2 October Gandhi Jayanti | गाँधी जयंती विशेष

साथियों नमस्कार, हिंदी भाषा की सबसे बड़ी वेबसाइट Hindi Short Stories पर आपका स्वागत है| आज के इस खास अंक “2 October Gandhi Jayanti | गाँधी जयंती विशेष” में हम आपके लिए हमारी मण्डली के लेखक “धीरज व्यास” द्वारा लिखी गई एक शानदार कविता लेकर आएं हैं|

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2 October Gandhi Jayanti | गाँधी जयंती विशेष

“कर दिया कमाल”

तर्ज:- दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल

फसा दिया फैला के तूने मंदी का ये जाल,
मीडिया के महानायक तूने कर दिया कमाल…
संकट में भी चलती रही तेरी राजनेतिक ये चाल,
वाह रे प्रधान सेवक तूने कर दिया कमाल!!

कोरोना से लड़ी तूने अजब सी ये लड़ाई,
ज्योति जलाई तो कभी तूने ताली थाली बजाई…
ऐसे में झूलते पडोसीयों नें भी आँख दिखाई,
वाह रे फ़क़ीर तूने खूब करामत करवाई||

विदेशी मोबाइलों में से चीनी एप्प को दिया निकाल,
इसको भी मीडिया नें मान लिया एक धमाल…
आ सकता है कोरोना में पहला नंबर अगले साल,
वाह रे चोकीदार तूने कर दिया कमाल||

नौकरी की राह देख रहा थे ये ज़माना,
बद से बदतर हुआ अब नौकरी पाना…
ऐसे में पकोड़ों का भी अब जल भुन जाना,
तू भी फैकुं बड़ा है अब उस्ताद पुराना||

काट डाली तूने ढूँढ़ कर अर्थ वाली डाल,
इस पर चला दी तूने आत्मनिर्भर वाली चाल…
बढ़ा दी हम बेरोजगारों की ये खूब तूने जमात,
वाह रे विकास पुरुष तूने क्या कर दिया कमाल||

2 October Gandhi Jayanti | गाँधी जयंती विशेष
लेखक:- धीरज व्यास पाली


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Vedavati | वेदवती की कथा

साथियों नमस्कार! आज हम आपके लिए हमारे वैद-पुराणों की एक ऐसी कथा “वेदवती की कथा | Vedavati in Hindi” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आप अपने आपको भारतीय होने पर गोरवान्वित महसूस करेंगे| यह कथा हमें भेजी है पीयूष गोएल ने| आपको हमारा यह संकलन कैसा लगता है हमें Comment Section में ज़रूर बताएं|


Vedavati | वेदवती की कथा

एक बार कुशध्वज नाम के एक राजा थे । वह अत्यंत ज्ञानी थे इसलिए उन्हें देवगुरु ब्रहस्पति के पुत्र की भी उपाधि प्राप्त थी । उनकी एक पुत्री थी , जब उसका जन्म हुआ तब वह रोने के स्थान पर वेदों की महिमा गाने लगी , जिससे प्रसन्न होकर उसके माता पिता ने उस कन्या का नाम वेदवती रखा । वेदवती भगवान विष्णु को बहुत मानती थी ।

एक बार वेदवती तप करने बैठी थी । उसे तप करते करते तीन दिवस पूर्ण हुए । वह भूखी प्यासी थी । उनके पिता कुशध्वज ने जब यह देखा तो वह चिंतित हो उठे उन्होंने वेदवती की तपस्या भंग करने का निश्चय किया । तभी वातावरण में नारायण – नारायण नाम की ध्वनि उतपन्न हुई । वह ध्वनि देवऋषि नारद की थी ।

देवरिषि प्रकट हुए ओर उन्होंने राजा को वेदवती की तपस्या भंग करने से मना किया । ओर कहा की  आप ऐसा न करिए क्योकिज़22 वेदवती इस समय भगवान विष्णु के तप में लीन है , इस वक्त वेदवती को उठाना बिल्कुल एक शिशु से उसकी माता छीनने जैसा है । इसलिए हमारा निवेदन है कि कृपा कर आप वेदवती को उनकी साधना से न उठाए । यह बात सुनकर कुशध्वज रुक गए ओर वह चले गए ।

अप पढ़ रहें हैं Vedavati | वेदवती की कथा

कुशध्वज अपनी पुत्री के विषय मे चिंतित थे क्योंकि वेदवती का स्वभाव बिल्कुल भक्तिमय था और वह अपने तप में अधिक लीन रहती थी । कुशध्वज को यह चिंता थी कि वेदवती का विवाह कैसे होगा ? कोंन करेगा वेदवती से विवाह ? वेदवती की संतान होगी या नही ?

कोंन  पुरुष वेदवती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करेगा ? क्या वेदवती आजीवन अविवाहित रहेगी ? राजा ने यह सारी बात अपनी रानी को बताई ।

रानी भी अपनी पुत्री के स्वभाव से चिंतित रहती थी । फिर  उनके अंधकार भरे जीवन में एक ज्योत जली जब वेदवती ने एक दिन अपने पिता से कहा की वेदवती ने अपने आप के लिए एक वर पसन्द किया है ।

यह सुनकर कुशध्वज अति प्रसन्न हुए ओर वह अति प्रशंसा के भाव मे कहने लगे की पुत्री ! मुझे तुमसे यही आशा थी कि तुम अपने योग्य एक वर का चयन अवश्य करोगी । मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुमने जिस वर का चयन करा होगा , वह वर निसन्देह अति मनमोहक व अति ज्ञानी होगा परन्तु उस वर का नाम व पता तो बताओ ताकि हम उस वेद के पास तुम्हारा विवाह प्रस्ताव रख सके ।

यह सुनकर वेदवती ने अपने पिता से कहा कि वह वर अत्यंत मनमोहक ओर ज्ञानी है , उसका नाम श्री विष्णु है और वह वैकुंठ में रहते है । यह सुनकर कुशध्वज चिंतित हो उठे , उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उनके पैरों के तले से  जमीन खिंच गयी हो । वह कभी शांत होते तो कभी अपनी पुत्री को निहारते ।

काफी देर तक कोई वार्तालाप नही हुआ , फिर कुशध्वज ने अपनी चुप्पी फोड़ते हुए कहा कि पुत्री ! तुम खुद नही जानती की तुम क्या कह रही हो , तुम जिन विष्णु की बात कर रही हो , उनकी कृपा से सृष्टि की रक्षा होती है । फिर रानी ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी और बोली कि भगवान कभी विवाह नही करते , ओर फिर नारायण तो विवाहित है तभी उन्हें लक्ष्मीपति  कहा जाता है ।

इसलिए तू यह विचार अपने मन – मस्तिष्क से सदैव के लिए निकाल दे । रानी व राजा ने अपनी बात सम्पूर्ण करी । पर वेदवती तो अपने तन -मन – धन से नारायण को अपना पति मां चुकी थी और किसी भक्त को भगवान से छीनना धरती से सूर्य छीनने जैसा है ।

वेदवती अपनी बात पर अड़ी रही तब कुशध्वज को देवऋषि की सिख याद आई ओर् उन्होंने रानी से कहा कि प्रिये ! अब वेदवती को न रोको बस इतना समझ लो कि अब हमारी पुत्री अपने ससुराल के लिए विदा हो चुकी है ।

वेदवती भगवान विष्णु को प्राप्त करने के लिए एक वटवृक्ष के नीचे बैठकर तप करने लगी । उसने कई वर्षों तक तप किया । उसके तपोबल ने वटवृक्ष के नीचे ही वैकुंठ धाम बना दिया । उसकी यह तपस्या इतनी कठिन थी जितनी देवता भी तपस्या नही कर सकते । भगवान विष्णु सब देख रहे थे ।

ईस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु  प्रकट हुए ऒर उन्होंने वेदवती से वर मांगने को कहा तब वेदवती ने भगवान नारायण को अपने पति रूप में मांगा तब भगवान बोले कि मैं तो विवाहित हु प्रणति मैं अपने किसी अवतार में तुम्हे अपनी पत्नी अवश्य बनाऊंगा ,  फिर भगवान चले गए ।

वेदवती दुबारा तप करने लगी । तभी रावण वहां आया , वह वेदवती की सुंदरता देख मोहित हो गया ओर उसके सम्भोग करने की इच्छा करने लगा । तब वेदवती ने रावण को श्राप दिया की वेदवती ही रावण के वध का कारण बनेगी । फिर वेदवती रथ में सवार होकर स्वर्ग की ओर चली गई ।

समय बीता और एक दिन रावण सीता का अपहरण करने आ गया तब वेदवती ने सीता का रूप धारण करा ओर रावण ने वेदवती का ही अपहरण करा ।

श्री राम ने रावण का वध किया और सद्वती को मुक्ति दिलाई । सीता की अग्नि परीक्षा इसलिए हुई ताकि श्री राम सीता को वापस प्राप्त कर सके । जब अग्नि परीक्षा समाप्त हुई तब सीता ने श्री राम से कहा कि वेदवती ने बहुत दुख सहे है इसलिए आप वेदवती को अपनी पत्नी बनाए । तब श्री राम ने ऐसा ही किया|

Vedavati | वेदवती की कथा

पियूष गोएल


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Moral Stories in Hindi | असली शिक्षक

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Moral Stories in Hindi | असली शिक्षक

सोमवार की सुबह दिवार पर लटकी संगीतमाय घडी 11 बजने का आभास पहले संगीत से फिर 11 घंटे बजाकर कराती है। रवि के घर में उसके स्कूल जाने की तैयारियां अब जोर पकड़ने लगती है।

वैसे तो रोज इस समय तक सारी तैयारियां हो जाती है पर आज रवि दो दिन से स्कूल जा रहा है| इस कारण तैयारियों का कार्यक्रम तनिक देरी से चल रहा है।

रवि सुबह जल्दी 6 बजे उठ गया था और टूशन जाकर भी आ गया लेकिन वहां से वापस आ कर अखबार पढ़ते पढ़ते उसे नीदं आ गई जो उसकी आँख अभी तोड़ी देर पहले खुली।

स्कूल ड्रेस को वह खुद इस्त्री कर रहा है पर अभी जूते पोलिश करना, बस्ता जमाना भी तो बाकी है। ड्रेस को इस्त्री करते करते रवि अपनी माँ से बोला ”खाना बना कर मेरा टिफिन भी पैक कर देना” माँ ने आश्चर्य से पूछा ”आज लंच टाइम में खाना खाने घर नहीं आएगा क्या?”

