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Funny Story in Hindi | जिओग्राफी की कॉपी

Funny Story in Hindi | जिओग्राफी की कॉपी

साथियों नमस्कार, स्वागत है आपका हमारे आज के इस खास आर्टिकल “Funny Stories in Hindi में जिसमें हम आपके लिए कुछ चुनिन्दा Funny Story लेकर आएं हैं जिन्हें आप अपने watsapp या instagram पर शेयर कर सकते हैं! पढ़िए हमारा खास आर्टिकल…


9th में हम Geography की कॉपी नहीँ बनाये थे और कॉपी चेक कराने का भयंकर Pressure था, 
मैडम भी बड़ी सख्त थीं….

पता चलता उनको तो उल्टा ही टांग देतीं,
पूरे 9 chapter हो चुके थे लड़के 40 40 वाले रजिस्टर भर चुके थे और हमपर जो भी था एक रफ़ कॉपी में ही था,

2 रात को ससुर एक मिनट नींद नहीं आयी, ऊपर से बापू को पता चलने का डर…और उसी साल बापू ने दुनाली का license भी लिया था

चेकिंग का दिन आया, मैडम ने चेकिंग शुरू की….18 रोल नंबर वालों तक कि कॉपी चेक हुईं और घंटा लग गया, हमने राहत की सांस ली…तभी मैडम ने जल्दी जल्दी में कहा कि सभी बच्चे कॉपी जमा करके दे दो मैं चेक करके भिजवा दूंगी…

तभी हमारा शातिर दिमाग घूमा,
हम भीड़ में कॉपियों तक गए और जैसे बीजगणित में मान लेते हैं न ठीक वैसे ही हमने मान लिया कि कॉपी हमने जमा कर दी

अब कॉपी का टेंशन मैडम का

2 दिन बाद सबकी कॉपी आयीं, हमारी नहीं आयी…आती भी कैसे

अब हम गए मैडम के पास की मैडम हमारी कॉपी नहीं आयी, वो बोलीं की मैं चेक कर लूंगी staffroom में होगी,

अगले दिन हम फिर पहुच गए कि मैडम हमारी कॉपी, मैडम बोलीं कि स्टाफरूम में तो है नहीं मेरे घर रह गयी होगी कल देती हूँ,
हमने कहा ठीक है,

अगले दिन हम फिर….मैडम कॉपी मैडम बोली कि बेटा मेने घर देखी थी, आपकी कॉपी मिल गयी है… आज मैं लाना भूल गयी, कल देती हूँ!

मैंने कहा वाह …कमाल हो गया, हमारे बिना submit किये ही कॉपी मैडम के घर पहुँच गयी

अगले दिन हम फिर…मैडम कॉपी, मैडम याद भी करना है

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और यूँ हमने 5 दिन तक मैडम को torture किया, फिर मैडम ने हमको स्टाफरूम में बुलाया और ज्यों ही बोला की

“देखो बेटा…आपकी कॉपी हमसै गलती से खो गयी है”

हमने ऐसा मुरझाया मुंह बना लिया जैसे पता नहीं अब क्या होगा और कहा “मैडम अब क्या होगा,
हम इतना दोबारा कैसे लिखेंगे, याद कैसे करेंगे….एग्जाम कैसे देंगे, इतना सारा हम फिर से कैसे लिखेंगे” वगैरह वगैरह झोंक दिया

मैडम ने ज्यों ही कहा “बेटा तुम चिंता न करो, दसवें चैप्टर से कॉपी बनाओ और बाकी दोबारा मत लिखना, वो हम बंदोबस्त कर देंगे” समझ लो ऐसे लगा जैसे भरी गर्मी में कलेजे पर बर्फ रगड़ दी हो किसीने!

मानो 50 किलो का बोझा सिर से उतर गया हो, मैडम के सामने तो खुशी जाहिर नहीं कर सकते थे लेकिन
मैडम के जाते ही तीन बार घूँसा हवा में मारकर “Yes…Yes…Yes” बोलकर अपन टाई ढीली करते हुए आगे बढ़ लिए |

अगले दिन मैडम उन 9 चैप्टर की 80 पेज की फोटोस्टेट लेकर आयीं और हमें दी कि ये लो बेटा, कुछ समझ न आये तो कभी भी आकर समझ लेना|

उसी दिन हमें अपनी असली शक्तियों का एहसास हुआ कि अपनी पर आएं तो हम अच्छे अच्छन को बेवकूफ बना सकते हैं|

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“हर आदमी के कमियाबी के पीछे औरत का हाथ होता है”

थाईलैंड की एक होटल कंपनी के मालिक ने, अपने ग्राहकों के सामने एक शर्त रखी कि मगरमच्छों से भरे तालाब में जो आदमी मगरमच्छों से बचकर बाहर निकल जाएगा उसको 5 करोड रुपए इनाम के तौर पर दिया जाएगा और अगर उस आदमी को मगरमच्छ ने खा लिया
तो उसके परिवार को दो करोड रुपया दिया जाएगा !

