पकड़ते हुए कहा “लम्बरदार जी गलती होगी, वो बि थारा ई बालक है.. माफ़ करदो जी| आज के बाद गाम मै बि न दिखै”

आप पढ़ रहें हैं हिंदी कहानी हाय 

चतर सिंह को जैसे एकदम ताव आ गया “मेरे बुड्ढे बाप कु मरता छोड़ कै भाग गिया अर तू बोलरी माफ़ कर दूँ| उस लोफर कु माफ़ कर दूँ ?”

तभी चतर सिंह का ही ख़ास बोल पड़ा “तेरे लोंडे का तो शोक हो गिया अर म्हारा क्या हाल बन गिया| पता डाक्टर नै अपरेसन बोल दिया हड्डी का| पचास्सो हज़ार का खर्चा आ जागा”

शरबतिया गिड़गिड़ा कर रो रही थी, उस आदमी के भी पैरो में गिर गयी|

तभी वहाँ बैठा एक आदमी बोल पड़ा “सुण री सारा खर्चा तू ई देगी इलाज का”

शरबतिया इस बात पर घबरा गयी| जो मजदूरी में कमाती थी उसमें से सभी कुछ तो खर्च हो जाता था| अपने बेटे सुनील को भी अच्छे स्कुल में पढ़ा रही थी|

जो थोड़े बहुत जेवर थे वो भी बेच ही चुकी थी| घबराते हुए बोली “खर्चा? अभी तो कुछ ना मेरे पास, पर सुनील का टेस्ट पास हो गिया सरकारी नौकरी का…एक एक पाई चूका दूंगी खर्चे की”

तभी एक और व्यक्ति बोल पड़ा “अच्छा तेरा लोंडा तो जागा नौकरी पै अर हम यहाँ डोब भरैन्गे, देख पुलस मै रपट कर दी| या तो सारा खर्चा अर दंड अभी के अभी दे ना तो सांज तक दरोगा जी अपने आप सलट लेंगे”

शरबतिया एकदम से घबरा गयी और चतर सिंह के पैर पकड़ लिए और रोती हुई बोली “माफ़ कर दो लम्बरदार…जिन्नगी बर्बाद मत करो मेरे बेट्टे की| यो थारे सामने खड़ा…. जो सजा देनी दे लो पर मुझ विधवा का सहारा ना छिन्नो”

चतर सिंह बोल पड़े “गरीब ….तू कहाँ की गरीब? लोंडा तेरा गाड़ियों मै घूमरा”

शरबतिया ने उठकर सुनील के चांटे मारते हुए कहा “लम्बरदार सही कहरे तम, खूब समझाऊ ही कि चद्दर सै बाहर पैर ना काढ़, हम मजदुर गरीब हैं”

इतने में ही चतर सिंह के युवा बेटे ने उठकर सुनील के कई चांटे जड़ दिए| और लोगो ने भी सुनील की पिटाई शुरू कर दी|

सुनील के ऊपर पड़ने वाला हर प्रहार शरबतिया को चोट पहुंचा रहा था| लेकिन वो रोते हुए बस ये कहा रही थी “इसे सजा दे लो जी जो देनी है| थारा ही बालक है जी, थारे भरोसे ई इस गाम मै पड़ी ही आज तक| ना तो मुझ विधवा का क्या सहारा?”

तभी पुलिस आ गयी “पुलिस को देखकर शरबतिया घबरा गयी| सुनील के चेहेरे पर खून निकल रहा था लेकिन उसकी घबराहट भी साफ़ दीख रही थी|

पुलिस सुनील को पकड़ कर ले जाने लगी “शरबतिया ने दरोगा के पैर पकड़ लिए, पंचायत में बैठे हर आदमी के पैरो में गिरकर वो गिड़गिड़ायी लेकिन किसी ने नहीं सुनी और पुलिस सुनील को ले गयी|

शरबतिया ने चतर सिंह से कहा “लम्बरदार मुझ गरीब की हाय मत ले, बकस दे हमें| दुबारा मै या मेरा लोंडा तुझै दिखै बी ना गाम मै, लम्बरदार रहम कर मुझ विधवा पर”

लम्बरदार ने ताव में आते हुए कहा “री वो आवारा है जहाँ जागा वहाँ लोफर पाना ई करैगा”

शरबतिया ने याचना करते हुए कहा “ना लम्बरदार सुधर जागा| नौकरी लगन वाली उसकी, उसकी जिन्दगी ख़राब ना करो”

चतर सिंह ने कहा “शरबतिया मेरा लोंडा ऐसा आवारा होत्ता या ऐसा काण्ड करता तो घर मै बी ना बड़ण देत्ता| खुद पुलिस कु सौंप देत्ता”

अब शरबतिया का सब्र का बाँध टूट गया था| उसने अपनी बिखरी आवाज़ में कहा “लम्बरदार बड़े बोल ना बोल, सबके सामनै आं उसके बोल्ले बोल| मेरे सुनील सै गलती हुई पर इतनी बी बड़ी ना हुई के उसकी जिन्दगी बर्बाद कर दो तुम गाम वाले”

लेकिन वहाँ किसी पर शरबतिया की वेदना और पीड़ा का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था|

शरबतिया उठकर चल दी और चलते चलते कहा “लम्बरदार याद रखिये अपने बड़े बोल बी अर इस विधवा कु बी…..एक दिन तू खुद कहगा कि तुन्नै सही ना करा हा, जब तेरे बोल तेरे सामने आकर खड़े हो जावेंगे| तब तुझे पता चलेगा कि एक गरीब की हाय क्या कर सकती है?” हाय | हिंदी कहानी 

…… …… ……

शरबतिया उठकर चली गयी वहाँ से| लेकिन शायद ये उस घटना का असर था या कोई दुर्योग कि शरबतिया की दो दिन बाद ही मौत हो गयी| दुर्घटना का मुकदमा था तो सुनील कुछ दिन बाद ही छुट गया और गाँव छोडकर चला गया|

फिर कभी सुनील गाँव में नहीं आया| सब कुछ सामान्य चल रहा था| चतर सिंह बहुत ही खुश था अपनी जीत पर, लोगो को शान से अपनी पितृभक्ति के बारे में बताता था कि कैसे उसके पिता को चोट देने वाले को उसने गाँव बदर कर दिया|

किसी को एहसास नहीं था उस दुःख और पीड़ा का जो शरबतिया ने सही थी|

शरबतिया का मकान भी जैसे उस दुःख को नहीं सह पाया और टूटकर बिखरने लगा था|

हिंदी कहानी – हाय 

…… …… ……

उस घटना से एक वर्ष बाद एक दिन जब चतरसिंह अपनी बैठक में बैठा था तभी गाँव का एक आदमी आया, वो घबराया हुआ था| अपनी फूली हुई सांस को सँभालते हुए उसने चतर सिंह से कहा “लम्बरदार जी रोहित ने गाडी सै टक्कर मार दी जी”| रोहित चतर सिंह का इकलोता पुत्र है|

चतर सिंह एक दम से खड़ा हो गया और बस इतना ही कह पाया “कहाँ? कैसा है रोहित?”

उस आदमी ने कहा “ वो जी कस्बे के जटिया मोहल्ले में, एक बुढिया थी, टक्कर लगते ई मरगी जी” फिर थोडा रुकते हुए बोला “वो जी दरोगा जी का फोन आया हा, बतारे हे कि रोहित दारु के नशे मै धुत्त था जी, मोहल्ले वालो ने गाडी बी तोड़ दी जी अर रोहित कु बी मार लगाई”

चतर सिंह के चेहरे पर अब घबराहट छा गयी| वो उठकर अन्दर गया और फोन पर दरोगा से बात की फिर निराश होकर बहर आ गया|

उस आदमी ने पूछा “क्या कहरे दरोगा जी?”

चतर सिंह ने दुखि मन से कहा “चिक काटनी पड़ी दरोगा जी कु, भीड़ लगा दी ही उन्होंने थाणे में| मेडिकल हो रा अब”

उस आदमी ने घबराते हुए कहा “मेडिकल मै तो दारु बी आ जागी जी”

फिर चतर सिंह अन्दर जाकर कुछ देर बाद बहर आया और कस्बे की तरफ अपने कुछ शुभचिंतको को लेकर चल दिया| देर रात चतर सिंह वापस आया| कोई भी समझोते को तैयार नहीं हुआ था| रोहित को पुलिस हिरासत में ही रहना पड़ा|

लेकिन चतर सिंह का दुर्भाग्य बस यहीं नही रुका| अगले दिन प्रात: चतर सिंह वापस कस्बे में जाने की तैयारी रहा था, उसके कुछ ख़ास शुभचिंतक भी आ गए थे|

चतर सिंह के मोबाइल की घंटी बजी, उसके दामाद का फोन आया था| वो बहुत ही परेशान था, चतर सिंह की बेटी का विवाह दो वर्ष पहले हुआ था और वो विवाह के बाद पहली बार गर्भवती थी|

चतर सिंह के दामाद ने बाताया “पिताजी रात जैसे ही रोहित के एक्सीडेंट की खबर सुनी तो घबरा गयी| बस क्या कहूँ जी तबियत ख़राब होती चली गयी| डोक्टर के पास भी ले गये लेकिन जी बच्चा मिस्करेज हो गया| इसकी तो हालत अब ठीक है पर मेरे घर में ख़ुशी आने से पहले ही …”इतना कहते ही वो रोने लगा|

चतर सिंह के हाथ से मोबाइल छुटकर ज़मीन पर गिर गया| वो खुद भी धम्म से ज़मीन पर पसर गया| वहाँ खड़े लोग परेशान हो गए और फोन को उठाकर दामाद से बात करने लगे|

हिंदी कहानी | हाय 

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चतर सिंह को दरवाजे पर शरबती खड़ी दिखाई दी| वो वितृष्णा भरी दृष्टि से देख रही थी| लेकिन उसके चेहेरे पर एक मुक्तिभाव प्रदर्शित करती मुस्कान दिखाई दे रही थी|

चतर सिंह उठकर अपने उस दिवास्वप्न के पीछे भाग लिया और भागते भागते शरबती के खंडहर बन चुके मकान के बाहर आकर ज़मीन पर बैठ गया और चिल्लाने और रोने लगा “शरबती मुझे माफ़ कर दे, मेरे जीवन में जहर मत घोल, री अपने नाम की लिहाज कर| शरबती है तेरा नाम, मिठास बाँट जहर मत घोल”

चतर सिंह के कानों में शरबती के वो बोल गूंज रहे थे “लम्बरदार याद रखिये अपने बड़े बोल बी अर इस विधवा कु बी…..एक दिन तू खुद कहगा कि तुन्नै सही ना करा हा, जब तेरे बोल तेरे सामने आकार खड़े हो जायेंगे| तब तुझे पता चलेगा कि एक गरीब की हाय क्या कर सकती है?”