उसने बताया “शुक्रवार को स्कूल में बोल रहे थे कि गेट पर ताला लगा दिया जाएगा, जो स्कूल समय में कोई भी बाहर ना जा सके। इसलिए, मेरे तो टिफिन डाल दो क्या पता लंच में आज घर आ पाऊ या या नहीं।” इतना बोल वो वापस तैयारियों में जुट गया।

रवि पास के सरकारी स्कूल में पिछले कुछ सालों से पढ़ रहा है। बचपन से प्राईवेट स्कूल में पढ़ा होने के कारण उसकी अच्छे से तैयार होकर स्कूल जाने की आदत पड़ी हुई थी वरना उसकी कक्षा के कुछ छात्र तो बगैर जूते, कुछ सलवटों से भरी ड्रेस पहने, कुछ के शर्ट बाहर निकले हुए, और कुछ तो बगैर बस्ते हाथ में दो चार किताब लिए हुए आ जाते थे।

समय रहते सारी तैयारी हो गई और रवि तय समय पर स्कूल के लिए निकल पड़ा। स्कूल पहुँच कर रवि सीधा अपनी कक्षा में पहुँचा। बस्ते को कक्षा में रख कर प्रार्थना में जाने के लिए अपने दोस्त विनोद के साथ मैदान की तरफ जाने लगा।

रास्ते में उसने “शनिवार का दिन स्कूल में कैसा रहा” इसके बारे में विनोद से पूछा तो वह बोला ”यार तु तो “शनिवार को आया नहीं पर उस दिन गजब हो गया।

लंच के बाद उपप्रधानाचार्य सर कक्षा में आये और अपनी कक्षा में सिर्फ 5 छात्रों को देखकर काफी नाराज हुए, फिर माॅनीटर से हाजरी भी नोट करवाई।”

”बाकी के सारे कहां गये थे ?” रवि ने पूछा। ”लंच में कुछ खाना-खाने स्कूल से बाहर गये थे जो वापस आए ही नहीं। आज पता नहीं क्या होगा ? मुझे तो अजीब सा ड़र लग रहा हैं।”

विनोद बस इतना बोल के चुप हो गया। ”डर मत यार। मैं तो छुट्टी पर था और तु कक्षा में मौजूद था। तो हम दोनो को डरने की जरूरत नहीं। डरेंगे तो वे बाकी के 60 छात्र जो कक्षा से भाग गए थे।” रवि विनोद को ये सब बोल हिम्मत बढ़ा ही रहा था कि प्रार्थना सभा स्थल आ गया और वे दोनो लाईन में खड़े हो गए।

प्रार्थना अपने निर्धारित समय पर चालु हो गई और जैसे ही खत्म हुई मंच पर से उपप्रधानाचार्य की आवाज माईक से गूंजी ”कक्षा बाहरवीं के छात्रों में से जिनका मैं नाम ले रहा हुँ उनको छोड़ कर बाकी के सारे छात्र उधर अलग लाईन बनाएँ|

विनोद का नाम मंच से बोला गया सो वो तो बच गया लेकिन रवि का नाम नहीं बोले जाने से उसे ताज्जुब हुआ। न चाहते हुए भी रवि को उस अलग वाली लाईन में खड़ा होना पड़ा।

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माईक पर अब बोला गया ”पूरी स्कूल अच्छे से देख लो इस लाईन को। ये सभी भागने वाले महान छात्र है। इनका आज सभी लोग देखलो मैं क्या ईलाज करता हूँ।  “उस लाईन की तरफ हाथ करते हुए, फिर से बोले ”मुर्गा बनो सभी”। ये सुनकर रवि की धड़कने तेज हो गई।

लाईन के सारे लड़के एक दूसरे को देखते रहे पर मुर्गा कोई नहीं बना। ये देख मंच से मुर्गा बनने का निर्देश फिर से गुस्से के साथ दिया गया। डर के मारे धीमें धीमें सारे लड़के मुर्गा बनने लगे लेकिन रवि खड़ा रहा।

वो खड़ा-खड़ा मन ही मन में सोचता रहा मेरी क्या गलती? मैं तो आया ही नहीं था। मैं क्यों मुर्गा बनु। रवि को खड़ा देख कर उपप्रधानाचार्य और ज्यादा गुस्से में आ कर मंच से चिल्लाए, ”लड़के! मुर्गा बन जल्दी”।

रवि ने सर हिलाकर मना कर दिया तो उनका धेर्य जबाव दे गया और मंच पर से तेजी से उतर कर सीधे रवि के पास पहुँचे |आव देखा न ताव उसका कान पकड़ कर मरोड़ दिया।

रवि हिम्मत करके जोर से बोला ”सर मैं छुट्टी पर था। “मैं भागा नहीं” पर वो कहां सुनने वाले थे। उन्होने एक जोरदार थप्पड़ रवि के गाल पर जड़ दिया और उसे झुका कर कमर में मुक्का भी मार दिया।

प्रार्थना में खड़े सभी लोगों का ध्यान इन दोनो पर आ गया। रवि जोर से चिल्लाया ”मेरी कोई गलती नहीं सर। मैंने तो माॅनीटर को छुट्टी की अर्जी भी दे रखी थी। आप उससे पुछते क्यों नही।”

वक्त की नजाकत को समझ माॅनीटर भी दौड कर झट से आ गया और कहा ”हाँ सर। रवि का प्रार्थना पत्र मेरे पास आया हुआ था और वो सच में छुट्टी पर ही था।” माॅनीटर की बात उनके कानो में जाती तब तक वे एक और थप्पड़ रवि को लगा चुके थे।

उपप्रधानाचार्य के रूकने पर रवि के सब्र का बांध टूट गया। ”मुझे ऐसी स्कूल में पढ़ना ही नहीं मैं तो घर जा रहा हुँ।” ऐसा बोलकर वो प्रार्थना स्थल से निकल पड़ा। पिछे से उसके सर चिल्लाए, ”जा चला जा। अब अपने पापा को स्कूल लाएगा तभी स्कूल में आ पाएगा”

रवि गुस्से से लबरेज पर मन से रूआंसा कक्षा में गया और अपना बस्ता उठा कर तेजी से वहां से चला गया। घर पहुँच कर जैसे ही रवि ने माँ और दादी को देखा तो उसकी आँखो से धड़ा धड़ आँसु पड़ने लगे। उसे रोता देख दोनो ने एक साथ पूछा ”क्या हुआ स्कूल में?”

रोते-रोते उसने सारी बात बतायी तो दोनो को बहुत गुस्सा आया पर खुद को और रवि को कैसे भी करके उसके पापा के आने तक का इंतजार करने का समझाया। पापा लंच में घर आए, तब तक रवि चुपचाप बैठा बैठा कुछ सोचता व रोता रहा।

माँ और दादी ने उसे खाना खीलाने की बहुत कोशिश की पर उसने कुछ नहीं खाया। पापा के घर आते ही रवि की दादी ने सारी बात बताते हुए, बोला ”अभी के अभी जा कर आ इसकी स्कूल और पता कर बात क्या है ? फालतु में मार दिया मेरे बच्चे को।”

पापा रवि को लेकर स्कूल पहुँचे। प्रधानाचार्य शहर से बाहर गए हुए थे और उपप्रधानाचार्य अन्य शिक्षकों साथ स्टाफ रूम में बैठे हुए थे। दोनो स्टाफ रूम पहुँचे और रवि के पापा ने उनको कहा ” सरजी गलती होने पर भले आप इसे पचास थप्पड़ मारों पर आपने तो बगैर गलती इसे मार दिया। एक बार इसकी बात तो सुनते।”

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इतना सुनते ही स्टाफ रूम में दूसरे अध्यापक भी आ गए| रवि के पापा सरकारी अधिकारी है इसलिए स्कूल में कई लोग उन्हे जानते है वे भी वहां आ गए| सर जी का गुस्सा अभी उतरा नहीं था सो उन्होने बेरूखी से जवाब दिया ”क्या हो गया मारा तो। इतना तो शिक्षक को हक होता है मारने का और गेहुं के साथ एक दो जौं पीस ही जाते है इसमें इतना बवाल काहे का।

इतने में रवि के दादा घर से होकर स्कूल पहुंचें| उनका शहर में बहुत रूतबा था जो वो सीधे स्टाफ रूम में आकर जोर से बोलने लगे, “कौन है वो मास्टर जिसने मेरे पोते को मारा है। उसकी इतनी हिम्मत मेरे बच्चे को हाथ लगाया। मैं उसका तबादला करा दूंगा।

उपप्रधानाचार्य उनके सामने आकर उनसे जोर से कुछ बोलने लगे तो उनकी बात काट कर रवि के दादा बोले ”जेल भिजवा दूंगा और नौकरी भी चली जाएगी मैंने पुलिस केस कर दिया तो।”

ये सुनते ही कक्षा के अन्य अध्यापक जो अध्यापक दल का नेता था रवि के दादा से भीड़ गया। स्टाफ रूम का माहौल अब तो ऐसा हो गया जैसे कोई सब्जी मंड़ी हो। दोनो पक्ष ज़ोर-ज़ोर  से चिल्लाने लगे। बड़ी मुश्किल से रवि और उसके पापा ने दादा को शांत करा कर रवाना किया।

उनके जाते ही सारे अध्यापक उपप्रधानाचार्य और संघ के नेता अध्यापक के साथ हो गए और रवि व उसके पापा को तरह तरह के ताने मारने लगे| एक बोला ”जमाना बहुत खराब है। गुरू की कोई इज्जत ही नहीं बची है।” दूसरा बोला ”मार दिया तो क्या हो गया? अब क्या माफी  मांगे पूरी कक्षा से|

एक अन्य बोला ”पुराने जमाने में लोेग स्कूल में कहने को आते थे कि मेरे बच्चे को मार मार के सुधारो और अब आज के जमाने के लोग लड़ने के लिए आ जाते है कि मेरे बच्चे को क्यों मारी।

एक के बाद एक कईयों ने अपनी भड़ास निकाली। सब के ताने सुन रवि ने अपने पापा का हाथ पकड़ा और उनसे बोला ”पापा चलो यहां से। मुझे नहीं पढ़ना इस स्कूल में। मुझे टी-सी- दिलवा दो। मै प्राईवेट ही बोर्ड की परीक्षा दे दूंगा| ये सुन कर आध्यापक बोला ”ये बात ,कदम सही है। हमें भी हमारे यहां नहीं चाहिए ऐसे विद्यार्थी|

ऐसा नहीं कहते बेटे। मैं बात कर रहा हुँ न।” रवि के पापा ने उसे समझाते हुए कहा। एक तरफ तो रवि के पापा रवि और उपप्रधानाचार्य में सुलह कराने की कोशिश कर रहे थे तो दूसरी तरफ अन्य अध्यापक उन्हें ताने मारने में व्यस्थ थे।