यह सुनकर सभी लोग भयभीत हो गए ! किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह तालाब में कूद सके ! तभी एक जोरदार आवाज आती है…लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया, यह क्या, किसी आदमी ने तालाब में छलांग लगा दी थी ! लोगों की सांसे थम गई और सभी लोग उस आदमी की तरफ देखने लगे !!

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वह आदमी पूरी तरह से तालाब में जद्दोजहद कर रहा था ! बिजली की फुर्ती से, वह पानी को चीर कर आगे बढ़ रहा था ! सभी लोग उसको बहुत ध्यान से देख रहे थे !

अब यह आदमी मगरमच्छ का निवाला बनेगा ! वह देखो मगरमच्छ उस आदमी के पीछे ! मगर उस आदमी ने हिम्मत नहीं हारी वह पूरी तरह जद्दोजहद कर रहा था बाहर निकलने की ! तभी वह आदमी पानी को चीरता हुआ, दूसरे किनारे से बाहर निकल जाता है !

उस आदमी को पूरी तरह सांस भी नहीं आ रही थी ! सभी लोग भाग कर उसकी तरफ गए ! लोगों ने ताली बजाना शुरू कर दिया !  जब उस आदमी को थोड़ा होश आया और उसे पता चल गया कि वह करोड़पति बन गया है, उसके मुंह से पहली आवाज निकली, ”पहले यह बताओ मुझे धक्का किसने दिया था ?” 

तभी तलाब के पास खड़ी भीड़ में, एक औरत ने हाथ खड़ा किया ! वह औरत, उस आदमी की बीवी थी ! उसने कहा, ”तुम काम के तो हो नहीं,
अगर बच गए तो 5 करोड़, मर जाते तो 2 करोड़ दोनों तरफ फायदा तो मुझे ही होना था !”

तब से यह कहावत बन गई, ”एक कामयाब व्यक्ति के पीछे, एक औरत का हाथ होता है”
बोलो राधे राधे

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उम्र 26 की | Funny Story in Hindi

यकीन मानिये पूरा दिन बिलकुल सामान्य सा था  इस दिन में कार्यालय भी गया| लेकिन वहां कुछ मन नहीं लगा और जल्दी ही मध्ह्यानः के बाद वापस आ गया | घर पहुंच के खाना वाना खाया और चाय शाय भी पीया| थकान जैसा लगा रहा था | तो सोच थोड़ा बिस्तर पे लेट लूं|

थोड़ी देर बाद किसी का प्रवेश होता है पहले लगा की जैसे कोई नयी रोशनी सी चमक गयी पूरे कमरे में, समझ ही नही पा रहा था की आखिर हो क्या रहा है | वही फिल्मों की तरह पायल वाली आवाज और धीरे धीरे चलना , शायद मैं पहले ही आ गया था रूम में | लेकिन कोई नहीं उम्र भी तो २७ की हो चली है अब कहाँ इतना ज्ञान है इन सब रीति रिवाजों का |

तो ग्लास का दूध रखा गया और शर्मा के एक आवाज आती है क्या जी आज के के दिन भी काम काम | आखिर बीमारी का ही बहाना बना लेते और छुट्टी ले लेते |

मैंने कुछ कहना चाहा लेकिन आवाज ही नही निकली थोड़ा जोर लगाया तो उसने कहा चलो छोड़ो इन बातो को और दूछ पी लो | मुझे भी कोई आश्चर्य नहीं , क्यूंकि अब उम्र भी तो ही गयी है २७ की, अब कहाँ इन सब रीति रिवाज़ों का पता है की कौन पहले बोलता है |मैंने भी सटाक्क से दूध पीया और और लेट के ही निहारने लगा |