समय अपनी गति से गतिमान रहा सब कुछ बदल गया था| सुनील कभी गाँव में वापस नहीं आया उसकी सरकारी नौकरी लग गयी थी और विवाह भी हो गया था| रोहित के मामले में भी समझोता हो गया था उसका भी विवाह हो गया था|

चतर सिंह की बेटी के घर में भी एक सुंदर पुत्री ने जन्म ले लिया था| सबका जीवन खुशहाल हो गया था| किसी को याद भी नहीं आती थी वो घटनाएं लेकिन चतर सिंह का जीवन जैसे बस उस दिन पर आकर ठहर गया था| वो पागल हो चूका था, उसे घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था|

लेकिन यदि वो कभी घर से बहर निकलता भी था तो सीधा शरबती के खंडहर बन चुके मकान पर आकर ही ठहरता था और शरबती से माफ़ी मांगने लगता था| उसे आज भी शरबती दिखाई देती थी|

हिंदी कहानी – हाय 

लेखक:

सतीश भारद्वाज

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Lockdown Story in Hindi | लॉकडाउन की पूरी कहानी

खारा पानी | Hindi Story with Moral

 

Lockdown Story in Hindi | लॉकडाउन की पूरी कहानी

साथियों नमस्कार, आज हम आपको कोरोना विरस से उत्पन्न एक और बड़ी परेशानी को एक कहानी “Lockdown Story in Hindi“के रूप में बताने जा रहें हैं आशा है आप इस कहानी का महत्त्व और उद्देश्य समझेंगे|


Lockdown Story in Hindi | लॉकडाउन की पूरी कहानी

बिंदा, अब ये नाम किसने रखा या कौन थे इसके माँ बाप ये तो बिंदा को भी नहीं पता था| कभी छोटा सा ही बिछड़ गया था अपने
माँ-बाप से| धुंधली सी याद थी वो भी मजदुर ही थे शायद…

जिन्दगी ऐसे ही बीती कभी मजदूरी मिली तो मजदूरी, कभी भीख मिली तो भीख| उसे अपने जैसी ही बेघर युवती शज्जो मिली तो
दोनों साथ रहने लगे| बस यूँ ही हो गया गठबंधन और गृहस्थी चल पड़ी| अब इन दोनों के तीन बच्चे भी हो गए थे|

इसी बिच भारत में कोरोना महामारी ने दस्तक दे दी थी| टोटल लॉक डाउन हो गया था और बिंदा और शज्जो जो कबाड़ चुनने का काम करते थे, उन्हें अब अपने झोपड़े में ही रहना पड़ता था| ये झोपड़ा भी कबाड़ के ढेर में से मिले सामान से ही बनाया था, शहर से बाहर जहाँ शहर का कूड़ा इकठ्ठा होता था|

इस छोटे से घर को कबाड़ में मिले मतलब के समान से सजाया था| बच्चो को कुछ टूटे फूटे खिलोने दे रखे थे, जो कबाड़ के ढेर में से ही मिले थे| इनकी पूरी जिदगी पक्के मकानों में रहने वाले लोगो के द्वारा फेंक दिए गए कबाड़ से ही चलती थी|

शज्जो और बिंदा बैठे देख रहे थे बच्चो को.. शज्जो ने कहा “पुलस डंडा मार मार के भगारी, अब पन्नी-पलासटिक तो मिले ना, किसी के घर भी रोटी ना मांग सके अब तो”

बिंदा ने एक पुरानी सी पन्नी में इकट्ठे किये गये सिगरेट के ठुन्टो में से एक ठुन्ट निकाला और सुलगा कर शज्जो की तरफ बढ़ा दिया|
और मुस्कान लाते हुए बोला “ले दम्म मार ले, ये भी आज ही आज हैं बस”

शज्जो ने सिगरेट के ठोटक में कश खींचते हुए कहा “पेट कमर से मिल्ल गिया, कल से कुछ ना खाया दोनों ने”
बिंदा ने कुछ सोचते हुए कहा “साँझ कु क्या देगी बालको कु, बचरा कुछ”

शज्जो ने इस सवाल का जवाब अपनी भीगती आँखों से दिया|
बिन्दा की आँखें भी नम हो गयीं थी प्रतिउत्तर में|

Lockdown Story in Hindi | लॉकडाउन की पूरी कहानी

आंसू सबसे ज्यादा सरलता से समझ आने वाली सांकेतिक भाषा होती है|
शज्जो ने झल्लाकर कहा “जान क्यूँ नी देरे काम करन कु, इस पास वाले मोहल्ले में भी ना घुसन देरे|…. नी तो मांग लात्ती थोडा सा
आट्टा”

बिंदा ने आखरी कश खींचते हुए कहा “बिमारी फैलरी, कसी आदमी के धोरै जात्ते ई लगजा”
शज्जो ने अपने उलझे बालो को सख्ती से सुलझाते हुए कहा “अमीरन की बिमारी है, कल बतारे अक बिदेश सै लाया कोई हुवाई
जिहाज मै बैठके”

बिंदा अपनी गर्दन के दाद को खुजलाते हुए बोला “वो तो बैठगे अपने महल्ल में, हम कहाँ जा?”

{सरकार के “लॉकडाउन” को 3 दिन गुजर गए थे| बिंदा शज्जो की जिदगी में भविष्य के सपनो के नाम पर अगले समय पर भर पेट मिल जाने वाले खाने के ख्वाब होते थे बस| पन्नी चुगकर पैसे मिल गये तो कभी दूकान से लेकर कुछ खा लिया बच्चो के साथ| वैसे उससे इतना पैसा नहीं मिल पाता था|

कभी कभी कूड़े में किसी घर का बचा हुआ खाना मिल गया तो वो खा लिया| कभी कबाड़ चुगते चुगते किसी घर से कुछ खाने को मांग लिया और भाग्य से गर्म और ताज़ा खाना मिल गया तो इनके परिवार की दावत हो जाती थी| इनकी पूरी जिन्दगी भीख और कबाड़े में मिली चीजो से ही गुंथकर बनायीं थी इन्होने| और इस जिदगी की जद्दोजहद हर शाम और हर सुबह के साथ खाने की तलाश से शुरू होकर उसकी तलाश पूर्ण होने पर सिमट जाती थी बस|}

सरकार ने मजदूरो को 1000 देने की घोषणा की थी| लेकिन दुनिया में बिन्दा और शज्जो जैसे भी लोग थे जिनका नाम शायद ही
दुनिया के किसी सरकारी दस्तावेज पर इतने ढंग से लिखा हो और बैंक खाता क्या होता है ये तो इन्होने ख्वाब में भी नहीं सोचा था|

इनके भाग्य को देखकर लगता था कि इनका नाम तो शायद विधाता के भी किसी कागज पर अंकित नही था| इनके समय बदलने का
तात्त्पर्य बस इतना था कि सुबह से शाम और शाम से सुबह| सरकारों की कोई घोषणा या योजना इनसे बहुत दूर कर बचकर निकल
जाती थी कुछ ऐसे ही जैसे कि आम लोग इनसे बचकर निकलते थे|

पिछले चार दिन के लॉक डाउन से इनकी जिन्दगी भी लॉक डाउन हो गयी थी| पिछली सुबह से बिन्दा और शज्जो ने कुछ नहीं खाया
था| क्योंकि तीनो बच्चो की भूख मिटानी जरुरी थी| अब कूड़ा भी कम ही आ रहा था तो उसमें भी कुछ खाने लायक नहीं मिल रहा था|
अब तो बच्चो के लिए भी कुछ नहीं बचा था|

बिन्दा कुछ सोचकर उठकर चल दिया और ठेकेदार जिसे ये पन्नी और कबाड़ बेचते थे उसके हत्ते के बाहर चल रही चर्चा को सुनने
लगा| वहाँ भी कोरोना महामारी को लेकर ही चर्चा चल रही थी|

Lockdown Story in Hindi | लॉकडाउन की पूरी कहानी

बिन्दा ने उस चर्चा में कुछ ऐसा सुना कि वो फुर्ती से वहाँ से शहर की और चल दिया| अभी वो पार्स कोलोनी की तरफ गया ही था कि
पुलिस वाले ने एक भद्दी गाली देते हुए उसे रोक लिया और पूछा “रै कहाँ भाग्गा जारा… रुक”|

बिन्दा जो कभी इनके सामने सर भी नहीं उठाता था आज डटकर दुस्साहस के साथ बोला “कुरोना के पास”
पुलिस वाले को लगा कोई पागल है तो ठिठोली करते हुए पूछा “रै तू के बाल पाडैगा कुरोणा का, चल भाग यहन्तै”

बिन्दा ने भावुकता से कहा “दीवन जी सरकार कुरोना के बीमार कु अस्पत्ताल मै रोट्टी भी देरी जी| तो बीमार होकै रोट्टी तो मिल
जागी| कुरोना मारे पता ना पर बाबूजी बालको कु भूख सै मरते ना देख सकू”

पुलिस के तीन चार सिपाही और एक अधिकारी भी यहाँ आ गया था| बिन्दा की बात सुनकर उन सबको चेहरे जो विनोदपूर्ण
मुस्कराहट से भरे थे अब मलिन हो गए|

सिपाही अब विनम्रता से बोला “सरकार पैसा भिजवायेगी तेरे खात्ते में भी चिंता मत कर, अर और भी व्यवस्था करेगी भाई”

बिन्दा ने अब आँखों में आंसू लाते हुए कहा “बाबूजी हर सरकारी व्यवस्था के लिए जितने कागज पत्तर चाह उतने तो ना म्हारे पास,
बस कुछेक बना दिए हे उन सरकारी बाबूजी ने| आर अब कद आगि सरकार यो भी ना पता”

फिर बिन्दा ने उस सिपाही ने पैरो में गिरते हुए कहा “बाबूजी यो हाड मॉस की देह है…. जीता जागता हूँ जी, पर यो ना दिक्खै जी
किसी कु बी| मुझे कुछ ना मिलै खान कु फिकर ना पर वहाँ शज्जो… मेरी घरवाली अर तीन बालक है जी| कल तक जो हा खुद ना खाके बालको कु खुला दिया| पर अबजा तो बालको लाक बि ना जी”

इतना कहकर बिन्दा पुलिस वाले के पैरो में गिरकर फुट फुट कर रोने लगा, सिपाही ने पीछे हटकर खुद को उससे दूर किया|
बिन्दा बोला “बाबूजी जान दो कुछ मांग लाऊंगा खान कु, अर जो कुरोना हो गिया तो सरकार केम्प मैं कुछ खान कु दे ई देगी”

पुलिस अधिकारी जो ये सब देख और सुन रहे थे| उन्होंने बिन्दा को उठने को कहा और पूछा “तेरे जैसे और भी होंगे वहाँ, कितने हैं?”
बिन्दा ने आंसू पोछते हुए कहा “कोई पन्द्रै झोपड़े है जी कुल मिला कै 100 होंगे जी”

