बच्चों की तिन कहानियां | Kids Story in Hindi

Kids Story in Hindi

बच्चों की तिन कहानियां | Kids Story in Hindi


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                    १ ) वफादार नेवला | Kids Story in Hindi

एक राज्य में एक ब्राम्हण और उसकी पत्नी अपने एक बच्चे के साथ मज़े से रहते थे| राज्य में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी| उस राज्य का राजा अपनी प्रजा का बहुत खास ख्याल रखता था| ब्राम्हण नगर में भिक्षाव्रत्ति कर के अपने परिवार का पालन पोषण करता था|

एक सुबह ब्राम्हण की पत्नी नहाने के लिए तलब पर गई और ब्राम्हण को पुत्र का ध्यान रखने का कह गई| ब्राम्हण ने अपने बच्चे को सुलाया और उसके पास बेथ कर उसके सर पर प्यार से हाथ फेरने लगा| तभी वहां राजा का एक सिपाही आ पहुंचा| राजा के सिपाही ने ब्राम्हण से कहा “हे ब्राम्हण देवता, महाराज ने आज आपको भिक्षा देने के लिए खास आमंत्रित किया है| महाराज की आगया पाकर में आपको महल चलने के लिए आमंत्रित करता हूँ|

सिपाही की बात सुनकर ब्राम्हण धर्म संकट में फस गया| ब्राम्हण ने सोचा में महाराज की आगया का उलंघन नहीं कर सकता लेकिन यहाँ पुत्र को भी अकेला नहीं छोड़ सकता| अगर में नहीं गया तो कोई और ब्राम्हण आकर रजा से भिक्षा ले जाएगा और आज मुझे व् मेरे परिवार को भूखा ही सोना पड़ेगा| लेकिन इधर उसका बाचा भी घर में अकेला था|

तभी उसे अपने पाले हुए पालतू नेवले का ख्याल आया….

क्यों ना में अपने पालतू नेवले को बच्चे की रक्षा की ज़िम्मेदारी सोंप जाऊ| इसी बिच में राजा से भिक्षा लेकर भी आ जाऊंगा| ब्राम्हण को यह उपाय कारगर लगा| इसलिए अपने पालतू नेवले को बच्चे की रक्षा की ज़िम्मेदारी सोंप कर वह राजा से भिक्षा लेने सिपाही के साथ निकल पड़ा|

इधर ब्राम्हण के जाते ही घर में एक बड़ा कला सांप घुस गया और उस बाचे को डसने के लिए आगे बढा| नेवले को जैसे ही घर में सांप की भनक लगी तो उसने बिना डरे सांप पर हमला कर दिया और सांप को लहू-लुहान कर मार दिया| लेकिन इसी बिच वह खुद भी सांप के हमले से लहू-लुहान  हो गया|

ब्राम्हण जैसे ही महल से भिक्षा लेकर अपनी कुटीया की और आया उसने नेवले को खून से लथपथ देखा| ब्राम्हण  समझ गया की हो ना हो इस नेवले ने मेरे साथ धोखा किया है और मेरे बच्चे को मरकर उसकी हत्या कर दी है| ब्राम्हण  के बस सोचने भर की देर थी| वह गुस्से से आग-बबुला हो गया और पास पड़े डंडे से नेवले को मरना शुरू कर दिया| ब्राम्हण  ने नेवले पर तब तक डंडे से प्रहार किया जब तक की नेवला मर ना गया|

जैसे ही नेवले ने अपने प्राण न्योछावर किये, ब्राम्हण को  अपने पुत्र की याद आई| लेकिन जैसे ही वह कुटीया के अन्दर गया तो उसने देखा कि उसका पुत्र तो आराम से सो रहा है और उसके पुत्र के पास ही खून से लथपथ एक सांप पड़ा है|

ब्राम्हण को सारी बात समझ आ गई, कि  नेवले ने उसके पुत्र की जान बचने के लिए अपने प्राणों की परवाह किये बगेर सांप को मर दिया और मुझ पापी ने उसे ही मार डाला| ब्राम्हण अपने किये पर बहुत पछता रहा था लेकिन तब तक उसका पालतू नेवला उसी के हाथो मर चूका था|

कहानी का तर्क यही है, कि भैया कछु भी हो जाए किसी को गुस्सा दिलाना नहीं और किसी पर गुस्सा करना नहीं (समझे मास्टर जी)

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                       २ ) मुर्ख कछुआ | Kids Story in Hindi