इन सब शोरगुल के बीच स्कूल के सबसे वरिष्ठ अध्यापक बाबुलाल अखबार पढ़ने का नाटक करते हुए सब चुप चाप देख रहे थे। आखिरकार जब उनसे रहा नहीं गया तो उठ कर बोले “ये कोई वक्त और मौका नहीं है आपसी एकता दिखाने का। इस बच्चे के साथ गलत हुआ है। हमें हमारी गलती माननी चाहिए।

हमारा काम सिर्फ पढ़ाना ही नहीं हैं। पढ़ाई के प्रति छात्रों का रूझान बनाये रखना भी हमारी जिम्मेदारी हैं। हमें हमारे सम्मान की चिंता छोडकर बच्चे के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए।”

इतना सुन कर स्टाफ रूम में ख़ामोशी हो गयी क्योंकि सभी लोग बाबुलाल की बहुत इज्जत करते थे। बाबुलालजी रवि के पास गये और उसके सिर पर हाथ फेर कर उससे बोले ”बेटा गुस्से में आदमी को सही गलत का कोई ध्यान नहीं रहता।

इस कारण उससे गलती हो जाती है। इस बात को एक बुरा सपना समझ कर भूल कर पढाई और अपने आने वाले भविष्य के बारे में सोचो।”

”पर ये सारे लोग नहीं भूलेंगे। मेरे कम सत्रांक भेजेंगे| मुझे कक्षा में नीचा दिखाएँगे मुझे जानबुझ कर तंग करेंगे ऐसे माहौल में पढ़ा नहीं जा सकता।” रवि ने उखड़े मन से जवाब दिया।”

कोई कुछ नहीं कहेगा तुझको। कोई कुछ भी कहे तो वो कक्षा छोड़ कर मेरी कक्षा में आ जाना। खाली समय में में मेरे पास आ जाना मै अतिरिक्त पढ़ा भी दूंगा तुझे। कोई टी-सी- नहीं लेना। तु तो मेरे बेटा जैसा है।

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ऐसा बोल उन्होने उसे गले लगा लिया। बाबुलाल के गले लग कर रवि का गुस्सा शांत हुआ और स्कूल में पढ़ने को तैयार हो गया। रवि को बिना गलती मिलें उस दंड और अपमान को भुलाने में कुछ वक्त लगा।

कुछ दिन बाद उसने वापस स्कूल जाना शुरू भी कर दिया। पर अब वह जब भी पढ़ने बैठता उसे वो घटना फिर याद आ जाती और पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता।

ये बात उसने बाबुलालजी को जा कर बोली। तो उन्होने समझाया की अगर तुम अपमान का बदला लेना चाहते हो तो ईज्जत पा कर लो। पढ़ाई कर के ऐसा परिणाम लाओ की तुम्हारी पूरे स्कूल में ईज्जत हो।

जिन लोगों ने तुम्हारा अपमान किया है वो ही तुम्हारी प्रशंशा करें यही असली बदला होगा। तुम्हारा आज से यही लक्ष्य होना चाहिए। आज नही तो कल गलती करने वालों को ग्लानी जरूर होगी।”

ये बात रवि के दिमाग में ठीक से बैठ गयी और वो पढाई में लग गया। पूरे साल बाबुलालजी प्यार से उसका हौसला बढ़ाते रहे। कुछ महीनों बाद हुई बोर्ड की परीक्षा में रवि ने अच्छे से सारे पेपर हल किए।

परीक्षा परिणाम में जब रवि प्रथम श्रेणी से पास हुआ तो वह बहुत ख़ुशी से बाबुलाल सर से मिलने स्कूल पहुँचा तो उसे पता चला कि अपनी कक्षा में सिर्फ वो अकेला ही प्रथम श्रेणी से पास हुआ है।

स्कूल वालों को परिणाम से आश्चर्य हुआ फिर भी सबने उसे बधाई दी। अगले दिन अखबार में अपनी फोटो देखते ही रवि की आँख भर आई। उसने अपनी माँ को बोला ”मेरी पूरी स्कूल में बहुत सारे शिक्षक थे। पर वो शिक्षक जिनकी वजह से मुझे यह ख़ुशी मिली वो अकेले बाबुलालजी है। वो ही है पूरी स्कूल के असली शिक्षक है।

Moral Stories in Hindi | असली शिक्षक
लेखक-धीरज व्यास, पाली


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हिंदी दिवस 2020 पर कविता | राष्ट्रभाषा पर बहस चले

साथियों नमस्कार, आज हम हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में आपके लिए एक खास कविता “हिंदी दिवस 2020 पर कविता | राष्ट्रभाषा पर बहस चले“लेकर आएं हैं| यह कविता हमारी मण्डली के लेखक बरुण कुमार सिंह ने लिखा है| आपको यह कविता कैसी लगी हमें Comment Section में ज़रूर बताएं|


हिंदी दिवस 2020 पर कविता | राष्ट्रभाषा पर बहस चले

 

नमस्कार! प्रणाम! हम भूल चले,
हैलो! हाय! बाय! हम बोल चले।
चरण स्पर्श! भूल चले,
आलिंगन को हाथ बढ़े।
संस्कृति को भूल चूकें,
विकृति को बढ़ चले।
पौराणिकता को भूल चले,
आधुनिकता को हाथ बढ़े।
अपव्यय पर हाथ रूके,
मितव्यय पर हाथ बढ़े।
कृत्रिमता को भूल चले,
अकृत्रिमता को बढ़ चले।
सुप्रीमकोर्ट में बहस बेमानी है,
न्याय की चौखट पर,
राष्ट्रभाषा हारी है,
मंजिल अभी बाकी है।
सितम्बर में हिन्दी दिवस मने,
हिन्दी पखवाड़ा विसर्जन बने।
राष्ट्रभाषा पर बहस चले,
हिन्दी पर राजनीति जारी है।
बरुण कुमार सिंह
ए-56/ए, प्रथम तल, लाजपत नगर-2
नई दिल्ली-110024
मो. 9968126797

हिंदी थी वह

हिंदी थी वह, जो लोगो के ह्रदयो में उमंग भरा करती थी,
हिंदी थी वह भाषा, जो लोगो के दिलो में बसा करती थी !!

हिंदी को ना जाने क्या हुआ, रहने लगी हैरान परेशान,
पूंछा तो कहती है अब कहाँ है, मेरा पहले सा सम्मान…!!

मैं तो थी लोगो की भाषा, मैं तो थी क्रांति की परिभाषा,
मैं थी विचार-संचार का साधन, मैं थी लोगो की अभिलाषा…!!

मुझको देख अपनी दुर्दशा, आज होती है बड़ी निराशा,
सुन यह दुर्दशा व्यथा हिंदी की, ह्रदय में हुआ बड़ा अघात ,
बात तो सच है वास्तव में, हिंदी के साथ हुआ बड़ा पक्षपात…!!

हिंदी जो थी जन जन की भाषा, और क्रांति की परिभाषा,
वह हिंदी कहती है लौटा दो उसका सम्मान, यही है उसकी अभिलाषा..!!

अपने ही देश में हिंदी दिवस को तुम, बस एक दिन ना बनाओ,
मैं तो कहती हूँ, हिंदी दिवस का यह त्यौहार तुम रोज मनाओ…!!

आओ मिलकर प्रण ले, हम सब करेंगे हिंदी का सम्मान,
पूरी करेंगे हिंदी की अभिलाषा, देंगे उसे दिलो में विशेष स्थान…!!


हिंदी जीवन है सदियों से,

हिंदी है मेरा अभिमान!
हिंदी को गर पूजूं न में,
मिट जाए मेरी पहचान!!
जिस धरती पर हुए अनेकों,
महापुरुष जो थे निष्काम!
उस भूमि और उस हिंदी को.
हमारा शत-शत प्रणाम!!

ह से हिंदी 

“ह” से “ह्रदय” ह्रदय से “हिंदी”, हिंदी दिल में रखता हूँ,

“नुक्ता”लेता हूँ “उर्दू” से, हिन्दी उर्दू कहता हूँ..

शब्द हो अंग्रेज़ी या अरबी, या कि फारसी तुर्की हो,

वाक्य बना कर हिन्दी में, हिन्दी धारा में बहता हूँ..

हिंदी-ह्रदय विशाल बहुत है, हर भाषा के शब्द समेटे,

शुरू कहीं से करूं मगर, हिंदी में ख़तम मैं करता हूँ..

केशव का हो कठिन काव्य, या मधुर छंद रसखान के हों,

मैं कबीर का समझ के दर्शन, सूर के रस में रमता हूँ..

तुलसी सदृश दास हिन्दी का, बन कर स्वयं समर्पित हो

मातृ रूपिणी हिन्दी तुमको, नमन कोटिशः करता हूँ…

—प्राणेन्द्र नाथ मिश्र


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सावन लोक गीत इन हिंदी लिरिक्स

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए सावन के कुछ ऐसे गीतों “सावन लोक गीत इन हिंदी लिरिक्स” का समावेश करने जा रहें हैं जिन्हें आप अपने घर-परिवार में रोजमर्रा के काम-काज के साथ गुनगुना सकते हैं|

सावन लोक गीत इन हिंदी लिरिक्स

ज्यों ज्यों बूँद परत चूनर पर,

    त्यों त्यों हरी उर लावतआवत ॥ कुन्जन  में ….

अधिक झंकोर होत मेघन की,

    द्रुम तरु छिन छिन गावत आवत ॥ कुन्जन  में ….

वे हँसि ओट करत पीताम्बर,

    वे चुनरी उन उढ़ावतआवत ॥ कुन्जन  में ….

भीजे राग रागिनी दोऊ,

    भीजे तन छवि पावनआवत ॥ कुन्जन  में ….

लै मुरली कर मन्द घोर स्वर,

    राग मल्हार बजावतआवत ॥ कुन्जन  में ….

तैसे ही मोर कोकिला बोलत,

    अधिक पवन घन भावतआवत ॥ कुन्जन  में ….

सूरदास प्रभु मिलन परस्पर,

    प्रीत अधिक उपजावतआवत ॥ कुन्जन  में ….