अधिकारी ने एक सिपाही को बुलाकर पुलिस मैस से खाना मंगवाने का निर्देश दिया और बिन्दा से कहा “ये जिन्दा देह जिन्दा रहे
इसलिए ही ये सब किया जा जा रहा है| तू फिकर मत कर कोई भूखा नहीं रहेगा”

तभी थोडा फासले से एक आवाज़ आई “सर”
पुलिस अधिकारी ने आवाज का श्रोत तलाशने के प्रयास में इधर उधर गर्दन घुमाई, तभी पुन: आवाज़ आई “सर यहाँ ऊपर”

पास के ऊँचे अपार्टमेंट के फ़्लैट बालकोनीयों में खड़े लोगो में से एक ही एक व्यक्ति की आवाज़ थी ये| उसने कहा “सर आप बस
परमिसन दीजिये और ये देखिये कि शहर में और कहाँ कहाँ खाने कि जरुरत है?, बाकी हम देख लेंगे| हमारी कोलोनी के लोग ही नहीं
शहर में और भी लोग हैं जो इसमें साथ दे देंगे”

पुलिस अधिकारी अभी कुछ सोच ही रहे थे कि एक अन्य व्यक्ति अपनी बालकोनी में से ही बोला “आप कोरोना से लड़िये सर… हम
इस भूख से लड़ लेंगे, लड़ाई हमारी भी है|”

पुलिस अधिकारी के चेहरे पर मुस्कान फ़ैल गयी और गरिमा के साथ उत्तर दिया “जी अभी तो इनके खाने की व्यवस्था हम ही कर देते
हैं| बाकी आप लोगो से मिलकर इस योजना पर आज शाम से काम कर लेते हैं, लेकिन हमें सोसल डिसटेन्सिंग का ख्याल भी रखना
होगा… याद रखिये”

इसके उत्तर में विभिन्न बालकोनियों में खड़े लोगो की तरफ से एक हर्ष पूर्ण सहमती की आवाज आई|

अधिकारी ने बिन्दा से रोबदार अंदाज में कहा “जा अपने साथ के लोगो को इकठ्ठा कर, सबको खाना मिलेगा| लेकिन सभी दूर दूर खड़े
होना, एक दुसरे के पास खड़े दिखाई दिए तो पहले लट्ठ मिलेगा… फिर खाना, समझा गया”

बिन्दा ने अपनी आँखों के आंसुओ से गिले चेहरे को पूछा और वापस अपनी झोपडी की तरफ भाग लिया|

Lockdown Story in Hindi | लॉकडाउन की पूरी कहानी

सतीश भारद्वाज

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साथियों यह कहानी पढ़कर आपकी भी आँखे भर आई होगी| आशा है इस कहानी के उद्देश्य को समझते हुए आप भी समाज के इस तबके का इस मुश्किल घडी में साथ देंगे| आगे आप फ़िलहाल एक महत्वपूर्ण काम इस कहानी को अपने और भी साथियों तक सोशल मीडिया के माध्यम से शेयर करें ताकि पुरे देश में जहाँ कहीं भी कोई भूखा हो उसे रोटी मिल सके|

पढ़ें कविता भूख

खारा पानी | Hindi Story with Moral

खारा पानी | Hindi Story with Moral

साथियों नमस्कार, आज की हमारी कहानी “खारा पानी | Hindi Story with Moral” राजनीती से ओतप्रोत है| यह कहानी हमारी मण्डली के लेखक सतीश भारद्वाज ने लिखी है| आशा है आपको हमारी यह कहानी बेहद पसंद आएगी|

इस कहानी में लेखक ने राजनीती को साथ में रखकर राजनीती से अलग एक दिल को छु लेने वाले पहलु को निर्देशित किया है|


खारा पानी | Hindi Story with Moral

बुंदेलखंड में हरेन्द्र पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ घूम रहा था| दिल्ली में व्यवसाय अच्छा था, हाल ही में राजनीति में पदार्पण हुआ था| सपना कोई चुनाव जीतकर विधान भवन में जाने का था| अपने सामाजिक सरोकार अच्छे होने के कारण पार्टी में अच्छा पद भी मिल गया था|

गर्मी काफी थी, गाडी का ऐ सी पूरी ताक़त से गाड़ी को ठंडा कर रहा था| गाडी एक छोटे से गावं में रुकी| कुछ झोपड़ियाँ थी, शायद दलित वर्ग की थी| पार्टियों के झंडे तो यहाँ पहुँच गए थे लेकिन विकास नहीं|

हरेन्द्र एक छप्पर के निचे खाट पर बैठ गया| कार्यकर्ता भी वहीँ खड़े हो गए| गावं के कुछ बुजुर्ग और युवक वहां एकत्र हो गए|

हरेन्द्र के साथ एक पुराने नेता थे| जानते थे कैसे पब्लिक को मोहित किया जाता हैं| बैठते ही बोले “पानी मिलेगा क्या?”

एक व्यक्ति ने जोर से एक महिला से कहा “पानी लाओ री”

हरेन्द्र को कुछ अजीब लगा, सोच रहा था की पानी साफ़ भी होगा या नहीं|

नेता जी: और कैसा चल रहा है सब

ग्रामीण: चल का रओ, बस उई खानो कमानो| और काये लाने आये नेता जी इतै|

नेताजी: जनता के बीच आने को भी कोई बहाना चाहिए| हमारी पार्टी बुदेलखंड का विकास चाहती है| बस आप लोगो का आशीर्वाद मिले तो|

ग्रामीण: हमाओ से का लोगे नेताजी| हम का देई|

नेताजी: वोट! तुम्हारा वोट ही तो हमारी ताक़त हैं|

फिर कुछ देर और बातो का दौर चला

इतने में नेता जी को याद आया और बोले “क्या भैया, पानी भूल गए?”

बातो में ही पौन घंटा बीत गया था| पानी के लिए गिलास तो आ गए थे पर पानी नहीं|

ग्रामीण: आयरो नेता जी पानी लेने के लाने उत गयी मुर्हाओं|

तभी एक बुढिया बोली “आऊत तन देर मई नेता जी, लिंगा भौते दूर रऐ, टेम लगै”

तभी हरेन्द्र ने देखा एक औरत अपने सर पर पानी का घड़ा लिए आ रही है पसीने से लथपथ| उसने आते ही सबको पानी दिया|

हरेन्द्र को कुछ बेचैनी हो रही थी| उसने ग्रामीण से पूछा “कितनी दूर से लाये हो पानी? क्या घर में बिलकुल भी नहीं था|”

ग्रामीण: हैओ पानी तो नेताजी, पर मोए लगा ताज़ा पी लेओ| उ कोई एक कोष जाना परै पानी के लाने|

हरेन्द्र पानी पीते पीते ही उस जगह से उठकर थोडा अलग चला गया क्यूंकि अब वो अपनी आँखों के बहाव को रोक नहीं पाया था|

वहां से चलने पर हरेन्द्र बोल पड़ा “मुझे वापस जाना है”

नेताजी ने अचकचा कर “क्यूँ?”

हरेन्द्र: तैयारी करनी है|

नेता जी: तैयारी ही तो चल रही है| एक महीने बाद टिकट चयन होगा| भाई तब तक पार्टी जहाँ बोल रही है वहां घुमो| पार्टी को जरुरत हैं बड़े जनाधार की|

हरेन्द्र: तैयारी टिकट की नहीं करनी है नेता जी| चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं है अभी|

ये सुनकर नेताजी सकपका गए

हरेन्द्र विस्मृत सा बोल रहा था “इन लोगो के वापस पास आना है| उन सब के पास भी जाना है जिन्हें मेरी जरुरत है”

नेताजी मुस्कुराते हुए बोले “भैया विधायक छोड़ नेता बनने का ख्वाब देख रहे हो”

हरेन्द्र: पता नहीं नेताजी, बहुत ही खारा था ये पानी| बहुत सारा नमक अन्दर चला गया| उसका ऋण उतारने को शायद सारी उम्र भी कम पड़ जाए|

खारा पानी | Hindi Story with Moral


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Hindi Story with Love | हिजड़ा

Hindi Story with Love | हिजड़ा

साथियों नमस्कार, आज हम आपको एक ऐसी कहानी “Hindi Story with Love | हिजड़ा” सुनाने जा रहें हैं जो प्रेम, वात्सल्य और ममता से भरी होने के साथ-साथ समाज की रूडिवादी  सोच को भी सोचने पर मजबूर कर देती है|

यह कहानी हमें हमारी मण्डली के लेखक “सतिश जी भारद्वाज” ने भेजी है| हमें पूरा यकीं है आपको हमारी यह कहानी ज़रूर पसंद आएगी|


Hindi Story with Love | हिजड़ा

बस यात्रियों से भर चुकी थी और चलने को तैयार थी| सभी अपना सामान और खुद को संयत करने में लगे थे| एक युगल अपने लगभग पाँच वर्ष के बच्चे के साथ बैठा था| उस बच्चे ने हाथ में एक दो रूपये का सिक्का मजबूती से पकडा था|

बच्चे की माँ ने उस बच्चे से वो सिक्का माँगा तो बच्चे ने देने से इनकार कर दिया|

बच्चे की माँ ने झल्लाकर कहा “गिरा देगा तू इसे कहीं”

लेकिन बच्चे ने ध्यान नहीं दिया और जाहिर कर दिया कि वो सिक्का नहीं देगा|

 तभी बस में एक प्रोढ़ उम्र का हिजड़ा चढ़ा| वो चटक लाल रंग का सूट सलवार पहने हुए था और होठो पर चटक लाली पोती हुई थी| बस में चढ़ते ही उसने ताली पिटते हुए कुछ नवयुवको की तरफ उत्तेजक इशारे किये और उन्हें छेड़ा|

उन युवको ने भी एक मादक मुस्कान के साथ उसको 10 का नोट थमा दिया| हिजड़ा अपनी इन उत्तेजक भाव भंगिमाओ के साथ बस में आगे बढ़ते हुए मांगने लगा|

उस युगल का चार वर्षीया बच्चा उस हिजड़े को उत्त्सुकता से देख रहा था| बच्चे के माता-पिता के साथ कई अन्य यात्रियों को भी उस हिजड़े की हरकतों से घृणा हो रही थी|

बस में कुछ ऐसे यात्री भी थे जिन्हें वो हिजड़ा मनोरंजन का साधन लग रहा था| ऐसे लोगो के मनोरंजन के लिए हिजड़ा अपनी हरकतों को और ज्यादा मादक करके कुछ मादक गीतों के बोल भी गा रहा था|

वो हिजड़ा बस में पीछे कि तरफ बढ़ चूका था और अभी उसने दो ही लोगो से पैसे लिए थे कि उस चार वर्षीय बच्चे ने जोर से उस हिजड़े को आवाज़ लगायी “माँ”

हिजड़े ने ध्यान नहीं दिया, बच्चे ने फिर आवाज़ लगायी “माँ”