उसने सर पे हाथ फिराया और बोला अब उठ के बैठ भी जाओ इतना भी क्या थके हुए हो , मैंने जैसे ही उठने के लिए जोर लगाया वैसे ही किसी ने पीछे से जोर से मारा और बोला , “ ये शाम को कोई सोने का समय है उठा जा जाके देखो पापा बुला रहें हैं, किसी लड़की की फोटो आयी है शादी के लिये , पता नहीं ये कौन सी हीरोइन कहाँ बैठी है सामने ही नहीं आ रही है, ये तुम्हारी शादी बस एक बार हो जाए तो गंगा नहा लू ” . पलट के देखा तो मम्मी हैं |

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चार रुपए पैंतालीस पैसे | हास्यास्पद कहानी

सच्चा और रोचक किस्सा , सन 1975

हमारे विशाल संयुक्त परिवार में हम पांच भाई…दो भाई सूरत शिफ्ट हो चुके थे. तीसरा अभी स्कूल में पढ़ रहा था| मैं और मेरे बड़े (कज़िन) भाई साब , मुझसे ढाई साल बड़े …

हम दोनों बारहवीं यानी इंटर में , F. R .I इंटर कॉलेज बरेली में “पढ़ते” थे , और घर में एक ही कमरा शेयर करते थे , हमारा दोस्तों जैसा व्यवहार था|

(अब ये मत पूछिए की भाईसाब ढाई साल बड़े और हम दोनों एक ही क्लास में क्यों थे ??? )

भाई साब मुझसे उम्र और अनुभव दोनों में मुझसे आगे थे| निहायत ही खूबसूरत व्यक्तित्व के मालिक ,ऊंचा क़द ,गोरे चिट्टे और बिल्लौरी आंखें (इसिलए घर मे उन्हें बिल्लू कहकर बुलाते थे) उस पर बारीक फ्रेम का चश्मा .कुर्ते पायजामे के ऊपर जैकेट में उनका व्यक्तित्व देखते ही बनता था|

पहली नज़र देखने में उच्च कोटि के ज्ञानी या फिलॉसफर होने का भरम होता था ,मगर तभी तक , जब तक अपना मुँह नहीं खोलते थे| बात करते ही उनका “भोलापन” टपकने लगता था और उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व की ऐसी तैसी हो जाती थी| हवाई किले बनाना उनका पसंदीदा शौक़ था और “हवाई फायरिंग” करने में माहिर थे|

एक दिन रात के समय कंघी से पीठ खुजाते हुए बोले – यार इस साल अपने कॉलेज के प्रेसिडेंट का इलेक्शन लड़ने का मन है| मैंने कहा – भाईसाब दिमाग़ ठिकाने पर है कि नहीं ? ये इलेक्शन विलेक्शन आपके बस का काम नहीं है|

अरे , छः साल से इस कॉलेज में हूँ , कॉलेज का बच्चा बच्चा मुझे जानता है हंड्रेट परसेंट जीत के आऊँगा| इत्ते पैसे कहाँ से लाओगे ? मैंने पूछा…

उसकी चिंता तुम मत करो , वो कुमार टॉकीज़ वाला पेंटर है न , हुसैन ? उससे मेरी बात हो गई है ,चार फुट बाय छः फुट के पब्लिसिटी के लिए फ्रेम दे देगा ,फ्री में पेंट करेगा …बाद में चाय पानी के पैसे दे देंगे| वैसे भी हुसैन ख़ाली बैठा है ऋषि कपुर की “लैला मजनू” छः महीने से लगी हुई है, उतरने का कोई चांस नहीं है

हुसैन भाई फिल्मों के जीवंत पोस्टरअपने हाथों से बनाते थे| और बाकी के पैसे कहाँ से आएंगे ? मैंने पूछा

“उधार की कौन सी माँ मर गई है ” और जीत गए तो वैसे भी कोई मांगने नहीं आएगा , किसकी हिम्मत होगी मांगने की , बोलो ???