एक तालाब में एक कछुआ सालों से रहता था| उसी तालाब के किनारे दो हंस भी शिकार की तलाश में रोज़ आया करता थे| काफी समय से हंसों के रोज़ आने से कछुए और दोनों हंसों के बिच में गाढ़ी मैत्री हो गई| अब जब भी हंस तालाब की और आते कछुआ तालाब से निकल कर दोनों से खूब मस्ती करता|

एक दिन तिन मछुआरों  की नज़ उस तालाब पर पड़ी| दोनों एक दिन तालाब का मुआयना करने आए| जिस वक़्त मछुआरे उस तालाब का मुआयना कर रहे थे, तब कछुआ भी अपने मित्रों से मिलने तालाब के बहार आया हुआ था| कछुए ने दोनों मछुआरों की बातो को सुन लिया|

तालाब का मुआयना करते हुए एक मछुआरे ने दुसरे मछुआरे से कहा “भाई, इस तालाब में तो बहुत सारी मछलियाँ है|” इस पर दूसरा मछुआरा बोला “भाई, इस तालाब में सिर्फ मछलियाँ नहीं है…यहाँ कछुए भी है|” यह सुनकर तीसरा मछुआरा बोला “तो फिर तय रहा, हम कल सुबह ही इस तालाब में जाल डालेंगे| अभी काफी देर हो गई है, रात के वक़्त जंगल में रुकना ठीक नहीं…चलो चलते हैं|”

मछुआरों की बात सुनकर कछुआ घबरा गया और अपने मित्रों से सहायता के लिए कहा| कछुए की बात सुनकर पहला हंस बोला “धेर्य रखो मित्र, कल की बात कल सोचेंगे| क्या पता वह मछुआरे कल आएँगे भी या नहीं| और अगर मछुआरे आए तो तुम्हें बचाने का भी कोई न कोई उपाय सोच ही लेंगे|

हंस की बात सुनकर कछुआ बोला “संकट की घडी में तो तुम दोनों पंख फैलाकर उड़ जाओगे लकिन में बे-मौत मारा जाऊंगा| तुम कोई एसा उपाय सोचो के में भी तुम्हारे साथ किसी दुसरे तालाब में जल्दी ही पहुँच जाऊ|

कछुए की बात सुनकर दूसरा हंस बोला “मित्र, तुम्हारी गति तो काफी धीमी है| तुम किसी दुसरे तालाब में कैसे पहुंचोगे|

हंस की बात सुनकर कछुआ बोला, “मित्र कोई एसा उपाय सोचो की संकट की इस घडी में, में भी तुम्हारे से=थ ही आकाश मार्ग से उड़ कर किसी दुसरे तालाब में पहुँच जाऊ|

कछुए की बात सुनकर पहला हंस बोला “यह असंभव है, तुम कैसे उड़ सकते हो|

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इस पर दूसरा हंस बोला “मित्र, तुम घबराओ मत| यह संभव हो सकता है की तुम भी हमारे साथ आकाश मार्ग से उड़ कर किसी दुसरे तालाब में पहुँच जाओ| लेकिन उस उपाय में थोडा खतरा है|

हंस की बात सुनकर कछुआ बोला, “जान बचाना है तो खतरा तो उठाना ही पढ़ेगा| तुम केवल उपाय बताओ|

कछुए की बात सुनकर हंस बोला “तो सुनो, हम लकड़ी के एक डंडे को अपने पंजो के सहारे दोनों और से पकड़ लेंगे|और तुम अपने मुह से उस डंडे को पकड़ के लटक जाना|  इस तरह हम उड़कर किसी दुसरे तालाब तक पहुँच जाएँगे| लेकिन जब हम तुमको अपने साथ लेकर उड़ेंगे तो निचे से बहुत से लोग हमको देखकर कुछ न कुछ बोलेंगे| उस वक़्त तुमको अपना मुह नहीं खोलना है| क्यों की मुह खोलते ही तुम निचे आ गिरोगे और तुम्हे पता है इतनी उचाई से निचे गिरने पर तुम्हारा क्या होगा|

हंस की बात सुनकर कछुआ राजी हो गया|

अगले सवेरे तडके दोनों हस कछुए को लेकर दुसरे तालाब की और निकल पड़े| रास्ते में लोग उन्हें देखकर तरह-तरह की बाते करने लगे और बचे आश्चर्यचकित  होकर उनके पीछे दौड़ने लगे| उन बच्चों को अपने पीछे दौड़ता देख कछुआ नाराज हो गया और उसने जौर से कहा “भाग जाओ”…..