अबकी बार हिजड़े ने ये शब्द “माँ” सुना तो लेकिन उस तरफ देखा नहीं|

उस बच्चे को उसकी माँ ने रोकने का प्रयास किया लेकिन बच्चे ने पुन: अपनी पूर्ण शक्ति से आवाज दी “ओ ताली बजाने वाली माँ”

इस बार एक झटके से हिजड़े ने पलट कर देखा| तभी एक व्यक्ति ने उसे देने के लिए एक नोट निकाल लिया था| उस हिजड़े ने वो नोट पकड़ भी लिया था लेकिन उस हिजड़े ने उस नोट को छोड़ दिया|

हिजड़े का ध्यान आकर्षित होते देखकर उस बच्चे की माँ जो बच्चे को रोक रही थी वो थोडा सहम गयी|

हिजड़े के भाव बदल गए थे उसके मुहँ से बस इतना निकला “हाँ मेरे बच्चे”

आप पढ़ रहें हैं सतीश भारद्वाज की लिखी “Hindi Story with Love | हिजड़ा”

बच्चे ने वो सिक्का हिजड़े को दिखाते हुए कहा “माँ ये भी लेलो”

ये शब्द माँ एक बार और सुनकर हिजड़े की आँखे जो अब तक नम सी थी अब उनसे पानी चेहरे पर आ चूका था| जो हिजड़ा अब तक अपनी उत्तेजक भावभंगिमाओं से मात्र मनोरंजन का साधन प्रतीत हो रहा था या कुछ लोगो को असहज किये हुए था|

अब वो हिजड़ा विस्मृत हो गया था| वो यूँ ही आगे बढ़ा, तभी उसे कुछ ध्यान आया उसने रुककर एक यात्री से लिए पैसे उसे लौटा दिए| वो यात्री अवाक हिजड़े को देख रहा था|

तभी बच्चे की एक और आवाज़ आई “माँ आजा”

हिजड़े ने एक रुंधी हुई आवाज में कहा “आ गयी मेरे बच्चे”

हिजड़े ने बच्चे के पास से गुजर कर आगे जिस सवारी से पैसे लिए थे उसे भी लौटा दिए| और बच्चे के पास आकार वो हिजड़ा अपलक उस बच्चे को निहारने लगा|

बच्चे के छोटे से हाथो से हिजड़े ने वो सिक्का लिया और उसे चूमकर माथे लगाया और ऊपर सर उठाकर भगवान् का धन्यवाद किया| बस में सभी इस दृश्य को देखकर अवाक थे|

क्या था आखिर उस दो रूपये के सिक्के में ऐसा जिसके लिए हिजड़े ने बस से इकट्ठे किये हुए सारे पैसे वापस लौटा दिए|

हिजड़े की आँखों से अब अविरल अश्रु धारा बह रही थी| हिजड़े की जिन आँखों थोड़ी देर पहले मादकता थी अब वो वात्सल्य से भर चुकी थी| हिजड़े ने बच्चे के सर को चूमा, हिजड़ा बुदबुदा कर बच्चे को दुआएं दे रहा था|

हिजड़े ने अपनी एक थैली में से 100 रूपये निकाल कर बच्चे के हाथ पर रख दिए| बच्चे की माँ ने उसे रोकते हुए कहा “ये क्या कर रहीं हैं आप”

हिजड़े ने अपने दुपट्टे से अपना मुहँ पूछा और बोला “बीबी आज से मेरी उम्र भी इसके नाम और इसके सारे दुःख मेरे नाम,  बीबी तेरा बेटा है तुझे बना रहे, भगवान् सुखो से तेरी जिन्दगी भर दे”

हिजड़े ने फिर से आंशुओ से भीग चुके चेहरे को दुपट्टे से साफ़ किया और बच्चे के चेहेरे को अपने हाथो में लेकर चूमा और बोला “बीबी मुझे तो पैदा होते ही मेरी माँ ने भी रिश्ता तोड़ लिया था, हम हिजड़ो का जनम होता ही ऐसा है|

बीबी जिन्दगी में पहली बार आज इस बच्चे ने माँ कहा तो लगा… हाँ मैं भी इंसान हूँ| बीबी इस बच्चे ने मुझे क्या दे दिया तू ना समझेगी”

फिर वो हिजड़ा उस सिक्के को अपनी छाती से लगाये बस से उतर लिया और जाते जाते वो बस बच्चे को दुआए और आशीष देता चला जा रहा था|

बच्चे ने अपने पिता को वो सो रूपये का नोट दिखाया तो पिता ने उस नोट को अपने माथे से लगाया और अपनी पत्नी से बोला “संभाल कर रखना इसे, ये आशीर्वाद है एक माँ का…. अपने बेटे को”

Hindi Story with Love | हिजड़ा 

लेखक- सतीश भारद्वाज 

फोन नंबर :9319125343


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Hindi Stories | घरु

घरु | Hindi Stories


साथियों नमस्कार, भारत-पाकिस्तान विभाजन की कई कहानियां आपने पढ़ी होंगी! लेकिन यकीं मानिये “सतीश भारद्वाज” की लिखी यह कहानी “घरु | Hindi Stories” आपके दिल को छु जाने वाली है! आपकी प्रतिक्रियाओं का हमें इंतज़ार रहेगा…


घरु | Hindi Stories

परितोष तेजवानी घर में आते ही सबसे पहले अपने पिता जगमोहन तेजवानी के पास आया| जगमोहन  तेजवानी 83 वर्ष के विधुर वृद्ध थे| सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त, परितोष भी प्रोढ़ अवस्था में आ चूका था और एक नामचीन पत्रकार है|

{जगमोहन  अपने कमरे में अपनी कुर्सी पर बैठे नित्य की भांति अपने ही विचारों में लीन है| धीमी आवाज़ में मल्लिका पुखराज के गाने चल रहे हैं}

परितोष ने अपने पिता के हाथो को अपने हाथों से नरमी के साथ पकड़ा और बोला “पापा जी”| जगमोहन का ध्यान भंग हुआ और पुत्र को देखकर एक हलकी सी मुस्कराहट अपने चहरे पर बिखेर दी| चेहरे की झुर्रियों में भी जगमोहन आँखे उनकी मुस्कान की गवाही दे रही थी|

परीतोश की आँखों में चमक थी उसने उत्साह से कहा “पापा तयारू कर लो, हम घरु जायेंगे”(पापा तैयारी कर लो हम घर जायेंगे)

जगमोहन एकदम से चंचल हो उठा और बोला “क्या जामपुर?”

परितोष ने जोर देकर कहा “हाँ, टहु दिहुं बाद” (हाँ तिन दिन बाद)

जगमोहन ने संक्षिप्त उत्तर दिया “ठिकू” (अच्छा है) और अपनी कुर्सी से सर टिका कर आँख बंद कर ली|

परितोष कुछ देर और अन्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में बैठा रहा फिर उठकर बाहर चला गया|

जगमोहन  पुरानी यादों में चला गया था शायद|

आज से कोई 70 साल पहले की बात होगी जब भारत की स्वतंत्रता के साथ ही विभाजन भी हो गया था| विभाजन रेखा के दोनों तरफ ही बड़ा कत्लेआम और विस्थापन हुआ था| जगमोहन तेजवानी का परिवार सिन्धी परिवार था|

जगमोहन के पिता का पंजाब के राजनपुर जिले के जामपुर क़स्बे में तम्बाकू का व्यापार था| “जामपुर” “सुलतान पहाड़ीयों” और “सिन्धु नदी” से बनी मनोरम वादियों में बसा पंजाब, पकिस्तान की सीमा पर सिंध से सटा क़स्बा था|

तीन भाई-बहनों में बहन सबसे बड़ी थी, एक और छोटा भाई था| माता पिता के साथ ही जगमोहन के दादा दादी भी रहते थे| दूकान के साथ ही घर था| कुछ जमीन जायदाद भी बना रखी थी|

विभाजन के समय जब कत्लेआम शुरू हुआ तो जगमोहन का परिवार भी उस आग की चपेट में आ गया| अपने पुरे परिवार में से बस जगमोहन ही वापस आ पाया था भारत| भारत में जगमोहन को उसकी बुआ ने पाला था| जगमोहन के फूफा सरकारी नौकरी में थे|

विभाजन के समय सरकारी नौकरी वालो की तो अदला बदली दोनों तरफ की सरकारों ने कर ली थीं लेकिन जो किसान या व्यापारी थे वो आग के दरियाओं को पार करके विस्थापित हुए थे|

जगमोहन के परिवार के साथ पकिस्तान में क्या हुआ?  ये कभी भी जगमोहन ने किसी से नहीं बताया| उस समय का जिक्र आते ही जगमोहन एक मौन धारण कर लेता था और उसकी आँखे पनीली हो जाती थीं|

परितोष ने भी बाकी लोगो की तरह कई बार जानना चाहा था कि उस समय क्या हुआ था? लेकिन जगमोहन ने कभी कुछ नहीं बताया| आज भी जगमोहन को आबिदा परवीन के गीत बहुत सुहाते थे|

हालाँकि वो विभाजन से बाद में पैदा हुई थीं| सिंध और पंजाब, पकिस्तान से सम्बद्ध समाचारो पर जगमोहन का ख़ास ध्यान रहता था| वह परितोष से कई बार कहता था “कडहिं घरु वञणु छा?” (कभी घर जायेंगे क्या?)|

आप पढ़ रहें हैं सतीश भरद्वाज की लिखी  ” घरु | Hindi Stories “

जगमोहन ने कभी भी इस विभाजन को स्वीकार ही नहीं किया था| जगमोहन  उस विभीषिका से बचकर आ तो गया था लेकिन शायद अपना बचपन, यौवन, हास्य, विनोद, करुणा सब वहीँ छोड़ आया था| एक भावना विहीन शरीर मात्र रह गया था जगमोहन |

लेकिन सिन्धु के जल प्रवाह की वो मोनारम ध्वनि से उत्त्पन्न संगीत, सुलतान पहाड़ियों की हवाओं कि वो सुंगंध आज भी उसके मन में बसी थी जो दिल्ली में भी भी उसको कभी जैसे सहला जाती थी| और यूँ ही मौन बैठे बैठे उसके चहरे पर एक मोहक मुस्कान आ जाती थी|

वो मुस्कान उसे एकदम एक बच्चे की तरह बना देती थी वो हसने लगता था, ठेठ सिन्धी भाषा में या कभी पंजाबी में कुछ भी बोल उठता था, जैसे वो लड़ रहा हो कभी अपने भाई बहनों से तो कभी अपने दोस्तों से|

हालाँकि जगमोहन को अच्छी हिंदी आती थी| वो खो जाता था कंचो या गिल्ली डंडे के खेल में| फिर शांत हो जाता था| किसी राजनैतिक मजलिस या जुलुस में अगर जगमोहन “अल्लहा हु अकबर” का नारा सुनता था तो बेचैन हो उठता था| वो अपने दोनों कानो को अपने हाथो से कसकर भींच लेता था|

सबको लगता था की जगमोहन पागल है| परन्तु अपना कार्य जगमोहन अन्य लोगो से ज्यादा गंभीरता से और कुशलता से करता था| बस वो किसी के साथ ज्यादा घुलता मिलता नहीं था| जगमोहन एक अच्छा पिता और पति रहा लेकिन उसके आचरण में ये असामन्यता हमेशा बनी रही| जगमोहन की बुआ ने और बाद में बेटे परितोष ने उसका इलाज भी करवाया लेकिन कुछ नहीं हुआ था|

दोनों देशो की सरकारें पुन: सम्बन्ध सामान्य करने की प्रक्रिया के दौर में थे| भारत से एक सांस्कृतिक प्रतिनिधि मंडल पकिस्तान जा रहा था| जिसमें परितोष भी था| परितोष ने भारतीय विदेश सचिव से अपने पिता के बारें में चर्चा की और उन्हें साथ ले जाने की बात रखी तो उसे अनुमति मिल गयी थी| भारत में पकिस्तान के राजदूत ने खास व्यवस्था करवाई थी जगमोहन को जामपुर भेजने की|

…….