शब्दार्थ : आवत = आते हैं, परत = पड़ती हैं, लावत = लाते हैं, झंकोर = गड़गड़ाहट की ध्वनि, उन = उन्हें, बजावत = बजाते हुए, उपजावत = उत्पन्न करते हुए


कृष्ण हिंडोले | सावन लोक गीत इन हिंदी लिरिक्स

कृष्ण हिंडोले बहना मेरी पड़ गये जी,
       ऐजी कोई छाय रही अजब बहार

सावन महीना अधिक सुहावनौ जी,
       ऐजी जामें तीजन कौ त्यौहार
मथुरा जी की शोभा ना कोई कहि सके जी,
ऐजी जहाँ कृष्ण लियौ अवतार

गोकुल में तो झूले बहना पालनो जी,
       ऐजी जहाँ लीला करीं अपार।  
वृन्दावन तो बहना सबते है बड़ौ री,
       एजी जहाँ कृष्ण रचायो रास।
मन्दिर मन्दिर झूला बहना मेरी परि गये जी
एजी जामें झूलें नन्दकुमार
राग रंग तो घर घर है रहे जी,
ऐजी बैकुण्ठ बन्यौ ब्रजधाम।
बाग बगीचे चारों लंग लग रहे जी,
ऐजी जिनमें पंछी रहे गुंजार
मोर पपैया कलरब करत हैं जी,
ऐजी कोई कोयल बोलत डार
पावन यमुना बहना मेरी बहि रही जी,
ऐजी कोई भमर लपेटा खाय
ब्रजभूमी की बहना छवि को कहै जी,
ऐजी जहाँ कृष्ण चराईं गाय
महिमा बड़ी है बहना बैकुण्ठ तै जी,
एजी यहाँ है रहे जै जैकार।  

शब्दार्थ : जामें = जिसमें, लंग = ओर / तरफ


झुकी है बदरिया कारीकब आओगे गिरधारी

झुकी है बदरिया कारीकब आओगे गिरधारी।

उमड घुमड कर घिरी हैं घटाएँ,

       घोर शब्द होए भारी,  कब आओगे गिरधारी।

धड धड कर यह जियरा धडके,

       आए याद तुम्हारीकब आओगे गिरधारी।

पी पी शोर मचाए पपीहा,

       कोयल अम्बुआ डालीकब आओगे गिरधारी।

गरज गरज कर इन्द्र डरावे,

       देख अकेली नारीकब आओगे गिरधारी।

रिमझिम रिमझिम मेहा बरसे,

       भीजे चुनर हमारीकब आओगे गिरधारी।

ओ किशोर चितचोर साँवरे,

       चाकर मैं शरणाईकब आओगे गिरधारी।


आई बागों में बहारझूला झूले राधा प्यारी

आई बागों में बहारझूला झूले राधा प्यारी

       झूले राधा प्यारी,  झुलावें बनवारी || आई बागों में …………..

सावन की ऋतु है आईघनघोर घटा नभ छाई

       ठंडी-ठंडी पड़े फुहारझूला झूले राधा प्यारी || आई बागों में …………..

हो मस्त मोर यूँ नाचेमोहन की मुरलिया बाजे

       कू-कू कोयल करे पुकारझूला झूले राधा प्यारी || आई बागों में ……….

सब सज रहीं नार नबेलीनटखट करते अठखेली

       कर कर के सोलह सिंगारझूला झूले राधा प्यारी || आई बागों में …………..

राधा संग में बनवारीझूलें हैं सखियाँ सारी

       हिलमिल गावेँ गीत मल्हारझूला झूले राधा प्यारी || आई बागों में …………..

भए ऐसे मगन कन्हाईचलती ठंडी पुरवाई

       छम-छम बरसे मूसलधारझूला झूले राधा प्यारी || आई बागों में ………..


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Hindi Poem on Daughter | में बेटी हूँ

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए एक ऐसी कविता “Hindi Poem on Daughter | में बेटी हूँ” लेकर आएं हैं जिसे पढ़कर आपको बेटियों पर गर्व महसूस होगा|


Hindi Poem on Daughter | बेटीयों और बहनों की अस्मिता का सवाल है

दरीन्दगी से भरे मानुष रूप किसे किसका ख्याल है,
लूट रही है इज्जत और झूठों का मायाजाल है|
21वीं सदी में मनुष्य का मनुष्य ही काल है,
बेटीयों और बहनों की अस्मिता का सवाल है||
घूम रहे हैं भेड़िये निर्भीक हर चौराहे पर,
उनकी जान बचाने के लिए…
कुछ भेड़िये खाल ओढ़े बैठे हैं संसद भवन पर.
कुछ तो अर्थों से बलात्कार का परिभाषा…
प्रयत्न करते बदलने का|
ये राम नहीं दूशासन का काल है.
बेटियों और बहनो की अस्मिता का सवाल है||
बेटियों और बहनों के साथ होता रहा दुर्व्यवहार,
खुद को सामाजिक समझने वाला इंसान
देखता रहा हर बार…
न्याय व्यवस्था फीकी है उम्मीद करें तो किस पर,
पुलिस प्रशासन सोयी है भीभीषण की गहरी नींद में
किसी की बहन होना किसी की बेटी होना
अब हो गया जी का जंजाल है….
बेटियों और बहनो की अस्मिता का सवाल है||
अब तो जागो मानवों अगर है तुममे मानवता,
दिखा दो गीदड़ों को तुम अपनी विशेषता|
सजा दो ऐसी दुस्टों को कांप जाए उनकी रूह भी,
बहन, बेटी, भाई सभी से है अब गुहार…
खोलो आँखे अपनी और अत्याचार पर करो प्रहार||
अब हम सब को मिल कर यह करना कमाल है,
बेटियों और बहनों की अस्मिता का सवाल है||
विजय नारायण

में बेटी हूँ

जी हाँ! में बेटी हूँ,
जिसके जन्म लेती ही…
माता पिता करने लगते हैं उसके दहेज़ की व्यवस्था|

जी हाँ! में वही बेटी हूँ,
में जनि जाती हूँ लक्ष्मी के रूप में भले…
पर मुझ पर किए जाते हैं अन्याय अनेक|

जी हाँ! में बेटी हूँ,
जिसके लिए नारे लगाए जाते हैं कई…
परन्तु कोख में ही ख़त्म कर दिया जाता है मुझे!
और तो और पढने से भी वंचित रखा जाता है मुझे|

जी हाँ! में वही बेटी हूँ,
पढ़ लिख कर आगे बढ़ना चाहती हूँ में,
समाज की इस व्यवस्था को बदलना चाहती हूँ में|

रचयिता – सपना कुमारी साह


बेटी

चहकतेविहान का आफ़ताब है बेटी,
महकते शाम का महताब है बेटी|

ज़िन्दगी के छंदों का अलंकार है बेटी,
कविता के पन्नों का संस्कार है बेटी|

वत्सल के श्रृंगार का रस है बेटी,
कल के संसार का यश है बेटी||


तुम मेरी सखी बनोंगी ना

सुख में दुःख में संग मेरे रहना,
तुम मेरी सखी बनोंगी ना!

जब में रुठुं, तुम मुझे मानाने आना…
हंस दो न बस एक बार,
बोल-बोल कर मुझको गले लगाना…
बोलो ऐसा करोगी ना,
तुम मेरी सखी बनोंगी ना!!

माँ, आज यह पहनों…आज यह ओढो,
कहकर मुझसे लाड जाताना…
आज यह खाना…आज वह खाना,
अपनी फरमाइशें बताना…
खूब प्यार में करती तुमसे,
तुम भी इतना प्यार करोगी ना ?
तुम मेरी सखी बनोंगी ना||

रचयीता – निभा अम्बुज जैन


अन्याय देखकर आंख उठाती,

नही तो लज्जा का अवतार है।

कितने कष्ट भी उसने झेले,

पर सहनशीलता भरमार है।

टूटने लगता जो कभी हौसला,

तो बनती सच्ची ढार है।

छेड़ो कभी जो राक्षस बनकर,

तो “दुर्गा” सी अंगार है।

रचयिता – प्रिया त्रिपाठी


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Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी

साथियों नमस्कार, कभी कभी इन्सान कुछ ऐसे रिश्तों में फंस जाता है जहाँ उसे अपने सपने पीछे छुटते नज़र आते हैं| ऐसी ही एक कहानी “Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी” हमारी लेखिका लिपि चौहान ने हमें भेजी है, आशा है आपको हमारा यह संकलन पसंद आएगा|


Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी

आज घर में अकेली थी ,राधा काम करके जा चुकी थी ,रवि ऑफिस जा चुके थे और में सारा काम निपटा के रेडियो पर गाने सुन रही थी। सुनते-सुनते नज़र शर्मा जी की बालकनी में टंगे पिंजरे पर पड़ी जहा एक प्यारा सा मिट्ठु  था।

एक खुबसुरा बोलने वाला मिट्ठू ,  जो अब बंद पिंजरे में चुप सा हो गया था। उसकी आँखे बस आकाश को देखती हुई आज़ादी का इंतज़ार करती थी उड़ने का इंतज़ार करती थी|

मुझे उससे हमदर्दी सी होने लगी वो तो एक असहाय पंछी है पर में तो इंसांन हूँ वो पिंजरा नहीं खोल सकता पर में सारे दरवाजे खोल सकती हूँ , पर क्यों हूँ  मै आज इस मुकाम पर?

माँ-पापा की चहेती,  भाई की जान और हर एक फंक्शन की जान थी मै| मुझे आज भी याद है, कॉलेज के उस फंक्शन में मेरे डांस परफॉरमेंस के बाद वन्स मोर-वन्स मोर की आवाजे आ रही थी| सारे टीचर्स और प्रिन्सिपल सर मेरी माँ को घेर कर खड़े थे|

प्रिंसिपल  तारीफ़ करते नहीं थक रहे थे| यही नहीं में कॉलेज टापर भी थी| मेरे यही सारे गुण देख कर रवि मर मिटे थे मुझ पर और मेरा हाथ मांग लिया| घर नौकरी सब अच्छी देख कर पापा ने भी मेरी शादी कर दी|

पहला एक साल तो प्यार मोहब्बत में कुछ ऐसा गुज़रा की पता ही नहीं चला| रवि की दीवानगी थी ही कुछ ऐसी थी| लेकिन वो दीवानगी सिर्फ दीवानगी नहीं थी एक ऐसा पिंजरा जो में मेरे लिए तैयार कर रही थी| जिसमे अब मेरा दम घुटता था|

मेरी खूबसूरती कोई और देखे तो रवि बर्दाश्त नहीं कर सकते थे| कोई मेरी कोई तारीफ़ करे ये भी उन्हें अच्छा नहीं लगता था| मै ज्यादा सजु-सवरू तो ताने मिलते थे|

एक कॉम्पिटिशन में भाग लेने के लिए जब मैने रवि से पूछा तो उन्कहोंने कह दिया की मेरी बीवी बीच बाजार में नाचे मुझे पसंद नहीं| क्या मेरी कला जो पूरी दुनिया पसंद करती है वो अब बाज़ारू भी हो गई थी ?