बहुत समझाया लेकिन, भाईसाब के ज़ेहन में इलेक्शन लड़ने का ब्लू प्रिंट तैयार था| भाईसाब ने एक न सुनी और अध्यक्ष के लिए नामांकन भर दिया|

कुल पाँच विद्यार्थियों ने नामांकन पत्र दाख़िल किया| कॉलेज के नए प्रिंसिपल जनाब इफ़्तेख़ार अली अहमद काफी तेज तर्रार और सख्त मिजाज़ थे| उन्होंने नया आदेश जारी कर दिया जिसके अनुसार इस बार कॉलेज के चुनाव शांतिपूर्ण हों इसलिए हर छात्र के बदले केवल केवल क्लास रिप्रेजेन्टेटिव (सी.आर.) को ही वोट देने का अधिकार होगा|

इसका साफ मतलब था कि कॉलेज के करीब 3000 छात्रों के बदले सिर्फ 50 छात्र ही वोट कर पाएंगे| छात्रों में असंतोष फैल गया.प्रिंसिपल के ऑफिस के बाहर भीड़ लग गई|

भाई साहब भी बिना सोचे समझे प्रिंसीपल मुर्दाबाद के नारों की भीड़ में जुड़ गए| उसी वक़्त उनके विरुद्ध खड़े उम्मीदवार आलोक श्रीवास्तव भीड़ में से निकल कर उनके पास आये और कान में कुछ फूंका||

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भाईसाब ने हाँ में सर हिलाया ,कोने में जाकर दोनों में क्या खुसुर पुसुर हुई . पता नहीं ,लेकिन किसी गंभीर प्लान को अंजाम दिया जा रहा था| अगले ही दिन सुबह, मैं अभी तक सो ही रहा था कि भाईसाब ने सुबह का दैनिक अखबार को रोल करके मेरे सर पर बजाया.

मैं हड़बड़ा कर उठा …ज़रा अखबार खोल और तीसरे पेज पे देख !!! भाईसाब ने सरप्राइज देने की अदा में मुस्कराते हुए कहा| मैंने फौरन उत्सुकता से तीसरा पेज खोला भाई साब और उनके प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार आलोक की तसवीरें , और ऊपर हेडलाइन थी…

“हर्ष साहनी और आलोक श्रीवास्तव का F.R.I कॉलेज में नई चुनाव प्रक्रिया के विरोध में आमरण अनशन”

आमरण अनशन ??? लगता है भाईसाब पागल हो गए है…मैंने मन ही मन सोचा …मैं तुरंत बिस्तर से उठ कर बाहर आया …

सुबह सुबह देखा तो किचन धुएँ से भरा हुआ था…अम्माँ आलू के मोटे मोटे परौंठे बनाये जा रही थीं, और भाईसाब दबाए जा रहे थे| भाईसाहब तनाव में थे और जल्दबाज़ी में बिना दाँतों का उपयोग किये , दही के साथ परौंठे यूँ निगले जा रहे थे जैसे जीवन में अंतिम बार भोजन कर रहे हों|

मैंने कहा …शांति से खाओ न, ऐसे कौन से कुत्ते पीछे पड़े हैं ? और अनशन में भी खाने की सेटिंग देर रात को हो ही जाएगी| भाईसाब ने मेरी बात पर ध्यान दिए बिना, दही से सनी दो उंगलियों से ऊपर की जेब से दस का नोट निकाला और मेरी तरफ सरकाया और जल्दबाज़ी में बोले …

ऐसा है…मैं जा रहा हूँ कॉलेज , तू इन दस रुपयों के दो मोटे वाले हार लेकर आना और मेरे और आलोक के गले में डाल देना …ठीक है … मेरे चेहरे पर कुटिल मुस्कान तैर गई|

दस के बदले पाँच रुपये के दो कमज़ोर वाले हार लिए और बाकी के पाँच रुपए जेब के हवाले कर दिए गए| कॉलेज पहुँच कर देखा , भाईसाब और आलोक कॉलेज की मुख्य इमारत के बाहर बने चबूतरे पर छोटे से तम्बू के नीचे गद्दे और गोल तकिए पर टेक लगाये बैठे थे और गले मे पहले से ही दो हार पड़े थे , सुबह के अखबार के तीसरे पेज को खोल कर आगे रक्खा हुआ था ,औऱ शान्त भाव से बैठे थे|

बीस पच्चीस लोगों की भीड़ लगी थी .

मैंने श्रद्धा भाव से कागज़ की पुड़िया खोली और सावधानी से दो हार निकाले| पहला हार आलोक के गले मे डालने के बाद , दूसरा हार भाईसाब के गले मे डाला और शुभकामना के भाव से मुस्कराते हुए भाईसाब के गले लग गया| भाईसाब अभी भी परांठों वाले डकार मार रहे थे|

लेकिन गले लगने के बाद छुटने में मुश्किल हो रही थी देखा तो भाईसाब ने चुपचाप मेरा कॉलर दबोच रक्खा था , अपना मुंह मेरे कान के पास लाकर फुसफुसाए….