लाहोर में कुछ औपचारिक मित्रवत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद आज जगमोहन जामपुर जा रहा था| भारत की मीडिया पकिस्तान की दरियादिली की चर्चाओं में तल्लीन थीं कि कैसे एक बिछड़े को उसकी जड़ों से मिलवाने को पकिस्तान सरकार ने मानवता का परिचय दिया है|

पाकिस्तानी जनता के जगमोहन के लिए बेहद मार्मिक और अपनत्व लिए सन्देश प्रचारित किये जा रहे थे| सत्यता का तो पता नहीं लेकिन भारतीय मिडिया चैनलों ने दोनों देशो के रिश्तों की बर्फ को पूरी तरह पिंघाल दिया था| जगमोहन की हालत को देखते हुए उसे मिडिया से बहुत दूर रखा जा रहा था|

सरकारी गाडी से सेना के चार जवान, एक पाकिस्तानी पत्रकार, दो पाकिस्तानी सरकारी अधिकारी, जगमोहन और परितोष को जामपुर ले जा रहे थे| परितोष यहाँ के दृश्य को देखकर मुग्ध था| “हिन्दुकुश पर्वतमाला का ही हिस्सा सुलतान पहाड़ी दिख रहीं थी| सिन्धु नदी ने यहाँ की धरती को उपजाऊ बना रखा था| जिससे यहाँ की हरयाली यहाँ की खूबसूरती को और बढ़ा रहीं थी| जगमोहन अपने में ही मगन था|

जामपुर क़स्बा शुरू भी नहीं हुआ था की जगमोहन ने एकदम से गाडी रुकवा दी| जगमोहन गाडी से बाहर आकर चारो तरफ देखने लगा| जगमोहन  की दृष्टी कुछ तलाश रही थी| तभी साथ आये पाकिस्तानी पत्रकार जिसे हिंदी अच्छी आती थी उसने कहा “यहाँ कभी एक पुराना मंदिर हुआ करता था| नयी सड़क बनाने के लिए उसे यहाँ से शिफ्ट कर दिया गया|”

परितोष ने उसकी बात सुनकर कहा “लगभग सभी मंदिर रास्तो में आ रहे थे इसलिए पकिस्तान सरकारों ने शिफ्ट कर दिए” ये शिफ्ट शब्द कुछ ज्यादा ही जोर डालकर बोला था परितोष ने| परितोष के इस कटाक्ष पर पाकिस्तानी पत्रकार ने दृष्टी चुराने का असफल प्रयास किया|

जगमोहन को उनके इस वार्तालाप से कोई मतलब नहीं था| वो अपनी ही धुन में कस्बे की तरफ चल दिया|

पाकिस्तानी पत्रकार ने कहा “सर कार से ही चलिए, अभी एक किलोमीटर चलना पड़ेगा, बिच शहर में कहीं होगा आपका ठिकाना”

जगमोहन ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और पैदल ही चलता रहा| जगमोहन  के बूढ़े शरीर में उर्जा का स्तर एकदम से बढ़ गया था| अब उसके कदम भी नहीं बहक रहे थे| जगमोहन कस्बे के भीतर आ गया था|

बहुत ज्यादा बदल चूका था ये क़स्बा, पहले से बड़ा भी हो गया था| लेकिन शायद यहाँ की जमीन का हर टुकड़ा पहचानता था जगमोहन को| वो कभी किसी गली में चला जाता| कुछ देर देखता रहता, साथ आया पाकिस्तानी बताता कि यहाँ कभी कोई पुरानी ईमारत हुआ करती थी|

कभी जगमोहन किसी पुरानी ईमारत के सामने रुक कर खड़ा हो जाता| उस ईमारत के भीतर जाता और घूमकर बहर आ जाता| वो चले जा रहा था अपनी पुरानी यादों में खोया| ना जगमोहन किसी से कुछ पुछ रहा था ना ही किसी को कुछ बता रहा था| वो चल रहा था जैसे कहाँ कहाँ जाना है ये उसने पहले से ही निश्चित किया हुआ है|

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चलते हुए जगमोहन एक खँडहर के सामने जाकर रुक गया| अब तक कुछ स्थानीय लोग भी कौतुहलवश साथ हो लिए थे| उस खंडहर को देखते ही जो स्थानीय लोग अभी तक इस तमाशे को आनंद से देख रहे थे, अब उनके सुर्ख चहरे सफ़ेद हो गए थे| एक स्थानीय के मुहँ से निकला “शैतानी रूहों का डेरा”

परितोष ने उन बातों पर ध्यान नहीं दिया| वो जगमोहन के पास आकर खड़ा हो गया| जगमोहन की आँखों में पूरा शहर घूमते समय एक बालसुलभ चमक थी लेकिन इस खंडहर के सामने आते ही उसकी आँखे झर झर बह चली थीं|

खंडहर कभी घर ही था| बाहर एक किनारे पर बड़ा सा कमरा और बरामदा था आगे फिर बड़ा सा आंगन था| उस आंगन में एक लोहे का खंम्बा था जिस पर लटका जीर्ण शीर्ण जंग खाया तराजू आज भी दिख रहा था| कभी मुख्य दरवाजे पर लकड़ी का दरवाजा रहा होगा क्योंकि जली हुई लकड़ी की देहल आज भी दिख रही थी|

पुरे आंगन में इंटें बिछी थीं, लेकिन फिर भी काफी ऊँची झाड़ियाँ हो गयी थीं| आंगन में ही दो बड़े पेड़ थे जिन पर जंगली बेल चढ़ गयीं थी| स्थानीय लोग इस खंडहर के पास भी नहीं आते थे| देखने में भी ये जगह बहुत डरावनी थी|

जगमोहन उस खंडहर के भीतर दाखिल होने लगा| तभी एक स्थानीय ने घबराते हुए कहा साहब इस जर्रे में तो आदमजात तो आदम जात कोई परिंदा भी कभी बैठे नहीं देखा|

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भयानक रूहें घुमती हैं यहाँ| रोकिये उन्हें भीतर जाने से| परितोष ने उस आदमी की बातों पर ध्यान नहीं दिया और जगमोहन के साथ खंडहर में भीतर दाखिल हो गया| लेकिन बाहर खड़े स्थानीय लोगो के चहरे भय से पीले जर्द हो गए थे|

जो स्थानीय लोग एक भीड़ के रूप में इनके साथ चल रहे थे अब वो सब वहाँ से दूर हो गए| बस उनके साथ आये लोग और एक दो स्थानीय ही वहाँ खड़े रह गए थे|

……….

जगमोहन  ने बाहर के उस कमरे में प्रवेश किया| कभी इसे जलाया गया था इसका अनुमान कमरे को देखकर हो रहा था| ये इस घर में आत्माओं के होने की जो बात लोगो के दिलों में बैठ गयी थी उसकी वजह से ये आज 70 साल बाद भी ज्यों का त्यों ही था, जैसा कभी दंगाइयों ने इसे कर दिया था और जगमोहन छोड़कर गया था|

जगमोहन ने बराबर में खड़े परितोष के हाथ को अपनी हथेली से दबाया और बोला “ये हमारी तम्बाकू की दुकान थी| पीले रंग की पुताई थी पुरे मकान पर”

फिर जगमोहन उस कमरे से बाहर आकर आंगन में आया और बताने लगा “यहाँ बहुत भीड़ रहती थी पुरे दिन, तम्बाकू और पैसो का लेनदेन होता था|”

परीतोष को अजीब लग रहा था| आज पहली बार जगमोहन बोल रहा था उस समय के बारे में|

फिर जगमोहन बाहरी आंगन से मकान के भतरी हिस्से में प्रविष्ट हो गया| एक बड़ा बरामदा फिर एक अपेक्षाकृत छोटा आंगन और उसके बाद फिर एक कमरों की पंक्ति| बरामदे में ही ऊपर जाने को जीना था| प्रथम दृष्टी में ही परितोष को इतना दिख गया था|

जगमोहन  ने अन्दर के बरामदे की तरफ इशारा करके कहा “यहाँ मेरी दादी बैठी रहती थी और तेरी बुआ और तेरी दादी भी उनके साथ यहीं बैठती थी| मैं और तेरा चाचा जब पाठशाला से आ जाते थे तो हम कभी यहाँ बैठ जाते थे|

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जब माँ घुड़क देती थी तो बाहर चले जाते थे| बाहर से भी पिताजी धमका कर भगा देते थे, तो फिर हम दादा जी के पास चले जाते थे” जगमोहन ने एक भीतरी कक्ष की तरफ इशारा करके कहा| बड़ी बड़ी झाड़ियों में जगमोहन  यूँ ही सरलता से घुसा चला जा रहा था|

परितोष भी जैसे उस समय में ही पहुँच गया था| उसे भी इस बात का अनुमान ही नहीं था की यहाँ कितनी बड़ी झाड़ियाँ हैं| वो अपने और जगमोहन के लिए झाड़ियाँ में से रास्ता बनाने का प्रयास जरुर कर रहा था|

फिर जगमोहन अन्दर आ गया आंगन में उसके बाद वो एक कमरे में गया| उस कमरे में एक लकड़ी का तख़्त पड़ा हुआ था| जो आज भी यूँ ही था|

अन्दर पक्का निर्माण होने के कारण झाडिया तो नहीं उगी थीं लेकिन मकड़ी के जालों से और धुल और कुछ जंगली बेलों से भरा था वो कमरा| उस घर में कदम रखने से भी सब डरते थे इसलिए उस घर का सामान भी किसी ने नहीं छेड़ा था| वहाँ बस प्रकृति का वास था पूरी तरह से|

उस कमरे के भीतर एक और कमरा था| जगमोहन ने उस कमरे में प्रवेश किया| परितोष ने देखा कि दो सेना के जवान डरते डरते भीतरी आंगन में आकर खड़े हो गए थे|