दिन ब दिन उम्मीदे मेरा दामन छोड़ रही थी और में उन चार दीवारों में सिमटती जा रही थी|

मेरा किसी पडोसी से बात करना भी रवि को पसंद नहीं था| क्या यही प्यार था उसका जो मुझे कैद करता जा रहा था| शाम हो चुकी थी, में अपने लिए चाय बनाकर लाई और बालकनी में पी ही रही थी की घंटी बजे देखा तो रवि थे और कुछ जल्दी में थे…

पूछा तो कहने लगे की मीटिंग है और उसके बाद  पार्टी लेट हो जाऊंगा आने में|

मैंने  कहा कुछ जरुरी बात है तो कहने लगे फ़िज़ूल में परेशान न करो  जल्दी से सूट निकालो मुझे जाना है| पता नहीं मेरे अंदर कौन सी लहर दौड़ गई की मेने कहा फ़िज़ूल नहीं बहुत ज़रूरी है और आज सुनना होगा|

रवि गुस्से में मेरी तरफ देखने लगे मेने भी उनसे आँख से आँख मिला कर कहा, आज मेरी गुरु माँ का कॉल आया था| उन्होंने कहा की आगरा कत्थक फेस्टिवल में, मैं  गुरुकुल को रिप्रेजेंट करू|

यह सुनते ही रवि का कटाक्ष मेरे कानो में पड़ा| वो कुछ बोलते इससे पहले ही मैंने  कहा, पूछ नहीं रही हूँ बता रही हूँ| कल आगरा के लिए निकल जाउंगी और हां अभी मुझे टिकट्स करना है। जा रही  हूँ।

रवि ने कहा, जा रही हो तो दुबारा इस घर में मत आना| मैंने कहा घर और अलमारी की चाबियां टेबल पर रखी है आपके जरुरी पेपर उस ड्रावर में है और आपको बोलने की जरुरत नहीं मैंने घर छोड़ने का फैसला उस वक़्त ही कर लिया था जब आपने मेरी कला को बाज़ारू कहा  था| बस हिम्मत आज जुटा पाई हूँ।

घर से बहार आते ही महसूस हुआ जो ख़ुशी एक अरसे से गुम थी आज मिल गई|

Motivational Story in Hindi for Success | गुम है ख़ुशी

लिपि चौहान


Success Story in Hindi | आत्मविश्वाश 

दिन गर्मियों के थे, हम सब सयुंक्त परिवार में रहते थे। एक दिन मेरी कॉलोनी में कुछ खूबसूरत सी लड़कियों का आना हुआ, बात करने पर पता चला कि वो मुम्बई से आई थी।

हाव-भाव, चाल-ढाल से एकदम शहरी। मैं जो कि अभी तेरह की हुई थी, उनको देखकर बहुत प्रभावित थी। आखिर बात हुई, दोस्ती हुई….फिर घूमना, बाते करना।

अक्सर मैं उनको देखकर उन जैसा बनने की कोशिश करती| समय बीतने लगा और कोशिश बढ़ गयी, पर कोई तारीफ नही बस कोशिश……पढ़ाई में होशियार थी अब जो समय पढ़ाई का था वो सुंदर दिखने और तारीफ पाने में लगने लगा।

उम्र का वो दौर, हार्मोन की उथल पुथल, सब कुछ जैसे अजीब था। एक सीधी साधी लड़की को अब उड़ना था, लेकिन किस दिशा में ,ये उसको नही पता था।समय निकलता गया, सयुंक्त परिवार और काम के कारण माँ उतना समय नही दे पाती थी, पिता सरकारी नौकरी में थे जोकि दूसरे शहर में पदस्थ थे।

लेकिन मेरे व्यवहार में अचानक आये परिवर्तन से वो भी अनभिज्ञ न थे।आखिर पापा ने पूछ ही लिया “क्या बात है तनीषा, आज कल कहा मन रहता है तुम्हारा”। मैं बोली “परीक्षा में अभी टाइम है,मैं कोर्स कवर कर लूंगी। पर मुसीबत बढ़ने वाली थी, उन लड़कियो ने ये बात भांप ली और फिर शुरू हुआ वो दौर जिसकी मैं कल्पना भी नही कर सकती थी|

उन लड़कियो ने मेरे कद ,रंग वजन और हर उस चीज़ का मज़ाक बनाया जिसको लेकर मैं संवेदनशील थी। एक अलग ही तरह का दबाव महसूस कर रही थी। मेरा खाना खाने का दिल नही करता था, खाती भी थी तो उल्टी कर देती थी।

मै उदास रहने लगी, कितनी भी कोशिश कर लूं, मैं उन लड़कियों जितनी आकर्षक नही लग पा रही थी। असर ये हुआ कि उस वर्ष मेरा परीक्षा परिणाम बहुत बुरा रहा। समय निकल रहा था। मैं अंदर से कमजोर हो गयी थी, फिर एक दिन मैंने ऐसे जीवन को खत्म करने का सोचा।

बस किशोर मन यही सोच रहा था कि जब मुझमे कोई आकर्षण ही नही तो जीवन का अर्थ क्या, दिन और समय तय किया ,और इंतज़ार करने लगी। पर इसी बीच पापा ने फ़ोन कर बुला लिया। जगह बदली, मन बदला मरने का विचार आगे बढ़ा दिया।

सोच वही ले जाती थी मैं सुंदर नही, मोटी हु। कद कम है रंग दबा हुआ। इस दबाव को झेलते हुए एक दिन अचानक ,एक अंदरूनी ऊर्जा महसूस हुई।जैसे कोई हाथ पकड़ कर मुझे इस स्थिति से निकल रहा था। मैंने खुद तय किया कि कुछ तय समय तक मैं सिर्फ सकारात्मक बाते पढूंगी और देखूंगी। मुझे अच्छा महसूस होने लगा था।

भूख बढ़ गयी , चहरा ठीक हो रहा था। थकान भी कम हो गयी। मैंने फिर एक दिन हिम्मत करके वहां के बच्चो से दोस्ती की और शाम को रोज़ बेडमिंटन खेलने जाने लगी।सब कुछ जैसे सही हो गया था। नए दोस्त , नया माहौल सब अच्छा था । फिर वापस जाने का समय आया।घबराहट , डर के कारण हालात खराब थी, पर जाना तो था।

अगले दिन वापस आ गए। उन लड़कियों का ग्रुप सामने से जा रहा था हंसता हुआ, पर मैं स्थिर खड़ी देख रही थी न कोई डर ,न दबाव। अपने अस्तित्व का पहला अनुभव उसी दिन हुआ था मूझे और उस किशोरी के लिए ये जीवन की अमूल्य सीख थी। आज ,इतने साल बीत गए ,लड़खड़ाई , बोहोत उत्तर चढ़ाव देखे पर उस दिन हिम्मत के जो पंख मिले, उनने मुझे कभी गिरने नही दिया। ——–

यामिनी

Motivational Story in Hindi for Success


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Inspirational Story in Hindi | पर्दा

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए “रशिश कौल” की लिखी एक ऐसी कहानी “Inspirational Story in Hindi | पर्दा”  लेकर आएं हैं जो समाज के उस वर्ग के दर्द को बयां करती है जो आज भी अछुता है| आशा है आपको हमारा यह संकलन पसंद आएगा|


Inspirational Story in Hindi | पर्दा

करीब आधे घंटे देरी से चली रेल, कुछ कोहरे की वजह से और कुछ आदतन। राहत की सांस ली जब देखा किसी को अपनी सीट से उठने के लिए बोलना नही पड़ेगा…बैग उठा के रखा सीट के नीचे और कानों में हेडफोन ठूस के पसार गया|

बाहरी दुनिया में न कोई दिलचस्पी बची थी मेरी और न ही कोई उम्मीद…बस कुछ था, तो इंतेज़ार मेरे स्टेशन के आने का और एक छोटी सी आस की तब तक कोई आकर “थोड़ा सा” सरकने को न बोले।

तभी कंधे पर एक हाथ महसूस हुआ, फिर एक हल्का सा झटका और फिर आयी थपकी। एक बार तो जी में आया कि चुप चाप गाने सुनता रहूँ पर यकीन मानिए, दिन के सफर में अगर आप समझते है कि अपनी आरक्षित सीट पर अकेला बैठ कर आप गाने सुनते हुए घर तक जाएंगे तो शास्त्रो में कड़े शब्दों में आपके लिए “मूर्ख, अज्ञानी, दुःसाहसी और निर्लज्ज” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है।

मैंने सर उठा के पीछे देखे तो करीब मेरी उम्र का लड़का खड़ा था , हाथ में सूटकेस लिए…अपना सामान सीट के नीचे रखने का इशारा करते हुए। मैंने अपना बैग आगे सरकाया और उसने अपना..यदि श्री कृष्ण ने अपने मुख में यशोदा माँ को समस्त ब्रम्हाण्ड समाया दिखाया हो तो हमारी रेल सीट के नीचे भी एक छोटी -मोटी आकाश गंगा तो शर्तिया समा जाती होगी।

“भाई ज़रा आप थोड़ा सा…” उसके पूरा बोलने से पहले ही में खिड़की से चिपक कर बैठ गया। जितना अफसोस मुझे अपने पैर फैला कर सफर ना करने का था उससे कई ज़्यादा दुख इस बात का था कि बैग सरकाने के चक्कर मे मेरे हैडफ़ोन कानों से निकल गए और बाहरी दुनिया का शोरगुल फिर से कानों में रौद्र तांडव करने लगा।

“भाईजान, दिल्ली जाओगे?” याद नही इतनी विनम्रता से आखरी बार किसने पूछा था कुछ, शायद लोन चिपकाने वाली लड़की ने।
“ह्म्म्म”, मैंने भी सर हिलाते हुए जवाब दे दिया, और हाथों को हैडफ़ोन की तारे सुलझाने में लगा दिए।

“बढ़िया है , में भी वही जाऊंगा…क्या करते है आप?”
अब यहां पर मेरे हाथ और दिमाग तेज़ी से चलने लगे गए…ये मेरी सीट हड़पने वाला आदमी कोई मामूली आदमी नही था, ये उन लोगो में से एक था जो आपसे घंटो बिना रुके बात करने की क्षमता रखते है|

ये आपको बताएंगे कि आपके अपने शहर में फलां चीज़ मशहूर है , और कैसे मोदी की लहर के सामने सब धराशाई हो गया कैसे नोटेबन्दी ने सारे कालेधन वालो को नाको चने चबवा दिए…सफर कुछ लंबा हो तो ये मेहंदीपूर बालाजी की महिमा का भी वर्णन ज़रूर करेंगे।

तो  कुल मिला के सार ये है कि मुझे तीन चीज़े आज तक समझ नही आई: GST, सब्ज़ी वाले से ये पूछने का फायदा की “भैया ये ताज़ी है ना”, और तीसरा इन महाशय से वार्तालाप कैसे और क्यों जारी रखे।

“चाय चाय, गरमा गरम चाय” अभी मुँह खोलने ही वाला था कि एक दम स्टीक समय पर वो चाय बेचने वाला आ गया। उसका ध्यान चाय पे जो भटका मैंने शुक्र मनाया और फटाक से कान सील कर दिए अपने। दिल्ली अभी तीन घंटे दूर थी और मेरी बैटरी बस आधे घंटे की मेहमान मालूम पड़ रही थी।

चार्ज पे लगा लेता पर ये कम्बखत व्हाट्सएप्प वाले ग्रुप ने दिलो-दिमाग पर बैटरी फटने का खौफ बिठा दिया है। अब मैं मानता तो नही इस चीज़ को लेकिन फिर मानता तो मैं भूतो को भी नही हूँ, पर अंधेर सुनसान गली में गुज़रते हुए हनुमान चालीसा अपने आप प्रवाहित होने लगता है..