ये पाँच के बदले दो रुपये वाले हार उठा लाए ? हरामीपंथी से बाज नहीं आओगे …निकाल बाकी पैसे …अब्बी …इधर…वरना यहीं पे मारूंगा|मैंने चुपचाप पाँच का नोट उनकी जैकेट की जेब में चुपके से सरका दिया और उन्होंने बड़बड़ाते हुए मेरा कॉलर छोड़ दिया| तमाशा होते रह गया …पाँच रुपये कमाने की खुशी गायब हो गई लेकिन बीच बाजार इज़्ज़त उछलने से बच गई|

थोड़ी ही देर में छात्रों और तमाशबीनों की भीड़ बढ़ गई| आलोक ने मुझे इशारे से बुलाया ,और बोला…

अमाँ यार कुछ नारे वारे लगवाओ , माहौल थोड़ा गरम करो …मैंने कहा , कौन सा नारा लगवाऊं बोलो ???

बोले , एक बार तुम्हारे भैया और मेरे जिंदाबाद का नारा लगवाओ तो … मैंने दोनों हथेलियों से कटोरे की शेप बनाकर मुँह के पास ले जाकर पुरजोर आवाज़ में पुकार लगाई

आलोक श्री….वास्तव

“जिन्दाबा…द” सामने से एक दो जनों ने मरियल आवाज़ में रेस्पॉन्स दिया

मैंने सोचा भाई साब के नाम को भी ट्राय किया जाये …

हर्ष …सा……हनी !!!

भीड़ में किसी मनचले ने जवाब दिया …“अमर रहे”…

आलोक ने मुझे बीच में ही रोककर हंसते हुए कहा… अमाँ तुम ये रहने दो …ये कॉलेज के लौंडे हैं , स्साले जीते जी अमर कर देंगे…ऐसा करो तुम “छात्र एकता ज़िंदाबाद” का नारा लगवाओ

मैंने फिर उसी अंदाज़ में पुकारा …”छात्र एकता”…

इस बार थोड़ा उत्साह बढ़ाने वाला रेस्पॉन्स आया …माहौल जमने लगा …इस तरह दोपहर हो गई …

उधर भाई साहब ने सुबह ज़रूरत से ज़्यादा खाये परांठो ने पेट में उत्पात मचाना प्रारम्भ किया आलोक ने भाईसाब से दूर हटते हुए कहा …अमाँ ये क्या ? सुबह फ्रेश होकर नहीं आये क्या ???

भाईसाब ने सकपकाते हुए कहा ,मैंने कुछ नहीं किया …मैंने तो कल से खाना भी नहीं खाया…पूछ लो बबल से …भाई साहब ने सफेद झूठ बोला|

मैंने सहमति जताते हुए कहा , भाईसाब सही कह रहे हैं , टेंशन में भाईसाब की भूख मर जाती है|

इतने में कॉलेज के गेट से सफेद अम्बेसडर कार प्रविष्ट हुई|

उसमें से प्रिंसीपल इफ़्तिख़ार अली अहमद उतरे , बिल्कुल मोहम्मद अली जिन्नाह जैसा व्यक्तित्व , ऊपर से काला चश्मा और थ्री पीस सूट में सज्ज , कार से उतर कर सीधे हमारे तम्बू के पास आये|

उन्हें देखते ही छात्रों की भीड़ तितर बितर हो गई|

“तुम दोनों मेरे ऑफिस में आओ” उन्होंने अपनी भारी आवाज़ और सख्त लहजे में आदेश दिया …और चल दिये …दोनों उम्मीदवारों ने एक दूसरे को ताली दी , मानों काम हो गया …

मैं , आलोक और भाईसाब कुछ छात्रों के साथ प्रिंसीपल के कमरे के पास पहुंचे| दरबान ने उन दोनों को अंदर जाने दिया और मुझे रोक लिया …ये हमारे बड़े भाई हैं, कहकर मैं भी अंदर घुस गया|

प्रिंसिपल ने हम तीनों को बैठने के इशारा किया …और हमारी उम्मीदों पर पानी फेरते हुए सख्त लहजे में फायरिंग प्रारम्भ की …

परमिशन ली थी ???

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नहीं सर …

तुम लोग यहाँ पढ़ने आते हो या राजनीति करने ??? न खुद पढ़ते हो न दूसरे को पढ़ने देते हो … दो दो साल से एक ही क्लास में अटके हो शर्म नहीं आती???