इस भीतरी कक्ष में अँधेरा था इसलिए परितोष ने मोबाइल टॉर्च जला ली थी रौशनी के लिए| कमरे के बिलकुल मध्य में एक पक्का ऊँचा आधार बना कर एक भण्डारण कक्ष बनाया हुआ था| पुराने मकानों में इसे बनाया जाता था जो कच्चा मिटटी का भी होता था, जिसे सामान्य रूप से अनाज भण्डारण के हेतु उपयोग करते थे|

जगमोहन  उसके आधार के पीछे की तरफ गया और आधार में ही बनी एक खोह को देखने लगा| अँधेरा था तो परितोष ने मोबाइल से टौर्च जला ली थी| जगमोहन ने उस खोह में घुसने का प्रयास किया लेकिन घुस नहीं पाया| जगमोहन  बाहरी कक्ष में आ गया| शायद वो अब थक गया था इसलिए गर्द और मकड़ी के जालो से भरी दिवार से ही टेक लगाकर खड़ा हो गया|

जगमोहन कुछ देर अपने में ही गुम रहा और फिर बोलना शुरू किया| “बहुत खुश थे हम यहाँ पर, अच्छा व्यवसाय था तेरे दादा का| लोगो में रसूख भी अच्छा था| यहाँ के मदरसों और मस्जिदों में सबसे ज्यादा दान तेरे दादा ही करते थे| मैं पुरे दिन मोनिस, अल्लामा के साथ खेलता था|

मोनिस का बाप असलाम और अल्लामा का बड़ा भाई मुश्ताक तेरे दादा के यहाँ ही नौकरी करते थे| असलाम को हम भाई बहन ताया बुलाते थे| जब विभाजन के बाद दंगे शुरू हुए तो तेरे दादा ने यहाँ से जाने का निर्णय कर लिया था| बुआ से भी बात हो गयी थी|

लेकिन शायद देर कर दी थी पिताजी ने| हमें पाठशाला भेजना बंद कर दिया था| माहोल बदल चूका था एकदम से| उस दोपहर के समय ही पिताजी भी खाना खाकर भीतर ही आराम करने आ गए थे|”

जगमोहन को एक सिहरन सी महसूस हुई और उसका बदन हल्का सा कंप-कपां गया| जगमोहन के शारीर की इस हलचल को परितोष ने भी अनुभव किया| वो जगमोहन से बोला “पापा आप ठीक तो हो ना, चले क्या?”

आप पढ़ रहें हैं सतीश भरद्वाज की लिखी  ” Hindi Kahani | घरु “

जगमोहन ने ध्यान नहीं दिया और फिर बोलना शुरू किया “मैं दादा जी के साथ इस कमरे में था| तभी शोर शराबा हुआ, कुछ जाने पहचाने नारे भी लग रहे थे “अल्लह हु अकबर” के| मुझे इन नारों से डर नहीं लगता था| जामपुर और आसपास के कई गाँव और कस्बो की मस्जिदें तेरे दादा और परदादा के पैसो से ही बनी थीं|

मौलवी कहा करते थे “आस पास जहाँ भी रोज मुक़द्दस अजान होती है या बच्चे तालीम लेतें हैं तो आपको जरुर दुआ देते हैं| आपको खुदा यूँ ही सलामत रखे| आप नजीर हो इंसानियत की शाह जी|”

जगमोहन फिर मौन में खो गया| अब तक वो दोनों सिपाही भी पास आ गए थे और बहर खड़े बाकी दोनों सिपाही और कर्मचारी भी भीतर आ गए थे| वो सब भी अत्यंत उत्सुकता से जगमोहन को सुन रहे थे| जगमोहन परितोष से हिंदी में ही बात किया करता था|

जगमोहन ने मौन को तोड़ते हुए बोलना शुरू किया “शाह जी ही कहते थे तेरे दादा को यहाँ लोग| बहार जोर जोर से नारों की आवाज़ सुनकर बाकी सब घरवाले कुछ परेशान हो गए थे| पिताजी कमरे से निकले और बहार आंगन में जाने को ही थे कि तुरंत तेज धमाका हुआ|

किसी ने पिताजी को गोली मार दी| घर में चीख पुकार मच गयी थी| मेरे दादा जी बाहर की तरफ भागे| वो भीड़ “अल्लहा हु अकबर” के नारे लगाते हुए तुरंत अन्दर घुस गयी थी| मैंने अपनी आँखों से देखा कि उस भड़ी में सबसे आगे असलाम और मुश्ताक थे|

जिन्हें मेरे दादा-दादी इदी दिया करते थे| चेटीचंड का हलवा खिलाया करते थे| मुश्ताक ने तलवार से मेरे दादा की गर्दन काट डाली, भीड़ ने दादी को भी मार दिया| तेरे चाचा के जो आठ बरस का था उसके नाज़ुक से शरीर को तलवार बल्लमों से चिर कर उसके ऊपर को ही भीद गुजर गयी|

मुश्ताक ने तेरी बुआ जो 14 वर्ष की नहीं थी थी उसे यहीं आंगन में पकड़ कर भीड़ से कहा ये है हमारा इनाम इन काफिरों की औरतें| इन्हें नहीं मारेंगे| भीड़ में से ही एक ने मेरी माँ को पकड रखा था| ये वो था जिसे कुछ दिन पहले पिताजी ने उसके बेटे के इलाज के लिए पैसे दिए थे| मैं कमरे में छुपा सब देख रहा था|”

जगमोहन को एक हिचकी आ गयी थी| परितोष जिसकी आँखों से अब आंसू बिना रुके बह रहे थे उसने कहा “चलो चलते हैं पापा”

जगमोहन ने हाथ के इशारे से मना किया और फिर बोलना शुरू किया “मेरी आँखों के सामने उस भीड़ ने इस आंगन में मेरी बहन और मेरी माँ का…”

आप पढ़ रहें हैं सतीश भरद्वाज की लिखी  “घरु | Hindi Stories”

इतना कहकर ही जगमोहन ने लम्बी सांस ली और फिर बोला “जो मेरी माँ को काकी ताई बुलाते थे आज वो वहसीयों की तरह उसे नोच रहें थे| मेरी छोटी सी मासूम बहन जिनको चाचा ताऊ कहती थी वो उसे नोच रहे थे|

मुश्ताक ने कहा कि इसे मैंने ही अपनी गोद में जवान किया है तो सबसे पहला हक मेरा| मेरी बहन और माँ उस भीड़ के लिए इनाम थी अल्लहा का और हम सजा भुगत रहे थे हिन्दू होने की|

तेरी दादी और बुआ को तलवार या बन्दुक से क़त्ल नहीं किया गया था बल्कि उन्हें तो इतनी भीड़ ने नोचा के वो मर गयी| तेरी 13 साल की बुआ और दादी में हिस्सा बांटने को पूरा क़स्बा खड़ा था| भीड़ उन दोनों के मर जाने के बाद भी उनकी लाशों को नोचती रही|

मेरी बहन चीख रही थी| सबसे उसका कोई न कोई रिश्ता था, कभी कहती भाई छोड़ो कभी कहती ताया जी दर्द हो रहा है| उस बेचारी को तो बस दर्द का ही एहसास हो रहा था| उसे क्या पता था कि उसके साथ ये सब अल्लहा की हुकूमत कायम करने को किया जा रहा है|

फिर उसकी चीखे बंद हो गयीं थी| मेरी माँ गिडगिडा रही थी भीड़ के सामने “वो बोल रही थी कि जो करना है मेरे साथ कर लो ये बच्ची है इसे छोड़ दो| वो सबको पुराने रिश्ते याद दिला रही थी| लेकिन उस भीड़ पर तो एक मजहबी जूनून सवार था| ये सब हो रहा था और भीड़ “अल्लहा हु अकबर” के नारे लगा रही थी|

मैं ये देखकर पत्थर हो गया था| शैतानो और भूतों की कहानिया कभी कभी दादा जी सुनाया करते थे| लेकिन उन किस्सों के शैतान भी इतने डरवाने नहीं थे जितनी वो भड़ी थी….वो इंसानों की भीड़|  मुझसे जब नहीं देखा गया तो मैं अन्दर जाकर कोठी के नीचे उस खोह में छुप गया|

भीड़ को उनका इनाम मिल गया था| किसी का ध्यान ही नहीं गया मेरी तरफ| वो जितना लूट सकते थे लुटा और फिर बाहर आग लगा दी थी| मुझे नहीं पता मैं कितने दिन अन्दर छुपा रहा,…..मुझे रौशनी और आदमजात से भी से डर लगने लगा था|

अँधेरे में बाहर आता और फिर छुप जाता, जो खाने पिने को मिलता घर में खा लेता| उस दिन के बाद मैंने मेरे परिवार के मुर्दों को भी नहीं देखा| क्योंकि मैं रौशनी में बाहर निकलता ही नहीं था| बस एक तीखी बदबू मुर्दा शरीर की नांक में घुस जाती थी|”

कुछ देर चुप रहने के बाद जगमोहन ने फिर बोलना शुरू किया “एक रात मैं यहाँ से बाहर निकला और चलता चला गया| दिन में छुप जाता रात में चल पड़ता| फिर मुझे एक जगह भीड़ दिखाई दी, वो शरणार्थियों का शिविर था| वहाँ से मुझे भारत भेज दिया| मुझे फूफा बुआ का पता मालूम था तो उनके पास पहुँच दिया गया|”

फिर जगमोहन बाहर आंगन की तरफ चल दिया| अब परितोष ही नहीं उन पाकिस्तानियों की आँख से पानी बह रहा था| जगमोहन ने एक कोने की तरफ ऊँगली करके कहा “देख यहाँ चूल्हा था हमारा, हम भाई बहन यहीं पास बैठकर गर्म गर्म खाते थे|”

एक कमरे की तरफ ऊँगली करके जगमोहन बोला “यहाँ हमारी चक्की थी जिसे माँ या दादी चलाती थी”

जगमोहन पुरे आंगन में घूम रहा था और अब अपनी ही धुन में बोल रहा था “ माँ सुम्मो बहन डूबीरो जाई, इनानु हलवा खुवा?” (माँ सुम्मो बहन दुबली हो रही है इसे हलवा खिला) फिर जगमोहन ठेठ सिन्धी में कुछ बोलने लगा जो परितोष के भी समझ नहीं आया| बस वो सुन रहा था कभी दादा कभी दादी, कभी पिता जी तो कभी चाचा लालराम का नाम| जगमोहन की शारीरिक भावभंगिमा एकदम से एक 13 वर्ष के बच्चे जैसी हो गयीं थी|

आप पढ़ रहें हैं सतीश भरद्वाज की लिखी  ” घरु | Hindi Stories “

फिर जगमोहन उस कमरे में चला गया, परितोष उसके पीछे चल रहा था| जगमोहन का पैर किसी चीज़ से टकराया उसने उसे उठाया तो वो टुटा हुआ हुक्का था| जगमोहन ने उसे अपनी छाती से यूँ लगा लिया जैसे कोई माँ अपने नवजात बच्चे को बाहों में भर लेती है|