ऊपर बैठे हनुमान जी ने भी शायद तभी सिंगल रहने का श्राप दिया हुआ है। मानो या न मानो, लेकिन ये “अगर हुआ तो?” वाला वाक्य ही है जिसकी वजह से बड़े बड़े नास्तिको को रिज़ल्ट के समय हाथ जोड़े खड़ा देखा है।

खैर, आधा घंटा कब हुआ पता नही चला और बैटरी ने भी जवाब दे दिया, अब जवाब मुझे अच्छा लगा या नही  ये सुनने की ज़हमत नही उठाई उसने..बस आंखें मूंद गयी अपनी।

कायदे से देखा जाए तो अब तारे लपेट कर जेबों में भरने का वक़्त आ चुका था, पर राजनीति में मेरा नाम अज्ञानियों के वर्गो में शुमार होता है और क्रिकेट की बात छेड़ने के लिए बचे हुए ढाई घंटे कम थे। तो मैंने ये अनुमान लगा लिया कि बचा हुआ वक़्त में अपनी गयी गुज़री ज़िन्दगी पर विलाप करने और आगे के जीवन पर चिंतन करने में लगा सकता हूँ, सो जैसा था वैसे ही चलने दिया।

“अम्मी! मज़ाक चल रहा है इधर क्या? में दिल्ली पहुंचने वाला हूँ…अब कहाँ से वापस जाऊँ?”

आप पढ़ रहें हैं Inspirational Story in Hindi | पर्दा

अब बात में भले ही ना करूँ पर इतना ज़रूर समझ गया था कि सफर काटने लायक सामग्री का प्रबंध हो गया था, बस ज़रूरत थी कान लगाके उसका चिल्लाना सुनने की।

“अब अब्बा को नही पसंद तो मैं क्या करूँ? अब जो है वो है…हाँ-हाँ मालूम है खाला भी आएंगी तो क्या? कम से कम आप तो साथ हो न मेरे?”

उस तरफ की आवाज़ बोल क्या रही है समझ तो नहीं आ रहा था पर सवाल के बाद की चुप्पी खूब पता लग रही थी।

“अम्मी।हो ना साथ आप, मेरे?”

उस तरफ से कोई आवाज़ नही आई, पतानी वो जवाब का इंतज़ार कर रहा था या जवाब अपनाने में दिक्कत हो रही थी उसे, पर लगभग दो मिनट तक कोई कुछ नही बोला, सिवाए स्टेशन के लाउडस्पीकर के।

“अम्मी, गे होना जुर्म तो नहीं ना..अब अल्लाह ने ही ऐसे भेजा है तो कुछ सोच के ही भेजा होगा ना?”

उसका गला एकदम भर आया, कहना बहुत कुछ था उससे पर उससे कहीं ज़्यादा रोक भी रहा था, शायद सब एक साथ कह देना चाहता था। बात वो शायद अपने आप से ही कर रहा होगा क्योंकि दूसरी तरफ की खामोशी के बदले अब काल काटने की बीप बज रही थी।

अपनी सीट से उठा और बाहर चला गया एकदम से, एक बार सोचा बात कर लूँ पर देर हो चुकी थी।

तभी नज़र सामने बैठे एक बुजुर्ग से चच्चा पर पड़ी जो उंगलियो को खास कोण में मोड़कर इशारा कर रहे थे,शायद पूछ रहे थे कि क्या हुआ इसको…मैंने भी कंधो को झटकते हुए दिखाया दिया कि मालूम नहीं, एक इशारा आपके दस मिनट बचा सकता है जानकर अच्छा लगा.. पर याद नही आ रहा था कि चचा अभी प्रकट हुए या पहले के बैठे हुए थे।

“ये गे क्या होता है बेटा?”

असमंजस में फसा दिया था, करने को तो मैं कंधे भी झटका सकता था पर अब जो ‘बेटा’ बोल दिया था ,  भारतीय सभ्यता और संस्कृति खतरे में भी आ सकती थी।

“समलैंगिक…आ गया समझ?”

समझ तो अभी भी नही आया पर ताऊ ये दिखाना नही चाहते थे, सर हिला के वापस धर लिया पीछे।

“भाईजान बैग रह गया था, पकड़ाएंगे ज़रा?”

मैंने नीचे उस अनंत गुफा से सामान निकाल कर पकड़ाया और पहली बार उसकी आंखों पे नज़र पड़ी, मुँह धोकर छुपाने की कोशिश तो खूब की थी पर लाल रंग ही ऐसा है, छुपाये नहीं छुपता।

“ठीक हो आप?” अब पूछने का फायदा तो नही था कुछ पर शायद बाद मैं मलाल रह जाता।
बदले में वो हल्का सा मुस्कुराया, या यूं कहें कि सांस ज़रा ज़ोर से बाहर निकाली।

“निज़ामुद्दीन जा रहे थे भाईजान, पर क्या है ना घरवालो को हम कुछ ज़्यादा ही भाते है…तो अब्बा ने कह दिया कि  बरकत मांगने जा रहे है, मेरे जैसा आदमी जाएगा तो हुज़ूर-ऐ-पाक खफा हो जाएंगे”

“मेरे जैसा मतलब?” मैं ये दिखाना नही चाहता था कि उसकी सारी बातें सुनी थी मैंने, पर शायद उसे सब पता था पहले ही।

“क्या है ना, की जो था सब सच बोल दिया एक दिन , दुसरो से झूठ बोल भी लूँ, पर खुद को धोखे में रखना यानी खुदा को धोखे में रखना। और वैसे भी, जब अल्लाह को फर्क नही पड़ता तो इन लोगो के लिए क्यों बंद रखूं अपने आप को?”

मैं हर वक़्त सोचता हूँ कि काश मुझे बचपन से इंटीग्रेशन और ट्रिग्नोमेट्री के बदले इन परिस्तिथियों को संभालना सिखाया होता , पर शायद ना उस वक़्त इतनी समझ थी और ना आज भी इतनी अकल है।

वो कुछ सुनने की आस लगाए बैठे था मुझसे, शायद ये की उसकी कोई गलती नही थी…पर शायद गलत आदमी से उम्मीद लगा के बैठ गया वो। उस आदमी से जिसे उसके दुख से ज़्यादा इस बात की खुशी थी कि पूरी सीट अब उसकी है।
गाड़ी धीरे धीरे चलने लगी, और उससे प्लेटफार्म पे तब तक देखता रहा जब तक भीड़ में खो नही गया वो।

“एक्सक्यूज़ मी?”
पीछे मुड़ा तो एक घुंगराले बालो वाली लड़की स्लिंग बैग लेके खड़ी थी।
“कैन यु प्लीज़…” उसके पूरा बोलने से पहले ही में खिड़की से चिपक कर बैठ गया।

उसने बैग सीट पे रखा और अपनी बिसलेरी की बोतल का ढक्कन घुमाने लगी।

“डेल्ही?” मैं दिल्ली बोलता पर कही गवार न समझ बैठे इसलिए पता नही क्यों , खैर… वो हाँ बोल के मुस्कुराई और कानों में हैडफ़ोन लगा के आंखे मूंद ली, मेरी बैटरी की तरह।पतानी उसने सुना या नहीं पर मैंने उससे पूछा था कि वो क्या करती है।

अब कुछ करने को था नही तो सामने बैठे ताऊ के रेडियो पर ही ध्यानमग्न होने का सोच लिया। उस आदमी का चेहरा रह रह कर आंखों के सामने आ रहा था और कानो में गूंज रहा था मध्धम आवाज़ में रेडियो पर ये गाना
“पर्दा नहीं जब कोई खुदा से,बंदों से पर्दा करना क्या”

Inspirational Story in Hindi | पर्दा

रशीश कौल 


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Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी

साथियों नमस्कार, हिंदी शार्ट स्टोरीज में आपका एक बार फिर स्वागत है| आज हम आपके लिए एक खास कहानी “Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी” लेकर आएं हैं जिसे हमारी मण्डली के लेखक “सतीश भारद्वाज” ने लिखा है| आपको हमारी यह कहानी कैसी लगती है हमें निचे दिए गए कमेंट सेक्शन में ज़रुर बताएं|

Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी

वो फौजी के साथ ब्याह कर ससुराल आई थी| कुछ ही दिन की छुट्टी मिली थी फौजी को| फौजी जानता था कि छुट्टी ख़त्म होने के बाद कई महीने विरह की आग में जलना पड़ेगा उसे भी और उसकी पत्नी को भी|

लेकिन विरह की घडी कुछ ज्यादा ही जल्दी आ गयी| छुट्टियां रद्द कर दी गयीं थी, कारगिल में जंग शुरू हो चुकी थी| 10 दिन पहले ही आने का बुलावा आ गया|

फौजी की पत्नी के चेहेरे पर मायूशी साफ़ दिख रही थी| उसके नैनों की चंचलता खो गयी थी| भरे सागर जैसी गहरी आँखों से पानी बस बाँध तोड़कर बहने को तैयार था|

फौजी ने अपनी पत्नी को आलिंगनबद्ध किया और बोला “फौजी से ब्याह किया है तूने तो मन को मजबूत तो करना ही पड़ेगा| बस तेरा पति ही नहीं हूँ अपनी प्लाटून का सिपाही और भारत माँ का बेटा भी हूँ मैं| आँसू मत बहाना क्योंकि जब फौजियों कि बीवियों की आँखों से आँसू बहते हैं तो वो देश के देश उजाड़ जाते हैं”