कछुए के मुह से सिर्फ “भाग” निकला, इतने में कछुआ धडाम से ज़मीन पर आ गिरा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए |

तो भैया कहानी का तर्क यह है “कि मुर्ख दोस्त से तो विद्वान क्षत्रु अच्छा ( समझे कुछ )

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                                                ३ ) सुनहरे हिरन

एक वन में दो सुनहरे हिरण रहते थे| दोनों हिरण जंगल के अलग-अलग छोर पर रहते थे| सभी हिरनों से अलग होने के कारण उन दोनों को हिरणों ने अपना सरदार मान रखा था| दोनों के जंगल के अलग-अलग छोर पर अपने-अपने दल थे|

जंगल के पास ही एक राज्य था| उस राज्य के राजा को शिकार करने का बहुत शोक था| वह प्रायः ही अपने लाव लश्कर के साथ जंगल की और निकल आता| राजा के सभी सैनिक और मंत्री राजा के इस शौक से बहुत परेशान थे| एक दिन राजा के सभी सैनिकों ने जंगल के सभी हिरणों को घेर कर राजा के बगीचे में लेन का फैसला किया ताकि असमय उनको राजा के साथ जंगल में ना जाना पड़े|

अगली सुबह राजा के सैनिकों ने जंगल के सभी हिरणों को घेर कर रजा के बगीचे में इकठ्ठा कर दिया| सभी हिरनों के साथ वो दो सुनहरे हिरन भी राजा के बगीचे में पहुँच गए|अब राजा का जब भी मन होता वो अपने बगीचे में जाकर हिरणों का शिकार कर लेता| लेकिन राजा उन दो सुनहरे हिरणों का शिकार नहीं करता था| धीरे-धीरे राजा के शिकार की वजह से हिरणों की संख्या कम होने लगी| दोनों सुनहरे हिरणों ने विचार किया की क्यों ना राजा से जा के बात की जाए|

अगले दिन दोनों हिरण राजा के दरबार में पहुँच गए| हिरणों ने राजा से विनती की, कि असमय शिकार के कारण हिरणों की प्रजाति पर संकट आ गया है| यदि आप इसी तरह हमारा शिकार करते रहे तो हमारा तो वंश ही समाप्त हो जाएगा| इसलिए आपसे प्रार्थना है की हम रोज आपके पास एक हिरन भेज दिया करेंगे ताकि आपका काम भी चल जाएगा और हमरा वंश भीं ख़त्म नहीं होगा|

राजा को हिरण का विचार अच्छा लगा| राजा ने तुरंत हिरन के प्रस्ताव पर हाँ कर दी| अब रोज एक-एक हिरन राजा के पास शिकार होने जाने लगे|

इसी तरह एक दिन एक गर्भवती हिरणी की बरी आई, उसने सुनहरे हिरन से जाकर प्रार्थना की, कि अगर में कुछ दिन और जीवित रही तो में एक और हिरन को जन्म दे सकुंगी जिससे हमारा वंश बढेगा| सुनहरे हिरन को हिरणी की बात समझ में आ गई| इसलिए उस रोज वो खुद राजा के समक्ष शिकार होने पहुँच गया|

राजा ने जैसे ही सुनहरे हिरन को देखा तौसने सुनहरे हिरण का शिकार करने से मन कर दिया और सुनहरे हिरण से किसी और हिरण को भेजने को कहा|

सुनहरे हिरन ने राजा से विनती की, कि आज जिस हिरणी कि बारी थी वह गर्भवती है| अगर वह कुछ दिन और जीवित रही तो वह एक और हिरण को जन्म देगी जिससे की हमारा वंश बढेगा| अतः महाराज से प्रार्थना है की आप मेरा शिकार कर दें और उस हिरणी को कुछ दिन और जीवित रहने दें|

राजा को सुनहरे हिरण की बात सुनकर अपनी गलती पर पछतावा हुआ और उसने सभी हिरनों को वापस जंगल में भेजने की अनुमति दे दी|

तो भाई लोग कहानी का तर्क यही है, कि जानवरों के अन्दर भी जान होती है, उन्हें भी दर्द होता है| इसलिए जानवरों पर दया करो! (तुम तो वैसे भी इन्सान हो, समझदार हो)

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