जगमोहन उस लकड़ी के तख़्त के पास पहुंचा और एक छोटे बच्चे की तरह बोला “दादा नींड आइ, तमारी गोदी मा आवी जाऊं”(दादा नींद आ रही है, तुम्हारी गोद में आ जाऊं)

इतना कहने के बाद जगमोहन एक बच्चे की तरह उस वर्षो की गर्द और गंदगी जमे तख़्त पर लेट गया| वो कुछ ऐसे लेटा था जैसे कोई छोटा बच्चा अपने दादा की गोद में खिलंदरी करके लेट जाता है|

परितोष रोकना तो चाहता था अपने पिता जगमोहन को उस धुल और गंदगी भरे तख़्त पर लेटने से लेकिन रोक नहीं पाया| वो देख रहा था आज अपने पिता के रूप में उस 14 साल के जगमोहन को खलेते हुए| जगमोहन  तख़्त पर लेटकर एकदम शांत हो गया था| परितोष ने कुछ देर तक चुप खड़ा रहा फिर उसने जगमोहन को आवाज दी “पप्पा …. पप्पा”

जगमोहन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी| परितोष ने जगमोहन का कन्धा पकड़ कर उसे हिलाया तो वो एक तरफ को निढाल होकर लेट गया और उसका हाथ तख़्त से नीचे लटक गया| परितोष घबरा गया और जोर से जगमोहन को हिलाकर बोला “पप्पा”

एक पाकिस्तानी फौजी ने पास आकर जगमोहन को देखा और परितोष से बोला “सर अब ये नहीं उठेंगे, ये अब अपने परिवार के साथ हैं……. पाक परवर दिगार की उस दुनियां में जहाँ कोई भी मजहबी शैतान इनकी खुशियों को आग नहीं लगा पायेगा”

परितोष ने टोर्च की रौशनी जगमोहन के चेहेरे पर डाली तो उस बूढ़े जगमोहन के झुर्रियों से भरे चेहेरे में जामनगर के उस बच्चे जगमोहन की झलक दिख रही थी|

 ” घरु | Hindi Stories “

लेखक-सतीश भारद्वाज (Satish Bhardwaj)

पढ़ें सतिश भारद्वाज की लिखी कहानी “भतेरी” 

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Fairy Tales in Hindi | कानपूर के दामाद

Fairy Tales in Hindi | कानपूर के दामाद


इस पृथ्वी पर “कानपुर” नाम का एक शहर है यदि संयोगवश आपकी ससुराल कानपुर हो गई तब आपके “एडजस्ट” करने के तरीक़े संसार से बिल्कुल भिन्न होंगे| आपके “ज़ेहन” और “पेट” पर “सम्मान” की इतनी बारिश होगी कि आप “सम्मान” के नाम से तौबा कर लेंगे| पढ़िए हमारी कहानी “Fairy Tales in Hindi | कानपूर के दामाद” …….यूँ समझ लीजिये आप पूरे “कानपुर” शहर के दामाद हो गए.


Fairy Tales in Hindi | कानपूर के दामाद

साल 1986 की बात है…

शादी के बाद, पहली बार हम अपनी श्रीमती जी को लिवाने “कानपुर धाम” पहुंचे…सूरत से ट्रेन के तीस घण्टे के लंबे सफर के बाद| ट्रेन कानपुर स्टेशन पर रुकते ही एक “कुली महाशय” हमारी सीट पर आकर बोले “पाय लागूं जीजाजी”…

इससे पहले कि हम समझ पाएं कि ये “लाल ड्रेस” वाले “साले साहब” हमारी शादी में क्यूँ नहीं दिखे, इतने में एक और नए “साले साहब” प्लेटफार्म पर उतरते ही चाय लेकर हाज़िर…

असल में हमारे “ओरिजिनल साले साहब” ने कुली से लेकर स्टॉल वाले को हमारे चेहरे मोहरे ,केबिन और सीट नंबर के साथ एक्स्ट्रा टिप दे के रक्खी थी कि “हमार जीजा आय रहे हैं , जरा ध्यान रखना समझे ???

इतने में हमारे “ओरिजिनल” साले साहब बाहें फैलाये चार पांच चेलों चपाटों के साथ प्रकट हुए , मुँह में पान मसाला दबाए लपके …”पाय लागे जीजाजी” कहते हुए की चारों तरफ “फ़िज़ा” में पान मसाले ,गुटके और केसरी तंबाकू की गंध भरी साँसें छा गईं …

स्टेशन से बाहर पैर रखते ही ड्राइवर लखन की “पिचकारी” और “पाय लागूं जीजाजी” से स्वागत हुआ…अब इतना सब होते-होते हमें अपनी उम्र पर शक़ होने लगा कि हम 26 के हैं या 62 के….

मगर ये तो अभी शुरुआत थी…

जॉइंट फैमिली भी माशाअल्लाह “डायनोसोर” जैसी ”जायंट” थी| घर पहुंचते ही दादी सास, सालियाँ ,भाभियाँ ,बुआ, मौसियाँ, बुज़ुर्ग महिलाएं, हर साइज़ के बच्चे बच्चियाँ और हमार सासु माँ दरवाज़े पर हाथ में आरती की थाली लिए स्वागत के लिए तैयार..

माथे पर एक भारी भरकम तिलक पर इतना केसर और चावल चिपकाय दिए गए कि ससुरी “टुंडे” की एक प्लेट “केसरी बिरयानी” बन जाये|

आख़िर बड़ी मुश्किल से सोफे पर बइठे ही थे कि ससुर जी आय गए …”हम फिर पाय लगे”…ससुराल का परिवार इतना बड़ा कि सदस्य “हनुमान जी की पूँछ” की तरह खत्म होने का नाम ही न लें…

पाँय लगने और लगवाने में ही हमार कमर दर्द करने लगी…अब इतने से भी मन न भरा तो हमारी पत्नी की कज़िन ने अपने नवजात शिशु को हमारे हाथों में थमाय दिया …

अले ले ले ले…जीजू आये जी…जू

लेकिन उस “समझदार” शिशु ने “नवजात” जीजू के रुतबे से प्रभावित होने से इनकार कर दिया और गोद में आते ही ज़ोर ज़ोर से प्रलाप करने लगा … इसलिए जल्दी मुक्ति मिल गई|

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आखिर तीस घण्टे की यात्रा की थकान से त्रस्त हमने दूर खड़ी पत्नी से याचना के स्वर में एक कप चाय की माँग की .

बस इतना सुनते ही तीन चार बालिकाएं “हम बनाएंगे” “हम बनाएंगे” कहते हुए किचन की तरफ भागीं …

आखिर चाय भी आ गई …

प्रकृति का अटल नियम है कि आपको “अपने घर की चाय ” और वो घर वाला “आपका ग्लास’ दुनियाँ के किसी कोने में नहीं मिलेगा!

हम ठहरे “माथे के सिंदूर” जितने दूध वाली पतली पतंग चाय पीने वाले …और हमारे हाथ में जो चाय आई उस पर अब तक मलाई की एक परत जम चुकी थी …

इतने में साली जी की आवाज़ आयी …हमारी शिवानी ने आपके लिए “स्पेशल” चाय बनाई है …

लेकिन उस “चाय” को देखते ही माथे पर बल आ गए … माथे के तिलक पर लगे पाँच छः चावल, केसर की दो तुरियों के साथ चाय के कप में सीधे “डाइव” मार गए …

“स्पेशल चाय” और भी “स्पेशल” हो गई … क्या करते “एडजस्ट किया” और धीरे धीरे करके सुड़क गए , आख़िर शिवानी ने “इतने प्यार” से जो बनाई थी… ऐसा लगा मानों जीभ पर गाढ़े दूध से पेंट कर दिया हो|

हम सोच ही रहे थे कि दो घड़ी आराम कर लें, कि हमारे कज़िन साले साहब का फरमान आ गया| जीजू आज आपको कानपुर के डी. एम.से मिलवाय के लाते हैं, हमारे खास दोस्त हैं…

हमने मन ही मन कहा, भाई… पहले हमें हमारी पत्नी से तो मिलवाय दो जो दूर से हम निरीह प्राणी पर अत्याचार होते देख कर भी मुस्करा रही थी.

आख़िर हमने कहा कि आप लोगों की आज्ञा हो तो हम ज़रा नहा धो लें ???

बड़ी मुश्किल से हम हमें आबंटित किये गए बैडरूम में पहुँचे, अभी “नव-श्रीमती” जी की तरफ बाहें फैलाई ही थीं कि दरवाज़े पर ठक ठक हुई …

चिढ़ते हुए दरवाज़ा खोला …सासु माँ खड़ी थीं, लो.. अभी से चिटकनी लगाय के बैठ गए ???

अरे बड़े घर से दादाजी आये हैं मिलने, पाँच मिनट मिल लो बाद में नहा लेना …

क्या करते ???  दादाजी से मिलने बाहर आये…फिर “पाँय लागूँ दादाजी” …

माय गॉड !!! दादाजी …एक तो ऊँचा सुनते, ऊपर से एक बार बोलना चालू हुए तो बन्द ही न हों … हमारे ही शहर का इतिहास हमें ही बताना चालू कर दिये…

बेटा जी “सूरत का असली नाम है सूर्यनगरी”… फिर ताप्ती नदी का इतिहास खँगालने बैठ गए .

आधे घण्टे बाद हमारे धैर्य की सीमा पार हुए जा रही थीं, आख़िर सासु माँ हमको ज़मानत पर छुड़ाने आईं … उन्होंने दादाजी के कान में ज़ोर से सुनाया …

भापा जी, “कवर सा” दो दिन के सफर करके थके हुए आए है थोड़ा आराम करने दो इनको…

दादाजी ने हमारी सासु माँ को नज़रंदाज़ करते हुए कहा… तुम अपना काम करो…देखती नहीं मैं दामाद जी से ज़रूरी बात कर रहा हूँ|

एक बुजुर्ग को अगर कोई बात करने वाला मिल जाये और इज़्ज़त प्यार से दो चार बार सिर हिला दो तो समझ लीजिए अपनी जान आफत में डाल ली…

दादाजी तो जोंक की तरह चिपक गए… छोड़ें ही न हमें!!!

हमारी कलाई कस कर पकड़ कर बातें कर रहे थे ताकि हम कहीं बीच में छटक न जायें!

खैर, साले साहब ने आकर दादाजी से हमारी जान छुड़ाई|

कमरे में आये तो पत्नी किचन में लगी पड़ी थीं ….अरे मेरी बनियान तो ढूँढ के निकालना, मिल नहीं रही है …मैंने पत्नी को बहाने से बुलाया …

दूर खड़ी साले साहब की पत्नी ने आँख मिचकाते हुए व्यंग्य के स्वर में कहा … जीजू, “बनियान नहीं मिलने” का मतलब हम अच्छी तरह समझते हैं ???