उसकी पत्नी ने अपने मनोभावों को नियंत्रित करते हुए कहा “जानती हूँ ज्यादा हक तो माँ और प्लाटून का ही है आप पर, ये दुराहत तो सहना ही पड़ेगा”

फौजी ने बाहों का कसाव मजबूत करते हुए कहा “कैसी बात कर रही है? सबकी मांगो के सिंदूर सलामत रहें, भैयादुज़ पर किसी बहन के आँखों में आँसू ना हो और होई पर हर माँ ख़ुशी से व्रत रखे बस इसलिए ही तो फौजी सीमा पर खड़ा होता है”

फौजी की पत्नी के चेहेरे पर एक मुस्कान फ़ैल गयी और वो बोली “जानती हूँ और इसका अभिमान भी है फौजी,आगे भी मान रखूंगी”

फौजी ने अपनी आँखो में याचना के भाव लाते हुए कहा “कल जब मै जाऊ तो तू मुझे दुल्हन की तरह सजकर विदा करना| वैसे भी अभी तो तू नयी नवेली दुल्हन ही है”

उसकी पत्नी की मुस्कराहट में प्रेम से भरी स्वीकृति थी|

…………

फौजी को विदा करने के लिए उसकी पत्नी ने सोलह श्रृंगार किये| आज वो उस दिन से भी ज्यादा सुन्दर लग रही थी जब वो दुल्हन बनकर फेरों की वेदी पर आई थी|

फौजी ने चुटकी ली “मुझे नहीं पता था तू बनाव श्रृंगार में इतनी माहिर है| आज तुझे देखकर लग रहा है कि तुझसे सुंदर कुछ नहीं|”

फौजी कि पत्नी ने भी चुटकी ली “कहीं फौजी का मन तो नहीं डोल रहा| अपनी प्लाटून से दगा करने की तो नहीं सोच रहा|”

फौजी : ना री ऐसा तो यो मन है ही ना, प्लाटून से दगा तो ना हो पाएगी|

फौजी की पत्नी ने कहा “एक बार जीतकर आ जाओ, अपने फौजी का स्वागत आज से भी ज्यादा सुन्दर श्रृंगार करके करेगी तेरी पत्नी| ऐसा श्रृंगार जैसा किसी ने कभी ना किया होगा”

फौजी ने आश्चर्य से कहा “इससे भी ज्यादा सुंदर हो सकता है कुछ?”

फौजी कि पत्नी ने कहा “जीत कर वापस आना और खुद देख लेना”

फौजी ने प्रेम से परिपूर्ण मुस्कान से उत्तर दिया लेकिन कुछ नहीं बोला और मुडकर चल दिया|

फौजी की पत्नी ने अभिमान के साथ कहा “जीत कर ही आना फौजी”

फौजी रुका और बिना उसकी तरफ देखे कहा “हाँ जीतकर ही आऊंगा, बस ये नहीं कह सकता कि मैं तुझे आगे बढकर गले से लगाऊंगा या तू मुझे आगे बढकर गले लगाएगी”

इतना कहकर फौजी चल दिया|

फौजी की पत्नी ने उत्तर दिया “जीत कर आया तो तेरी कसम सारी लोक लाज भूलकर तुझे गले से लगा लेगी तेरी पत्नी”

फौजी ने चलते चलते ही हाथ हिलाकर अभिवादन किया|

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युद्ध चरम पर था| पता नहीं कितने घरो के चिराग अपनी आहुति दे रहे थे इस यज्ञ में| उस फौजी ने भी अपना धर्म निभाया, जो भी शत्रु उसके सामने आया वो धराशायी हो गया| जितने घाव फौजी के शरीर पर बनते थे उसका रूप उतना ही विकराल हो जाता था|

काल प्रतीक्षा कर रहा उसकी पूर्णाहुति की इस राष्ट्र यज्ञ में लेकिन शायद उसके विकराल स्वरुप को देखकर काल भी ठिठक गया| और जब तक उस फौजी ने मोर्चा ना जीत लिया काल भी उसके निकट नहीं आया| फौजी अपने प्राणों का उत्सर्ग कर चूका था उसका चेहरा तेजमय था|

………..

फौजी का मृत शरीर उके घर लाया गया| ऐसा कोई नहीं था जिसके नेत्रों से अश्रु धरा ना बह रही हो| पुरे गाँव को गर्व था फौजी की वीरता पर| पीढ़ियों तक उसकी वीरता के किस्सेगाँव का माँ बढायेंगे|

फौजी की पत्नी आई और  कपडा हटाकर फौजी का चेहरा देखा| चेहेरे पर कुछ लगा था, उसने उसे हटाया और दोनों हाथों से बलैयां लेते हुए बोली “कितनी सजती है वर्दी मेरे फौजी पर, किसी की नज़र ना लगे”

फिर उसने फौजी के शरीर को अपने अंक में ले लिया|

तभी एक हवा का झोंका आया और उसके कानो में फौजी की आवाज़ सुनाई दी “एक वादा तो निभा दिया पर दूसरा नहीं निभाया तूने, बोल रही थी कि ऐसा श्रृंगार करेगी जैसा किसी ने ना किया होगा| लेकिन तूने तो ना लाली लगाई ना सिंदूर”

फौजी की पत्नी ने तुनक कर उत्तर दिया “जा नहीं करती श्रृंगार फौजी, दुराहत कर गया ना मेरे साथ| बस माँ से ही प्यार था तुझे”

फिर उसने फौजी के चेहेरे को अपने हाथो में लेकर कहा “तेरी वीरता के मान का ऐसा श्रृंगार चढ़ा है फौजी कि अब किसी श्रृंगार की जरुरत ही नहीं| तूने अपना खून बहाया तो मैंने अपना सिंदूर वार दिया भारत माँ के चरणों में| तुझसे एक रत्ती भी कम नहीं है भारत माँ से मेरा प्यार फौजी”

फौजी की पत्नी के चेहेरे पर स्वाभिमान का तेज बिखर रहा था| एक भी आँसू नहीं था उसकी आँखों में| वो सौंदर्य की अप्रतिम प्रतिमा लग रही थी| रति और कामदेव भी ऐसा श्रृंगार नहीं कर सकते जैसा श्रृंगार उस फौजी के प्रति उसके प्रेम के अभिमान ने किया था|

Story on Soldier in Hindi | फौजी की पत्नी

सतीश भारद्वाज 


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Story on Friendship in Hindi | हैप्पी फ्रेंडशिप डे

साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए एक ऐसी कहानी ” Story on Friendship in Hindi | हैप्पी फ्रेंडशिप डे ” लेकर आएं हैं जो आपको दोस्ती के एक नए अहसास से अवगत करवाएगी| आपको हमारी यह कहानी कैसी लगती है हमें कमेंट में ज़रूर बताए|


Story on Friendship in Hindi | हैप्पी फ्रेंडशिप डे

(सब दोस्त जा रहे हैं,एक दोस्त पीछे से आवाज़ देता आता है।सब पीछे मुड़ कर देखते है।)

समीर: आज फिर तू अकेला,आयुष कहाँ है???
राज: अरे पता नही यार , इतनी देर से उसका इंतेज़ार कर रहा हूँ अब भी उस के घर से ही आ रहा हूँ।
सादिम : तो क्या कहा उसने , आया क्यों नही??
राज : अरे यार वही,एक्टिंग का भूत जो उसके सर पर सवार है, उसी वजह से उस प्रधान के भांजे के चक्कर में लगा पड़ा है। उसी के पीछे घूमता रहता है,अब हम लोगो को कहाँ पूछेगा वो!

राज के चेहरे पर अफसोस था।

सलीम : जब से यह प्रधान का भांजा साद मुंबई से आया है तब से आयुष को पता नही क्या हो गया है बस इस चक्कर में है कि किसी तरह उसको इम्प्रेस करले ताकि वह इसको मुंबई ले जा सके और यह अपना बचपन का ऐक्टर बन्ने का सपना पूरा कर सके।

समीर : हाँ और उसे मौका भी तो मिल गया उस साद को इम्प्रेस करने का, अभी जब उस का लेपटाप खराब हुआ था और गाँव में कोई नही मिला ठीक करने वाला तो उसने आयुष को बुलाया था। तब से आयुष उसके साथ ही है।

सादिम : हाँ और अब तो उसने हम लोगो का फोन भी उठाना छोड़ दिया है।

सलीम : छोड़ यार क्या अफसोस करना, जब उसको कोई फिक्र नही है तो हम लोग क्यों परेशान हों।

समीर : सलीम ठीक कह रहा है यार वैसै भी सुना है  अपने मोहल्ले वाले चाचा के बाग में आम लगे हमारा इंतेज़ार कर रहे हैं।

सादिम : ठीक है बस फिर आज का खाना चाचा के बाग़ में चल राज हम लोग चलते हैं। और तू फिक्र क्यों करता है देखना इंशाअल्लाह आयुष को अपनी गलती का अहसास जल्दी होगा।

सब दोस्त बाग की तरफ जा  रहे हैं और समीर को याद आया कि उन सब में कैसे आयुष सबसे ज़्यादा एक्साइटेड होता था बाग़ में जाने के नाम पर।

“अबे सालों जल्दी चलो क्या मर मर कर चल रहे हो वह चाचा आ गया तो गये हमारे आम आज के”

आयुष नें समीर की कमर में एक ज़ोर की धप रसीद की थी।

साले बहुत हाथ चल रहे हैं तेरे रूक तू!!!!
समीर आयुष के पीछे भागा तो रस्ते में पड़े एक पत्थर से ज़ोर का टकराया था

हाहाहा…… मिल गयी सज़ा तुझे तो पहले ही आयूष उसे देख कर हसते हुए बोला।
छोड़ूंगा नी फिर भी तुझे अब बच तू!!!!
समीर उठ कर अपने कपड़े झाड़ते हुए उसकी तरफ भागा था।

अरे समीर किधर जा रहा है इधर चलना है हमें!!!
सलीम की आवाज़ पर उसनें चौंक कर आसपास देखा था।
हाँ चल वह चुपचाप सबके साथ हो लिया

Story on Friendship in Hindi | हैप्पी फ्रेंडशिप डे

सादिम : पछली बार जब हम आए थे याद है आयुष ने क्या किया था??

