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प्रेम पर कविता | अपने से नहीं लगते हो

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साथियों नमस्कार, आज हम आपके लिए हमारी मण्डली की लेखिका अनीता दयाल की लिखी एक खास कविता “प्रेम पर कविता | अपने से नहीं लगते हो” लेकर आएं हैं आशा है आप सभी को पसंद आएगी| आप सभी से अनुरोध है की आप कृपया अपने घरों में ही रहें और हमारी वेबसाइट पर कहानियों और कविताओं का आनंद लें|

प्रेम पर कविता | अपने से नहीं लगते हो

सुनो ना अब तुम अपने से नहीं लगते हो,
देखना चाहुं कैसे भी, ना जाने क्यों पहले से नहीं दिखते हो।
सुनो ना अब तुम अपने से……

जब भी बातें होती है अब, मेरी -तुम्हारी होती है।
ना जाने क्यों अब तुम्हारी बातों में अब हम, हम नहीं लगते।
सुनो ना अब तुम अपने से…..

मिलकर भी ऐसे मिलते हो, क्यों लगता है आज कल,
मन में किसी और को लिए फिरते हो।
सुनो ना क्यों अब तुम अपने से से नहीं लगते हो।

देख – जानकर भी सब कुछ जो में खुद को बहलाती थी।
हम एक नहीं है, तुमने कहा, फिर मेरे सारे हक़ क्यों खोये से लगते हैं। .
खुद को कितना भी बहलाऊ, लेकिन सुनो ना अब तुम अपने से नहीं लगते हो…

दिखता हैं बहुत कुछ, अब हमसे छुपाये बैठे हो…
में नहीं हूँ उन सपनो में, जिन्हे तुम सजाये से बैठो हो।
कहते हो अपने हो फिर, सुनो न क्यों अब तुम अपने से नहीं लगते हो।

अनीता दयाल
नई दिल्ली 


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