सर, पिछले साल एग्जाम के दौरान मेरी दादी …आलोक ने सहमी आवाज़ में जवाब दिया

चुप रहो !!! एक बार रस्टीकेट कर दिया तो कहीं एडमिशन नहीं मिलेगा| एक और बात कान खोल कर सुन लो , मैंने अपने ज़माने में तुमसे ज़्यादा गुंडागिरी की है , तुम जैसे लोगों से निपटना मुझे अच्छी तरह आता है …

आधे घंटे में तुम्हारा तंबू और बोरिया बिस्तरा उठाओ और दफा हो जाओ , वरना नामांकन रद्द कर दूंगा !!! इलेक्शन से भी जाओगे| समझे !!!

भाईसाब तो वैसे ही पेट से परेशान थे आलोक भी ढीला पढ़ गया … आख़िर आलोक ने धीमी आवाज़ में प्रस्ताव दिया …

ऐसा है सर … आप हमें अपने हाथों से जूस पिलवा दीजिये , हम अनशन तोड़ देते हैं …

प्रिंसिपल ने अपनी फाइलों पर साइन करते हुए बिना हमारी तरफ आँख उठाये जवाब दिया…गेट् आउट

जी क्या कहा सर ???

आई सैड “गेट आउट” मतलब दफा हो जाओ यहां से !!!

बड़े बेआबरू होकर प्रिंसिपल की ऑफिस से हम निकले …

बाहर कुछ छात्र और एक अख़बार का प्रतिनिधि भी खड़ा था| क्या हुआ??? क्या हुआ ??? हर कोई पूछने लगा|

भाईसाब को पब्लिक के बीच मे बात करने का कोई अनुभव न था और ऊपर से प्रिंसिपल की डांट से दोनों नर्वस लग रहे थे| आख़िर मैं बीच में उनके आधिकारिक प्रवक्ता की तरह टपक पड़ा और और सबसे शांत रहने की अपील की|

ऐसा है , हमारी माननीय प्रिंसिपल साहब से बड़े सौहार्दपूर्ण माहौल में मीटिंग हुई है, प्रिंसिपल महोदय ने कॉलेज और छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए आमरण अनशन को समाप्त करने की अपील की है , जिस पर हम सकारात्मक रूप से विचार कर रहे हैं|

आलोक ने भाईसाब से कहा : यार तुम्हारा भाई तो बहुत बढ़िया बोलता है|

भाई साब ने अभिमान से जवाब दिया – “अभी तक एक बार भी फेल नहीं हुआ है”

खैर…भाईसाब ने वही पाँच का नोट निकाला और दो गिलास जूस और एक “गैस हर” चूरन का पाउच लाने को कहा . ऐसा करना, तू ही पिला देना हम अनशन खत्म कर देंगे|

मैं कॉलेज के बाहर खड़े फ्रूट जूस वालों की स्टाल की तरफ बढ़ा मगर तुरंत ही निगाह गन्ने के रस की लॉरी पर गई| दिल ने कहा , ये भी तो जूस है …”गन्ने का जूस”

कहाँ बीस पैसे का गन्ने का “जूस” कहाँ एक रुपये का मौसमी का जूस… सीधा एक रुपये साठ पैसे का प्रॉफिट , मैंने गन्ने के दो गिलास “जूस” में बीस पैसे का “गैस हर” चूर्ण भाई साब के गिलास में मिक्स करवाया|

तुरंत जाकर ग्लास पकड़कर उसके तले पर हथेली लगाकर भाईसाब के होठों तक सम्मान पूर्वक पहुंचाया .

“जूस” का रंग देखकर भाईसाब चिढ़ गए …और दाँत किटकिटाते हुए बोले “जी करता है एक झापड़ लगाऊँ तुम्हारे मुँह पे … ये जूस है ???

मैंने कहा , अब पी भी लो चार आने का तो “गैस हर” चूरन मिक्स किया है , पी लो दिमाग़ ठंडा हो जाएगा| सुबह से प्यासे भाईसाब ने कुढ़ते हुए गन्ने का “जूस” एक ही साँस में गटक लिया …

और साढ़े चार सेकेंड लंबा डकार लिया …

दिन भर का तनाव “हवा” बनकर बाहर निकल गया| भाईसाब ने राहत की साँस ली …

मैं भी ख़ुश था …

चार रुपए पैंतालीस पैसे का नेट प्रॉफिट जो जेब में खनक रहा था|


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