बाप रे मरते मरते बचे थे तब तो….
राज को भी पिछली बार की बात याद आई थी।

“अरे बाग में बाद में जाएंगे पहले वह सामने देखो आज की दावत का इंतेज़ाम हो गया”

आयुष ने बालो को हाथ से सैट करते हुए कहा था।

राज : ओ गरीब! रहने दे बस तेरे चक्कर में हमे पिटना नही है तू जा।

आयुष : हाँ रे अम्बानी की बिसरी औलाद, पता है हमें रोज सुबह शाम नोट की बारिश होती होती है तेरे घर पे अब चल चुपचाप।

राज : देख आयुष मैं फिर कह रहा हूँ कोइ गड़बड़ ना हो जाए।
आयुष : अरे कुछ नी होगा, तू वो सामने दावत देख रहा है हम सब जाएंगे और बिरयानी साफ करके अपने रस्ते बस किसी को कुछ पता नी चलेगा कि कौन है किसी ने पूछा तो कह देंगे हम लड़के वाले हैं

सलीम : अबे ये प्रोग्राम ही बनाते रहोगे या चलोगे भी मेरे पेट में तो चूहे कूदने लगे हैं बिरयानी के ख्याल से ही….
राज : हाँ तू तो है ही भिखारियों का लीडर।
सलीम : हाँ बिरयानी के लिए वो भी बनने को तैयार हूँ बस अब चल तू।

सब खाना खा कर उठ रहे होते हैं कि एक आदमी उन सबको देख कर रूक जाता है

आदमी : कौन हो तुम सब और कहाँ से आए हो देखे से भी नही लग रहे मुझे तो!!!

आयुष : जी हाँ हमें भी याद नही आ रहा है कि हमने आपको कभी देखा हो।

आदमी : तो आए कहाँ से हो तुम लोग ये बताओ???

और प्लान के मुताबिक़ आयुष ने कह दिया कि लड़के वालों की तरफ से हैं।

आदमी : कौन से लड़के वाले ???

आयुष : वही लड़का जिसकी शादी का यह खाना हो रहा है।

आदमीं : अच्छा तो जिसकी शादी का यह खाना है उस लड़के की तरफ से हो तुम ???
आयुष ने हाँ में सर हिला दिया

आदमी : और तुम सारे????
जी हाँ हम सब भी इसके साथ ही हैं, सब ने एक साथ सर हिला दिया

अच्छा ये बात है रुको तुम लोग फिर तो इनाम ले कर जाना अगर लड़के वाले हो ,ओय छोटू सुन इधर आ।
उस आदमीं ने एक लड़के को हाथ के इशारे से बुला कर उन सब की तरफ इशारा किया था ।

यह सब लड़के वालो की तरफ से हैं मतलब कि हमारे मेहमान हैं खाना खा लिया है इनहोने बस अब प्रसाद देना है इनको जा तू मेरे कमरे से लेकर आ प्रसाद वही रखा है चारपाई पर।

उस आदमीं ने छोटू को अन्दर जाने का इशारा किया तो उन सब के दिमाग में खतरे की घंटी बजी थी।
और वह खतरा सच भी साबित हो गया जब वह छोटू अन्दर से प्रसाद की जगह एक मोटा सा डन्डा ले कर हाजिर हुआ था।

अबे भागों सालों नही तो मरने के बाद घर वालों को लाश भी नही मिलेगी!!!!!!!!
आयुष ने चिल्लाते हुए सबको भागने का इशारा किया था।

“रुक जाओ तुम सबको तो मैं बताता हूं बारात का खाना खाने आऐ थे ना तुम, बताता हूं अभी कि यह तेरहवीं है बारात नही”

वह आदमी उन सबके पीछे लठ लेकर भागते हुए बोला था

“और उसका तो लठ ही इतना सालिड था कि एक भी पड़ जाता तो तीन साल उठते नही हम लोग”
सलीम को भी पूरा सीन हू बा हू याद आया था।

( राज का फोन बजता है, उसके घर से फोन है)
राज : चलो यार अभी चलता हूँ माँ ने बुलाया है कल मिलते हैं ।
सादिम : हाँ चलो हम सब भी कल मिलते हैं बाय।
सब चले जाते हैं।

अरे सादिम कल तो तेरा ब्रथ डे है ना???

सब इकट्ठे बैठे हुए थे जब सलीम को याद आया था।

सादिम : हाँ तो वही चलते हैं कल, अपनी वाली जगह।

समीर : आयुष को भी पूछ लेते हैं एक बारी!!!

सादिम नहीं आएगा वह देख ले तु भी कोशिश करके (समीर आयुष को फोन करता है)

Story on Friendship in Hindi | हैप्पी फ्रेंडशिप डे

आयुष: हाँ समीर बोल??

समीर : कहाँ है यार तू?? तेरे घर जाओ तो ना मिलता फोन करो तो फोन नहीं उठाता है हुआ क्या है तुझे???

आयुष: हाँ यार बस टाईम ही नहीं मिलता है क्या करुं!!

सादिम :अच्छा ठीक है, तुझे याद है ना कल मेरा ब्रथ डे है तो कल हम सब लोग वही चल रहे हैं जो फिक्स है अपना रेस्टारेंट तू आ जाना सुबह ही।

आयुष: कल अरे सारी यार कल तो नही जा सकता कोई बात नहीं तुम लोग चले जाओ में फिर कभी चला जाऊंगा एक ज़रुरी काम है मुझे कल!

ठीक है यार मत आ मर्जी तेरी!
राज ने पूरी बात सुनने से पहले ही सादिम के हाथ से लेकर फोन काट दिया!

सब इक्टठे बैठे बात कर रहे हैं कि सलीम का फोन बजता है।

मोबाइल की सक्रीन पर आयुष का घर वाला नम्बर देख कर वह हैरान होता है!
हाँ आयुष बोल??
वह फोन उठाते हुए बोला था

लेकिन दूसरी तरफ से कुछ ऐसा कहा गया था कि वह फौरन उठ कर खड़ा हो गया और राज को भी उठा कर खड़ा कर दिया
क्या हुआ भाई कुछ बता तो सही
सादिम और समीर ने एक साथ पूछा

“आयुष के पापा को हार्ट अटैक हुआ है और घर पर कोई नही है, आयुष भी नही! अंकल ने खुद ही कैसे करके फोन किया है हमें अभी चलना है फौरन”।

सलीम ने एक ही साँस में पूरी बात बता दी!
“चल फिर हम लोग भी चलते हैं ”

वह दोनो भी उठ खड़े हुए!

नहीं तुम दोनों डॉक्टर को लेकर आओ तब तक हम लोग जाकर अंकल को देखते है, राज तू बाइक निकाल।
सलीम कहते हुए बाहर निकल गया।

डाक्टर साहब क्या हुआ है ,खतरे की तो कोई बात नही है??

डाक्टर के चेकअप करने के बाद सलीम ने डाक्टर से दवाई का पर्चा लेते हुए पूछा था।

डाक्टर : अब खतरे की कोई बात नही है मैंनें इंजेक्शन दे दिया है बस इनका ख्याल रखें और अकेले बिलकुल ना छोड़ें ऐसे पेशेंट का अकेले में बी पी ज्यादा हाई हो जाता है ।

सादिम : ठीक है डाक्टर साहब बहुत शुक्रिया आऐं मैं आपको बाहर तक छोड़ दूं।

(तभी आयुष आता है)

सलीम भाई कैसे हैं पापा ??

आयुष आँखों में आँसू लिए पापा के सरहाने बैठ गया।

सलीम : वह सो रहे हैं अभी अभी डाक्टर ने उनहें नीन्द का इंजेक्शन दिया है तु फिक्र ना कर सब ठीक है।

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बहुत शुक्रिया यार तुम लोगों का!!! आयुष उठ कर सलीम के गले लग गया।

अच्छा साले!अब तू हमारा शुक्रिया करेगा!!!

कोने में खड़ा राज भी उन दोनों की तरफ आया था।

तेरे पापा हमारे कुछ नी लगते क्या ???

समीर भी बोला तो आयुष नें नम आँखों से अपने दोस्तो को देखा था।

आयुष : सादिम कहाँ है ???

सलीम : वह डाक्टर को छोड़ने गया है। दवाई का पर्चा भी उसके पास है , आ रहा है वह दवाई ले कर।

आयुष : यार मेरी समझ मे नही आ रहा कि मैं कैसे तुम लोगों का शुक्रिया करुं!!!

(सादिम आता है)

शुक्रिया मत कर यह ले दवाई और अंकल का पूरा ख्याल रख और बस टाईम से उनहें दवा देते रहना।

उसके बाद सब चले जाते हैं।

सादिम : आज मूवी देखने चलते हैं।
राज : ठीक है पर आयुष के बिना मज़ा नही आएगा।

“तो मेरे बिना जाना क्यों है ,मै भी चलता हूँ साथ में”
पीछे से आयुष की आवाज़ सुनकर सब ने मुड़ कर देखा था।

समीर : तू कब आया?
आयुष : अभी जब तुम लोग मुझे  याद कर रहे थे।
समीर : हम तो याद करते ही रहते हैं तू ही भूल गया है हमें।

” मुझे माफ करदो यार जो भी मैंने किया उसके लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ”
आयुष ने हाथ में पकड़ा लेप्टाप साइड में रखकर माफी माँगी।

“दोस्तों में यह माफी नही चलती”।
सलीम उसके दोनो हाथों को खोलते हुए बोला था।

“तुझे एहसास हो गया यही काफी है” सादिम ने भी उसके शर्मिंदगी के एहसास को कम किया।
राज : आज तो वैसै भी दोस्तों का दिन है तो आज के दिन सारी नाराज़गिया खत्म।
आयुष : कितना खुश किस्मत हूँ मैं कि तुम सब जैसे दोस्त मिले हैं जो जीते जी ही नही मरने के बाद भी मेरा साथ नही छोड़ेंगे।

सादिम : अरे तू टेंशन ही ना ले मरने के बाद भी हम सब साथ मिल कर ऐसे ही सब को सताया करेंगे जैसै अभी सताते हैं।
राज : और उसी तरह छुप कर चाचा के बाग से आम भी तोड़ेगे जैसे अब तोड़ते हैं।

आयुष : तो चलो फिर इसी बात पर हमेशा की तरह थ्री चियरस हो जाए।
हो जाए!!!!! सब एक साथ बोले थे।
हिप हिप हुर्रे
हिप हिप हुर्रे
हिप हिप हुर्रे

आयुष : यह लो शाम की फिल्म की टिक्ट हम सबकी। और एक और चीज़ भी है।
राज : क्या है???
आयुष : लेप्टाप खोलकर अपनी खुद की बनाई हुई वीडियो प्ले करता है जिसमें उसने उन सब के फोटोज़ एडिट किए हुए थे।

सलीम : यह देखो सादिम ने कैसे मुँह बनाया हुआ है इसमें।

सब हँसने लग जाते हैं।

Story on Friendship in Hindi | हैप्पी फ्रेंडशिप डे 

Afariya Faruqui


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