खुद अटैची पैक कर के लाये हैं, और बनियान के लिए दीदी को पुकार रहे हैं ?  हमको बुद्धू समझे हैं क्या ???

हम खिसियाते हुए,  ही ही करते, शर्मसार होकर वापस कमरे में घुस गए…

नहा धो कर निकले, कि सामने पलंग पर नई हाथ से कढ़ाई की हुई चादर बिछी थी|

दो दिन के सफर की थकान से त्रस्त हम बिस्तर पर पसर गए…

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तकिए पर मोटे धागे से की गई कढ़ाई गालों पर चुभ रही थी लेकिन थकान से भरी आंखों में फौरन नींद आ गई|

एक घंटे बाद सासु माँ ने गहरी नींद से जगाया…चलो उठो दामाद जी…नाश्ता तैयार है …

कमरे से बाहर निकलते ही देखा कि साले सालियाँ और सासु माँ सबके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान तैर रही थी …

हमने पत्नी की तरफ शंका भरी नजरों से देखा, तुमने नींद में कोई “हरकत” तो नहीं की ???

पत्नी ने पीछे से हमारी बाहें थामकर वाशबेसिन पर लगे दर्पण के सामने खड़ा कर दिया|

मोटे धागों से तकिए पर कढ़ाई किया हुआ फूल, किसी सरकारी मुहर की तरह हमारे गालों पर छप गया था… और तो और उन गुलाबी धागों का कच्चा रंग भी हमारे गालों पर उतर आया था|

आख़िर हमने बाएं हाथ से गाल सहलाते हुए और दाएं हाथ से ब्रेकफास्ट खत्म किया…

मगर ये तो अभी शुरुआत थी, साली साहिबा ने एक भारी भरकम आलू का पराँठा हमारी प्लेट में धरते हुए कहा… “जीजाजी”, ये तो खाना ही पड़ेगा, मैंने “इतने प्यार से” बनाया है…आपको मेरी क़सम लगेगी…

उसके बाद तो ससुर जी ने “प्यार से” बनारसी के लड्डू , सासु माँ ने “प्यार से” हलवा और बाकियों ने “प्यार के नाम पर” वो ज़ुल्म किये कि बरेली में अयूब खाँ चौराहे के हनुमान मंदिर की एक मूर्ति याद आ गई जिनके मुँह पर भक्त गण ज़बरदस्ती लड्डू, बर्फी चिपका कर भगवान को भोग लगाने का संतोष प्राप्त करते थे|

आख़िर जब डाइनिंग टेबल से उठे तो हमारी हालत उस “अबला” की तरह थी जो “प्यार” के नाम पर गर्भवती हो गई हो|

बड़ी मुश्किल से पेट पर हाथ रक्खे अपने कमरे में पहुंचे, पेट इतना “प्यार” बर्दाश्त न कर सका, तबियत बिगड़ गई…

उसके बाद तो “प्यार से” दवाईयाँ देने वाले घरेलू डॉक्टरों का तांता लग गया…

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अरे निम्बू पानी में जीरा डाल के पी लो… जीजू ये लो हाजमोला…सासु माँ अजवाइन और नमक ले आईं , साले साहब बोल उठे , अमाँ जीजू एक पुड़िया पान मसाले की गटक जाओ पेट एकदम ठिकाने पे आ जायेगा…

आख़िर पान मसाला छोड़कर “प्यार” के नाम पर जो दिया गया हम गटक गए…

थोड़ी राहत हुई तो साले साहब फिर सवार हो गए… चलो हमारे ऑफिस …अपने दोस्तों से मिला दें आपको …घर बैठ कर भी क्या करोगे ???

अब उन सबको क्या समझाते कि घर बैठ कर हम क्या न करते ???

खैर !!! न चाहते हुए भी अधूरे मन से साले साहब की ऑफिस चल दिये… “नयागंज”

अजीबो ग़रीब बाजार था… रास्तों के दोनों तरफ तरफ रसोई में प्रयोग होने वाले मसाले से लेकर हर चीज़ की बोरियों के ढेर से लगे थे|

साले साहब लाल मिर्च की मंडी से गुज़रते हुए किसी गाइड की तरह मिर्च की तरह तरह की नस्लों से यूँ परिचय करवा रहे थे जैसे मिर्चें नहीं “राष्ट्रपति भवन” के “मुगल गार्डन ” में फूलों की प्रजातियाँ हों …

ये देखो जीजू, ये गुन्टूर की मिर्च है…

इसका असर अगले दिन सुबह पता चलता है.

इधर हमें छींकें चालू हुईं तो बन्द ही न हों …

शुक्र है साले साहब का इलाइची का कारोबार था, मिर्च का नहीं|

उसके बाद साले साहब के दोस्तों से मुलाकातों का सिलसिला चालू हुआ…

हर दूसरा दोस्त अपने निचले होंठ को दीवाली के दिये की तरह मोड़े हुए यूँ बात रहा था जैसे मुर्गा बांग देने से पहले जैसे सर उठाता है …ये सब मुँह में पान मसाले का “अमूल्य तरल पदार्थ” मुँह से बाहर न गिर जाए उसकी सुरक्षा के लिए था|

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हालाँकि, कुछ जिंदादिल दोस्तों ने हमारे “सम्मान” में साइड में पिचकारी मारते हुए “उस अमूल्य तरल पदार्थ” का त्याग किया|

कानपुर के लोगों में अद्भुत “सेंस ऑफ ह्यूमर” और चतुराई भरे “वन लाइनर” सही समय पर दाग़ने की जन्मजात प्रतिभा है…ये उस दिन पता चला…

शाम को किचन मसाले की पोटली बने घर पहुँचे तो श्रीमति जी ने दूर धकेलते हुए कहा, पहले नहा कर चेंज करके आओ , तुमसे मसालों की महक आ रही है .

साले साहब की पत्नी ने आँख मारते हुए श्रीमति को छेड़ा … दीदी एक बार “spicy” जीजाजी को भी टेस्ट कर के देख लो …

मगर “टेस्ट” करने की नौबत ही नहीं आई …

रात बारह बजे तक साले सलियाँ और बच्चे हमारे बैडरूम में अड्डा जमाये गप्पें मारते रहे…

हमने कई बार नक़ली उबासियाँ लेते हुए इशारा किया कि “अब उठो भी ” लेकिन कोई हिलने का नाम ही न ले…

आखिर रात एक बजे बड़ी मुश्किल से सब उठे तो हमारी हालत उस नववधू की तरह थी जो सुहाग रात में थकी हारी नींद के झोंके खा रही हो …

अगले दिन सुबह साले साहब हमें कार में बिठा कर बोले चलो आज आपको “एक हस्ती” से मिलवाते हैं|

हमारे “सम्मान’ में हमें कानपुर के कथित “गुटका किंग” से यह बताते हुए मिलवाया गया कि ये हमारा “परम सौभाग्य” था कि “किंग” साहब उसदिन “कानपुर” में थे वरना इनका एक पैर स्विट्जरलैंड में होता है दूसरा लंदन में…

इसी तरह हमारे साले साहब हमको ज़बरदस्ती “सम्मानित” करवाने शहर के डी एम , राजनीतिक और धनिक लोगों के घर ऑफिस में ले गए …

अरे बिज्जू… अचानक कैसे आना हुआ भई ??? कुछ ने पूछा

अरे वो जीजाजी आये हुए थे सूरत से, पहली बार आये हैं , सोचा आपको मिलवाते चलें …

इतना शुक्र है कि कानपुर में “जीजा” नाम के प्राणी को हर जगह ख़ास मान सम्मान मिलता है …सो हमें भी मिला…

अपने दिमाग को “एडजेस्ट” करते हुए अपने आपको ज़बरदस्ती ” “धन्य” मानने को बाध्य हुए|

हमारे अंदर “सम्मान” ऐसे ठूंस ठूंस कर भरा गया जैसे किसी बोरी में कागज़ की रद्दी पैरों से दबा-दबा के भरी जाती है.

हमने सुन रखा था कि मछली और मेहमान तीसरे दिन बदबू देने लगते हैं सो हम एडवांस में तीसरे दिन वापसी की टिकट करवा के आये थे|

आख़िर तीसरे दिन हमारी “सपत्नीक” सप्रेम बिदाई हुई… सबने मिलकर बेटी के लिए आँसू बहाए और हमारे लिए एक “कॉमन” शिकायत …

जीजू मज़ा नहीं आया, अभी आये अभी चल दिये …पता भी नहीं चला…अगली बार कम से कम एक हफ्ता लेकर आना …

कानपुर स्टेशन पहुँचकर पता चला कि ट्रेन आठ घंटे लेट है… उन दिनों संचार माध्यम इतने विकसित नहीं हुए थे…

मजबूरी में वापस घर आना पड़ा …परिवार के सदस्य बेचारे सोते से उठे … सबके होठों पर एक फीकी मुस्कान थी…

चेहरे पर साफ लिखा था “अतिथि तुम क्यों वापस आये ?”

आख़िर सबको आठ घंटे तक हमारे “सम्मान” की सज़ा देकर हम फिर स्टेशन पहुंचे…

“रेलवे स्टेशन ” पर रक्खी वज़न करने की मशीन बता रही थी कि पिछले तीन दिन में हमारे “सम्मान” में तीन किलो वृद्धि हो चुकी है …

आख़िर ट्रेन आ ही गई, प्रथम श्रेणी के साधारण डिब्बे में समान रक्खा, पांव पसार कर लेटे ही थे कि टी-टी महाशय ने केबिन का दरवाज़ा खटखटाया …

ऐसा है की फलां शहर के फलां विधायक, और नेता अलीगढ़ तक जा रहे हैं तो तब तक आपको “एडजेस्ट” करना पड़ेगा|

इससे पहले कि हम कुछ कहें , एक खादी कुर्ता धारी “नेताजी” अपने चार पांच चमचों के साथ हमारी आरक्षित सीटों पर जम गए|

श्रीमती बेचारी घबरा के खिड़की के पास सिमट के बैठ गईं ,अपनी ही आरक्षित सीटों पर हम किसी चोर की तरह दुबक के बैठे थे|

चार पांच चमचे “नेताजी” की आव भगत और उनका गुणगान करने में लगे थे. और “नेता जी” किसी महाराजा की अदा में मानों किसी सिंहासन पर बैठे थे …

उनकी एक आवाज़ पर टी टी से लेकर अटेंडेंट तक उनकी सेवा में जी सर …जी सर कहते हुए हाज़िर हो जाता था…

उत्तर प्रदेश में जन्म लेने का अनुभव काम आया|

बिना कोई विरोध किए हम दोनों पति पत्नी बिल्कुल चुपचाप सिकुड़ के बैठे रहे…

ट्रेन कानपुर छोड़ चुकी थी …

हमारा “दामाद” होने का नशा धीरे धीरे उतरने लगा था …

हमारे सामने हमारे सीनियर “देश के दामाद” जो विराजमान थे|

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